Thursday, March 26, 2026

युद्ध के दुष्प्रभावों से निपटने को तैयार भारत


जिन लोगों को आज से तीन दशक पहले की बातें याद हैं, उन्हें गैस एजेंसियों, सरकारी राशन और चीनी की दुकानों के आगे लगी कतारें भी याद होंगी. पश्चिम एशिया के युद्ध के साथ कुछ यादें ताज़ा हो गई हैं.

उसके पहले चीन युद्ध के बाद देश में खाद्य संकट पैदा हुआ था और हमें काफी समय तक अमेरिकी गेहूँ खाना पड़ा था. शायद वह काफी पुरानी बात हो गई, पर कोविड महामारी तो हाल की बात है, जब शहर-शहर गाँव-गाँव लॉकडाउन के कारण रोज़ी-रोज़गार पर तो संकट आया, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता भी चुनौती बन गई.

पश्चिम एशिया की लड़ाई ने हमें एकबार फिर से चौंकाया है. आपदाएँ किसी भी वक्त आ सकती हैं, पर भारत की विशेषता है कि वह संकटों का सामना आसानी से कर लेता है. आपको समझना ही है, तो इस समय अपने पड़ोसी देशों की स्थिति पर एक बार नज़र ज़रूर डालें.

कहना मुश्किल है कि लड़ाई जल्द खत्म होगी या देर से होगी. इसलिए मानकर चलिए कि समस्याएँ नए रूप में भी आ सकती है. ऐसे में आपके धैर्य, अनुशासन और एकजुटता की सबसे बड़ी ज़रूरत है. भाईचारा बनाकर रखें. बेशक संकट आया है, तो दूर भी होगा.

प्रधानमंत्री का बयान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई को लेकर संसद के दोनों सदनों में भारत के सामने खड़ी 'अप्रत्याशित चुनौतियों' का ज़िक्र करते हुए कहा है कि हम उनका सामना करने में समर्थ हैं. सच यह है कि देश अतीत में ऐसे संकटों का सफलतापूर्वक सामना कर चुका है.

अलबत्ता प्रधानमंत्री ने इस बात को रेखांकित किया कि इस टकराव का असर लंबे समय तक बने रहने की आशंका है. ऐसा शायद पहली बार हो रहा है कि महामारी और युद्ध का आगमन आगे-पीछे हुआ है. कोविड के दौरान भी सप्लाई चेन में संकट पैदा हुआ था और देश ने एकजुटता से उसका मुकाबला किया.

भारत में बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, गैस और उर्वरक जैसी अनेक ज़रूरी चीजें होर्मुज़ जलसंधि मार्ग से आती हैं. युद्ध के बाद से ही वहाँ से जहाज़ों का आना-जाना बहुत चुनौतीपूर्ण हो गया है. बावजूद इसके, हमारी सरकार का प्रयास रहा है कि पेट्रोल-डीज़ल और गैस की सप्लाई बहुत ज़्यादा प्रभावित न हो.

Wednesday, March 25, 2026

ट्रंप को अब युद्ध से निकलने के रास्ते की तलाश


ईरान-युद्ध शुरू होने के पहले से ही कहा जा रहा था कि लड़ाई शुरू हो गई, तो उसे खत्म करना मुश्किल हो जाएगा. यह बात अब सच साबित हो रही है. अब ट्रंप अपनी योजनाओं को लेकर किंतु-परंतु करने लगे हैं. पहले धमकी दी कि ईरानी ऊर्जा केंद्रों पर हमले करेंगे और फिर कहा कि 120 घंटे तक ऐसा नहीं करेंगे.

उनका यह भी कहना है कि ईरान से बात चल रही है. पाकिस्तान के हाथों 15 सूत्री प्रस्ताव भेजा है.  उधर ईरान के नेता कह रहे हैं कि हमारी कोई बात नहीं हो रही है.

न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है कि जब से राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान-युद्ध में ‘प्रवेश’ किया है, तब से वे इस सवाल से रूबरू हैं कि इसे समाप्त कब करेंगे? सच यह है कि युद्ध के उनके कई घोषित लक्ष्य अब भी अधूरे हैं.

ट्रंप ने ईरान-युद्ध के लिए ‘भ्रमण’ शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया है, ताकि लगे कि कोई बड़ी परेशानी की बात नहीं है, लेकिन व्यावहारिक रूप से लगता है कि वे फँस गए हैं.

अब वे परेशान हैं. पिछले शुक्रवार शाम को जब ट्रंप फ्लोरिडा के लिए रवाना हुए, तो ऐसा लग रहा था कि वे शायद लड़ाई को कोई मोड़ देकर एक्ज़िट यानी हाथ खींचने की घोषणा करेंगे.

बहरहाल अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है. दूसरी तरफ उनकी और वैश्विक अर्थव्यवस्था की परेशानियाँ बढ़ती जा रही हैं. पेट्रोल की औसत कीमतें आसमान छूने की तैयारी कर रही है. फारस की खाड़ी में बुनियादी ढाँचा खंडहर में तब्दील हो चुका है, वहीं ईरान की कमजोर धार्मिक सत्ता की पकड़ मजबूत होती जा रही है.

Monday, March 23, 2026

हरीश राणा के मार्फत ‘इच्छामृत्यु’ से जुड़े सवाल


ग़ाज़ियाबाद के 32 वर्षीय हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर परोक्ष इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) के लिए एम्स दिल्ली के पैलिएटिव केयर विभाग में शिफ्ट कर दिया गया है। इच्छामृत्यु की प्रक्रिया को पूरा होने में कई सप्ताह लग सकते हैं, क्योंकि इसमें कई चरण शामिल हैं। हालाँकि इस प्रक्रिया की व्यावहारिकता से जुड़े कई सवाल अभी हैं, पर अब बहस एक्टिव इच्छामृत्यु यानी दवा देकर या किसी दूसरे तरीके से मृत्यु देने पर भी होगी। सबसे बड़ी ज़रूरत इस बात की है कि संसद इस विषय पर कानून बनाए। 2018 और 2026 के फैसलों के बावजूद संसद ने अभी तक समग्र कानून नहीं बनाया। कोर्ट ने कई बार विधायिका से कानून बनाने की अपील की है

पैलिएटिव केयर में ऐसी चिकित्सा देखभाल होती है, जिसका उद्देश्य गंभीर या असाध्य बीमारी से पीड़ित मरीज को आराम देना और बीमारी को पूरी तरह ठीक करने के बजाय मरीज के दर्द, साँस लेने में तकलीफ, घबराहट, बेचैनी या अन्य शारीरिक-मानसिक परेशानियों को कम करने पर ध्यान दिया जाता है। सक्रिय इच्छामृत्यु मृत्यु का एक नया कारण उत्पन्न करती है; निष्क्रिय इच्छामृत्यु पहले से ही चल रही प्राकृतिक मृत्यु में बाधा को दूर करती है। एक मृत्यु का कारण बनती है; दूसरी मृत्यु को स्वाभाविक रूप से होने देती है। एक्टिव इच्छामृत्यु यानी दवा या किसी दूसरे तरीके से मौत देना पूरी तरह अवैध है।

प्रश्न है कि संविधान के अनुच्छेद 21के तहत ‘जीने के अधिकार’ में ‘गरिमापूर्ण मरने का अधिकार’ शामिल है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि अधिकार है, लेकिन सीमित परिस्थितियों में। हरीश राणा केस के फैसले के बाद भी, यह बहस अभी अपूर्ण है। इच्छामृत्यु के विरोध में जो तर्क है, उसके अनुसार जीवन ईश्वर का दिया हुआ है, उसमें मानवीय हस्तक्षेप गलत है। इच्छामृत्यु के अधिकार का दुरुपयोग होने का खतरा भी है। डॉक्टर ‘किलर’ बन जाएँगे। कोमा में पड़े लोगों को व्यर्थ समझ लिया जाएगा। कैथलिक चर्च, कई हिंदू संगठन और इस्लामी विद्वान इसे जीवन के खिलाफ मानते हैं।

Wednesday, March 18, 2026

ईरान-युद्ध और भारत का ‘डिप्लोमैटिक-कैलकुलेशन’


पश्चिम एशिया की लड़ाई अब तीसरे हफ्ते में है. इसके साथ जुड़े भारत के गहरे हित नज़र आने लगे हैं. वहाँ रहने वाले एक करोड़ भारतीयों के अलावा ऊर्जा आवश्यकताओं, पूँजी निवेश और रक्षा-तकनीक से जुड़े मसलों के कारण भी हमारी दिलचस्पी इस इलाके में रही है और रहेगी.

