Friday, January 11, 2013

भारत-पाकिस्तान संवाद जारी रहना चाहिए


                              

सीमा पर पिछले हफ्ते की घटनाओं के बावज़ूद भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के बैरोमीटर से ऐसा कोई संकेत नहीं मिल रहा है जो कहे कि दोनों देशों के रिश्ते बिगड़ने चाहिए। इस मामले को दोनों देशों की सरकारों और सेना पर छोड़ देना चाहिए। न्यूज़ चैनलों के स्टूडियो इन मामलों पर बहस के लिए उपयुक्त नहीं हैं। आवेशों और भावनाओं को फिलहाल दबाकर रखना चाहिए। 

पिछले मंगलवार 8 जनवरी को जम्मू-कश्मीर के मेंढर सेक्टर में नियंत्रण रेखा पर 13 राजपूताना रायफल्स के दो जवानों की मौत के बाद देश में और खासतौर से सीमा पर तैनात फौजियों के भीतर उबाल है। सवाल है कि इसके बाद किया क्या जाए। पिछले दस दिन में सीमा पर चौथी बार जबर्दस्त फायरिंग गुरुवार 10 जनवरी को हुई। इस फायरिंग में पाकिस्तानी हवलदार मोहियुद्दीन के मारे जाने की खबर है। मंगलवार की घटना के पहले 6 जनवरी को एक पाकिस्तानी फौजी की गोलीबारी में मौत हुई थी। जवाबी गोलीबारी से समस्या का हल नहीं निकलता। सोशल मीडिया में भारतीय राष्ट्र राज्य के कमज़ोर होने की बात उलाहने के रूप में कही जा रही है। यह भी कहा जा रहा है कि अमेरिका या चीन के साथ ऐसा होता तो वे जवाब देते। ऐसा कहने वालों का जवाब से आशय क्या है? क्या फौज को हमला करने का आदेश दिया जाए? या कोई सर्जिकल स्ट्राइक किया जाए? सर्जिकल स्ट्राइक किसके खिलाफ? कहा जा रहा है कि इस मामले में लश्करे तैयबा जैसे संगठन का हाथ है। हाथ हो तब भी फौजी सहायता के बगैर यह सम्भव नहीं है, क्योंकि यह नियंत्रण रेखा का मामला है, जहाँ तक फौज की निगाह में पड़े बगैर नहीं पहुँचा जा सकता। पर पूरे तथ्यों को हासिल किए बगैर कोई बात कैसे कही जा सकती है।

Wednesday, January 9, 2013

नियंत्रण रेखा पर हिंसा का निहितार्थ

                        
जम्मू-कश्मीर के मेंढर इलाके में नियंत्रण रेखा पर पिछले कुछ दिनों की घटनाओं से लगता है कि भारत-पाक सम्बन्धों में सुधार की प्रक्रिया को धक्का लगेगा। यह धक्का सायास है या अनायास है, इसे समझने की ज़रूरत है। साथ ही यह समझने की ज़रूरत है कि इसके पीछे कोई योजना है तो वह किसकी है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार इसमें लश्करे तैयबा और पाक सेना की मिली-भगत है। सन 1999 में भारतीय सेना के कैप्टेन सौरभ कालिया को यंत्रणा देकर मारने और हत्या के बाद उनके शरीर को  मामला हाल में भारतीय अदालतों में भी गया है। करगिल युद्ध के दौरान सौरभ कालिया पेट्रोलिंग ड्यूटी पर थे। उस समय पाकिस्तानी सेना ने कालिया का अपहरण कर लिया। तीन हफ्ते तक इनके साथ अमानवीय व्यवहार चलता रहा। इनकी आंखें निकाल ली गई, इन पर यातनाएं हुई, इनके शरीर में सिगरेट से दागा गया, इसके बाद  इनका शव भारत सरकार को लौटा दिया गया। इसे लेकर भारत में जबर्दस्त रोष व्यक्त किया गया था।

