Sunday, May 12, 2013

आज़ादी चाहता है ‘पिंजरे में कैद तोता’


सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को सरकार के पिंजड़े में कैद तोता ही नहीं बताया, उसकी आज़ादी का रास्ता भी साफ कर दिया है। रेलमंत्री पवन कुमार बंसल और कानून मंत्री अश्विनी कुमार को हटा दिया गया है। 

मंत्रियों का रहना या हटना मूल समस्या नहीं है। समस्या का लक्षण है। इन दोनों मंत्रियों के साथ दो अलग-अलग किस्म के मामले जुड़े हैं। पर एक साम्य है। वह है सीबीआई की भूमिका।

 पिछले हफ्ते सीबीआई को लेकर एक महत्वपूर्ण पहल सुप्रीम कोर्ट ने की है। उसने सरकार को प्रकारांतर से निर्देश दिया कि जाँच एजेंसी को बाहरी हस्तक्षेप से बचाने के लिए कानून बनाया जाए। 

यह काम इस मामले पर अगली सुनवाई यानी 10 जुलाई के पहले-पहले कर लिया जाना चाहिए और इसके लिए संसद की स्वीकृति का इंतज़ार नहीं करना चाहिए। यानी अध्यादेश जारी करके यह काम किया जा सकता है।

दिल्ली के येदियुरप्पा न बन जाएं मनमोहन


कर्नाटक ने कांग्रेस की मुश्किल घड़ी में बड़ी मदद की है। उसके डूबते जहाज को सहारा दिया है, बल्कि गहरी मूर्च्छा में पड़ी पार्टी को संजीवनी दी है। पर यह सब इतना ही है, इससे आगे नहीं। कांग्रेस कह रही है कि अब तो ट्रेंड सेट हो गया है, जो 2014 के चुनाव तक चलेगा। यह भी कहा जा रहा है कि यह कांग्रेस की नीतियों की जीत है। 

मनमोहन सिंह ने यह जीत राहुल गांधी को समर्पित की है और दिग्विजय सिंह ने हार का ठीकरा नरेन्द्र मोदी के सिर पर फोड़ा है। कांग्रेस नेता नारायणसामी के अनुसार नरेन्द्र मोदी डूब गए। क्या कर्नाटक के मतदाता ने भ्रष्टाचार के खिलाफ वोट दिया है? बेशक उसने भाजपा के खिलाफ वोट दिया है, पर यह भाजपा के भ्रष्टाचार के खिलाफ है या प्रदेश के विफल प्रशासन के खिलाफ? या भाजपा के वोटों के बँटवारे के कारण? 

सम्भव है सारे कारणों का कुछ न कुछ योगदान हो, पर यह वोट काग्रेस के पक्ष में सकारात्मक न होकर भाजपा के खिलाफ नकारात्मक वोट है। कांग्रेस ने इसका ज्यादा फायदा उठाया, क्योंकि उसने खुद को विकल्प के रूप में पेश किया। जेडीएस को उसने विकल्प नहीं बनाया, क्योंकि जेडीएस का जनाधार छोटा है और 2008 के चुनाव में वोटर ने जेडीएस की धोखाधड़ी के खिलाफ ही भीजेपी को जिताया था।

Saturday, May 11, 2013

अगला कौन?

हिन्दू में केशव का कार्टून

15 नवम्बर 2010 ए राजा, टूजी

7 जुलाई 2011 दयानिधि मारन, एयरसेल-मैक्सिस डील

26 जून 2012 वीरभद्र सिंह, कारोबारी सौदों में घूसखोरी

10 मई 2013 पवन कुमार बंसल और अश्विनी कुमार, रेलगेट और कोलगेट


अगला कौन?

सतीश आचार्य का कार्टून

Friday, May 10, 2013

कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के कुछ ‘गैर-कांग्रेसी’ कारण


Photo: Shikari Rahul!
(Fake Encounter in Karnataka)

ऊपर सतीश आचार्य का कार्टून नीचे हिन्दू में केशव का कार्टून
प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अनुसार कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के सूत्रधार हैं राहुल गांधी
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अनुसार कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के सूत्रधार हैं राहुल गांधी. राहुल गांधी से पूछें तो शायद वे मधुसूदन मिस्त्री को श्रेय देंगे. या कहेंगे कि पार्टी संगठन ने अद्भुत काम किया.

