Sunday, February 10, 2013

फाँसी के बाद भी सवाल उठेंगे


अब इस बात पर विचार करने का वक्त नहीं है कि अफज़ल गुरू को फाँसी होनी चाहिए थी या नहीं, पर इतना साफ है कि यह फाँसी केन्द्र सरकार पर बढ़ते दबाव के कारण देनी पड़ी। अजमल कसाब की फाँसी की यह तार्किक परिणति थी। और प्रयाग के महाकुम्भ में धर्मसंसद की बैठक के कारण पैदा हुआ दबाव। सन 2014 के चुनाव के पहले देश में एक बार फिर से भावनात्मक आँधियाँ चलने लगें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। पर उसके पहले पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे बलवंत सिंह राजोआणा और राजीव गांधी की हत्या में शामिल संतन, मुरुगन और पेरारिवालन की सजाओं के बारे में भी विचार करना होगा। इन सजाओं के भी राजनीतिक निहितार्थ हैं। राजोआणा को फाँसी होने से शिरोमणि अकाली दल की लोकप्रियता पर असर पड़ेगा, जो भारतीय जनता पार्टी का मित्र दल है। और राजीव हत्याकांड के दोषियों को फाँसी का असर द्रमुक पर पड़ेगा, जो यूपीए में शामिल पार्टी है। समाज के किसी न किसी हिस्से की इन लोगों के साथ सहानुभूति है। सरकार दोहरे दबाव में है। एक ओर गुजरते वक्त के साथ उसके ऊपर सॉफ्ट होने का आरोप लगता है, दूसरे न्याय-प्रक्रिया में रुकावट आती है।
पिछले साल तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने एक साथ 35 हत्यारों की फाँसी माफ कर दी, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड था। जिन 35 व्यक्तियों की फाँसी की सजा उम्रकैद में बदली गई है, वे 60 से ज्यादा लोगों की हत्या में दोषी ठहराए गए थे। क्या वह प्रतिभा पाटिल का व्यक्तिगत निर्णय था? ऐसा नहीं है। राष्ट्रपति के निर्णय गृहमंत्री की संस्तुति पर होते हैं। पिछले साल तक सरकार धीरे-धीरे देश में मौत की सजा की समाप्ति की ओर बढ़ रही थी। यों भी सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है कि फाँसी रेयर ऑफ द रेयरेस्ट मामले में दी जाए। दुनिया के अधिकतर देश मौत की सज़ा खत्म कर रहे हैं। पर दिल्ली गैंगरेप के बाद मौत की सजा के पक्ष में ज़ोरदार तर्क सामने आए हैं। हालांकि जस्टिस वर्मा समिति ने रेप के लिए मौत की सजा को उचित नहीं माना है, पर सरकार ने जो अध्यादेश जारी किया है, उसमें रेयर ऑफ द रेयरेस्ट मामले में मौत की सजा को भी शामिल किया है। यहाँ भी राजनीति का दबाव न्याय-तंत्र पर दिखाई पड़ता है। पर हम स्त्रियों के मसले पर नहीं आतंकवादी हिंसा या देश पर हमले की बात कर रहे हैं। ऐसी हिंसा पर मौत की सजा का विरोध करना काफी मुश्किल है। हालांकि कसाब को फाँसी मिलने के बाद यह बात उठी थी कि हमें फाँसी की सज़ा पूरी तरह खत्म कर देनी चाहिए। यह बात उन सिद्धांतवादियों की ओर से आई थी जो मृत्युदंड के खिलाफ हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने जिस रेयर ऑफ द रेयरेस्ट की बात कही है, वह पहली नज़र में अपराध के जघन्य होने की ओर इशारा करता है। पहली नज़र में लगता है कि सामूहिक बलात्कार, क्रूरता और वीभत्सता की कसौटी पर रेयर ऑफ द रेयरेस्ट को परखा जाना चाहिए। क्या इसमें राजनीतिक हिंसा को शामिल नहीं किया जा सकता? राजनीतिक उद्देश्यों से हिंसा में शामिल होने वाले ज्यादा बड़े लक्ष्यों के साथ आते हैं। उनका व्यक्तिगत हित इसमें नहीं होता। पर दूसरे नज़रिए से देखें तो राजनीतिक सज़ा को टालते रहना ज्यादा खतरनाक साबित हुआ है। मसलन सन 1999 में इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण करके लाहौर ले जाने वाले लोगों की योजना मौलाना मसूद अज़हर, अहमद उमर सईद शेख और मुश्ताक अहमद ज़रगर को रिहा कराने की थी। यदि इन लोगों को समय से मौत की सजा दिलवाकर फाँसी दे दी गई होती तो विमान अपहरण न होता। अपराधियों को छुड़ाने के लिए विमान यात्रियों से लेकर सरकारी अधिकारियों तक को बंधक बनाने की परम्परा दुनिया भर में है। भारत में झारखंड, ओडीसा और बंगाल में सरकार को कई बार नक्सली बंदियों की रिहाई करनी पड़ी। इसके विपरीत कहा जाता है कि राजनीतिक प्रश्नों का हल राजनीति से होना चाहिए। नक्सलपंथ या इस्लामी आतंकवाद एक राजनीतिक सवाल है, उनका बुनियादी हल निकलना चाहिए।
पर कुछ बड़े सवाल अनुत्तरित हैं। क्या अफज़ल गुरू की फाँसी अनिश्चित काल तक टाली जा सकती थी? पर उससे बड़ा सवाल है कि क्या वास्तव में अफ़ज़ल गुरू संसद पर हमले का गुनहगार था? उसका मास्टरमाइंड कौन थाउस हमले के दौरान मारे गए पाँच आतंकवादी कौन थे, वे कहाँ से आए थे? इस मामले में पकड़े गए दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक एसएआर गीलानी की रिहाई के बाद यह सवाल पैदा हुआ था कि क्या अफज़ल गुरू को भी फँसाया गया था? अरुंधती रॉय उसके मामले को फर्ज़ी मानती हैं। उनका कहना है कि अफज़ल ने ऐसा दावा नहीं किया कि वह बिलकुल निर्दोष है, पर इस मामले में पूरी तहकीकात नहीं की गई। 13 दिसम्बर शीर्षक से पेंगुइन बुक्स की एक पुस्तक ज़ारी भी की गई, जिसकी प्रस्तावना अरुंधती रॉय ने लिखी थी। इस किताब में अनेक सवाल उठाए गए थे। सवाल अब भी उठेंगे। श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या में दोषी पाए गए केहर सिंह को दी गई फाँसी की सज़ा के बाद भी ऐसे सवाल उठे थे। सम्भव है आने वाले समय में इस पर कुछ रोशनी पड़े।

