Saturday, May 17, 2014

अब ‘अच्छे दिनों’ को लाना भी होगा

भारतीय जनता पार्टी की यह जीत नकारात्मक कम सकारात्मक ज्यादा है. दस साल के यूपीए शासन की एंटी इनकम्बैंसी होनी ही थी. पर यह जीत है, किसी की पराजय नहीं. कंग्रेस जरूर हारी पर विकल्प में क्षेत्रीय पार्टियों का उभार नहीं हुआ. नरेंद्र मोदी ने नए भारत का सपना दिखाया है. यह सपना युवा-भारत की मनोभावना से जुड़ा है. यह तख्ता पलट नहीं है. यह उम्मीदों की सुबह है. इसके अंतर में जनता की आशाओं के अंकुर हैं. वोटर ने नरेंद्र मोदी के इस नारे को पास किया है कि अच्छे दिन आने वाले हैं. अब यह मोदी की जिम्मेदारी है कि वे अच्छे दिन लेकर आएं. उनकी लहर थी या नहीं थी, इसे लेकर कई धारणाएं हैं. पर देशभर के वोटर के मन में कुछ न कुछ जरूर कुछ था. यह मनोभावना पूरे देश में थी. देश की जनता पॉलिसी पैरेलिसिस और नाकारा नेतृत्व को लेकर नाराज़ थी. उसे नरेंद्र मोदी के रूप में एक कड़क और कारगर नेता नज़र आया. ऐसा न होता तो तीस साल बाद देश के मतदाता ने किसी एक पार्टी को साफ बहुमत नहीं दिया होता. यह मोदी मूमेंट है. उन्होंने वोटर से कहा, ये दिल माँगे मोर और जनता ने कहा, आमीन। देश के संघीय ढाँचे में क्षेत्रीय आकांक्षाओं को पंख देने में भी नरेंद्र मोदी की भूमिका है. एक अरसे बाद एक क्षेत्रीय क्षत्रप प्रधानमंत्री बनने वाला है.

Friday, May 16, 2014

मोदी से क्या नाराज़गी है आडवाणी और सुषमा को

 शुक्रवार, 16 मई, 2014 को 19:58 IST तक के समाचार
नरेंद्र मोदी आडवाणी
इस लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी के बजाय क्लिक करेंलालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में चुनाव लड़ती तो क्या उसे ऐसी सफलता मिलती?
इस भारी विजय की उम्मीद शायद भाजपा को भी नहीं थी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आंतरिक सर्वे में भी इसकी उम्मीद ज़ाहिर नहीं की गई थी.
चुनाव परिणाम आने के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भ्रष्टाचार, महंगाई और कुशासन के तीन परिणामों को गिनाया है.
उन्होंने कहा कि यह वोट भ्रष्टाचार और परिवारवाद के ख़िलाफ़ है. उन्होंने नरेंद्र मोदी का भी सरसरी तरीक़े से उल्लेख किया पर खुलकर श्रेय नहीं दिया.

‘शुद्ध रूप से’ बीजेपी की जीत

इसी प्रकार की प्रतिक्रिया सुषमा स्वराज की भी है. उनका कहना है कि यह ‘शुद्ध रूप से’ बीजेपी की जीत है.
आडवाणी ने सार्वजनिक रूप से न तो मोदी को बधाई दी और न श्रेय दिया, बल्कि मोदी का नाम लेते वक़्त कहा कि इस बात का विश्लेषण किया जाना चाहिए कि इस जीत में नरेंद्र मोदी की भूमिका कितनी है.

अपने तबेले को कैसे सम्हालेंगे मोदी?