कांग्रेस संगठन जीता ज़रूर पर पार्टी अध्यक्ष परमेश्वरन खुद चुनाव हार गए. कमल नाथ के अनुसार यह कांग्रेस की नीतियों की जीत है.

कांग्रेस की इस शानदार जीत के लिए वास्तव में पार्टी संगठन, उसके नेतृत्व और नीतियों को श्रेय मिलना चाहिए.

पर उन बातों पर भी गौर करना चाहिए, जिनका वास्ता कांग्रेस पार्टी से नहीं किन्ही और ‘चीजों’ से हैं.

राज्यपाल की भूमिका
सन 1987 में जस्टिस आरएस सरकारिया आयोग ने राज्यपाल की नियुक्तियों को लेकर दो महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे. पहला, घनघोर राजनीतिक व्यक्ति को जो सक्रिय राजनीति में हो, उसे राज्यपाल नहीं बनाना चाहिए.

दूसरा यह कि केंद्र में जिस पार्टी की सरकार हो, उसके सदस्य की विपक्षी पार्टी के शासन वाले राज्य में राज्यपाल के रूप में नियुक्ति न हो.

30 मई 2008 को येदियुरप्पा सरकार बनी और उसके एक साल बाद 25 जून 2009 को हंसराज भारद्वाज कर्नाटक के राज्यपाल बने, जो संयोग से इन योग्यताओं से लैस थे.

विधि और न्याय मंत्रालय में भारद्वाज ने नौ वर्षों तक राज्यमंत्री के रूप में और पांच साल तक कैबिनेट मंत्री रहकर कार्य किया. वे देश के सबसे अनुभवी कानून मंत्रियों में से एक रहे हैं.

वे तभी खबरों में आए जब उन्होंने यूपीए-1 के दौर में कई संवेदनशील मुद्दों में हस्तक्षेप किया. प्रायः ये सभी मामले 10 जनपथ से जुड़े थे.

बीबीसी हिंदी डॉटकॉम में पूरा लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें

एक माँ का अचानक खो जाना


प्रमोद जोशी
 साहित्य, संगीत, चित्रकला और रंगमंच पर माँ विषय सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाला विषय है। निराशा में आशा जगाती, निस्वार्थ प्रेम की सबसे बड़ी प्रतीक है माँ। जितना वह हमें जानती है हम उसे नहीं जानते। दक्षिण कोरिया की लेखिका क्युंग-सुक शिन ने अपनी अंतर्राष्ट्रीय बेस्ट सेलर प्लीज लुक आफ्टर मॉममें यही बताने की कोशिश की है कि जब माँ हमारे बीच नहीं होती है तब पता लगता है कि हम उसे कितना कम जानते थे। सन 2011 के मैन एशियन पुरस्कार से अलंकृत इस उपन्यास का 19 भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। और अब यह हिन्दी में माँ का ध्यान रखना नाम से उपलब्ध है।
इसकी कहानी 69 साल की महिला पार्क सो-न्यो के बारे में है, जो दक्षिण कोरिया की राजधानी सोल के मेट्रो स्टेशन पर भीड़ के बीच उसका हाथ पति के हाथ से छूटा और वह बिछुड़ गई। उसका झोला भी उसके पति के पास रह गया। वह खाली हाथ थी। वे दोनों अपने बड़े बेटे ह्योंग चोल के पास आ रहे थे। पूरे उपन्यास में माँ की गुजरे वक्त की कहानी है। पाँच बच्चों की माँ। इनमें तीसरे नम्बर की बेटी लेखिका है। वह ह्योंग चोल को वकील बनाना चाहती थी, पर वह कारोबारी बना। माँ के बिछुड़ जाने पर ह्योंग चोल को अफसोस है। माँ की कहानी त्याग की कहानी है। उसने अपना जन्मदिन भी पिता के जन्मदिन के साथ मनाना शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे खामोशी से माँ का असली जन्मदिन नज़रन्दाज कर दिया गया। जब वह खो गई तो इश्तहार देने के लिए किसी के पास उसकी फोटो नहीं थे। फोटो खिंचाते वक्त वह गायब हो जाती थी। बड़े बेटे को जब शहर में हाईस्कूल के सर्टिफिकेट की ज़रूरत हुई तो उसने पिता को फोन किया कि किसी के हाथ बस से भेज दो, मैं ले लूँगा। उस ठंडी रात में माँ वह कागज लेकर खुद शहर जा पहुँची।

