Wednesday, September 12, 2012

अदालतों की मीडिया कवरेज

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के संविधानिक पीठ ने अदालती सुनवाई की कवरेज के एक नए संविधानिक सिद्धांत  को लागू किया। अदालत ने इस संवेदनशील मामले पर पहली नज़र में कोई गाइडलाइन ज़ारी नहीं की। पर फेयर ट्रायल के सिद्धांत की रक्षा के लिए मीडिया पर पाबंदी का रास्ता खोल दिया है। यह एक महत्वपूर्ण खबर थी। खासतौर से पिछले दिनों कई मामलों में मीडिया ट्रायल शब्द का इस्तेमाल होने लगा। उसे देखते हुए लगता था कि शायद अदालत कोई व्यापक गाइडलाइन ज़ारी करेगी, पर वैसा नहीं हुआ। पर अदालत के इस फैसले पर काफी कुछ विवेचन बाकी है। हिन्दी अखबारों में यह विवेचन कहीं दिखाई नहीं दिया। देश के पहले दस अखबारों में से कितने हिन्दी के अखबार हैं, यह अखबारों के विज्ञापनों में हर तीसरे महीने दिखाई पड़ता है। पर इन अखबारों की कवरेज कैसी है, यह रोज़ नज़र आता है। बहरहाल ऐसे सवालों पर विचार करने वाले दो-तीन अखबार अंग्रेज़ी में दिखाई पड़ते हैं। सम्भव है बांग्ला, मलयालम और किसी दूसरी भारतीय भाषा में सांविधानिक सवालों पर विवचन होता हो, हिन्दी में नहीं होता।

सुप्रीम कोर्ट के इस नए सिद्धांत पर कुछ अखबारों के सम्पादकीय क्या कहते हैं, इसे पढ़ें। इन सम्पादकीयों में चिन्ता के स्वर हैं।

Tuesday, September 11, 2012

देशप्रेम, देशद्रोह या सिर्फ राजनीति


कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी को लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में शोर ज्यादा हुआ। अखबारों में खबरें तो हैं, पर विचार कम हैं। खासतौर से देशद्रोह के आरोप को लेकर अधिकतर हिन्दी अखबारों ने टिप्पणियाँ भी नहीं की हैं। असीम त्रिवेदी के मसले में तीन बातें हैं। एक तो वे राजनीतिक एक्टिविस्ट हैं। दूसरे कार्टूनिस्ट के रूप में उनकी अभिव्यक्ति का मामला है और तीसरे उनके खिलाफ देशद्रोह का आरोप है। असीम को अपनी देशभक्ति का विश्वास है और सरकार को लगता है कि वे व्यवस्था की आलोचना करते हैं इसलिए देशद्रोही हैं। कविता के रूपकों में हमने भारत माता का अपमान करती परिस्थितियों को स्वीकार कर लिया, पर कार्टून का रूपक हमें स्वीकार नहीं। भारत माता के गैंग रेप को दिखाकर असीम ने गैंग रेप का समर्थन किया है या एक परिस्थिति की ओर पाठकों का ध्यान खींचा है? भेड़ियों का रूपक क्या राष्ट्रीय चिह्न के सम्मान की रक्षा के लिए है या राष्ट्रीय चिह्न पर हमला है? ऐसा ही संविधान के बाबत है। असीम का इरादा संविधान की रक्षा का है या अपमान करने का? चूंकि चित्र बनाया है इसलिए अपमान किया है माना जाए या यह माना जाए कि देश को शीशा दिखाया है? ऐसे तमाम सवाल है। इन सवालों पर 11 सितम्बर के अखबारों की कुछ सम्पादकीय टिप्पणियाँ यहाँ पेश हैं।

Monday, September 10, 2012

पाकिस्तान के साथ ठंडा-गरम

पाकिस्तान से जुड़ी इस हफ्ते की दो बड़ी खबरें हैं। एक, पाकिस्तान के साथ सार्थक बातचीत और दूसरे हक्कानी नेटवर्क पर कसता शिकंजा। विदेश मंत्री एसएम कृष्णा की पाकिस्तान यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है नई वीज़ा व्यवस्था। पर इसे आंशिक उपलब्धि कहा जाना चाहिए। मई में यह समझौता तैयार था। दोनों देशों के विदेश सचिव इसपर दस्तखत करने वाले थे कि पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने कहा कि इसपर दस्तखत राजनीतिक स्तर पर होने चाहिए। अलबत्ता यह उपलब्धि है, क्योंकि दोनों देशों के लोग बड़ी संख्या में आना-जाना चाहते हैं। तमाम रिश्तेदारियाँ हैं, सांस्कृतिक रिश्ते हैं, मीडिया का संवाद है और नया व्यापारिक माहौल है। दोनों देशों के बीच एक सांस्कृतिक समझौते के आशय पत्र पर भी दस्तखत हुए हैं। एक लिहाज़ से हम एक एक कदम आगे बढ़े हैं। 26 नवम्बर 2008 के बाद से रिश्तों में तल्खी आ गई थी, उसमें कुछ कमी हुई है। पर कुछ बुनियादी सवाल सामने आते हैं। एक, क्या भारत और पाकिस्तान के रिश्ते कभी खुशनुमा हो पाएंगे? क्या दोनों देशों की सरकारों में इतनी सामर्थ्य है कि वे बुनियादी सवालों पर समझौते कर सकें? और क्या अमेरिका के अफगानिस्तान से हटने के बाद इस इलाके में अस्थिरता और नहीं बढ़ेगी?