Tuesday, January 8, 2013

दामिनी का नाम और मीडिया का दायित्व

People walk near a sand sculpture with the words "We Want Justice" created by Indian sand artist Sudarshan Patnaik, in solidarity with a gang rape victim who was assaulted in New Delhi, on a beach in the eastern Indian state of Odisha
पिछले रविवार को लंदन के मिरर अखबार ने दिल्ली के गैंगरेप पीड़ित लड़की के पिता की अनुमति से उसका नाम ज़ाहिर कर दिया। इसके बाद भारत के कुछ अखबारों ने उसका नाम छापा, पर यह सवाल विचार का विषय है कि ज़िम्मेदार मीडिया को क्या करना चाहिए। इस बीच उस लड़की के पिता का यह वक्तव्य आया कि मैने नाम ज़ाहिर करने की बात नहीं कही थी, सिर्फ इतना कहा था कि यदि सरकार उसके नाम पर कानून बनाना चाहती है तो हमें अच्छा लगेगा। मंगलवार के टाइम्स ऑफ इंडिया में  पिता के हवाले से समाचार प्रकाशित हुआ है कि नाम ज़ाहिर करने पर हमें आपत्ति नहीं है। पर क्या इतने मात्र से नाम ज़ाहिर कर देना चाहिए। 6 जनवरी के हिन्दू में उसके सम्पादक सिद्धार्थ वरदराजन का वक्तव्य छपा है, चूंकि पिता की सहमति लिखित नहीं है, इसलिए हम अभी उसका नाम ज़ाहिर नहीं कर रहे हैं। नीचे पढ़ें उनका पूरा वक्तव्यः-

Naming Delhi rape victim: a note to readers

As some of you may know, a foreign newspaper has published the name of the 23-year-old rape victim, apparently with the approval of her father. Section 228A of the Indian Penal Code, which prohibits publication of the name of a deceased rape victim without the permission of her next of kin, lays down a specific procedure by which this permission is to be accorded: it must be given in writing to a welfare organisation or institution recognised by the Central or State governments. To the best of my knowledge, this procedure, which was introduced into law as an added layer of protection for the victim and her family, has not yet been followed. We respect the father's wish to go public, if that is indeed what he wants, but unless he states the same in writing in the manner prescribed by statute, The Hindu will continue witholding the name of the victim.
Siddharth Varadarajan, Editor
पर क्या यह पत्रकारीय मर्यादाओं के खिलाफ है? हाल में लंदन के गार्डियन में एमर ओ टूल ने भी दिल्ली गैंग रेप को लेकर विचार प्रकट किए हैं। और बीबीसी ने भी गैग रेप पर आलेख पर प्रकाशित किए हैं। इन आलेखों  में भारत की बलात्कार संस्कृति को लेकर टिप्पणियाँ  मर्यादाओं पर विमर्श से जुड़ी वैबसाइट लिबरल कांस्पिरेसी ने Why a Guardian piece on Delhi gang-rape misleads on rape culture शीर्षक से भारतीय विसंगतियों और पश्चिमी समझ के अंतर की ओर इशारा किया है। दिल्ली गैंग रेप के बाद मीडिया की कवरेज पर ध्यान दें तो नज़र आता है कि बलात्कार के सवाल से ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल कानून-व्यवस्था और सरकार के प्रति आक्रोश को लेकर खड़े हुए। आशाराम बापू और राष्ट्रीय स्वयंसेवकसंघ के मोहन भागवत के बयानों से परम्परागत पुरुष-दृष्टिकोण सामने आया है। इस पर भी मीडिया में चर्चा नहीं हुई। 