हमारी विदेश-नीति, सामाजिक-सांस्कृतिक संवेदनशीलता और नैतिकता के अलावा सकल राष्ट्रीय हितों से निर्धारित होती है. यह गणित यानी कैलकुलेशन है, जो दीर्घकालीन हितों पर आधारित होता है.  

इस गणित का सहारा सभी देश लेते हैं, और इसी गणित का परिणाम है कि जबर्दस्त फायर वर्क्स के बीच से पेट्रोलियम और एलपीजी के कुछ टैंकर होर्मुज जलडमरूमध्य पार करते हुए भारत आने में कामयाब हुए हैं. यही गणित हमें मुखर होने और कई बार खामोश रहने का सुझाव देता है.

हाल में अमेरिकी प्रशासन ने रूसी तेल पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों को 30 दिन के लिए निलंबित करने का निर्णय ऐसे ही गणित के तहत ही किया है. ट्रंप के इस कदम से वैश्विक ऊर्जा बाजार को आकार देने में तेल समृद्ध रूस के महत्त्व के प्रति वाशिंगटन की व्यावहारिक समझ व्यक्त होती है.

Wednesday, March 11, 2026

नेपाल में जेन-ज़ी की नई सरकार


 

नेपाल की तीन साल पुरानी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने पिछले सप्ताह हुए संसदीय चुनाव में शानदार जीत हासिल की और अगली सरकार बनाने के लिए तैयार है। हर मायने में, यह चुनाव नेपाल के युवाओं ने जीता है। सितंबर में हुए जनरेशन जेड के विरोध प्रदर्शनों में इन्हीं युवाओं ने हिस्सा लिया था, तत्कालीन सरकार को गिराया था, आरएसपी को अपना पूरा समर्थन दिया था और 35 वर्षीय पूर्व रैपर बलेंद्र शाह को नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता संभालने का मार्ग प्रशस्त किया था ।

पड़ोसी देश बांग्लादेश के युवाओं ने भी अपने देश के हालिया राजनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, हालांकि पिछले महीने हुए चुनाव में मतदाताओं ने अंततः दो स्थापित पार्टियों में से एक, यानी पुराने नेताओं को ही देश का नेतृत्व करने के लिए चुना।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के लिए, बांग्लादेश का चुनाव चीजों को करने के एक पुराने और परिचित तरीके की ओर इशारा करता है, लेकिन नेपाल के नए नेतृत्व के भू-राजनीतिक निहितार्थों का विश्लेषण करने के लिए उन्हें एक नए दृष्टिकोण की आवश्यकता हो सकती है।

भारत उन देशों में से एक है जिन्हें नेपाल के प्रति इस तरह के नए दृष्टिकोण की आवश्यकता हो सकती है।

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को अपने फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट किया कि उनकी आरएसपी नेताओं के साथ "सौहार्दपूर्ण टेलीफोन वार्ता" हुई और उन्होंने "अपनी शुभकामनाएं दीं", साथ ही दोनों पड़ोसी देशों की "आपसी समृद्धि, प्रगति और कल्याण" के लिए नई सरकार के साथ काम करने की भारत की प्रतिबद्धता का उल्लेख किया।

जनरेशन Z के कई प्रदर्शनकारियों और मतदाताओं को 2015 और 2016 की कड़वी यादें जरूर होंगी, जब दक्षिणी मैदानी इलाकों में सीमा नाकाबंदी लागू कर दी गई थी, जिससे भारत से खाद्य पदार्थों, दवाओं और ईंधन का आयात आधे साल तक रुक गया था। कमी का सामना करते हुए, काठमांडू और अन्य शहरों के कई भोजनालय केवल कुछ ही व्यंजन परोस पा रहे थे, जिन्हें स्थानीय लोग व्यंग्यपूर्वक "मोदी मेनू" कहते थे।

उस समय नई दिल्ली ने दावा किया था कि वह नाकाबंदी के पीछे नहीं थी, लेकिन काठमांडू को लगा कि भारत इसमें शामिल था और सरकार ने अंततः उन दबावों को कम करने और आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को मजबूत करने के लिए चीन की ओर रुख किया।

फिलहाल, नई दिल्ली काठमांडू के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करना चाहती है। मोदी के इस बयान में यह इरादा स्पष्ट रूप से झलकता है: "मुझे विश्वास है कि हमारे संयुक्त प्रयासों से भारत और नेपाल के संबंध आने वाले वर्षों में नई ऊंचाइयों को छुएंगे।"

लेकिन सीमा विवाद जैसे लंबे समय से चले आ रहे मुद्दे द्विपक्षीय संबंधों पर हमेशा ही नकारात्मक प्रभाव डालते रहेंगे। मोदी सरकार को नेपाल की नई पीढ़ी (जेनरेशन जेड) से निपटना भी सीखना होगा, जो देश की राजनीतिक व्यवस्था को बदलने की क्षमता से सशक्त हुई है । चीन सहित हिमालयी क्षेत्र के देशों को भी भू-राजनीतिक गणनाओं में इन नए बदलावों को ध्यान में रखना होगा।

निकी एशिया से साभार

 

पश्चिम एशिया-युद्ध में वैश्विक-मीडिया की भूमिका


पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई की स्थिति को समझने के लिए ज्यादातर लोग मुख्यधारा के मीडिया पर निर्भर हैं। इंटरनेट के आगमन के बाद से मीडिया के स्वरूप में भारी बदलाव आया है।

युद्ध की कवरेज आसान नहीं होती। इसके दो कारण हैं। एक तरफ मौत का खतरा और दूसरी तरफ सरकारों की बंदिशें। इस कवरेज में पारदर्शिता नहीं होती। कोई देश पत्रकारों को छूट नहीं देता।

अलबत्ता मीडिया की टेक्नोलॉजी में बदलाव आने से सूचनाओं की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ी है। पर सब सही तथ्य नहीं होते। अफवाहें और प्रचार भी खबरों के लिफाफे में लपेट कर पेश किए जाते हैं। इस समय ऐसा ही हो रहा है।

1991 के खाड़ी युद्ध के बाद अमेरिका की टाइम पत्रिका ने वर्ष के व्यक्ति (मैन ऑफ द इयर) के रूप में मीडिया जगत के दिग्गज टेड टर्नर को नामित किया, जिनके केबल न्यूज नेटवर्क (सीएनएन) ने युद्ध की लाइव कवरेज करके मीडिया-कवरेज के एक नए आयाम का उद्घाटन किया था।

उसके बाद से समाचार की परिभाषा किसी घटना के घटित हुआ था या उसकी विलंबित सूचना से बदलकर, जैसा घटित हो रहा है, हो गई।’ टाइम पत्रिका ने लिखा, घटनाओं की गतिशीलता को प्रभावित करने और 150 देशों के दर्शकों को इतिहास का तात्कालिक गवाह बनाने के लिए, रॉबर्ट एडवर्ड टर्नर को 1991 के लिए टाइम पत्रिका का 'मैन ऑफ द ईयर' चुना गया है।’

