Sunday, October 27, 2013

पाक को भी चुकानी होगी इस तनाव की कीमत

अमेरिका ने आधिकारिक रूप से नवाज़ शरीफ की इस सलाह को खारिज कर दिया कि कश्मीर-मामले में उसे मध्यस्थता करनी चाहिए। अमेरिका का कहना है कि दोनों देशों को आपसी संवाद से इस मसले को सुलझाना चाहिए। अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता जेन पसाकी ने ट्विटर पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा कि हमारे दृष्टिकोण में बदलाव नहीं हुआ है। अमेरिका दोनों देशों के बीच संवाद को बढ़ावा देता रहेगा। उधर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सीमा पर लगातार गोलीबारी को लेकर नवाज़ शरीफ के प्रति अपनी निराशा को व्यक्त किया है। नियंत्रण रेखा पर शांति बनाए रखने के लिए दोनों देशों के बीच सन 2003 में जो समझौता हुआ था, वह पिछले दस साल से अमल में आ रहा था। अब ऐसी क्या बात हुई कि पिछले 10 महीनों से लगातार कुछ न कुछ हो रहा है।

Saturday, October 26, 2013

भावनाओं के भँवर में गोते लगाते राहुल

लगता है कि राहुल गांधी के भाषणों को लिखने वाले या उनके इनपुट्स तय करने वाले तीन-चार दशक पुरानी परम्परा के हिसाब से चल रहे हैं। उन्हें लगता है कि नेता जो बोल देगा उसका तीर सीधे निशाने पर जाकर लगेगा। उसके बाद अहो-अहो कहने वाली मंडली उस बात को आसमान पर पहुँचा देगी। मुज़फ्फरनगर के युवाओं के पाकिस्तानी खुफिया एजेंटों के सम्पर्क में आने वाली बात कह कर राहुल ने नासमझी का परिचय दिया है। नरेन्द्र मोदी के हाथों उनकी फज़ीहत हुई सो अलग किसी दूसरे समझदार व्यक्ति को भी यह बात समझ में नहीं आएगी। उन्हें अपने भाषणों में सावधानी बरतनी होगी।
राहुल गांधी अपने राजनीतिक जीवन के बेहद महत्वपूर्ण मोड़ पर हैं। निर्णायक रूप से उनके सफल या विफल होने में अभी कुछ महीने बाकी हैं, पर अंतर्विरोध उजागर होने लगे हैं। उनकी विश्व-दृष्टि और राजनीतिक मिशन को लेकर सवाल उठे हैं। अपनी पार्टी का भविष्य वे किस रूप में देख रहे हैं और इसमें व्यक्तिगत रूप से वे क्या भूमिका निभाना चाहते हैं? ऐसे समय में जब उन्हें दृढ़-निश्चयी, सुविचारित और सुलझे राजनेता के रूप में सामने आना चाहिए, वे संशयी और उलझे व्यक्ति के रूप में नज़र आ रहे हैं। पहले अपनी माँ, फिर पिता, फिर दादी का ज़िक्र करते वक्त बेशक वे अपनी भावनाओं को व्यक्त कर रहे हैं और इसका उन्हें अधिकार है। पर इससे विसंगति पैदा होती है। उनके परिवार की त्रासदी पर पूरे देश की हमदर्दी है। वे कहते हैं कि उन्होंने मेरे पिता को मारा, मेरी दादी की हत्या की और शायद एक दिन मेरी भी हत्या हो सकती है। ऐसा कहते ही वे अपने पारिवारिक अंतर्विरोधों का पिटारा खोल रहे हैं।

Thursday, October 24, 2013

पाकिस्तान से निपटने का विकल्प क्या है?

जम्मू-कश्मीर में गोलाबारी अब चिंताजनक स्थिति में पहुँच गई है. मंगलवार को पाकिस्तानी सेना ने लाउडस्पीकर पर घोषणा करके केरन सेक्टर के एक आदर्श गाँव में कम्युनिटी हॉल का निर्माण रुकवा दिया. सन 2003 में दोनों देशों ने नियंत्रण रेखा के आसपास के गाँवों में जीने का माहौल बनाने का समझौता किया था. लगता है वह खत्म हो रहा है. पिछले दस महीनों से कड़वाहट बढ़ती जा रही है. जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई चाहते हैं. उन्होंने कहा कि यदि पाकिस्तान लाइन ऑफ कंट्रोल पर संघर्ष विराम का उल्लंघन करना जारी रखता है तो केंद्र सरकार को अन्य विकल्पों पर विचार करना चाहिए. विकल्प क्या है? उधर नवाज शरीफ ने अमेरिका से हस्तक्षेप की माँग करके घाव फिर से हरे कर दिए हैं. नवाज शरीफ रिश्तों को बेहतर बनाने की बात करते हैं वहीं भारत को सबसे तरज़ीही मुल्क का दर्ज़ा देने भर को तैयार नहीं हैं. उनका कहना है कि इस मामले पर भारत के चुनाव के बाद बात होगी. क्या मौज़ूदा तनाव का रिश्ता लोकसभा चुनाव से भी जुड़ा है? क्या पाकिस्तान को लगता है कि भारत में सत्ता-परिवर्तन होने वाला है? सत्ता-परिवर्तन हो भी गया तो क्या भारतीय विदेश नीति में कोई बड़ा बदलाव आ जाएगा?

Wednesday, October 23, 2013

शटडाउन अंकल सैम

प्रसिद्ध पत्रिका इकोनॉमिस्टने लिखा है, आप कल्पना करें कि किसी टैक्सी में बैठे हैं और ड्राइवर तेजी से चलाते हुए एक दीवार की और ले जाए और उससे कुछ इंच पहले रोककर कहे कि तीन महीने बाद भी ऐसा ही करूँगा। अमेरिकी संसद द्वारा अंतिम क्षण में डैट सीलिंग पर समझौता करके फिलहाल सरकार को डिफॉल्ट से बचाए जाने पर टिप्पणी करते हुए पत्रिका ने लिखा है कि इस लड़ाई में सबसे बड़ी हार रिपब्लिकनों की हुई है। डैमोक्रैटिक पार्टी को समझ में आता था कि अंततः इस संकट की जिम्मेदारी रिपब्लिकनों पर जाएगी। उन्होंने हासिल सिर्फ इतना किया कि लाभ पाने वालों की आय की पुष्टि की जाएगी। पर क्या डैमोक्रेटों की जीत इतने भर से है कि बंद सरकार खुल गई और डिफॉल्ट का मौका नहीं आया? वे हासिल सिर्फ इतना कर पाए कि डैट सीलिंग तीन महीने के लिए बढ़ा दी गई। अब तमाशा नए साल पर होगा। यह संकट यों तो अमेरिका का अपना संकट लगता है, पर इसमें भविष्य की कुछ संभावनाएं भी छिपीं हैं। अमेरिकी जीवन की महंगाई हमारे जैसे देशों के लिए अच्छा संदेश लेकर भी आई है। कम से कम स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में हम न केवल विश्व स्तरीय है, बल्कि खासे किफायती भी हैं। इसके पहले अमेरिका में आर्थिक प्रश्नों पर मतभेद सरकार के आकार, उसके ख़र्चों और अमीरों पर टैक्स लगाने को लेकर होते थे, पर इस बार ओबामाकेयर का मसला था।

