Friday, January 25, 2013

कोई बताए हमारा आर्थिक मॉडल क्या हो


समकालीन सरोकार, जनवरी 2013  में प्रकाशित 

सन 2013 का पहला सवाल है कि क्या इस साल लोकसभा चुनाव होंगे? लोकसभा चुनाव नहीं भी हों, आठ विधान सभाओं के चुनाव होंगे। इनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और कर्नाटक का अलग-अलग कारणों से राजनीतिक महत्व है। सवाल है क्या दिल्ली की गद्दी पर गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा सरकार आने की कोई सम्भावना बन रही है? संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार ने एफडीआई के मोर्चे पर एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सफलता हासिल की है। इसके अलावा बैंकिग विधेयक लोकसभा से पास भी करा लिया है। अभी इंश्योरेंस, पेंशन और भूमि अधिग्रहण कानूनों को पास कराना बाकी है। और जैसा कि नज़र आता है कांग्रेस और भाजपा आर्थिक उदारीकरण के एजेंडा को मिलकर पूरा कराने की कोशिश कर रहे हैं। यह बात विचित्र लगेगी कि एक दूसरे की प्रतिस्पर्धी ताकतें किस तरह एक-दूसरे का सहयोग कर रही है, पर बैंकिंग विधेयक में दोनों का सहयोग साफ दिखाई पड़ा। खुदरा बाज़ार में एफडीआई को लेकर सरकार पहले तो नियम 184 के तहत बहस कराने को तैयार नहीं थी, पर जैसे ही उसे यह समझ में आया कि सरकार गिराने की इच्छा किसी दल में नहीं है, वह न सिर्फ बहस को तैयार हुई, बल्कि उसपर मतदान कराया और जीत हासिल की। सीपीएम के नेता सीताराम येचुरी इसे मैन्युफैक्चरिंग मेजॉरिटी कहते हैं, पर संसदीय लोकतंत्र यही है। सन 1991 में आई पीवी नरसिंह राव की सरकार कई मानों में विलक्षण थी। हालांकि आज़ादी के बाद से हर दशक ने किसी न किसी किस्म के तूफानों को देखा है, पर नरसिंह राव की सरकार के सामने जो चुनौतियाँ थी वे आसान नहीं थीं। उनके कार्यकाल में बाबरी मस्जिद को गिराया गया, जिसके बाद देश भर में साम्प्रदायिक हिंसा का जबर्दस्त दौर चला। मुम्बई में आतंकी धमाकों का चक्र उन्ही दिनों शुरू हुआ। कश्मीर में सीमापार से आतंकवादी कार्रवाइयों का सबसे ताकतवर सिलसिला तभी शुरू हुआ। पर हम नरसिंह राव सरकार को उन आर्थिक उदारवादी नीतियों के कारण याद रखते हैं, जिनका प्रभाव आज तक है। भारत में वैश्वीकरण की गाड़ी तभी से चलनी शुरू हुई है। वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उस सरकार के वित्त मंत्री थे। जब पहली बार आर्थिक उदारीकरण की नीतियों को लागू किया गया था तब कई तरह की आशंकाएं थीं। मराकेश समझौते के बाद जब 1995 में भारत विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बना तब भी इन आशंकाओं को दोहराया गया। पिछले इक्कीस साल में इन अंदेशों को बार-बार मुखर होने का मौका मिला, पर आर्थिक उदारीकरण का रास्ता बंद नहीं हुआ। दिल्ली में कांग्रेस के बाद संयुक्त मोर्चा और एनडीए की सरकारें बनीं। वे भी उसी रास्ते पर चलीं। बंगाल और केरल में वाम मोर्चे की सरकारें आईं और गईं। उन्होंने भी उदारीकरण की राह ही पकड़ी। मुख्यधारा की राजनीति में उदारीकरण की बड़ी रोचक तस्वीर बनी है। ज्यादातर बड़े नेता उदारीकरण का खुला समर्थन नहीं करते हैं, बल्कि विरोध करते हैं। पर सत्ता में आते ही उनकी नीतियाँ वैश्वीकरण के अनुरूप हो जाती हैं। एफडीआई पर संसद में हुई बहस की रिकॉर्डिंग फिर से सुनें तो आपको परिणाम को लेकर आश्चर्य होगा, पर राजनीति इसी का नाम है। उदारीकरण के दो दशकों का अनुभव यह है कि हम न तो उसके मुखर समर्थक हैं और न व्यावहारिक विरोधी। इस अधूरेपन का फायदा या नुकसान भी अधूरा है।
सन 1991 में उदारीकरण की राह पकड़ने के ठीक पहले भारत सरकार ने यूनियन बैंक ऑफ स्विट्ज़रलैंड और बैंक ऑफ इंग्लैंड में 67 टन सोना गिरवी रखा था। हमारे सामने विदेशी मुद्रा का संकट था। जनवरी 1991 में हमारा विदेशी मुद्रा भंडार 1.2 अरब डॉलर था, जो जून आते-आते इसका आधा रह गया। आयात भुगतान के लिए तकरीबन तीन सप्ताह की मुद्रा हमारे पास थी। ऊपर से राजनीतिक अस्थिरता थी। प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर की अल्पमत सरकार कांग्रेस के सहयोग पर टिकी थी। फौरी तौर पर अंतरऱाष्ट्रीय मुद्रा कोष से 2.2 अरब डॉलर का कर्ज लेना पड़ा और सोना गिरवी रखना पड़ा। आर्थिक उदारीकरण का वह रास्ता हमने मजबूरी में पकड़ा। न तब कोई गहरा विचार-विमर्श हुआ और न आज है। इस राह पर चलने के फायदे अर्थ-व्यवस्था को मिले। पिछले साल 18 नवम्बर को हमारे पास 308 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था। पर पिछले एक साल किश्ती डगमगा रही है। अर्थव्यवस्था दबाव में आ गई है। डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत गिरने लगी, इससे पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत बढ़ी। विदेशी मुद्रा का भंडार गिरने लगा, जो इस साल 6 जुलाई को 287.62 अरब डॉलर हो गया। आप याद करें इस साल जुलाई में राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी को लेकर ऊहापोह थी, पिछले साल नवम्बर में भारत सरकार ने खुदरा बाज़ार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को स्वीकृति दी थी, जिसे रोकने की घोषणा बंगाल की मुख्यमंत्री ने कोलकाता से कर दी थी। पिछले साल दिसम्बर में लोकपाल विधेयक को लेकर सरकार घिरी हुई थी। सन 2012 की शुरूआत राजनीतिक स्तर पर निराशा के साथ हुई थी। संसद के बजट सत्र में रेल बजट पेश करने वाले मंत्री दिनेश त्रिवेदी को किराया-भाड़ा बढ़ाने के कारण तृणमूण कांग्रेस ने खड़े घाट पद से हटा दिया। नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर बनाने की घोषणा होते ही केन्द्र सरकार पर वार होने लगे और भैंस पानी में गई तो आज तक वहीं है।

