भारत में महिला आरक्षण को लेकर एक साथ कई सवाल हैं। संसद में संविधान संशोधन विधेयक पास नहीं हो पाया, या उसे पास कराने में किसी की दिलचस्पी नहीं थी? ऐसा लगता है कि बीजेपी का इरादा इस मसले को उठाना और विरोधियों को उत्तेजित करना था, ताकि वे शोर मचाएँ। सरकार जानती थी कि उसके साथ दो तिहाई सदस्य नहीं हैं और आज के राजनीतिक हालात में उसे कत्तई आशा नहीं करनी चाहिए थी कि विरोधी राजनीति का कोई धड़ा उसके समर्थन में आता। तब फिर क्यों बिल पेश किया?
भारतीय राजनीति विश्वसनीय नहीं है। इसमें जो कहा
जाता है, ज़रूरी नहीं कि वैसा ही हो। फौरी तौर पर यह राजनीतिक तीर था, जो ‘नारी-शक्ति’ का लाभ उठाने के लिए चलाया गया था। संसद में जब बातें होती हैं, तब उन्हें
गाँव-गाँव में सुना जाता है। विरोध में जितना शोर होगा, फायदा उतना ज्यादा होगा। उद्देश्य
माहौल बनाने, नैरेटिव रचने या इसे जो भी कहें, उतना ही था। विरोधियों की दिलचस्पी
भी कम से कम महिला आरक्षण में नहीं थी। परिसीमन को लेकर भी उनके तर्क विचित्र थे। इससे
ज्यादा उनका इरादा भी कुछ नहीं था। बहरहाल इसका विपरीत-प्रभाव भी होगा, जो समूची
राजनीति को अपनी चपेट में लेगा।
क्या महिलाओं को समझ में नहीं आ रहा है कि उन्हें
छला जा रहा है? यह दीगर सवाल है कि इस विधेयक के परास्त होने का
लाभ बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव में मिलेगा या नहीं। असल बात यह है कि देश की
राजनीति ने पिछले तीन दशक से ‘नारी-शक्ति’ को छला है। उसे बहुत
ज्यादा छला नहीं जा सकेगा। स्त्रियों की राजनीतिक अभिलाषाएँ आज उस सुप्तावस्था में
नहीं हैं, जो नब्बे के दशक में थीं। साफ है कि यह विधेयक राजनीतिक-गतिविधि मात्र
थी। जिस तरह से बिल के गिरते ही पोस्टर छपकर आ गए, और
राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन की योजना बन गई, वह बताता है कि बीजेपी इसकी तैयारी के
साथ आई थी।
सबसे पहले एचडी देवेगौड़ा सरकार ने 81वें
संविधान संशोधन विधेयक, 1996 के रूप में 12 सितंबर 1996 को महिला
आरक्षण विधेयक, पेश किया था। विधेयक पेश तो हुआ, लेकिन राजनीतिक आम सहमति न बनने और गठबंधन सरकार के भीतर विरोध के कारण
इसे संयुक्त संसदीय समिति को भेजना पड़ा और 11वीं लोकसभा भंग होने के साथ ही लैप्स
हो गया। देश की राजनीति चाहती, तो देवेगौड़ा का बिल ही पास
हो जाता।
सरकार ने इसबार जो विधेयक पेश किया था, वह संसदीय सीटों के परिसीमन पर केंद्रित था। उसके विरोधियों का कहना है कि परिसीमन देश को तोड़ देगा। वे कहते हैं कि 2023 के बिल को लागू करो। 2023 के महिला आरक्षण कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार, इसे परिसीमन के बगैर लागू नहीं किया जा सकता। यह कानून विशेष रूप से जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू होने की शर्त से बँधा हुआ है। परिसीमन रुकेगा तो आरक्षण भी रुकेगा।
सरकार ने 2023 के बिल की अधिसूचना जारी कर दी है,
ताकि वह लैप्स न हो। उसकी प्रक्रिया ठीक से चली भी तो 2034 के चुनाव के पहले
आरक्षण लागू नहीं हो सकेगा। संभव है कि 2039 में लागू हो। क्या महिलाएँ इतना लंबा
इंतज़ार करेंगी? दरअसल देश की पुरुष-संचालित राजनीति देख नहीं पा
रही है कि महिलाएँ धीरे-धीरे बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में उभर कर आ रही हैं। यह
ताकत अभी तक वोटर के रूप में है, पर जल्द ही नेतृत्व के लेवल पर भी दिखाई पड़ेगी।
जब 2023 का वह बिल पास हो रहा था, तब उसे लेकर जबर्दस्त सर्वानुमति थी। वह सर्वानुमति भी राजनीतिक-लाभ लेने