समाचार मीडिया के रूप में टेलीविजन के उदय ने पत्रकारों के एक ताकतवर तबके का उदय भी किया। सीएनएन के लैरी किंग का टॉक शो अमेरिकी राजनीति का सबसे महत्त्वपूर्ण शो बन गया और लैरी किंग को किंग ऑफ किंग्स कहा गया।

एम्बैडेड पत्रकारिता

1991 की लड़ाई के बाद 2003 में पत्रकारिता की एक नई विधा का जन्म हुआ, जिसे एम्बैडेड पत्रकारिता (Embedded Journalism) नाम दिया गया। उस दौरान कुछ पत्रकारों ने युद्ध या सशस्त्र संघर्ष के दौरान सीधे मिलिट्री यूनिट के साथ रहते हुए रिपोर्टिंग की।

बेशक उस कवरेज में बहुत सी जानकारियाँ विश्वसनीय होती थीं, पर बहुत से वे बातें, जिन्हें सेना छिपाना चाहती थीं, छिपा ली जाती थीं।

सूचनाओं की रिपोर्टिंग के साथ पत्रकारिता की साख जुड़ी है। आज के सोशल मीडिया-युग में इस साख को बनाए रखने के सवाल भी उभर कर सामने आ रहे हैं। ये सवाल पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई के सिलसिले में भी उठे हैं।

इस बीच मैंने सामग्री की तलाश की तो तीन जानकारियाँ मुझे मिलीं, जिन्हें मैं आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ। इनके पहले इसराइली व्यवस्था के आलोचक माने जाने वाले मीडिया हाउस हारेट्ज़ की एक रिपोर्ट साथ ही टाइम्स ऑफ इसराइल में प्रकाशित एक रिपोर्ट को भी पढ़ें। इस पूरे विवरण में मैंने भारतीय मीडिया को शामिल नहीं किया है। उसके लिए अलग से लिखना होगा। 

Tuesday, March 10, 2026

कब और कैसे खत्म होगा ‘शह और मात’ का खेल?

 


पश्चिम एशिया में पहले से इस बात का इमकान था कि लड़ाई शुरू होने वाली है, पर आज कहना मुश्किल है कि वह कब और कैसे खत्म होगी. चौतरफा बयानबाज़ी से लगता है कि वह आसानी से तो खत्म नहीं होगी.

कुछ भरोसा बैकरूम-विमर्श पर है, जो किसी न किसी स्तर पर चल रहा है. इसमें चीन ने पहल की है. चीनी विदेशमंत्री वांग यी ने अपने 'ग्लोबल सिक्योरिटी इनीशिएटिव' के तहत मध्यस्थता की पेशकश की है.  

'ग्लोबल सिक्योरिटी इनीशिएटिव' चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा अप्रैल 2022 में प्रस्तावित एक सुरक्षा अवधारणा है, जो अविभाज्य सुरक्षा के सिद्धांत पर आधारित है. इसका उद्देश्य पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका के नेतृत्व वाली व्यवस्था की जवाबी वैश्विक सुरक्षा का ढाँचा तैयार करना है.

गहरी दरारें

इसके पहले भी इस इलाके में 1991 और 2003 में लड़ाई हुई है, पर सही मानों में असली खाड़ी युद्ध इस बार ही हुआ है. फारस की खाड़ी से सटे सभी आठ देश, साथ ही आधा दर्जन से ज़्यादा दूसरे देश भी इसमें शामिल हैं.

लड़ाई रुकी भी, तो इस इलाके की शक्ल और भावनात्मक रिश्ते पहले जैसे नहीं रहेंगे. अब्राहमिक धर्मों और समाज की ऐतिहासिक दरारें और गहरी होंगी.

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने शनिवार को कहा कि हम अब अपने पड़ोसी देशों को तब तक निशाना नहीं बनाएँगे, जब तक कि हमले उनके क्षेत्र से न किए जाएँ. बावज़ूद इसके हमले अभी ज़ारी हैं. शायद पेज़ेश्कियान की बात अपने देश में उतननहीं मानी जाती, जितनी हम समझते हैं.

Friday, March 6, 2026

औद्योगिक-आत्मनिर्भरता के प्रवेशद्वार पर भारत

भारत ने हाल में कुछ ऐसे औद्योगिक क्षेत्रों में प्रवेश किया है, जो अपेक्षाकृत नए हैं और जिनमें भारी पूँजी निवेश की ज़रूरत होती है। ये क्षेत्र हैं: आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, अक्षय ऊर्जा और रक्षा उत्पादन। इसके अलावा हमारा परंपरागत वस्त्र और परिधान-उद्योग, ऑटोमोबाइल्स, फार्मा और सॉफ्टवेयर उद्योग पहले से ज्यादा मजबूती के साथ अपने कदम बढ़ा रहा है। इन बातों का सकल परिणाम है: नई पूंजी+ नई तकनीक=औद्योगिक गुणवत्ता में सुधार। हमारे वस्त्र, ऑटो पार्ट्स, औषधियाँ, केमिकल ज़्यादा प्रतिस्पर्धी बनेंगे। इससे निर्यात-आधारित उद्योगों को सीधा फ़ायदा मिलेगा। नतीजा: उत्पादन बढ़ेगा, रोज़गार बढ़ेगा, उद्योगों का विस्तार होगा।

इस प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए हमें दो स्तरों पर काम करने की ज़रूरत है। एक स्तर छोटे और मध्यम दर्जे के उद्योगों का है, जो बड़ी संख्या में रोज़गार उपलब्ध कराते हैं और आम उपभोग की वस्तुएँ तैयार करते हैं। ऐसे उद्योग भी तभी सफल होंगे, जब हमारे पास नवीनतम उच्चस्तरीय तकनीक होगी। साथ ही हमें ऐसे सामाजिक विकास की ज़रूरत है, जो बड़ी संख्या में लोगों की समृद्धि का कारण बने। जब लोगों के पास पैसा होगा, तभी वे अपनी ज़रूरत की चीज़ें खरीदेंगे। जब उनका उपभोग बढ़ेगा, तब औद्योगिक विकास भी होगा।

भारी उद्योगों की भूमिका

हमने ऊपर जिन उद्योगों का ज़िक्र किया है, उनमें से ज्यादातर भारी उद्योगों की श्रेणी में आते हैं। भारी उद्योगों से आशय उन बड़े पैमाने के विनिर्माण उद्यमों से है, जिनमें भारी मात्रा में पूँजी, जटिल मशीनरी और कच्चे माल का उपयोग होता है। ये उद्योग, जैसे इस्पात, भारी इंजीनियरिंग, मशीनरी, सीमेंट, पोत और विमान निर्माण और ऑटोमोबाइल आदि बुनियादी ढाँचे के विकास, अन्य उद्योगों के लिए मशीनें बनाने और अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

Wednesday, March 4, 2026

पश्चिम एशिया को इस ‘भँवर’ से निकालना मुश्किल होगा


अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने ईरान पर हमला करके, जो लंबा दाँव खेला है, उसके कारण पश्चिम एशिया का भविष्य फिलहाल अनिश्चित नज़र आने लगा है. लगता है कि भानुमती के पिटारे की तरह एक के बाद एक नई चीजें सामने आ रही हैं और अभी आएँगी।

उनका यह ऑपरेशन 'एपिक फ्यूरी' नए क्षेत्रीय संघर्षों को भी जन्म दे गया है, जिनमें अमेरिका फँसा तो उससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा. ट्रंप ने एक वीडियो में ईरानी जनता को संबोधित करते हुए, कहा देश की सत्ता पर ‘आपको कब्ज़ा करना होगा. यह संभवतः पीढ़ियों के लिए आपको मिला एकमात्र मौका है.’