हाल की इन राजनीतिक गतिविधियों का जायज़ा लेने के पहले फिर से 1991 की सरकार की ओर चलें। वह अल्पमत सरकार थी। 1991 के चुनाव में कांग्रेस को 232 सीटें मिलीं थीं। सन 1992 में पंजाब के चुनाव के बाद इनमें 12 का इज़ाफा और हुआ, फिर भी सरकार अल्पमत में थी। जुलाई 1993 में उस सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया, तब उसे बचाने की कबायद शुरू हुई। भारतीय संसद में समर्थन हासिल करने के वास्ते पैसे के इस्तेमाल का मामला उसी वक्त सामने आया। आज वामपंथी पार्टियाँ मायावती और मुलायम सिंह को कोस रही हैं। सन 1993 में वे चाहतीं तो नरसिंह राव सरकार गिर जाती, पर ऐसा नहीं हुआ। और लगभग ऐसा ही तमाशा अगस्त 2008 में न्यूक्लियर बिल को लेकर पेश किए गए विश्वासमत पर हुआ। बहरहाल उदारीकरण के दौर में शेयर बाज़ार घोटाला सामने आया। उसी सरकार ने देश की दूरसंचार-व्यवस्था में बुनियादी बदलाव किए। दूरसंचार घोटाले का प्रकरण भी उसी दौर की देन है। भारत के विश्व बाज़ार संगठन में प्रवेश के समय एक बड़ी राजनीतिक मुहिम शुरू हुई। ऐसा कहा गया कि देश गुलामी की ओर बढ़ रहा है। साम्राज्यवादी ताकतें इस देश को गुलाम बना लेंगी। ईस्ट इंडिया कम्पनी की वापसी हो रही है वगैरह। जो कुछ हुआ हमारे सामने है। आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ने के कारण हाल के वर्षों में भारत की विकास दर 9.00 फीसदी तक जा पहुँची, जिसके कारण देश के आधारभूत ढाँचे में बड़े स्तर पर बदलाव हो रहा है। राष्ट्रीय राजमार्गों के विस्तार का महत्वाकांक्षी कार्यक्रम एनडीए सरकार ने शुरू किया। दिल्ली मेट्रो के बाद देश के कई बड़े शहरों में मेट्रो परियोजनाएं शुरू हुईं हैं। जापान की बुलेट ट्रेन की तर्ज पर भारत के छह मार्गों पर हाईस्पीड ट्रेनें चलाने के लिए एक विशेष प्राधिकरण बनाया गया है। इन बड़े फैसलों की बुनियाद पर कमज़ोर राजनीतिक सरकार थी। सन 1989 के बाद से देश में कोई सरकार ऐसी नहीं बनी जिसमें किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला हो, पर इस दौरान बनी सरकारों ने जितने बड़े फैसले किए हैं, शायद ही पुरानी ताकतवर सरकारों ने किए हों। भारत में पंचायत राज व्यवस्था, जानकारी पाने का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार योजना इसी दौर की देन हैं। मीडिया की जितनी बारीक स्क्रूटिनी इन दिनों सम्भव है उसका दशमांश भी 1975 में सम्भव नहीं था, जब इंदिरा गांधी की सरकार ने इमर्जेंसी लगाई थी। सन 1995 के बाद से प्राइवेट टीवी चैनलों का दौर उसी उदारीकरण की देन है। जिस तरह हम सरकारी मीडिया के अंतर्विरोधों को लेकर परेशान थे, आज निजी मीडिया के अंतर्विरोध हमें परेशान कर रहे हैं।