Wednesday, February 6, 2013

यह उजाले पर अंधेरों का वार है

अक्टूबर 2011 में बीबीसी हिन्दी की वैबसाइट पर संवाददाता समरा फ़ातिमा की रपट में बताया गया था कि अलगाववादी आंदोलन और हिंसा के दृश्यों के बीच कश्मीर में इन दिनों सुरीली आवाजें सुनाई दे रही हैं। उभरते युवा संगीतकार चार से पाँच लोगों का एक बैंड बना कर ख़ुद अपने गाने लिखने और इनका संगीत बनाने लगे हैं। चूंकि इनके गीतों में तकलीफों का बयान था, इसलिए पुलिस की निगाहें इनपर पड़ीं। 'एम सी कैश' के नाम से गाने बनाने वाले 20 वर्षीय 'रोशन इलाही' ने बताया कि 2010 के सितंबर में पुलिस ने उनके स्टूडियो में छापा मारा और उसे बंद कर दिया। इन कश्मीरी बैंडों में अदनान मट्टू का ब्लड रॉक्ज़ भी है, जिनकी प्रेरणा से तीन लड़कियों का बैंड प्रगाश सामने आया।
प्रगाश के फेसबुक पेज पर जाएं तो आपको समझ में आएगा कि कट्टरपंथी उनका विरोध क्यों कर रहे हैं। जैसे ही वे चर्चा में आईं उनके फ़ेस बुक अकाउंट पर नफरत भरे संदेशों का सिलसिला शुरू हो गया। सबसे पहले उनका पेज खोजना मुश्किल है, क्योंकि इस नाम से कई पेज बने हैं। असली पेज का पता इन लड़कियों के बैंड छोड़ने की घोषणा से लगता है। प्रगाश के माने हैं अंधेरे से रोशनी की ओर। रोशनी की ओर जाना कट्टरपंथियों को पसंद नहीं है। पिछले रविवार को कश्मीर के प्रधान मुफ़्ती ने उनके गाने को ग़ैर इस्लामीकरार दिया, पर उसके दो दिन पहले मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट किया था कि थोड़े से पागल लोग इनकी आवाज़ को खामोश नहीं कर पाएंगे। पर तीनों लड़कियों को बैंड छोड़ने का फैसला करना पड़ा। इससे पहले हुर्रियत कांफ़्रेंस ने भी इन उनकी यह कह कर आलोचना की थी कि वह पश्चिमी मूल्यों का अनुसरण कर रही हैं। कश्मीर के ये बैंड सन 2004 के बाद से सक्रिय हुए हैं। कश्मीर में ही नहीं पाकिस्तान में संगीत का खासा चलन है। हाल में दिल्ली आया पाकिस्तानीलाल बैंडकाफी लोकप्रिय हुआ। लाल बैंड प्रगतिशील गीत गाता है। इन्होंने रॉक संगीत में फैज अहमद फैज जैसे शायरों के बोल ढाले और उन्हें सूफी कलाम के नज़दीक पहुंचाया। पाकिस्तान और कश्मीर में सूफी संगीत पहले से लोकप्रिय है। ऐसा क्यों हुआ कि जब लड़कियों ने बैंड बनाया तो फतवा ज़ारी हुआ?

