Saturday, January 4, 2014

कांग्रेस के पास राहुल के अलावा कोई विकल्प नहीं

 शनिवार, 4 जनवरी, 2014 को 09:40 IST तक के समाचार
राहुल गाँधी
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने साफ़ कर दिया है कि वे यूपीए के प्रधानमंत्री पद के अगले उम्मीदवार नहीं होंगे. ऐसे में सवाल उठता है कि भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का मुक़ाबला करने के लिए फिर कांग्रेस के पास कौन है?
अगर यह मान भी लें कि यूपीए सरकार आगे आने वाली है या संभावित है तो सबसे पहले राहुल गाँधी का नाम आएगा. 17 जनवरी को ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की बैठक में संभवतः राहुल गाँधी के नाम की घोषणा भी हो जाए.
अगर राहुल गाँधी का नाम घोषित नहीं हुआ, तो किसका नाम सामने आएगा? यह सवाल बहुत सहज इसलिए भी है क्योंकि राहुल गाँधी ने अभी तक कभी भी नहीं कहा है कि वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं.
इससे पहले राहुल गाँधी से जब भी सरकार में आने का आग्रह किया गया, उन्होंने मना ही किया है. ऐसे में संभवतः अंतिम क्षण में राहुल गाँधी प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए मना भी कर दें.
ऐसे में कांग्रेस के नेताओं में से एक या दो के नाम ज़ेहन में आते हैं. सबसे पहला नाम है वित्त मंत्री पी चिदंबरम और दूसरा नाम है एके एंटनी. दोनों ही नेता दक्षिण भारत से हैं. एक तमिलनाडु के हैं, तो दूसरे केरल के. हाल ही में चिदंबरम ने ज़ोर देकर कहा था कि कांग्रेस को अब पीएम पद के उम्मीदवार की घोषणा करनी चाहिए. हालाँकि वे यह भी कहते रहे हैं कि मुझे अपनी सीमाएं मालूम हैं.

Friday, January 3, 2014

‘अच्छी छवि’ के दौर में खराब छवि के शिकार मनमोहन

 शुक्रवार, 3 जनवरी, 2014 को 15:07 IST तक के समाचार
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के संवाददाता सम्मेलन में किसी बड़ी घोषणा की उम्मीद नहीं थी. सिवाय इसके कि उनके इस्तीफ़े को लेकर क़्यास थे, जिन्हें उन्होंने दूर कर दिया. यह भी साफ़ कर दिया कि वे तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के इच्छुक नहीं हैं.
उनका संवाददाता सम्मेलन एक माने में जनता को संबोधित करने का तीसरा मौक़ा था. सन 2011 के फ़रवरी और 2012 में टेलिविज़न पर दो बार वे चुनिंदा मीडियाकर्मियों से रूबरू हुए थे. हाल के चुनावों में कांग्रेस की हार और पार्टी नेतृत्व को लेकर पैदा हो रहे असमंजस को दूर करना शायद इस संवाददाता सम्मेलन का उद्देश्य था.
एक और उद्देश्य नरेंद्र मोदी के ख़तरे की ओर जनता का ध्यान खींचना था. पिछले डेढ़ साल से नरेंद्र मोदी ने मनमोहन सिंह को सीधा निशाना बना रखा है. इस बार मनमोहन सिंह ने उन्हें निशाना बनाया. शायद यह पार्टी की लोकसभा चुनाव की रणनीति का हिस्सा है.
प्रधानमंत्री ने अपने दस साल के पूरे कार्यकाल की उपलब्धियों का ज़िक्र भी इस मौक़े पर किया, पर होता हमेशा यही है कि सारी बहस उनके नेतृत्व पर उठे सवालों तक सिमट जाती है. सच यह है कि उन्होंने यूपीए-2 की विफलताओं के जो कारण गिनाए उनसे सामान्य व्यक्ति की सहमति नहीं है. वे मानते हैं कि हम महंगाई को नियंत्रित नहीं कर पाए और पर्याप्त संख्या में रोज़गार पैदा नहीं कर पाए. पर केवल इसी वजह से यूपीए सरकार को लेकर जनता के मन में रोष नहीं है.