आज सुबह के इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है 'Headline awaited' यानी शीर्षक का इंतज़ार है। अब से कुछ घंटे बाद परिणाम आने लगेंगे। कहना मुश्किल है कि देश को कोई शीर्षक मिलेगा या नहीं। लगता है कि कांग्रेस का शीर्षक लिखा जा चुका है। अब उसकी दिलचस्पी मोदी को रोकने में है। दूसरी ओर भाजपा यानी मोदी हारें या जीतें उनकी समस्याएं बढ़ने वाली हैं। हारने का मतलब समस्याओं का पहाड़ है तो जीतने का मतलब है परेशानियों का महासागर। जीते तो उनके खिलाफ कांग्रेस वही काम शुरू करेगी जो अबतक वे कांग्रेस के साथ कर रहे थे। उनकी अपनी पार्टी के खुर्राट भी उनका काम लगाएंगे। बीच में लटके तो दीदियों और दादाओं की मनुहार में सारा वक्त खर्च होगा। बहुत कठिन है डगर पनघट की।


कल के भास्कर की खबर


स्मृति हारीं तब भी जीतेंगी
                                       


                                         पहली बारी गवर्नरोंं की 



भाजपा का नया कोर ग्रुप

Thursday, May 15, 2014

कांग्रेस क्या आत्मघाती पार्टी है?

हिंदू में केशव का कार्टून
मनमोहन सिंह को दिए गए रात्रिभोज में राहुल गांधी नहीं आए। रात में टाइम्स नाउ ने सबसे पहले इस बात को उठाया। चैनल की संवाददाता ने वहाँ उपस्थित कांग्रेस नेताओं से बात की तो किसी को कुछ पता नहीं था। सुबह के अखबारों से पता लगा कि शायद वे बाहर हैं। अलबत्ता रात में यह बात पता लगी थी कि कपिल सिब्बल का भी विदेश का दौरा था, पर उनसे कहा गया था कि वे किसी तरह से इस भोज में शामिल हों। भोज में शामिल होना या न होना इतना महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह बात है कि राहुल का अपने साथियों के साथ संवाद का स्तर क्या है।


दो दिन से कांग्रेस के नेता यह साबित करने में लगे हैं कि कांग्रेस राहुल गांधी की वजह से नहीं हारी। यह सामूहिक हार है। कमल नाथ बोले कि राहुल सरकार में नहीं थे। सरकार अपनी उपलब्धियो को जनता तक नहीं ले जा सकी। उनसे पूछा जाए कि जीत होती तो क्या होता? सन 2009  की जीत का श्रेय राहुल को दिया गया था। भला क्यों?

आज टाइम्स ऑफ इंडिया में स्वामीनाथन अंकलेसरैया अय्यर का लम्बा लेख मनमोहन सिंह की उपलबधियों के बारे में प्रकाशित हुआ है। समय बताएगा कि उनकी उपलब्धियाँ क्या थीं, पंर कांग्रेस उनका जिक्र क्यों नहीं करती?

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ओपीनियन पोल संज़ीदा काम है कॉमेडी शो नहीं

एक होता है ओपीनियन पोल और दूसरा एक्ज़िट पोल। तीसरा रूप और है पोस्ट पोल सर्वे का, जिसे लेकर हम ज़्यादा विचार नहीं करते। क्योंकि उसका असर चुनाव परिणाम पर नहीं होता। यहीं पर इन सर्वेक्षणों की ज़रूरत और उनके दुरुपयोग की बात पर रोशनी पड़ती है। इनका काम जनता की राय को सामने लाना है। पर हमारी राजनीतिक ताकतें इनका इस्तेमाल प्रचार तक सीमित मानती हैं। इनका दुरुपयोग भी होता है। अक्सर वे गलत भी साबित होते हैं। हाल में कुछ स्टिंग ऑपरेशनों से पता लगा कि पैसा लेकर सर्वे परिणाम बदले भी जा सकते हैं।

जनता की राय को सामने लाने वाली मशीनरी की साख का मिट्टी में मिलते जाना खतरनाक है। इन सर्वेक्षणों की साख के साथ मीडिया की साख जुड़ी है। पर कुछ लोग इन सर्वेक्षणों पर पाबंदी लगाने की माँग करते हैं। वह भी इस मर्ज की दवा नहीं है। हमने लोकमत के महत्व को समझा नहीं है। लोकतंत्र में बात केवल वोटर की राय तक सीमित नहीं होती। यह मसला पूरी व्यवस्था में नागरिक की भागीदारी से जुड़ा है। जनता के सवाल कौन से हैं, वह क्या चाहती है, अपने प्रतिनिधियों से क्या अपेक्षा रखती है जैसी बातें महत्वपूर्ण हैं। ये बातें केवल चुनाव तक सीमित नहीं हैं।