Monday, February 4, 2013

कानूनी सुधार का अधूरा चिंतन


पिछले दो साल में हुए दो बड़े जनांदोलनों की छाया से सरकार बच नहीं पा रही है। यह छाया 21 फरवरी से शुरू होने वाले बजट सत्र पर भी पड़ेगी। इन आंदोलनों की नकारात्मक छाया से बचने के लिए सरकार ने पिछले हफ्ते दो बड़े फैसले किए हैं। केन्द्रीय कैबिनेट ने पहले लोकपाल विधेयक के संशोधित प्रारूप को मंज़ूरी दी और उसके बाद स्त्रियों के खिलाफ होने वाले अपराधों को रोकने के लिए कानून में बदलाव की पहल करते हुए अध्यादेश लाने का फैसला किया। दोनों मामलों में सरकार कुछ देर से चेती है और दोनों में उसका आधा-अधूरा चिंतन दिखाई पड़ता है। अंदेशा यह है कि यह कदम उल्टा भी पड़ सकता है। सीपीएम ने इस बात को सीधे-सीधे कह भी दिया है। यह अधूरापन केवल सरकार में नहीं समूची राजनीति में है। इसके प्रमाण आपके सामने हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रकाश सिंह की याचिका पर छह साल पहले सरकार को निर्देश दिया था कि वह पुलिस सुधार का काम करे। ज्यादातर राज्य सरकारों की दिलचस्पी इसमें नहीं है। पिछले साल लोकपाल आंदोलन को देखते हुए लगभग सभी दलों ने संसद में आश्वसान दिया था कि कानून बनाया जाएगा। जब 2011 के दिसम्बर में संसद में बहस की नौबत आई तो बिल लटक गया। सरकार अब जो विधेयक संशोधन के साथ लाने वाली है उसके पास होने के बाद लोकपाल की परिकल्पना बदल चुकी होगी। दिसम्बर 2011 में ही समयबद्ध सेवाएं पाने और शिकायतों की सुनवाई के नागरिकों के अधिकार का विधेयक भी पेश किया गया था। कार्यस्थल पर यौन शोषण से स्त्रियों की रक्षा का विधेयक 2010 से अटका पड़ा है। ह्विसिल ब्लोवर कानून के खिलाफ विधेयक अटका पड़ा है। भोजन का अधिकार विधेयक अटका पड़ा है। यह संख्या बहुत बड़ी है।

Tuesday, January 29, 2013

विमर्श-विहीनता, विश्वरूपम से आशीष नन्दी तक



संयोग है कि आशीष नन्दी का प्रकरण तभी सामने आया, जब विश्वरूपमपर चर्चा चल रही थी। आशीष नंदी विसंगतियों को उभारते हैं। यह उनकी तर्क पद्धति है। वे मूलतः नहीं मानते कि पिछड़े और दलित भ्रष्ट हैं, जैसा कि उनकी बात के एक अंश को सुनने से लगता है। वे मानते हैं कि देश के प्रवर वर्ग का भ्रष्टाचार नज़र नहीं आता। यह जयपुर लिटरेरी फोरम के मंच पर कही गई गई थी। आशीष नन्दी से असहमति प्रकट करने के तमाम तरीके मौज़ूद हैं। पर सीधे एफआईआर का मतलब क्या है? एक मतलब यह कि विमर्श का नहीं कार्रवाई का विषय है। कार्रवाई होनी चाहिए। बेहतर हो कि इस बहस को आगे बढ़ाएं, पर उसके पहले वह माहौल तो बनाएं जिसमें कोई व्यक्ति कुछ कहना चाहे तो वह कह सके।