Monday, May 6, 2013

इस स्टूडियो-उन्माद को भी बन्द कीजिए


अच्द्दा हुआ कि लद्दाख में चीनी फौजों की वापसी के बाद तनाव का एक दौर खत्म हुआ, पर यह स्थायी समाधान नहीं है। भारत-चीन सीमा उतनी अच्छी तरह परिभाषित नहीं है, जितना हम मान लेते हैं। दूसरे हम पूछ सकते हैं कि हमारी सेना अपनी ही सीमा के अंदर पीछे क्यों हटी? इस सवाल का जवाब बेहतर हो कि राजनयिक स्तर पर हासिल किया जाए। पिछले हफ्ते कई जगह कहा जा रहा था कि भारत सॉफ्ट स्टेट है। सरकार ने शर्मनाक चुप्पी साधी है। बुज़दिल, कायर, दब्बू, नपुंसक। खत्म करो पाकिस्तान के साथ राजनयिक सम्बन्ध। तोड़ लो चीन से रिश्ते। मिट्टी में मिला दी हमारी इज़्ज़त। इस साल जनवरी में जब दो भारतीय सैनिकों की जम्मू-कश्मीर सीमा पर गर्दन काटे जाने की खबरें आईं तब लगभग ऐसी प्रतिक्रियाएं थीं। और फिर जब लद्दाख में चीनी घुसपैठ और सरबजीत सिंह की हत्या की खबरें मिलीं तो इन प्रतिक्रयाओं की तल्खी और बढ़ गई। टीवी चैनलों के शो में बैठे विशेषज्ञों की सलाह मानें तो हमें युद्ध के नगाड़े बजा देने चाहिए। सरबजीत का मामला परेशान करने वाला है, पर मीडिया ने उसे जिस किस्म का विस्तार दिया वह अवास्तविक है। हम भावनाओं में बह गए। सच यह है कि जब सुरक्षा और विदेश नीति पर बात होती है तो हम उसमें शामिल नहीं होते। उसे बोझिल और उबाऊ मानते हैं। और जब कुछ हो जाता है तो बचकाने तरीके से बरताव करने लगते हैं। हमने 1965, 1971 और 1999 की लड़ाइयों में पाकिस्तान के साथ राजनयिक रिश्ते नहीं तोड़े तो आज तोड़ने वाली बात क्या हो गईहम बात-बात पर इस्रायली और अमेरिकी कार्रवाइयों का जिक्र करते हैं। क्या हमारे पास वह ताकत है? और हो भी तो क्या फौरन हमले शुरू कर दें? किस पर हमले चाहते हैं आप?  बेशक हम राष्ट्र हितों की बलि चढ़ते नहीं देख सकते, पर हमें तथ्यों की छान-बीन करने और बात को सही परिप्रेक्ष्य में समझना भी चाहिए। 

Sunday, May 5, 2013

राष्ट्रगान के रिकॉर्ड बनाने से ज्यादा मिलकर काम करें

राष्ट्रगान के विश्व रिकॉर्ड बनाने से काम चलता हो तो भारत को सिर्फ चीन ही पछाड़ पाएगा, पर हमारी प्रतियोगिता पाकिस्तान से चल रही है। 6 मई को हमारे यहाँ नया विश्व रिकॉर्ड बनने जा रहा है। पर क्या इस विश्व रिकॉर्ड के बाद हमारा समाज ज्यादा समझदार, विवेकशील और कल्याणकारी हो जाएगा। हमें सबके लिए अच्छी शिक्षा, सबके लिए अच्छा स्वास्थ्य और सुशासन चाहिए। पर हमारे यहाँ एक के बाद एक खुलते घोटाले कुछ और कहानी कहते हैं। ठीक है राष्ट्रगीत गाइए, पर गीतों की भावना को जीवन में भी उतारिए। वर्ना यह सब पाखंड भर साबित होगा। इस विषय में मैने इसके पहले एक पोस्ट लिखी थी, उसे नीचे पढ़ें