बलात्कार-पीड़ित लड़की का नाम सामने न लाने के पीछे कानून की भावना क्या है? यही कि उसकी या उसके परिवार की बदनामी न हो। उन्हें समाज के सामने जाने में दिक्कत न हो। प्रायः बलात्कार की शिकार लड़की को कई प्रकार की मानसिक वेदनाओं का शिकार होना पड़ता है। पर इस मामले में समाज उसकी बहादुरी को लेकर उसका सम्मान करना चाहता है? क्या कानून की भावना समाज को उसका परिचय देने से रोकती है? इसका निर्णय शायद कोई अदालत करे। एक बात यह भी है कि तमाम प्रश्नों पर टीवी की लाइव कवरेज ने अनेक राजनीतिक, सामाजिक संस्थाओं को हास्यास्पद बना दिया है। इंटरनेट पर जिस तरह की शब्दावली का प्रयोग हो रहा है, वह मीडिया की भाषा नहीं थी। पर यह सामाजिक विमर्श है। इसकी विसंगतियों पर विचार होना चाहिए। 
Indian women offer prayers for a gang rape victim at Mahatma Gandhi memorial in New Delhi, Jan. 2, 2013.

Read more: http://world.time.com/2013/01/07/indias-gang-rape-case-as-accused-go-to-court-unease-settles-over-delhi/#ixzz2HOSFH44r

Monday, January 7, 2013

तुम्हारा नाम क्या था दामिनी?

हिन्दू में केशव का कार्टून

लंदन के डेली मिरर ने दिल्ली गैंग रेप की पीड़ित लड़की का नाम और पहचान उजागर कर दी। उसके पिता चाहते हैं कि नाम उजागर हो। कानून का जो उद्देश्य है मामला उससे आगे चला गया है। सारा देश उस लड़की को उसकी बहादुरी के लिए याद रखना चाहता है। यदि उसे याद रखना है तो उसका नाम क्यों न बताया जाए। उसका दर्जा शहीदों में है। बहरहाल रेप पर चर्चा कम होती जाएगी, पर उससे जुड़े मसले खत्म नहीं होंगे। 

दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार की रात ज़ी न्यूज़ चैनल के खिलाफ एक मामला दर्ज किया, जिसमें आरोप है कि दिल्ली गैंगरेप के बाबत कुछ ऐसी जानकारियाँ सामने लाई गईं हैं, जिनसे पीड़िता की पहचान ज़हिर होती है। इसके पहले एक अंग्रेजी दैनिक के खिलाफ पिछले हफ्ते ऐसा ही मामला दर्ज किया गया था। भारतीय दंड संहिता की धारा 228-ए के तहत समाचार पत्र के संपादक, प्रकाशक, मुद्रक, दो संवाददाताओं और संबंधित छायाकारों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। सम्भव है ऐसे ही कुछ मामले और दर्ज किए गए हों। या आने वाले समय में दर्ज हों। बलात्कार की शिकार हुई लड़की के मित्र ने ज़ी न्यूज़ को इंटरव्यू दिया है जिसमें उसने उस दिन की घटना और उसके बाद पुलिस की प्रतिक्रिया और आम जनता की उदासीनता का विवरण दिया है। उस विवरण पर जाएं तो अनेक सवाल खड़े होते हैं। पर उससे पहले सवाल यह है कि जिस लड़की को लेकर देश के काफी बड़े हिस्से में रोष पैदा हुआ है, उसका नाम उजागर होगा तो क्या वह बदनाम हो जाएगी? उसकी बहादुरी की तारीफ करने के लिए उसका नाम पूरे देश को पता लगना चाहिए या कलंक की छाया से बचाने के लिए उसे गुमनामी में रहने दिया जाए? कुछ लोगों ने उसे अशोक पुरस्कार से सम्मानित करने का सुझाव दिया है। पर यह पुरस्कार किसे दिया जाए? पुरस्कार देना क्या उसकी पहचान बताना नहीं होगा

