राइजिंग कश्मीर के सम्पादक शुजात बुखारी की
हत्या,जिस रोज हुई, उसी रोज सेना के एक जवान औरंगजेब
खान की हत्या की खबर भी आई थी। इसके दो-तीन दिन पहले से कश्मीर में अचानक हिंसा का
सिलसिला तेज हो गया था। नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तानी गोलीबारी से बीएसएफ के चार
जवानों की हत्या की खबरें भी इसी दौरान आईं थीं। हिंसा की ये घटनाएं कथित
युद्ध-विराम के दौरान तीन हफ्ते की अपेक्षाकृत शांति के बाद हुई हैं। कौन है इस
हिंसा के पीछे?भारतीय विशेषज्ञों का अनुमान है कि इसमें लश्कर या
हिज्बुल मुजाहिदीन का हाथ है।
हिज्ब और लश्कर ने कहा
है कि हत्या में हमारा हाथ नहीं है। हिज्ब और युनाइटेड जेहाद कौंसिल के मुखिया
सैयद सलाहुद्दीन ने इसकी अंतरराष्ट्रीय जाँच की माँग की है। लश्करे तैयबा का कहना
है कि इस हत्या में भारतीय खुफिया एजेंसियों का हाथ है। लश्कर की मानें तो मुम्बई
से लेकर पठानकोट और उड़ी हमलों तक सबमें भारतीय एजेंसियों का हाथ था। बातों को
घुमाना इस गिरोह की विशेषता है।
हत्या का कारण भी साफ
है। बुखारी स्वतंत्र राय रखने वाले पत्रकार थे। वे मध्यमार्गी थे और शांति की राह
पर चलने में भरोसा रखते थे। रमजान के महीने में भारतीय सशस्त्र बलों ने एक महीने
के लिए कार्रवाई रोकने की जो घोषणा की थी, उसका उन्होंने स्वागत किया था। अपने
लेखों के मार्फत उन्होंने आंदोलनकारियों से और पाकिस्तानी प्रतिष्ठान से आग्रह
किया था कि यह बेहतरीन मौका है, शांति-स्थापना के लिए बात आगे बढ़नी चाहिए। ज़ाहिर
है, जिसे यह बात पसंद नहीं होगी, उसने ही उनकी हत्या की योजना बनाई होगी। पुलिस ने
सीसीटीवी के मार्फत जिन तीन संदिग्ध बाइक सवारोंकी तस्वीर निकाली है, उनकी पहचान
कर ली गई है। तीनों लश्कर के आतंकी हैं। इनमें नवीद जट कुछ समय पहले कश्मीर अस्पताल
से फरार हुआ था।
शुजात बुखारी भारत-पाक
शांति वार्ता और कश्मीर विवाद को सुलझाने के लिए लगातार प्रयत्नशील थे। उनके अखबारों
कोकश्मीर घाटी की आवाज माना जाता था। उनपर इससे पहले भी हमले हो चुके थे। जुलाई
1996 में आतंकियों ने उन्हें 7 घंटे तक अनंतनाग में बंधक बनाकर रखा था। फिर 2000
में जान की धमकी दी गई, 2006 में भी हमला हुआ। पिछले साल भी उन्हें धमकी मिली थी। सभी
धमकियाँ पाकिस्तानी गिरोहों ने दी थीं।
जाहिर है कि यह हत्या उनकी आवाज़ को खामोश करने के मकसद से की गई है।
वे शांति स्थापना की बातें कर रहे थे और अलग तरह से सोचने की वकालत करते थे। शांति-प्रयासों
को विफल बनाने वालों की योजना का वेमोहरा बने हैं। यह हत्या उस वक्त की गई है, जब एकतरफा
संघर्ष विराम की मियाद ख़त्म होने जा रही थी। उसे आगे बढ़ाने और शांति की पहल किए
जाने की उम्मीदें बन रहीं थीं। हत्या के फौरन बाद कुछ लोगों ने माँग की है कि फौजी
कार्रवाई रोकने की कोई जरूरत नहीं है। पर सरकार का फैसला सोच-विचारकर ही होगा। हालात
को सरकार और सुरक्षाबल बेहतर जानते हैं।
कश्मीर के पाकिस्तान-परस्त कट्टरपंथी शुजात बुखारी को भारतीय
एजेंसियों का दलाल मानते थे। भारतीय कट्टरपंथी भी उन्हें नापसंद करते थे, क्योंकि
वे शांति और विमर्श की बात कर रहे थे। संयोग है कि जिस दिन उनकी हत्या हुई ट्विटर
पर ऑब्ज़र्वर फाउंडेशन की एक चर्चा का जिक्र चल रहा था, जिसमें उन्हें पूर्वाग्रही
बताया गया। इस प्रकार के आरोप स्वतंत्र राय रखने वालों पर अक्सर लगते हैं। स्वतंत्र
