Monday, December 9, 2013

'आप' को साबित करना होगा कि वह आपकी पार्टी है

 रविवार, 8 दिसंबर, 2013 को 17:58 IST तक के समाचार
आम आदमी पार्टी के सदस्य
दुनिया के कुछ अन्य देशों में आम आदमी पार्टी जैसी पार्टियां बनती रही हैं, जैसे अमरीका में एक टी-पार्टी बनी थी. आम आदमी पार्टी शहरी मध्यवर्ग और युवाओं की अवधारणा है जो परंपरागत राजनीति से नाराज़ हैं या उससे ऊब गये हैं. कोई दूरगामी योजना या अच्छा राजनीतिक संगठन इसका आधार नहीं है.
इसका आधार ये धारणाएं हैं कि कुछ व्यवस्थाएं हैं जो मानव-विरोधी हैं या भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती हैं जो हमारी समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार हैं. ऐसे में आम आदमी पार्टी का उदय होना और उसे समर्थन मिलना बड़ा स्वाभाविक है.
ये बात चुनाव से पहले ही समझ में आने लगेगी कि आम आदमी पार्टी कुछ न कुछ तो करेगी. लेकिन ये पार्टी यदि देश की परंपरागत राजनीति नहीं सीखेगी तो उसका विफल होना बिल्कुल तय है.
भारतीय मध्यवर्ग अब अपेक्षाकृत जागरूक है. जाति और धर्म के जुमलों से उसे लंबे समय तक भरमाया जा चुका है. दिल्ली के मध्यवर्ग ने आम आदमी पार्टी पर भरोसा किया है, पार्टी भरोसे पर कितना खरा उतरती है, ये देखना बाकी है.
आम आदमी पार्टी पर इन लोगों के भरोसे का आधार ये है कि ये पार्टी दूसरी पार्टियों से अलग है और ये हमारे जैसे लोग हैं. ऐसे में इस पार्टी को समर्थन मिलना स्वाभाविक है. आगे क्या होगा, ये दूसरी बात है.

Sunday, December 8, 2013

चुनाव परिणाम जो भी कहें

जब आप इन पंक्तियों को पढ़ रहे होंगे तब तक पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम या तो आने वाले होंगे या आने शुरू हो चुके होंगे। या पूरी तरह आ चुके हों। अब इस बात का कोई मतलब नहीं कि परिणाम क्या हैं। वस्तुतः यह लोकसभा चुनाव का प्रस्थान-बिंदु है। तारीखों की घोषणा बाकी है। सभी प्रमुख पार्टियों ने प्रत्याशियों को चुनने का काम शुरू कर दिया है। स्थानीय स्तर पर छोटे-मोटे गठबंधनों को छोड़ दें तो इस बार चुनाव के पहले गठबंधन नहीं होंगे, क्योंकि ज्यादातर पार्टियाँ समय आने पर फैसला और सिद्धांत और कार्यक्रमों का विवेचन करेंगी। आने वाला चुनाव राजनीतिक मौका परस्ती का बेहतरीन उदाहरण बनने वाला है।

पिछले डेढ़-दो महीने की चुनावी गतिविधियों को देखते हुए यह भी समझ में आ रहा है कि आरोप-प्रत्यारोप का स्तर आने वाले समय में और भी घटिया हो जाएगा। गटर राजनीति अपने निम्नतम रूप में सामने आने वाली है। स्टिंग ऑपरेशनों और भंडाफोड़ पत्रकारिता के धुरंधरों का बाज़ार खुलने वाला है। दिल्ली में ‘आप’ के प्रदर्शन के मद्देनज़र यह देखने की ज़रूरत होगी कि क्या कोई वैकल्पिक राजनीति भी राष्ट्रीय स्तर पर उभरेगी। क्या ‘आप’ लोकसभा चुनाव लड़ेगी? इससे जुड़े लोग दावा कर रहे हैं कि पार्टी की जड़ें देश भर में हैं। पर वह व्यावहारिक सतह पर नज़र नहीं आती। हाँ शहरी मध्य वर्ग की बेचैनी और उसकी राजनीतिक चाहत साफ दिखाई पड़ रही है। और यह भी कि यह मध्य वर्ग कांग्रेस के साथ नहीं है।