Sunday, January 6, 2013

अफगानिस्तान में तुर्की की पहल और भारत

 हामिद करज़ाई और तुर्की के राष्ट्रपति  अब्दुल्ला ग़ुल
और 
आसिफ अली ज़रदारी,

अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से हटने के पहले भावी योजना में तुर्की को महत्वपूर्ण भूमिका देती नज़र आती है। इस योजना में कुछ पूर्व तालिबान नेता भी शामिल हैं, जिन्हें पाकिस्तान की जेलों से रिहा किया गया है। मोटे तौर पर इस प्रक्रिया में कोई असामान्य बात नहीं लगती, पर इसके पीछे भारत के महत्व को कम करने की कोशिश ज़रूर नज़र आएगी। सन 2012 में जून के पहले हफ्ते भारत-पाकिस्तान और अफगानिस्तान के संदर्भ में दो महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं। पहली थी अमेरिका के रक्षामंत्री लियन पेनेटा का अफगानिस्तान और भारत का दौरा। और दूसरी थी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की पेइचिंग में हुई बैठक। पेनेटा की भारत यात्रा के पीछे इस वक्त कोई बड़ा कार्यक्रम नहीं था, सिर्फ अमेरिका की नीति में एशिया को लेकर बन रहे ताज़ा मंसूबों से भारत सरकार को वाकिफ कराना था। इन मंसूबों के अनुसार भारत को आने वाले वक्त में न सिर्फ अफगानिस्तान में बड़ी भूमिका निभानी है, बल्कि हिन्द महासागर से लेकर चीन सागर होते हुए प्रशांत महासागर तक अमेरिकी सुरक्षा के प्रयत्नों में शामिल होना है। अमेरिका की यह सुरक्षा नीति चीन के लिए परेशानी का कारण बन रही है। वह नहीं चाहता कि भारत इतना खुलेआम अमेरिका के खेमे में शामिल हो जाए।

Saturday, January 5, 2013

आपकी उदासीनता??!!!?


     

सड़क पर फैला खून...
तैरकर या लांघकर निकल जाते हैं लोग
चुपचाप, बिना रुके...
कहां भीगता है कोई इस शहर में
-विजय किशोर 'मानव'


दिल्ली में बलात्कार का शिकार हुई लड़की के मित्र ने ज़ी न्यूज़ को इंटरव्यू में उस दिन की घटना और उसके बाद पुलिस की प्रतिक्रिया और आम जनता की उदासीनता का जो विवरण दिया है वह एक भयावह माहौल की ओर संकेत करता है। टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में पीड़ित लड़की के मित्र ने पूरी घटना का सिलसिलेवार ब्योरा दिया है। लड़के का कहना था कि पीड़ित ने 100 नंबर पर पुलिस कंट्रोल रूम को फोन करने की कोशिश की थी, लेकिन अभियुक्तों ने उसका मोबाइल फोन छीन लिया। उनकी दोस्त के शरीर से बहुत ज्यादा खून बह रहा था। जब उसे और पीड़ित लड़की को नग्न अवस्था में बस से फेंक दिया गया तो उन्होंने राह पर आते-जाते लोगों को रोकने की कोशिश की लेकिन 20-25 मिनट तक कोई नहीं रुका। करीब 45 मिनट बाद पुलिस की पीसीआर वैन्स घटनास्थल पर पहुंची लेकिन आपस में अधिकार क्षेत्र तय करने में उन्हें समय लगा। वह बार-बार कोई कपड़ा दिए जाने की गुहार लगाता रहा लेकिन किसी ने उसकी बात न सुनी और काफी देर बाद एक बेडशीट फाड़ कर दी गई जिससे उसने पहले अपनी मित्र को ढँका। शायद उन्हें डर था कि वे रुकेंगे तो पुलिस के चक्कर में फंस जाएंगे। अस्पताल पहुंचने पर भी ठीक से मदद नहीं मिली। वहां भी किसी ने तन ढकना जरूरी नहीं समझा। युवक के अनुसार, वह वारदात की रात से ही स्ट्रेचर पर था। 16 से 20 दिसंबर तक वह थाने में ही रहा। इस दौरान पुलिस ने उसका उपचार भी नहीं करवाया। 

क्या यह आम नागरिक की बेरुखी थी? या व्यवस्था से लगने वाला डर? 
दुष्यंत कुमार की इन पंक्तियों में शायद यही बात हैः-

इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात
अब किसी भी बात पर
खुलती नहीं हैं खिड़कियाँ 

सरकारी व्यवस्था की उदासीनता को कोस कर क्या होगा, जब सामान्य व्यक्ति भी उतना ही उदासीन है। सरकार किसकी है? आपकी ही तो है? 