Tuesday, October 22, 2013

सोशल मीडिया का हस्तक्षेप यानी, ठहरो कि जनता आती है

ग्वालियर में राहुल गांधी की रैली खत्म ही हुई थी कि मीनाक्षी लेखी का ट्वीट आ गया माँ की  बीमारी का नाम लेने पर तीन कांग्रेसी सस्पेंड कर दिए गए, अब राहुल गांधी वही कर रहे हैं। उधर दिग्विजय सिंह ने ट्विटर पर नरेन्द्र मोदी को चुनौती दी, मुझसे बहस करो। रंग-बिरंगे ट्वीटों की भरमार है। माना जा रहा है कि सन 2014 के लोकसभा चुनाव में पहली बार सोशल मीडिया का असर देखने को मिलेगा। इस साल अप्रेल में 'आयरिस नॉलेज फाउंडेशन और 'इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया' ने 'सोशल मीडिया एंड लोकसभा इलेक्शन्स' शीर्षक से एक अध्ययन प्रकाशित किया था, जिसमें कहा गया था कि भारत की 543 में से 160 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जिनके नतीजों पर सोशल मीडिया का प्रभाव पड़ेगा। सोशल मीडिया का महत्व इसलिए भी है कि चुनाव से 48 घंटे पहले चुनाव प्रचार पर रोक लगने के बाद भी फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग सक्रिय रहेंगे। उनपर रोक की कानूनी व्यवस्था अभी तक नहीं है। दिल्ली में आप के पीछे सोशल मीडिया की ताकत भी है।

Sunday, October 20, 2013

राडिया टेपों की तार्किक परिणति

सुप्रीम कोर्ट ने कॉरपोरेट लॉबीस्ट नीरा राडिया के साथ प्रभावशाली लोगों की बातचीत से जुड़े छह मामलों में आगे जाँच के आदेश देकर इसे तार्किक परिणति तक पहुँचा दिया है। नीरा राडिया की नौकरशाहों, कारोबारियों और नेताओं के साथ रिकार्ड की गई बातचीत के बारे में अदालत ने कहा है कि पहली नजर में इसमें सरकारी अधिकारियों और निजी उद्यमियों की मिलीभगत से किसी गहरी साजिशका पता चलता है। बातचीत से जाहिर होता है कि प्रभावशाली लोग किसी दूसरे मकसद से निजी लाभ उठाने के लिए भ्रष्ट तरीके अपनाते हैं। नीरा राडिया मामला हमारी व्यवस्था के भीतर छिपे भ्रष्ट-आचरण और उसके निराकरण की सामर्थ्य का टेस्ट-केस साबित होगा। अभी तक यह मामला टू-जी के साथ पुछल्ले की तरह जुड़ा था। अब यह पूरी तरह स्वतंत्र मामलों का एक समूह बनेगा। अदालत ने इसके पहले सीबीआई को फटकार लगाई थी कि वह इसे केवल टू-जी से जोड़कर न चले। अब कोर्ट ने मिली-भगत और गहरी साजिश जैसे शब्दों का प्रयोग करके इस मामले को काफी महत्वपूर्ण बना दिया है। सम्भव है कल केवल ये टेप देश के रूपांतरण के सूत्रधार बनें।

Monday, October 14, 2013

इंटरनेशनल हैरल्ड ट्रिब्यून अब न्यूयॉर्क टाइम्स बना

अंतरराष्ट्रीय खबरों के लिए दुनिया के सबसे मशहूर अखबार इंटरनेशनल हैरल्ड ट्रिब्यून का आज आखिरी अंक प्रकाशित हुआ। कल यानी 15 अक्टूबर से यह नए नाम इंटरनेशनल न्यूयॉर्क टाइम्स नाम से निकलेगा। यह इस अखबार का पहली बार पुनर्नामकरण संस्कार नहीं हुआ ङै। न्यूयॉर्क हैरल्ड नाम के अमेरिकी अखबार ने सन 1887 में जब अपना यूरोप संस्करण शुरू किया तो उसका नाम रखा न्यूयॉर्क हैरल्ड ट्रिब्यून, जो बाद में इंटरनेशनल हैरल्ड ट्रब्यून बना।  इंटरनेशनल न्यूयॉर्क टाइम्स बनने का मतलब है कि यह अब पूरी तरह न्यूयॉर्क टाइम्स की सम्पत्ति हो गया है। कुछ साल पहले तक यह अखबार वॉशिंगटन पोस्ट के सहयोग से चल रहा था। इंटरनेशनल हैरल्ड ट्रिब्यून का एक भारतीय संस्करण हैदराबाद से निकलता था, जिसे डैकन क्रॉनिकल निकालता था। हालांकि भारत से विदेशी प्रकाशन को निकालना सम्भव नहीं है, पर कई प्रकार की जटिल जुगत करके इसे निकाला जा रहा था और इसके सम्पादक एमजे अकबर थे। यह संस्करण कल से नहीं मिलेगा। 

