Monday, August 18, 2014

सौहार्द की तस्वीरें भी हमारे बीच हैं

आज के इंडियन एक्सप्रेस के पेज 2 पर एक मुस्लिम महिला का चित्र है जो अपने बच्चे को कृष्ण बनाकर ले जा रही है। इस तरह की तस्वीरें हर साल भारतीय मीडिया में प्रकाशित होती रहती हैं। परम्परा से हमारे बीच जो सहिष्णुता है, उसे यों भी हम अपने शादी-विवाहों, पर्वों-त्योहारों और ग़मी-खुशी के तमाम मौकों पर देखते रहते हैं। मुझे याद पड़ता है सत्तर या अस्सी के दशक के शुरुआती वर्षों में लखनऊ में इंदिरा गांधी गोल्ड कप हॉकी प्रतियोगिता होती थी। यह अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता थी और इसमें पाकिस्तान की टीम भी खेलती थी। उन दिनों मैने देखा कि पाकिस्तानी खिलाड़ी हज़रतगंज में खरीदारी करते हुए अपने साथ कृष्ण की प्रतिमाएं खरीद कर ले जाते थे। आपको आश्चर्य होगा। भला वे अपने घर में बुत कैसे रखते होंगे? पर मुझे लगता है कि कृष्ण और राम को धार्मिक से ज्यादा सांस्कृतिक अर्थ में देखा जाना चाहिए।  इन दिनों बात चल रही है कि इस देश के रहने वालों को हिंदू कहने में क्या गलत है। गलत है या नहीं, पर दुनिया में तमाम जगहों पर हमें हिंदी या हिंदू कहा ही जाता है। हिंदू की धार्मिक पहचान शायद सौ-डेढ़ सौ साल से ज्यादा पुरानी नहीं है। जबके हमारी हिंदू या इंदु के रूप से पहचान हजारों साल पुरानी है। चीनी भाषा में भारत का नाम है इंदु वन और भारतीय को कहते हैं इंदु रन। आज क़मर वहीद नक़वी ने अपने फेसबुक वॉल पर एक तस्वीर लगाई है, जो 2011 के इंडियन एक्सप्रेस में छपी थी। मैने सन 2010 में अपने वॉल पर एक तस्वीर लगाई थी उसे भी इस पोस्ट के साथ लगा रहा हूँ। हो सकता है कि किसी एक मुस्लिम परिवार के दिमाग में बच्चे को कृष्ण बनाने की बात आई हो, पर अलग-अलग साल में अलग-अलग शहरों में ऐसा हो तो अच्छा लगता है।
आज के इंडियन एक्सप्रेस के पेज 2 पर लगी तस्वीर। नीचे इस तस्वीर को अलग से लगाया है। 

2011 की एक तस्वीर

2010 की तस्वीर




भास्कर में प्रकाशित

नीचे एक आलेख बृजेश शुक्ल का है। इसे पढ़ें। इसे मैने नवभारत टाइम्स के ब्लॉग से लिया है। लखनऊ की संस्कृति में इस सौहार्द के बेहतरीन उदाहरण मिलेंगे, जिन्हें लेखक ने गिनाया है। 


नवभारत टाइम्स | Aug 13, 2013, 01.00AM IST

बृजेश शुक्ल।।

पुराने लखनऊ में मेरे एक दोस्त रहते हैं। एक दिन अपना घर दिखाने लगे और मुस्कराकर बोले- यहां से वहां तक आपका ही घर है। लखनवी तहजीब, नफासत, नजाकत, इलमी अदब, वजादारी, मेहमानवाजी, हाजिर जवाबी में लखनऊ का दुनिया में कोई जोड़ नहीं। पिछले तीस सालों में लखनऊ कहां से कहां तक तरतीब और बेतरतीब ढंग से बढ़ा, उससे यह सवाल जरूर उठा कि लखनवियत अब बचेगी या नहीं। लेकिन टुकड़ों में ही सही, लखनवियत आज भी जिंदा है। विकास की अंधी दौड़ में समाज का बड़ा वर्ग 'पहले आप! पहले आप!' की तहजीब को भी नहीं समझ पाया। कुछ लोगों के लिए यह शब्द मजाक का विषय भी बना। लेकिन यकीन मानिए, 'पहले आप! पहले आप!' तो उसी महान संस्कृति के लोग कह सकते हैं, जिसमें कुर्बानी का जज्बा हो, जिसमें मेहमाननवाजी और दूसरों को तरजीह देने की कूवत हो। जो पहले खुद के लिए परेशान है, वह पहले आप बोल ही नहीं सकता।

नवाब आसफुद्दौला

लखनवियत लखनऊ के रस्मोरिवाज में घुली-मिली है। रमजान के दिनों में आप देर रात पुराने लखनऊ की गलियों में घूमिए। चाय की दुकानों में सामने रखे चाय के प्याले की ओर इशारा करते हुए यह कहने वाले आपको बहुत से लोग मिलेंगे- नहीं-नहीं, पहले आप लीजिए। लखनऊ में सन् 1722 में नवाबों का शासन आया और 1857 तक चला। लेकिन लखनवियत पनपी और बढ़ी 1775 से, यानी नवाब आसफुद्दौला के शासनकाल से। नवाब वाजिद अली शाह के समय में तो इस तरह फली-फूली कि लोग इस पर कुर्बान हो गए। वास्तव में लखनवियत तीन बुनियादी मूल्यों पर आधारित है। पहला इंसानियत, दूसरा हक यानी किसी जाति-धर्म का व्यक्ति हो, उसके साथ किसी तरह का भेदभाव न हो। तीसरा बिंदु है धर्मनिरपेक्षता- हर मजहब और मिल्लत की इज्जत करना और उसकी बेहतर चीजों को अपनाना। यहां बहुत से हिंदू एक दिन का रोजा रखते है। मोहर्रम के दिनों में तमाम हिंदू महिलाएं इमामबाडे़ व ताजिये के सामने जाकर मन्नतें मांगती हैं। जी हां, आज भी।

