Monday, May 30, 2011

उफनती लहरें और अनाड़ी खेवैया



यूपीए सरकार की लगातार बिगड़ती छवि को दुरुस्त करने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस महीने की दस तारीख को पब्लिक रिलेशनिंग के लिए एक और ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स बनाया है। इस ग्रुप की हर रोज़ बैठक होगी और मीडिया को ब्रीफ किया जाएगा। यह सामान्य सी जानकारी हमारे राजनैतिक सिस्टम के भ्रम और कमज़ोरियों को भी ज़ाहिर करती है। सरकार का नेतृत्व तमाम मसलों पर जल्द फैसले करने के बजाय ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स बनाकर अपना पल्ला झाड़ता है। यूपीए-दो ने पिछले साल में कितने जीओएम बना लिए इसकी औपचारिक जानकारी नहीं है, पर इनकी संख्या 50 से 200 के बीच बताई जाती है। दूसरी ओर राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के रूप में एक और संस्था खड़ी होने से राजनीति और राजनैतिक नेतृत्व बजाय ताकतवर होने के और कमज़ोर हो गया है। यह कमज़ोरी पार्टी की अपनी कमज़ोरी है साथ ही गठबंधन सरकारों की देन भी है।

Monday, May 23, 2011

दिल्ली पर संशय के मेघ


यूपीए सरकार के सात साल पूरे हो गए। 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद बनी यह सरकार यूपीए प्रथम की तुलना में ज्यादा स्थिर मानी जा रही थी। एक तो कांग्रेस का बहुमत बेहतर था। दूसरे इसमें वामपंथी मित्र नहीं थे, जो सरकार के लिए किसी भी विपक्ष से ज्यादा बड़े विरोधी साबित हो रहे थे। यूपीए के लिए इससे भी ज्यादा बड़ा संतोष इस बात पर था कि एनडीए की न सिर्फ ताकत घटी, उसमें शामिल दलों की संख्या भी घटी। मुख्य विपक्षी दल भाजपा का नेतृत्व बदला। उसके भीतर की कलह सामने आई। यूपीए के लिए एक तरह से यह बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने की तरह से था। पर यूपीए के पिछले दो साल की उपलब्धियाँ देखें तो खुश होने की वजह नज़र नहीं आती।

Friday, May 20, 2011

बुनियाद के पत्थरों को डरना क्या



चुनाव परिणाम आते ही पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि करके केन्द्र सरकार ने राजनैतिक नासमझी का परिचय दिया है। पेट्रोल कम्पनियों के बढ़ते घाटे की बात समझ में आती है, पर इतने दिन दाम बढ़ाए बगैर काम चल गया तो क्या कुछ दिन और रुका नहीं जा सकता था? इसका राजनैतिक फलितार्थ क्या है? यही कि वामपंथी पार्टियाँ इसका विरोध करतीं थीं। वे हार गईं। अब मार्केट फोर्सेज़ हावी हो जाएंगी।  इधर दिल्ली में मदर डेयरी ने दूध की कीमतों में दो रुपए प्रति लिटर की बढ़ोत्तरी कर दी। उसके पन्द्रह दिन पहले अमूल ने कीमतें बढ़ाईं थीं। इस साल खरबूजे 30 रुपए, आम पचास रुपए, तरबूज पन्द्रह रुपए और सेब सौ रुपए के ऊपर चल रहे हैं। ककड़ी और खीरे भी गरीबों की पहुँच से बाहर हैं।

Tuesday, May 17, 2011

टॉप गोज़ टु बॉटम

अखबार के मास्टहैड का इस्तेमाल अब इतने तरीकों से होने लगा है कि कुछ लोगों के लिए यह दिलचस्पी का विषय नहीं रह गया है। फिर भी 14 मई के टेलीग्राफ के पहले सफे ने ध्यान खींचा है। इसमें मास्टहैड अखबार की छत से उतर कर फर्श पर चला गया है।