सन 2007 के वीडियो में देखिए किस तरह तैयार होता था इंटरनेशनल हैरल्ड ट्रिब्यून

Sunday, October 13, 2013

सरकार की ओर से जवाब तो राहुल को भी देना होगा

इंटरनेट पर पप्पू और फेंकू दो सबसे ज्यादा प्रचलित शब्द हैं। जाने-अनजाने भारतीय राजनीति दो नेताओं के इर्द-गिर्द सिमट गई है। परम्परा से भारतीय जनता पार्टी व्यक्ति केन्द्रित पार्टी नहीं है। और कांग्रेस हमेशा व्यक्ति केन्द्रित पार्टी रही है। पर इस बार दोनों अपनी परम्परागत भूमिकाओं से हट गईं हैं। भाजपा का सारा जोर व्यक्तिगत नेतृत्व पर है और कांग्रेस नेतृत्व के इस सीधे टकराव से भागती नजर आती है। सच बात है कि भारतीय चुनाव अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव की तरह नहीं होते जहाँ दो राष्ट्रीय नेता आमने-सामने बहस करें। यहाँ संसद का चुनाव होता है, जिसमें पार्टियाँ महत्वपूर्ण होती हैं। और संसदीय दल अपने नेता का चुनाव करते हैं। वास्तव में यह आदर्श स्थिति है। इंदिरा इज़ इंडिया तो कांग्रेस का ही नारा था। सच यह भी है कि लाल बहादुर शास्त्री, पीवी नरसिम्हाराव और मनमोहन सिंह तीनों नेताओं को प्रधानमंत्री बनने का मौका तब मिला जब परिवार का कोई नेता तैयार नहीं था। पर आज स्थिति पूरी तरह बदली हुई है।

Thursday, October 10, 2013

अपने लिए कुआं और खाई दोनों खोदे हैं कांग्रेस ने तेलंगाना में

कांग्रेस के लिए खौफनाक अंदेशों का संदेश लेकर आ रहा है तेलंगाना. जैसा कि अंदेशा था इसकी घोषणा पार्टी के लिए सेल्फगोल साबित हुई है. इस तीर को वापस लेने और छोड़ने दोनों हालात में उसे ही घायल होना है. सवाल इतना है कि नुकसान कम से कम कितना हो और कैसे हो? इस गफलत की जिम्मेदारी लेने को पार्टी का कोई नेता तैयार नहीं है. प्रदेश की जनता, उसकी राजनीति और प्रशासन दो धड़ों में बँट चुका है. मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी इस फैसले से खुद को काफी पहले अलग कर चुके हैं. शायद 2014 के चुनाव के पहले यह राज्य बन भी नहीं पाएगा. यानी कि इसे लागू कराने की जिम्मेदारी आने वाली सरकार की होगी.

Sunday, October 6, 2013

चार चुनाव, तीन परीक्षाएं

इसे सेमीफाइनल कहें या कोई और नाम दें, पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव काफी महत्वपूर्ण साबित होने वाले हैं। इनमें नरेन्द्र मोदी, राहुल गांधी और दिल्ली में आप की परीक्षा होगी। सन 2014 के लोकसभा चुनाव में यह तीनों बातें महत्वपूर्ण साबित होंगी। इन पाँचों राज्यों से लोकसभा की 73 सीटें हैं। हालांकि लोकसभा और विधानसभा के मसले अलग होते हैं, पर इस बार लगता है कि विधान सभा चुनावों पर स्थानीय मसलों के मुकाबले केन्द्रीय राजनीति का असर दिखाई पड़ेगा, जैसाकि दिल्ली के पालिका चुनावों में नजर आया था। पांच में फिलहाल तीन राज्य दिल्ली, मिजोरम और राजस्थान कांग्रेस के पास हैं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ एक दशक से भाजपा के मजबूत किले साबित हो रहे हैं। दोनों पार्टियों में अपनी बचाने और दूसरे की हासिल करने की होड़ है। मिजोरम को छोड़ दें तो शेष चार राज्य हिन्दी भाषी हैं और यहाँ मुकाबले आमने-सामने के हैं। दिल्ली में आप के कारण एक तीसरा फैक्टर जुड़ा है। अन्ना हजारे के आंदोलन की ओट में उभरी आम आदमी पार्टी परम्परागत राजनीतिक दल नहीं है। शहरी मतदाताओं के बीच से उभरी इस पार्टी के तौर-तरीके शहरी हैं। इसने दिल्ली के उपभोक्ताओं, ऑटो चालकों और युवा मतदाताओं की एक टीम तैयार करके घर-घर प्रचार किया है। खासतौर से मोबाइल फोन, सोशल मीडिया तथा काफी हद तक मुख्यधारा के मीडिया की मदद से। हालांकि उसी मीडिया ने बाद में इससे किनारा कर लिया। मिजोरम में कांग्रेस के सामने कोई बड़ा दावेदार नहीं है।

Tuesday, October 1, 2013

क्या यह शुद्धीकरण का श्रीगणेश है?

चारा मामले में लालू यादव के अपराधी घोषित होने के बाद एक सवाल मन में आता है कि क्या राहुल गांधी के दिमाग में कहीं बिहार की भावी राजनीति का नक्शा तो नहीं था? उन्होंने यह सब सोचा हो या न सोचा हो, पर नीतीश कुमार ने राहुल के वक्तव्य का तपाक से स्वागत किया। चारा घोटाले में उनके भी एक सांसद शहीद हुए हैं, पर लालू की शिकस्त उनकी विजय है। अब राजनेताओं का गणित नए सिरे से बनेगा और बिगड़ेगा। सीबीआई की राजनीतिक भूमिका और रंग लाएगी। सुप्रीम कोर्ट का 10 जुलाई का फैसला दुधारी तलवार है, जिससे दोनों ओर की गर्दनें कटेंगी। राहुल गांधी की मंशा न जाने क्या थी, पर निशाने पर मनमोहन सिंह भी आ गए हैं। उनका सीना भी जख्मी है। लालू का मामला एक ओर सुधरती व्यवस्था को लेकर आश्वस्त करता है, वहीं राजनीति में बढ़ने वाले सम्भावित अंतर्विरोधों की ओर इशारा भी कर रहा है।

चुनाव के इस दौर में राजनीति का रथ गहरे ढलान पर उतर गया है। देखना यह है कि समतल पर पहुँचने के पहले इसके कितने चक्के बचेंगे। पिछले शुक्रवार को राहुल ने जो कुछ कहा उससे उनकी राजनीति का कच्चापन सामने आता है। वे व्यवस्थावादी हैं, यानी सिस्टम की बात करते हैं, व्यक्ति की नहीं। दूसरी नेता के रूप में उन्होंने शासन-व्यवस्था को ढेर कर दिया। वे सत्ता के भीतर हैं या बाहर यह समझ में नहीं आता। शुद्धतावादी हैं या व्यावहारिक राजनीति के क्रमबद्ध सुधार के समर्थक? उन्होंने जो लक्ष्मण रेखा खींची है उसे लाँघना सरकार के लिए मुश्किल होगा। पर लालू इस राहुल रेखा की पहली कैजुअल्टी हैं। इससे बिहार का ही नहीं आने वाले समय की केन्द्रीय राजनीति का गणित बिगड़ेगा। राजनीति का गटर फिर भी साफ नहीं होगा। पिछले तीन साल की उथल-पुथल के बावजूद व्यवस्था-सुधार की सारी बातें पीछे रह गईं हैं। लोकपाल कानून, ह्विसिल ब्लोवर कानून, सिटिजन चार्टर और चुनाव सुधार कहाँ चले गए?