हमने ज़रूरी सावधानियाँ नहीं बरतीं

लोकतांत्रिक जीवन में तमाम सवालों पर लगातार लोकमत को उभारने की ज़रूरत होती है। यह जागृत-लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। अमेरिका का प्यू रिसर्च सेंटर इस काम को बखूबी करता है और उसकी साख है। हमारा लोकतंत्र पश्चिमी मॉडल पर ढला है। ओपीनियन पोल की अवधारणा भी हमने वहीं से ली, पर उसे अपने यहाँ लागू करते वक्त ज़रूरी सावधानियाँ नहीं बरतीं। हमारे यहाँ सारा ध्यान सीटों की संख्या बताने तक सीमित है। वोटर को भेड़-बकरी से ज्यादा नहीं मानते। इसलिए पहली जरूरत है कि ओपीनियन पोलों को परिष्कृत तरीके से तैयार किया जाए और उनकी साख को सूरज जैसी ऊँचाई तक पहुँचाया जाए।

जब मुँह के बल गिरा अनुमान

भारत में सबसे पहले साठ के दशक में सेंटर फॉर द स्टडीज़ ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज़ ने सेफोलॉजी या सर्वेक्षण विज्ञान का अध्ययन शुरू किया। नब्बे के दशक में कुछ पत्रिकाओं और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने चुनाव सर्वेक्षणों को आगे बढ़ाया। कुछ सर्वेक्षण सही भी साबित हुए हैं। पर पक्के तौर पर नहीं। मसलन सन 1998 और 1999 के लोकसभा चुनाव के सर्वेक्षण काफी हद तक सही थे, तो 2004 और 2009 के काफी हद तक गलत। सन 2007 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मायावती की बसपा की भारी जीत और 2012 में मुलायम सिंह की सपा को मिली विश्वसनीय सफलता का अनुमान किसी को नहीं था। इसी तरह पिछले साल हुए उत्तर भारत की चार विधानसभाओं के परिणाम सर्वेक्षणों के अनुमानों से हटकर थे। मसलन दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सफलता का अनुमान केवल एक सर्वेक्षण में लगाया जा सका। राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस का इस बुरी तरह सूपड़ा साफ होने की भविष्यवाणी किसी ने नही की थी।

सामाजिक संरचना भी जिम्मेदार

सर्वेक्षण चुनाव की दिशा बताते हैं, सही संख्या नहीं बता पाते। इसका एक बड़ा कारण हमारी सामाजिक संरचना है। पश्चिम में समाज की इतनी सतहें नहीं होतीं, जितनी हमारे समाज में हैं। आय, धर्म, लिंग, उम्र और इलाके के अलावा जातीय संरचना चुनाव परिणाम को प्रभावित करती है। हमारे ज्यादातर सर्वेक्षण बहुत छोटे सैम्पल के सहारे होते हैं। पिछले साल दिल्ली विधान सभा की 70 सीटों के लिए एचटी-सीफोर सर्वेक्षण का दावा था कि 14,689 वोटरों को सर्वेक्षण में शामिल किया गया। यानी औसतन हर क्षेत्र में तक़रीबन 200 वोटर। जिस विधानसभा क्षेत्र में वोटरों की संख्या डेढ़ से दो लाख है (क्षमा करें मेरी गलती से अखबार में यह संख्या करोड़ छपी है), उनमें से 200 से राय लेकर किस प्रकार सही निष्कर्ष निकाला जा सकता है? दिल्ली विधानसभा चुनाव में आपने अपना सर्वे भी कराया। उसका दावा था कि उसने 35,000 वोटरों का सर्वे कराया। यानी औसतन 500 वोटर। सीवोटर ने उत्तर भारत की चार विधान सभाओं की 590 सीटों के लिए 39,000 वोटरों के सर्वे का दावा किया है। यानी हर सीट पर 60 से 70 वोटर।