नवम्बर 2009 में भारत ने इंटरनेशनल मोनीटरी फंड से 200 टन सोना खरीदा। इस खरीद का यों तो कोई खास अर्थ नहीं। पर भारत से संदर्भ में इसका प्रतीक रूप में महत्व था। सन 1991 में हमें सोना गिरबी रखना पड़ा था। अब आईएमएफ को गरीब देशों को कर्ज देने के लिए मुद्रा की ज़रूरत है। हमने उस ज़रूरत को पूरा भी किया और अपने स्वर्ण भंडार को बढ़ाया। इस साल संकटग्रस्त यूरोज़ोन को आर्थिक मदद का भारत ने वादा किया है। साठ के दशक में हम कटोरा लेकर खड़े थे। आज यूरोप की मदद कर रहे हैं। दुनिया की सबसे तेज़ गति से विकसित हो रही अर्थव्यवस्थाओं में हमारा दूसरा स्थान है। सम्भावना इस बात की है कि अगले दो-तीन साल में हम चीन को पीछे करके विकास की दर में नम्बर एक पर आ जाएंगे।

बावजूद इस गुलाबी तस्वीर के इन दिनों हम एक द्वंद से गुजर रहे हैं। सन 2008 में अमेरिका और यूरोप की मंदी के दौर में भी हमारी अर्थव्यवस्था उसके दंश से बची रही। 2007-08 में हमारी जीडीपी ग्रोथ 9.2 प्रतिशत थी जो 2008-09 में 6.7 हो गई। इसके बाद अर्थव्यवस्था ने तेजी पकड़ी और 2009-10 में यह दर 7.4 प्रतिशत हो गई। 2010-11 में 9 पर लाने का इमकान था। वह गलत ही साबित नहीं हुआ, बल्कि अर्थव्यवस्था अचानक ढलान पर उतर गई। उसकी वजह यूरोज़ोन का संकट भी था, जिसके कारण विदेशी कम्पनियों ने विदेशी मुद्रा को निकालना शुरू कर दिया। राजकोषीय घाटा बढ़ने लगा, जिसका असर अगले साल के बजट में दिखाई पड़ेगा। विदेशी रेटिंग कम्पनियों ने हमारी रेटिंग घटानी शुरू कर दी है, जिससे विदेशी निवेश पर असर पड़ेगा। सन 2009 में जब यूपीए-2 की सरकार बनी थी तब लगता था कि आर्थिक उदारीकरण का बाकी एजेंडा यह सरकार पूरा करेगी। पर इस सरकार के पहले तीन साल राजनीतिक विवादों की भेंट चढ़ गए। कॉमनवैल्थ गेम्स के पहले घोटालों का जिक्र शुरू हुआ जो आज तक ज़ारी है। इस साल अगस्त में जब संसद का अधिवेशन शुरू हुआ तब आशा थी कि बैंकिंग, इंश्योरेंस, लोकपाल, जीएसटी, खाद्य सुरक्षा और भूमि अधिग्रहण जैसे कानूनों को पास करने का काम पूरा होगा। पर संसद का वह पूरा सत्र कोयला घोटाले के नाम हो गया।

उदारीकरण का ठीकरा मनमोहन सिंह के सिर पर फूटता है, पर यह काजल की कोठरी है और इसमें बगैर दाग वाली कमीज़ किसी ने नहीं पहनी है। पिछले कुछ दिनों में यह बात बार-बार सामने आ रही है कि उदारीकरण का मतलब संसाधनों का कुछ परिवारों के नाम स्थानांतरण नहीं है। हमारा आर्थिक विकास रोज़गार पैदा करने में विफल रहा है। पर क्या ममता बनर्जी, मुलायम सिंह, मायावती और बीजेपी व्यव्स्था को पारदर्शी बनाना चाहते हैं? क्या उनके विरोध के पीछे कोई आदर्श है? या यह सब ढोंग है? प्रधानमंत्री का कहना है कि पैसा पेड़ों में नहीं उगता। क्या ममता, मुलायम और मायावती समेत लगभग सारे दलों को लगता है कि उगता है? बंगाल सरकार 23,000 करोड़ रुपए के जिस कर्ज़ को माफ कराना चाहती है, वह रुपया भी पेड़ों नहीं उगा