Monday, September 30, 2013

लालू के फैसले के बाद क्या बिहार करवट लेगा?

 सोमवार, 30 सितंबर, 2013 को 09:38 IST तक के समाचार
लालू प्रसाद यादव की आरजेडी पार्टी
पिछले शुक्रवार को दिल्ली के प्रेस क्लब में राहुल गांधी की हैरतभरी घोषणा ने केवल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए ही असमंजस पैदा नहीं किया, बल्कि उत्तर भारत के महत्वपूर्ण प्रदेश बिहार की राजनीति में उलटफेर के हालात भी पैदा कर दिए हैं.
पिछले एक साल से आरजेडी नेता लालू यादव ने जगह-जगह रैलियाँ करके प्रदेश की राजनीति में न सिर्फ अपनी वापसी के हालात पैदा कर लिए हैं, बल्कि एनडीए से टूटे जेडीयू का राजनीतिक गणित भी बिगाड़ दिया है.
मई में पटना की परिवर्तन रैली और जून में महाराजगंज के लोकसभा चुनाव में प्रभुनाथ सिंह को विजय दिलाकर लालू ने नीतीश कुमार के लिए परेशानी पैदा कर दी थी.
उस वक़्त लालू प्रसाद ने कहा था कि अगले लोकसभा चुनाव में बिहार की सभी 40 सीटों पर आरजेडी की जीत का रास्ता तैयार हो गया है. वह अतिरेक ज़रूर था, पर ग़ैर-वाजिब नहीं. फिलहाल व्यक्तिगत रूप से लालू और संगठन के रूप में उनकी पार्टी की परीक्षा है.

अध्यादेश का क्या होगा?

दाग़ी जनप्रतिनिधियों की सदस्यता बचाने वाला अध्यादेश अधर में है और अब लगता नहीं कि सरकार इस पर राष्ट्रपति के दस्तख़त कराने पर ज़ोर देगी. अगले हफ़्ते इसके पक्ष में फैसला हुआ भी, तो शायद लालू यादव के लिए देर हो चुकी होगी.
लालू यादव
लालू यादव राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी रहे हैं.
अगले हफ़्ते कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य रशीद मसूद से जुड़े मामले में भी सज़ा सुनाई जाएगी. बहरहाल उनके मामले का राजनीतिक निहितार्थ उतना गहरा नहीं है, जितना लालू यादव के मामले का है.
राहुल गांधी के अध्यादेश को फाड़कर फेंक देने का जितना मुखर स्वागत नीतीश कुमार ने किया है, वह ध्यान खींचता है. क्या नीतीश कुमार को इसका कोई दूरगामी परिणाम नज़र आ रहा है?
लालू यादव राजनीतिक विस्मृति में गर्त में गए तो तीन-चार महत्वपूर्ण सवाल सामने आएंगे. बिहार में आरजेडी एक महत्वपूर्ण ताक़त है. 2010 के विधानसभा के चुनाव में जेडीयू ने 115 सीटों पर जीत हासिल की थी.

Sunday, September 29, 2013

सुरक्षा तंत्र के छिद्रों को तो बंद कीजिए

इधर जनरल वीके सिंह और सरकार के बीच नोकझोंक की खबरें गर्म थीं कि जम्मू में फौजी कैम्प पर आतंकी हमले की खबरें सुनाई पड़ीं। इसके दो रोज पहले पेशावर और केन्या के एक मॉल से खूंरेजी की खबरें सुनाई पड़ीं। इन सारी बातों का रिश्ता नहीं है, पर ध्यान से देखें तो है। इन सबके केन्द्र में पाकिस्तान का जेहादी ताना-बाना और हमारी सुरक्षा व्यवस्था के सवाल हैं। इसमें दो राय नहीं कि जनरल वीके सिंह और सरकार के बीच तनातनी किसी बड़े सैद्धांतिक कारण से नहीं थी। यह शुद्ध रूप से सेना के भीतर की गुटबाजी की देन थी। इस मामले को ज्यादा बढ़ावा मिलने के पहले ही खत्म कराने की जिम्मेदारी राजनीतिक नेतृत्व की थी। ऐसा हो नहीं पाया। धीरे-धीरे विवाद ऐसी शक्ल लेता जा रहा है जो देश के हित में नहीं है। जनरल सिंह के इस वक्तव्य को लेकर काफी चर्चा है कि सेना कश्मीर के राजनीतिक नेताओं को देश की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए धन का इस्तेमाल करती थी। इस वक्तव्य पर गौर करें तो इसमें कोई ऐसी बात नहीं थी जो हमारे लिए असमंजस पैदा करे।

Thursday, September 26, 2013

सुरक्षा के गले में राजनीति का फंदा

जनरल वीके सिंह को लेकर विवाद आने वाले समय में बड़ी शक्ल लेगा. जाने-अनजाने राजनीति ने रक्षा व्यवस्था को अपने घेरे में ले लिया है, जिसके दुष्परिणाम भी होंगे. हमारी सेना पूरी तरह अ-राजनीतिक है और इसे विवादों से बाहर रखने की परम्परा है. फिर भी यह विवाद के घेरे में आ रही है तो जिम्मेदार कौन है? क्या हम सीबीआई या किसी दूसरी जाँच एजेंसी की मदद से ऐसे मामलों की जाँच करा सकते हैं? हाल में इशरत जहाँ मामले को लेकर खुफिया एजेंसियों और जाँच एजेंसियों की टकराहट सामने आई है, जिसके दुष्परिणाम सामने हैं. यह सब क्या व्यवस्था को साफ करने में मदद करेगा या हालात और बिगड़ेंगे? जनरल वीके सिंह का मामला सन 2004 के बाद दिल्ली में बनी यूपीए सरकार के साथ शुरू हुआ है. उसके पहले एनडीए के शासन में रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडिस और नौसेनाध्यक्ष विष्णु भागवत के बीच भी विवाद हुआ था, जिसकी परिणति विष्णु भागवत की बर्खास्तगी में हुई थी. वर्तमान विवाद सन 2005 में जनरल जेजे सिंह की थल सेनाध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के बाद शुरू हुआ. इसका प्रस्थान बिन्दु वही नियुक्ति है और इसके पीछे सेना के भीतर बैठी गुटबाजी है.