Monday, January 28, 2013

हेडली से ज्यादा हमें उसके सरपरस्तों की ज़रूरत है


अक्सर कुछ रहस्य कभी नहीं खुलते। कुछ में संकेत मिल जाता है कि वास्तव में हुआ क्या था। और कुछ में पूरी कहानी सामने होती, पर उसे साबित किया नहीं जा सकता। 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमलों के साथ ऐसा ही हुआ। पाकिस्तान के लश्करे तैयबा का इस मामले में हाथ होने और उसके कर्ता-धर्ताओं के नाम सामने हैं। भारत में अजमल कसाब को स्पष्ट प्रमाणों के आधार पर फाँसी दी जा चुकी है। और अब अमेरिकी अदालत ने पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी नागरिक डेविड हेडली को 35 साल की सजा सुनाकर उन आरोपों की पुष्टि कर दी है। बावज़ूद इसके हम पाकिस्तान सरकार के सामने साबित नहीं कर सकते हैं कि हमलों के सूत्रधार आपके देश में बाइज़्ज़त खुलेआम घूम रहे हैं। अमेरिकी अदालत में डेविड हेडली को सजा सुनाने वाले डिस्ट्रिक्ट जज ने अभियोजन पक्ष द्वारा हेडली के लिए हल्की सजा की माँग किए जाने पर अपनी नाखुशी जाहिर की थी। सजा में पैरोल का कोई प्रावधान नहीं है और दोषी को कम से कम 85 फीसदी सजा पूरी करनी होगी। 52 वर्षीय हेडली जब जेल से बाहर आएगा तब उसकी उम्र 80 से 87 साल के बीच होगी। अमेरिकी अभियोजक उसके लिए मौत या उम्र कैद की सजा भी माँग सकते थे, पर हेडली के साथ एक समझौते के तहत उन्होंने यह सजा नहीं माँगी।
जज ने सजा सुनाते हुए कहा हेडली आतंकवादी हैं। उसने अपराध को अंजाम दिया, अपराध में सहयोग किया और इस सहयोग के लिए इनाम भी पाया। जज ने कहा, इस सजा से आतंकवादी रुकेंगे नहीं। वे इन सब बातों की परवाह नहीं करते। मुझे हेडली की इस बात में कोई विश्वास नहीं होता जब वह यह कहता है कि वह अब बदल गया। पर 35 साल की सजा सही सजा नहीं है। इसके पहले शिकागो की अदालत ने इसी महीने की 18 तारीख को मुंबई हमले में शामिल हेडली के सहयोगी पाकिस्तानी मूल के कनाडाई नागरिक 52 वर्षीय तहव्वुर राना को लश्कर-ए-तैयबा को साजो-सामान मुहैया कराने और डेनमार्क के अखबार पर हमले के लिए षड्यंत्र में शामिल होने के लिए 14 साल की सजा सुनाई गई थी। पर राना को मुम्बई मामले में शामिल होने के लिए सजा नहीं दी गई। इन दोनों मामलों का दुखद पहलू यह है कि हमारे देश में हुए अपराध के लिए हम इन अपराधियों पर मुकदमा नहीं चला सकते। हालांकि सरकार कह रही है कि हम हेडली और राना के प्रत्यर्पण की कोशिश करेंगे, पर लगता नहीं कि प्रत्यर्पण होगा। अमेरिकी सरकार के अभियोजन विभाग ने हैडली से सौदा किया था कि यदि वह महत्वपूर्ण जानकारियां देगा तो उसे भारत के हवाले नहीं किया जाएगा। राना के मामले में अभियोजन पक्ष ने 30 साल की सजा माँगी थी, पर अदालत ने कहा, सुनवाई के दौरान मिली जानकारियों और उपलब्ध कराई गई सामग्री को पढ़ने पर पता लगता है कि राना एक बुद्धिमान व्यक्ति है, जो लोगों का मददगार भी है। यह समझना मुश्किल है कि इस तरह का व्यक्ति कैसे इतनी गहरी साजिश में शामिल हो गया। दोनों मामलों में सजा देने वाले जज एक हैं शिकागो के डिस्ट्रिक्ट जज हैरी डी लेनिनवेबर। हेडली और तहव्वुर राना के भारत प्रत्यर्पण में 1997 में अमरीका से की गई संधि भी एक अड़चन है। यह संधि उस व्यक्ति की सुपुर्दगी की इजाजत नहीं देती जो पहले ही उस अपराध के लिए दोषी ठहराया जा चुका हो अथवा बरी  हो चुका हो। प्रत्यर्पण संधि के तहत राना को इसलिए सौंपा नहीं जा सकता, क्योंकि मुम्बई हमलों के लिए उसे  दोषी नहीं ठहराया गया है। हेडली इस दलील के साथ अपना बचाव करेगा कि उसे दोषी ठहराया जा चुका है और वह सजा पा रहा है।