Friday, December 6, 2013

सांप्रदायिक हिंसा निरोध कानून माने दुधारी तलवार

 शुक्रवार, 6 दिसंबर, 2013 को 11:43 IST तक के समाचार
मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक दंगे
हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों पर विचार-विमर्श के दौरान कुछ लोगों ने इस बात को उठाया था कि केंद्र सरकार ने सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निवारण विधेयक को पास कर दिया होता तो ये हिंसा नहीं हो पाती.
व्यावहारिक सच यह है कि इस कानून को पास कराना टेढ़ी खीर साबित हो सकता है. हाल में गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने संकेत दिया था कि सरकार ने इस कानून पर काम शुरू कर दिया है. अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री के रहमान ख़ान का कहना है कि इस मामले में आम सहमति बनाने की कोशिश हो रही है.
जेडीयू के नेता केसी त्यागी ने इस क्लिक करेंकानून का विरोध करने वालेनरेंद्र मोदी की आलोचना की है. क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जाए कि उनकी पार्टी इस विधेयक को पारित कराने में मदद करेगी? इस कानून का प्रारूप राष्ट्रीय विकास परिषद (एनएसी) ने तैयार किया है.
प्रस्तावित कानून के अंतर्गत केंद्र और राज्य सरकारों को ज़िम्मेदारी दी गई है कि वे अनुसूचित जातियों, जन जातियों, धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को लक्ष्य करके की गई हिंसा को रोकने और नियंत्रित करने के लिए अपनी ताकत का इस्तेमाल करें. इस मसौदे में हिंसा की परिभाषा, सरकारी कर्मचारियों द्वारा कर्तव्य की अवहेलना की सज़ा और कमांड का दायित्व भी तय किया गया है.
राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने 14 जुलाई 2010 को इस विधेयक का खाका तैयार करने के लिए एक प्रारूप समिति का गठन किया था और 28 अप्रैल 2011 की एनएसी की बैठक के बाद नौ अध्यायों और 135 धाराओं में इसे तैयार किया गया. 22 जुलाई 2011 को यह सरकार को सौंप दिया गया.

भारतीय तोपखाने की कहानी

डिफेंस मॉनिटर के दिसंबर-जनवरी अंक में 1971 के बांग्लादंश युद्ध की याद और उस साल वैश्विक परिदृश्य में भारत की बदली भूमिका का ज़िक्र है। इस अंक में भारत की सेना के आधुनिकीकरण से जुड़े तीन लेख महत्वपूर्ण हैं। एक है तोपखाने के आधुनिकीकरण से जुड़ा, दूसरा एरोस्पेस कमांड को लेकर जो भविष्य के युद्धों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। तीसरा लेख भारत के रक्षा उद्योग में विदेशी पूँजी के निवेश को लेकर है। एक और महत्वपूर्ण लेख पूर्व नौसेनाध्यक्ष अरुण प्रकाश का है जिसमें उन्होंने सलाह दी है कि सेना के मामलों को लेकर राजनीति क्यों नहीं होनी चाहिए। एक अन्य लेख पाकिस्तान के एटमी हथियारों की सुरक्षा को लेकर है। यह खतरा हमेशा बना रहता है कि ये हथियार कभी कट्टरपंथियों के हाथों में न चले जाएं। इनके अलावा पूर्व सेनाध्यक्ष जन वीपी मलिक की नई पुस्तक के अंश।

रक्षा, विदेश नीति, आंतरिक सुरक्षा और एरोस्पेस पर इतनी आधिकारिक जानकारी देने वाली यह अपने किस्म की अकेली पत्रिका है। 

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Thursday, December 5, 2013

जनता वोट देने निकलती है तो क्यों?

