Sunday, May 9, 2021

पाँच राज्यों के सबक और वक्त की आवाज़


पिछले रविवार को घोषित पाँच राज्यों के चुनाव-परिणामों ने राज-व्यवस्था, राजनीति, समाज और न्याय-व्यवस्था को कई तरह से प्रभावित किया है। ये परिणाम ऐसे दौर में आए हैं, जब देश एक त्रासदी का सामना कर रहा है। स्वतंत्रता के बाद पहली बार देश के नागरिक मौत को सामने खड़ा देख रहे हैं और राजनीति को दाँव-पेचों से फुर्सत नहीं है। जब परिणाम घोषित हो रहे थे, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और हरियाणा समेत अनेक राज्यों में ऑक्सीजन और दवाओं की कमी से रोगियों की मौत हो रही थी।

चुनाव-संचालन

यह संकट पिछले साल बिहार के चुनाव के समय भी था, पर इसबार परिस्थितियाँ बहुत ज्यादा खराब हैं। चूंकि लोकतांत्रिक-प्रक्रियाओं का परिपालन भी होना है, इसलिए इन मजबूरियों को स्वीकार करना होगा, पर चुनाव आयोग तथा अन्य सांविधानिक-संस्थाओं के लिए कई बड़े सबक यह दौर देकर गया है। इस दौरान मद्रास हाईकोर्ट को चुनाव-आयोग पर काफी सख्त टिप्पणी करनी पड़ी।

चुनाव  संचालन के लिए आयोग के पास तमाम अधिकार होते हैं, फिर भी बहुत सी बातें उसके हाथ से बाहर होती हैं। राजनीतिक दलों ने भी प्रचार के दौरान दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने में कोई कमी नहीं की। जरूरत इस बात की थी कि वे प्रचार के तौर-तरीकों को लेकर आमराय बनाते। चुनाव-आयोग और ईवीएम को विवादास्पद बनाने की राजनीतिक-प्रवृत्ति भी बढ़ी है। खासतौर से इसबार बंगाल में चुनाव-आयोग लगातार राजनीतिक-विवेचना का विषय बना रहा।

बीजेपी की पराजय

चार राज्यों और एक केंद्र-शासित प्रदेश के परिणामों में देश की भावी राजनीति के लिए तमाम संदेश छिपे हैं। भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, वामपंथी दलों और तमिलनाडु के दोनों क्षेत्रीय दलों पर इन परिणामों का असर आने वाले समय में देखने को मिलेगा। हालांकि हरेक राज्य का राजनीतिक महत्व अपनी जगह है, पर बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की जीत और भारतीय जनता पार्टी की पराजय सबसे बड़ी परिघटना है। बीजेपी ने जिस तरह से अपनी पूरी ताकत इस चुनाव में झोंकी और जैसे पूर्वानुमान थे, उसे देखते हुए यह झटका है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की निजी हार।

Saturday, May 8, 2021

बंगाल-हिंसा की ग्राउंड-रिपोर्ट क्यों नहीं करता मीडिया?


पश्चिम बंगाल में चुनाव परिणाम आने के बाद से शुरू हुई हिंसा की खबरें अब भी मिल रही हैं, पर मुख्यधारा का मीडिया अब भी इसकी ग्राउंड रिपोर्ट करने से बच रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कल ही माना था कि राज्य के विभिन्न हिस्सों में चुनाव बाद हिंसा में 16 लोगों की मौत हुई है। उधर केंद्रीय गृह मंत्रालय की टीम ने हिंसा पीड़ित स्थलों का दौरा किया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी जाँच के लिए ऐसी ही एक टीम गठित की है। उधर कोलकाता हाईकोर्ट ने भी हिंसा को लेकर राज्य सरकार से रिपोर्ट माँगी है।

राज्य के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने हिंसा को लेकर सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि आज (शनिवार) की शाम तक उनसे मुलाकात करें। उन्होंने यह भी कहा है कि राज्य के गृह सचिव ने उन्हें चुनाव के बाद हुई हिंसा से जुड़ी कानून-व्यवस्था की स्थिति से अवगत नहीं कराया। उन्होंने ट्वीट किया है कि गृह सचिव ने राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और कोलकाता पुलिस आयुक्त की इस संबंधी रिपोर्ट उन्हें नहीं भेजी हैं।

गृह-मंत्रालय की टीम

उधर केंद्रीय गृह मंत्रालय के चार सदस्यों की एक टीम ने शुक्रवार को राज्यपाल से भी मुलाकात की। इतनी सरगर्मियों के बावजूद इस मामले में राष्ट्रीय मीडिया की बेरुखी भी ध्यान खींचती है। ज्यादातर खबरें पार्टी प्रवक्ताओं या सरकारी संस्थाओं के माध्यम से आ रही हैं। सोशल मीडिया पर जानकारियों की बाढ़ है, पर इनमें बहुत सी बातें भ्रम को बढ़ाने वाली हैं। शायद जान-बूझकर बहुत सी गलत जानकारियाँ भी फैलाई जा रही हैं, ताकि वास्तविक घटनाओं को लेकर भ्रम की स्थिति बने। मुख्यधारा का मीडिया ग्राउंड रिपोर्ट करे, तो ऐसे भ्रमों की सम्भावनाएं कम हो जाएंगी।  

Friday, May 7, 2021

चुनाव-परिणामों का कांग्रेस पर असर



पिछले कई महीनों से कांग्रेस पार्टी की आंतरिक राजनीति का विश्लेषण बाहर के बजाय भीतर से ज्यादा अच्छा हो रहा है। इसमें सबसे बड़ी भूमिका ग्रुप-23 की है, जो पार्टी में हैं, पर नेतृत्व की बातों से असहमति को पार्टी के मंच पर और बाहर भी व्यक्त करते हैं। बहरहाल हाल में हुए पाँच राज्यों के चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन को लेकर पार्टी ने बहुत संकोच के साथ ही प्रतिक्रिया व्यक्त की है। राहुल गांधी ने 2 मई को तीन ट्वीट किए थे। एक में कहा गया था कि हम जनता के फैसले को स्वीकार करते हैं। ऐसा ही ट्वीट पार्टी प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने किया। राहुल गांधी के शेष दो ट्वीट में ममता बनर्जी और एमके स्टालिन को जीत पर बधाई दी गई थी। उन्होंने ममता बनर्जी को बधाई दी, पर ऐसी ही बधाई पिनाराई विजयन को नहीं दी।

विस्तार से पार्टी का कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं हुआ, पर जी-23 के दो वरिष्ठ सदस्यों कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आजाद ने कहा कि देश में महामारी की स्थिति को देखते हुए यह समय टिप्पणी करने के लिहाज से उचित नहीं है। बंगाल की हार को लेकर अधीर रंजन चौधरी ने दिल्ली के एक अंग्रेजी अखबार को कुछ सफाई दी है। खबर थी कि उन्होंने कोई ट्वीट भी किया है, पर वह नजर नहीं आया। शायद हटा दिया गया। ऐसा लगता है कि फिलहाल पार्टी की रणनीति है कि चुनाव-परिणामों पर चर्चा नहीं की जाए। इसकी जगह महामारी को लेकर केंद्र पर निशाना लगाया जाए। यह रणनीति एक सीमा तक काम करेगी, पर यह एक प्रकार का पलायन साबित होगा।

केरल में असंतोष

नेतृत्व ने भले ही चुनाव-परिणामों पर चुप्पी साधी है, पर कार्यकर्ता मौन नहीं है। केरल से उनकी आवाज सुनाई पड़ी है। उन्हें उम्मीद थी कि पार्टी की सत्ता में वापसी होगी। केरल में इससे पहले सत्ता में बैठी सरकार ने कभी वापसी नहीं की है, इसलिए यूडीएफ को वापसी की उम्मीद थी। बहरहाल शुरूआती चुप्पी के बाद, केरल दबे-छिपे बातें सामने आने लगी हैं। एर्नाकुलम के युवा कांग्रेस सांसद हिबी एडेन ने फेसबुक पर लिखा, हमें क्या अब भी लगातार सोते हाईकमान की आवश्यकता क्यों है?