दिल्ली विधानसभा में अरविंद केजरीवाल का भाषण

विश्वास मत  पर दिल्ली विधानसभा में हुई चर्चा  का जवाब देते हुए अरविंद केजरीवाल ने जो बातें कहीं उन्हें विस्तार से आज दैनिक भास्कर ने इस रूप में प्रकाशित किया हैः-
दैनिक भास्कर में प्रकाशित

कांग्रेस और भाजपा ने 'आप' से क्या सीखा?


हिंदू में सुरेंद्र का कार्टून
गुरुवार को जिस वक्त दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की सरकार के विश्वासमत पर चर्चा चल रही थी, टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज़ आई कि महाराष्ट्र सरकार ने आदर्श मामले पर गठित आयोग की रपट को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया है। इस खबर से दो बातें ज़ाहिर हुईं। एक 'आप' परिघटना ने कांग्रेस को भीतर तक हिला दिया है। साथ में दूसरी बात यह भी साबित हुई कि कांग्रेस के नेता इस बात से कोई सबक सीखना नहीं चाहते। महाराष्ट्र सरकार ने आंशिक रूप से रपट स्वीकार करके जनता की आँखों में धूल झोंकने की कोशिश की है। उसने अब अफसरों को नापने और राजनेताओं को बचाने का काम शुरू किया है। नीचे पढ़ें आज के हिंदू में प्रकाशित रपट का एक अंश

Five days after Congress vice-president Rahul Gandhi criticised the Maharashtra government’s rejection of the Adarsh Commission of Inquiry report, the State Cabinet revised its stand and accepted the report on Thursday.

However, the Action Taken Report (ATR), issued upon acceptance of the report recommends no action against the six politicians indicted by the Commission for extending “political patronage” to the controversial building project on the grounds that there were “no allegations of criminality” against them.

The 12 IAS officers named for violating All India Service Conduct Rules will be proceeded against. The Commission’s report indicted four former Congress Chief Ministers, including Sushilkumar Shinde, now Union Home Minister, Vilasrao Deshmukh, Ashok Chavan and Shivajirao Nilangekar Patil.

It had also indicted two NCP Ministers of State, Sunil Tatkare and Rajesh Tope. In the case of the latter two, the ATR goes a step further and says they had not dealt with any files related to the building. The Bharatiya Janata Party was quick to denounce this.

अरुण जेटली का लेख 

कांग्रेस के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी ने भी 'आप' परिघटना से कुछ सीखने का निश्चय किया है। भारतीय जनता पार्टी की वैबसाइट पर अरुण जेटली का लेख गुरुवार को प्रकाशित हुआ है जिसमें उन्होंने लिखा है कि हाल के चुनाव परिणामों का संदेश साफ है कि भारत में वोटर की अपेक्षाएं बढ़ रहीं हैं। हमें इन परिणामों से सबक सीखने चाहिए। इस लेख के अंशः-

Is 2014 going to be substantially different in terms of India’s polity and governance? The bar of expectation of Indian people has been raised high. It is not merely the Indian middle class which is the strong opinion maker. There is additionally a substantial aspirational class in India whose level of expectations is entirely different. They are going to judge Indian politics, persons in public life and the quality of governance harshly. They will vote in governments and vote out governments if they found them not meeting popular aspirations. पूरा लेख यहाँ पढ़ें

Thursday, January 2, 2014

प्रतीकों से बाहर अब काम पर आना होगा 'आप' को

 गुरुवार, 2 जनवरी, 2014 को 17:05 IST तक के समाचार
इस बात को लेकर संशय नहीं कि दिल्ली की सरकार अपना बहुमत आसानी से साबित करेगी. मेट्रो यात्रा, लालबत्ती का तिरस्कार, मुफ़्त पानी और सस्ती बिजली, मीटरों और खातों की जाँच और विश्वासमत के आगे अब क्या?
कांग्रेस, ‘आप’ और भाजपा के ‘प्रेम-घृणा और ईर्ष्या की इस त्रिकोण कथा’ का पहला अध्याय प्रतीकों को समर्पित रहा. इस दौरान राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने ‘आप’ के उदय को क्रांतिकारी घटना के रूप में देखा. अब उसका उस अग्निपरीक्षा से सामना है, जिसे उसने खुद चुना है.
‘आप’ की ओर से बार-बार कहा गया कि हम सरकार बनाने के इच्छुक नहीं हैं. हमने किसी से समर्थन नहीं माँगा. जनता ने सरकार बनाने का आदेश दिया. हम अपना काम कर रहे हैं.