Wednesday, September 25, 2013

भाजपा का नमो नमः


देश की राजनीति का रथ अचानक गहरे ढाल पर उतर गया है, जिसे अब घाटी की सतह का इंतजार है जहाँ से चुनाव की चढ़ाई शुरू होगी। संसद के सत्र में जरूरी विधेयकों को पास कराने में सफल सरकार ने घायल पड़ी अर्थव्यवस्था की मरहम-पट्टी शुरू कर दी है। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने नरेन्द्र मोदी को लेकर लम्बे अरसे से चले आ रहे असमंजस को खत्म कर दिया है। देखने को यह बचा है कि अब लालकृष्ण आडवाणी करते क्या हैं। मुजफ्फरनगर के दंगों के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश में माहौल बिगड़ चुका है। कुछ लोग इसे भी चुनाव की तैयारी का हिस्सा मान रहे हैं। बहरहाल चुनाव आयोग ने पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं। आयोग की टीम ने उन सभी पाँच राज्यों का दौरा शुरू कर दिया है, जहां साल के अंत में चुनाव होने हैं।

Sunday, September 22, 2013

तीन सर्वेक्षण तेरह तरह के नतीजे

 शनिवार, 21 सितंबर, 2013 को 11:41 IST तक के समाचार
आगामी विधानसभा चुनावों में चार राज्यों की तस्वीर क्या होगी इसे लेकर क़यास शुरू हो गए हैं.
इन क़यासों को हवा दे रहे हैं चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण जिनपर भले ही यक़ीन कम लोगों को हो पर वे चर्चा के विषय बनते हैं.
हालांकि चुनाव तो पांच राज्यों में होने हैं लेकिन सर्वेक्षण करने वालों ने सारा ध्यान चार राज्यों पर केंद्रित कर रखा है.
हाल में जो सर्वेक्षण सामने आए हैं वे क्लिक करेंकांग्रेस के ह्रास और भारतीय जनता पार्टी के उदय की एक धुंधली सी तस्वीर पेश कर रहे हैं.
सर्वेक्षणों ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीगढ़ के बारे में कमोबेश साफ़ लेकिन दिल्ली के बारे में भ्रामक तस्वीर बनाई है.
इसकी एक वजह आम आदमी पार्टी यानी ‘आप’ की उपस्थिति है जो एक राजनीतिक समूह है. उसकी ताक़त और चुनाव को प्रभावित करने के सामर्थ्य के बारे में क़यास इस भ्रम को और भी बढ़ा रहे हैं.
तीन सर्वेक्षण तीन तरह के नतीजे दे रहे हैं जिनसे इनकी विश्वसनीयता को लेकर संदेह पैदा होते हैं. सर्वेक्षणों के बुनियादी अनुमानों में इतना भारी अंतर है कि संदेह के कारण बढ़ जाते हैं.
दिल्ली का महत्व
दिल्ली भारत के मध्य वर्ग का प्रतिनिधि शहर है. यहाँ पर होने वाली राजनीतिक हार या जीत के व्यावहारिक रूप से कोई माने नहीं हों पर प्रतीकात्मक अर्थ गहरा होता है. यहाँ से उठने वाली हवा के झोंके पूरे देश को प्रभावित करते हैं.
हाल में दिल्ली गैंगरेप के ख़िलाफ़ और उसके पहले अन्ना हज़ारे के आंदोलन की ज़मीन देश-व्यापी नहीं थी पर दिल्ली में होने के कारण उसका स्वरूप राष्ट्रीय बन गया. इसकी एक वजह वह क्लिक करेंख़बरिया मीडिया है, जो दिल्ली में निवास करता है.
भाजपा का लोगो
हाल ही में भाजपा ने दिल्ली में अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा की.
दिल्ली की इसी प्रतीकात्मक महत्ता के कारण यहाँ के नतीजे महत्वपूर्ण होते हैं भले ही वे दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघों के हों या दिल्ली विधानसभा के.
हाल में भाजपा के मंच पर प्रधानमंत्री के प्रत्याशी का नाम घोषित करने की प्रक्रिया पर जो ड्रामा शुरू हुआ था उसका असर दिखाई पड़ने लगा है और इसमें भी पहल दिल्ली की है.
नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करने के साथ ही उनकी रैलियों का कार्यक्रम बन रहा है.

क्या है मोदी की विश्व-दृष्टि?

पिछले हफ्ते रेवाड़ी में हुई रैली में नरेन्द्र मोदी ने दो महत्वपूर्ण बातें कहीं जिनपर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने एक तो पाकिस्तान के बरक्स अटल बिहारी वाजपेयी की नीतियों का समर्थन किया। और दूसरे यह कहा कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को मिलकर दक्षिण एशिया की गरीबी दूर करने के रास्ते तलाशने चाहिए। पाकिस्तान के अखबार द नेशन इस खबर को शीर्षक दिया फाइट पावर्टी नॉट इंडिया, मोदी आस्क्स पाकिस्तान। मोदी ने कहा, पाकिस्तान के शासक अगले दस साल तक अपनी जमीन का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों में शामिल होने से रोक सकें तो मैं पूरे विश्वास के साथ कहता हूँ कि पाकिस्तान वह प्रगति देखेगा जो पिछले साठ साल में नहीं देखी होगी। मोदी की बातें आमतौर पर उग्र राष्ट्रवादी शब्दावली में लिपटी होती हैं। पिछले स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री को जवाब देने वाले भाषण में उन्होंने चीनी घुसपैठ और पाकिस्तानी सीमा पर सैनिकों की गर्दन काटे जाने के मामलों में मनमोहन सिंह की प्रतिक्रिया को बेहद कमजोर और क्षीण साबित किया था। पर लगता है प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में उनका नाम तय हो जाने के बाद उनकी शब्दावली संयत और सार्थक हुई है।