था, पर वाम मोर्चा सरकार ने रुपया लाने के तरीकों के बारे में नहीं सोचा। आर्थिक सुधारों को लेकर सोनिया गांधी ने जनता के बीच जाकर कभी कुछ नहीं कहा। बल्कि उन्होंने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद बनाई, जिसकी अधिकतर सलाहों से सरकार सहमत नहीं रही। पार्टी के आर्थिक और राजनीतिक विचारों में तालमेल नज़र नहीं आता। आर्थिक विकास के समानांतर हमें जिस सामाजिक विकास की दरकार है, उसके बारे में हमारे पास कल्पनाएं तो हैं, व्यावहारिक रास्ते नहीं हैं। पर इसका मतलब ग्रोथ को रोकना नहीं है। कम से कम एक दशक तक तेज आर्थिक विकास और एक मजबूत मध्यवर्ग के उदय के बाद ही हमें उम्मीद करनी चाहिए कि हमारी राजनीति विकास(ग्रोथ) और विकास(डेवलपमेंट) के अंतर्विरोधों को दूर करने के तौर-तरीके खोज पाएगी। में एफडीआई को लेकर सरकार का यह दावा अविश्वसनीय है कि इससे एक करोड़ रोज़गार पैदा होंगे, वहीं यह बात भी सही नहीं है कि इससे 25 करोड़ छोटे कारोबारी तबाह हो जाएंगे। चूंकि खुदरा कारोबार से जुड़े लोग राजनीतिक दलों पर अच्छा असर रखते हैं, इसलिए इस मसले ने बड़ी राजनीतिक शक्ल ले ली, पर उद्योगों और कारोबारों के आकार बढ़ने की यह प्रवृत्ति कोई पहली बार तो हमने नहीं देखी। साइकिल रिक्शे चलने से बैलगाड़ियों, ऑटो के कारण साइकिल रिक्शों, बसों के कारण ऑटो और मेट्रो के कारण बसों के कारोबार पड़ते असर को क्या हमने नहीं देखा? सरकार ने एफडीआई के जिस फैसले की अधिसूचना जारी की है उसके अनुसार देश के उन शहरों के रिटेल स्टोरों के लिए लिए विदेशी पूँजी निवेश की अनुमति दी जाएगी, जिनकी आबादी दस लाख से ज्यादा है। देश में ऐसे 53 शहर हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बंगाल, तमिलनाडु, बिहार जैसे देश के आधे से ज्यादा राज्यों ने घोषणा कर दी है कि हम अपने यहाँ एफडीआई नहीं आने देंगे। इसका मतलब है कि 20 से 25 शहर इसके पात्र होंगे। मान लें इन सभी शहरों में तीन-चार नए स्टोर खुले तो ज्यादा से ज्यादा सौ-सवा सौ स्टोर खुलेंगे। इनमें पूँजी निवेश का आधा पैसा बैक-एंड काम पर लगेगा। यानी कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग, क्वालिटी कंट्रोल, सप्लाई चेन वगैरह। यानी किसी न किसी स्तर पर निर्माण होगा। देश का कुल खुदरा बाज़ार तकरीबन 500 अरब डॉलर का है। इसमें से मामूली सा कारोबार संगठित क्षेत्र में है। तीन-चार विदेशी कम्पनियाँ फिलहाल ज़्यादा से ज्यादा चार पाँच अरब डॉलर का निवेश करेंगी। वह भी अगले तीन से पाँच साल में। इस दौरान कितने नए शहर भी तैयार होंगे। चूंकि यह काम राज्य सरकारों के जिम्मे है और अनेक राज्य अपने यहाँ विदेशी निवेश नहीं होने देंगे, इसलिए हमारे पास जिन इलाकों में विदेशी स्टोर खुलेंगे और जहाँ नहीं खुलेंगे, उन दोनों स्थानों के अनुभव होंगे। हम उन अनुभवों के आधार पर फैसले करेंगे। प्रतियोगिता से भागने के बजाय उसका मुकाबला करना चाहिए।