मुरव्वत का दौर खत्म

तीनों पार्टियाँ अब अपने कदम तौल रही हैं. भारतीय जनता पार्टी ने ‘आप’ और कांग्रेस पर एक साथ हमला बोला है और दोनों के बीच साठ-गांठ साबित करने की कोशिश की है.

टेक्नोट्रॉनिक क्रांति 2014

हर रोज़ कुछ नया, कुछ अनोखा
 हाल में दिल्ली में हुए इंडो-अमेरिकन फ्रंटियर्स ऑफ इंजीनियरिंग सिंपोज़ियम में कहा गया कि सन 2014 में बिगडेटा, बायोमैटीरियल, ग्रीन कम्युनिकेशंस और सिविल इंजीनियरी में कुछ बड़े काम होंगे. बिगडेटा यानी ऐसी जानकारियाँ जिनका विवरण रख पाना ही मनुष्य के काबू के बाहर है. मसलन अंतरिक्ष से जुड़ी और धरती के मौसम से जुड़ी जानकारियाँ. इनके विश्लेषण के व्यावहारिक रास्ते इस साल खुलेंगे. सन 2014 में साइंस और टेक्नॉलजी की दुनिया में क्या होने वाला है, इसपर नज़र डालते हैं.

Tuesday, December 31, 2013

आज का सूर्यास्त ‘आप’ के नाम


दिल्ली में शपथ लेने के बाद अरविंद केजरीवाल ने गीत गाया, इंसान का इंसान से हो भाईचारा, यही पैगाम हमारा. ऐसे तमाम गीत पचास के दशक की हमारी फिल्मों में होते थे. नए दौर और नए इंसान की नई कहानी लिखने का आह्वान उन फिल्मों में था. पर साठ साल में राजनीति के ही नहीं, फिल्मों, नाटकों, कहानियों और सीरियलों के स्वर बदल गए. सन 1952 के चुनाव में आम आदमी पार्टी की ज़रूरत नहीं थी. सारी पार्टियाँ आप थीं. तब से अब में पहिया पूरी तरह घूम चुका है. जो हीरो थे, वे विलेन हैं.

Sunday, December 29, 2013

राहुल बनाम मोदी बनाम 'आप'

सन 2013 में साल की शुरुआत नौजवानों, खासकर महिलाओं की नाराजगी के साथ हुई थी। दिल्ली गैंगरेप के खिलाफ वह आंदोलन किसी भी नज़रिए से राजनीतिक नहीं था। पर उस आंदोलन ने बताया कि भारतीय राजनीति में युवाओं और महिलाओं की उपस्थिति बढ़ रही है। राजनीति का समुद्र मंथन निरंतर चलता रहता है। साल का अंत होते-होते सागर से लोकपाल रूपी अमृत कलश निकल कर आया है। रोचक बात यह है कि पार्टियों की कामधेनु बने वोटर को यह अमृत तब मिला जब वह खुद इसके बारे में भूल चुका था। संसद के इस सत्र में लोकपाल विधेयक पास करने की योजना नहीं थी। पर उत्तर भारत की चार विधानसभाओं के चुनाव परिणामों ने सरकार को इतना भयभीत कर दिया कि आनन-फानन यह कानून पास हो गया।

बावजूद इसके इस साल की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना लोकपाल विधेयक का पास होना नहीं है। बल्कि आम आदमी पार्टी का उदय है। विडंबना है कि जिस लोकपाल कानून के नाम पर आप का जन्म हुआ, वही इसकी सबसे बड़ी विरोधी है। आप किसी सकारात्मक राजनीति का परिणाम न होकर विरोध की देन है। दिसंबर 2011 के अंतिम सप्ताह में लोकपाल विधेयक को लोकसभा से पास करके जिस तरह राज्यसभा में अटका दिया गया, उससे अन्ना हजारे को नहीं देश की जनता के मन को ठेस लगी थी। अन्ना के आंदोलन के साथ यों भी पूरा देश नहीं था। वह आंदोलन दिल्ली तक केंद्रित था और मीडिया के सहारे चल रहा था। पर भ्रष्टाचार को लेकर जनता की नाराजगी अपनी जगह थी। इस साल मार्च में पवन बंसल और अश्विनी कुमार को अलग-अलग कारणों से जब पद छोड़ने पड़े तब भी ज़ाहिर हुआ कि जनता के मन में यूपीए सरकार के खिलाफ नाराज़गी घर कर चुकी है। उन्हीं दिनों सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को तोता नाम से विभूषित किया था।

सीले पटाखों से कैसे मनेगी कांग्रेस की दीवाली?