जोगिया मेला और इंदरसभा

'काजमैन रौजा' लाला जगन्नाथ ने बनवाया था। नवाब आसफुद्दौला के वजीर झाऊलाल ने ठाकुरगंज में इमामबाड़ा और टिकैतराय ने एक मस्जिद बनवाई। अमीनाबाद में पंडिताइन की मस्जिद मशहूर है। अलीगंज के हनुमान मंदिर के शिखर पर चमकने वाला इस्लामी चिन्ह चांद-तारा लखनवियत का प्रतीक है। इस मंदिर की संगेबुनियाद नवाब शुजाउद्दौला की बेगम और नवाब आसफुद्दौला की वालिदा बहूबेगम ने रखी थी। इस आपसी भाईचारे के कारण ही लखनऊ में अमन-चैन रहा। एक बार नवाब आसफुद्दौला का पड़ाव अयोध्या में पड़ा। नवाब साहब को जब तोपों की सलामी दी जा रही थी तभी उनके कानों में घंटा-घड़ियाल की आवाजें पड़ी। नवाब ने हुक्म दिया कि उनका पड़ाव इस पवित्र नगरी से पांच मील दूर डाला जाए, ताकि हिंदुओं को पूजा-पाठ में कोई व्यवधान न पैदा हो। नवाब वाजिद अली शाह हर साल जोगिया मेला लगवाते थे। उन्होंने राधा-कन्हैया और इंदरसभा नाटक लिखे और स्वयं श्रीकृष्ण की भूमिका करते थे।

तबला, खयाल, ठुमरी, सितार की परवरिश लखनऊ में हुई। कथक ने यही जन्म लिया। आदाब लखनवियत का हिस्सा है। जरा नवाबों की सोच तो देखिए। हिंदू नमस्ते कहे, मुसलमान सलाम करे तो एकता के दर्शन कहां। नवाबों ने दोनों वर्गो के लिए आदाब दिया। नजरें और सर थोड़ा झुका हुआ। उंगलियां आगे की ओर झुकी हुईं और हाथ को नीचे से थोड़ा ऊपर ले जाकर धीरे से आदाब कहना। इस लखनवियत में अहंकार नहीं है, संपन्नता का गरूर नहीं है। इस तहजीब की सबसे बड़ी खासियत यही है कि जुबान और व्यवहार से किसी को कष्ट न पहुंचे। कोई बीमार है तो यह नहीं पूछा जायेगा कि सुना आप बीमार है। पूछने वाला यही कह कर बीमार का हाल जान लेगा कि सुना है हुजूर के दुश्मनों की तबीयत नासाज है। लखनवी जुबान उर्दू है। लेकिन बहुत रस में पकी हुई, शहद में डूबी हुई। मुगलिया सल्तनत की जुबान फारसी थी। लेकिन उर्दू दक्षिण में पैदा हुई, दिल्ली में जवान हुई, लखनऊ में दुल्हन बनी और शबाब पाया।

वक्त बदल गया है। दीवारों से लखौरी ईटें गायब हो रही है। इमारतों का आर्किटेक्चर बदल रहा है। लेकिन पुराने लखनऊ की गलियों में आज भी लखनवियत नजर आती है। काजमैन के पास किसी बात को लेकर दो गुटों में तनाव हो गया। पत्रकार पहुंचे तो उन्होंने जानकारी चाही। वहां खड़े एक युवक ने बड़े मीठे लहजे में बताया- जनाब उधर शिया हजरात रहते हैं, इधर अहले सुन्नत हजरात रहते हैं। पत्रकारों ने समझा कि कोई मुस्लिम युवक है, इसी से बात कर ली जाए। नाम पूछा तो पता चला कि वह हिंदू था। लखनऊ की नजाकत, नफासत और मीठी जबान धर्म के आधार पर नहीं बंटी। यह तो एक तहजीब है। लखनऊ की हवाओं में लखनवियत है। गालियों से लेकर मोहब्बत व छेड़खानी तक का अपना अंदाज है। इस तहजीब को जीवन में उतार चुके लोगों की लड़ाइयों का भी तर्जे बयां निराला है- 'अब आप एक लफ्ज भी न बोलिएगा, बाखुदा आपकी शान में गुस्ताखी कर दूंगा।' जवाब आएगा- 'चलो मैं नहीं बोलता अब आप फरमाइए।'

दुनिया में लाजवाब है तू

अब जीवन तेज गति से चल रहा है। किसी के पास समय नहीं बचा। शब्दों में हाय-हलो हावी हो गया है। लेकिन लखनऊ के मामलों पर गहरी जानकारी रखने वाले जाफर अब्दुल्ला कहते हैं- लखनवी जुबान तो हवा का वो झोंका है जो जीवन में रंग भर देता है। दुनिया के किसी भी कोने में यदि आपको अपनी बेगम को ही आप कहने वाले कोई साहब मिल जाएं तो उनसे जरूर पूछिएगा, जनाब क्या आप लखनऊ के हैं? लखनऊ के ही प्रसिद्ध लेखक और इतिहासविद् योगेश प्रवीन की ये लाइनें लखनवियत को बताने के लिए काफी हैं- ये सच है जिंदादिली की कोई किताब है तू। अदब का हुस्नो-हुनर का हसीं शबाब है तू। सरे चमन तेरा जलवा है वो गुलाब है तू। लखनऊ आज भी दुनिया में लाजवाब है तू।