अटकलबाज़ी को सर्वेक्षण कहना गलत

आप कल्पना करें कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के सुदूर और विविध जन-संस्कृतियों वाले इलाक़ों से कोई राय किस तरह निकल कर आई होगी। ऊपर बताए सैम्पल भी दावे हैं। जरूरी नहीं कि वे सही हों। इस बात की जाँच कौन करता है कि कितना बड़ा सैम्पल लिया गया। वे अपनी अधयन पद्धति भी नहीं बताते। केवल सैम्पल से ही काम पूरा नहीं होता सर्वेक्षकों की समझदारी और वोटर से पूछे गए सवाल भी महत्वपूर्ण होते हैं। जनमत संग्रह का बिजनेस मॉडल इतना अच्छा नहीं है कि अच्छे प्रशिक्षित सर्वेक्षक यह काम करें। पूरा डेटा सही भी हो तब भी उससे सीटों की संख्या किस प्रकार हासिल की जाती है, इसे नहीं बताते। जल्दबाज़ी में फैसले किए जाते हैं। यह शिकायत आम है कि डेटा में जमकर हेर-फेर होती है। बेशक कुछ लोगों से बात करके चुनाव की दशा-दिशा का अनुमान लगाया जा सकता है। वह अनुमान सही भी हो सकता है, पर अटकलबाज़ी को वैज्ञानिक सर्वेक्षण कहना गलत है। चैनलों के अधकचरे एंकर ब्रह्मा की तरह भविष्यवाणी करते वक्त कॉमेडियन जैसे लगते हैं। सर्वेक्षण जरूरी हैं, पर उन्हें कॉमेडी शो बनने से रोकना होगा। 

Wednesday, May 14, 2014

चुनाव परिणामों को लेकर संघ और कांग्रेस के आंतरिक सर्वे

लोकसभा चुनाव परिणामों को लेकर राष्ट्रीय संवयं सेवक संघ ने अपने स्वयंसेवकों के मार्फत जो सर्वेक्षण कराया है, वह इस प्रकार है। इसमें केसरिया रंग के कॉलम में प्राप्त सीटों का अनुमान है और हरे रंग के कॉलम में अंदेशा है कि खराब से खराब स्थिति में कितनी सीटें मिलेंगी।



अमर उजाला ने कांग्रेस पार्टी के सर्वेक्षण का हवाला देकर बताया है कि पार्टी को 166 सीटें मिलने की आशा है। अखबार का कहना है किः-

हाल में कुल छह एग्जिट पोल किए गए, जिनमें से ज्यादातर में दावा किया गया कि कांग्रेस इस बार सौ सीटों तक नहीं पहुंच रही है। पर कांग्रेस का सर्वे इन सभी से अलग है।

राहुल गांधी की अगुवाई में चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस के इस पोल में दावा किया गया है कि उसे कुल 543 सीटों मेंसे 166 सीटें मिल सकती हैं। हालांकि, यह सर्वे अंतिम चरण की सीटों पर मतदान से पहले किया गया था।

इसमें कहा गया था कि अंतिम चरण में 39 सीटों पर वोटिंग होनी बाकी है, ऐसे में नरेंद्र मोदी को कुछ फायदा जरूर हो सकता है, क्योंकि उससे ठीक पहले चुनाव चिन्ह दिखाने को लेकर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।

इस आंतरिक सर्वे में यह भी कहा गया कि नरेंद्र मोदी ने आचार संहिता का जो उल्लंघन किया और चुनाव आयोग पर बोला गया सीधा हमला यह संकेत है कि भाजपा जानती है कि वो लड़ाई हारने की वजह से घबराहट महसूस कर रही है।

इस सर्वे में कहा गया है कि दलितों ने मुस्लिमों के साथ 67 सीटों पर मोदी के खिलाफ वोटिंग की है, जिसके कारण यूपीए 166 सीटों तक पहुंच सकती है। आकलन में यह भी कहा गया है कि मोदी का पीएम पद तक पहुंचना मुश्किल है, क्योंकि वो अति आत्मविश्वासी हैं।

इसमें कहा गया है कि अगर भाजपा मोदी के बजाय क‌िसी और को पीएम के तौर पेश करने पर तैयार हो जाती है, तो इसके बावजूद एनडीए सरकार बना सकता है। वरना वो विपक्ष में बैठेगा और यूपीए 3 तीसरे मोर्चे के समर्थन से सरकार बनाने में कामयाब रहेगा।

पूरी खबर पढ़ें यहाँ

कुछ महत्वपूर्ण राज्यों के एक्जिट पोल अनुमान























13 मई 2004 से 13 मई 2014...