25 जनवरी 2012 औरंगाबाद

20 अक्टूबर 2012 लाहौर

केवल राष्ट्र्गान गाने से काम चलता हो तो पाकिस्तान ने गिनीज़ बुक ऑफ रिकॉर्ड्स के अंतर्गत विश्व रिकॉर्ड कायम कर लिया है। शनिवार 20 अक्टूबर को लाहौर के नेशनल हॉकी स्टेडियम में 44,200 लोगों ने एक साथ खड़े होकर देश का राष्ट्रगान गाया। पाकिस्तान के लिए एक उपलब्धि यह भी थी कि उसने इस मामले में भारत का रिकॉर्ड तोड़ा था। 25 जनवरी 2012 को महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के डिवीज़नल स्पोर्ट्स ग्राउंड में 15,243 लोगों ने एक साथ खड़े होकर वंदे मातरम गाया था। वह कार्यक्रम लोकमत मीडिया कम्पनी ने आयोजित किया था। उसके पहले 14 अगस्त 2011 को पाकिस्तान के कराची शहर में 5,857 लोगों ने एक साथ अपना राष्ट्रगान गाया था। इस रिकॉर्ड को कायम करने के लिए फेसबुक और ट्विटर की मदद ली गई थी।

शनिवार को लाहौर में कायम किए गए विश्व रिकॉर्ड में पाकिस्तान के पंजाब सूबे के मुख्यमंत्री शाहबाज़ शरीफ भी शामिल थे। राष्ट्रगान और समूहगान हमें एक जुट होने की प्रेरणा देते हैं। हाल में मलाला युसुफज़ई प्रकरण में पाकिस्तान की सिविल सोसायटी ने एकता का परिचय दिया था। इस एकता की दिशा बदहाली और बुराइयों से लड़ने की होनी चाहिए। हम होंगे कामयाब जैसे समूहगान चमत्कारी हो सकते हैं बशर्ते हमारी सामूहिक पहलकदमी में दम हो। सम्भव है कल भारत में कोई इससे भी बड़ी भीड़ से राष्ट्रगान गवाने में कामयाब हो जाए, पर असल बात भावना की है।
राष्ट्रगान के विश्व रिकॉर्ड

छाती पीटने से नहीं होगी राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा


सरबजीत के मामले में भारत सरकार, मीडिया और जनता के जबर्दस्त अंतर्विरोध देखने को मिले हैं। सरबजीत अगस्त 1990 में गिरफ्तार हुआ था और अक्टूबर 1991 में उसे मौत की सजा दी गई थी। इसके बाद यह मामला अदालती प्रक्रियाओं में उलझा रहा और 2006 में पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने भी उसकी सजा को बहाल रखा। इस दौरान भारतीय मीडिया ने उसकी सुध नहीं ली। सरबजीत की बहन और गाँव वालों की पहल पर कुछ स्थानीय अखबारों में उसकी खबरें छपती थीं। इसी पहल के सहारे भारतीय संसद में यह मामला पहुँचा और सितम्बर 2005 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के सालाना सम्मेलन के मौके पर पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्ऱफ के सामने इस मसले को रखा।

Friday, May 3, 2013

कांग्रेस की राह के 11 रोड़े


प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

हिन्दू में सुरेन्द्र का कार्टून

मई 2009 में जब यूपीए-2 की सरकार आई तब लगा था कि देश में स्थिरता का एक दौर आने वाला है.

सरकार के पास सुरक्षित बहुमत है. सहयोगी दल अपेक्षाकृत सौम्य हैं.

इस घटना के कुछ महीने पहले ही मंदी का पहला दौर शुरू हुआ था. हमारी आर्थिक विकास दर 9 प्रतिशत से घटकर 6 प्रतिशत के करीब आ गई थी. पर उस संकट से हम पार हो गए. अन्न के वैश्विक संकट का प्रभाव हमारे देश पर नहीं पड़ा.

नवम्बर 2009 में भारत ने इंटरनेशनल मॉनीटरी फंड से 200 टन सोना खरीदा. इस खरीद का यों तो कोई खास अर्थ नहीं. पर प्रतीक रूप में महत्व है. इस घटना के 18 साल पहले 1991 में जब हमारा विदेशी मुद्रा रिजर्व घटकर दो अरब डॉलर से भी कम हो गया था, हमें अपने पास रखे रिजर्व सोने में से 67 टन सोना बेचना पड़ा था.