संवाद-शिल्प में माहिर हैं मोदी

जनता से संवाद करना मोदी को आता है, कम्युनिकेशन स्किल में निपुण हैं मोदी

प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने विरोधी की बातों की बेहतरीन पेशबंदी करना जानते हैं। उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के भाषण की शुरुआत में कहा, मेरी बात को राजनीति के तराजू में न तोला जाए। यह बात अच्छी तरह समझ कर कही गई थी कि उनकी बातों को राजनीति के तराजू में तोला जाएगा। पर अब जो तोलेगा वह अतिरिक्त जोखिम मोल लेगा। उन्होंने कहा, मैं दिल्ली के लिए आउटसाइडर रहा हूं, पर दो महीने में जो इनसाइडर व्यू लिया तो चौंक गया। ऐसा लगता है कि जैसे एक सरकार के भीतर दर्जनों सरकारें चल रहीं हैं। हरेक की जागीर बनी है। मैंने दीवारें गिराने की कोशिश की है।
यहां यह भी महत्वपूर्ण तथ्य है कि भाषण के मंच से तकरीबन तीस साल बाद बुलेट प्रूफ बॉक्स हटा दिया गया। सिर पर परम्परागत पगड़ी, पृष्ठभूमि में पुरानी दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतें, सामने बच्चों की कतारें।
मोदी के संदेश के कथ्य से ज्यादा महत्वपूर्ण है उनकी शैली और मंचकला। उन्हें माहौल बनाना आता है। जनता की भाषा में बोलते हैं। वह भी ऐसी जो समझ में आती है। बाएं और दाएं हाथ की मुद्राएं और चेहरे के हाव-भाव और शब्दों का मॉड्यूलेशन उस नाटकीयता को जन्म देता है, जो उनके भाषण को प्रभावशाली बनाती है। वे अपने शब्दों को इतनी तरह से कहते हैं कि बात सुनने वाले के मन में गहराई तक उतर जाए। उन्होंने कहा, देश को एक रस, एक मन, एक दिशा, एक गति, एक मति हो जाना चाहिए। बार-बार बोलकर उन्होंने सुनने वाले के मन पर ‘एक’ को इतनी गहराई तक उतार दिया कि उसे ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं रह गई।
सामाजिक ऊर्जा को दोहन के तरीकों को नरेंद्र मोदी बेहतर जानते हैं। यह बात लोकसभा चुनाव में हमने देखी। मोदी ने दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में पी2जी2 (प्रो पीपुल, गुड गवर्नेंस), स्किल,स्केल और स्पीड, माउस चार्मर का देश, फाइबर टू फैशन, गुजरात का नमक और आधा भरा गिलास जैसे जुमलों का सहारा लेकर नौजवानों को अपनी बात समझाई थी। यह शब्दावली नौजवानों को फौरन समझ में आती है। गौर करें तो पाएंगे कि मोदी नौजवानों के बीच खासे लोकप्रिय हैं। गुजरात में मोदी गुजराती में बोलते हैं पर शेष देश में वे हिन्दी में बोलते हैं। वे इन भाषाओं में सहज हैं और इनके मुहावरों को समझते हैं। पर अंग्रेजी का ‘मिनिमम गवर्नमेंट-मैक्सीमम गवर्नेंस’ भी वे उसी सानी से लोगों के मन में डालने में कामयाब हुए हैं।
वे अच्छे स्टोरी टेलर भी हैं। सम्भव है उन पर परम्परागत देशी कथा वाचकों का प्रभाव हो। पर जॉब और सर्विस के बीच के अंतर को उन्होंने एक छोटे से दृष्टांत से समझा दिया। कथा वाचक भी दृष्टांतों की मदद से कहानी आगे बढ़ाते हैं। पिछले साल जब अप्रैल के पहले हफ्ते में सीआईआई की एक गोष्ठी में राहुल गांधी ने अपना दृष्टिकोण देश के सामने रखा। राहुल का वह भाषण बेहद संजीदा था। तब तक देश उन्हें संजीदगी से ही ले रहा था। राहुल के भाषण के चार दिन बाद ही फिक्की की महिला शाखा में नरेंद्र मोदी का भाषण हुआ। उसमें मोदी ने अपनी वाक्पटुता का परिचय दिया। इस भाषण में उन्होंने महिलाओं से जुड़ी कई कहानियां सुनाईं। और फिर जनता ने राहुल और मोदी की तुलना शुरू कर दी। इस तुलना ने मोदी को लगातार फायदा पहुंचाया। मोदी के भाषणों के अनुप्रास अनायास ही अब सबका ध्यान खींचते हैं। यह उनकी व्यक्तिगत देन है या कोई कम्युनिकेशन स्ट्रैटजी है, पर अब सरकारी भाषा बदल गई है।
इस साल जब संसद का सत्र शुरू हो रहा था तब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने अभिभाषण में कहा, नई सरकार 3-डी तकनीक से काम करेगी और देश को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी। यहाँ 3-डी का मतलब था डेमोक्रेसी, डेमोग्राफी और डिमांड। अपने चुनाव अभियान में हजारों जमीनी और थ्री-डी रैलियों के अलावा चाय पर चर्चा उनकी कम्युनिकेशन रणनीति का हिस्सा ही थीं। सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले शुरुआती राजनेताओं में नरेंद्र मोदी ही थे। उन्होंने राजनीतिक संवाद की जो शैली विकसित की है वह स्वतंत्रता दिवस के भाषण के रूप में अपने सबसे उत्कृष्ट रूप में देखने में आई। एक प्रधानमंत्री अपनी जनता के सामने उसके प्रधान सेवक के रूप में खड़ा था, बगैर बुलेट प्रूफ पर्दे के। यह बात जनता की भावनाओं को गहराई तक छूती है। 

Sunday, August 17, 2014

एक था योजना आयोग

योजना आयोग खत्म करने की खबर पर आज के टेलीग्राफ ने अपना पूरा पहला पेज इस खबर को समर्पित कर दिया। इस पेज में काफी रोचक जानकारियाँ हैं।

ONE DINO DOWN

- Jurassic plan panel set to be replaced

New Delhi, Aug. 16: The Narendra Modi government plans to transform the Soviet-era Planning Commission into a Chinese-style National Development Reforms Commission.

The proposed commission will act not only as an economic and human development think tank but also as a body that plans and monitors the implementation of mega projects and industrial areas, liaising with state governments to get the projects up and running within a timeframe.

Modi feels the plan panel — a Jurassic-era relic of the command economy — has outlived its utility in the new age where the larger chunk of the economy is in private hands, and where the State’s role is that of a catalyst rather than a Soviet-style target setter.

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Those days of commanding heights
- Species that towered over the economy is finally being declared extinct
JAYANTA ROY CHOWDHURY

Yojana Bhavan, which houses the Planning Commission. Picture by Ramakant Kushwaha
An apocryphal story: Raj Krishna, the economist who coined the phrase “Hindu rate of growth”, was a member of the Planning Commission when it was formulating the Sixth Five-Year Plan. Someone asked him what the approach to the Sixth Plan would be. Krishna replied: “This is not the approach to the Sixth Plan. This is the Sixth approach to the same Plan.”
Like other relics of the Nehruvian era — smoke-belching Ambassador cars, unwieldy Murphy radio sets, urban sprawls of ugly, box-like, post-World War flats, the fashion statement of the Nehru jacket and Godrej typewriters — the Planning Commission, housed just three buildings away from Parliament, is now destined for history’s dustbin.