पाँच राज्यों की विधान सभाओं के चुनाव परिणाम आने के पहले राहुल गांधी के चेहरे पर हल्की सी दाढ़ी बढ़ी होती थी। पिछली 22 दिसंबर को फिक्की की सभा में राहुल गांधी का या दूसरे शब्दों में कांग्रेस नया चेहरा सामने आया। इस सभा में राहुल चमकदार क्लीनशेव चेहरे में थे। उद्योग और व्यवसाय के प्रति वे ज्यादा संवेदनशील नज़र आए। संयोग से उसी दिन पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने इस्तीफा दिया था। उस इस्तीफे को लोकसभा चुनाव के पहले की संगठनात्मक कवायद माना गया था। अंदरखाने की खबरें हैं कि देश के कॉरपोरेट सेक्टर को सरकार से शिकायतें हैं। विधानसभा चुनाव के पहले तक राहुल गांधी का ध्यान गाँव और गरीब थे। अब शहर, मध्य वर्ग और कॉरपोरेट सेक्टर भी उनकी सूची में है।

Wednesday, December 25, 2013

'आप' की सरकार पर कुछ प्रतिक्रियाएं

मंजुल का कार्टून

फेसबुक पर बीबीसी हिंदी के पेज पर एक पाठक की प्रतिक्रियाः-

कमाल जनता है मेरे देश की
जब आन्दोलन कर
रहे थे तो कहने लगे
 अनशन आन्दोलन से कुछ नही होगा पार्टी बनाइये चुनाव लड़िये!
चुनाव लड़ने लगे तो कहने लगे,
नौसिखिये हैं, बुरी तरह हारेंगे! 
चुनाव जीत गये तो कहते हैं, 
सत्ता के भूखे हैं! 
सत्ता छोड़ के विपक्ष मे बैठने लगे तो कहते हैं, 
के जनता को किये वादे पूरे नहीं कर सकते इसलिये डर गये!
जनता को किये वादे पूरे करने के लिये सरकार बनाने लगे 
तो कहते हैं के
जनता को धोखा दे कर कांग्रेस से हाथ मिला लिया! 
जनता से पूछने गये की क्या कांग्रेस से समर्थन लेके सरकार सरकार बना सकते हैं, 
तो कहते है
की क्या हर काम अब जनता से पूछ के होगा!
मेरे भाई आखिर चाहते क्या हो?
इतने सवाल 50 सालों मे कांग्रेस भाजपा से कर लेते 
तो आज आम आदमी पार्टी की
ज़ुरूरत ही नही पैदा होती!!


फेसबुक पर बीबीसी हिंदी के पेज पर एक और प्रतिक्रियाः-
अल्पमत की सरकार : मेरे विचार में दिल्ली में बनने जा रही "आप" की सरकार को गठबंधन या समर्थन की सरकार के बतौर देखना गलत है, ये सीधे-सीधे अल्पमत की सरकार है जो चुनाव परिणाम आने के बाद रिफ्रेँडम द्वारा जनता के बहुमत की इच्छा के आधार पर बनाया जा रहा है, और इसीलिए आज मजबूरी में कौन इसे समर्थन दे रहा है और कौन नहीं ये महत्वपूर्ण ही नहीं है बल्कि ज्यादा दिलचस्प और निर्णायक तो ये देखना होगा कि कौन पार्टी इस अल्पमत की सरकार को गिराने का दुस्साहस करती है, क्योंकि "आप" की इस सरकार को गिराने केलिए भी भाजपा और काँग्रेस को तो एक साथ मिलकर ही वोटिँग करना पड़ेगा और इसीलिए ये अल्पमत की सरकार भी दोनों पार्टियों पर बहुत भारी पड़ने जा रही है ?