कोई नहीं आया मदद के लिए बीबीसी समाचार
ज़ी न्यूज़ पर इंटरव्यू

Monday, December 31, 2012

इस आंदोलन ने भी हमें कुछ नया दिया है


दिल्ली में जो जनांदोलन इस वक्त चल रहा है उसे थोड़ी सी दिशा दे दी जाए तो उसकी भूमिका सकारात्मक हो सकती है। पर इस दिशा के माने क्या हैं? दिशा के माने राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, लैंगिक और तमाम रूप और रंगत में देखे जा सकते हैं। इसलिए कहना मुश्किल है कि यह सकारात्मक भूमिका दो रोज में दिखाई पड़ेगी। पर इतना ज़रूर है कि जनता के इस रोष ने व्यवस्था को एक ताकतवर संदेश दिया है। पर सब कुछ सत्ता और व्यवस्था को ही नहीं करना है। उसे गुस्से के साथ-साथ हमारी सहमतियों, असहमतियों, सलाहों, सिफारिशों और निर्देशों की ज़रूरत भी है। पर सलाह-मशविरा देने वाली जनता भी तो हमें बनना होगा। इस आंदोलन में भी काफी बातें सकारात्मक थीं, जैसे कि किसी आंदोलन में होती हैं। ज़रूरत ऐसे आंदोलनों और सामूहिक भागीदारियों की हैं। यह भागीदारी जितनी बढ़ेगी, उतना अच्छा। फिलहाल इस आंदोलन ने भारतीय राज्य और जनता की दूरी को परिभाषित किया है। हमें  लगता है कि यह दूरी बढ़ी है, जबकि वह घटी है। प्रधानमंत्री और देश की सबसे ताकतवर नेता रात के तीन बजे कड़कड़ाती ठंड में एक गरीब लड़की के शव को लाते समय हवाई अड्डे पर मौज़ूद रहे, यह इस बात को बताता है कि नेतृत्व जनता की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं चाहता। पर यह सिर्फ मनोकामना है, इस मनोकामना को व्यावहारिक रूप में लागू करने वाली क्रिया-पद्धति इसकी आदी नहीं है। 

साल का आखिरी दिन पश्चाताप का हो या आने वाली उम्मीदों का? एक ज़माने में जब अखबार ब्लैक एंड ह्वाइट होते थे, साल के आखिरी दिन और अगले साल के पहले दिन के लिए पहले सफे पर छापने के लिए दो फोटो चुने जाते थे। अक्सर सूरज की फोटो छपती थी। एक सूर्यास्त की और दूसरी सूर्योदय की। इन तस्वीरों के आगे पीछे किसी पक्षी, किसी मीनार, किसी पेड़ या किसी नाव, नदी, पहाड़ की छवि होती थी। इसके साथ होता था कवितानुमा कैप्शन जो वक्त की निराशा और आशा दोनों को व्यक्त करने की कोशिश करता था। बहरहाल वक्त बदल गया। जीवन शैली बदल गई। दूरदर्शन के साथ बैठकर नए साल का इंतज़ार के दिन गए। अब लोग सनी लियोनी या कैटरीना कैफ के डांस के साथ पिछले साल को विदा देना चाहते हैं। जिनकी हैसियत इतनी नहीं है वे अपने शहर या कस्बे की लियोनी खोजते हैं। बहरहाल साल का अंत होते-होते भारतीय क्रिकेट टीम ने पाकिस्तान की टीम को टी-20 के दूसरे मैच में हराकर हमारी निराशा को कम किया, वहीं सिंगापुर के अस्पताल में उस अनाम लड़की ने दम तोड़ दिया, जिसकी एक-एक साँस के साथ यह देश जुड़ चुका था। देश का मीडिया उसे अनाम नहीं रहने देना चाहता था, इसलिए उसने उसे निर्भया, अमानत, दामिनी और न जाने कितने नाम दिए। और उसके नाम पर कितने टीवी शो निकल गए।