 गुरुवार, 5 दिसंबर, 2013 को 09:24 IST तक के समाचार
छत्तीसगढ़, वोटर, मतदाता
दिल्ली विधानसभा चुनाव में मतदान 67 प्रतिशत के आस पास हुआ है. अनेक मतदान केंद्रों पर रात 9.30 बजे तक वोट पड़ते रहे. मतदान की समय सीमा शाम साढ़े पाँच बजे के बाद 1.72 लाख वोट पड़े. लगभग डेढ़ फीसदी वोट उन मतदाताओं का था, जो साढ़े पाँच बजे तक मतदान केंद्र के भीतर आ चुके थे.
दिल्ली के लिए यह मतदान नया कीर्तिमान है. इसके पहले हुए चार चुनावों में क्रमशः 57.8 (2008), 54.4 (2003), 49.0(1998) और 61.8(1993) प्रतिशत मतदान हुआ था. इस बार मिजोरम में 83 फीसदी, छत्तीसगढ़ में 77 फीसदी, मध्य प्रदेश में 76 और राजस्थान में 75 फीसदी मतदान जनता की हिस्सेदारी को साबित करता है.
पिछले साल उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और कर्नाटक में ज्यादा मतदान हुआ. जातीय हिंसा और लंबे ब्लॉकेड के बावजूद मणिपुर में ऊँचा मतदान हुआ था.
अभी तक की परंपरा है कि हम भारी मतदान के मानये ‘एंटी इनकंबैंसी’ मानते थे. यानी कि सरकार से नाराज़गी. पर पिछले साल पंजाब और हिमाचल पर यह बात लागू नहीं हुई.
बुधवार की शाम दिल्ली में हुए भारी मतदान की खबर के बारे में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से पूछा गया तो उनका जवाब था कि यह लोकतंत्र के मज़बूत होने की निशानी है. लोकतंत्र की मजबूती एक सामान्य निष्कर्ष है.

Wednesday, December 4, 2013

बस्तर से दिल्ली तक का संदेश

पाँच राज्यों के विधान सभा चुनाव का दौर तकरीबन पूरा हो गया है. अब सिर्फ दिल्ली का चुनाव बचा है. चुनाव अगर खेल का मैदान हो तो इसे फाइनल और सेमी फाइनल की शब्दावली में बाँधने की कोशिश भी होती है. इस बार के चुनाव को इस रूपक से भी जोड़ा गया है. हरेक चुनाव कुछ न कुछ नया देकर जाता है. मिजोरम हो या राजस्थान चुनाव प्रक्रिया हमारे समाज पर गहरा असर छोड़कर जाती है. चुनाव अब हमारी संस्कृति का हिस्सा है. इस बार छत्तीसगढ़ में भारी मतदान ने साबित किया कि मुख्य धारा की राजनीति यदि नागरिकों के सबसे नीचे के तबकों से खुद को जोड़ेगी तो बदले में उसे जबरदस्त समर्थन मिलेगा. इन नागरिकों को कुछ बंदूकधारियों ने अपनी धारणाओं से प्रभावित किया था. यह प्रभाव अनायास नहीं था. उसके कारण भी थे. चुनाव के कारण यह बात भी सामने आई कि किस तरह हमारी विकास-नीति ने जनजातियों की अनदेखी की है. एक गलतफहमी यह है कि चुनाव पाँच साल बाद लगने वाला मेला है. वस्तुतः यह हमारे दैनिक जीवन को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया है. इसलिए चुनाव हो जाने के बाद भी नागरिक या उसके प्रतिनिधियों का रिश्ता टूटना नहीं चाहिए. यह रिश्ता किस तरह बना रहेगा, इसपर विचार-मनन चल ही रहा है. इस चुनाव में नोटा बटन की शुरुआत हुई है. यह शुरुआत मात्र है. इसका व्यवहारिक मतलब अभी कुछ नहीं है, पर कुछ साल बाद यह बटन किसी और बटन का मार्ग-दर्शक बनेगा.

Tuesday, December 3, 2013

नेपाल में कट्टरपंथ की पराजय

नेपाल की संविधान सभा की 601 सीटों के लिए हुए चुनाव में किसी भी पार्टी को साफ बहुमत न मिल पाने के कारण संशय के बादल अब भी कायम हैं, पर इस बार सन 2008 के मुकाबले कुछ बदली हुई परिस्थितियाँ भी हैं। माओवादियों के दोनों धड़े किसी न किसी रूप में पराजित हुए हैं। पुष्प दहल कमल यानी प्रचंड की एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) तीसरे नम्बर पर रही है। वहीं उनके प्रतिस्पर्धी मोहन वैद्य किरण की भारत-विरोधी नेकपा-माओवादी और 33 अन्य दलों की चुनाव बहिष्कार घोषणा भी बेअसर रही। इसका मतलब है कि नेपाली जनमत शांतिपूर्ण तरीके से अपने लोकतंत्र को परिभाषित होते हुए देखना चाहता है। हालांकि नेपाल कांग्रेस और एमाले चाहें तो मिलकर सरकार बना सकते हैं। और अपनी मर्जी का संविधान भी तैयार कर सकते हैं। पर कोशिश होनी चाहिए कि बहु दलीय राष्ट्रीय सरकार बनाई जाए, क्योंकि देश को इस समय आम सहमति की ज़रूरत है। व्यवहारिक अर्थ में यह संसद भी है, पर वास्तव में यह संविधान सभा है। अभी इस मंच पर मतभेदों को राजनीतिक शक्ल नहीं देनी चाहिए। कोशिश होनी चाहिए कि फैसले आम राय से हों। इस बार पार्टियों ने विश्वास दिलाया है कि वे एक साल के भीतर देश को संविधान दे देंगी। यह तभी संभव है, जब वे अतिवादी रुख अख्तियार न करें।