देश की बिग बाज़ार जैसी कम्पनियाँ कई सौ करोड़ के घाटे में चल रहीं हैं। उनके पास बैक-एंड इंतज़ाम नहीं हैं और न लगाने के लिए पैसा है। दूसरी ओर शहरीकरण लगातार हो रहा है। यह कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। एक तरफ हम कहते हैं कि देसी सेठजी की दुकान से बेहतर सेवा मॉल में नहीं मिलती। घर-घर चूड़ी पहनाने वाली मनहारिन से बेहतर सेवा मॉल में नहीं मिलेगी। परम्परागत व्यापारी मॉल संस्कृति के मुकाबले बेहतर सेवा देते हैं। पर दरिद्रतम व्यक्ति को भी चमकदार बिल्डिंगों के भीतर घूमने की इच्छा होती है। हमें उसकी दरिद्रता दूर करने के वास्ते शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास के बारे में सोचना चाहिए। देसी व्यापारियों की कार्यक्षमता पर भरोसा है तो क्यों मानते हैं कि ये स्टोर 25 करोड़ लोगों को तबाह कर देंगे? दोनों एक-दूसरे के मुकाबले में उतरेंगे तो उपभोक्ता को बेहतर सेवा मिलेगी। बेशक हमें नियमन चाहिए। देश के कुछ कानूनों में बदलाव भी ज़रूरी है। कृषि उत्पाद विपणन समिति कानून को खत्म किए बगैर कृषि उत्पादों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना सम्भव नहीं। राज्यों की सरकारें अभी इसमें बदलाव को तैयार नहीं हैं। इसकी वजह यह है कि राजनतिक दलों के पास वैश्विक दृष्टिकोण नहीं है।