Thursday, December 27, 2012

आइए आज गीत ग़ालिब का गाएं


27 दिसम्बर 1797 को मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ ग़ालिब” का जन्म आगरा मे एक सैनिक पृष्ठभूमि वाले परिवार में हुआ था। वे उर्दू और फ़ारसी के महान शायर थे। उन्हें उर्दू के सार्वकालिक महान शायरों में गिना जाता है। ग़ालिब (और असद) नाम से लिखने वाले मिर्ज़ा मुग़ल काल के आख़िरी शासक बहादुर शाह ज़फ़र के दरबारी कवि भी रहे थे। 1850 मे शहंशाह बहादुर शाह ज़फर द्वितीय ने मिर्ज़ा गालिब को "दबीर-उल-मुल्क" और "नज़्म-उद-दौला" के खिताब से नवाज़ा। बाद मे उन्हे "मिर्ज़ा नोशा" का खिताब भी मिला। आगरादिल्ली और कलकत्ता में अपनी ज़िन्दगी गुजारने वाले ग़ालिब को मुख्यतः उनकी ग़ज़लों को लिए याद किया जाता है। 15 फरवरी 1869। सन 1969 को भारत सरकार ने महात्मा गांधी की जन्मशती मनाई। संयोग से वही साल ग़ालिब के निधन का साल है। इस मौके पर भारत सरकार ने ग़ालिब की पुण्य तिथि की शताब्दी मनाई। कहना मुश्किल है कि स्वतंत्र भारत में महात्मा गांधी से लेकर हिन्दी और उर्दू का सम्मान कितना बढ़ा, पर उर्दू के शायर साहिर लुधयानवी के मन में उर्दू को लेकर ख़लिश रही। इस मौके पर मुम्बई में हुए एक समारोह में साहिर ने उर्दू को लेकर जो नज़्म पढ़ी उसे दुबारा पढ़ाने को मन करता है। शायद आप में से बहुत से लोगों ने इसे पढ़ा हो।

इक्कीस बरस गुज़रे, आज़ादी-ए-कामिल को
तब जाके कहीं हमको, ग़ालिब का ख़याल आया
तुर्बत है कहाँ उसकी, मसकन था कहाँ उसका
अब अपने सुख़नपरवर ज़हनों में सवाल आया
आज़ादी-ए-कामिल: संपूर्ण स्वतंत्रता         तुर्बत: क़ब्र, मज़ार
मसकन: घर             सुख़नपरवर ज़हनों: शायरी के संरक्षक, ख़यालों

सौ साल से जो तुर्बत, चादर को तरसती थी
अब उसपे अक़ीदत के, फूलों की नुमाइश है
उर्दू के तअल्लुक़ से, कुछ भेद नहीं खुलता
यह जश्न यह हंगामा, ख़िदमत है कि साज़िश है
अक़ीदत: श्रद्धा, निष्ठा         तअल्लुक़: प्रेम, सेवा, पक्षपात

जिन शहरों में गूँजी थी, ग़ालिब की नवा बरसों
उन शहरों में अब उर्दू, बेनाम-ओ-निशाँ ठहरी
आज़ादी-ए-कामिल का, ऐलान हुआ जिस दिन
मअतूब ज़ुबाँ ठहरी, ग़द्दार ज़ुबाँ ठहरी
नवा: आवाज़                    बेनाम-ओ-निशाँ: गुमनाम
मअतूब: दुखदाई, घृणा योग्य, अभागी

जिस अहद-ए-सियासत ने, यह ज़िंदा ज़ुबाँ कुचली
उस अहद-ए-सियासत को, मरहूमों का ग़म क्यों है
ग़ालिब जिसे कहते हैं, उर्दू ही का शायर था
उर्दू पे सितम ढाकर, ग़ालिब पे करम क्यों है
अहद-ए-सियासत: सरकार के काल          मरहूमों: मृतक, स्वर्गीय
ग़ालिब: श्रेष्ठ व्यक्ति, मिर्ज़ा ग़ालिब            करम: कृपा, उदारता, दया, दान