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ज़ीरो डिफैक्ट यानी मोदी इफैक्ट

नरेंद्र मोदी ने औपचारिक और पिटे-पिमटाए भाषणों की परम्परा तोड़ कर देश की जनता से जो सीधा संवाद किया है उसका केंद्रीय संदेश है कि राष्ट्रीय चरित्र बनाए बगैर देश नहीं बनता। इस लिहाज से 68 साल में यह पहला स्वतंत्रता दिवस संदेश है जो उसे संबोधित है जो देश का निर्माता है। इस भाषण के अंदाजे बयां की नेहरू, इंदिरा या अटल बिहारी के भाषणों से तुलना संभव है, पर अपने कंटेंट या कथ्य में यह एकदम नया और निराला है। देश बनाना है तो जनता बनाए और दुनिया से कहे कि भारत ही नहीं हम दुनिया का निर्माण करेंगे।

Friday, August 15, 2014

इन बदरंग राष्ट्रीय तमगों की जरूरत ही क्या है?

राष्ट्रीय सम्मानों की हमारी व्यवस्था विश्वसनीय कभी नहीं रही। पर हाल के वर्षों में वह मजाक का विषय बन गई है। इन पदकों ने पहचान पत्र की जगह ले ली है। यूपीए सम्मानित, एनडीए सम्मानित या सिर्फ असम्मानित! पिछले हफ्ते खबर थी कि नेताजी सुभाष बोस को भारत रत्न मिलने वाला है। फिर कहा गया कि अटल बिहारी को भी मिलेगा। ताज़ा खबर है कि हॉकी के जादूगर ध्यानचंद के नाम की संस्तुति प्रधानमंत्री से की गई है। पता नहीं किसी को मिलेगा या नहीं पर ट्विटर, फेसबुक और टेलीविजन पर कम से कम डेढ़ सौ हवा में नाम फेंके जा चुके हैं। कांशीराम से लेकर सर सैयद, एओ ह्यूम से एनी बेसेंट, भगत सिंह से रास बिहारी बोस, लाला लाजपत राय से मदन मोहन मालवीय और राम मनोहर लोहिया से लेकर कर्पूरी ठाकुर। लगो हाथ जस्टिस काटजू ने ट्वीट करके सचिन तेन्दुलकर को भारत रत्न देने की भर्त्सना कर दी। जवाब में शिवसेना ने जस्टिस काटजू की निंदा कर दी। सम्मानों की राजनीति चल रही है।

Thursday, August 14, 2014

फटा सुथन्ना पहने हरचरना किसके गुन गाता है?

कुछ तो कहती हैं जनता की खामोशियाँ

राष्ट्रगीत में  भला कौन  वह/ भारत भाग्य विधाता है/ फटा सुथन्ना पहने जिसका/ गुन हरचरना गाता है।
मख़मल टमटम बल्लम तुरहीपगड़ी छत्र चँवर के साथ/ तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर/ जय-जय कौन कराता है।
पूरब-पच्छिम से आते हैं/ नंगे-बूचे नरकंकाल/ सिंहासन पर बैठा,उनके/ तमगे कौन लगाता है।
कौन-कौन है वह जन-गण-मन/ अधिनायक वह महाबली/ डरा हुआ मन बेमन जिसका/ बाजा रोज़ बजाता है।
हमारे तीन राष्ट्रीय त्योहार हैं।15 अगस्त है जन-जन की आज़ादी का दिन। गणतंत्रका दिन है 26 जनवरी। गण पर हावी तंत्र। देश का मन गांधी के सपने देखता है, सो 2 अक्तूबर चरखा कातने का दिन है। मन को भुलाने का दिन। जन और मन की जिम्मेदारी थी कि वह गण को नियंत्रण में रखे। पर जन खामोश रहा और मन राजघाट में सो गया। व्यवस्था ने उसके नाम से गली-चौराहों के नाम रख दिए, म्यूजियम बना दिए और पाठ्य पुस्तकों पर उसकी सूक्तियाँ छाप दीं। इन्हीं सूक्तियों को हमने गीतों में ढाल दिया है। फटा सुथन्ना पहनने वाला हरचरना और उसकी संतानें सालहों-साल राष्ट्रगान बजते ही सीधे खड़े हो जाते हैं। रघुवीर सहाय की ऊपर लिखी कविता हर साल स्वतंत्रता दिवस पर ताज़ा रहती है, जैसे अभी लिखी गई हो। सबसे महत्वपूर्ण है इसका आखिरी सवाल। वह जन-गण-मन अधिनायक कौन है, जिसका बाजा हमारा डरा हुआ मन रोज बजाता है?
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने जॉर्ज पंचम के लिए कविता लिखी या भारतीय जन-गण के लिए लिखी इस बहस को फिर से ताज़ा करने का इरादा नहीं है। दिलचस्पी हरचरना के हसीन सपनों में है। उसे 1947 में ही बता दिया गया था कि अच्छे दिन आने वाले हैं। 67 साल गुजर गए हरचरना के नाती-पोते इंतज़ार कर रहे हैं। दशकों पहले काका हाथरसी ने लिखा, जन-गण-मन के देवता, अब तो आँखें खोल/ महँगाई से हो गया, जीवन डांवांडोल/ जीवन डांवांडोल, ख़बर लो शीघ्र कृपालू/ कलाकंद के भाव बिक रहे बैंगन-आलू। काका को भी जन-गण-मन के किसी देवता से शिकायत थी। काका ने जब यह लिखा तब टमाटर आठ रुपए किलो मिलते थे। अब अस्सी में मिल जाएं तो अच्छे भाग्य समझिए।