उदारीकरण के बरक्स कांग्रेस और बीजेपी लगभग एक ही पायदान पर हैं। रिटेल में एफडीआई का श्रीगणेश बीजेपी ने ही किया है। उदारीकरण से जुड़े तमाम बड़े फैसले एनडीए सरकार ने किए। विडंबना है कि जब बीजेपी फैसले करती है तब कांग्रेस उसका विरोध करती है और जब कांग्रेस फैसले करती है तो बीजेपी उसका विरोध करती है। आर्थिक नीति नहीं राजनीति महत्वपूर्ण है। आधुनिकीकरण, औद्योगीकरण और आर्थिक गतिविधियों में तेजी के बगैर गहराई तक बैठी गरीबी और पिछड़ेपन को दूर करने का तरीका नज़र नहीं आता। पर इन गतिविधियों में सबसे पहले वे लोग ही जुड़ेंगे जो शिक्षित, किसी खास धंधे में कुशल, स्वस्थ और सक्रिय हैं। आर्थिक व्यवस्था के वैश्विक मॉडल में भी बदलाव आएगा। पूरे यूरोप और अमेरिका में जनता अपनी सरकारों से इस बात पर नाराज़ है कि वे वित्तीय संस्थाओं और बड़े कॉरपोरेट हाउसों की कैद में हैं। सोवियत संघ और चीन जैसे कुछ देशों में एक समाजवादी मॉडल आया था, जिसमें नियोजन और लगभग युद्ध की अर्थव्यवस्था के तर्ज पर पिछड़ेपन को दूर करने की कोशिश की गई थी। इस कोशिश में रूस के लाखों किसान मारे गए थे। चीन में ग्राम-केन्द्रित क्रांति हुई थी, जिसने तीन दशक पहले रास्ता बदल लिया। हमें सोचना है कि हमारा कोई अलग मॉडल होगा या किसी की नकल करते रहेंगे। पर किसी उच्चस्तरीय व्यवस्था के आने के पहले, पिछड़ेपन से छुटकारा ज़रूरी है।

पिछले दो-तीन महीनों में आर्थिक उदारीकरण से जुड़े बड़े फैसले होने के कारण अर्थव्यवस्था में गिरावट रुकी है। सेंसेक्स 19000 पार कर गया है। दस महीनों की तेजी के बाद मुद्रास्फीति की दर पहली बार गिरकर 7.24 फीसदी हुई है। इसके और गिरने की सम्भावना है। हालांकि रिज़र्व बैंक ने ब्याज़ दरें कम नहीं की हैं, पर संकेट दिया है कि भविष्य में घटाई जा सकती हैं। उनके घटने से आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ेंगी। डॉलर की कीमत 57 रु तक पहुँच गई थी जो अब 48-49.50 के स्तर पर आ गई है। 14 दिसम्बर को विदेशी मुद्रा कोष 296 अरब डॉलर हो गया, जिसका असर पेट्रोलियम की कीमतों पर दिखाई पड़ेगा। इसका दूरगामी परिणाम महंगाई पर होगा। बेशक इसे शहरों में रहने वाले और पूँजी निवेश करने वाले मध्य वर्ग को मिली राहत कह सकते हैं, पर क्या इस वर्ग को राहत देना अनुचित है? यही मध्य वर्ग अपने से नीचे वाले वर्ग के उत्थान का कारण बनता है। बेशक हमारे मध्य वर्ग का बड़ा हिस्सा गैर-जिम्मेदार और मौज-मस्ती में डूबा है। पर यही वर्ग राजनीतिक दृष्टि से जागरूक भी है।

इधऱ सरकार ने पेंशन और बीमा में एफडीआई की सीमा 26 फीसदी से बढ़कर 49 फीसदी करने का फैसला किया है। खुदरा कारोबार, उड्डयन और प्रसारण में विदेशी निवेश की अनुमति के लिए संसद सरकारी फैसला काफी था। पेंशन और इंश्योरेंस के लिए कानून में बदलाव ज़रूरी है। इसी तरह के बदलाव कम्पनी कानून में भी होने हैं। निवेश के रास्ते में आने वाली अड़चनों को दूर करने के लिए सरकार ने बड़ी परियोजनाओं को जल्द मंजूरी देने को लेकर मंत्रिमंडल की निवेश समिति गठित करने और औद्योगीकरण को बढ़ावा देने के लिए भूमि अधिग्रहण विधेयक के मसौदे को मंजूरी दे दी। यूरिया क्षेत्र के लिए नई निवेश नीति को भी हरी झंडी दे दी। भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर हालांकि उद्योग जगत में निराशा है, पर किसानों के साथ टकराव का कांटा दूर होगा। इस कानून को पास कराना भी राजनीतिक दृष्टि से आसान नहीं है। पर अब दुनिया में सबसे महंगी ज़मीन भारत में होंगी। उद्योगों के लिए ज़मीन खरीदना मुश्किल काम होगा, पर शायद विवाद कम हों। इससे आवासीय योजनाएं महंगी होंगी और शहरीकरण की रफ्तार सुस्त होगी।