Thursday, May 6, 2021

राष्ट्रीय स्तर पर ममता बनर्जी क्या विरोधी दलों की नेता बनेंगी?


बंगाल के चुनाव-परिणाम आने के बाद यह बात उठने लगी है कि क्या ममता बनर्जी को राष्ट्रीय स्तर पर आगे रखने का समय आ गया है। क्या कांग्रेस के बजाय तृणमूल कांग्रेस विपक्ष के अग्रिम दस्ते की भूमिका निभा सकती है? एनसीपी के प्रमुख शरद पवार एक अरसे से कांग्रेस से टूटे हुए दलों की एकता स्थापित करने के प्रयास कर रहे हैं। इसबार के चुनाव के ठीक पहले उन्होंने ममता बनर्जी का समर्थन किया था, जबकि कांग्रेस भी बंगाल के चुनाव मैदान में थी। वे मार्च में ममता की रैली में भी शामिल होने वाले थे, पर आए नहीं।

ममता बनर्जी पिछले कई साल से शिवसेना के सम्पर्क में भी हैं। चूंकि शिवसेना का गठबंधन बीजेपी के साथ चल रहा था, इसलिए ममता बनर्जी ने खुलेआम शिवसेना के नेताओं के साथ उपस्थिति दर्ज नहीं कराई। राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यू, जेडीएस और आम आदमी पार्टी के नेताओं के साथ भी उनका अच्छा सम्पर्क है। बावजूद इन बातों के ममता के नेतृत्व से जुड़े कुछ सवाल हैं।

पहला सवाल है कि ममता के नेतृत्व में विरोधी दलों की एकता का मतलब क्या है? क्या इसमें कांग्रेस भी शामिल होगी? इसका मतलब क्या? ममता यूपीए में शामिल होंगी या यूपीए ममता को अपना नेता बनाएगा? दूसरे ममता पर बंगाल की नेता का ठप्पा लगा है। बीजेपी के खिलाफ उन्होंने ‘आमार बांग्ला’ और बीजेपी के ‘बाहरी लोग’ का सवाल उठाया था। इसका लाभ उन्हें मिला, पर उत्तर भारत के हिन्दी इलाकों और गुजरात के वोटर के मन में भारतीय राष्ट्र-राज्य की जो छवि है, उसमें क्षेत्रीयता की एक सीमित भूमिका है। कमजोर हिन्दी और सीमित राष्ट्रीय अपील का उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है, लेकिन मोदी के मुकाबले खड़े होने का लाभ भी उन्हें मिलेगा।

Wednesday, May 5, 2021

बंगाल की हिंसा की गहराई से पड़ताल की जरूरत


पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है। उनकी फिलहाल सबसे बड़ी जवाबदेही उस हिंसा को लेकर है, जो किसी न किसी रूप में तीसरे दिन भी जारी थी। हालांकि हिंसा के तीन दिन बाद आज कुछ अखबारों में इन घटनाओं की कवरेज हुई है, पर बंगाल या देश-विदेश के मीडिया ने इन घटनाओं की गहराई से पड़ताल करने की कोशिश नहीं की है, जो चिंता का विषय है।

ज्यादातर अखबारों ने ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक बयानों और सरकारी गतिविधियों को खबर बनाया है। यह पता लगाने की कोशिश नहीं की है कि इनके पीछे क्या कारण हैं। खासतौर से बंगाल के अखबारों ने इन खबरों की या तो अनदेखी की है या शांति बनाए रखने की मुख्यमंत्री की अपील को प्रमुखता दी है। चौबीस घंटे सनसनी फैलाने वाले टीवी चैनलों के प्रतिनिधियों या कैमरामैनों ने भी घटनास्थलों तक जाकर पीड़ितों से बात करने का प्रयास नहीं किया है। जो वीडियो वायरल हुए हैं, वे घटनास्थलों पर उपस्थित लोगों ने मोबाइल फोनों से तैयार किए हैं।

स्त्रियों से दुर्व्यवहार

इस कवरेज से ही पता लगेगा कि स्त्रियों के साथ क्या सलूक किया गया और घरों पर किस तरह से हमले हुए हैं। ये घटनाएं बंगाल की राजनीति के एक महत्वपूर्ण पहलू से वास्ता रखती हैं। दिल्ली के एक अखबार ने कल अपने सम्पादकीय में जरूर लिखा कि ममता बनर्जी को उस हिंसा पर रोक लगानी चाहिए, जिसमें उनके समर्थक अपने विरोधियों को निशाना बना रहे हैं। पर केवल हिंसा को लेकर न तो सम्पादकीय लिखे गए हैं और गहराई से विवेचन किया गया है। बंगाल के आर्थिक पिछड़ेपन के पीछे देहाती क्षेत्रों में व्याप्त इस हिंसा की भी भूमिका है।

Tuesday, May 4, 2021

बंगाल की हिंसा पर मीडिया की खामोशी

सीताराम येचुरी ने इन तस्वीरों को अपने ट्वीट में शेयर किया है

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद से बड़े पैमाने पर हिंसा चल रही है। राज्य के कई इलाकों से देसी बम फोड़ने और आगजनी की खबरें भी हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की
एक रिपोर्ट में 11 लोगों के मरने की खबर है। हैरत की बात है कि इन खबरों को लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया खामोश है। हिंसा की खबरें आते हुए करीब 40 घंटे हो गए हैं, पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ऐसी खबर देखने को नहीं मिली है। भारतीय मीडिया में छिटपुट खबरें हैं, जिन्हें जोड़कर देखने पर ही हिंसा की तस्वीर उभरती है। ऐसा लगता नहीं कि किसी ने इस हिंसा की पड़ताल करने की कोशिश की हो।

हालांकि चुनाव आयोग ने कोविड-19 की भयावह स्थिति को देखते हुए परिणाम आने के बाद किसी प्रकार के जश्न मनाने के लिए मना किया था, पर रविवार को दिन में ही परिणाम आते-आते जश्न मनाने का सिलसिला शुरू हो गया था। सोमवार को भारतीय जनता पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस पर आरोप लगाया था कि उसके कार्यकर्ता हमले कर रहे हैं। पार्टी ने दावा किया कि उसके अनेक कार्यकर्ताओं की इस हिंसा में मौत हो गई।

अमेरिकी समाज में बैठी कड़वाहट को कैसे दूर करेंगे बाइडेन?


अफ्रीकी मूल के अमेरिकी नागरिक जॉर्ज फ़्लॉयड की पिछले साल हुई मौत के मामले में अमेरिका की एक अदालत में पूर्व पुलिस अधिकारी डेरेक शॉविन को हत्या का दोषी माने जाने के बाद राष्ट्रपति जो बाइडेन और उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस ने जॉर्ज फ़्लॉयड के परिवार से फोन पर बात की। बाइडेन ने टीवी पर राष्ट्र के नाम संदेश में कहा, कम से कम अब न्याय तो मिला, पर हमें अभी बहुत कुछ करना है। यह फ़ैसला सिस्टम में मौजूद वास्तविक नस्लवाद से निपटने का पहला क़दम साबित होने वाला है। सिस्टम में बैठा नस्लवाद देश के ज़मीर पर धब्बा है।

पुलिस-हिरासत में होने वाली मौतों के मामले में अमेरिकी अदालतें पुलिस अधिकारियों को बहुत कम दोषी ठहराती रही हैं। डेरेक शॉविन के इस मामले के बारे में कहा जा रहा है कि इससे पता लगेगा कि अमेरिका की विधि-व्यवस्था  भविष्य में ऐसे मामलों से किस तरह से निपटेगी। इस फ़ैसले के बाद अदालत के बाहर उत्सव का माहौल था। लोग मुट्ठियां भींचकर ‘ब्लैक पावर! ब्लैक पावर!’ चिल्ला रहे थे।

Monday, May 3, 2021

तृणमूल जीती, पर हारा कौन?


पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के बहुमत में आते ही जोशो-जश्न के अलावा हिंसा की घटनाएं भी सामने आ रही हैं। यह सब तब, जब चुनाव आयोग ने नतीजों का जश्न मनाने पर रोक लगा रखी है। परिणाम आ जाने के बाद चुनाव आयोग की जिम्मेदारी खत्म हो गई है, पर अब इस तरफ बहुत कम लोगों  का ध्यान है कि बंगाल की सड़कों पर क्या हो रहा है। इसे रास्ते पर लाने की जिम्मेदारी अब ममता बनर्जी की सरकार पर है।

रविवार को जब चुनाव परिणाम आ रहे थे, तभी खबर आई कि आरामबाग स्थित भाजपा कार्यालय में आग लगा दी गई है। आरोप है कि वहाँ से तृणमूल उम्मीदवार सुजाता मंडल के हारने के बाद उनके समर्थक नाराज हो गए और उन्होंने भाजपा दफ्तर को फूँक डाला। ममता बनर्जी का कहना है कि भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनके उम्मीदवार को खदेड़ा और सिर पर वार किया।

ममता के लिए अब परीक्षा की घड़ी है। हुल्लड़बाजी से गाड़ी ज्यादा दूर तक चलेगी नहीं। राज्य में आर्थिक गतिविधियां बढ़ानी होंगी। अभी का राजनीतिक मॉडल उन बेरोजगार नौजवानों के सहारे है, जो स्थानीय स्तर पर क्लब बनाकर संगठित हैं और उसके आधार पर उगाही, अवैध वसूली और कमीशन से कमाई करते हैं। यह मॉडल सीपीएम से विरासत में पार्टी को मिला है। पर इससे राज्य की जनता को कुछ मिलने वाला नहीं है।

शुभेंदु अधिकारी की गाड़ी पर हमला

हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार नंदीग्राम से ममता बनर्जी को हराने वाले बीजेपी के प्रत्याशी शुभेंदु अधिकारी की कार पर हमला हुआ। इसी तरह नटबारी में बीजेपी प्रत्याशी मिहिर गोस्वामी की कार को क्षतिग्रस्त किया गया। सिऊरी में बीजेपी के दफ्तर को तहस-नहस किया गया।

बंगाल के परिणामों का राष्ट्रीय राजनीति पर गहरा असर होगा

रविवार को जब बंगाल के चुनाव परिणाम आ ही रहे थे, तभी खबर आई कि तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने आरामबाग स्थित भाजपा कार्यालय में आग लगा दी। बंगाल की राजनीतिक संस्कृति में यह बात सामान्य लगती है, पर क्या तृणमूल इसे आगे भी चला पाएगी? क्या बंगाल के तृणमूल-मॉडल को जनता का समर्थन मिल गया है? या यह ममता बनर्जी के चुनाव-प्रबंधन की विजय है?

बंगाल के इस परिणाम का देश के राजनीतिक भविष्य पर गहरा असर होने वाला है। इसका बीजेपी और उसके संगठन, कांग्रेस और उसके संगठन तथा विरोधी दलों के गठबंधन पर असर होगा। ममता बनर्जी अब राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के मुकाबले में उतरेंगी। वे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को जितनी बड़ी चुनौती पेश करेंगी, उतनी ही बड़ी चुनौती कांग्रेस और उसके नेता-परिवार के लिए खड़ी करेंगी।

विरोधी-राजनीति

दूसरी तरफ विरोधी दल यदि ममता बनर्जी के नेतृत्व में गोलबंद होंगे, तो इससे कांग्रेस की राजनीति भी प्रभावित होगी। सम्भव है राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस ममता के नेतृत्व को स्वीकार कर ले, पर उसका दूरगामी प्रभाव क्या होगा, यह भी देखना होगा। राहुल का मुकाबला अब ममता से भी है। इसकी शुरूआत इस चुनाव के ठीक पहले शरद पवार ने कर दी थी। वे एक अरसे से इस दिशा में प्रयत्नशील थे।

Sunday, May 2, 2021

कोरोना के खिलाफ लड़ाई में व्यवस्थागत पारदर्शिता भी जरूरी है

देश में हर रोज नए संक्रमितों की संख्या चार लाख पार कर गई है। वैश्विक संख्या से यह आधी से कुछ कम है। देश में 32 लाख से ऊपर लोग बीमार है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार करीब साढ़े तीन हजार लोगों की हर रोज मौत हो रही है और करीब तीन लाख लोग हर रोज संक्रमण-मुक्त हो रहे हैं। करीब 16 साल बाद स्थिति ऐसी आई है, जब हमें दूसरे देशों से सहायता को स्वीकार करना पड़ा है, पर यह हमारी विफलता नहीं है। यह वक्त की बात है। सहायता लेने के पहले हमने सहायता दी भी है। यह पारस्परिक निर्भरता वाली दुनिया है। ऐसी घटनाएं सदियों में एकाध बार ही होती हैं। पिछले साल हमने अमेरिका को सहायता दी थी।

भारतीय आँकड़ों को लेकर पश्चिमी देशों के मीडिया ने जो संदेह व्यक्त किया है, उसपर विचार करने की जरूरत है। आँकड़ों की पारदर्शिता और सरकारी व्यवस्थाओं को लेकर देश में भी सवाल उठाए गए हैं। श्मशानों पर दाह-संस्कार जितने होते हैं, उतनी संख्या सरकारी रिपोर्टों में नहीं होती। सही जानकारी होगी, तो स्थिति पर काबू पाने में मदद मिलेगी। अस्पतालों में बिस्तरों, ऑक्सीजन और दवाओं का इंतजाम उसी हिसाब से होगा।

जवाबदेह-व्यवस्था

लोग परेशान हैं। खबरें हैं कि लोगों ने जब शिकायत की तो उन्हें गिरफ्तार करने की धमकियाँ मिलीं। ऐसे तो समस्या का समाधान नहीं होगा। जिम्मेदार वे लोग हैं, जिन्होंने मंजूरशुदा ऑक्सीजन संयंत्र लगाने में देरी की या जिन्होंने अतिरिक्त टीकों की जरूरत का ध्यान नहीं रखा। विकसित समाज जिस जवाबदेही और व्यवस्थागत निगरानी में काम करते हैं, वह नहीं होगा, तो हम अपने को आधुनिक लोकतांत्रिक देश कैसे कहेंगे? 

Saturday, May 1, 2021

पहले इस लहर से लड़ें, फिर आपस में भिड़ें

 

न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपने पहले पेज पर दिल्ली में जलती चिताओं की एक विशाल तस्वीर छापी। लंदन के गार्डियन ने लिखा, द सिस्टम हैज़ कोलैप्स्ड। लंदन टाइम्स ने कोविड-19 को लेकर मोदी-सरकार की जबर्दस्त आलोचना करते हुए एक लम्बी रिपोर्ट छापी, जिसे ऑस्ट्रेलिया के अखबार ने भी छापा और उस खबर को ट्विटर पर बेहद कड़वी भाषा के साथ शेयर किया गया। पश्चिमी मीडिया में असहाय भारत की तस्वीर पेश की जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख टेड्रॉस गैब्रेसस ने कहा, भारत की दशा को व्यक्त करने के लिए हृदय-विदारक शब्द भी हल्का है।

ज्यादातर रिपोर्टों में समस्या की गम्भीरता और उससे बाहर निकलने के रास्तों पर विमर्श कम, भयावहता की तस्वीर और नरेंद्र मोदी पर निशाना ज्यादा है। प्रधानमंत्री ने भी पिछले रविवार को अपने मन की बात में माना कि 'दूसरी लहर के तूफान ने देश को हिलाकर रख दिया है।' राजनीतिक हालात को देखते हुए उनकी यह स्वीकारोक्ति मायने रखती है।

व्यवस्था का दम घुटा

इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि सरकार इस संकट का सामना करने के लिए तैयार नहीं थी। उत्तराखंड की बाढ़ की तरह यह आपदा अचानक आई पर, सरकार को इसका पूर्वानुमान होना चाहिए था। अमेरिका में भी ऐसी ही स्थिति थी, पर वहाँ की जनसंख्या कम है और स्वास्थ्य सुविधाएं हमसे बेहतर हैं, वे झेल गए। भारत में सरकार केवल केंद्र की ही नहीं होती। राज्य सरकार, नगरपालिकाएं और ग्राम सभाएं भी होती हैं। जिसकी तैयारी बेहतर होती है, वह झेल जाता है। केरल में ऑक्सीजन संकट नहीं है, क्योंकि वहाँ की सरकार का इंतजाम बेहतर है।