नरेन्द्र मोदी की विश्व दृष्टि क्या है? मसलन यदि वे प्रधानमंत्री बने तो उनकी विदेश नीति क्या होगी? क्या वे पाकिस्तान और चीन से सीधे मुठभेड़ मोल लेंगे? चीन के साथ व्यापारिक सम्बन्धों पर उनका दृष्टिकोण क्या होगा? उन्हें वीजा न देने वाले अमेरिका के साथ उनके रिश्ते कैसे होंगे? इन बातों पर अभी ज्यादा चर्चा नहीं हुई है, पर होनी चाहिए। पहली बात तो यह है कि देश की विदेश नीति पूरे देश की नीति होती है, किसी व्यक्ति विशेष की नीति के रूप में उसे देखना मुश्किल होता है। इसीलिए उसमें एक प्रकार की निरंतरता होती है। दूसरे मोदी एक पार्टी के नेता हैं। पार्टी भी इन सवालों पर विमर्श करती है। व्यक्तिगत रूप से नेता भी इसमें भूमिका निभाते हैं जैसे कि पाकिस्तान के संदर्भ में अटल बिहारी वाजपेयी ने निभाई थी।

Saturday, September 21, 2013

रैनबैक्सीः भारतीय औषधि उद्योग की प्रतिष्ठा को धक्का

रैनबैक्सी की दवाओं पर अमेरिका में पाबंदी लगने से भारतीय शेयर बाजार में निवेशकों के 5,855 करोड़ रुपए एक दिन में ही डूब गए। दुनिया में बिकने वाली तकरीबन चालीस फीसदी जेनरिक दवाएं भारत में बनती हैं। क्या इस फैसले का असर इस पूरे कारोबार पर पड़ेगा? भारत में डॉ रेड्डीज लैबोरेटरीज़, ल्यूपिन लिमिटेड, सन फार्मा और सिपला वगैरह के कारोबार पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ा है। अमेरिकी एफडीए सभी कंपनियों का निरीक्षण नहीं करता, पर रैनबैक्सी के साथ हालात बिगड़ते चले गए। सही है कि अमेरिकी मानक कड़े होते हैं, पर रैनबैक्सी के मामले में शिकायतें केवल कड़ाई की नहीं थीं। क्या हम वास्तव में दवाओं के ठीक से क्लीनिकल ट्रायल भी नहीं कर सकते? सवाल यह भी है कि हमारे देश के औषधि नियामक किस बात का इंतजार कर रहे हैं? क्या उन्हें अपने देश की कम्पनी से जुड़े मामले की जाँच नहीं करनी चाहिए? क्या कारण है कि हमारे देश में ऐसी कंपनियाँ नहीं है जो नए अनुसंधान के आधार पर दवाएं बनाने की कोशिश करें? क्या हम केवल नकल कर सकते हैं वह भी टेढ़े तरीके से? इस मामले में अमेरिका का विसिल ब्लोवर कानून भी काम में आया है। कंपनी के एक पूर्व अधिकारी की शिकायतें भी इसमें शामिल हैं। इसलिए इस सवाल पर भी विचार करने की जरूरत है कि हम विसिल ब्लोवर कानून को पास करने देरी क्यों कर रहे हैं? और यह भी कि इस कानून को निजी कंपनियों पर भी क्यों नहीं लागू करना चाहिए?

Monday, September 16, 2013

मोदीः मसीहा या मुसीबत

 शनिवार, 14 सितंबर, 2013 को 20:16 IST तक के समाचार
भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार आखिरकार घोषित कर दिया. लाल कृष्ण आडवाणी के साथ-साथ कुछ और लोगों के तमाम विरोधों के बावजूद मोदी के नाम की घोषणा क्या बीजेपी में एक नए अध्याय की शुरूआत होगी.
क्या मोदी की उम्मीदवारी बीजेपी के लिए तुरूप का पत्ता साबित होगी या इससे पार्टी का अंदरूनी झगड़ा और बढ़ जाएगा. आप क्या सोचते हैं बीजेपी की इस राजनैतिक पहल पर.
बीबीसी इंडिया बोल में इस शनिवार इसी मुद्दे पर बहस हुई. इस कार्यक्रम में श्रोताओं के सवाल दिए वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी ने.

Sunday, September 15, 2013

घायल है सामाजिक ताना-बाना

मुजफ्फरनगर की घटना के बाद कई सवाल उठ खड़े हुए हैं। हिंसा में मरने वालों की संख्या बहुत बड़ी है। इसके घाव काफी गहरे हैं और काफी देर तक इस इलाके को तकलीफ देते रहेंगे। ज्यादा भयावह है घर छोड़कर भागने वालों की बड़ी संख्या। चालीस-पचास हजार या इससे भी ज्यादा लोगों को घरों से भागना पड़ा। वे वापस आ भी जाएंगे तो उनके मन में गहरी दहशत होगी। जिस भाई-चारे और भरोसे के सहारे वे अपने को सुरक्षित पाते थे वह खत्म हो गया है। यह भरोसा सामाजिक ताना-बाना प्रदान करता है। दुनिया की बड़ी से बड़ी प्रशासनिक मशीनरी इसकी गारंटी नहीं दे सकती। आग प्रशासनिक नासमझी से लगी और राजनीतिक स्वार्थों ने इसे भड़काया। इसे ठीक करने की जिम्मेदारी इन दोनों पर है। पर आने वाले वक्त के राजनीतिक घटनाक्रम को देखते हुए यह सम्भव नहीं लगता। इसे ठीक करने के लिए भी उन्हीं खाप पंचायतों की जरूरत होगी, जिन्हें कई समस्याओं का दोषी माना जाता है। उन्हें याद दिलाया जाना चाहिए कि वे जिस साझा परम्परा के प्रतिनिधि हैं उसका संवल है एक-दूसरे पर विश्वास। सामाजिक बदलाव और आधुनिकीकरण के रास्ते पर जाने के लिए इन पंचायतों के भीतर विमर्श की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए। इसकी जिम्मेदारी नौजवान पीढ़ी को अपने ऊपर लेनी चाहिए।

दुर्भाग्य से इस समय हमारा राष्ट्रीय विमर्श इस बात पर केन्द्रित है कि क्या जाटों का झुकाव भाजपा की ओर बढ़ेगा या क्या मुसलमान सपा का साथ छोड़ेंगे या क्या बसपा इसका फायदा उठाएगी। हमारे सोच-विचार का यही तरीका है। पर विचार इस बात पर होना चाहिए कि उस ताने-बाने को पुनर्स्थापित कैसे किया जाए जो शहरों में तमाम साम्प्रदायिक फसादों के बावजूद गाँवों में बचा रहा। और जो इस बार की हिंसा में तार-तार हो गया है। इतनी बड़ी संख्या में गाँवों से पलायन हमारे सामाजिक जीवन की नई घटना है।
  