भैया जी ने सरकार बना डाली तो वह अद्भुत सरकार होगी। सरकार ईमानदारी की कही जाएगी, लेकिन समर्थन बेईमानों का होगा। अगर बेईमान लोग चलवाएंगे ईमानदार सरकार तो चल गई सरकार।

Tuesday, December 24, 2013

'आप' ने ओखली में सिर दिया

 मंगलवार, 24 दिसंबर, 2013 को 06:38 IST तक के समाचार
आम आदमी पार्टी के नेता
हिंदी की कहावत है 'ओखली में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना?' आम आदमी पार्टी ने जोखिम उठाया है तो उसे इस काम को तार्किक परिणति तक पहुँचाना भी होगा.
यह तय है कि उसे समर्थन देने वाली पार्टी ने उसकी 'कलई खोलने' के अंदाज़ में ही उसे समर्थन दिया है और 'आप' के सामने सबसे बड़ी चुनौती है इस बात को गलत साबित करना और परंपरागत राजनीति की पोल खोलना.
'आप' सरकार की पहली परीक्षा अपने ही हाथों होनी है. यह पार्टी परंपरागत राजनीति से नहीं निकली है.
देखना होगा कि इसका आंतरिक लोकतंत्र कैसा है, प्रशासनिक कार्यों की समझ कैसी है और दिल्ली की समस्याओं के कितने व्यावहारिक समाधान इसके पास हैं?
इससे जुड़े लोग पद के भूखे नहीं हैं लेकिन वे सरकारी पदों पर कैसा काम करेंगे? सादगी, ईमानदारी और भलमनसाहत के अलावा सरकार चलाने के लिए चतुराई की जरूरत भी होगी, जो प्रशासन के लिए अनिवार्य है.

Monday, December 23, 2013

मीडिया-उन्माद का विषय मत बनाइए देवयानी मामले को

देवयानी खोबरागड़े का मामला मीडिया संग्राम का शिकार हो गया। दोनों देशों की सरकारों ने अब इस मामले पर ठंडा पानी डालने की कोशिश की है। हमारे मीडिया को समझना चाहिए कि हर बात को राष्ट्रीय अपमान, पश्चिम के भारत विरोधी रवैये और भारत के दब्बूपन पर केंद्रित न करे। दूसरी ओर पश्चिमी देशों को भारतीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखना चाहिए। इधर जब भारत सरकार ने अमेरिकी राजनयिकों को मिल रही सुविधाओं को खत्म करने की घोषणा की तब अखबारों की सुर्खियाँ इस आशय की थीं कि भारत के पास भी रीढ़ की हड्डी है। अमेरिकी विदेश मंत्री के खेद प्रकट करने के बावजूद भारत की ओर से माफी माँगने और इस मुकदमे को वापस लेने की माँग होने लगी।

Sunday, December 22, 2013

'लोक' जाग जाता है तो लोकपाल आता है

लोकपाल विधेयक पास होने के बाद अब अनेक सवाल उठेंगे। क्या अब देश से भ्रष्टाचार का सफाया हो जाएगा? क्या हमें इतना ही चाहिए था? सवाल यह भी है कि यह काम दो साल पहले क्यों नहीं पाया था? जो राजनीतिक दल कल तक इस कानून का मज़ाक उड़ा रहे थे वे इसे पास करने में एकजुट कैसे हो गए? और अरविंद केजरीवाल और उनके साथी जो कल तक अन्ना हजारे के ध्वज वाहक थे आज इसे जोकपाल कानून क्यों कह रहे हैं? राहुल गांधी ने इस कानून को लेकर पहले गहरी दिलचस्पी नहीं दिखाई। वे अब इसे अपना कानून क्यों बता रहे हैं? इसे पास कराने में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच इतनी जबरदस्त सहमति कैसे बन गई?
दो साल पहले केजरीवाल कहते थे कि हम चुनाव लड़ने नहीं आए हैं। उन्होंने चुनाव लड़ा। ऐसी तमाम अंतर्विरोधी बातों से ही एक लोकतांत्रिक व्यवस्था विकसित होती है। इन दिनों अचानक एक नए किस्म की राजनीति ने जन्म लिया है। यह शुभ लक्षण है। जरूरी नहीं कि यह उत्साह बना रहे। संभव है कि निराशा का कोई और कारण हमारे भीतर पैदा हो। फिलहाल हमें धैर्य और समझदारी का परिचय देना चाहिए।