अखबार के ब्रैंड बनने पर तमाम बातें हैं। पत्रकारों और सम्पादकों, खबरों और विश्लेषणों से ज्यादा महत्वपूर्ण है ब्रैंड। बाकी उत्पादों की बात करें तो ब्रैंड माने प्रोडक्ट की गुणवत्ता की मोहर। अखबार इस माने में हमेशा ब्रैंड थे। उन्हें पढ़ा ही इसीलिए जाता था कि उनकी पहचान थी। लेफ्ट या राइट। कंज़र्वेटिव या लिबरल। कांग्रेसी या संघी। दृष्टिकोण या पॉइंट ऑफ व्यू, खबरों को पेश करने का सलीका, तरीका वगैरह-वगैरह। एक हिसाब से देखें तो अखबारों ने ही सारी दुनिया को ब्रैंड का महत्व समझाया। दुनिया भर की खबरों को एक पर्चे पर छाप दो तो वह अखबार नहीं बनता। सिर्फ मास्टहैड लगा देने से वह अखबार बन जाता है। और इस तरह वह सिर्फ मालिक की ही नहीं पाठक की धरोहर भी होती है। बहरहाल...

हाल में बड़ी संख्या में अखबारों ने अपने मास्टहैड के साथ खेला है। हिन्दी में नवभारत टाइम्स तो लाल रंग में अंग्रेजी के तीन अक्षरों के आधार पर खुद को यंग इंडिया का अखबार घोषित कर चुका है। ऐसे में टेलीग्राफ ने अपने मास्टहैड के मार्फत नई सरकार का स्वागत किया है। अच्छा-बुरा उसके पाठक जानें, पर बाकी अखबार दफ्तरों में कुलबुलाहट ज़रूर होगी कि इसने तो मार लिया मैदान, अब इससे बेहतर क्या करें गुरू।

क्या कोई बता सकता है कि इसका मतलब कुछ अलग सा करने के अलावा और क्या हो सकता है?

Monday, May 16, 2011

आमतौर पर वोटर नाराज़गी का वोट देता है



भारतीय राजनीति के एक्टर, कंडक्टर, दर्शक, श्रोता और समीक्षक लम्बे अर्से से समझने की कोशिश करते रहे हैं कि वोटर क्या देखकर वोट देता है। व्यक्ति महत्वपूर्ण होता है या पार्टी, मुद्दे महत्वपूर्ण होते हैं या नारे। जाति और धर्म महत्वपूर्ण हैं या नीतियाँ। कम्बल, शराब और नोट हमारे लोकतंत्र की ताकत है या खोट हैं? सब कहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र पुष्ट, परिपक्व और समझदार है। पर उसकी गहराई में जाएं तो नज़र आएगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था कुछ घाघ लोगों के जोड़-घटाने पर चलती है। जिसका गणित सही बैठ गया वह बालकनी पर खड़ा होकर जनता की ओर हाथ लहराता है। नीचे खड़ी जनता में आधे से ज्यादा पार्टी कार्यकर्ता होते हैं जिनकी आँखों में नई सरकार के सहारे अपने जीवन का गणित बैठाने के सपने होतें हैं।

Saturday, May 14, 2011

पोल पंडितों की पोल

हर चुनाव में एक्जिट पोल पंडितों की परीक्षा होती है। वे हर बार गलत साबित होते हैं, फिर भी कहीं न कहीं से खुद को सही साबित कर लेते हैं। इस बार भी बंगाल और असम के मामले में प्रायः सभी पोल सही साबित हुए, सबके अनुमान ऊपरनीचे रहे। केरल, तमिलनाडु और पुदुच्चेरी में पोलों की पोल खुली।

एक्जिट पोल को हम मोटे तौर पर देखते हैं। बंगाल यानी टीएमसी+ या वाम मोर्चा प्लस, असम में इतने बड़े अन्य का ब्रेक अप नहीं मिलता। तमिलनाडु में अगर छोटे-छोटे दलों के बारे में पता करेंगे तो पोल काफी गलत साबित होंगे। ज्यादातर पोल अपने निष्कर्षों को साबित करना चाहते हैं। इनके वैज्ञानिक अध्ययन का वैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए। 