इसके अगले साल यानी 2010 तक देश के उत्साह में कमी नहीं थी. एक अप्रैल 2010 को हमने हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार दिया. आर्थिक इंडिकेटर्स भी ठीक थे. पर जून आते-आते हालात बदल गए. और तब से पिछले तीन साल में कांग्रेस की कहानी में बुनियादी पेच पैदा हुए हैं. स्क्रिप्ट भटक गई है.

सबसे बड़ी बात यह कि लालकृष्ण आडवाणी के पराभव के बाद रसातल की ओर जा रही भारतीय जनता पार्टी को नकारात्मक प्रचार का फ़ायदा मिला और कांग्रेस को नुकसान.

इस दौरान कांग्रेस को केवल एक बड़ी राजनीतिक सफलता मिली है. वह है राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद पर उसके प्रत्याशियों की जीत. इस बात को जानने की कोशिश करें कि वे कौन से बिन्दु हैं जो कांग्रेस को परेशान करते हैं.
पूरा लेख बीबीसी हिन्दी वैबसाइट में पढ़ें

अमेरिका जाने का शौक है तो उसे झेलना भी सीखिए


अमेरिका के हवाई अड्डों से अक्सर भारतीय नेताओं या विशिष्ट व्यक्तियों के अपमान की खबरें आती हैं। अपमान से यहाँ आशय उस सामान्य सुरक्षा जाँच और पूछताछ से है जो 9/11 के बाद से शुरू हुई है। आमतौर पर यह शिकायत विशिष्ट व्यक्तियों या वीआईपी की ओर से आती है। सामान्य व्यक्ति एक तो इसके लिए तैयार रहते हैं, दूसरे उन्हें उस प्रकार का अनुभव नहीं होता जिसका अंदेशा होता है। मसलन एक पाकिस्तानी नागरिक ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि मुझसे तकरीबन 45 मिनट तक पूछताछ की गई, पर किसी वक्त अभद्र शब्दों का इस्तेमाल नहीं हुआ। मेरी पत्नी को मैम और मुझे सर या मिस्टर सिद्दीकी कहकर ही सम्बोधित किया गया। उन्होंने सवाल भी मामूली पूछे, जिनमें मेरा कार्यक्रम क्या है, मैं करता क्या हूँ, अमेरिका क्यों आया हूँ वगैरह थे। दरअसल हमारे देश के नागरिक अपने देश की सुरक्षा एजेंसियों के व्यवहार से इतने घबराए होते हैं कि उन्हें अमेरिकी एजेंसियों के बर्ताव को लेकर अंदेशा बना रहता है।

Monday, April 29, 2013

'नेता' का एजेंडा सेट कर गए मोदी



कर्नाटक में भाजपा ने नरेंद्र मोदी का बेहतर इस्तेमाल जान-बूझकर नहीं किया या यह पार्टी के भीतरी दबाव का परिणाम था? सिर्फ एक रैली से मोदी पार्टी के सर्वमान्य नए राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित नहीं होते.

हाँ, वे प्रादेशिक नेता के बजाय राष्ट्रीय नेता के रूप में प्रकट ज़रूर हुए हैं. उससे ज्यादा बड़ी बात यह है कि उन्होंने मौका लगते ही ‘ताकतवर नेता’ की ज़रूरत को फिर से राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना दिया है.

पूरा लेख पढ़ें बीबीसी हिन्दी की वैबसाइट पर
और एक पुराना लेख
क्या मोदी की मंच कला राहुल से बेहतर है

हिन्दू में सुरेन्द्र का कार्टून

सतीश आचार्य का कार्टून

हिन्दू में सुरेन्द्र का कार्टून

सीबीआई क्या खुद पहल करेगी?