धारदार, साखदार है तभी अख़बार, वर्ना है काग़ज़ का टुकड़ा


हर सुबह अखबार के साथ रंगीन आर्ट पेपर पर छपे इश्तहारों के टुकड़े भी आते हैं। उनकी सजावट के मुकाबले अखबार कुछ भी नहीं होते, पर आप पहले अखबार उठाते हैं। उन्हें भी पढ़ते हैं, पर वे आप तक अखबार की वजह से आते हैं, अखबार के साथ। पिछले चार सौ साल से ज्यादा वक्त हो गया अखबार निकलते। वे पहला औद्योगिक उत्पाद माने जाते हैं। उनका विकास दुनिया में लोकतंत्र के विकास का इतिहास है। तमाम किस्म के अंतर्विरोध अखबार के साथ छिपे हैं। अखबारों ने वैश्विक सामाजिक-राजनीतिक जीवन में अपनी जगह बनाई, जो अभी तक बनी है। अब ऐसा लगता है कि अखबार की कहानी कुछ दशकों की रह गई है। सम्भव है कागज़ के पर्चे के रूप में अखबार हमारे जीवन से चला जाए, पर पत्रकारिता की जरूरत हमेशा बनी रहेगी। आज रांची के दैनिक प्रभात खबर ने अपनी तीसवीं वर्षगाँठ मनाई है। इस अखबार की खासियत है कि यह आधुनिक भारत के उस दौर से शुरू हुआ जब देश नई करवट ले रहा था। राजीव गांधी के नेतृत्व में इक्कीसवीं सदी की बातें प्रभात खबर के आने के बाद शुरू हुईं हैं। इस अखबार ने सामाजिक जीवन के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं का साथ नहीं छोड़ा है। इसने समय के साथ बहुत कुछ बदला है, पर तमाम बातों को छोड़ा नहीं है। यानी नया जोड़ा है, पर पुराना नहीं छोड़ा। इसकी तीसवीं वर्षगाँठ पर अखबार के विशेष पेज पर छपा मेंरा लेख। इस लेख के साथ एनके सिंह का लेख भी है, जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के रुझानों पर है। 

कुछ साल पहले पंजाब के एक हिंदी अख़बार के पहले सफे पर चार तस्वीरों के साथ एक खबर छपी थी जिसका शीर्षक था मुझे घर जाने दो नहीं तो जान दे दूँगी. खबर एक छोटे शहर की थी जहाँ की पुलिस सार्वजनिक स्थानों पर घूमते जोड़ों की पक़ड़-धकड़ कर रही थी. खबर के साथ लगी पहली तीन तस्वीरों में एक लड़की पुलिस वालों से बात करती नजर आती थी. मुख्य शीर्षक के ऊपर शोल्डर था मोरल पुलिसिंग! प्रेमी जोड़ों पर कार्रवाई के दौरान छात्रा हुई प्रताड़ित, फिर आ गई ट्रेन के नीचे. खबर में चौथी तस्वीर रेल की पटरियों के बीच पड़ी लाश की थी. पुलिस की कार्रवाई, लड़की का घबराना और अख़बार में खबर का ट्रीटमेंट तीनों को बदलते वक्त की रोशनी में देखना चाहिए.
मीडिया तकनीक और कवरेज में बदलते वक्त का आइना दिखाई देता है. एक अख़बार ने महिलाओं की किटी पार्टी की कवरेज में विशेषज्ञता हासिल कर ली. पंजाब और दिल्ली का एक अख़बार संयुक्त परिवारों पर विशेष सामग्री छापता है. ऐसे ज़माने में जब परिवार छोटे हो रहे हैं, यह द्रविड़ प्राणायाम अलग किस्म का नयापन लेकर आया है. एक और अख़बार सीनियर सिटिज़न यानी वयोवृद्धों पर अलग से पेज छापता है. युवाओं पर अलग पेज तो तकरीबन सभी अखबारों ने शुरू किए हैं. धर्म और धार्मिक कर्मकांड भी हिंदी अखबारों का एक अनिवार्य हिस्सा है. वैसे ही जैसे विज्ञान-तकनीक और गैजेट्स का पेज.   

रॉबिन जेफ्री की किताब इंडियाज़ न्यूज़पेपर रिवॉल्यूशन सन 2000 में प्रकाशित हुई थी. इक्कीसवीं सदी के प्रवेश द्वार पर आकर किसी ने संज़ीदगी के साथ भारतीय भाषाओं के अखबारों की ख़ैर-ख़बर ली. रॉबिन जेफ्री ने किताब की शुरुआत करते हुए इस बात की ओर इशारा किया कि अखबारी क्रांति ने एक नए किस्म के लोकतंत्र को जन्म दिया है. उन्होंने 1993 में मद्रास एक्सप्रेस से आंध्र प्रदेश की अपनी एक यात्रा का जिक्र किया है. उनका एक सहयात्री एक पुलिस इंस्पेक्टर था. बातों-बातों में अखबारों की जिक्र हुआ तो पुलिस वाले ने कहा, अखबारों ने हमारा काम मुश्किल कर दिया है. पहले गाँव में पुलिस जाती थी तो गाँव वाले डरते थे. पर अब नहीं डरते. बीस साल पहले यह बात नहीं थी. तब सबसे नजदीकी तेलुगु अख़बार तकरीबन 300 किलोमीटर दूर विजयवाड़ा से आता था. सन 1973 में ईनाडु का जन्म भी नहीं हुआ था, पर 1993 में उस इंस्पेक्टर के हल्के में तिरुपति और अनंतपुर से अख़बार के संस्करण निकलते थे.

Tuesday, August 12, 2014

नया भारत : अंधेरे को छांटती आशा की किरणें

सन 2009 में ब्रिटेन के रियलिटी शो ‘ब्रिटेन गॉट टेलेंट’ में स्कॉटलैंड की 47 वर्षीय सूज़न बॉयल ने ऑडीशन दिया। पहले दिन के पहले शो से उसकी प्रतिभा का पता लग गया। पर वह 47 साल की थी ग्लैमरस नहीं थी। वह व्यावसायिक गायिका नहीं थी। पूरा जीवन उसने अपनी माँ की सेवा में लगा दिया। चर्च में या आसपास के किसी कार्यक्रम में गाती थी। उसके बेहतर प्रदर्शन के बावज़ूद दर्शकों का समर्थन नहीं मिला। ग्लैमरस प्रस्तोता दर्शकों पर हावी थे। पर सुधी गुण-ग्राहक भी हैं। सूज़न बॉयल को मीडिया सपोर्ट मिला। बेहद सादा, सरल, सहज और बच्चों जैसे चेहरे वाली इस गायिका ने जब फाइनल में ‘आय ड्रैम्ड अ ड्रीम’ गाया तो सिर्फ सेट पर ही नहीं, इस कार्यक्रम को देख रहे एक करोड़ से ज्यादा दर्शकों में खामोशी छा गई। तमाम लोगों की आँखों में आँसू थे। जैसे ही उसका गाना खत्म हुआ तालियों का समाँ बँध गया।