इन नतीज़ों में छिपी हैं कुछ पहेलियाँ



कोलकाता के टेलीग्राफ का पहला पेज
इस चुनाव परिणाम ने पाँच राज्यों में जितने राजनैतिक समाधान दिए हैं उससे ज्यादा पहेलियाँ  बिखेर दी हैं। अब बंगाल, तमिलनाडु और केरल से रोचक खबरों का इंतज़ार कीजिए। जनता बेचैन है। वह बदलाव चाहती है, जहाँ रास्ता नज़र आया वहां सब बदल दिया। जहाँ नज़र नहीं आया वहाँ गहरा असमंजस छोड़ दिया। बंगाल में उसने वाम मोर्चे के चीथड़े उड़ा दिए और केरल में दोनों मोर्चों को म्यूजिकल चेयर खेलने का आदेश दे दिया। बंगाल की जीत से ज्यादा विस्मयकारी है जयललिता की धमाकेदार वापसी। ममता बनर्जी की जीत तो पिछले तीन साल से आसमान पर लिखी थी। पर बुढ़ापे में करुणानिधि की इस गति का सपना एक्ज़िट पोल-पंडितों ने नहीं देखा।

पोस्ट-घोटाला भारत के इस पहले चुनाव का संदेश क्या है? कि भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं है। और जनता ने सन 2009 में यूपीए पर जो भरोसा जताया था, वह अब भी कायम है? क्या हाल के सिविल सोसायटी-आंदोलन की जनता ने अनदेखी कर दी? तब फिर तमिलनाडु में जयललिता की जीत को क्या माना जाए? और तमिलनाडु की जनता की भ्रष्टाचार से नाराज़गी है तो जयललिता को जिताने का क्या मतलब है? उनपर क्या कम आरोप हैं? 

खुद को पुनर्परिभाषित करे वाम मोर्चा

यह लेख 13 मई के दैनिक जनवाणी में छपा था। इसके संदर्भ अब भी प्रासंगिक हैं, इसलिए इसे यहाँ लगाया है।

हार कर भी जीत सकता है वाम मोर्चा

कल्पना कीजिए कभी चीन में चुनावों के मार्फत सरकार बदलने लगे तो क्या होगा? चीन में ही नहीं उत्तरी कोरिया और क्यूबा में क्या होगा? यह कल्पना कभी सच हुई तो सत्ता परिवर्तन के बाद का नज़ारा कुछ वैसा होगा जैसा हमें पश्चिम बंगाल में देखने को मिलेगा। बशर्ते परिणाम वैसे ही हों जैसे एक्ज़िट पोल बता रहे हैं। देश का मीडिया इस बात पर एकमत लगता है कि वाम मोर्चा की 34 साल पुरानी सरकार विदा होगी। ऐसा नहीं हुआ तो विस्मय होगा और मीडिया की समझदारी विश्लेषण का नया विषय होगी।

Tuesday, May 10, 2011

पोस्ट घोटाला, पहले चुनाव


पाँच विधानसभाओं के चुनाव तय करेंगे राष्ट्रीय राजनीति की दिशा
तेरह को खत्म होंगे कुछ किन्तु-परन्तु
प्रमोद जोशी

राजनीति हमारी राष्ट्रीय संस्कृति और चुनाव हमारे महोत्सव हैं। इस विषय पर हाई स्कूल के छात्रों से लेख लिखवाने का वक्त अभी नहीं आया, पर आयडिया अच्छा है। गरबा डांस, भांगड़ा, कथाकली, कुचीपुडी और लाल मिर्चे के अचार जैसी है हमारी चुनाव संस्कृति। जब हम कुछ फैसला नहीं कर पाते तो जनता पर छोड़ देते हैं कि वही कुछ फैसला करे।    

टू-जी मामले में कनिमोझी की ज़मानत पर फैसला 14 मई तक के लिए मुल्तवी हो गया है। 14 के एक दिन पहले 13 को तमिलनाडु सहित पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम सामने आ चुके होंगे। कनिमोझी की ज़मानत का चुनाव परिणाम से कोई वास्ता नहीं है, पर चुनाव परिणाम का रिश्ता समूचे देश की राजनीति से है। तमिलनाडु की जनता क्या इतना जानने के बाद भी डीएमके को जिताएगी? डीएमके हार गई तो क्या यूपीए के समीकरण बदलेंगे?