Friday, April 30, 2021

बंगाल में ‘पोरिबोर्तोन’ की आहट


पश्चिम बंगाल में आठवें चरण का मतदान पूरा हो जाने के बाद देर रात तक चैनलों पर एग्जिट पोल का अटकल-बाजार लगा रहा, जिसमें चार राज्यों को लेकर करीब-करीब एक जैसी राय थी, पर बंगाल को लेकर दो विपरीत राय थीं। शेष चार राज्यों को लेकर आमतौर पर सहमति है, केवल सीटों की संख्या को लेकर अलग-अलग राय हैं।

वस्तुतः इन पाँच राज्यों में से बंगाल के परिणाम देश की राजनीति को सबसे ज्यादा प्रभावित करेंगे। यहाँ का बदलाव देश की राजनीति में कुछ दूसरे बड़े बदलावों का रास्ता खोलेगा। कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर चल रही बहस और तीखी होगी। साथ ही यूपीए की संरचना में भी बड़े बदलाव हो सकते हैं।

बंगाल में पिछले छह दशकों से अराजक राजनीति ने गहराई तक जड़ें जमा ली हैं। आर्थिक गतिविधियाँ नहीं होने के कारण राजनीति ही व्यवसाय बन गई है। सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ता ही सरकारी धन के इस्तेमाल का माध्यम बनते हैं। इसकी परम्परा सीपीएम के शासन से पड़ी है। कोई भी काम कराने में स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं की भूमिका होती है। गाँवों में इतनी हिंसा के पीछे भी यही राजनीति है। राजनीति ने यहाँ के औद्योगीकरण में भी अड़ंगे लगाए। इस संस्कृति को बदलने की जरूरत है।

बंगाल का नारा है पोरिबोर्तोन। सन 2011 में ममता बनर्जी इसी नारे को लगाते हुए सत्ता में आईं थीं और अब यही नारा उनकी कहानी का उपसंहार लिखने की तैयारी कर रहा है। बंगाल के एग्जिट पोल पर नजर डालें, तो इस बात को सभी ने माना है कि राज्य में तृणमूल कांग्रेस का पराभव हो रहा है और भारतीय जनता पार्टी का उभार। यानी कांग्रेस-वाममोर्चा गठबंधन के धूल-धूसरित होने में किसी को संदेह नहीं है।

Thursday, April 29, 2021

त्रासद समय में पश्चिमी मीडिया का रुख


दुनिया के किसी भी देश ने कोविड-19 की भयावहता को उस शिद्दत से महसूस नहीं किया, जिस शिद्दत से भारत के लोग इस वक्त महसूस कर रहे हैं। अमेरिका के थिंकटैंक कौंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस की वैबसाइट पर ग्लोबल हैल्थ जैसे विषयों पर लिखने वाली लेखिका क्लेरी फेल्टर ने लिखा है कि इस दूसरी लहर के महीनों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने अपने देश की कमजोर स्वास्थ्य-प्रणाली को मजबूत करने का मौका खो दिया। वर्तमान संकट का उल्लेख करते हुए उन्होंने इस बात का उल्लेख भी किया है कि भारत सरकार अब ऑनलाइन आलोचना को सेंसर कर रही है। इस आपदा पर पश्चिमी देशों, कम से कम उनके मीडिया का दृष्टिकोण कमोबेश ऐसा ही है। भारत सरकार ने इस विदेशी हमले का अनुमान भी नहीं लगाया था। अब विदेशमंत्री एस जयशंकर ने दुनियाभर में फैले अपने राजदूतों तथा अन्य प्रतिनिधियों से कहा है कि वे इस सूचना-प्रहार का जवाब दें। 

न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपने पहले पेज पर दिल्ली में जलती चिताओं की एक विशाल तस्वीर छापी। लंदन के गार्डियन ने लिखा, द सिस्टम हैज़ कोलैप्स्ड। लंदन टाइम्स ने कोविड-19 को लेकर मोदी-सरकार की जबर्दस्त आलोचना करते हुए एक लम्बी रिपोर्ट छापी, जिसे ऑस्ट्रेलिया के अखबार ने भी छापा और उस खबर को ट्विटर पर बेहद कड़वी भाषा के साथ शेयर किया गया। पश्चिमी मीडिया में असहाय भारत की तस्वीर पेश की जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख टेड्रॉस गैब्रेसस ने कहा, भारत की दशा को व्यक्त करने के लिए हृदय-विदारक शब्द भी हल्का है।

पहली लहर से धोखा खा गए


मोदी सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार के विजय राघवन मानते हैं कि कोविड-19 की पहली लहर के बाद देश में स्वास्थ्य से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने की कोशिशों में ढील आ गई। इंडियन एक्सप्रेस के साथ विशेष बातचीत में उन्होंने यह भी कहा कि बड़े से बड़े कदमों के बावजूद इंफ्रास्ट्रक्चर उस स्तर पर नहीं आ सकता था, जो दूसरी लहर से पैदा हुई असाधारण परिस्थितियों का सामना कर पाता। पहली लहर के समय केंद्र और राज्य सरकारों ने अस्पतालों को सुदृढ़ करने और सुविधाएं बेहतर करने का प्रयास किया था। पर जैसे ही वह लहर हल्की पड़ी, तो तात्कालिकता की वह लहर भी हल्की पड़ गई। 

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दूसरी लहर के वेग से सभी को हैरत हुई है। चूंकि पहली लहर हल्की पड़ गई थी और वैक्सीन बनकर तैयार हो गई थी, इसलिए वर्तमान लहर का अनुमान लगा पाने में गलती हुई। हालांकि हमें दूसरे देशों में चल रही दूसरी लहर की जानकारी थी, पर हमारे पास वैक्सीन थीं और मॉडलिंग एक्सरसाइज़ नहीं बता रही थीं कि दूसरी लहर इतनी घातक होगी। इसलिए वैक्सीनेशन के काम को तेजी से चलाने की जरूरत महसूस की गई। साथ में कोविड से जुड़े आचरण का पालन करने की जरूरत भी थी। पहला काम तो हुआ, पर दूसरे (उपयुक्त आचरण) में हम ढीले पड़ गए।  

जल्द काबू पा लेंगे

उनका कहना है कि दिल्ली में आ रहे दैनिक संक्रमणों की संख्या में हम जल्द ही गिरावट देखेंगे और दूसरी लहर अगले महीने अपने उच्चतम स्तर पर होगी। पर बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करेगा कि हमारा आचरण कैसा रहता है। उत्तर प्रदेश की स्थिति चिंताजनक है। तमिलनाडु और कर्नाटक की दशा भी खराब है। पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड पर भी नजर रखनी होगी। इन्हीं राज्यों से स्थिति में सुधार होगा। कठोर कदमों हालात को सुधारने में मदद मिलेगी। स्थिति इससे ज्यादा खराब होने वाली नहीं है।

विजय राघवन प्रतिष्ठित बायोलॉजिस्ट हैं और वे बायोटेक्नोलॉजी विभाग के सचिव भी रह चुके हैं। वे नहीं मानते कि हमने वैक्सीन की माँग का अनुमान गलत लगाया। हमने और वैक्सीन मँगाने का इंतजाम किया है और अगले कुछ महीनों में हमारे पास वे आ जाएंगी। सीरम इंस्टीट्यूट का नोवावैक्स के साथ गठबंधन है। यह वैक्सीन जुलाई तक आ जाएगी। जॉनसन एंड जॉनसन का बायलॉजिकल ई के साथ समझौता है। यह भी जल्द आएगी। ज़ायडस की वैक्सीन भी बहुत जल्द आ जाएगी। स्पूतनिक आ चुकी है। चूंकि इन सबकी व्यवस्था पिछले साल महामारी के दौरान कर ली गई थी, इसलिए वे इतनी जल्दी उपलब्ध होने वाली हैं। चूंकि दूसरी लहर जबर्दस्त है, इसलिए लग रहा है कि स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है।


 

Monday, April 26, 2021

क्या वैक्सीन ताउम्र सुरक्षा की गारंटी है?