कोल ब्लॉक आबंटन की स्टेटस रिपोर्ट के मसले में कानून मंत्री और सीबीआई डायरेक्टर दोनों ने मर्यादा का उल्लंघन किया है। पर इस वक्त सीबीआई डायरेक्टर चाहें तो एक बड़े बदलाव के सूत्रधार बन सकते हैं। इस मामले में सच क्या है, उनसे बेहतर कोई नहीं जानता। उन्हें निर्भय होकर सच अदालत और जनता के सामने रखना चाहिए। दूसरे ऐसी परम्परा बननी चाहिए कि भारतीय प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा तथा अन्य महत्वपूर्ण सेवाओं के अफसरों को सेवानिवृत्ति के बाद कम से कम पाँच साल तक कोई नियुक्ति न मिले। भले ही इसके बदले उन्हें विशेष भत्ता दिया जाए। इससे अफसरों के मन में लोभ-लालच नहीं रहेगा। सत्ता का गलियारा बेहद पेचीदा है। यहाँ के सच उतने सरल नहीं हैं, जितने हम समझते हैं। बहरहाल काफी बातें अदालत के सामने साफ होंगी। रंजीत सिन्हा के हलफनामे में जो नहीं कहा गया है वह सामने आना चाहिएः-
कुछ बातें जो अभी तक विस्मित नहीं करती थीं, शायद वे अब विस्मित करें। कोयला मामले में सीबीआई डायरेक्टर रंजीत सिन्हा के अदालत में दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि मामले की स्टेटस रिपोर्ट का ड्राफ्ट कानून मंत्री को दिखाया गया, जिसकी उन्होंने इच्छा व्यक्त की थी। सीबीआई ने अपनी रपट 8 मार्च को दाखिल की थी। उसके बाद 12 मार्च को अटॉर्नी जनरल जीई वाहनावती ने अदालत से कहा कि हमने इस रपट को देखा नहीं था। इसके बाद अदालत ने सीबीआई के डायरेक्टर को निर्देश दिया कि वे हलफनामा देकर बताएं कि यह रिपोर्ट सरकार को दिखाई गई या नहीं। अदालत ने ऐसा निर्देश क्यों दिया? इसके बाद 13 अप्रेल के अंक में इंडियन एक्सप्रेस ने खबर दी कि सीबीआई डायरेक्टर अदालत में दाखिल होने वाले हलफनामे में इस बात को स्वीकार करेंगे कि रपट सरकार को दिखाई गई थी।

Sunday, April 28, 2013

चीनी रिश्तों की जटिलता को समझिए


भारत और चीन के बीच जितने अच्छे रिश्ते व्यापारिक धरातल पर हैं उतने अच्छे राजनीतिक मसलों में नहीं हैं। लद्दाख का विवाद कोई बड़ी शक्ल ले सके पहले ही इसका हल निकाल लिया जाना चाहए। पर उसके पहले सवाल है कि क्या यह विवाद अनायास खड़ा हो गया है या कोई योजना है। हाल के वर्षों में चीन के व्यवहार में एक खास तरह की तल्खी नज़र आने लगी है। इसे गुरूर भी कह सकते हैं। यह गुरूर केवल भारत के संदर्भ में ही नहीं है। उसके अपने दूसरे पड़ोसियों के संदर्भ में भी है। जापान के साथ एक द्वीप को लेकर उसकी तनातनी काफी बढ़ गई थी। दक्षिण चीन सागर में तेल की खोज को लेकर वियतनाम के साथ उसके रिश्तों में तल्खी आ गई है। संयोग से भारत भी उस विवाद में शामिल है। दक्षिणी चीन सागर में अधिकार को लेकर चीन का वियतनाम, फिलीपींस, ताइवान, ब्रुनेई और मलेशिया के साथ विवाद है। चीन इस पूरे सागर पर अपना दावा जताता है जिसका पड़ोसी देश विरोध करते है। चीन के सबसे अच्छे मित्रों में पाकिस्तान का नाम है। यह इसलिए है कि हमारा पाकिस्तान के साथ विवाद है या पाकिस्तान ने चीन का साथ इसलिए पकड़ा है कि वह भविष्य में भी हमारा प्रतिस्पर्धी रहेगा, कहना मुश्किल है। 