बहरहाल 27 अगस्त को मुजफ्पऱनगर के कवाल गाँव में एक छोटी सी घटना के बाद युवकों के बीच संघर्ष हुआ, जिसमें पहले एक की मौत हुई, फिर भीड़ ने दो युवकों को पीट-पीटकर मार डाला। इस घटना से स्वाभाविक रूप से आसपास के इलाकों में दहशत फैली होगी। पर ऐसा नहीं था कि दूर-दूर के गाँवों में हिंसा फैलती। प्रशासन को इस घटना की संवेदनशीलता का अनुमान था इसलिए उसने फौरन कार्रवाई करने की ठानी। नासमझी, अनुभवहीनता या अब तक के चलन को देखते हुए उसने वह किया जो नहीं किया जाना चाहिए था। घटना के कुछ समय बाद ही जिले के एसएसपी और जिलाधिकारी को हटा दिया गया। उस रोज इस इलाके में बड़े स्तर की सामूहिक हिंसा नहीं हुई थी। समझदार लोग बात की गम्भीरता को समझते थे और शायद समझाने-बुझाने पर चीजें ठीक रास्ते पर आ जातीं। पर प्रशासन के शीर्ष पर बड़ा बदलाव हो गया। नए अफसर नए थे, वे कुछ समझ और कर पाते कि हालात बिगड़ने लगे। मीडिया की कवरेज पर यकीन करें तो तकरीबन हर दल के नेताओं ने मामले को सुलझाने के बजाय भावनाओं का दोहन करने की कोशिश की। उनकी कोशिश होनी चाहिए थी कि समस्या को साम्प्रदायिक रूप न लेने देते। पर हुआ इसके विपरीत। अफवाहों का एक दौर चला। लोगों का खून खौलाने वाली बातें हुईं।

पहले ऐसा लगता था कि साम्प्रदायिक हिंसा के बीज शहरों में बोए जा रहे हैं। गाँव अछूते हैं, क्योंकि वहाँ पारम्परिक जीवन कायम है। परम्परा से हमारे समाज ने सह-जीवन के संस्कार पैदा कर लिए हैं। पर मुजफ्फरनगर की हिंसा के बाद जो नया संदेश गया है वह भयावह है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में सामाजिक सद्भाव का सैकड़ों साल पुराना तानाबाना टूटता सा लगता है। इन्हीं गाँवों मे स्वतंत्रता ता संग्राम मिल-जुलकर लड़ा गया था। किसान आंदोलन में भी इन गाँवों ने एकजुटता दिखाई थी। मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश के प्रगतिशील जिलों में से एक है। खेती में सबसे आगे। प्रदेश को गुड़ और चीनी की मिठास देने वाला इलाका। इस इलाके में जाट और मुसलमान दो प्रमुख सम्प्रदाय हैं। चूंकि वोट की राजनीति में सामाजिक ताकतों की भूमिका है, इसलिए राजनीतिक दल इनके बीच सक्रिय हैं और इन समुदायों की परतों का इस्तेमाल करते हैं। पर वह वोट की राजनीति तक सीमित रहा है।

इलाके के मुसलमानों ने धर्मांतरण से पहले की अपनी पहचान को कायम रखा है, जिससे समझा जा सकता है कि यह इलाका अपनी परम्पराओं का कितना आदर करता है। मूले, त्यागी और राजपूत मुसलमानों की तमाम परम्पराएं चलती आ रही हैं। खास बात यह है कि सभी मिलकर अपने पर्व-त्योहार मनाते रहे हैं। इस अर्थ में हिन्दुओं और मुसलमानों ने कई बार एक-दूसरे के हितों की लड़ाई लड़ी है। चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत किसानों के सवाल उठाते थे। पर जब मौका आया तो 1989 में नईमा कांड के खिलाफ भोपा में 40 दिन तक जेल भरो आंदोलन भी उन्होंने चलाया। नईमा की अपहरण के बाद हत्या कर दी गई थी। संयोग है कि इस बार भी 7 सितम्बर की पंचायत के पहले राकेश टिकैत ने कहा था कि नईमा कांड की तरह इस आंदोलन को भी बड़े स्तर पर शुरू किया जा सकता है।

जाट समुदाय अपनी पहचान को लेकर संवेदनशील है और अपनी परम्परागत खाप व्यवस्था को बनाकर रखता है। वह सगोत्र विवाह और नए चाल-चलन को लेकर कई बार कड़े फैसले भी करता है, पर इसके कारण वह कई प्रकार के सामाजिक दोषों से भी बचा है। इन बातों के समानांतर इलाके में शहरीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है, संचार और परिवहन के आधुनिक साधन बढ़े हैं और स्त्री शिक्षा बढ़ी है। इन बातों का सामाजिक जीवन पर भी प्रभाव पड़ा है। बेटी-बहन की रक्षा करना इलाके में प्रतिष्ठा का प्रश्न माना जाता है। इसे लेकर अक्सर झगड़े होते रहते हैं, पर इस हद तक नहीं होते कि उसकी आग में पूरा इलाका जल जाए।

मुजफ्फरनगर की हिंसा के सिलसिले में कुछ लोगों ने इस बात को रेखांकित करने की कोशिश की है कहीं एके-47 मिली या उसके कारतूस मिले। यों भी अब्दुल करीम टुंडा या कुछ और लोगों के नाम से इस शहर की पहचान है, पर यही अकेली वास्तविकता नहीं है। यह उस अलगाव का लक्षण है, जो हमारे बीच पनप रहा है और जिसे राजनीति प्रश्रय दे रही है। सच यह है कि बड़ी संख्या में लोग ऐसे हैं, जिनके लिए टुंडा आदर्श नहीं है। इस इलाके में ऊँची नाक की लड़ाई आधुनिकीकरण की प्रक्रिया की प्रतिक्रिया है। यह यहाँ के परम्परागत समाज के भीतर बैठी है वह हिन्दू हो या मुसलमान। इसे दूर करने के लिए आधुनिक शिक्षा के प्रसार की जरूरत है। उससे पहले राजनीतिक स्वार्थों पर रोक लगनी चाहिए। यह काम इस इलाके के लोग ही कर सकते हैं।