Saturday, December 21, 2013

कांग्रेस अब गठबंधन की तलाश में

चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में भारी पराजय के बाद कांग्रेस ने 17 जनवरी को दिल्ली में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक बुलाई है, जिसमें लोकसभा चुनावों की रणनीति तैयार की जाएगी। संभावना इस बात की है कि उस बैठक में राहुल गांधी को औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी भी घोषित कर दिया जाए। पर पार्टी के विचारकों के सामने सबसे बड़ा संकट अलग-अलग राज्यों का गणित है। लोकपाल विधेयक को पास कराने की जल्दबाज़ी और इस मामले में भी राहुल गांधी की पैराट्रुपर राजनीति का मतलब यही है कि पार्टी को संजीवनी चाहिए। एआईसीसी की पिछली बैठक इस साल जनवरी में जयपुर चिंतन शिविर के साथ हुई थी। इस बैठक की घोषणा जिस दिन की गई उसके एक दिन पहले डीएमके के नेता करुणानिधि ने अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करने का ऐलान किया है।

Friday, December 20, 2013

सूचना की आँधी, बहस का शोर

तमाम विफलताओं के बावजूद विस्तार की राह पर है मीडिया

दिल्ली में विधानसभा चुनाव की गतिविधियाँ तब शुरू ही हुईं थीं। एक दिन अचानक मोबाइल फोन की घंटी बजी। ‘हेलो मैं अरविंद केजरीवाल बोल रहा हूँ। फोन काटिए मत यह रिकॉर्डेड मैसेज है.....।’ अपनी बात कहने का यह एक नया तरीका था। यह एक शुरुआत थी। इसके बाद इस किस्म के तमाम फोन और एसएमएस आए। ऐसे फोन भी आए, जिनमें अरविंद केजरीवाल या उनकी पार्टी के खिलाफ संदेश था। इसमें दो राय नहीं कि इन चुनावों में ‘न्यू मीडिया’ का जबरदस्त हस्तक्षेप था। ईआरआईएस ज्ञान फाउंडेशन और भारतीय इंटरनेट एवं मोबाइल संघ द्वारा कराए गए एक अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2014 में होने वाले अगले आम चुनाव में सोशल मीडिया लोकसभा की 160 सीटों को प्रभावित करेगा। यह बात इन विधानसभा चुनावों में दिखाई भी दी। अध्ययन में कहा गया है कि अगले आम चुनाव में लोकसभा की कुल 543 सीटों में से 160 अहम सीटों पर सोशल मीडिया का प्रभाव रहने की संभावना है, जिनमें महाराष्ट्र में सबसे हाई इम्पैक्ट वाली 21 सीटें और गुजरात में 17 सीटें शामिल है। आशय उन सीटों से है, जहां पिछले लोकसभा चुनाव में विजयी उम्मीदवार के जीत का अंतर फेसबुक का प्रयोग करने वालों से कम है अथवा जिन सीटों पर फेसबुक का प्रयोग करने वालों की संख्या कुल मतदाताओं की संख्या का 10 प्रतिशत है।

Thursday, December 19, 2013

'आप' के सामने जोखिम अनेक हैं, पर सफल हुई तो भारत बदल जाएगा

 गुरुवार, 19 दिसंबर, 2013 को 11:27 IST तक के समाचार
आम आदमी पार्टी रविवार तक जनता के बीच जाकर उससे पूछेगी कि पार्टी को दिल्ली में सरकार बनानी चाहिए या नहीं. इसके बाद सोमवार को पता लगेगा कि पार्टी सरकार बनाने के लिए तैयार है या नहीं. भारत में यह जनमत संग्रह अभूतपूर्व घटना है. यूनानी नगर राज्यों के प्रत्यक्ष लोकतंत्र की तरह.
‘आप’ की पेचदार निर्णय प्रक्रिया जनता को पसंद आएगी या नहीं, लेकिन पार्टी जोखिम की राह पर बढ़ रही है. पार्टी को दुबारा चुनाव में ही जाना था, तो इस सब की ज़रूरत नहीं थी. इस प्रक्रिया का हर नतीजा जोखिम भरा है. पार्टी का कहना है कि हमने किसी से समर्थन नहीं माँगा था, पर उसने सरकार बनाने के लिए ही तो चुनाव लड़ा था.
‘आप’ अब तलवार की धार पर है. सत्ता की राजनीति के भंवर ने उसे घेर लिया है. इस समय वह जनाकांक्षाओं के ज्वार पर है. यदि पार्टी इसे तार्किक परिणति तक पहुँचाने में कामयाब हुई तो यह बात देश के लोकतांत्रिक इतिहास में युगांतरकारी होगी.
एक सवाल यह है कि इस जनमत संग्रह की पद्धति क्या होगी? पार्टी का कहना है कि 70 विधानसभा क्षेत्रों में जनसभाएं की जाएंगी, 25 लाख पर्चे छापे जाएंगे. फेसबुक, ट्विटर और एसएमएस की मदद भी ली जाएगी.