Saturday, January 26, 2013

राजनीति का चिंताहरण दौर


भारतीय राजनीति की डोर तमाम क्षेत्रीय, जातीय. सामुदायिक, साम्प्रदायिक और व्यक्तिगत सामंती पहचानों के हाथ में है। और देश के दो बड़े राष्ट्रीय दलों की डोर दो परिवारों के हाथों में है। एक है नेहरू-गांधी परिवार और दूसरा संघ परिवार। ये दोनों परिवार इन्हें जोड़कर रखते हैं और राजनेता इनसे जुड़कर रहने में ही समझदारी समझते हैं। मौका लगने पर दोनों ही एक-दूसरे को उसके परिवार की नसीहतें देते हैं। जैसे राहुल गांधी के कांग्रेस उपाध्यक्ष बनने पर भाजपा ने वंशवाद को निशाना बनाया और जवाब में कांग्रेस ने संघ की लानत-मलामत कर दी। जयपुर चिंतन शिविर में उपाध्यक्ष का औपचारिक पद हासिल करने के बाद राहुल गांधी ने भावुक हृदय से मर्मस्पर्शी भाषण दिया। इसके पहले सोनिया गांधी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को सलाह दी थी कि समय की ज़रूरतों को देखते हुए वे आत्ममंथन करें। नगाड़ों और पटाखों के साथ राहुल का स्वागत हो रहा था। पर उसके पहले गृहमंत्री सुशील कुमार शिन्दे के एक वक्तव्य ने विमर्श की दिशा बदल दी। इस हफ्ते बीजेपी के अध्यक्ष का चुनाव भी तय था। चुनाव के ठीक पहले गडकरी जी से जुड़ी कम्पनियों में आयकर की तफतीश शुरू हो गई। इसकी पटकथा भी किसी ने कहीं लिखी थी। इन दोनों घटनाओं का असर एक साथ पड़ा। गडकरी जी की अध्यक्षता चली गई। राजनाथ सिंह पार्टी के नए अध्यक्ष के रूप में उभर कर आए हैं। पर न तो राहुल के पदारोहण का जश्न मुकम्मल हुआ और न गडकरी के पराभव से भाजपा को कोई बड़ा धक्का लगा।

Friday, January 25, 2013

कोई बताए हमारा आर्थिक मॉडल क्या हो


समकालीन सरोकार, जनवरी 2013  में प्रकाशित 

सन 2013 का पहला सवाल है कि क्या इस साल लोकसभा चुनाव होंगे? लोकसभा चुनाव नहीं भी हों, आठ विधान सभाओं के चुनाव होंगे। इनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और कर्नाटक का अलग-अलग कारणों से राजनीतिक महत्व है। सवाल है क्या दिल्ली की गद्दी पर गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा सरकार आने की कोई सम्भावना बन रही है? संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार ने एफडीआई के मोर्चे पर एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सफलता हासिल की है। इसके अलावा बैंकिग विधेयक लोकसभा से पास भी करा लिया है। अभी इंश्योरेंस, पेंशन और भूमि अधिग्रहण कानूनों को पास कराना बाकी है। और जैसा कि नज़र आता है कांग्रेस और भाजपा आर्थिक उदारीकरण के एजेंडा को मिलकर पूरा कराने की कोशिश कर रहे हैं। यह बात विचित्र लगेगी कि एक दूसरे की प्रतिस्पर्धी ताकतें किस तरह एक-दूसरे का सहयोग कर रही है, पर बैंकिंग विधेयक में दोनों का सहयोग साफ दिखाई पड़ा। खुदरा बाज़ार में एफडीआई को लेकर सरकार पहले तो नियम 184 के तहत बहस कराने को तैयार नहीं थी, पर जैसे ही उसे यह समझ में आया कि सरकार गिराने की इच्छा किसी दल में नहीं है, वह न सिर्फ बहस को तैयार हुई, बल्कि उसपर मतदान कराया और जीत हासिल की। सीपीएम के नेता सीताराम येचुरी इसे मैन्युफैक्चरिंग मेजॉरिटी कहते हैं, पर संसदीय लोकतंत्र यही है। सन 1991 में आई पीवी नरसिंह राव की सरकार कई मानों में विलक्षण थी। हालांकि आज़ादी के बाद से हर दशक ने किसी न किसी किस्म के तूफानों को देखा है, पर नरसिंह राव की सरकार के सामने जो चुनौतियाँ थी वे आसान नहीं थीं। उनके कार्यकाल में बाबरी मस्जिद को गिराया गया, जिसके बाद देश भर में साम्प्रदायिक हिंसा का जबर्दस्त दौर चला। मुम्बई में आतंकी धमाकों का चक्र उन्ही दिनों शुरू हुआ। कश्मीर में सीमापार से आतंकवादी कार्रवाइयों का सबसे ताकतवर सिलसिला तभी शुरू हुआ। पर हम नरसिंह राव सरकार को उन आर्थिक उदारवादी नीतियों के कारण याद रखते हैं, जिनका प्रभाव आज तक है। भारत में वैश्वीकरण की गाड़ी तभी से चलनी शुरू हुई है। वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उस सरकार के वित्त मंत्री थे। जब पहली बार आर्थिक उदारीकरण की नीतियों को लागू किया गया था तब कई तरह की आशंकाएं थीं। मराकेश समझौते के बाद जब 1995 में भारत विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बना तब भी इन आशंकाओं को दोहराया गया। पिछले इक्कीस साल में इन अंदेशों को बार-बार मुखर होने का मौका मिला, पर आर्थिक उदारीकरण का रास्ता बंद नहीं हुआ। दिल्ली में कांग्रेस के बाद संयुक्त मोर्चा और एनडीए की सरकारें बनीं। वे भी उसी रास्ते पर चलीं। बंगाल और केरल में वाम मोर्चे की सरकारें आईं और गईं। उन्होंने भी उदारीकरण की राह ही पकड़ी। मुख्यधारा की राजनीति में उदारीकरण की बड़ी रोचक तस्वीर बनी है। ज्यादातर बड़े नेता उदारीकरण का खुला समर्थन नहीं करते हैं, बल्कि विरोध करते हैं। पर सत्ता में आते ही उनकी नीतियाँ वैश्वीकरण के अनुरूप हो जाती हैं। एफडीआई पर संसद में हुई बहस की रिकॉर्डिंग फिर से सुनें तो आपको परिणाम को लेकर आश्चर्य होगा, पर राजनीति इसी का नाम है। उदारीकरण के दो दशकों का अनुभव यह है कि हम न तो उसके मुखर समर्थक हैं और न व्यावहारिक विरोधी। इस अधूरेपन का फायदा या नुकसान भी अधूरा है।