चीनी घुसपैठ गम्भीर है, चिंतनीय नहीं

चीनी के साथ हमारा सीमा विवाद जिस स्तर का है उसके मुकाबले पाकिस्तान के साथ विवाद छोटा है, बावजूद इसके चीन के साथ हमारे रिश्तों में वैसी कड़वाहट नहीं है जैसी पाकिस्तान के साथ है। बुनियादी तौर पर पाकिस्तान का इतिहास 66 साल पुराना है और चीन का कई हजार साल पुराना। वह आज से नहीं हजारों साल से हमारा प्रतिस्पर्धी है। यह प्रतिस्पर्धा पिछले कुछ सौ साल से कम हो गई थी, क्योंकि भारत और चीन दोनों आर्थिक शक्ति नहीं रहे। पर अब स्थिति बदल रही है। बेशक हमारे सीमा विवाद पेचीदा हैं, पर दोनों देश उन्हें निपटाने के लिए लम्बा रास्ता तय करने को तैयार हैं। चीन हमें घेर रहा है या हम चीन की घेराबंदी में शामिल हैं, यह बात दोनों देश समझते हैं। फिर भी लद्दाख में चीनी घुसपैठ किसी बड़े टकराव का कारण नहीं बनेगी। चीन इस वक्त जापान के साथ टकराव में है और भारत से पंगा लेना उसके हित में नहीं। 

Tuesday, April 23, 2013

हमारी निष्क्रियता हमारे पाखंड


 इन सवालों को हिन्दू या मुसलमानों के सवाल मानकर हम किसी एक तरफ खड़े हो सकते हैं पर हमें व्यावहारिक उत्तर चाहिए। टोपी पहन कर किसी एक समुदाय को और टीका लगाकर किसी दूसरे को खुश करने की राजनीति खतरनाक है। इसीलिए कश्मीरी पंडितों के जीवन-मरण के सवाल को हम साम्प्रदायिक मानते हैं और मुसलमानों की आर्थिक बदहाली को छिपाकर उनके भावनात्मक मसलों को उठाते हैं। इतिहास का पहिया उल्टा घुमाया नहीं जा सकता पर यदि आज हमारे सामने 1947 पर वापस जाने का विकल्प हो तो लाखों मुसलमान भी अपने घरों को छोड़कर जाना नहीं चाहेंगे। विभाजन ने हमें बांटा ही नहीं, राजनीतिक पाखंडों से भी लैस कर दिया है। यह खतरनाक है।
बड़ी संख्या में हिन्दू परिवार पाकिस्तान छोड़कर भागना चाहते हैं। बांग्लादेश में 1971 के अपराधियों को लेकर आंदोलन चल रहा है। और रिफ्यूजी कैम्पों में रह रहे कश्मीरी पंडित सवाल पूछ रहे हैं कि क्या हमारा भी कोई देश है। पिछले महीने राज्यसभा में गृह राज्यमंत्री आरपीएन सिंह ने स्वीकार किया कि घाटी में रहने वाले पंडितों को एक पत्र मिला है कि वे कश्मीर छोड़कर चले जाएं। घाटी में रहने वाले पंडितों की संख्या अब बेहद मामूली है। कुल मिलाकर चार हजार के आसपास। पर 1947 में उनकी संख्या डेढ़ से दो लाख के बीच थी। यानी कुल आबादी की 15 फीसदी के आसपास। 1947 की आज़ादी उनके लिए मौत का संदेश लेकर आई थी। सन 1948 के फसादों और 1950 के भूमि सुधारों के बाद तकरीबन एक लाख पंडित कश्मीर छोड़कर चले गए। उनपर असली आफत आई 1989 के बाद। 14 सितंबर, 1989 को चरमपंथियों ने भारतीय जनता पार्टी के राज्य सचिव टिक्का लाल टपलू की हत्या की। जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ़्रंट के नेता मक़बूल बट को मौत की सज़ा सुनाने वाले सेवानिवृत्त सत्र न्यायाधीश नीलकंठ गंजू की हत्या उसके डेढ़ महीने बाद हुई। फिर 13 फ़रवरी, 1990 को श्रीनगर के टेलीविज़न केंद्र के निदेशक लासा कौल की हत्या हुई। तकरीबन चार लाख पंडित उस दौरान बेघरबार हुए या मारे गए। ये लोग आज शरणार्थी शिविरों में निहायत अमानवीय स्थितियों में रह रहे हैं। पंडितों को जितनी शिकायत आतंकवादियों से है उतनी भारतीय राजव्यवस्था से भी है।