पर्यवेक्षकों का कहना है कि ईरान का इस्लामिक गणराज्य एक वैचारिक प्रणाली है, जिसमें बहुस्तरीय अभिजात वर्ग और समर्थन का आधार है. हो सकता है कि हाल के वर्षों में यह समर्थन कम हुआ हो, पर वह सत्ता बनाए रखने की ताकत रखता है. बमबारी से पस्त और घायल होने के बावज़ूद यह धार्मिक व्यवस्था खड़ी रहेगी.

इस आक्रमण के बाद जहाँ एकाध अपवाद को छोड़कर पूरा यूरोप, अमेरिका और इसराइल के साथ खड़ा नज़र आ रहा है, वहीं रूस और चीन ने आयतुल्ला खामनेई की हत्या की निंदा की है.

चीन ने इसे 'संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों के ख़िलाफ़' बताया और कहा कि हम इसका सख़्त विरोध और कड़ी निंदा करते हैं. पर वे निंदा तक ही सीमित रह सकते हैं. वे जो भी करेंगे, दूर रहते हुए परोक्ष तरीकों से करेंगे, प्रत्यक्ष तरीके से नहीं. 

दुबई की पहचान खतरे में और पेट्रोलियम-संकट के आसार

 

28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिकी और इसराइली हमलों के जवाब में ईरान की जवाबी कार्रवाई ने दुबई की सुरक्षित छवि को हिलाकर रख दिया है। आलीशान कृत्रिम आवास पाम जुमेराह पर स्थित फेयरमों होटल पहले ही दिन आग की चपेट में आ गया। अमेज़न वैब सर्विसेज का एक डेटा सेंटर भी जल गया। विश्व की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय एयरलाइन, अमीरात एयरलाइंस का मुख्यालय और दुबई के पर्यटन व्यापार के लिए महत्वपूर्ण हवाई अड्डा क्षतिग्रस्त हो गया और उड़ानें स्थगित कर दी गईं। अमीरात के तेजी से विकसित हो रहे बंदरगाह और माल ढुलाई केंद्र, जबल अली, में परिचालन रोक दिया गया।

दुबई, संयुक्त अरब अमीरात ( यूएई ) के बाकी हिस्सों की तरह, अब तक इस स्थिति से अप्रभावित रहा था; युद्ध के दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन जो कुछ दिन पहले तक गुप्त रखा गया था, वह अब हकीकत बन गया है। हालांकि ज्यादातर विदेशी निवासी सुरक्षित हैं, कुछ लोग ओमान या सऊदी अरब के रास्ते, जहां हवाई क्षेत्र खुला है, कुछ समय के लिए ही सही, देश छोड़ रहे हैं या छोड़ने की योजना बना रहे हैं। अमेरिका के विदेश विभाग ने नागरिकों को क्षेत्र छोड़ने की सलाह दी है। व्यवसायी अभी टिके हुए हैं, लेकिन इमर्जेंसी योजनाएँ बना रहे हैं। सवाल यह है कि क्या दुबई को वैश्विक व्यापार केंद्र के रूप में विकसित करने वाले लोग और पैसा पहले की तरह आता रहेगा?

Tuesday, March 3, 2026

ईरानी आपदा पर चीन की चुप्पी

 

इकोनॉमिस्ट से साभार

ईरान के सुप्रीमो आयतुल्ला अली खामनेई की हत्या की चीन ने निंदा की है, पर उसने अमेरिका का उतना कड़ा विरोध नहीं किया है, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। इसके पीछे के कारणों को विशेषज्ञों ने समझने की कोशिश भी की है।

हांगकांग के अखबार साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट ने लिखा है कि चीन ने ईरान में अपने एक चीनी नागरिक की मौत और देश से अपने 3,000 नागरिकों को निकालने की पुष्टि की और शनिवार को रूस के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपातकालीन बैठक बुलाई और सैन्य कार्रवाई की निंदा की। सोमवार को रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ फोन कॉल में, चीन के शीर्ष राजनयिक वांग यी ने ईरान के सुप्रीमो आयतुल्ला अली खामनेई की हत्या की निंदा करते हुए इसे अस्वीकार्य बताया।

इस प्रकार के शाब्दिक विरोध के अलावा, चीन ने ईरान के लिए किसी प्रकार की ठोस मदद की पेशकश से परहेज किया है, ठीक वैसे ही जैसे उसने तब किया था जब इसराइल ने पिछले साल जून में ईरान के सैन्य और परमाणु स्थलों पर हमले किए थे।

बीजिंग की प्रतिक्रिया राजनयिक समर्थन देने और प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से बचने की उसकी पुरानी रणनीति के अनुरूप है, जैसा कि उसने जनवरी में वेनेजुएला के नेता निकोलस मादुरो के अमेरिकी अपहरण के समय भी किया था। लेकिन हमलों से एक दिन पहले प्रकाशित चैटम हाउस के एसोसिएट फैलो अहमद अबूदूह के एक विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका-ईरान विवाद में चीन के राजनयिक संयम को चीनी अविश्वसनीयता या उदासीनता के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए

अल्मोड़ा की होली


हिंदी की लोकप्रिय लेखिका गौरा पंत शिवानी ने अपनी आत्मकथा
सुनहु तात यह अकथ कहानी में एक जगह अल्मोड़ा की होली का बड़ा सुंदर विवरण दिया है, गौर करें:

होली आती तो अल्मोड़ा के छोटे से बाजार की शोभा ही द्विगुणित हो जाती…. पहाड़ की होली का तब अपना ही जादू था। आमल की एकादशी से होली की बैठकें लगतीं। मोट के दन (कालीन), उन पर बिछती दुग्ध-धवल चादरें, सफेद गिलाफ चढ़ा गाव-तकिया, उनका सहारा लिए लखनऊ की अम्बरी तम्बाकू की सुगन्धित धूम्र-रेखा से हुक्के का कश खचते प्रतिष्ठित व्यक्ति। थोड़ी ही देर में थाल के थाल जम्बू हुँके आलू और गोझे परिवेशित होते, पीतल के चमचमाते गिलासों में मसाले डली अदरक की चाय। फिर आरभ्भ होती बैठक होली

अपनों बीरन मोहे दे री ननदिया

मैं होली खेलन जाऊँ वृन्दावन।

           या

जाय पड़ईं पी के अंक

चाहे कलंक लगै री़

तबले पर संगत करते कुमाऊँ के अल्लारक्खा, दाम दा, हारमोनियम पर पहाड़ के जलगाँवकर, कांति दा; और रसीले कंठ का माधुर्य बिखेरते वे संगीत रसिक गायक, जिन्होंने न कभी विधिवत संगीत की शिक्षा पाई, न किसी गुरु का गंडा ही बाँधा। स्वयं विधाता ने जिनके कंठ में प्रतिभा को खूँटे की गाय-सा बाँधकर रख दिया था। न कह अश्लील प्रलाप, न छींटाकशी; वह मधुर स्वरलहरी, सम पार आती, तो वाह-वाह की साधुध्वनि छज्जे को गुंजायमान करती सड़क तक चली जाती।

राह चलते लोग ठिठककर खड़े हो जाते, ‘‘कौन गा रहा है यह? भवानी शाह या बद्रिया?’’