हिंदू में सुरेंद्र का कार्टून

एक्ज़िट पोल के परिणामों पर कांग्रेस को औपचारिक रूप से भरोसा हो या न हो, पर व्यावहारिक रूप से दिल्ली के गलियारों में सत्ता परिवर्तन की हवाएं चलने लगी हैं। कल 13 मई को श्रीमती सोनिया गांधी 10 जनपथ के पिछले दरवाजे से निकलकर राष्ट्रपति भवन गईं। यह एक औपचारिक मुलाकात थी। आज मनमोहन सिंह का विदाई भोज है। उधर भाजपा के खेमे में भी सरगर्मी है। दिल्ली में सरकार की शक्ल क्या होगी?  पर इससे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी वगैरह का क्या होगा? खबर थी कि आडवाणी जी एनडीए संसदीय दल के अध्यक्ष बनाए जा सकते हैं। पर आज के टेलीग्राफ में राधिका रमाशेषन की खबर है कि मोदी ने साफ कर दिया है कि यदि मैं प्रधानमंत्री बना तो सत्ता के दो केंद्र नहीं होंगे। सही बात है। यह चुनाव नरेंद्र मोदी जीतकर आ रहे हैं। कहना मुश्किल है कि आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा की स्थिति क्या होती, पर आज यह विचार का विषय ही नहीं है। 

भारत के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर तरस आता है। नीचे से ऊपर तक सबका दिमाग शून्य है। दिल्ली में चल रही गतिविधियों पर उनकी नज़र ही नहीं है। सुबह से शाम तक एक्ज़िट पोल का तसकिरा लेकर बैठे हैं।  सारी खबरें अखबारों से मिल रहीं हैं। इन संकीर्तनोंं के विशेषज्ञों की समझ पर हँसी आती है। विनोद मेहता, अजय बोस, दिलीप पडगाँवकर, आरती जैरथ, सबा नकवी, सुनील अलग और पवन वर्मा वगैरह-वगैरह किन बातों पर बहस कर रहे हैं? 

दिल्ली के कुछ अखबारों ने मनीष तिवारी के हवाले से खबर दी है कि सूचना मंत्रालय की ज़रूरत ही नहीं है। आज क हिंदू में खबर है कि एनडीए सरकार मंत्रालयों में भारी फेर-बदल करेगी। आज के अमर उजाला के अनुसार नौकरशाही के महत्वपूर्ण पदों के लिए खींचतान शूरू हो गई है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पोलों के पोल के पीछे पड़ा है। 

टेलीग्राफ की ध्यान देने वाली दो खबरें


हिंदू का ग्रैफिक

अमर उजाला


Tuesday, May 13, 2014

भाजपा या कांग्रेस के खोल से बाहर आइए


हिंदू में कशव का कार्टून
मंजुल का कार्टून
एक्जिट पोल अंतिम सत्य नहीं है। यों भी भारत में एक्ज़िट पोलों की विश्वसनीयता संदिग्ध है। पर क्या हमें कांग्रेस की हार नज़र नहीं आती? बेहतर है चार रोज़ और इंतज़ार करें। परिणाम जो भी हों उनसे सहमति और असहमति की गुंजाइश हमेशा रहेगी। पर एक सामान्य नागरिक को कांग्रेसी या भाजपाई खोल में रहने के बजाय नागरिक के रूप में खुद को देखना चाहिए और राज-व्यवस्था के संचालन में भागीदार बनना चाहए।सामान्य वोटर का फर्ज है वोट देना। अब जो भी सरकार बनेगी वह पूरे देश की और आपकी होगी, भले ही आपने उसके खिलाफ वोट दिया हो।