Tuesday, December 17, 2013

लोकपाल बनने भर से ‘आप’ नहीं रुकेगी

लोकपाल विधेयक अब पास हो जाएगा. इसे मुख्य धारा के लगभग सभी राजनीतिक दलों का समर्थन हासिल है. समाजवादी पार्टी को छोड़ दें तो बाकी सब इसके पक्ष में आ गए हैं, भाजपा भी. उसकी केवल दो आपत्तियाँ हैं. जाँच के दौरान सीबीआई अधिकारियों के तबादले को लेकर और दूसरी सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के पहले उन्हें सूचना देने के बाबत. लोकसभा से पास हुए विधेयक में राज्यसभा में इतने संशोधन आए कि उसे प्रवर समिति को सौंपना पड़ा था. प्रवर समिति ने सुझाव दिया है कि लोकपाल द्वारा भेजे गए मामलों पर लोकपाल की निगरानी रहेगी. इसके अलावा जिन मामलों की जाँच चलेगी उनसे जुड़े अफसरों का तबादला लोकपाल की सहमति से ही हो सकेगा. पर सरकार चाहती है कि उसके पास तबादला करने का अधिकार रहे. सरकार यह भी चाहती है कि किसी अफसर के खिलाफ कार्रवाई करने के पहले उसे सूचित किया जाए. झूठी शिकायतें करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की व्यवस्था भी विधेयक में हैं. इसके अंतर्गत अधिकतम एक साल की सज़ा और एक लाख रुपए तक के जुर्माने की व्यवस्था है. भारतीय दंड संहिता में व्यवस्था है कि शिकायत झूठी पाई जाने पर भी यदि उसके पीछे सदाशयता है तो यह नियम लागू नहीं होता. प्रवर समिति की अनुशंसा है कि यह बात इस कानून में दर्ज की जाए.

Sunday, December 15, 2013

नई राजनीति की आहट

अभी तक राजनीति का मतलब हम पार्टियों के गठबंधन, सरकार बनाने के दावों और आरोपों-प्रत्यारोपों तक सीमित मानते थे। एक अर्थ में राजनीति के मायने चालबाज़ी, जोड़तोड़ और जालसाज़ी हो गए थे। पर राजनीति तो राजव्यवस्था से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण कर्म है। पिछले एक हफ्ते में अचानक भारतीय राजनीति की परिभाषा में कुछ नई बातें जुड़ीं हैं। चार राज्यों के विधान सभा चुनाव का यह निष्कर्ष साफ है कि यह कांग्रेस के पराभव का समय है। यह आने वाले तूफान की आहट है। पर इस चुनाव के कुछ और निष्कर्ष भी हैं। पहला यह कि ‘आप’ के रूप में नए किस्म की राजनीति की उदय हो रहा है। यह राजनीति देश के शहरों और गाँवों तक जाएगी। दिल्ली की प्रयोगशाला में इसका परीक्षण हुआ। अब बाकी देश में यह विकसित होगी।

Saturday, December 14, 2013

राजनीति के ढलते-उगते सूरज

पिछले साल उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में भारी सफलता पाने के बाद मुलायम सिंह का अनुमान था कि लोकसभा चुनाव समय से पहले होंगे। उस अनुमान में उनकी राजनीति भी छिपी थी। उन्हें लगता था कि आने वाला वक्त लोकसभा में उनकी पार्टी को स्थापित करेगा। इसी उम्मीद में उन्होंने खुद को केंद्रीय राजनीति के साथ जोड़ा। ऐसा अनुमान ममता बनर्जी और जयललिता का भी था। छह महीने पहले तक लगता था कि केंद्र सरकार 2013 के विधानसभा चुनावों के साथ लोकसभा चुनाव भी कराएगी। ऐसा नहीं हुआ तो सरकार के लिए दिक्कत पैदा होंगी। दीवार पर लिखा था कि उत्तर भारत की विधान सभाएं कांग्रेस के लिए अच्छा संदेश लेकर नहीं आने वाली हैं। झटका लगा तो फिर रिपल इफैक्ट रुकेगा नहीं।  शायद कांग्रेस अपने गेम चेंजर का असर देखने के लिए कुछ समय चाहती थी।

Wednesday, December 11, 2013

अंतरिक्ष में कौन रहता है?