भारत की सतरंगी-संस्कृति का पर्व होली

रंगों की बौछार से कड़वाहटों को भुलाने का मौका

होली रंगों का त्योहार है, पर केवल रंग उड़ाने या मौज मस्ती तक सीमित नहीं है। अवध के इलाके में परंपरा है कि होली के बाद सब एक-दूसरे के गले मिलते हैं। यह क्रम करीब एक पखवाड़े तक चलता है। हरेक परिवार अपने पड़ोस के हरेक घर में होली मिलने जाता है। पड़ोसी उनके घर आते हैं। यह क्रम एक पखवाड़े से ज्यादा समय तक चलता है। ऐसी परंपराएँ होली को सामाजिक मेलजोल का सबसे बड़ा त्योहार बनाती हैं। पूरे देश में ऐसा ही कुछ किसी न किसी रूप में और किसी न किसी परंपरा के साथ होता है।

यह कई दिन चलने वाली गतिविधि है, जो चार महीनों की ठंडक के कारण जड़ीभूत निष्क्रियता को तोड़ने का काम करती है। पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों में इससे जुड़ी रोचक परंपराएँ हैं, जो केवल रंग बिखरने से ही नहीं जुड़ी है। इसके साथ खान-पान, संगीत, दस्तकारी और लोक कलाओं की जबर्दस्त परंपराएँ जुड़ी हुई हैं। होली के रंग ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, जाति और धर्म के बंधनों को तोड़कर, वैर-भाव भूलकर सभी को समान धरातल पर लाते हैं। यह पर्व सामाजिक सद्भाव और दोस्ताना समाज की स्थापना करता है।  

वसंत पंचमी से ही फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। प्रकृति भी इस समय खिली हुई होती है। सरसों के पीले फूल धरती को रंग देते हैं। गेहूँ की बालियाँ निकल आती हैं। आम पर बौर फूलने लगते हैं। किसान खुश होकर गीत गाते हैं। यह त्योहार सभी पृष्ठभूमि के लोगों को एक साथ लाता है, जाति, पंथ और उम्र की बाधाओं को पार करते हुए एकता और समुदाय की भावना को बढ़ावा देता है। क्षमा और मेल-मिलाप को प्रोत्साहित करता है। खुशी की बेलाग अभिव्यक्ति और कड़वाहटों को भुलाने का दिन।

सबसे पुराना त्योहार

जब हम इसके इतिहास पर जाते हैं, तब पता लगता है कि यह देश के सबसे पुराने त्योहारों में से एक है। इतिहासकारों के अनुसार आर्यों में इस पर्व का प्रचलन था। विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ से प्राप्त ईसा से 300 वर्ष पुराने एक अभिलेख में होली मनाए जाने का उल्लेख मिलता है। जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गाहय-सूत्र, नारद पुराण और भविष्य पुराण में भी इसका उल्लेख मिलता है। सातवीं शताब्दी के राजा हर्ष ने अपनी रचना 'रत्नावली' में होलिकोत्सव का उल्लेख किया है।

Saturday, February 28, 2026

केजरीवाल की वापसी


दिल्ली सरकार के आबकारी मामले में अदालत से छुट्टी पाने के बाद आम आदमी पार्टी ने बड़ी तेजी से गतिविधियाँ शुरू कर दी हैं, जिसकी शुरुआत रविवार 1 मार्च को जंतर-मंतर पर मेगा रैली से होगी। पार्टी का कहना है कि इसमें मोहल्ला क्लीनिक से हटाए गए डॉक्टर, नर्स और दस हजार बस मार्शल भी शामिल होंगे, जिन्होंने अपनी नौकरी खो दी। अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया, कंडक्टरों, बस मार्शलों, डॉक्टरों और फार्मेसिस्टों की ओर से मुद्दे उठाएँगे।

2025 के विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद अरविंद केजरीवाल खामोश हो गए थे, तब उन्होंने कहा था कि जब तक अदालत उन्हें निर्दोष साबित नहीं कर देती, तब तक उन्होंने चुप रहने का फैसला किया है। चूँकि अदालत ने उन्हें क्लीन चिट दे दी है, इसलिए संभवतः वे फिर से गरजते-बरसते दिखी पड़ेंगे। दिल्ली में विधानसभा चुनाव 2030 में होंगे, इसलिए फिलहाल उनकी सक्रियता का एक लक्ष्य राष्ट्रीय स्तर पर संगठन को मजबूत करने का होगा। दूसरे वे 2027 में पंजाब और गुजरात के चुनाव की तैयारी करेंगे, जहाँ उनकी पार्टी ने अपनी जगह बना ली है।

कांग्रेस की प्रतिक्रिया

कांग्रेस की शुरुआती प्रतिक्रिया से लगता है कि वह केजरीवाल की वापसी को वह बीजेपी की साजिश मानती है। बीजेपी देश भर में मुख्य विरोधी दल के रूप में आप को खड़ा करना चाहती है। कांग्रेस की तरफ से पवन खेड़ा ने इस मुद्दे को लेकर मोर्चा खोला है। उन्होंने केजरीवाल के बरी होने को भाजपा के कांग्रेस मुक्त अभियान का हिस्सा बता दिया। उन्होंने कहाभाजपा की तरफ से कांग्रेस मुक्त भारत का अभियान चलाया जा रहा है। इसी अभियान के तहत केजरीवाल और सिसोदिया को रिहा किया गया है। उन्होंने कहाअब आम आदमी पार्टी पंजाबतमिलनाडु हर जगह चुनाव लड़ेगी। खेड़ा ने कहा कि भाजपा चुनाव के लिए केजरीवाल को धोकर लाई है और विपक्ष में कौन होगायह भी बीजेपी तय करना चाहती है। राष्ट्रीय राजनीति मेंचूंकि इंडिया ब्लॉक के कई घटक दल कई मुद्दों पर कांग्रेस से सहमत नहीं हैंइसलिए केजरीवाल के फिर से जोश में लौटने से आम आदमी पार्टी की स्थिति अब और भी मजबूत होगी।

Tuesday, February 24, 2026

अपने ही ‘चक्रव्यूह’ में घिरने लगा ट्रंप-प्रशासन


अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ़ को अवैध घोषित करके राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की योजना को जहाँ बड़ा धक्का पहुँचाया है, वहीं अमेरिका और दुनिया की अर्थव्यवस्था को लेकर कई तरह की अनिश्चितताओं को जन्म भी दे दिया है.  

फैसले का एक निहितार्थ यह भी है कि वृहत स्तर पर अमेरिकी लोकतंत्र दुनिया पर एकपक्षीय राज करने का समर्थक नहीं है. और यह भी कि व्यापार-समझौते दोतरफा साझेदारी से तय होने चाहिए, एकतरफा अकड़ से नहीं. 

धक्का लगने के बावज़ूद ट्रंप की आक्रामकता में कमी नहीं आई है. उन्होंने फौरन एक नए आधार पर 10 प्रतिशत सार्वभौमिक टैरिफ की घोषणा कर दी, जिसे बाद में बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया है. पर इससे उनकी आर्थिक-रणनीति का लक्ष्य पूरा नहीं होगा.

ट्रंप के आर्थिक एजेंडा के कारण संघीय बजट में एक ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का छेद पैदा हो गया है. पिछले साल पदभार संभालने के बाद उन्होंने आयकर में भारी कटौती कर दी थी, जिसे लेकर अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी थी कि पहले से ही कर्ज़ में डूबे देश को मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा.

जवाब में ट्रंप प्रशासन ने व्यापक रणनीति तैयार की, जिसके तहत शेष विश्व से अमेरिकी बाजारों में आने वाली सामग्री पर भारी टैरिफ लगाना शामिल है. इससे दुनियाभर के देशों की आर्थिक-गतिविधियाँ प्रभावित होने के अलावा कुछ बोझ निम्न और मध्यम आय वाले अमेरिकियों पर भी पड़ा, क्योंकि ज़रूरत की चीजें महँगी होने लगीं.   