‘आय ड्रैम्ड अ ड्रीम’ हारते लोगों का सपना है। यह करोड़ों लोगों का दुःस्वप्न है, जो हृदयविदारक होते हुए भी हमें भाता है। कुछ साल पहले फेसबुक पर नाइजीरिया के किसी टेलेंट हंट कांटेस्ट का पेज देखने को मिला। उसका सूत्र वाक्य था, आय थिंक आय कैन’। एक सामान्य व्यक्ति को यह बताना कि तुम नाकाबिल नहीं हो। उसकी हीन भावना को निकाल कर फेंकने के लिए उसके बीच से निकल कर ही किसी को रोल मॉडल बनना होता है।

हाल में अमिताभ बच्चन के कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम की आठवीं श्रृंखला का एक प्रोमो देखने को मिला, जिसमें विज्ञापन में अमिताभ बच्चन प्रतिभागी पूर्णिमा से एक प्रश्न पूछते हैं कि कोहिमा किस देश में है? यह सवाल जिस लड़की से पूछा गया है, वह खुद कोहिमा की रहने वाली है। बहरहाल वह इस सवाल पर ऑडियंस पोल लेती है। सौ प्रतिशत जवाब आता है ‘इंडिया।’ अमिताभ ने पूछा इतने आसान से सवाल पर तुमने लाइफ लाइन क्यों ली?  तुम नहीं जानतीं कि कोहिमा भारत में है जबकि खुद वहीं से हो। उसका जवाब था, जानते सब हैं, पर मानते कितने हैं? पिछले दिनों दिल्ली शहर में पूर्वोत्तर के छात्रों का आक्रोश देखने को मिला। जैसे-जैसे अंतर्विरोध खुल रहे हैं वैसे-वैसे नया भारत परिभाषित होता जा रहा है।

सख़्त ज़मीन पर आया मोदी-रथ

भाजपा की राष्ट्रीय परिषद में नरेंद्र मोदी ने अमित शाह को ‘मैन ऑफ द मैच’ घोषित किया और उसके अगले ही रोज आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, एनडीए की सरकार बनाने का श्रेय किसी पार्टी या शख्स को नहीं, बल्कि आम जनता को जाता है.'' यह बदलाव तब हुआ जब देश की जनता ने इसका फैसला किया. क्या यह नरेंद्र मोदी को तुर्की-ब-तुर्की जवाब है या अनायास कही गई बात है? भाजपा के शिखर पर मोदी और अमित शाह की जोड़ी नम्बर वन पूरी तरह स्थापित हो जाने के बाद मोहन भागवत का यह बयान क्या किसी किस्म का संतुलन बैठाने की कोशिश है या संघ के मन में किसी किस्म का भय पैदा हो गया है? मोदी की राजनीति के लिए अगला हफ़्ता काफी महत्वपूर्ण साबित होने वाला है, क्योंकि लोकसभा चुनाव की कुछ तार्किक परिणतियाँ इस हफ्ते देखने को मिलेंगी.

आर्थिक नज़र से देखें तो मॉनसून की अनिश्चितता की वजह से खाने-पीने की चीजों की महंगाई बढ़ने वाली है. बावजूद इसके रिज़र्व बैंक को उम्मीद है कि सरकारी नीतियों से आने वाले महीनों में आपूर्ति में सुधरेगी. अलबत्ता उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित खुदरा मुद्रास्फीति जून में लगातार दूसरे महीने कम हुई है. आरबीआई उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति को जनवरी 2015 तक 8 प्रतिशत पर और जनवरी 2016 तक 6 प्रतिशत तक सीमित करने के लक्ष्य के प्रतिबद्ध है. राजनीति के लिहाज से कमोबेश माहौल ठीक है. भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों की निगाहें अब चार राज्यों के विधानसभा चुनावों और उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए 12 उप चुनावों पर हैं. संसद का यह सत्र 14 अगस्त तक है और बीमा विधेयक पर पीछे हटने के बाद मोदी सरकार अब कठोर ज़मीन पर आ गई है.

Sunday, August 10, 2014

मद्धम पड़ते कांग्रेसी चिराग़

कांग्रेस के सामने फिलहाल तीन चुनौतियाँ हैं। पहली नेतृत्व की। दूसरी संसदीय रणनीति की। और तीसरी दीर्घकालीन राजनीति से जुड़ी राजनीति की। जितना समझा जा रहा है संकट उससे भी ज्यादा गहरा है। पार्टी के एक असंतुष्ट नेता जगमीत सिंह बराड़ ने इसका संकेत दे दिया है। हालांकि उन्होंने अपनी बात कह कर वापस भी ले ली। पर राजनीति में बातें इतनी आसानी से वापस नहीं होतीं। जो कह दिया सो कह दिया। उन्होंने राहुल और सोनिया गांधी को दो साल की छुट्टी लेने की सलाह दी थी, जिसे बाद में अपने तरीके से समझा दिया। वे पहले ऐसे कांग्रेसी नेता हैं, जिन्होंने गांधी परिवार को कुछ समय के लिए ही सही लेकिन पद छोड़ने की सलाह दी। उनकी बात का मतलब जो हो, पार्टी आला कमान ने भी पहली बार विरोधों को स्वीकार किया है। नेतृत्व के ख़िलाफ़ उठ रही आवाज़ों के बीच गांधी परिवार के क़रीबी जनार्दन द्विवेदी ने माना कि कार्यकर्ताओं की आवाज़ को तवज्जोह देना चहिए। संवाद दोनों तरफ से हो।

इसे कांग्रेस के आत्म मंथन की शुरुआत तभी माना जा सकता है, जब औपचारिक से विमर्श हो। किसी कार्यकर्ता का बोलना और उसे चुप करा लेना अनुशासन से जुड़ी घटना भर बनकर रह जाता है। कार्यकर्ता के रोष को अनुशासनहीनता माना जा सकता है या विमर्श का मंच न होने की मजबूरी। दिक्कत यह है कि व्यवस्थित विमर्श और अनुशासनहीनता की रेखा खींच पाना भी काफी मुश्किल है। इसीलिए एके एंटनी समिति औपचारिक नहीं है। उसकी सिफारिशों की शक्ल भी औपचारिक नहीं होगी।