Wednesday, November 27, 2013

लोकसभा चुनाव के लिए ओपीनियन पोल साबित होंगे दिल्ली के परिणाम

 मंगलवार, 26 नवंबर, 2013 को 08:05 IST तक के समाचार
इंडिया गेट
अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए दिल्ली विधानसभा का चुनाव ओपीनियन पोल का काम करेगा. कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए.
दिल्ली एक बेहतरीन बैरोमीटर बनता, पर ‘आप’ ने एंटी क्लाइमैक्स तैयार कर दिया है.
अंदेशा है कि दिल्ली का वोटर त्रिशंकु विधानसभा चुनकर दे सकता है. ऐसा हुआ तो ‘आप’ के सामने बड़ा धर्मसंकट पैदा होगा. यह उस धर्मसंकट का ट्रेलर भी होगा, जो 2014 के लोकसभा परिणामों के बाद जन्म ले सकता है.
दिल्ली से उठने वाली हवा के झोंके पूरे देश को प्रभावित करते हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सातों संसदीय सीटों पर कांग्रेस के प्रत्याशी जीते थे.
इनमें कपिल सिब्बल, अजय माकन, कृष्णा तीरथ और संदीप दीक्षित की राष्ट्रीय पहचान है. यहाँ होने वाली राजनीतिक हार या जीत के चाहे व्यावहारिक रूप से कोई मायने न हों पर प्रतीकात्मक अर्थ गहरा होता है.
पिछले कुछ साल में देश के शहरी नौजवानों के आंदोलनों को सबसे अच्छा हवा-पानी दिल्ली में ही मिला. राजधानी होने के नाते दिल्ली इस आयु और आय वर्ग का बेहतरीन नमूना है.

Tuesday, November 26, 2013

शीला दीक्षित, समय ने जिनका साथ दिया

 गुरुवार, 21 नवंबर, 2013 को 09:00 IST तक के समाचार
मुख्यमंत्री के रूप में लगातार चुनाव जीतना सफलता का पैमाना है तो शीला दीक्षित को नरेन्द्र मोदी से ज़्यादा सफल मुख्यमंत्री माना जा सकता है. कांग्रेस के ही नहीं बल्कि देश के सबसे अच्छे मुख्यमंत्रियों में उनकी गिनती होती है.
सौम्य छवि उनकी सफलता का बड़ा कारण है. सच यह भी है कि शीला दीक्षित को उस प्रकार के कठोर राजनीतिक विरोध का सामना नहीं करना पड़ा जैसा विरोध नरेंद्र मोदी को झेलना पड़ा.
साथ ही भौगोलिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और आर्थिक हर लिहाज़ से दिल्ली खुशहाल राज्य है, जहाँ समस्याएं अपेक्षाकृत कम हैं.
आकार को देखते हुए उसके पास साधनों की कमी नहीं. क़ानून-व्यवस्था की ज़िम्मेदारी राज्य सरकार की नहीं. शिक्षा के ज़्यादातर संस्थान केंद्रीय हैं.
राजधानी में रहने वालों में बड़ी संख्या केंद्रीय कर्मियों की है जिनके वेतन-भत्ते केंद्र सरकार देती है.
बदले में वे ख़ुद कई तरह के टैक्स दिल्ली सरकार को देते हैं.

Monday, November 25, 2013

चुनाव रैलियों में भीड़ क्यों नहीं जाती?