कोविड-19 का टीका लगने के बाद शरीर में कितने समय तक इम्यूनिटी बनी रहेगी? यह सवाल अब बार-बार पूछा जा रहा है। क्या हमें दुबारा टीका या बूस्टर लगाना होगा? क्या डोज़ बढ़ाकर इम्यूनिटी की अवधि बढ़ाई जा सकती है? क्या दो डोज़ के बीच की अवधि बढ़ाकर इम्यूनिटी की अवधि बढ़ सकती है? ऐसे तमाम सवाल हैं।

इन सवालों के जवाब देने के पहले दो बातों को समझना होगा। दुनिया में कोविड-19 के वैक्सीन रिकॉर्ड समय में विकसित हुए हैं और आपातकालीन परिस्थिति में लगाए जा रहे हैं। इनका विकास जारी रहेगा। दूसरे प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में इम्यूनिटी का एक स्तर होता है। बहुत कुछ उसपर निर्भर करेगा कि टीके से शरीर में किस प्रकार का बदलाव आएगा।

दुनिया में केवल एक प्रकार की वैक्सीन नहीं है। कोरोना की कम से कम एक दर्जन वैक्सीन दुनिया में सामने आ चुकी हैं और दर्जनों पर काम चल रहा है। सबके असर अलग-अलग होंगे। अभी डेटा आ ही रहा है। फिलहाल कह सकते हैं कि कम से कम छह महीने से लेकर तीन साल तक तो इनका असर रहेगा।

कम से कम छह महीने

हाल में अमेरिकी अखबार वॉलस्ट्रीट जरनल ने इस सवाल का जवाब जानने की कोशिश की, तो विशेषज्ञों ने बताया कि हम भी अभी नहीं जानते कि इसका पक्का जवाब क्या है। अभी डेटा आ रहा है, उसे अच्छी तरह पढ़कर ही जवाब दिया जा सकेगा। दुनिया में फायज़र की वैक्सीन काफी असरदार मानी जा रही है। उसके निर्माताओं ने संकेत दिया है कि उनकी वैक्सीन का असर कम से कम छह महीने तक रहेगा। यानी इतने समय तक शरीर में बनी एंटी-बॉडीज़ का क्षरण नहीं होगा। पर यह असर की न्यूनतम प्रमाणित अवधि है, क्योंकि परीक्षण के दौरान इतनी अवधि तक असर रहा है।

टेलीविजन के भविष्य का परिदृश्य

 


वनिता कोहली-खांडेकर /  04 25, 2021

देश में टेलीविजन का भविष्य क्या है? क्या यह ग्रामीण क्षेत्रों का माध्यम बनकर रह जाएगा? ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) की ओर से हाल में जारी आंकड़ों को देखकर तो ऐसा ही लग रहा है। आंकड़ों के मुताबिक टेलीविजन देखने वाले भारतीयों की तादाद 19.7 करोड़ घरों में 83.6 करोड़ से बढ़कर 21 करोड़ घरों में 89.2 करोड़ पहुंच गई। इनमें से 11.9 करोड़ घरों के 50.8 करोड़ लोग ग्रामीण जबकि 9.1 करोड़ घरों के 38.4 करोड़ लोग शहरी हैं।

 यदि वर्ष 2016, 2018 और 2020 के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि टीवी के आधे से कुछ अधिक दर्शक और घर हमेशा से ग्रामीण भारत में रहे। लेकिन राजस्व जुटाने की दृष्टि से अहम यानी टीवी देखने में बिताए गए समय के हिसाब से देखें तो शहरी भारत आगे है। विज्ञापन से जुड़ा राजस्व इसी से तय होता है। एक शहरी दर्शक आमतौर पर 4 घंटे 27 मिनट टीवी देखता है जबकि ग्रामीण दर्शक तीन घंटे 43 मिनट। इसकी एक वजह कम नमूने लेना या बिजली की दिक्कत भी हो सकती है। लब्बोलुआब यह है कि ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में काफी लोग टीवी देखते हैं। टीवी अ भी 1,38,300 करोड़ रुपये के भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग में दर्शकों और राजस्व के मामले में सबसे बड़ा हिस्सेदार है। यानी देश भर में टीवी देखने वाले घरों में टीवी देखने में बढ़ता समय वृद्धि का हिस्सा है।

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Sunday, April 25, 2021

भारत पर ‘प्राणवायु’ का संकट


भारत में कोरोना की दूसरी लहर ने सारी दुनिया का ध्यान खींचा है। दो महीने पहले जिस लड़ाई में भारत को दुनियाभर से बधाई-संदेश मिल रहे थे, उसमें तीन हफ्ते के भीतर भारी बदलाव आने से चिंता के बादल हैं। स्कूल खुलने लगे थे, बाजारों में रंगीनी वापस लौट रही थी, मित्रों की लम्बे अरसे बाद मुलाकातें होने लगी थी, वैवाहिक समारोहों से लेकर बर्थडे पार्टियाँ फिर से सजने लगी थीं। मार्च के महीने में हमारे यहाँ हर रोज होने वाले नए संक्रमणों की संख्या घटकर 13,000 के आसपास पहुँच गई थी। जर्मनी और फ्रांस से भी कम। ज्यादातर मामले महाराष्ट्र और दक्षिण में थे। इन उपलब्धियों पर पिछले तीन हफ्ते से चली दूसरी लहर और पिछले हफ्ते खड़े हुए ऑक्सीजन-संकट ने पानी फेर दिया है।

ऑक्सीजन की किल्लत

सामान्य परिस्थितियों में देश में मेडिकल-ऑक्सीजन का उपलब्धता को लेकर दिक्कत नहीं है। स्वास्थ्य मंत्रालय की 15 अप्रेल की प्रेस-विज्ञप्ति के अनुसार कोविड-19 अधिकार प्राप्त समूह-2 ने ऑक्सीजन की उपलब्धता को लेकर घबराहट पैदा न हो, इसके लिए पहले से कार्रवाई शुरू कर दी थी। 15 अप्रेल को समूह-2 की बैठक में हुए तीन महत्वपूर्ण फैसलों में से सभी ऑक्सीजन की उपलब्धता को लेकर थे।

देश में प्रतिदिन लगभग 7,127 एमटी ऑक्सीजन की उत्पादन क्षमता है और जरूरत पड़ने पर इस्पात संयंत्रों के पास उपलब्ध अतिरिक्त ऑक्सीजन को भी उपयोग में लाया जा रहा है। 12 अप्रैल को मेडिकल-ऑक्सीजन की खपत 3,842 एमटी थी। कोविड-19 के सबसे ज्यादा सक्रिय मामलों वाले 12 राज्यों को 20, 25 और 30 अप्रैल की अनुमानित मांग को पूरा करने के लिए क्रमशः 4880 एमटी, 5619 एमटी और 6593 एमटी मेडिकल ऑक्सीजन का आबंटन किया गया। पर जरूरत इससे भी काफी आगे निकल गई। एक हफ्ते में अचानक बढ़कर करीब तिगुनी हो गई।

Friday, April 23, 2021

मौके-बेमौके तमाशा क्यों बनते हैं केजरीवाल?