Friday, February 20, 2026

एआई फिज़ूल सपना नहीं, उसमें दम है

 


दिल्ली में गलगोटिया विवि के रोबोटिक डॉग औरड्रोन सॉकर एरीनाके कारण हुई फज़ीहत के बाद कुछ लोग पूछ रहे हैं कि आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में भारत वास्तव में क्या कुछ कर भी पाएगा? हमारे पास उसके लिए पर्याप्त तकनीकी आधार और टेलेंट है भी या नहीं? बहरहाल इस घटना ने सरकार समर्थित टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्मों पर स्वदेशी नवाचार की गलत व्याख्या की ओर देश का ध्यान आकर्षित किया है। साथ ही हमारे प्रचार-प्रिय सूचना तंत्र की पोल भी खोली है, जिससे सारी दुनिया में हमारी भद्द पिटी। सोशल-मीडिया के लिए ऐसी घटनाएँ चटपटे मसाले की तरह होती हैं, कुछ समय तक याद रहती हैं और फिर बिसरा दी जाती हैं। बहरहाल इस घटना ने हमें इसकी उपयोगिता और अपनी उपलब्धियों पर विचार करने की सलाह भी दी है।  

इसके पहले जनवरी में दावोस सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जिवा की इस टिप्पणी को लेकर भी विवाद हुआ था कि भारत 'सेकंड-टियर' एआई पावर है। राजनीति-शास्त्री आयन ब्रेमर ने भी इस बात का हवाला देते हुए कहा था कि नए उभरते देशों को अमेरिका या चीन के साथ तालमेल बिठाना चाहिए। इन दोनों बातों का तीखा जवाब देते हुए भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री, अश्विनी वैष्णव ने कहा, भारत एआई देशों क ‘साफ पहली कतार’ में है।

उन्होंने एआई आर्किटेक्चर की पाँच परतों के रूप में वर्णित भारत की प्रगति का विवरण दिया: एप्लीकेशन, मॉडल, चिप, बुनियादी ढाँचे और ऊर्जा के सभी पाँच स्तरों पर ' भारत अच्छी प्रगति' कर रहा है। उन्होंने स्टैनफर्ड विवि की एक रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें भारत को एआई प्रवेश और तैयारियों में तीसरे स्थान पर और वैश्विक स्तर पर एआई प्रतिभा में दूसरे स्थान पर रखा गया है। बाद में आईएमएफ की चीफ ने इस विवाद को ठंडा करते हुए कहा कि संगठन भारत की एआई प्रगति के लिए भारी प्रशंसा करता है। उन्होंने इस गलतफहमी के लिए मॉडरेटर को दोषी ठहराया।

Wednesday, February 18, 2026

बांग्लादेश की ‘लोकतांत्रिक’ पेचीदगियाँ


शेख हसीना के अपदस्थ होने के 18 महीने बाद, बांग्लादेश में जन-प्रतिनिधि सरकार की स्थापना हो गई है. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की भारी जीत के बाद अब वहाँ स्थिरता की उम्मीदें हैं.  

आम चुनाव के साथ संवैधानिक-सुधारों के लिए जनमत संग्रह भी हुआ है. तमाम बदलावों को जनता ने स्वीकार कर लिया है, पर असल सवाल है कि वास्तव में बांग्लादेश का लोकतंत्र कैसा होगा? वहाँ क्या शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण की व्यवस्था कायम हो पाएगी?

नए सांसदों ने शपथ ले ली है, लेकिन संवैधानिक सुधार परिषद को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. यह स्थिति इसलिए उत्पन्न हुई है क्योंकि बीएनपी सदस्यों ने सांसदों के रूप में शपथ तो ले ली, लेकिन प्रस्तावित परिषद के सदस्यों के रूप में शपथ नहीं ली. उन्होंने कहा कि संविधान में इस परिषद के लिए पद की शपथ लेने का कोई प्रावधान नहीं है.

यह सब मुहम्मद यूनुस की अस्थायी सरकार की देखरेख में हुआ, जो अपनी घोषणाओं के बावज़ूद बढ़ते सांप्रदायिक उन्माद और आर्थिक बदहाली को रोक नहीं पाई. भारत से रिश्ते बिगाड़ने में भी उसने कसर नहीं छोड़ी.  

दक्षिण एशिया में समावेशी-आधुनिकता और संकीर्ण सांप्रदायिक-प्रवृत्तियों का टकराव बड़ी समस्या है. भारत, पाकिस्तान या बांग्लादेश में होने वाली घटनाएँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं. तीनों के साझा अतीत में नकारात्मक और सकारात्मक दोनों बातें हैं.

Wednesday, February 11, 2026

ईरान से झगड़े क्या निपटा पाएँगे ट्रंप?


दुनिया भर में धूम-धड़ाके के बाद क्या अब अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ईरान के साथ अपने संघर्ष को खत्म करने जा रहे हैं? झगड़े निपटाने के माने क्या? ईरान की हार या बराबरी का समझौता?

बेशक, टकराव खत्म हुआ, तो इस इलाके की बड़ी समस्या खत्म हो जाएगी,  पर क्या ऐसा होगा? पिछले शुक्रवार को ओमान में हुई अप्रत्यक्ष-वार्ता के पहले दौर के बाद दोनों पक्षों ने इसे बहुत अच्छी शुरुआतबताया है.

यह बैठक मिस्र, तुर्की और खाड़ी देशों कोशिशों से तय हुई थी. इन देशों में से कोई भी क्षेत्रीय युद्ध नहीं चाहता. न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप प्रशासन भी लड़ाई टालने के लिए ईरान के साथ बात करना चाहता है.

हालाँकि दोनों पक्षों ने संकेत दिया है कि बातचीत के दौर भविष्य में भी होंगे, पर यह स्पष्ट नहीं है कि वार्ता कैसे आगे बढ़ेगी. अमेरिका के काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के अध्यक्ष माइकल फ्रोमैन के अनुसार, भविष्य की बातचीत में कई दिक्कतें आएँगी. ट्रंप का मनमौजी स्वभाव है और तयशुदा सौदों को रद्द करने की उनकी आदत है.  

Thursday, February 5, 2026

वॉशिंगटन पोस्ट में भारी छँटनी से मीडिया जगत में हंगामा

प्रतिष्ठित अमेरिकी अखबार द वॉशिंगटन पोस्ट में बड़े पैमाने पर हुई छँटनी दुनियाभर के पत्रकारों के बीच चिंता का विषय बन गई है। जेफ बेजोस की इस कंपनी ने अपने 30 प्रतिशत कर्मचारियों को निकाल दिया है, जिनमें 300 से ज्यादा पत्रकार शामिल हैं। अखबार ने भारत, मिस्र और ऑस्ट्रेलिया समेत अनेक देशों के अपने दफ्तरों को बंद करने की घोषणा की है। इसका सबसे ज्यादा असर अखबार के स्पोर्ट्स, लोकल न्यूज और इंटरनेशनल कवरेज पर पड़ा है।

पोस्ट के कार्यकारी संपादक मैट मरे ने कहा है कि छँटनी से अखबार मे ‘स्थिरता’ आएगी। लेकिन इस घोषणा की अखबार के कर्मचारियों और कुछ पूर्व अमेरिकी नेताओं ने कड़ी निंदा की, जिनमें से एक ने इसे प्रतिष्ठित अखबार के ‘इतिहास के सबसे काले दिनों’ में से एक बताया है। कुछ का कहना है कि छँटनी बताती है कि इंटरनेट के मार्फत सामान बेचकर दुनिया के सबसे अमीर लोगों में जगह बनाने वाले जेफ बेजोस, मुनाफे वाला अखबार चलाने का सही तरीका नहीं ढूँढ पाए हैं। उनके मालिक बनने के शुरुआती आठ वर्षों में अखबार का विस्तार हुआ, लेकिन हाल में उसकी रफ्तार धीमी पड़ गई ।