Saturday, September 14, 2013

सैर करनी है तो अंतरिक्ष में आइए

 आपकी जेब में पैसा है तो अगले साल गर्मियों की छुट्टियाँ अंतरिक्ष में बिताने की तैयारी कीजिए। रिचर्ड ब्रॉनसन की कम्पनी वर्जिन एयरलाइंस ने पिछले शुक्रवार को अपने स्पेसक्राफ्ट वर्जिन गैलेक्टिकका दूसरा सफल परीक्षण कर लिया। वर्जिन गैलेक्टिक पर सवार होकर अंतरिक्ष में जाने वालों की बुकिंग शुरू हो गई है। एक टिकट की कीमत ढाई लाख डॉलर यानी कि तकरीबन पौने दो करोड़ रुपए है, जो डॉलर की कीमत के साथ कम-ज्यादा कुछ भी हो सकती है। वर्जिन गैलेक्टिक आपको किसी दूसरे ग्रह पर नहीं ले जाएगा। बस आपको सब ऑर्बिटल स्पेस यानी कि पृथ्वी की कक्षा के निचले वाले हिस्से तक लेजाकर वापस ले आएगा। कुल जमा दो घंटे की यात्रा में आप छह मिनट की भारहीनता महसूस करेंगे। जिस एसएस-2 में आप विराजेंगे उसमें दो पायलट होंगे और आप जैसे छह यात्री। लगे हाथ बता दें कि इस यात्रा के लिए जून के महीने तक 600 के आसपास टिकट बिक चुके हैं। वर्जिन गैलेक्टिक की तरह कैलीफोर्निया की कम्पनी एक्सकोर ने लिंक्स रॉकेट प्लेन तैयार किया है। यह भी धरती से तकरीबन 100 किलोमीटर की ऊँचाई तक यात्री को ले जाएगा।

Friday, September 13, 2013

आडवाणी कब तक नाराज रहेंगे?

नीचे प्रकाशित आलेख 13 सितम्बर की सुबह लिखा गया था। चूंकि फैसला हो गया इसलिए अब इसकी कालावधि पूरी हो गई। पर अब यह समझने की जरूरत है कि फैसला जिस तरह से हुआ है, उसका मतलब क्या है। क्या आडवाणी जी हाशिए पर गए? क्या अब मोदी के वर्चस्व का समय आ गया है?  संघ के पूरे दबाव के बावजूद आडवाणी जी ने हार नहीं मानी। ऐसा क्यों हुआ? ऐसी क्या बात हुई कि वे पार्टी के संसदीय बोर्ड की बैठक में आना चाहकर भी नहीं आ पाए? क्या यह व्यक्तिगत पीड़ा है? मुरली मनोहर जोशी और सुषमा स्वराज की बैठक में उपस्थिति के बावजूद इतना स्पष्ट है कि वे खुश नहीं हैं। ऐसा लगता है कि आडवाणी को यकीन है कि मोदी विफल होंगे। आज विरोध दर्ज कराते हुए वे अपने कल की पेशबंदी कर रहे हैं। ताकि कह सकें कि मैने अपना विरोध दर्ज कराया था। व्यक्तिगत रूप से देखें तो असंतुष्ट नेताओं में सुषमा स्वराज ही ऐसी हैं, जो भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। मुरली मनोहर जोशी भी ज्यादा समय के नेता नहीं हैं। भाजपा के पास प्रधानमंत्री पद के लिए सुयोज्ञ पात्र सुषमा जी हैं, पर इस वक्त कांग्रेस को परास्त करने के लिए मोदी जैसे आक्रामक व्यक्ति की भाजपा को जरूरत है। कांग्रेस जबर्दस्त एंटी इनकम्बैंसी की शिकार है। साथ ही उसके पास लोकप्रिय नेता नहीं है। फिलहाल नरेन्द्र मोदी की परीक्षा चार राज्यों के चुनाव में होगी, पर उसके पहले देखना होगा कि पार्टी संगठन किस प्रकार चुनाव में उतरता है। मोदी को कहीं भितरघात का सामना तो नहीं करना होगा? उसके पहले देखना यह है कि आडवाणी जी मोदी को कैसा आशीर्वाद देते हैं। क्या वे लम्बे समय तक नाराज रह सकेंगे? उनकी नाराजगी मोदी से है या संघ से, जिसने उनकी उपेक्षा की है? मोदी को आगे करने का फैसला कई सवालों को अनुत्तरित छोड़ गया है।

फैसला मोदी नहीं, आडवाणी के बारे में होना है?

 शुक्रवार, 13 सितंबर, 2013 को 11:26 IST तक के समाचार
भारतीय जनता पार्टी क्या अपने सबसे बड़े कद के नेता को हाशिए पर डालने की हिम्मत रखती है? पार्टी में मतभेदों के सार्वजनिक होने के बाद अपनी फजीहत और कांग्रेस के व्यंग्य-बाणों से खुद को बचाने की क्या कोई योजना उसके पास है? और क्या इस फजीहत का असर चार राज्यों के विधान सभा चुनाव पर नहीं पड़ेगा?
लालकृष्ण आडवाणी को पार्टी के कम से कम तीन-चार बड़े नेताओं का समर्थन हासिल है. पर यह भी लगता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के फैसले की कद्र करते हुए शायद इनमें से कोई भी नेता अंतिम क्षण तक आडवाणी जी का साथ नहीं देगा.
हो सकता है कि अंततः आडवाणी भी इसे कबूल कर लें, पर क्या वे मोदी के नाम का प्रस्ताव करेंगे? या इस फैसले के बाबत होने वाली प्रेस कांफ्रेस में साथ में खड़े होंगे? या फिर से पार्टी के सारे पदों से इस्तीफा देंगे?
जून में जब गोवा में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में नरेन्द्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाया गया था तब उन्होंने पार्टी के सारे पदों से इस्तीफा दे दिया था. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अध्यक्ष मोहन भागवत के सीधे हस्तक्षेप के बाद उन्होंने अपने हाथ खींचे थे.
उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि प्रधान मंत्री पद का फैसला करते वक्त आपको शामिल किया जाएगा और इसीलिए इस हफ्ते पार्टी के तमाम नेता उन्हें लगातार मनाने की कोशिश करते रहे हैं. क्या अब उन्हें मनाने की कोशिश बंद कर दी जाएगी?