Sunday, December 20, 2015

अपने संरक्षकों की बेरुखी का शिकार नेशनल हेरल्ड

नेशनल हेरल्ड अख़बार को कांग्रेस पार्टी के उत्थान और पतन के साथ जोड़कर भी देखा जाना चाहिए. सन 1938 में जब यह अख़बार शुरू हुआ था देश में 11 प्रांतीय असेम्बलियों के पहली बार हुए चुनावों में से आठ में जीत हासिल करके कांग्रेस ने अपनी धाक जमाई थी. और 2008 में जब यह बंद हुआ कांग्रेस का पराभव शुरू हो चुका था.

अख़बार के मास्टहैड के ठीक नीचे उद्देश्य वाक्य लिखा रहता था, फ्रीडम इज़ इन पेरिल, डिफेंड इट विद ऑल योर माइट-जवाहर लाल नेहरू (आज़ादी खतरे में है, अपनी पूरी ताकत से इसकी रक्षा करो). यह वाक्य एक पोस्टर से उठाया गया था, जिसे सन 1939 में इंदिरा गांधी ने ब्रेंटफोर्ड, मिडिलसेक्स से नेहरू जी को भेजा था. यह ब्रिटिश सरकार का पोस्टर था. नेहरू को यह वाक्य इतना भा गया कि इसे उन्होंने अपने अख़बार के माथे पर चिपका दिया. दुर्भाग्य है कि नेहरू के वारिस तमाम बातें करते रहे, पर वे इस अख़बार और उसके संदेश की रक्षा करने में असफल रहे.

नेहरू के जीवनी लेखक बेंजामिन ज़कारिया ने लिखा है,  कांग्रेस की आंतरिक खींचतान में उलझने के कारण जब जवाहर लाल नेहरू को लगा कि मैं पर्याप्त रूप से देश और समाज पर असर नहीं डाल पा रहा हूँ तो उन्होंने पत्रकारिता की शरण में जाने का फैसला किया. सन 1936 में उनके मन में अपना अख़बार निकालने का विचार आया और 9 सितंबर, 1938 को नेशनल हेरल्ड का पहला अंक लखनऊ से निकला. इसके पहले सम्पादक के रामाराव थे. ज़कारिया के अनुसार यह अख़बार लगातार आर्थिक संकटों का सामना करता रहा. पहले दो साल अख़बार निकालने के लिए लगातार रुपयों और न्यूजप्रिंट की कमी पेश आती रहती थी.

वरिष्ठ पत्रकार दुर्गा दास में लिखा है कि सन चालीस के दशक के शुरूआती दिनों में नेहरू और देवदास गांधी के बीच अख़बार के कारण कड़वाहट रहती थी. महात्मा गांधी के सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी तब हिन्दुस्तान टाइम्स के सम्पादक थे. नेहरू न्यूजप्रिंट के लिए उनकी मदद माँगते थे, पर देवदास गांधी इसके लिए तैयार नहीं थे, बल्कि वे इस अख़बार को अपना प्रतिद्वंद्वी मानते थे. हालांकि 15 अगस्त 1942 को जब अख़बार का प्रकाशन पहली बार बंद हुआ तो उसके कर्मचारियों को हिन्दुस्तान टाइम्स में जगह दी गई. उनमें एम चेलापति राव भी थे, जो बाद में इसके प्रधान सम्पादक बने.

सन 1942 में अख़बार बंद होने के पीछे कई कारण थे. भारत छोड़ो आंदोलन के कारण कांग्रेस के नेता जेलों में थे, ब्रिटिश सरकार की नीतियों के कारण अख़बार निकालना मुश्किल काम था. ऊपर से आर्थिक संकट था. इसके बाद 11 नवम्बर 1945 को इसमें फिर से प्राण डाले गए. अंततः 1 अप्रैल 2008 को यह अख़बार अंतिम रूप से बंद हो गया, हालांकि तब उस बंदी को अस्थायी कहा गया था.