अमेरिकी पत्रिका द अटलांटिक ने लिखा: हम एक हत्या के साक्षी बन रहे हैं।  पोस्ट के अरबपति मालिक जेफ बेजोस और उनके द्वारा 2023 के अंत में नियुक्त प्रकाशक विल लुईस, अखबार की हर उस खासियत को खत्म करने की अपनी योजना के नवीनतम चरण पर आगे बढ़ रहे हैं, जो इसे विशिष्ट बनाती है। द पोस्ट लगभग 150 वर्षों से अस्तित्व में है, एक स्थानीय पारिवारिक अखबार से विकसित होकर एक अपरिहार्य राष्ट्रीय संस्था और लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक स्तंभ बन गया है। लेकिन अगर बेजोस और लुईस इसी राह पर चलते रहे, तो शायद यह ज्यादा समय तक टिक न पाए।

पिछले कुछ वर्षों में, उन्होंने बार-बार न्यूज़ रूम में कटौती की है—रविवार की पत्रिका बंद कर दी, कर्मचारियों की संख्या में सैकड़ों की कमी की, मेट्रो डेस्क को लगभग आधा कर दिया—लेकिन इस स्थिति तक पहुँचने वाले खराब व्यावसायिक निर्णयों को स्वीकार नहीं किया और न ही भविष्य के लिए कोई स्पष्ट योजना प्रस्तुत की। आज सुबह, कार्यकारी संपादक मैट मरे और एचआर प्रमुख वेन कॉनेल ने सुबह-सुबह एक वर्चुअल मीटिंग में न्यूज़ रूम के कर्मचारियों को बताया कि वे खेल विभाग और पुस्तक अनुभाग को बंद कर रहे हैं, अपने प्रमुख पॉडकास्ट को समाप्त कर रहे हैं, और अंतर्राष्ट्रीय और मेट्रो विभागों में भारी कटौती कर रहे हैं, साथ ही सभी टीमों में भी बड़े पैमाने पर छंटनी कर रहे हैं। पोस्ट के नेतृत्व—जिनमें अपने कर्मचारियों से व्यक्तिगत रूप से बात करने का साहस भी नहीं था—ने फिर सभी को एक ईमेल का इंतजार करने के लिए छोड़ दिया, जिसमें उन्हें बताया जाएगा कि उनकी नौकरी रहेगी या नहीं।

पोस्ट की छँटनी को लेकर न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित रिपोर्ट

वॉशिंगटन पोस्ट ने बुधवार को कर्मचारियों को बताया कि वह छंटनी का एक व्यापक दौर शुरू कर रहा है, जिससे संगठन के खेल, स्थानीय समाचार और अंतर्राष्ट्रीय कवरेज को नुकसान पहुंचने की आशंका है। निर्णय की जानकारी रखने वाले दो लोगों के अनुसार, कंपनी अपने सभी कर्मचारियों में से लगभग 30 प्रतिशत को नौकरी से निकाल रही है। लोगों ने कहा कि इसमें व्यवसायिक पक्ष के लोग और न्यूज़ रूम के लगभग 800 पत्रकारों में से 300 से अधिक शामिल हैं।

कटौती इस बात का संकेत है कि जेफ बेजोस, जो इंटरनेट पर चीजें बेचकर दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक बन गए, अभी तक यह नहीं समझ पाए हैं कि इंटरनेट पर एक लाभदायक प्रकाशन कैसे बनाया और बनाए रखा जाए। उनके स्वामित्व के पहले कई वर्षों के दौरान अखबार का विस्तार हुआ, लेकिन कंपनी हाल ही में तेजी से आगे बढ़ी है।

 

द पोस्ट के कार्यकारी संपादक मैट मरे ने बुधवार सुबह न्यूज़ रूम के कर्मचारियों के साथ एक कॉल पर कहा कि कंपनी को बहुत लंबे समय से बहुत अधिक धन का नुकसान हुआ है और वह पाठकों की ज़रूरतों को पूरा नहीं कर पा रही है। उन्होंने कहा कि सभी वर्ग किसी न किसी तरह से प्रभावित होंगे, और इसका परिणाम यह होगा कि एक प्रकाशन राष्ट्रीय समाचार और राजनीति के साथ-साथ व्यवसाय और स्वास्थ्य पर और भी अधिक केंद्रित होगा, और अन्य क्षेत्रों पर बहुत कम।

 

मरे ने कहा, ‘अगर कुछ भी हो, तो आज का दिन अधिक भीड़भाड़, प्रतिस्पर्धी और जटिल होते मीडिया परिदृश्य में लोगों के जीवन के लिए खुद को और अधिक आवश्यक बनने के लिए तैयार करना है।’’और कुछ वर्षों के बाद, स्पष्ट रूप से, द पोस्ट को संघर्ष करना पड़ा।’

मरे ने एक ईमेल में तर्क को आगे समझाते हुए कहा कि पोस्ट ‘एक अलग युग में निहित है, जब हम एक प्रमुख, स्थानीय प्रिंट उत्पाद थे’ और ऑनलाइन खोज ट्रैफ़िक, आंशिक रूप से जेनरेटिव एआई के उदय के कारण, पिछले तीन वर्षों में लगभग आधे से गिर गया था। उन्होंने कहा कि द पोस्ट का ‘दैनिक स्टोरी आउटपुट पिछले पांच वर्षों में काफी हद तक गिर गया है।’

उन्होंने कहा, ‘भले ही हम कई बेहतरीन काम करते हैं, हम अक्सर एक ही नजरिए से, दर्शकों के एक वर्ग के लिए लिखते हैं।’

पोस्ट का खेल अनुभाग बंद हो जाएगा, हालांकि इसके कुछ रिपोर्टर वहीं रहेंगे और खेल की संस्कृति को कवर करने के लिए फीचर विभाग में चले जाएंगे। पोस्ट का मेट्रो अनुभाग सिकुड़ जाएगा, और पुस्तक अनुभाग बंद हो जाएगा, साथ ही ‘पोस्ट रिपोर्ट’ दैनिक समाचार पॉडकास्ट भी बंद हो जाएगा।

मरे ने कर्मचारियों से कहा कि जबकि द पोस्ट का अंतरराष्ट्रीय कवरेज भी कम हो जाएगा, पत्रकार लगभग एक दर्जन स्थानों पर बने रहेंगे। पश्चिम एशिया के साथ-साथ भारत और ऑस्ट्रेलिया में रिपोर्टरों और संपादकों को नौकरी से हटा दिया गया।

उनके निर्णय की जानकारी रखने वाले दो लोगों के अनुसार, अनुभाग के संपादक, पीटर फिन ने अनुरोध किया कि जब उन्हें कटौती के दायरे के बारे में पता चला तो उन्हें कटौती की योजना बनाने में शामिल होने के बजाय हटा दिया जाए।

 

जैसे ही कर्मचारियों को नौकरी से निकाले जाने की सूचना देने वाले ईमेल इनबॉक्स में आने लगे, द पोस्ट के पत्रकारों ने अपने सहकर्मियों को सूचित करना शुरू कर दिया कि उनके पदों में कटौती कर दी गई है। ‘हटा दिया गया,’ हटा दिया गया,’ ‘हटा दिया गया,’ उन्होंने एक दूसरे को संदेश भेजे।

