Friday, April 12, 2013

बेकाबू क्यों हो रहा है उत्तर कोरिया?



जब हम विश्व समुदाय की बात करते हैं तो इसका एक मतलब होता है अमेरिका और उसके दोस्त। और जब हम उद्दंड या दुष्ट देश यानी रोग स्टेट्स कहते हैं तो उसका मतलब होता है उत्तर कोरिया, ईरान और सीरिया और एक हद तक वेनेजुएला। सन 1990 के दशक से दुनिया को शीत-युद्ध से भले मुक्ति मिल गई, पर अमेरिका और इन उद्दंड देशों के बीच तनातनी का नया दौर शुरू हो गया है। अमेरिका का कहना है कि उत्तर कोरिया किसी भी वक्त दक्षिण कोरिया या प्रशांत महासागर में स्थित अमेरिकी अड्डों पर मिसाइलों से हमला कर सकता है। सुदूर पूर्व पर नज़र रखने वालों का कहना है कि उत्तर कोरिया हमला नहीं करेगा। परमाणु बम का प्रहार करने की स्थिति में वह नहीं है। उसके पास एटमी ताकत है ज़रूर, पर डिलीवरी की व्यवस्था नहीं है। हो सकता है वह किसी मिसाइल का परीक्षण करे या एटमी धमाका। अलबत्ता यह विस्मय की बात है कि सायबर गाँव में तब्दील होती दुनिया में कोरिया जैसी समस्याएं कायम हैं। दोनों कोरिया एक भाषा, एक संस्कृति, एक राष्ट्र के बावजूद राजनीतिक टकराव के अजब-गजब प्रतीक है।