तक की थी। उस वक्त भी सवाल था कि इसे फौरन लागू करने से रोका किसने है? कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खरगे ने राज्यसभा में कहा था, जब सरकार नोटबंदी जैसा फैसला तुरत लागू करा सकती है, तब इतने महत्वपूर्ण विधेयक की याद साढ़े नौ साल बाद क्यों आई? बात तो बहुत मार्के की कही थी, पर दस साल तक कांग्रेस की सरकार रही, वह भी
तो उसे लागू नहीं करा पाई। यूपीए के सहयोगी दल ही इसके लिए तैयार नहीं थे।
‘इंडिया’ ब्लॉक के नेता आज कह रहे हैं कि हम उस
विधेयक का समर्थन करेंगे जो 543 सीटों की वर्तमान संसद में महिलाओं के लिए 33
प्रतिशत आरक्षण को तुरंत लागू कराए। उन्होंने क्या सरकार के साथ बैठकर इस विषय पर
बात की? जब वे जानते हैं कि जनगणना और परिसीमन के बिना यह
फिलहाल कानूनी रूप से संभव नहीं है, तो उन्हें ऐसी पेशकश करनी चाहिए, जिसके पीछे
ईमानदारी हो और व्यावहारिकता भी।
व्यावहारिक बात है कि सांसदों की वर्तमान संख्या
को देखते हुए, किसी पार्टी का सदस्य इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेगा। लोकसभा में
मोटे तौर पर 86 प्रतिशत पुरुष हैं और देश की विधानसभाओं में करीब 90 प्रतिशत। इसी
संख्या पर आरक्षण लागू हुआ, तो बड़ी संख्या में पुरुषों का पत्ता साफ हो जाएगा। कोई
नहीं चाहेगा कि उसका चुनाव-क्षेत्र आरक्षण के दायरे में चला जाए। भले ही एक तिहाई
सीटें महिलाओं के कोटे में जाएँगी, पर किसका क्षेत्र छिनेगा, पता नहीं। एक-एक
चुनाव क्षेत्र को तैयार करने में बरसों की मेहनत और लाखों की रकम खर्च होती है। यह
सब उन्हें मंज़ूर होता, तो 1996 से अब तक यह सब रुका हुआ क्यों है?
बहरहाल पुरुषों की इस राजनीति को महिलाओं की बढ़ती
ताकत ही ठिकाने लगाएगी। अभी तक माना जाता था कि महिलाओं की राजनीतिक आवाज़ नहीं
होती है। वोटर के रूप में उनकी आवाज़ को मान्यता मिल चुकी है। कौन सा राज्य है,
जहाँ पार्टियाँ महिलाओं को लिए लुभावने कार्यक्रम लेकर नहीं आ रही हैं। ये
कार्यक्रम वोटर के रूप में हैं।
दूसरी तरफ राजनीतिक-कार्यकर्ताओं के रूप में भी
महिलाओं के बीच खामोश क्रांति हो रही है। इसकी शुरुआत स्थानीय निकायों, यानी पंचायतों
और नगरपालिकाओं में, महिलाओं को न्यूनतम 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने से हुई है,
जो 1993 के 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधनों के तहत उन्हें प्राप्त हुआ है। इस
आरक्षण को बिहार, उत्तराखंड, महाराष्ट्र
सहित 20 से अधिक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया
है।
जमीनी स्तर पर अब करीब साढ़े चौदह लाख से अधिक
महिलाएँ जन-प्रतिनिधि के रूप में काम कर रही हैं, जो इन निकायों के कुल सदस्यों का
करीब 46 प्रतिशत है। इनमें से कुछ अपने पतियों, भाइयों और बेटों के लिए आड़ का काम
कर रही हैं, पर ज्यादा बड़ी संख्या उन महिलाओं की है, जो न केवल सक्रिय हैं, बल्कि
अपनी कुशलता साबित कर रही हैं।
इनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ भी जन्म ले रही
हैं। ग्राम सभा की सदस्य, जिला स्तर पर जाना चाहती हैं, नगर पालिका की पार्षद
विधायक और उससे ऊपर के स्तर पर। उनकी संख्या बढ़ रही है, क्योंकि एक पीढ़ी के बाद
दूसरी पीढ़ी भी सामने आ रही है।
स्थानीय निकायों के कुल सदस्यों में 46 प्रतिशत
महिलाएँ हैं, वहीं लोकसभा और विधानसभाओं में यह प्रतिशत काफी कम है। 18वीं लोकसभा
में 543 में से 75 महिला सांसद (लगभग 14 प्रतिशत) हैं, जो
2024 में चुनाव लड़कर आई हैं। राज्यसभा में लगभग 39 (17 प्रतिशत) महिला सदस्य हैं।
वहीं एडीआर की एक रिपोर्ट के अनुसार, 4,666 सांसदों/विधायकों
में से केवल 464 यानी 10 प्रतिशत महिलाएँ हैं। यह असंतुलन है, जिसे अब महिलाएँ ही
आगे बढ़कर दूर करेंगी।

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