Wednesday, January 23, 2013

शिन्दे जी ने यह क्या कह दिया?

हिन्दू में सुरेन्द्र का कार्टून
कांग्रेस के साथ दिक्कत यह है कि कितनी भी अच्छी स्क्रिप्ट हो, कहानी के अंत में एंटी क्लाइमैक्स हो जाता है। जयपुर में राहुल गांधी के भावुक वक्तव्य और पार्टी की नई दिशा के सकारात्मक  इशारों के बावज़ूद सुशील कुमार शिन्दे के छोटे से वक्तव्य ने एजेंडा बदल दिया। चर्चा जिन बातों की होनी चाहिए थी, वे पीछे चली गईं और बीजेपी को अच्छा मसाला मिल गया। जैसे 2007 के गुजरात चुनाव में  सोनिया गांधी के मौत के सौदागर वक्तव्य ने काम किया लगभग वही काम शिन्दे जी के वक्तव्य ने किया है।

ऐसा नहीं कि शिन्दे जी नादान हैं। और न दिग्विजय सिंह अबोध है। भगवा आतंकवाद शब्द का प्रयोग इसके पहले तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदम्बरम भी कर चुके हैं। ये वक्तव्य कांग्रेस की योजना का हिस्सा हैं। पर इस बार तीर गलत निशाने पर जा लगा है। खासकर हाफिज सईद के बयान से इसे नया मोड़ मिल गया। जनार्दन द्विवेदी ने पार्टी की ओर से तत्काल सफाई पेश कर दी, पर नुकसान जो होना था वह हो गया। कांग्रेस इधर एक तरफ संगठित नज़र आ रही थी और दूसरी ओर गडकरी प्रकरण के कारण भाजपा का जहाज हिचकोले ले रहा था। पर भाजपा को इसके कारण सम्हलने का मौका मिल गया। इनकम टैक्स विभाग के छापों के बाद गडकरी के लिए टिके रहना और मुश्किल हो गया, पर इसका लाभ भाजपा को ही मिला। अब वह अपेक्षाकृत बेहतर संतुलित हो गई है, हालांकि उसका जहाज दिशाहीन है।