कोरिया की समस्या स्थानीय है या यह कोई वैश्विक शक्ल लेगी यह साफ नहीं है। अलबत्ता ईरान, सीरिया और कोरिया के विवाद एक ही वक्त पर सामने खड़े हैं। इन तीनों विवादों को अमेरिका एक साथ रखकर देखता है। उत्तर कोरिया एटमी हमले की धमकी दे रहा है, वहीं अमेरिका लगातार संकेत दे रहा है कि ईरान ने अपने नाभिकीय कार्यक्रम पर रोक नहीं लगाई तो उसके एटमी केन्द्रों पर हमले किए जा सकते हैं। उधर सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद अपने विरोधियों से लगातार लड़ रहे हैं। बशर अल असद का शासन अपेक्षाकृत धर्मनिरपेक्ष है। उनके खिलाफ बगावत में अमेरिका परस्त अरब देशों का हाथ है। एक प्रकार से यह शिया मुसलमानों के खिलाफ संग्राम भी है। इस वैश्विक घटनाक्रम में रूस और चीन एक–दूसरे के करीब आ गए हैं। ईरान के मसले में जर्मनी का रुख भी अमेरिका से मेल नहीं खाता। तब क्या हम किसी नए शीतयुद्ध की ओर बढ़ रहे हैं? दुनिया को परमाण्विक निरस्त्रीकरण, प्रक्षेपास्त्र तकनीक के अप्रसार तथा अन्य सामरिक प्रश्नों पर नए सिरे से विचार करने की ज़रूरत है। परमाणु ऊर्जा को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत के रूप में विकसित करने के पहले उसके दुरुपयोग के बारे में आश्वस्त होने की ज़रूरत भी है। विडबंना है कि एनपीटी से बाहर कम से कम पाँच देशों के पास या तो एटम बम मौजूद हैं या बम बनाने की क्षमता है।
शीत-युद्ध अतीत की बात हुई। अब ज़माना व्यापारिक रिश्तों का है। आर्थिक संकटों से घिरे यूरोप और अमेरिका के लिए पश्चिम एशिया, अफगानिस्तान, सोमालिया, म्यांमार और सायबर स्पेस पर हो रहे हमलों की तुलना में उत्तरी कोरिया अचानक बड़ी समस्या क्यों लग रहा है? क्या एटमी प्रहार सम्भव है? लंदन में जी-8 के विदेश मंत्रियों की इस वक्त हो रही बैठक में उत्तरी कोरिया भी एक मसला है। पर वह सबसे महत्वपूर्ण मसला नहीं है। इन देशों में जापान भी शामिल है, जो कोरिया का पड़ोसी है। रूस की भूमिका भी महत्वपूर्ण है जो चीन के साथ मिलकर धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय राजनय में एक समांतर धुरी तैयार कर रहा है। नाभिकीय और मिसाइल अप्रसार की अमेरिकी योजना में चीन हमेशा सेंध लगाता रहा है। और एशिया प्रशांत तथा चीन सागर में चीन की घेराबंदी करने की अमेरिकी योजना बदस्तूर जारी है। वियतनाम और फिलीपींस अमेरिका के साथ हैं।
उत्तर कोरिया दुनिया से कटा हुआ सबसे जटिल देश है। यह विचित्र कम्युनिस्ट देश है। यहाँ वंश-आधारित साम्यवाद है। किम खानदान कोरियन वर्कर्स पार्टी के भी ऊपर है। और किम इल सुंग यहाँ के भगवान। 1945 से 1995 तक किम इल सुंग का राज रहा और उसके बाद पिछले साल दिसम्बर तक उनके बेटे किम इल जोंग का। 1972 में एक संविधान भी बनाया गया, पर वास्तविक शासन परिवार का है। क्यूबा के फिदेल कास्त्रो और हाल में दिवंगत वेनेजुएला के ह्यूगो शावेज़ की तरह किम खानदान की रंज़िश अमेरिका से है। पर क्या केवल खानदान की ताकत इतनी बड़ी तानाशाही को ढो सकती है? इस देश की कई बातें अचरज भरी हैं। तानाशाही में शिखर पुरुष के ढहने पर सत्ता संघर्ष होता है। पर यहाँ बगैर किसी संघर्ष के दो बार सत्ता परिवर्तन हो चुका है। वर्तमान शासक अपने पिता के सबसे छोटे पुत्र हैं। तीन बेटों में इन्हें ही क्यों चुना गया, किसने चुना और कैसे चुना इसे बताने वाला कोई नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि तमाम अंदेशों के बावजूद देश की राजनीतिक व्यवस्था में एक प्रकार की स्थिरता है। इसकी वजह शायद सामूहिक नेतृत्व है। देश के संचालन की कोई मशीनरी ज़रूर काम करती है।