सरकार के पास तुरुप का अगला पत्ता है कंडीशनल कैश ट्रांसफर। राहुल गांधी का कहना है कि कैश ट्रांसफर की हमारी योजना ठीक तरीके से लागू हो जाए तो अगले दो चुनाव हम जीत जाएंगे। यह बात उन्होंने उन 51 जिलों के कांग्रेस अध्यक्षों से कही है, जहाँ कैश ट्रांसफर कार्यक्रम जनवरी से शुरू करने की योजना है। पर पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय का कहना है कि संबंधित जिलों में 80-90 फीसदी आबादी का 'आधार कार्ड' अभी तक नहीं बन पाने की वजह से इसे शुरू नहीं किया जा सकता। फिलहाल 20 जिलों में ही यह योजना शुरू की जा सकती है। योजना देर से या कम जिलों में शुरू होना समस्या नहीं है। सवाल है कि क्या कैश ट्रांसफर ठीक तरीके से हो पाएगा? व्यवस्था से जुड़े तमाम सवाल सामने हैं। उनके जवाब देने के लिए हमें व्यवस्था के पुष्ट होने का इंतज़ार करना होगा। हो सकता है किसी को लगे कि हम भटक गए हैं, पर ऐसा है नहीं। हम सही रास्ते पर हैं। देखते रहिए कल और परसों तक। शायद ब्रेक लम्बा हो, पर कहानी चलती रहेगी। फैज़ की दो पंक्तियाँ याद आती हैः- दिल ना उमीद तो नहीं, ना काम ही तो है/ लम्बी है ग़म की शाम, मगर शाम ही तो है।

इंडियन एक्सप्रेस में प्रताप भानु मेहता के लेख Myths of our making तथा Nation of small strivings

हिन्दू में संजय बारू का लेख Decoding Manmohan Singh's red lines और इसके जवाब में प्रकाश करत का लेख  The only line Manmohan protected was pro-US tilt

हिन्दू में सीपी चन्द्रशेखर का लेख The cost of food security


7 comments:

  1. मैं बता सकता हूँ की हमारा आर्थिक माडल क्या हो..?

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  2. बहुत सही-सार्थक प्रस्तुति . हार्दिक आभार हम हिंदी चिट्ठाकार हैं

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  3. बहुत ही रोचक आलेख..नये तथ्यों और संदर्भों का पता चला।

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  4. सवाल माॅडल कर नहीं, नीयत का है.
    जब सत्ता में बैठे लोगों की नीतियां देश की ज़रूरतों के बजाय चुनावों के हिसाब से बनेंगी तो माॅडल क्या कर लेगा.
    ये एक दम नई प्रवृत्ति है जो पंजाब में मुफ़्त बिजली से शुरू हुई फिर तमिलनाडु में देखने को मिली कि टीवी दूँगा, फिर साड़ी लैपटाॅप शुरू हुए, ऊपी में हज़ार बारह सौ रूपये हर महीने बाँटने की बात चली तो काँग्रेस कहाँ पीछे रहने वाली थी उसने नोट ही खातों में डालने शुरू कर दिए हैं... पता नहीं, कितनी दूर निकल जाएंगे ये लोग आैर देश खड़ा बगलें झांकता रह जाएगा

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  5. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (26-1-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  6. बहुत रोचक पोस्ट. मैं इस पोस्ट को पढ़ने के लिए खुश हूँ.

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  7. पोस्ट बहुत अच्छी और बहुत अच्छी तरह से लिखा

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