Monday, January 21, 2013

राहुल के पदारोहण से आगे नहीं गया जयपुर चिंतन


राहुल गांधी के उपाध्यक्ष बनने मात्र से कांग्रेस का पुनरोदय नहीं हो जाएगा, पर इतना ज़रूर नज़र आता है कि कांग्रेस अपनी खोई ज़मीन को फिर से हासिल करने की कोशिश कर रही है। राहुल चाहेंगे तो वे उन सवालों को सम्बोधित करेंगे जो आज प्रासंगिक हैं। राजनीति में इस बात का महत्व होता है कि कौन जनता के सामने अपनी इच्छा व्यक्त करता है। फिलहाल कांग्रेस के अलावा दूसरी कोई पार्टी दिल्ली में सरकार बनाने की इच्छा व्यक्त नहीं कर रहीं है। सम्भव है कल यह स्थिति न रहे, पर आज बीजेपी यह काम करती नज़र नहीं आती। बीजेपी ने राहुल गांधी के उपाध्यक्ष बनाए जाने पर वंशानुगत नेतृत्व का नाम लेकर जो प्रतिक्रिया व्यक्त की है, वह नकारात्मक है। कांग्रेस यदि वंशानुगत नेतृत्व चाहती है तो यह उसका मामला है। आप स्वयं को उससे बेहतर साबित करें। अलबत्ता कांग्रेस पार्टी ने जयपुर में वह सब नहीं किया, जिसका इरादा ज़ाहिर किया गया था। अभी तक ऐसा नहीं लगता कि यह पार्टी बदलते समय को समझने की कोशिश कर रही है। लगता है कि जयपुर शिविर केवल राहुल गांधी को स्थापित करने के वास्ते लगाया गया था। कांग्रेस को गठबंधन की राजनीति और देश के लिए उपयुक्त आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों की ज़रूरत है। साथ ही उन नीतियों को जनता तक ठीक से पहुँचाने की ज़रूरत भी है। फिलहाल लगता है कि कांग्रेस विचार-विमर्श से भाग रही है। उसके मंत्री फेसबुक और सोशल मीडिया को नकारात्मक रूप में देख रहे हैं, जबकि सोशल मीडिया उन्हें मौका दे रहा है कि अपनी बातों को जनता के बीच ले जाएं। पर इतना ज़रूर ध्यान रखें कि देश के नागरिक और उनके कार्यकर्ता में फर्क है। नागरिक जैकारा नहीं लगाता। वह सवाल करता है। सवालों के जवाब जो ठीक से देगा, वह सफल होगा। 

Friday, January 18, 2013

डॉ सॉक ने कहा, कैसा पेटेंट?


जिस तरह रुक्सा खातून के नाम से बहुत कम लोग परिचित हैं उसी तरह  जोनास एडवर्ड सॉक (28 अक्टूबर1913-23 जून 1995) के नाम से भी बहुत ज्यादा लोग परिचित नहीं हैं। परिचित हैं भी तो इस बात से कि उन्होंने पोलियो का वैक्सीन तैयार किया। हालांकि आज इस वैक्सीन में सुधार हो चुका है, पर उन्हें श्रेय जाता है ऐसी बीमारी का टीका तैयार करने का जो 1955 के पहले तक सार्वजनिक स्वास्थ्य के सामने खड़े सबसे बड़े खतरे के रूप में पहचानी जाती थी।जोनास एडवर्ड सॉक के यहूदी माता-पिता ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे, पर उनकी तमन्ना थी कि उनका बेटा कोई अच्छा काम करे। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में सॉक ने डॉक्टरी की पढ़ाई की, पर वे विलक्षण इस बात में साबित हुए कि उन्होंने रिसर्च का रास्ता पकड़ा।

सन 2009 में बनी एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म के अनुसार सन 1952 में अमेरिका में पोलियो की महामारी ने तकरीबन 58,000 लोगों को निशाना बनाया। उस वक्त अमेरिकी लोगों के मन में एटम बम के बाद दूसरी सबसे खतरनाक चीज पोलियो की बीमारी थी। अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूज़वेल्ट इसके सबसे प्रसिद्ध शिकारों में एक थे। इसके सबसे ज्यादा पीड़ित बच्चे थे, जो बच भी जाते तो पूरा जीवन विकलांग के रूप में बिताते थे। सॉक की वैक्सीन बनने के बाद इसके फील्ड ट्रायल भी विलक्षण थे। अमेरिका के 20,000 डॉक्टरों और सार्वजनिक स्वास्थ्य कर्मियों, 64,000 स्कूल कर्मचारियों, 2,20,000 वॉलंटियरों और 18,00,000 बच्चों ने इसके परीक्षण में हिस्सा लिया। 12 अप्रेल 1955 को जब इस वैक्सीन की सफलता की घोषणा हुई तो सॉक को चमत्कारिक व्यक्ति के रूप में याद किया गया। वह दिन राष्ट्रीय अवकाश जैसा हो गया। और जब एक टीवी इंटरव्यू में सॉक से सवाल किया गया कि इस टीके का पेटेंट किसके नाम है, सॉक ने जवाब दिया, "कोई पेटेंट नहीं, क्या आप सूरज को पेटेंट करा सकते हैं?"("There is no patent. Could you patent the sun?")

सॉक के जीवन काल में ही एड्स की बीमारी दुनिया में प्रवेश कर चुकी थी और उन्होंने जीवन के अंतिम वर्ष उसकी वैक्सीन तैयार करने पर लगाए। वे यह काम पूरा कर नहीं पाए।

डॉ सॉक ने पेटेंट से इनकार क्यों किया
ओपन माइंड डॉ सॉक का इंटरव्यू

आपने रुक्सा खातून का नाम सुना है?