यह जश्न यह हंगामे, दिलचस्प खिलौने हैं
कुछ लोगों की कोशिश है, कुछ लोग बहल जाएँ
जो वादा-ए-फ़र्दा पर, अब टल नहीं सकते हैं
मुमकिन है कि कुछ अरसा, इस जश्न पे टल जाएँ
वादा-ए-फ़र्दा: आनेवाले कल के वादे

यह जश्न मुबारक हो, पर यह भी सदाक़त है
हम लोग हक़ीक़त के, एहसाह से आरी हैं
गांधी हो कि ग़ालिब हो, इन्साफ़ की नज़रों में
हम दोनों के क़ातिल हैं, दोनों के पुजारी हैं
सदाक़त: वास्तविकता, सच्चाई        आरी: रिक्त, महरूम

Wednesday, December 26, 2012

मोदी के शपथ ग्रहण समारोह के संकेत


नरेन्द्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह का एक राजनीतिक संदेश साफ है कि पार्टी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मोदी के महत्व को महसूस कर रही है। पिछली 20 दिसम्बर को चुनाव परिणाम आने के बाद अनंत कुमार की प्रतिक्रिया में जोश नहीं था। लाल कृष्ण आडवाणी जैसे नेता की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई, जबकि वे गांधीनगर से सांसद हैं। पर बुधवार के शपथ समारोह में पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी और वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के अतिरिक्त सुषमा स्वराज और अरुण जेटली, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह शामिल हुए। राजनाथ सिंह और वैंकेया नायडू भी इस अवसर पर मौज़ूद थे। झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, गोवा मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर, राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया, पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू, हेमा मालिनी, किरण खेर, सुरेश व विवेक ऑबेराय भी समारोह में मौज़ूद थे। पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, इंडियन नेशनल लोकदल के नेता ओमप्रकाश चौटाला, शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे, उनके चेचेरे भाई एवं महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे और आरपीआई नेता रामदास अठावले भी शपथ ग्रहण समारोह में मौजूद थे।  बिहार बीजेपी के अध्यक्ष सीपी ठाकुर समारोह में शामिल हुए।

Tuesday, December 25, 2012

दिल्ली रेप कांड के दूसरे सामाजिक पहलू भी हैं


दिल्ली रेप कांड को केवल रेप तक सीमित करने से इसके अनेक पहलुओं की ओर से ध्यान हट जाता है। यह मामला केवल रेप का नहीं है। कम से कम जैसा पश्चिमी देशों में रेप का मतलब है। हाल में एक रपट में पढ़ने को मिला कि पश्चिमी देशों के मुकाबले भारत में रेप कम है। पर उस डेटा को ध्यान से पढ़ें तो यह तथ्य सामने आता है कि रिपोर्टेड केस कम हैं। यानी शिकायतें कम हैं। दूसरे पश्चिम में सहमति और असहमति के सवाल हैं। वहाँ स्त्री की असहमति और उसकी रिपोर्ट बलात्कार है।हमारे यहाँ के कानून कितने ही कड़े हों, एक तो उनका विवेचन ठीक से नहीं हो पाता, दूसरे पीड़ित स्त्री अपने पक्ष को सामने ला ही नहीं पाती। इसका कारण यह है कि हमारे देश में स्त्रियाँ पश्चिमी स्त्रियों की तुलना में कमज़ोर हैं। इसके अलावा हमारी पुलिस और न्याय व्यवस्था स्त्रियों के प्रति सामंती दृष्टिकोण रखती है। रेप का मतलब उनके जीवन को तबाह मानती है, उन्हें ठीक से रहने का प्रवचन देती है वगैरह।

Monday, December 24, 2012

मध्य वर्ग के युवा को क्या नाराज़ होने का हक नहीं है?