सतीश आचार्य का एक पुराना कार्टून, जो आज भी मौजूं है

आम आदमी पार्टी और उसके नेता अरविंद केजरीवाल की पहचान अराजक मुख्यमंत्री के रूप में पहले से थी, अब उनकी विश्वसनीयता खत्म होने का खतरा पैदा होता जा रहा है। महामारी के दौर में देश के दस सबसे त्रस्त राज्यों के मुख्यमंत्रियों साथ पीएम मोदी की बैठक के दौरान अरविंद केजरीवाल ने जो बातें कहीं, वे टीवी चैनलों पर लाइव दिखाई गईं। यह सब अनायास ही लाइव नहीं हुआ होगा। कहीं न कहीं उनके प्रचार-तंत्र ने चैनलों के साथ मिलकर काम किया होगा।

बहरहाल उन्होंने प्रोटोकॉल को तोड़कर जो किया, उससे उन्हें बदनामी ही मिलेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके व्यवहार से नाराज हुए हैं। सम्भव है केजरीवाल को इससे कोई फर्क न पड़े, पर राजनीतिक रूप से वे विरोधी दलों के बीच भी अविश्वसनीय व्यक्ति बनते जा रहे हैं। केजरीवाल ने पीएम मोदी से कहा कि कोरोना मरीजों के लिए ऑक्सीजन की कमी होने से बहुत बड़ी त्रासदी हो सकती है। हालात से निबटने के लिए राष्ट्रीय योजना की आवश्यकता है। दिल्ली को कम ऑक्सीजन मिल रहा है। साथ ही उन्होंने एक देश एक वैक्सीन प्राइस की बात कही।

सरकारी सूत्रों के अनुसार पहली बार प्रधानमंत्री के साथ मुख्यमंत्रियों की बातचीत को लाइव टीवी पर दिखाया गया। सरकारी सूत्रों का कहना है कि केजरीवाल ने पीएम-सीएम संवाद का इस्तेमाल राजनीति के लिए किया। केजरीवाल ने तथ्य जानते हुए भी वैक्सीन की कीमत को लेकर झूठ फैलाया। उन्होंने ऑक्सीजन को एयरलिफ्ट करने का मुद्दा उठाया। शायद उन्हें पता नहीं था कि पहले से ही ऑक्सीजन एयरलिफ्ट की जा रही है। उनका पूरा भाषण समस्या के हल को नहीं बता रहा था, बल्कि वह राजनीति से प्रेरित और जिम्मेदारियों से भागने वाला था।

यूट्यूब-पत्रकारिता के खुलते दरवाजे


यूट्यूब-पत्रकारिता ने अभिव्यक्ति और सूचना के द्वार खोले हैं। अनेक पत्रकारों के चैनल सामने आए हैं। खबरों और विचार से ही नहीं जीवन के सभी क्षेत्रों से जुड़े चैनल सामने आ रहे हैं। यह बहुत अच्छा है और इससे बहुत सी नई बातों को सामने आने का मौका मिल रहा है। जीवन, समाज, संस्कृति, पर्यटन, खान-पान जैसे तमाम विषयों पर बहुत अच्छी बातें डिजिटल मीडिया के मार्फत दिखाई पड़ रही हैं। स्थानीय स्तर पर ऐसी जगहों से खबरें आ रहीं हैं, जहाँ मुख्यधारा के पत्रकार तैनात नहीं होते हैं। 

बावजूद इसके मुझे विचार और अभिव्यक्ति को लेकर एक खतरा दिखाई पड़ रहा है। वह खतरा हर जगह है और यूट्यूब पर और ज्यादा है। आप फेसबुक पर भी देखें। कई तरह के खेमे हैं। वे खेमों में ही यकीन करते हैं। संतुलित राय में बहुत कम लोगों की दिलचस्पी है। हाँ प्रचार के लिए सत्य-निष्ठा और ऑब्जेक्टिविटी जैसे शब्दों का इस्तेमाल सभी करते हैं और इससे  कोई किसी को रोक नहीं सकता।

बहरहाल यह व्यक्तियों की प्राथमिकता पर निर्भर करता है कि वे किस राय को चुनते हैं, पर खेमेबाज़ी किस तरह विचार को प्रभावित करती है, इसे आप यूट्यूब पर देखें। यूट्यूब पर विज्ञापन दो आधार पर मिलते हैं। एक, आपके सब्स्क्राइबर कितने हैं और दूसरे आपके वीडियो को कितने लोगों ने देखा। इसका व्यावहारिक अर्थ है कि यूट्यूब पर आप किसी राजनीतिक, व्यावसायिक या किसी अन्य प्रकार के समूह से जुड़ें, और उसके लिए काम करें। सफलता की सम्भावनाएं तभी ज्यादा हैं।

एक जमाने में चुनाव के एक- दो महीने पहले से छोटे-छोटे अखबार निकलने लगते थे। वैसा ही है। यह वही प्रचारक-पत्रकारिता है, जिसे लेकर मेरे मन में मुख्यधारा की पत्रकारिता को लेकर पहले से अंदेशा है। मूल्यों का यह अंतर्विरोध भारत में सदा से रहा है। मेरे पास विदेशी पत्रकारिता का अनुभव नहीं है। अलबत्ता कुछ प्रसंग जरूर याद हैं, जब पत्रकारिता की मूल्य-बद्धता की परीक्षा हुई। ऐसी ही परीक्षा भारत में भी हुई है। चूंकि 1947 के पहले की हमारी पत्रकारिता राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ी रही, इसलिए बहुत सी बातें उसमें ही छिपी रह गईं।

मेडिकल-ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ेगी


कोरोना की दूसरी लहर और स्वास्थ्य-प्रणाली को लेकर उठे सवालों के परिप्रेक्ष्य में केंद्र सरकार सक्रिय हुई है। कल प्रधानमंत्री ने इस सिलसिले में बैठकों में भाग लिया और आज भी बैठकें हो रही हैं। संकट की इस स्थिति में गुरुवार को प्रधानमंत्री ने हस्तक्षेप करके अधिकारियों को निर्देश दिया कि ऑक्सीजन का उत्पादन बढ़ाया जाए। इस बीच गृह मंत्रालय ने हस्तक्षेप करके राज्यों को निर्देश दिया कि वे ऑक्सीजन की वितरण योजना का ठीक से पालन करें। प्रधानमंत्री आज भी कोविड-19 की स्थिति पर अधिकारियों और राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ विचार-विमर्श कर रहे हैं। 

कोरोना की दूसरी लहर का तेज हमला एक तरफ से हो ही रहा था कि अस्पतालों में बिस्तरे कम होने और वेंटीलेटरों और ऑक्सीजन की कमी की खबरें आने लगीं। ऑक्सीजन की कमी खासतौर से चार राज्यों, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और गुजरात से सुनाई पड़ी। ये चारों राज्य राजनीति दृष्टि से भी संवेदनशील हैं। महामारी के दौर में प्राणवायु की इस किल्लत ने त्राहि-त्राहि मचा दी है। इसबार के संक्रमण में सबसे ज्यादा परेशानी साँस को लेकर है। शरीर में ऑक्सीजन की कमी तेजी से होने लगती है। ऐसे में ऑक्सीजन देने की जरूरत होती है।

Thursday, April 22, 2021

दूसरी लहर और सरकारी भूमिका पर सवाल

 


देश में कोविड-19 संक्रमण की दूसरी लहर इस साल 28 मार्च को होली के चार-पाँच दिन बाद तक कम से कम उत्तर भारत के लोगों को नजर नहीं आ रही थी। पिछले 15 दिनों में इसकी शिद्दत का पता लगा और पिछले एक हफ्ते में इसकी भयावहता सामने आई है। बीमारों की असहायता को देखते हुए स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर जनता की नाराजगी जायज है। पहली नजर में इसके लिए सरकारें ही जिम्मेदार हैं। पर इसे राजनीतिक रंग देना भी ठीक नहीं। कई तरह की गलत सूचनाएं पिछले कुछ दिनों में राजनेताओं के ट्विटर हैंडलों से जारी हुई हैं। शायद उन्हें लगता है कि इसका राजनीतिक लाभ उन्हें मिलेगा।  

आज के टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपने सम्पादकीय में खासतौर से ऑक्सीजन की कमी का उल्लेख किया है। अखबार ने लिखा है कि कोविड-19 के इलाज रेमडेसिविर जैसी दवा की उतना भूमिका नहीं है, जितनी बड़ी भूमिका ऑक्सीजन की है। पर पिछले एक साल में ज्यादा अस्पतालों ने हवा से ऑक्सीजन एकत्र करने वाले संयंत्रों को नहीं लगाया। अब जब इस मामले की समीक्षा करने का समय आएगा, तब केंद्र और राज्य सरकारों को सार्वजनिक-स्वास्थ्य पर कम बजट का जवाब देना होगा। उधर ऑक्सीजन की सप्लाई को लेकर राज्यों के बीच विवाद खड़े हो गए हैं। केंद्र को इसमें समन्वय करना होगा। साथ ही राजनीति को पीछे रखना होगा।