Monday, May 12, 2014

मनमोहन सिंह यानी दुविधा के दस साल

यूपीए-2 सरकार का यह आखिरी हफ्ता है. भविष्य का पता नहीं, पर इतना तय है कि मनमोहन सिंह अब प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे. पिछले हफ्ते सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की आखिरी बैठक हुई तो मीडिया के लिए बड़ी खबर नहीं थी. दिल्ली में यूपीए की सरकार बनेगी या नहीं कहना मुश्किल है, पर फिलहाल राष्ट्रीय सलाहकार परिषद भी नहीं होगी. होगी तो शायद किसी नए नाम और किसी नए एजेंडा के साथ होगी. प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह और उनके समानांतर राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का होना कांग्रेसी दुविधा को रेखांकित करता है. बेशक मनमोहन  सिंह को एक भले, शिष्ट, सौम्य और ईमानदार व्यक्ति के रूप में याद रखा जाएगा. वे ऐसे हैं. पर सच यह है कि यूपीए सरकार के सारे अलोकप्रिय कार्यों का ठीकरा उनके सिर फूटा है. श्रेय लायक कोई काम हुआ भी तो उसके लिए वे याद नहीं किए जाएंगे.

Sunday, May 11, 2014

इस हार के बाद कांग्रेस का क्या होगा?

कांग्रेस का चुनाव प्रचार इस बार इस बात पर केंद्रित था कि हमें जिताओ, वर्ना मोदी आ रहा है। पिछले 12 साल में कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी को 'भेड़िया आया' के अंदाज़ में खड़ा किया है। कांग्रेस ने अपनी सकारात्मक राजनीति को सामने लाने के बजाय इस राजनीति का सहारा लिया। जहाँ उसे जाति का लाभ मिला वहाँ जाति और जहाँ धर्म का लाभ मिला वहाँ धर्म का सहारा भी लिया। पश्चिमी देशों के मीडिया में कांग्रेस की इस अवधारणा को महत्व मिला। बावजूद इन बातों के क्या कांग्रेस चुनाव में हार रही है? इस बात को अभी कहना उचित नहीं होगा। सम्भव है भारतीय मीडिया के सारे कयास और अनुमान गलत साबित हों। अलबत्ता यह लेख इस बात को मानकर लिखा गया है कि कांग्रेस अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी पराजय से रूबरू होने जा रही है। ऐसा होता है तब कांग्रेस क्या करेगी? बेशक ऐसा नहीं हुआ और कांग्रेस विजयी होकर उभरी तो हमें अपनी समझ का पुनर्परीक्षण करना होगा। पर यदि वह हारी तो उन बातों पर विचार करना होगा जो कांग्रेस के पराभव का कारण बनीं और यह भी कि अब कांग्रेस क्या करेगी। 

पिछले साल जून में भाजपा के चुनाव अभियान का जिम्मा सँभालने के बाद नरेंद्र मोदी ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से 'कांग्रेस मुक्त भारत निर्माण' के लिए जुट जाने का आह्वान किया था। उस समय तक वे अपनी पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नहीं बने थे। नरेन्द्र मोदी की बातों में आवेश होता है। उनकी सारी बातों की गहराई पर जाने की ज़रूरत नहीं होती, पर उन्होंने इस बात को कई बार कहा, इसलिए यह समझने की ज़रूरत है कि वे कहना क्या चाहते थे। यह भी कि इस बार के चुनाव परिणाम क्या कहने वाले है।

चुनाव का आखिरी दौर कल पूरा हो जाएगा और कल शाम ही प्रसारित होने वाले एक्ज़िट पोलों से परिणामों की झलक मिलेगी। फिर भी परिणामों के लिए हमें 16 मई का इंतज़ार करना होगा। अभी तक के जो आसार हैं और मीडिया की विश्वसनीय, अविश्वसनीय जैसी भी रिपोर्टें हैं उनसे अनुमान है कि कांग्रेस हार रही है। हार भी मामूली नहीं होगी। तीसरे मोर्चे वगैरह की अटकलें हैं। इसीलिए इस चुनाव के बाद कांग्रेस का क्या होने वाला है, इस पर नज़र डालने की ज़रूरत है। संकट केवल लोकसभा का नहीं है। सीमांध्र और तेलंगाना विधानसभाओं के चुनाव-परिणाम भी 16 मई को आएंगे। इस साल महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव भी होंगे। यानी कांग्रेस के हाथ से प्रादेशिक सत्ता भी निकलने वाली है।