हिन्दू में सुरेन्द्र का कार्टून
दिल्ली में बलात्कार के खिलाफ युवा-आक्रोश को लेकर एक अलग तरह की बहस चल निकली है। कुछ लोगों को इसमें  क्रांति की चिंगारियाँ नज़र आती हैं, वहीं कुछ लोग इसे मध्य वर्ग का आंदोलन मानकर पूरी तरह खारिज करना चाहते हैं। इन लोगों के पास जल, जंगल, जमीन और शर्मीला इरोम की एक शब्दावली है। वे इसके आगे बात नहीं करते। मध्य वर्ग कहीं बाहर से नहीं आ गया है। और जल, जंगल, जमीन पार्टी जिन लोगों के लिए लड़ रही है उन्हें भी तो इसी मध्य वर्ग में शामिल कराने की बात है। जो मध्य वर्ग दिल्ली की सड़कों पर खड़ा है, उसमें से आधे से ज्यादा की जड़ें जल,जंगल,जमीन में हैं। यह वर्ग अगर नाराज़ है तो उसके साथ न भी आएं, पर उसका मज़ाक तो न उड़ाएं। 

अरुंधती रॉय ने बलात्कार की शिकार लड़की को अमीर मध्य वर्ग की लड़की बताया है। वे किस आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँची कहना मुश्किल है, पर यदि वे दिल्ली की सड़कों पर काम के लिए खाक छानते बच्चों को अमीर मध्य वर्ग मानती हैं तो उनकी समझ पर आश्चर्य होता है।

किराए के रोने वाले और हमारे शोक के वास्तविक सवाल

गुजरात में नरेन्द्र मोदी की विजय के ठीक पहले दिल्ली में चलती बस में बलात्कार को लेकर युवा वर्ग का आंदोलन शुरू हुआ। और इधर सचिन तेन्दुलकर ने एक दिनी क्रिकेट से संन्यास लेने का फैसला किया। तीनों घटनाएं मीडिया की दिलचस्पी का विषय बनी हैं। तीनों विषयों का अपनी-अपनी जगह महत्व है और मीडिया इन तीनों को एक साथ कवर करने की कोशिश भी कर रहा है, पर इस बात को रेखांकित करने की ज़रूरत है कि हम सामूहिक रूप से विमर्श को ज़मीन पर लाने में नाकामयाब हैं। अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद से एक ओर हम मीडिया की अत्यधिक सक्रियता देख रहे हैं वहीं इस बात को देख रहे हैं कि लोग बहुत जल्द एक बात को भूलकर दूसरी बात को शुरू कर देते हैं। बहरहाल सी एक्सप्रेस में प्रकाशित मेरा लेख पढ़ें:-
फेसबुक पर वरिष्ठ पत्रकार चंचल जी ने लिखा, दिल्ली में अपाहिज मसखरों का एक संगठित गिरोह है। बैंड पार्टी की तरह, उन्हें किराए पर बुला लो जो सुनना चाहो उन लो। बारात निकलते समय, बच्चे की पैदाइश पर,  मारनी पर करनी पर, खतना पर हर जगह वे उसी सुर में आएंगे जो प्रिय लगे। और यह जोखिम का काम भी नहीं है। बस कुछ चलते फिरते मुहावरे हैं उसे खीसे से निकालेंगे और जनता जनार्दन के सामने परोस देंगे। गुजरात पर चलेवाली बहस देखिए। मोदी को जनता ने जिता दिया। इतनी सी खबर मोदी को जेरे बहस कर दिया। वजनी-वजनी शब्द, जीत के असल कारण, उनका नारा, वगैरह-वगैरह इन बुद्धिविलासी बहसी आत्माओं का सोहर बन गया है। और अगर मोदी हार गया होता तो यही लोग ऐसे-ऐसे शब्द उसकी मैयत पर रखते कि वह तिलमिला कर भाग जाता। उन्होंने यह बात गुजरात के चुनाव परिणामों की मीडिया कवरेज के संदर्भ में लिखी है, पर इस बात को व्यापक संदर्भों में ले जाएं तो सोचने समझने के कारण उभरते हैं।