Saturday, August 9, 2014

योजना आयोग रहे न रहे, राज्यों की भूमिका बढ़नी चाहिए

यूपीए सरकार और उसकी राजनीति में अंतर्विरोध था। सरकार आर्थिक उदारीकरण पर कटिबद्ध थी और पार्टी नेहरूवादी सोच में कैद थी। मोदी सरकार के सामने भी अंतर्द्वंद है। पर मनमोहन सरकार के मुकाबले वह ज्यादा खुलकर काम कर सकती है। यह बात योजना आयोग को लेकर चल रही अटकलों के संदर्भ में कही जा सकती है। योजना मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने पिछले हफ्ते राज्यसभा में लिखित उत्तर में कहा कि आयोग को फिलहाल खत्म करने या उसके मौजूदा स्वरूप को युक्तिसंगत बनाने का कोई प्रस्ताव सरकार के विचाराधीन नहीं है। पर इस बार के बजट का साफ संकेत है कि आयोग के पर कतरे जाएंगे।
योजनागत और गैर-योजनागत व्यय में अंतर पिछली सरकार ने अपने अंतरिम बजट में ही कर दिया था। सरकारी विभागों को दो तरीके से धनराशि आवंटित होती है। एक, वित्त मंत्रालय के जरिए और दूसरे योजना आयोग से। इस विसंगति को दूर किया जा रहा है। यह अवधारणा मोदी सरकार की देन नहीं है। इसकी सिफारिश रंगराजन समिति ने की थी। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बरसों से इसकी बात करते रहे हैं। उन्होंने अपने विदाई भाषण में लगातार खुलती जा रही अर्थव्यवस्था में योजना आयोग की भूमिका की समीक्षा करने की सलाह दी थी। भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में भी आयोग के पुनर्गठन की बात कही गई है। अलबत्ता वामपंथी दलों को यह विचार पसंद नहीं आएगा।

Friday, August 8, 2014

पानी में फँसा नौजवान, नीतीश कुमार और टाटा

बारिश कम हो तो परेशानी और ज्यादा हो तो और ज्यादा परेशानी। आज के भास्कर के पहले सफे पर एक पिलर के सहारे लटके एक युवक की तस्वीर है, जो तेज बहते पानी के बीच फँसा है। इन दिनों ऐसे दृश्य देश भर से देखने को मिल रहे हैं। मोबाइल फोनों में लगे कैमरों ने अब ऐसी खबरें लेना आसान बना दिया है। राजस्थान पत्रिका ने जयपुर के महिला कॉलेजों में चल रहे छात्रसंघ चुनाव में सोशल मीडिया की बढ़ती भूमिका पर रोचक फीचर छापा है। ऐसी ही कुछ और तस्वीरें दूसरे अखबारों में हैं। एक रोचक खबर बंगाल के वित्त मंत्री अमित मित्र और रतन टाटा के बीच शाब्दिक जिरह को लेकर है। रतन टाटा ने एक रोज पहले कहा था कि मैं दो साल बाद कोलकाता आया हूँ और मुझे राजरहाट इलाके में औद्योगिक विकास नजर नहीं आया। इस पर अमित मित्र ने कहा कि टाटा का दिमाग फिर गया है। सिंगुर मामले के कारण नैनो परियोजना को बंगाल से गुजरात ले जाने वाले टाटा के मन में खलिश है। मित्रा-टाटा संवाद पर आज के टेलीग्राफ ने जोरदार कवरेज की है। आज की एक रोचक खबर बिहार से है जहाँ के मुख्यमंत्री जीतन राम माँझी ने कहा है कि चुनाव के बाद हम जीते तो मुख्यमंत्री  नीतीश कुमार बनेंगे। जेडीयू, राजद और कांग्रेस के गठबंधन ने बिहार में गठबंधन की योजना बना ली है। चुनाव अभी दूर है। आज की कुछ कतरनें



Wednesday, August 6, 2014

जितना महत्वपूर्ण है इतिहास बनना, उतना ही जरूरी है उसे लिखा जाना

संजय बारू के बाद नटवर सिंह की किताब का निशाना सीधे-सीधे नेहरू-गांधी परिवार है। देश का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवार आज से नहीं कई दशकों से राजनीतिक निशाने पर है। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि इस परिवार ने सबसे ज्यादा समय तक सत्ता में भागीदारी की। केवल सत्ता का सामान्य भोग ही नहीं किया, काफी इफरात से किया। इस वक्त कांग्रेस इस परिवार का पर्याय है। अब मनमोहन सिंह की बेटी दमन सिंह की किताब 'स्ट्रिक्टली पर्सनल : मनमोहन एंड गुरशरण' आने वाली है। दमन सिंह ने यह किताब मनमोहन सिंह पर एक व्यक्ति के रूप में लिखे जाने का दावा किया है, प्रधानमंत्री मनमोहन पर नहीं। अलबत्ता 5 अगस्त के टाइम्स ऑफ इंडिया में सागरिका घोष के साथ इंटरव्यू में कही गई बातों से लगता है कि मनमोहन सिंह के पास भी कहने को कुछ है। दमन सिंह ने मनमोहन सिंह के पीवी नरसिम्हाराव और इंदिरा गांधी के साथ रिश्तों पर तो बोला है, पर सोनिया गांधी से जुड़े सवाल पर वे कन्नी काट गईं और कहा कि यह सवाल उनसे (यानी मनमोहन सिंह से) ही करिेेए। इससे यह भी पता लगेगा कि नेहरूवादी आर्थिक दर्शन से जुड़े रहे मनमोहन सिंह ग्रोथ मॉडल पर क्यों गए और भारत के व्यवस्थागत संकट को लेकर उनकी राय क्या है। इस किताब को मैने भी मँगाया है। रिलीज होने के बाद मिलेगी। फिलहाल जो दो-तीन किताबें सामने आईं हैं या आने वाली हैं, उनसे  भारत की राजनीति के पिछले ढाई दशक पर रोशनी पड़ेगी। इनसे देश की राजनीतिक संस्कृति और सिस्टम के सच का पता भी लगेगा। यह दौर आधुनिक भारत का सबसे महत्वपूर्ण दौर रहा है।  नीचे मेरा लेख है, जो मुंबई से प्रकाशित दैनिक अखबार एबसल्यूट इंडिया में प्रकाशित हुआ है।