राय रखना न केवल साहस का काम है, उसके लिए स्पष्ट दृष्टिकोण की जरूरत भी होती है।
नए रास्ते भी वही सुझा सकते हैं, जिनके पास नई दृष्टि हो।
शुजात बुखारी कश्मीर समस्या के समाधान के लिए ट्रैक-टू से जुड़े थे और
हाल में दुबई में हुई एक बैठक में वे शामिल हुए थे। इस बैठक में कहा गया था कि हर
तरफ से हिंसा रुकनी चाहिए। हिंसा से समस्या का समाधान नहीं हो सकता। पिछले दिनों
खबरें थीं कि पाकिस्तान-परस्त गुटों कोष खासतौर से सैयद सलाहुद्दीन को यह बात पसंद
नहीं आई थी। कश्मीरी अखबारों में उनकी प्रतिक्रिया प्रकाशित हुई थी, ‘कश्मीरी लोग प्याज और आलू की तिजारत के लिए अपना खून नहीं बहा रहे
हैं...और न वे कश्मीर का स्थायी विभाजन चाहते हैं। दुबई सम्मेलन में हिस्सा लेने
वाले लोग पैसा लेकर काम कर रहे हैं।’
हाल में एक ब्लॉग में शुजात बुखारी पर आरोप लगाया गया था कि वे भारत
सरकार की तरफ से बोल रहे हैं। जिस तरह उनकी हत्या हुई है, तकरीबन उसी तरह मार्च
2003 में हिज्ब के कमांडर अब्दुल मजीद दार की हत्या हुई थी। दार ने ऐसे ही एक
शांति-प्रयास के तहत सन 2000 में एकतरफा युद्ध-विराम की घोषणा की थी, जिसे
पाकिस्तान-परस्त लोगों ने पसंद नहीं किया था। पाक-परस्त टोली कश्मीर में किसी कीमत
पर शांति नहीं चाहती। गृहमंत्री राजनाथ सिंह के कश्मीर दौरे के बाद फौजी कार्रवाई
रोके जाने की घोषणा एक योजना के तहत की गई थी, जिसे लेकर पाकिस्तान-परस्त ताकतें
सशंकित हैं। शुजात बुखारी उस अंदेशे के शिकार हुए हैं।
हत्याजिस दिन हुई उसी दिन संयुक्त राष्ट्र के
एक संगठन ने कश्मीर में मानवाधिकार पर एक रिपोर्ट जारी की। बुखारी ने अपने आखिरी
ट्वीट में इस रिपोर्ट का उल्लेख किया था। इस रिपोर्ट में भारत और पाकिस्तान दोनों
की आलोचना की गई है, पर वस्तुतः इसमें कुछ बुनियादी बातों का ध्यान नहीं रखा गया
है। इसमें लश्करे तैयबा और जैशे मोहम्मद को आतंकवादी गिरोहों के रूप में नहीं
दर्शाया गया है, जबकि सुरक्षा परिषद ने इन दोनों संगठनों को आतंकवादी घोषित किया
है। रिपोर्ट में 26 जगह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को ‘आजाद कश्मीर’लिखा गया है, जिससे लगता
है कि किसी पाकिस्तानी ने बैठकर रिपोर्ट तैयार की है।
मानवाधिकार पर संयुक्त
राष्ट्र उच्चायुक्त जैद रा’ड अल हुसेन के व्यक्तिगत राजनीतिक विचार इस
रिपोर्ट में झलकते हैं। जॉर्डन के शाही परिवार से ताल्लुक रखने वाले जैद का
कार्यकाल इसी 31 अगस्त को पूरा होने वाला है। उन्होंने केवल दो वर्षों की घटनाओं
को आधार बनाकर जो रिपोर्ट तैयार की है, वह विवादास्पद है। भारत ने प्राथमिक रूप से
इसपर अपना रोष जाहिर कर दिया है, जिसे आगे बढ़ाना चाहिए। दुनिया को बताने की जरूरत है कि जब हम कश्मीर में शांति की पहल करते हैं,
तो उसमें कैसे अड़ंगे लगाए जाते हैं। शुजात बुखारी की हत्या का उदाहरण सामने है।
हरिभूमि में प्रकाशित
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (19-06-2018) को "कैसे होंगे पार" (चर्चा अंक-3006) पर भी होगी।
ReplyDelete--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन बिहार विभूति डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह जी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।
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