Tuesday, May 6, 2014

राजनीति का खेलघर बनता असम

असम के बोडोलैंड टैरिटोरियल एरिया डिस्ट्रिक्ट (बीटीएडी) में तकरीबन दो साल बाद फिर से हिंसा का तांडव होने के बाद हमारे मीडिया ने सहज भाव से इसे हिंदू-मुस्लिम समस्या की शक्ल दी है और कांग्रेस पार्टी ने देरी किए बगैर इसके पीछे नरेंद्र मोदी के बयानों को जिम्मेदार ठहराया है. पर यह पूरा सच नहीं है. चुनाव के कारण इसे हम देश की राजनीति से अलग करके देख नहीं पा रहे हैं. असम की कांग्रेस सरकार ने अपनी बचत के लिए इस हिंसा का आरोप  नेशनल डेमोक्रैटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड के उग्रवादियों के एक ग्रुप (सोंगजिबित) पर लगाया है. पर एनडीएफबी का कहना है कि इसमें हमारा हाथ नहीं है. कांग्रेस का बोडो पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) के साथ गठबंधन है. इस ग्रुप का एक मंत्री भी गोगोई सरकार में है. हाल की हिंसा के पीछे इसी ग्रुप का हाथ बताया जाता है. माना जा रहा है कि चुनाव में वोट न डालने की सजा गैर-बोडो लोगों को दी गई है, जो मूलतः बांग्ला या हिंदी भाषी और मुसलमान हैं. ये सब बांग्लादेशी नहीं हैं. अंदेशा है कि इस बार कोंकराझार इलाके से किसी गैर-बोडो प्रत्याशी की जीत होने वाली है.

Monday, May 5, 2014

पार्टी-पॉलिटिक्स के अलावा भी पॉलिटिक्स है

चुनाव वह समय होता है, जब हम अपनी तमाम समस्याओं पर विचार करते हैं. इस विमर्श से कुछ समस्याओं के समाधान मिलते हैं. कुछ समाधान फौरन होते हैं और कुछ में समय लगता है. आप किसी भी क्षेत्र के मतदाता से बात करें उसकी शिकायत होती है सरकार महंगाई कम कर दें, बच्चों को रोज़गार दिलवा दे, नलों में पानी आने लगे, बिजली जाना बंद कर दे, अस्पतालों में इलाज होने लगे तो जीवन सुखद हो जाए. उसकी ज्यादातर शिकायतें प्रशासन से हैं. वह प्रशासन जो सरकार की ओर से जनता की मदद के लिए तैनात किया गया है. पर प्रशासन और पुलिस, इन दोनों से जनता डरती है. क्यों हैं ऐसा? क्या हम प्रशासनिक रूप से विफल हैं? क्या हम नालायक हैं?

Sunday, May 4, 2014

इस आर्तनाद से कैसे रुकेगा मोदी?

नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनें या न बनें, पर रोको-रोको का आर्तनाद बढ़ता जा रहा है। नया जुम्ला है किसी भी कीमत पर रोको। मोदी को खिलाफ चलते-चलाते गुजरात पुलिस में आपराधिक मुकदमा दर्ज हुआ। तकरीबन छह महीने तक ठंडे बस्ते में डालने के बाद अब सरकार जाते-जाते 16 मई के पहले स्नूप गेट पर जाँच आयोग बैठाने जा रही है। क्या चुनाव आयोग को अब इसकी अनुमति देनी चाहिए? कांग्रेस को इस कदम से क्या हासिल होने वाला है?  और बीजेपी को क्या नुकसान होने वाला है? हाल में मुलायम सिंह ने जानकारी दी कि भाजपा में मोदी के खिलाफ बड़ी बगावत होने वाली है। भाजपा में क्या केवल मोदी साम्प्रदायिक हैं, शेष पार्टी स्वच्छ है? मोदी के इस अतिशय विरोध ने ही क्या मोदी को ताकतवर नहीं बनाया है? दूसरी ओर मोदी-विरोध का मोर्चा आम आदमी पार्टी ने सम्हाल लिया है। क्या कांग्रेस को इसका नुकसान होगा? कांग्रेस पार्टी और नेहरू गांधी परिवार की ओर से प्रियंका गांधी ने बयानों की बौछार करके एक और सवाल उछाला है। क्या राहुल की जगह प्रियंका लेने वाली हैं? क्या पार्टी के संगठन में बदलाव होगा? पार्टी का प्लान बी क्या है? तीसरे मोर्चे वालों के साथ क्या चल रहा है वगैरह-वगैरह। अहमद पटेल ने कहा, तीसरे मोर्चे को समर्थन देंगे। अब राहुल ने कहा है कि समर्थन नहीं देंगे। हमारे पास नम्बर आने वाले हैं। कांग्रेस को जीत का विश्वास है तो मोदी को रोकने की हड़बड़ी क्यों है? 