यह तस्वीर रुक्सा खातून की है। इस साल 12 जनवरी को भारत ने पोलियो की बीमारी से मुक्ति के दो साल पूरे कर लिए। हाल में खबर आई थी कि देश में पोलियो की आखिरी शिकार रुक्सा खातून नाम की छोटी सी लड़की को पैरों में सर्जरी की ज़रूरत है। पोलियों के कारण उसके दोनों पैर बराबर नहीं हैं। कुछ साल पहले तक पोलियो एक भयानक बीमारी थी। पल्स पोलियो अभियान केवल टीकाकरण के लिहाज से ही नहीं मानवीय प्रश्नों पर संचार माध्यमों के इस्तेमाल के लिहाज से दुनिया के सफलतम कार्यक्रमों में से एक है। पोलियो के टीके का विरोध भी हुआ, कोल्ड चेन से लेकर गाँव-गाँव जाने की दिक्कतें भी सामने आईं, पर भारत ने इसे सफल बनाकर दिखाया। दो साल पहले तक पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भारत और नाइजीरिया अंग्रेजी में अपने नाम के पहले अक्षरों के आधार पर 'पेन'(PAIN) देश कहलाते थे। भारत का नाम इनमें से हट गया है। शेष देशों का नाम भी हट जाएगा। जब हम निश्चय करके एक बीमारी को खत्म कर सकते हैं तो क्या अपनी तमाम बीमारियों को, शारीरिक, मानसिक, सांस्कृतिक, खत्म नही कर सकते? कर सकते हैं। ज़रूर कर सकते हैं। नीचे कुछ जानकारियाँ देखें और विचार करें।

Tuesday, January 15, 2013

दोनों ओर गरज़ते लाउडस्पीकरों के गोले




हिन्दू में प्रकाशित सुरेन्द्र का कार्टून जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर व्याप्त तनाव को अच्छी तरह व्यक्त करता है। दोनों देशों के लाउडस्पीकर तोप के गोलों का काम कर रहे हैं। यह भी एक सच है कि दोनों देश तनाव के किसी भी मौके का फायदा उठाने से नहीं चूकते। बहरहाल जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर तनाव का पहला असर हॉकी इंडिया लीग पर पड़ा है। पाकिस्तानी खिलाड़ियों को खेलने से रोक दिया गया है। लगता है कुछ दिन तनाव दूर करने में लगेंगे। हमें इसे स्वीकार करना चाहिए कि हमारा मीडिया तमाम सही मसलों को उठाता है, पर हर बात के गहरे मतलब निकालने के चक्कर में असंतुलन पैदा कर देता है। भारत-पाक मसलों पर तो यों भी आसानी से तनाव पैदा किया जा सकता है। नियंत्रण रेखा पर तनाव कम होने में अभी कुछ समय लगेगा। बेशक हमारे सैनिकों की मौत शोक और नाराज़गी दोनों का विषय है। उससे ज्यादा परेशानी का विषय है सैनिक की गर्दन काटना। यह मध्य युगीन समझ है और पाकिस्तान को अपनी सेना के अनुशासन पर ध्यान देना चाहिए। अलबत्ता इस समय दोनों देशों के बीच झगड़े और तनाव का कोई कारण नहीं है। यह बात अगले दो-तीन हफ्ते में स्पष्ट हो जाएगी। भारत सरकार पर भी लोकमत का भारी दबाव है। 

जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर पिछले दस-बारह दिन से गोलियाँ चल रहीं हैं। भारत के दो सैनिकों की हत्या के बाद से देश में गुस्से की लहर है। सीमा पर तैनात सैनिक नाराज़ हैं। वे बदला लेना चाहते हैं। फेसबुक और ट्विटर पर कमेंट आ रहे हैं कि भारत दब्बू देश है। वह कार्रवाई करने से घबराता है। हालांकि भारत ने पाकिस्तान के सामने कड़े शब्दों में अपना विरोध व्यक्त किया है, पर जनता संतुष्ट नहीं है। सैनिकों की हत्या से ज्यादा फौजी की गर्दन काटने से जनता नाराज़ है। पर हमें समझना होगा कि यह घटना क्या जान-बूझकर की गई है? क्या पाकिस्तानी सेना या सरकार का इसमें हाथ है? या यह स्थानीय स्तर पर नासमझी में हुई घटना है? भारत को एक ज़िम्मेदार देश की भूमिका भी निभानी है। केवल आवेश और भावनाओं से काम नहीं होता।