हालांकि मुझे हेरल्ड हाउस में काम करने का मौका नहीं मिला, पर सत्तर के दशक के शुरूआती दिनों में वहाँ जाने का अवसर खूब मिला. पायनियर हाउस में काम करते हुए भी हमें हेरल्ड से खास स्नेह था, अक्सर ईर्ष्या भी. उस जमाने में चेलापति राव दिल्ली चले गए थे और लखनऊ में सीएन चितरंजन स्थानीय सम्पादक थे. नवजीवन के सम्पादक तब कृष्ण कुमार मिश्र थे, जो दिल्ली के इंडियन एक्सप्रेस से वापस आए थे. नवजीवन के प्रसिद्ध सम्पादकों में लक्ष्मण नारायण गर्दे और भगवती चरण वर्मा जैसे नाम थे. ज्ञान चंद जैन भी वहाँ से जुड़े रहे. हमारे तमाम दोस्त वहाँ काम करते थे, जिनमें से कई साथियों के साथ बाद में हमने काम भी किया.

लखनऊ के कैसरबाग का हेरल्ड हाउस साठ और सत्तर के दशक में भारतीय राजनीति और पत्रकारिता का शक्ति स्रोत था. इसके तीनों अख़बार गुणवत्ता के लिहाज से श्रेष्ठ माने जाते थे. हम ज्यादातर नेशनल हेरल्ड का जिक्र सुनते हैं, पर इसके हिन्दी अख़बार नवजीवन और उर्दू अख़बार क़ौमी आवाज़ को भी याद किया जाना चाहिए. नवजीवन महात्मा गांधी के प्रसिद्ध पत्र के नाम पर 1947 में निकाला गया था, जिसके लिए गांधी जी से खास अनुमति ली गई थी. उसके प्रकाशन के पीछे फिरोज गांधी और रफी अहमद किदवई का विशेष योगदान था. क़ौमी आवाज़ जैसे उर्दू अख़बार का बंद होना देश का दुर्भाग्य है. प्रसिद्ध साहित्यकार हयातुल्ला अंसारी और इशरत अली सिद्दीकी जैसे नामी सम्पादक इसके साथ जुड़े रहे. यह अख़बार जब बंद हुआ तब भी घाटे में नहीं था. इसे उर्दू के सर्वश्रेष्ठ पत्रकारों की कर्तव्यनिष्ठ सेवा मिली.

हेरल्ड हाउस पर कांग्रेसी ठप्पा लगा होने के बावजूद इन अखबारों की प्रतिष्ठा कम नहीं थी. वे पाठक की आवाज थे. इस समूह की सबसे बड़ी परीक्षा इमर्जेंसी के दौरान हुई. हेरल्ड अकेला अख़बार था, जिसमें उस वक्त सरकार की आलोचना का साहस था. जहाँ दूसरे अख़बार संजय गांधी की प्रशस्ति से भरे होते थे, हेरल्ड में उनकी खबर नहीं छपती थी. इतनी प्रतिष्ठा और पाठकों के जबर्दस्त समर्थन के बावजूद अस्सी के दशक में इस अख़बार का पराभव होता चला गया. यह अख़बार पाठकों से विमुख तब हुआ जब संरक्षकों ने इसकी उपेक्षा शुरू कर दी. 

अख़बार प्रबंधकीय नीतियों का शिकार हो गया. वे इसकी आय बढ़ाने की जुगत में लगे रहे, बाकी बातें भूल गए. लखनऊ में इसकी पुरानी इमारत को गिराकर कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स बनाया गया. देश के अलग-अलग राज्यों में कांग्रेस सरकारें होने का लाभ हेरल्ड को जमीन के रूप में जरूर मिला, पर अख़बार को उससे कोई फायदा नहीं हुआ. न तो इसका नेटवर्क बेहतर हुआ और न तकनीक का आधुनिकीकरण हुआ. लखनऊ के अलावा दिल्ली, मुम्बई, भोपाल और दूसरे शहरों में इस संस्थान के पास काफी सम्पत्ति जरूर जमा हो गई.