जयपुर का रामलीला मैदान अपेक्षाकृत छोटा है। तकरीबन बीस हजार वर्ग फुट क्षेत्र में मंच की जगह छोड़ने के बाद ज़मीन पर बैठें तो छह हजार के आसपास दर्शक आएंगे। गुरुवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जयपुर सभा जान-बूझकर रामलीला मैदान में रखी गई थी। आयोजकों ने मैदान में तीन हज़ार कुर्सियाँ फैलाकर लगाई थीं। मनमोहन सिंह के नाम पर यों भी भीड़ नहीं उमड़ती। उम्मीद थी कि शहर के बीच में होने के कारण और फिर देश के प्रधानमंत्री के नाम पर कुछ लोग तो आएंगे।ऐसा हुआ नहीं। तकरीबन 1200 सुरक्षा कर्मियों की उपस्थिति के बावज़ूद मैदान भरा नहीं था।

हाल में नरेंद्र मोदी की भोपाल-रैली में भी भीड़ उम्मीद से काफी कम थी। दो महीने पहले इसी जगह पर नरेंद्र मोदी को सुनने के लिए लाखों लोग जमा हो गए थे। इस बार पाँच-छह हज़ार के आसपास थे। सागर, छतरपुर और गुना में हुई उनकी रैलियों में भी उम्मीद से कम लोग थे। हाल में दिल्ली में राहुल गांधी की सभा में दर्शक भाषण शुरू होने के पहले ही खिसकने लगे। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को हाथ जोड़कर निवेदन करना पड़ा, कृपया रुक जाएं। मोदी और राहुल की सभाओं का यह हाल है तो बाकी का क्या होगा? खबर है कि भोजपुर में सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, शमशाबाद में मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं की सभाओं से भीड़ नदारद थी। शरद यादव ने पेटलावद में हेलिकॉप्टर से झांककर देखा तो सौ लोग भी नहीं थे और वे आसमान में ही वापस थांदला लौट गए। उनकी जबलपुर सभा में भी लोग काफी कम थे। अब लोग हेलिकाप्टर देखने भी नहीं आते।

Sunday, November 24, 2013

‘तहलका’ मामला निजी नहीं

तरुण तेजपाल के मामले को बदलती जीवन शैली की दृष्टि से देखें, स्त्रियों के साथ हो रहे बर्ताव या पत्रकारिता या सिर्फ अपराध के नज़रिए से देखा जा सकता है। पर यह मामला ज्यादा बड़े फलक पर विचार करने को प्रेरित करता है। अगले महीने दिल्ली गैंग रेप मामले का एक साल पूरा होगा। लगता है एक साल में हम दो कदम भी आगे नहीं बढ़ पाए हैं। इस मसले ने पूरे देश को हिलाकर ज़रूर रख दिया, पर हमें बदला नहीं। गोवा पुलिस ने तरुण तेजपाल के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कर ली है। अब यह आपराधिक मामला है और जांच का विषय। केवल दो व्यक्तियों के बीच का मामला नहीं रहा। एक जाँच पुलिस करेगी। दूसरी तहलका में होगी। दोनों जाँचों के बाद घटना की वास्तविकता और उसके बाद उठाए गए कदमों की जानकारी मिलेगी। बात फिर भी खत्म नहीं होगी। मीडिया के भीतर की इस घटना को तूल देने के आरोप मीडिया पर ही लगे हैं। अफसोस कि मीडिया में काम करने वाली महिलाएं स्वयं को असुरक्षित पाती हैं।

Saturday, November 23, 2013

तेन्दुलकर तो निर्विवाद हैं, पुरस्कार नहीं

18 अगस्त 2007 को जब दशरथ मांझी का दिल्ली में कैंसर से लड़ते हुए निधन हुआ था, तब उसके जीवट और लगन की कहानी देश के सामने आई थी। पर न तब और न आज किसी ने कहा कि उन्हें भारत रत्न मिलना चाहिए। हमारे एलीटिस्ट मन में यह बात नहीं आती। इन पुरस्कारों का इतिहास देखें तो लगता है कि तेन्दुलकर का सम्मान गलत नहीं है।

जाने-अनजाने सचिन तेन्दुलकर देश की पहचान हैं। उनकी प्रतिभा और लगन युवा वर्ग को प्रेरणा देती है। सहज और सौम्य हैं, पारिवारिक व्यक्ति हैं, माँ का सम्मान करते हैं और एक साधारण परिवार से उठकर आए हैं। यह तय करने का कोई मापदंड नहीं कि वे  देश के सार्वकालिक सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी हैं भी या नहीं। ध्यानचंद महान खिलाड़ी थे और उस दौर में थे जब हमें आत्मविश्वास की ज़रूरत थी। फिर भी वे लोकप्रियता के उस शिखर पर नहीं थे, जिसपर आज सचिन तेन्दुलकर हैं। वह संस्कृति और वह समाज ऐसी लोकप्रियता देता भी नहीं था। ध्यानचंद के जन्मदिन को हम राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाते हैं। तमाम खेल प्रेमी नहीं जानते कि 29 अगस्त उनकी जन्मतिथि है। इस दिन राष्ट्रपति राष्ट्रीय खेल पुरस्कार देते हैं।