बेजोस ने द पोस्ट के लिए फायदे का रास्ता खोजने के लिए 2023 के अंत में विल लुईस को प्रकाशक के रूप में नियुक्त किया, जो दर्शकों में गिरावट और घटती सदस्यता से पीड़ित था। लुईस ने संगठन को बदलने के लिए कई बदलावों का प्रयोग किया है, विशेष रूप से टिप्पणियों, पॉडकास्ट और समाचार एकत्रीकरण को सशक्त बनाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अपनाया है।

उनका अधिकांश कार्यकाल उथल-पुथल भरा रहा है, जिसमें न्यूज रूम नेतृत्व में बदलाव और न्यूज कॉर्प के लिए काम करने के दौरान फोन-हैकिंग घोटाले में उनके संबंधों की जांच शामिल है। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव से ठीक पहले, श्री लुईस ने द पोस्ट के संपादकीय बोर्ड द्वारा राष्ट्रपति पद के समर्थन को समाप्त करने के लिए श्री बेजोस की एक नई नीति की घोषणा की, जिसने डेमोक्रेटिक उम्मीदवार, उपराष्ट्रपति कमला हैरिस के मसौदा समर्थन को अवरुद्ध कर दिया। प्रतिक्रिया में सैकड़ों हजारों पोस्ट ग्राहकों ने अपनी सदस्यता रद्द कर दी।

2024 में एक स्टाफ मीटिंग में, लुईस ने आगाह किया कि पोस्ट संकट में है। उन्होंने कहा, ‘हम बड़ी मात्रा में पैसा खो रहे हैं।’ हाल के वर्षों में हमारे पाठक दर्शक आधे हो गए हैं। लोग आपकी सामग्री नहीं पढ़ रहे हैं।’

2024 के अंत में, बेजोस ने द न्यूयॉर्क टाइम्स द्वारा आयोजित एक सम्मेलन में एक साक्षात्कार में संघर्ष का वर्णन किया: ‘हमने वाशिंगटन पोस्ट को एक बार बचाया, और हम इसे दूसरी बार बचाने जा रहे हैं।’

प्रॉफिट हासिल करने के संघर्ष में प्रकाशकों के बीच पोस्ट अकेला नहीं है। कई आउटलेट्स के लिए, प्रिंट सर्कुलेशन लगातार कम हो रहा है, जेनरेटर एआई के कारण डिजिटल ट्रैफिक में बाधा आ रही है और दर्शक विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर बंट गए हैं। घाटे की भरपाई के लिए प्रकाशकों को विभिन्न राजस्व धाराओं, जैसे इवेंट और प्रीमियम सदस्यता, के साथ प्रयोग करना पड़ा है।

 

‘यह अमेरिकी पत्रकारिता, वाशिंगटन शहर और पूरे देश के लिए एक दुखद दिन है,’ द पोस्ट के मुख्य आर्थिक संवाददाता जेफ स्टीन ने कहा, जो बुधवार को निकाले गए लोगों में से नहीं थे।

न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक बयान में उन्होंने कहा, ‘मैं उन पत्रकारों के लिए शोक मना रहा हूं जिन्हें मैं प्यार करता हूं और जिनके काम ने पेशे के सबसे सच्चे और सबसे महान आह्वान को बरकरार रखा है।’’उन्हें उन गलतियों के लिए दंडित किया जा रहा है जो उन्होंने नहीं कीं।’

डॉन ग्राहम, जिनके परिवार के पास आधी सदी से भी अधिक समय तक द पोस्ट का स्वामित्व था और उन्होंने वॉटरगेट को ब्रेक करने वाले पहले दर्जे के समाचार पत्र में इसके विस्तार की देखरेख की, ने फेसबुक पर एक पोस्ट में कहा कि उन्हें ‘पेपर पढ़ने का एक नया तरीका सीखना होगा, क्योंकि मैंने 1940 के दशक के अंत से खेल पेज के साथ शुरुआत की है।’

द पोस्ट के पूर्व कार्यकारी संपादक, मार्टी बैरन ने एक बयान में कहा कि बुधवार ‘दुनिया के सबसे महान समाचार संगठनों में से एक के इतिहास में सबसे काले दिनों में से एक है।’

बैरन ने लिखा, ‘वाशिंगटन पोस्ट की महत्वाकांक्षाएं तेजी से कम हो जाएंगी, इसके प्रतिभाशाली और बहादुर कर्मचारी और भी कम हो जाएंगे और जनता को हमारे समुदायों और दुनिया भर में जमीनी स्तर, तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग से वंचित कर दिया जाएगा, जिसकी पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है।’

इस अखबार में कांग्रेस के नेता शशि थरूर के पुत्र ईशान थरूर भी काम करते थे। उन्हें भी हटा दिया गया है। उन्होंने एक्स पर अपने ट्वीट में इस बात पर अफसोस व्यक्त किया है। पोस्ट के दिल्ली ब्यूरो चीफ प्रांशु वर्मा ने एक्स पर पोस्ट किया:

यह बताते हुए बहुत दुख हो रहा है कि मुझे वाशिंगटन पोस्ट से हटा दिया गया है। मेरे कई प्रतिभाशाली दोस्त भी चले गए, उनके लिए दुख है। पिछले चार वर्षों से यहां काम करना सौभाग्य की बात है। अखबार के नई दिल्ली ब्यूरो प्रमुख के रूप में काम करना एक सम्मान की बात थी।

 


 

Wednesday, February 4, 2026

पश्चिम एशिया की भूल-भुलैया में भारत


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस महीने संभावित इसराइल-यात्रा से पहले, पिछले शनिवार को अरब विदेश मंत्रियों के साथ दूसरी बैठक की मेजबानी करके भारत ने स्पष्ट कर दिया कि पश्चिम एशिया में हमारी गहरी दिलचस्पी है और इस इलाके के आर्थिक-विकास में हम भी भागीदार हैं.

केवल इस इलाके की बात ही नहीं है, बल्कि विश्व-राजनीति में भी भारत की सक्रिय भूमिका बढ़ने जा रही है. यूके, ईयू और अमेरिका के साथ व्यापार और दीर्घकालीन नीतिगत समझौते होने के बाद यह स्पष्ट होता है कि भारत की अर्थव्यवस्था पश्चिमी देशों के साथ ज्यादा बड़े स्तर पर जुड़ने जा रहा है.

बेहतर तरीके से वैश्विक-संतुलन बनाने में भारत भी महत्त्वपूर्ण किरदार निभाएगा. अरब विदेशमंत्रियों की बैठक की पृष्ठभूमि में डॉनल्ड ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस के गठन और उसमें शामिल होने के लिए भारत को प्राप्त आमंत्रण और उसपर चुप्पी पर भी ध्यान देना होगा. अकसर लोगों को लगता है कि भारत ने प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. पश्चिम एशिया की जटिलता को देखते हुए तीखी प्रतिक्रियाएँ संभव नहीं है. संज़ीदा डिप्लोमेसी से ऐसी उम्मीद करनी भी नहीं चाहिए.

ध्यान दें कि गज़ा क्षेत्र के पुनर्निर्माण में भारत के लोगों और कंपनियों को भी काम मिलेगा. दूसरी तरफ ईरान में चल रहे आंदोलन और उसे लेकर अमेरिकी धमकियों पर भी हमें निगाहें रखनी होंगी. विदेश-नीति केवल नैतिक-आधारों पर नहीं चलती हैं. वे राष्ट्रीय हितों पर आधारित होती है. पश्चिम एशिया की डगर आसान नहीं है, क्योंकि वहाँ हर कदम पर जोखिम हैं, फिर भी भारतीय डिप्लोमेसी वहाँ संतुलित और शालीन तरीके से आगे बढ़ रही है.