शुरूआती विफलताओं के बाद पिछले साल दिसम्बर में उत्तरी कोरिया ने अपने अंतरिक्ष उपग्रह का सफल प्रक्षेपण किया। किम वंश के तीसरे शासक की यह पहली सफल परीक्षा थी। इस परीक्षण को उनकी उपलब्धि के रूप में पेश किया गया और देश में जश्न मनाया गया। वे किम वंश के उत्तराधिकारी हैं। क्वांगम्योंगसांग-3 यानी चमकता सितारा नाम के जिस उपग्रह को अंतरिक्ष में भेजा गया  उसे तकरीबन 45 करोड़ डॉलर यानी करीब करीब सवा दो हजार करोड़ के खर्च से तैयार किया गया था। खर्चे का विवरण इसलिए ज़रूरी है कि यह देश भयानक गरीबी का सामना कर रहा है। इसके बाद फरवरी 2013 में उसने एटमी परीक्षण भी किया। अमेरिका का कहना है कि रॉकेट परीक्षण और एटमी धमाके में उत्तरी कोरिया और ईरान की भागीदारी है। और दोनों ही देशों के खिलाफ अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से पाबंदियाँ लगी हुईं हैं। उत्तरी कोरिया ने पहली बार एटमी विस्फोट सन 2006 में किया था। पर उसके बाद छह देशों के हस्तक्षेप से उसने अपने एटमी कार्यक्रम को छोड़ने का वादा किया था। यह वादा उसने पूरा नहीं किया। इसके पहले सन 2002 में भी वह अंतरराष्ट्रीय समझौता तोड़ चुका है।
अमेरिका के अनुसार ईरान, सीरिया और उत्तरी कोरिया के बीच मिसाइल और एटमी तकनीक के मामले में सहयोग है। ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को भी उत्तरी कोरिया के साथ जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि अक्टूबर 2007 में इस्रायली वायु सेना ने सीरिया के एक एटमी रिएक्टर पर हमला करके उसे ध्वस्त कर दिया था। हालांकि इस हवाई हमले के ज्यादा विवरण नहीं मिलते पर माना जाता है कि यह हमला किसी एटमी रिएक्टर पर था। और यह भी माना जाता है कि यह रिएक्टर उत्तर कोरिया की मदद से बना था। सन 2011 में अमेरिका के पूर्व रक्षामंत्री रॉबर्ट गेट्स ने चेतावनी दी थी कि अगले पाँच साल में उत्तरी कोरिया अमेरिका के लिए सीधा खतरा बन जाएगा। वह जो अंतर महाद्वीपीय प्रक्षेपास्त्र बना रहा है उनकी मार में अमेरिका का अलास्का क्षेत्र आ जाएगा। पर अमेरिका को सीधे निशाने पर रखने में उत्तर कोरिया का क्या हित है? और अमेरिका जैसी बड़ी ताकत इसे रास्ते पर क्यों नहीं ला पा रही है? कहीं इसके पीछे चीन का हाथ तो नहीं? दूसरी ओर दक्षिण कोरिया का धैर्य खत्म हो रहा है। वह इस इलाके की बड़ी अर्थ व्यवस्था को तैयार कर रहा है। उसके पड़ोस में पड़ा बारूद का ढेर उसके लिए खतरा है। 23 नवम्बर 2010 को उत्तर कोरिया की ओर से की गई अंधा-धुंध गोलाबारी से दक्षिण कोरिया के कुछ नौसैनिक मारे गए थे। तब एक बड़े युद्ध का खतरा पैदा हो गया था। साल में कई बार ऐसे मौके आते हैं जब इस इलाके में लड़ाई के बादल मंडराने लगते हैं। हालांकि इस संदर्भ में भारतीय नीति उत्तर कोरिया को मुख्यधारा में बनाए रखने की है, पर इसे सब जानते हैं कि पाकिस्तान का मिसाइल कार्यक्रम उत्तर कोरिया के तेपोदोंग मिसाइल पर आधारित है।
फिलहाल जी-8 देश चाहते हैं कि चीन उत्तरी कोरिया पर उत्तेजक बयान न देने के लिए दबाव डाले। क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो भी कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव से विचलित हैं। उन्होंने भी उत्तरी कोरिया को संयम बरतने की सलाह दी है। पर उत्तरी कोरिया ने सभी देशों से कहा है कि वे अपने दूतावास बंद कर दें। यह गम्भीर स्थिति है। उसकी तुलना में ईरान की स्थिति बेहतर है जो अपने परमाणु कार्यक्रमों विवाद को दुनिया बड़ी महाशक्तियों के साथ बातचीत से सुलझाना चाहता है। और वह अलमाटी में दुनिया की छह बड़ी शक्तियों से दूसरे दौर की बातचीत कर रहा है। हालांकि यह बातचीत भी कोई परिणाम नहीं दे पाई है, पर इससे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों में ढील दिए जाने की संभावना बढ़ी है। उत्तर कोरिया के लिए बेहतर होगा कि वह दक्षिण कोरिया के साथ रिश्ते सुधारे और क्रमशः एकीकरण की ओर बढ़े। यह काम संवाद बढ़ाने से ही सम्भव है। फेसबुक और ट्विटर के ज़माने में ऐसा संवाद असम्भव नहीं। 

नेशनल दुनिया में प्रकाशित
April 6, 2013
हिन्दू में केशव का कार्टून

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