दुनिया का सबसे बड़ा अनुत्तरित सवाल

अमेरिका से एक साप्ताहिक पत्रिका निकलती थी वीकली वर्ल्ड न्यूज। इस पत्रिका की खासियत थी ऊल-जलूल, रहस्यमय, रोमांचकारी और मज़ाकिया खबरें। इन खबरों को वड़ी संजीदगी से छापा जाता था। यह पत्रिका सन 2007 में बंद हो गई, पर आज भी यह एक टुकड़ी के रूप में लोकप्रिय टेब्लॉयड सन के इंसर्ट के रूप में वितरित होती है। अलबत्ता इसकी वैबसाइट लगातार सक्रिय रहती है। इस अखबार की ताजा लीड खबर हैएलियन स्पेसशिप टु अटैक अर्थ इन डेसेम्बर दिसम्बर में धरती पर हमला करेंगे अंतरिक्ष यान। खबर के अनुसार सेटी (सर्च फॉर एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल इंटेलिजेंस) के वैज्ञानिकों ने घोषणा की है कि सुदूर अंतरिक्ष से तीन यान धरती की ओर बढ़ रहे हैं, जो दिसम्बर तक धरती के पास पहुँच जाएंगे। इनमें सबसे बड़ा यान तकरीबन 200 मील चौड़ा है। बाकी दो कुछ छोटे हैं। इस वक्त तीनों वृहस्पति के नजदीक से गुजर रहे हैं और अक्टूबर तक धरती से नजर आने लगेंगे। यह खबर कोरी गप्प है, पर इसके भी पाठक हैं। पश्चिमी देशों में अंतरिक्ष के ज़ीबा और गूटान ग्रहों की कहानियाँ अक्सर खबरों में आती रहतीं हैं, जहाँ इनसान से कहीं ज्यादा बुद्धिमान प्राणी निवास करते हैं। अनेक वैबसाइटें दावा करती हैं कि दुनिया के देशों की सरकारें इस तथ्य को छिपा रही हैं कि अंतरिक्ष के प्राणी धरती पर आते हैं। आधुनिक शिक्षा के बावजूद दुनिया में जीवन और अंतरिक्ष विज्ञान को लेकर अंधविश्वास और रहस्य ज्यादा है, वैज्ञानिक जानकारी कम।

Monday, December 9, 2013

राजनीति में गांधी टोपी की वापसी

 सोमवार, 9 दिसंबर, 2013 को 08:12 IST तक के समाचार
चार राज्यों के विधान सभा चुनाव का पहला निष्कर्ष है कि कांग्रेस के पराभव शुरू हो गया है.
पार्टी यदि इन परिणामों को लोकसभा चुनाव के लिए ओपिनियन पोल नहीं मानेगी तो यह उसकी बड़ी गलती होगी.
चुनाव का दूसरा बड़ा निष्कर्ष है ‘आप’ के रूप में नए किस्म की राजनीति की उदय हो रहा है, जो अब देश के शहरों और गाँवों तक जाएगा. इसका पायलट प्रोजेक्ट दिल्ली में तैयार हो गया है.
यह भी कि देश का मध्य वर्ग, प्रोफेशनल युवा और स्त्रियाँ ज्यादा सक्रियता के साथ राजनीति में प्रवेश कर रहे हैं. राजनीतिक लिहाज से ये परिणाम भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी के आत्म विश्वास को बढ़ाने वाले साबित होंगे.
अशोक गहलोत और शीला दीक्षित ने सीधे-सीधे नहीं कहा, पर प्रकारांतर से कहा कि यह क्लिक करेंकेंद्र-विरोधी परिणाम है. सोनिया गांधी का यह कहना आंशिक रूप से ही सही है कि लोकसभा चुनाव और विधान सभा चुनाव के मसले अलग होते हैं. सिद्धांत में अलग होते भी होंगे, पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी की रणनीति भी केंद्रीय उपलब्धियों के सहारे प्रदेशों को जीतने की ही तो थी.