Saturday, May 3, 2014

गाड़ी के आगे बैल या बैल के आगे गाड़ी?

संशय भरा है कांग्रेस का डेवलपमेंट मॉडल
हिंदी में ग्रोथ और डेवलपमेंट के लिए अक्सर विकास शब्द का इस्तेमाल होता है। संशय की शुरूआत यहीं से होती है। इनक्ल्यूसिव ग्रोथ की बात हो तो मामला और बिगड़ जाता है। इन दिनों देश विकास के मॉडलों की तफतीश में लगा है। इस बहस में अमर्त्य सेन से लेकर जगदीश भगवती तक कूद पड़े हैं। गौर से देखें तो कांग्रेस का विकास-मॉडल तकरीबन वही है, जो भारतीय जनता पार्टी का है। आर्थिक विकास के लिए 1991 से लागू की गई आर्थिक उदारीकरण की योजना कांग्रेसी है, जिससे बीजेपी को परहेज़ नहीं है। पर राजनीतिक कारणों से सन 2009 के बाद से पार्टी ने उदारीकरण की तरफ से ध्यान हटाकर मनरेगा, मिड डे मील, खाद्य सुरक्षा और कंडीशनल कैश ट्रांसफर जैसे सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों पर ज़ोर देना शुरू कर दिया। सरकार और पार्टी विपरीत रास्तों पर चलने लगीं। सरकार चाहती थी ऊर्जा पर सब्सिडी खत्म करना। उसने रसोई गैस के दाम बढ़ाए, सस्ते सिलेंडरों की संख्या कम की। पार्टी ने सिंलेंडर 6 से 9 और फिर 12 करा दिए।  

Wednesday, April 30, 2014

निर्णायक होंगे आज से शुरू हो रहे चुनाव के आखिरी तीन दौर

 बुधवार, 30 अप्रैल, 2014 को 07:02 IST तक के समाचार
चुनाव अधिकारी
सोलहवीं लोकसभा के चुनाव का सातवां दौर आज पूरा हो जाने के बाद 105 लोकसभा क्षेत्रों में मतदान बाक़ी रह जाएगा.
यानी काम निपटता जा रहा है. पर राजनीतिक दृष्टि से देखें तो चुनाव अपने सबसे महत्वपूर्ण दौर में प्रवेश कर रहा है. आज के सातवें दौर में 89 सीटों का फ़ैसला होगा. कई लिहाज से यह मतदान दिल्ली की भावी सरकार की शक्लो-सूरत तय करेगा.
कांग्रेस और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्षों की लोकसभा सदस्यता का फ़ैसला आज होगा. श्रीमती सोनिया गांधी रायबरेली से और राजनाथ सिंह लखनऊ से चुनाव लड़ रहे हैं.
जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव बिहार के मधेपुरा से चुनाव लड़ रहे हैं. उनका फ़ैसला भी आज हो जाएगा.

वर्चस्व की लड़ाई

आज गुजरात की 26, आंध्र की 17, बिहार की सात, जम्मू कश्मीर की एक, पंजाब की 13, उत्तर प्रदेश की 14, पश्चिम बंगाल की नौ, दादरा-नगर हवेली की एक और दमण-दीव की एक सीट पर मतदान होगा.