कुछ ऐसे ही सवाल बंगाल के चुनाव को लेकर हैं। बंगाल में तृण मूल कांग्रेस का सितारा बुलंदी पर है। वे जीतीं तो मुख्यमंत्री भी बनेंगी। बेशक उनके बाद रेल मंत्रालय उनकी पार्टी को ही मिलेगा, पर क्या कांग्रेस बंगाल की सरकार में शामिल होगी? सन 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को महत्वपूर्ण सफलता मिली थी। पर अब सन 2009 नहीं है। और न वह कांग्रेस है। पिछले एक साल में राष्ट्रीय राजनीति 360 डिग्री घूम गई है।

Saturday, May 7, 2011

इतिहास के सबसे नाज़ुक मोड़ पर पाकिस्तान



बहुत सी बातें ऐसी हैं, जिनके बारे में हमारे देश के सामान्य नागरिक से लेकर बड़े विशेषज्ञों तक की एक राय है। कोई नहीं मानता कि बिन लादेन के बाद अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद खत्म हो जाएगा। या पाकिस्तान के प्रति अमेरिका की नीतियाँ बदल जाएंगी। अल-कायदा का जो भी हो, लश्करे तैयबा, जैशे मोहम्मद, तहरीके तालिबान और हक्कानी नेटवर्क जैसे थे वैसे ही रहेंगे। दाऊद इब्राहीम, हफीज़ सईद और  मौलाना मसूद अज़हर को हम उस तरह पकड़कर नहीं ला पाएंगे जैसे बिन लादेन को अमेरिकी फौजी मारकर वापस आ गए।

बिन लादेन की मौत के बाद लाहौर में हुई नमाज़ का नेतृत्व हफीज़ सईद ने किया। मुम्बई पर हमले के सिलसिले में उनके संगठन का हाथ होने के साफ सबूतों के बावजूद पाकिस्तानी अदालतों ने उनपर कोई कार्रवाई नहीं होने दी। अमेरिका और भारत की ताकत और असर में फर्क है। इसे लेकर दुखी होने की ज़रूरत भी नहीं है। फिर भी लादेन प्रकरण के बाद दक्षिण एशिया के राजनैतिक-सामाजिक हालात में कुछ न कुछ बदलाव होगा। उसे देखने-समझने की ज़रूरत है। 

Thursday, May 5, 2011

राजनीति का रखवाला कौन?


समय-संदर्भ
 पीएसी या जेपीसी बहुत फर्क नहीं पड़ता ज़नाब
अब राजनीति माने काजू-कतरी

ब्रिटिश कॉमन सभा में सन 1857 में पहली बार यह माँग उठी थी कि सरकारी खर्च सही तरीके से हुए हैं या नहीं, इसपर निगाह रखने के लिए एक समिति होनी चाहिए। सन 1861 में वहाँ पहली पब्लिक एकाउंट्स कमेटी की स्थापना की गई। हमने इसे ब्रिटिश व्यवस्था से ग्रहण किया है। ब्रिटिश व्यवस्था में भी पीएसी अध्यक्ष पद परम्परा से मुख्य विपक्षी दल के पास होता है। इन दिनों वहाँ लेबर पार्टी की मारग्रेट हॉज पीएसी की अध्यक्ष हैं। पीएसी क्या होती है और क्यों वह महत्वपूर्ण है, यह बात पिछले साल तब चर्चा में आई जब टू-जी मामले की जाँच का मसला उठा।

पीएसी या जेपीसी, जाँच जहाँ भी होगी वहाँ राजनैतिक सवाल उठेंगे। मुरली मनोहर जोशी द्वारा तैयार की गई रपट सर्वानुमति से नही है, यह बात हाल के घटनाक्रम से पता लग चुकी है। पर क्या समिति के भीतर सर्वानुमति बनाने की कोशिश हुई थी या नहीं यह स्पष्ट नहीं है। बेहतर यही था कि रपट के एक-एक पैरा पर विचार होता। पर क्या समिति में शामिल कांग्रेस और डीएमके सदस्य उन पैराग्राफ्स पर सहमत हो सकते थे, जो प्रधानमंत्री के अलावा तत्कालीन वित्त और संचार मंत्रियों के खिलाफ थे। और क्या पार्टी का अनुशासन ऐसी समितियों के सदस्यों पर लागू नहीं होता? साथ ही क्या मुरली मनोहर जोशी राजनीति को किनारे करके ऑब्जेक्टिव रपट लिख सकते थे? बहरहाल जोशी जी के फिर से पीएसी अध्यक्ष बन जाने के बाद एक नया राजनैतिक विवाद खड़ा होने के पहले ही समाप्त हो गया। यह हमारी व्यवस्था की प्रौढ़ता की निशानी भी है।