दोष इसके संचालकों की समझ में था. उनकी निगाहें सम्पत्ति को जमा करने तक सीमित रह गई और अख़बार का पतन होता गया. वे रियल एस्टेट जोड़ने की जुगत में लगे रहे. उन्होंने कर्मचारियों की दिक्कतों से आँखें मूंद लीं. सन 1998 में अदालत के एक आदेश पर हेरल्ड की कुछ सम्पत्ति को नीलाम कर कर्मचारियों की देनदारी पूरी की गई. लखनऊ में हेरल्ड की बंदी के कारण बेरोजगार हुए कुछ पत्रकारों ने कुछ समय तक वर्कर्स हेरल्ड नाम से अख़बार भी निकाला, पर वह सफल नहीं हुआ.

सन 1978 में पायनियर हाउस में हम मिड शिफ्ट में काम कर रहे थे कि टेलीप्रिंटर पर खबर आई कि हेरल्ड में तालाबंदी हो गई है. यह खबर केवल हेरल्ड के ही नहीं, कांग्रेस के पराभव की कहानी लिख गई. उसके बाद हेरल्ड गिरता ही गया. बेशक उसके बाद 1980 और 1984 में कांग्रेस पार्टी चुनाव जीतकर आई, पर उसके पीछे नकारात्मक कारण थे. 1980 जनता प्रयोग की विफलता के कारण और 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या की सहानुभूति में. बहरहाल कांग्रेस सत्ता की दौड़ में तो शामिल रही, पर एक शानदार संस्था की धीमी मौत के प्रति उदासीन रहे.

हेरल्ड की कहानी के दो पात्र सबसे महत्वपूर्ण हैं. पहले हैं जवाहर लाल नेहरू, जिन्होंने इसकी परिकल्पना की थी. नेहरू ने इस अख़बार में कई बार अपने नाम से और कई बार बगैर नाम से लेख लिखे. 1 मार्च 1954 को जब अमेरिका ने हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया तो नेहरू ने डैथ डीलर शीर्षक से साइंड लेख लिखा था. अख़बार के साथ जुड़ा दूसरा महत्वपूर्ण नाम है एम चेलापति राव का, जिन्होंने 1946 में इसके सम्पादक का पद सम्हाला और 1978 तक इसके सम्पादक रहे.

चेलापति राव पर नेहरू का अगाध विश्वास था. एक बार उन्होंने कहा, लोग समझते हैं कि यह मेरा अख़बार है. यह चेलापति राव का अख़बार है, इन्होंने इसे बनाया है. सन 1975 से 1977 के बीच आपातकाल का दौर इस अखबार की परीक्षा और प्रतिष्ठा का समय था. आपातकाल के बाद चेलापति राव अपने पद से मुक्त हो गए. अख़बार का प्रबंधन यशपाल कपूर के हाथ में आ गया, जो श्रीमती इंदिरा गांधी के करीबी थे. हेरल्ड के साथ पी थेरयन, के पणिक्कर, हरि जयसिंह, जैसे सम्पादक भी जुड़े.

हेरल्ड का दुर्भाग्य था कि समय रहते उसका तकनीकी आधुनिकीकरण नहीं किया गया. सत्तर के दशक में उसका एक विदेश संस्करण भी निकाला गया, जो महीन न्यूजप्रिंट पर साप्ताहिक के रूप में छपता था. एक तरफ उसे देश के कई केन्द्रों से निकालने की योजना थी, दूसरी ओर जब वह 2008 में बंद किया गया तब उसके सम्पादकीय विभाग के पास कम्प्यूटर भी नहीं था, जबकि देश के ज्यादातर अख़बार नब्बे के दशक से कम्प्यूटर का इस्तेमाल कर रहे थे. उसकी कम्पोजिंग के लिए प्रेस के पास पाँच या छह कम्प्यूटर थे. ऐसा संस्थान किस तरह अपना अस्तित्व बचाता? 
इन्हें भी पढ़ें
प्रभात खबर में प्रकाशित

No comments:

Post a Comment