Wednesday, November 20, 2013

गठबंधनों का गड़बड़झाला


लालू यादव से किसी टीवी चैनल के एंकर ने कहा, आपकी तो रीजनल पार्टी है. लालू बोले रीजनल नहीं ओरीजनल पार्टी है. लालू प्रसाद ने जवाब क्या सोचकर दिया था पता नहीं, पर इतना तय है कि वे भारत की ग्रासरूट राजनीति का प्रतिनिधित्व करते हैं. इस लिहाज से उनकी राजनीति ओरीजनल है. वे इस वक्त परेशानी से घिरे हैं, पर यह मान लेना ठीक नहीं होगा कि उनकी राजनीति खत्म हो गई. उसका एक नया दौर शुरू हुआ है. तमाम क्षेत्रीय क्षत्रपों की तरह लालू यादव भी सन 2014 के चुनाव के बाद देश में बुनी जाने वाली राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. वे खुद चुनाव लड़ें या न लड़ें.

गठबंधन भारतीय राजनीति का मूल तत्व है. चाहे वह 1962 तक की कांग्रेस के एकछत्र शासन की राजनीति हो या यूपीए-2 की गड़बड़झाला राजनीति. इस राजनीति के तमाम गुण-दोष हैं. इसके साथ विचार-दर्शन और सिद्धांत हैं और शुद्ध मतलब-परस्ती भी. इसके अंतर में सम्प्रदाय और जाति के कारक हैं जो इसे संकीर्ण बनाते हैं, पर क्षेत्रीय, सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता के दर्शन भी इसी के मार्फत होते हैं. हाँ, इन गठबंधनों में विचारधारा कम, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं या गुटबाजी हावी रहती हैं. गठबंधनों के कारणों के तफसील में जाएंगे तो यही बात उजागर होगी.

Monday, November 18, 2013

इन तमगों का पानी भी नही उतरना चाहिए

सचिन तेन्दुलकर देश के बड़े आयकन हैं। उनकी खेल प्रतिभा के कारण देश का सम्मान बढ़ा जिस पर हम सबको नाज़ है। इस घोषणा के राजनीतिक निहितार्थ गहरे हैं और इस पर ऑब्जेक्टिव विमर्श खासा मुश्किल। सचिन तेन्दुलकर युवा वर्ग के आदर्श बनें और उनसे प्रेरणा लेकर अनुशासन, लगन और परिश्रम की राह खुले तो देश का हित होगा। इधर खबर है कि सचिन को समाजवादी पार्टी ने अपने साथ आने का न्योता भेजा है। कांग्रेस पार्टी शायद उन्हें अपनी उपलब्धि मानेगी। शायद शिवसेना उन्हें मराठी मानते हुए पूजे। पर सचिन तो पूरे देश के हैं और उन्हें अब राष्ट्रीय संरक्षक की भूमिका निभानी चाहिए। इसके साथ हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि हम प्रतिभाओं का सम्मान किस तरह करते हैं। और यह भी कि क्या सचिन को बनाने में कॉरपोरेट मीडिया की कोई भूमिका थी। कोल्ड ड्रिंक और टूथपेस्ट बेचते भारत रत्न दिखाई पड़ेंगे तो यह सवाल भी मन में आएगा। सवाल सचिन की श्रेष्ठता का नहीं है, उस व्यवस्था का है, जो श्रेष्ठता के पैमाने तय करती है। 

यह सवाल तो फिर भी पूछा जा सकता है कि यह सचिन की लोकप्रियता को भुनाने की कोशिश तो नहीं? दिसम्बर 2011 में तत्कालीन खेल मंत्री अजय माकन ने जानकारी दी कि उन्होंने प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि भारत रत्न पुरस्कार की पात्रता में खिलाड़ियों को भी शामिल किया जाए। सरकार ने उस साल नवम्बर में इस सिफारिश को मंजूर करते हुए इस आशय की अधिसूचना ज़ारी की थी।