Tuesday, April 20, 2021

ईरान और सऊदी वार्ता से पश्चिम एशिया में माहौल सुधरने की सम्भावना

 


पश्चिम एशिया में दो परम्परागत प्रतिस्पर्धी सऊदी अरब और ईरान के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच करीब पाँच साल बाद पहली बार सीधी बात हुई है। बताया जा रहा है कि इराक की राजधानी बग़दाद में हुई इस बैठक में दोनों देशों के बीच रिश्तों को सामान्य बनाने पर विमर्श हुआ। दोनों देशों ने करीब पाँच साल पहले अपने राजनयिक रिश्ते तोड़ लिए थे।

फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक बग़दाद में इसी महीने हुई इस बैठक में लंबे अंतराल के बाद पहली बार गंभीर बातचीत हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक़ सऊदी अरब की ओर से इस वार्ता का नेतृत्‍व खुफिया प्रमुख खालिद बिन अली अल हुमैदान ने किया। बातचीत की पहल इराक के प्रधानमंत्री मुस्तफा अल क़दीमी ने की है। इस खुफिया बैठक के बारे में सऊदी अरब ने कोई टिप्पणी नहीं की है। ईरानी वैबसाइट पार्सटुडे ने फाइनेंशियल टाइम्स का हवाला देते हुए इस खबर को प्रकाशित जरूर किया है, पर ईरान सरकार ने फौरन कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी।

बाद में इसी वैबसाइट पर प्रकाशित एक रिपोर्ट में ईरान के विदेश विभाग के प्रवक्ता सईद ख़तीबज़ादे ने कहा कि ईरान और सऊदी अरब के मध्य वार्ता दोनों देशों के लोगों के हित में है और वह क्षेत्रीय शांति व सुरक्षा में मददगार बनेगी। उन्होंने इराक़ में ईरान और सऊदी अरब की वार्ता की रिपोर्टों के बारे में कहा कि हमने संचार माध्यमों में देखा कि इस बारे में विरोधाभासी ख़बरें प्रकाशित हुई हैं। सऊदी अरब के साथ वार्ता का ईरान स्वागत करता है और यह चीज़ दोनों देशों के लोगों के हित में है।

इराकी पहल

इराक़ी प्रधान मंत्री अल-काज़मी ने सऊदी शाह सलमान के निमंत्रण पर पिछले महीने रियाज़ का दौरा किया था, जहां इस वार्ता का ख़ाका तैयार किया गया था। इस रिपोर्ट में एक इराक़ी अधिकारी के हवाले से उल्लेख किया गया है कि बग़दाद ने ईरान-मिस्र और ईरान-जॉर्डन के बीच संपर्क का एक चैनल स्थापित किया है। हाल में सऊदी विदेश मंत्री ने कहा था कि विश्वास बढ़ाने के लिए खाड़ी के अरब देशों से वार्ता हो सकती है। इस रिपोर्ट में एक इराक़ी अधिकारी के हवाले से उल्लेख किया गया है कि बग़दाद ने ईरान-मिस्र और ईरान-जॉर्डन के बीच संपर्क का एक चैनल स्थापित किया है।

Monday, April 19, 2021

भारत-सऊदी तेल-डिप्लोमेसी में तल्ख़ी


भारत, दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा खनिज-तेल आयातक देश है। ईरान पर अमेरिकी पाबंदियों के कारण वाजिब कीमत पर तेल की खरीद को धक्का लगा था, पर सऊदी अरब का सहारा था। इस तेल-डिप्लोमेसी ने सऊदी अरब के साथ हमारे दीगर-रिश्ते भी सुधारे थे। अब तेल की कीमतों की गर्मी में ये रिश्ते पिघलते दिखाई पड़ते हैं।  

पिछले छह महीनों से अंतरराष्ट्रीय तेल-बाजार में सुर्खी आने लगी है। इस वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान होने लगा। इस तेजी के पीछे है ओपेक प्लस देशों का उत्पादन घटाने का फैसला। इसमें खासतौर से सऊदी अरब की भूमिका है। पिछले साल अप्रेल से दिसम्बर के बीच भारत ने औसतन 50 डॉलर से कम कीमत पर तेल खरीदा था। पर पिछले महीने कीमत 60 डॉलर के ऊपर पहुँच गई।

पेट्रोल पर भारी टैक्स के कारण भारत के खुले बाजार में पेट्रोल की कीमत 100 प्रति लिटर से ऊपर चली गई है। इससे सरकार की फज़ीहत होने लगी है। ब्रेंट-क्रूड की कीमतें पिछले साल अक्तूबर में 40 डॉलर प्रति बैरल थीं, जो इस महीने 64 डॉलर के आसपास आ गईं। भारत जैसे विकासशील देशों को महामारी के इस दौर में इसकी वजह से अपनी अर्थव्यवस्थाओं को पटरी पर लाने में दिक्कतें पैदा होने लगी हैं।

Sunday, April 18, 2021

कैसे रोकें ‘दूसरी लहर’ का प्रवाह?


कोरोना की दूसरी लहर को लेकर कई प्रकार की आशंकाएं हैं। हम क्या करें? वास्तव में संकट गहरा है, पर उसका सामना करना है। क्या बड़े स्तर पर लॉकडाउन की वापसी होगी? पिछले साल कुछ ही जिलों में संक्रमण के बावजूद पूरा देश बंद कर दिया गया था। दुष्परिणाम हमने देख लिया। तमाम नकारात्मक बातों के बावजूद बहुत सी सकारात्मक बातें हमारे पक्ष में हैं। पिछले साल हमारे पास बचाव का कोई उपकरण नहीं था। इस समय कम से कम वैक्सीन हमारे पास है। जरूरत निराशा से बचने की है। निराशा से उन लोगों का धैर्य टूटता है, जो घबराहट और डिप्रैशन में हैं।

लॉकडाउन समाधान नहीं

लॉकडाउन से कुछ देर के लिए राहत मिल सकती है, पर वह समाधान नहीं है। अब सरकारें आवागमन और अनेक गतिविधियों को जारी रखते हुए, ज्यादा प्रभावित-इलाकों को कंटेनमेंट-ज़ोन के रूप में चिह्नित कर रही हैं। अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी ने हाल में लिखा है कि पिछले साल के लॉकडाउन ने सप्लाई चेन को अस्त-व्यस्त कर दिया, उत्पादन कम कर दिया, बेरोजगारी बढ़ाई और करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी छीन ली। सबसे ज्यादा असर प्रवासी मजदूरों पर पड़ा था। पिछले साल के विपरीत प्रभाव से मजदूर अभी उबरे नहीं हैं।

Saturday, April 17, 2021

दूसरी लहर में बहुत ज्यादा है संक्रमण का पॉज़िटिविटी रेट

 


भारत में कोविड-19 की दूसरी लहर में संक्रमण बहुत तेजी से बढ़ा है और जिन लोगों को संक्रमण हुआ है, उनका प्रतिशत बहुत ज्यादा यानी पॉज़िटिविटी रेट बहुत ज्यादा है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक हफ्ते में हुए टेस्ट में 13.5 फीसदी से ज्यादा लोग पॉज़िटिव पाए गए हैं। इतना ऊँचा पॉज़िटिविटी रेट इसके पहले नहीं रहा है। यह बात इस बात की सूचक है कि प्रसार बहुत ज्यादा है।

सबसे बड़ी बात है कि यह प्रसार पिछले एक-डेढ़ महीने में हुआ है, जबकि पिछले साल संक्रमण इतनी तेजी से नहीं हुआ था। पिछले वर्ष जुलाई के महीने में पॉज़िटिविटी रेट सबसे ज्यादा था। हालांकि संक्रमणों की संख्या सितम्बर तक बढ़ी थी, पर पॉज़िटिविटी रेट कम होता गया था। जुलाई तक देश में करीब पाँच लाख टेस्ट हर रोज हो रहे थे। उस महीने के अंत में टेस्ट की संख्या बढ़ी और अगस्त के तीसरे सप्ताह तक दस लाख के आसपास प्रतिदिन हो गई थी।

इस वक्त देश में सितम्बर की तुलना में करीब ढाई गुना संक्रमण के मामले हर रोज सामने आ रहे हैं। जबकि टेस्ट लगभग उतने ही हो रहे हैं, जितने सितम्बर-अक्तूबर में हो रहे थे। महाराष्ट्र में पहले भी पॉज़िटिविटी रेट 15 फीसदी के आसपास रहा है, पर उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में यह राष्ट्रीय औसत से कम था। इस समय छत्तीसगढ़ का पॉज़िटिविटी रेट महाराष्ट्र से भी ज्यादा है। इसकी वजह शायद यह है कि लोगों का आपसी सम्पर्क बढ़ा है और यह भी कि वायरस का नया स्ट्रेन ज्यादा तेजी से संक्रमित हो रहा है। 

Friday, April 16, 2021

कैसे रुकेगी दूसरी लहर?