ऐसे ही तो लिखा जाता है इतिहास
यूपीए सरकार के दस साल, उसमें शामिल सहयोगी दलों की करामातें, सोनिया गांधी का त्याग, मनमोहन सिंह की मजबूरियाँ और राहुल गांधी की झिझक से जुड़ी पहेलियाँ नई-नई शक्ल में सामने आ रही हैं। संजय बारू ने 'एक्सीडेंटल पीएम लिखकर जो फुलझड़ी छोड़ी थी उसने कुछ और किताबों और संस्मरणों को जन्म दिया है। इस हफ्ते दो किताबों ने कहानी को रोचक मोड़ दिए हैं। कहना मुश्किल है कि सोनिया गांधी किताब लिखने के अपने वादे को पूरा करेगी या नहीं, पर उनके लिखे जाने की सम्भावना ने ही माहौल को रोचक और जटिल बना दिया है। अभी तक कहानी एकतरफा थी। यानी लिखने वालों पर कांग्रेस विरोधी होने का आरोप लगता था। पर मनमोहन सिंह की बेटी दमन सिंह ने भी माना है कि पार्टी के भीतर मनमोहन सिंह का विरोध होता था।

Tuesday, August 5, 2014

आमिर को चीप पब्लिसिटी की क्या जरूरत?

आमिर को चीप पब्लिसिटी की क्या जरूरत? इस बार नकल में अकल नहीं लगाई...

प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार
फिल्‍म ‘पीके’ के पोस्टर में आमिर खान का निर्वस्त्र होकर फोटो खिंचाना उन्हें विवादास्पद और एक हद तक अभद्र साबित करता है। वे मार्केटिंग विशेषज्ञ के रूप में सफल साबित हुए हैं। पर उनके सम्मान को ठेस लगने का खतरा भी पैदा हो रहा है। कहा जा रहा है कि उनकी प्रेरणा स्रोत पूनम पाण्डेय हैं। क्या आमिर खान को पब्लिसिटी चाहिए? क्या उनका अंतिम ध्येय व्यावसायिक सफलता ही हासिल करना है? इससे उनकी उस गम्भीर छवि को धक्का लगेगा, जो ‘सत्यमेव जयते’ के कारण बनी है। यह उसी तरह है जैसा क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर का भारत रत्न बनने के बाद भी कारोबारी विज्ञापनों में नजर आना अच्छा नहीं लगता।
आप कह सकते हैं कि आखिर उन्हें धंधा भी करना है। सच है कि धंधे में आमिर सफल हैं। चूंकि वे सफल हैं तो वे जो भी करेंगे, वह सफल होता जाएगा। ‘थ्री ईडियट्स’ और ‘गजनी’ फिल्मों की मार्केटिंग के लिए उन्होंने जिन फॉर्मूलों को अपनाया, उन्हें धूम-3 में उल्टा कर दिया। फिल्म के रिलीज होने के एक साल पहले फेडोरा हैट पहने आमिर की तस्वीर जारी की गई। कोई इंटरव्यू नहीं, कोई टीवी रियलिटी शो नहीं, फिल्म के संगीत को भी रहस्य बनाकर रखा गया।
पिछले साल शाहरुख खान की ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ रिलीज होने के पहले प्रचार की झड़ी लग गई थी। इसका फायदा भी मिला और फिल्म ने शुरुआती दिनों में ढाई सौ करोड़ से ऊपर का बिजनेस कर लिया। उसके छह महीने बाद ‘धूम-3’ ने एक प्रकार के सन्नाटे की रचना की और पांच सौ से ऊपर का बिजनेस कर लिया। आमिर खान ने ही टीवी रियलिटी शो, पात्रों की पहचान की प्रतियोगिताएं, वाराणसी में रिक्शे से घूमना, चंडीगढ़ की शादी में शामिल होने वगैरह का काम किया था।
पर कलात्मकता के लिहाज से यह पोस्टर कोई मौलिक रचना नहीं है। सन 1973 में पुर्तगाली संगीतकार किम बैरीरोज़ के पोस्टर की नकल भी लगता है, जिसमें पियानो एकॉर्डियन ने अंग को ढकने का काम किया है। आमिर ने इसके लिए स्टीरियो सिस्टम की मदद ली है। आरोप तो उनकी पुरानी फिल्मों के पोस्टरों पर भी है। पिछले साल ही जब 'धूम-3' का पोस्टर सामने आया तो कहा गया कि यह तो हॉलिवुड की फिल्म 'डार्क नाइट' के पोस्टर की नकल है। 
 

Sunday, August 3, 2014

अमेरिकी रिश्तों में गर्मजोशी

नरेंद्र मोदी सरकार ने हालांकि अपनी राजनयिक मुहिम अपने पड़ोसी देशों के साथ शुरू की है, पर उसकी असली परीक्षा अब शुरू हो रही है। अमेरिकी विदेश मंत्रि जॉन कैरी ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इसके एक दिन पहले भारत-अमेरिका पांचवीं रणनीतिक वार्ता के तहत विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मुलाकात की थी। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पहले ही अमेरिकी सरकार ने उनसे सम्पर्क कर लिया था। इस चक्कर में अमेरिकी राजदूत नैंसी पॉवेल को इस्तीफा भी देना पड़ा। कहीं बदमज़गी थी भी तो वह खत्म हो चुकी है। अमेरिका ने मोदी के और मोदी ने अमेरिका के महत्व को स्वीकार कर लिया है। जॉन कैरी ने भारत यात्रा शुरू करने के पहले 'सबका साथ सबका विकास' दृष्टिकोण का हिंदी में स्वागत करके माहौल को खुशनुमा बना दिया था।
वॉशिंगटन और दिल्ली में एकसाथ जारी किए गए भारत-अमेरिका संयुक्त वक्तव्य में लश्करे तैयबा को अल-कायदा जैसा खतरनाक बताया गया और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया गया। दोनों देशों के बीच यों तो सहमतियों के बिंदु असहमतियों के मुकाबले कहीं ज्यादा हैं। पर इधर डब्ल्यूटीओ पर असहमति ज्यादा बड़ा मुद्दा बनी है। कैरी की यात्रा के बाद भी वह असहमति बनी हुई है। इधर सुषमा स्वराज ने अमेरिका द्वारा भारतीय नेताओं की जासूसी का मुद्दा उठाया और कहा कि मित्रता में यह स्वीकार नहीं किया जाएगा।