कयास तभी था कि शायद सचिन तेन्दुलकर को यह अलंकार मिलने वाला है। फौरन बात उठी कि सचिन के पहले ध्यानचंद को यह पुरस्कार मिलना चाहिए। शायद इसी वजह से तब फैसला रुक गया। हाल में खेल मंत्री ने सरकार को पास सिफारिश भी भेजी कि ध्यानचंद को भारत रत्न दिया जाए। पर फैसला सचिन के नाम पर हुआ है। अब यह बहस खत्म है कि ध्यानचंद को सम्मान मिलना चाहिए कि नहीं। अब उन्हें सम्मान मिले भी तो वैसे ही होगा, जैसे हम महात्मा गांधी को भारत रत्न का सम्मान दें।

महात्मा गांधी को भी भारत रत्न नहीं मिला। गांधी को सरकारी सम्मान की ज़रूरत ही नहीं। गांधी की तरह ध्यानचंद को सम्मान के लिए सरकारी अलंकरण की जरूरत नहीं है। पर इतिहास के कालक्रम का ध्यान रखना चाहिए। महापुरुषों का सम्मान करने की प्राथमिकता तय करनी चाहिए। भविष्य के इतिहास में सम्मानित व्यक्तियों की सूचियाँ और उनसे जुड़ी बहसें भी नत्थी होंगी। पर उसके पहले देखें कि दक्षिण एशिया ने क्रिकेट को कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया है।

1975 में जब एक दिनी क्रिकेट के विश्व कप की शुरूआत हुई थी, तब तक यह अंग्रेजों का खेल था। अक्सर सवाल होता है कि भारत में क्रिकेट को इतनी अहमियत क्यों दी जाती है? दूसरे खेलों को क्यों नहीं? नई आर्थिक संस्कृति और कॉरपोरेट-संरक्षण के कारण हमारा क्रिकेट दुनिया के टॉप पर है। इस बदलाव का नेतृत्व भारत ने किया है। पर पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश को मिली सफलताएं भी इसका कारण हैं। सबसे बड़ा कारण तो टीम को मिली सफलता है। सामान्य दर्शक को सफलता और हीरो चाहिए। राष्ट्रीय-अभिमान, उन्माद और मौज-मस्ती के लश्कर इसके सहारे बढ़ते हैं।

क्रिकेट लम्बा और उबाऊ खेल था। यह खत्म हो जाता अगर ऑस्ट्रेलिया के मीडिया-टायकून कैरी पैकर ने इसे नई परिभाषा न दी होती।1975 में पहले विश्व कप के लिए आठ टीमें जुटाना मुश्किल था। उसमें श्रीलंका को शामिल किया गया, जिसे टेस्ट मैच खेलने लायक नहीं समझा जाता था। पूर्वी अफ्रीका के देशों की एक संयुक्त टीम बनाई गई थी। 1979 में कोई नहीं कहता था कि अगला विश्व कप भारत की टीम जीतेगी। 1983 में प्रतियोगिता शुरू होने तक कोई नहीं कह सकता था। इंग्लैंड के सट्टेबाज भारत की सम्भावना पर 66-1 का सट्टा लगा रहे थे। 1982 के एशिया खेलों के कारण हमारा राष्ट्रीय रंगीन टीवी नेटवर्क काम करने लगा था, पर विश्व कप के टीवी प्रसारण की बात सोची भी नहीं गई थी। टीम अप्रत्याशित रूप से सफल हुई तो सेमीफाइनल और फाइनल मैच टेलीकास्ट हुआ। उस खेल में ग्लैमर भी नहीं था। 60 ओवर का मैच दिन की धूप में खेला जाता था। खिलाड़ी रंगीन कपड़े नहीं पहनते थे। सफेद कपड़े पहनते थे।

क्रिकेट की जो लोकप्रियता हम देख रहे हैं उसे इस स्तर पर लाने में मीडिया और कारोबार की भारी भूमिका है। कारोबार को आयकन चाहिए। वे लोकप्रिय नहीं होंगे तो आयकन कैसे? इस विचार से ध्यानचंद निरर्थक हैं। भीड़ उन्हें पहचानती नहीं, भले ही वे महान खिलाड़ी रहे हों। हमने इस भीड़ को उनकी महानता से परिचित ही नहीं कराया। जैसे कमाई के लिए मीडिया को आई बॉल्स चाहिए वैसे ही राजनीति को भी लोकप्रियता की दरकार है। सचिन तेन्दुलकर में इन सबका मेल है। वे महान हैं।