भारत में कोरोना की पहली लहर 16 सितम्बर 2020 को अपने उच्चतम स्तर पर पहुँची और उसके बाद उसमें कमी आती चली आई। फिर फरवरी के तीसरे सप्ताह से दूसरी लहर आई है, जिसमें संक्रमितों की संख्या दो लाख के ऊपर चली गई है। यह संख्या कहाँ तक पहुँचेगी और इसे किस तरह रोका जाए? इस आशय के सवाल अब पूछे जा रहे हैं। अखबार द हिन्दू की ओर से पत्रकार आर प्रसाद ने गौतम मेनन और गिरिधर बाबू से इस विषय पर बातचीत की, जिसका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:  

आपको क्या लगता है, दूसरी लहर कब तक अपने उच्चतम स्तर (पीक) पर होगी? और जब यह पीक होगी, तब दैनिक संक्रमणों की संख्या क्या होगी?

गौतम मेनन: यह बताना बहुत मुश्किल है। पहले यह जानकारी होनी चाहिए कि फिर से इंफेक्शन का स्तर क्या है और बीमारी से बाहर निकलने वालों का इम्यून स्तर क्या है।  अलबत्ता इतना स्पष्ट है कि नए वेरिएंट काफी तेजी से फैल रहे हैं और उनका प्रसार पिछली बार से ज्यादा तेज है। मुझे लगता है कि स्थितियाँ सुधरने के पहले काफी बिगड़ चुकी होंगी। हमें हर रोज करीब ढाई लाख नए केस देखने पड़ेंगे। इसका उच्चतम स्तर इस महीने के त या अगले महीने के पहले हफ्ते में होगा।

तमाम राज्यों में आवागमन पर बहुत कम रोक हैं। क्या संक्रमण रोकने के लिए आवागमन पर रोक लगनी चाहिए?

गौतम मेनन: हमें अंतर-राज्य आवागमन पर रोक लगानी चाहिए। पर यह रोक तभी लगाई जा सकेगी, जब पता हो कि नए वेरिएंट का प्रसार कितना है। मेरी समझ से नए मामलों की संख्या नए वेरिएंट के कारण है। यदि उनका प्रसार हो चुका है, तो यात्रा पर रोक लगाने से भी कुछ नहीं होगा। हमें डेटा की जरूरत है। इसके अलावा मास्किंग, धार्मिक और राजनीतिक कार्यक्रमों की फिक्र करनी होगी, जिनपर पूरी तरह रोक लगनी चाहिए। मेरी समझ से अंतर-राज्य और राज्य के भीतर भी लोगों के आवागमन को रोकना चाहिए।

गिरिधर बाबू: मुझे लगता है कि हमने देर कर दी है। फरवरी के पहले और दूसरे हफ्ते में हमने देख लिया था कि संक्रमण संख्या बढ़ रही है। हमें पता था कि किन जगहों पर ऐसा हो रहा है। हमें वहीं पर जेनोमिक सीक्वेंसिंग और एपिडेमियोलॉजिकल जाँच करनी चाहिए थी। बावजूद इसके कि जेनोमिक सीक्वेंसिंग के परिणाम हालांकि मार्च के तीसरे सप्ताह में मिल गए थे।  

Thursday, April 15, 2021

अफगानिस्तान में शांति-स्थापना के अपने प्रयास जारी रखेगा अमेरिका: बाइडेन


अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अंततः अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी की घोषणा बुधवार को कर दी। उन्होंने कहा कि यह अफगानिस्तान में अमेरिका की सबसे लंबी लड़ाई को खत्म करने का समय आ गया है। यह ऐसी जिम्मेदारी है जिसे मैं अपने उत्तराधिकारी पर नहीं छोड़ना चाहता। उन्होंने देश के नाम अपने संबोधन में कहा कि अमेरिका इस जंग में लगातार अपने संसाधन झोंक नहीं सकता। इस घोषणा के बाद अब अफगानिस्तान को लेकर वैश्विक राजनीति का एक नया दौर शुरू होगा।

बाइडेन ने इस बात पर जोर दिया है कि उनका प्रशासन अफगान सरकार और तालिबान के बीच शांति-वार्ता का समर्थन करता रहेगा और अफगान सेना को प्रशिक्षित करने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों में मदद करेगा। अब 1 मई से सेना को अफगानिस्तान से निकालना शुरू किया जाएगा, पर हम जल्दबाजी नहीं करेंगे। तालिबान को पता होना चाहिए कि अगर वे हम पर हमला करते हैं तो हम पूरी ताकत के साथ अपना और साथियों का बचाव करेंगे। उन्होंने यह भी कहाहम इस इलाके के अन्य देशों खास तौर पर पाकिस्तानरूसचीनभारत और तुर्की से और समर्थन की उम्मीद रखते हैं। अफगानिस्तान के भविष्य निर्माण में इनकी भी अहम भूमिका होगी। उनके इस बयान में तालिबान को परोक्ष चेतावनी पर ध्यान दें। साथ ही उन्होंने जिन देशों के समर्थन की आशा व्यक्त की है उसमें  ईरान का नाम नहीं है। 

Wednesday, April 14, 2021

अफगानिस्तान से पूरी तरह हटेगी अमेरिकी सेना


अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन सम्भवतः आज अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी की नई तारीख की घोषणा करेंगे। यह तारीख होगी 11 सितम्बर, 2021। बाइडेन की यह घोषणा शुद्ध रूप से राजनीतिक फैसला है। अमेरिकी सेना की सलाह है कि अफगानिस्तान को छोड़कर जाने का मतलब है, वहाँ फिर से अराजकता को खेलने का मौका देना। बहरहाल बाइडेन ने 1 मई की तारीख को बढ़ाकर 1 सितम्बर करके डोनाल्ड ट्रंप की नीति में बदलाव किया है और दूरगामी सहमति भी व्यक्त की है। भारत के नजरिए से इस फैसले के निहितार्थ पर भी हमें विचार करना चाहिए। 

11 सितम्बर की तारीख क्यों? क्योंकि यह तारीख अमेरिका पर हुए 11 सितम्बर 2001 के सबसे बड़े आतंकी हमले के बीसवें वर्ष की याद दिलाएगी। अफगानिस्तान में अमेरिकी कार्रवाई उस हमले के कारण हुई थी। बहरहाल 11 सितम्बर का मतलब है कि उसके पहले ही अमेरिका की सेना की वापसी शुरू हो जाएगी। यों भी वहाँ अब उसके 3500 और नेटो के 65000 सैनिक बचे हैं।  उनकी उपस्थिति भावनात्मक स्तर पर अमेरिकी हस्तक्षेप का माहौल बनाती है।  

यों अमेरिकी दूतावास की रक्षा के लिए अमेरिकी सेना की उपस्थिति किसी न किसी रूप में बनी रहेगी। पर उन सैनिकों की संख्या ज्यादा से ज्यादा कुछ सौ होगी। पर अमेरिका इस इलाके पर नजर रखने और इंटेलिजेंस के लिए कोई न कोई व्यवस्था करेगा। कैसे संचालित होगी वह व्यवस्था? उधर नेटो देशों की सेना को वापसी के लिए भी अमेरिका की लॉजिस्टिक सहायता की जरूरत होगी।