राष्ट्रीय सम्मान राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जुड़े हैं तो उनकी राजनीति भी है। सन 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तब अलंकरणों को खत्म करने का फैसला किया गया। मोरारजी देसाई व्यक्तिगत रूप से अलंकरणों के खिलाफ थे। संयोग है कि सन 1991 में मोरारजी को भारत रत्न का अलंकरण दिया गया। दूरदर्शन ने जब मोरारजी से प्रतिक्रिया माँगी तो उन्होंने कहा, मैं ऐसे अलंकरणों के खिलाफ हूँ आप देना ही चाहते हैं तो मैं क्या कर सकता हूँ। 

पर सचिन के साथ सीएनआर राव के नाम की ज़रूरत क्या थी? सरकार की इच्छा सम्मान करने से ज्यादा उस लोकप्रियता का लाभ लेने में है जो सचिन के संन्यास और मंगलयान के प्रक्षेपण के बाद भारतीय विज्ञान के प्रति विश्वास से उपजी है। सीएनआर राव प्रधानमंत्री की सलाहकार परिषद में हैं। काबिल वैज्ञानिक हैं पर क्या हम अपने काबिल वैज्ञानिकों का सम्मान करते हैं? ऐसा है तो होमी जहाँगीर भाभा और विक्रम साराभाई को क्यों भूल गए

भारत रत्नों की सूची ध्यान से देखें तो पाएंगे कि अलंकरणों का रिश्ता राजनीति से है।  कुछ लोग बरसों बाद याद आए और कुछ कभी याद नहीं आए। दिसम्बर 2011 में सीएनआर राव ने कहा था कि डॉ भाभा को भारत रत्न मिलना चाहिए। यह बात उन्होंने तब कही जब सचिन तेंदुलकर को भारत देने की मांग करते हुए मुम्बई क्रिकेट एसोसिएशन ने उनसे प्रतिक्रिया माँगी। उन्होंने कहा, दुख की बात है कि आज क्रिकेट को विज्ञान से अधिक महत्व मिल रहा है। मुझे सचिन को यह सम्मान देने पर विचार करने को लेकर कोई दिक्कत नहीं है लेकिन भाभा के बारे में क्या? इस महान हस्ती का मरणोपरांत सम्मान करने का शिष्टाचार तो कम से कम होना ही चाहिए। मैं प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखूँगा। लगता है कि सरकार को उनकी चिट्ठी मिल गई और उन्हें राव साहब ही सामने नज़र आए जिन्हें सम्मान दे दिया।
हाल में वल्लभ भाई पटेल की विरासत को लेकर जब कांग्रेस और भाजपा के बीच संग्राम चल रहा था, तब इस बात का उल्लेख हुआ कि पटेल को 1991 में भारत रत्न मिला राजीव गांधी के साथ। जवाहर लाल नेहरू को 1955 में गोविंद बल्लभ पंत को 1957, विधान चन्द्र रॉय को 1961, राजेन्द्र प्रसाद को 1962, लाल बहादुर शास्त्री को 1966, इंदिरा गांधी को 1971, वीवी गिरि को 1975, के कामराज को 1976, एमजी रामचंद्रन को 1988 और भीमराव आम्बेडकर को 1990 में यह सम्मान मिला। इस सूची में केवल सीवी रामन, एम विश्वेसरैया और एपीजे कलाम सिर्फ तीन ऐसे नाम विज्ञान और तकनीक से जुड़े हैं। कोई ज़रूरी नहीं कि भारत के सारे महापुरुषों का सम्मान हो जाए, पर प्राथमिकता तो दिखाई पड़ती है। जैसे खेल में हमें ध्यानचंद याद हैं वैसे ही विज्ञान में हमें भाभा और साराभाई याद हैं। पर आज कौन उन्हें जानता है? सरकार को सीएनआर राव का नाम रहा सीआर राव का नहीं, जिनका नाम आज दुनिया के श्रेष्ठतम गणितज्ञों, सांख्यिकीविदों में शुमार किया जाता है। तमाम नाम और हैं। पर प्रतिभा का सम्मान एक बात है और लोकप्रियता दूसरी। फैसला सरकार का है। बहस आप करिए।