Sunday, September 9, 2012

पाकिस्तान ने प्रवीण स्वामी का वीज़ा क्यों रद्द किया?

विदेश मंत्री एसएम कृष्णा की पाकिस्तान यात्रा में उनके साथ 61 भारतीय पत्रकार भी गए थे। आमतौर पर पत्रकारों को वीज़ा मिलने में दिक्कत नहीं होती, पर एसएम कृष्णा के साथ जाने वाले 'हिन्दू' के दिल्ली संस्करण के स्थानीय सम्पादक प्रवीण स्वामी को वीज़ा नहीं दिया गया। खास बात यह है कि वीज़ा दे दिया गया था और प्रवीण स्वामी को पाकिस्तान के उच्चायोग में बुलाया भी गया था, पर बाद में 'हिन्दू' से कहा गया कि वे किसी दूसरे पत्रकार का नाम दें। 'हिन्दू' के सम्पादक ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। देश के अखबारों में 'हिन्दू' शायद अकेला है, जो पाकिस्तान में अपना संवाददाता रखता है। वहाँ इस समय अनिता जोशुआ तैनात हैं।

प्रश्न कवरेज से ज्यादा पत्रकार को लेकर है। प्रवीण स्वामी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रश्नों पर लिखते रहते हैं। उनके समाचारों और विश्लेषणों में नई बात होती है। प्रायः उनके पास काफी सूचनाएं होतीं हैं। इन सूचनाओं में पाकिस्तानी सरकार और सेना की भूमिका का अक्सर ज़िक्र होता है। ऐसा समझा जा रहा है कि उनका वीज़ा रोकने में पाकिस्तानी सेना की भूमिका है। बहरहाल कोई भी देश अपना वीज़ा देने के मामले में जवाबदेह नहीं है, पर प्रवीण स्वामी के मामले से इतना ज़ाहिर ज़रूर होता है कि सरकारें ज़रूरत से ज़्यादा संवेदनशील हो जाती हैं। प्रवीण स्वामी के पासपोर्ट में अब वीज़ा और उसपर कैंसल किए जाने की मुहर है जो इतिहास का हिस्सा बन गई। दोनों देशो के बीच वीज़ा व्यवस्था को आसान बनाने की कोशिशों के दौर में यह खबर बताती है कि सब कुछ इतना सरल नहीं है।

हिन्दू में प्रकाशित समाचार

फर्स्ट पोस्ट की रपट पाकिस्तान ने प्रवीण स्वामी को कविता की पुस्तक दी वीज़ा नहीं दिया

Wednesday, September 5, 2012

वॉशिटगटन पोस्ट की टिप्पणी को पीत पत्रकारिता कहना गलत है

अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट ने मनमोहन सिंह के बारे में आम भारतीय नागरिक के दृष्टिकोण को पेश करने की कोशिश की है। देश में घोटाले को बाद घोटाले ने मनमोहन सिंह की छवि को सबसे ज्यादा धक्का पहुँचाया है। अखबार कहता है कि एक सम्माननीय, विनम्र और बुद्धिमान मनमोहन सिंह की जगह निष्प्रभावी ब्यूरोक्रेट ने ले ली जो गहराई तक भ्रष्ट सरकार के सिंहासन पर बैठा है। 
"An honorable, humble and intellectual technocrat (who) has slowly given way to a dithering, ineffectual bureaucrat presiding over a deeply corrupt government."
अखबार के ताज़ा अंक में India’s ‘silent’ prime minister becomes a tragic figure शीर्षक से प्रकाशित टिप्पणी में हिन्दी पाठकों के लिए नया कुछ नहीं है। पश्चिमी पाठकों के लिए विस्मय की बात ज़रूर है कि उनकी नज़रों में सम्मानित व्यक्ति का का क्या से क्या बन गया। सायमन डेन्यर की इस टिप्पणी में रामचन्द्र गुहा और संजय बारू जैसे पत्रकारों, लेखकों को उधृत किया गया है। 

कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए इस मौके पर की गई यह टिप्पणी महत्वपूर्ण हो गई है। बीजेपी के प्रवक्ता राजीव प्रताप रूड़ी ने कहा है कि प्रधानमंत्री को अब फौरन इस्तीफा दे देना चाहिए। पर इससे ज्यादा रोचक टिप्पणी है सूचना एवं प्रसारण मंत्री अम्बिका सोनी की, जिन्होंने कहा है कि हम वॉशिंगटन पोस्ट के सम्पादक से माफी माँगने को कहेंगे। उन्होंने कहा, यह पीत पत्रकारिता है। "How can a US daily take the matter such lightly and publish something regarding the prime minister of another country. I will speak to the ministry of external affairs (MEA) and government officials and definitely do something over this issue." इसके पहले टाइम की अंडर अचीवर वाली टिप्पणी पर भी कांग्रेस की प्रतिक्रिया ऐसी ही थी।  क्या अम्बिका सोनी की पीत पत्रकारिता की परिभाषा यही है? बेशक इस टिप्पणी के राजनीतिक निहितार्थ सम्भव हैं और यह बीजेपी समेत दूसरे विपक्षी दलों की मदद कर सकती है, पर क्या यह एक सामान्य भारतीय नागरिक की राय से फर्क बात है? 



मिस्री टीवी पर पहली बार हिजाब

मिस्र के टीवी न्यूजरीडरों को हिजाब पहनने की अनुमति मिली। पिछले रविवार को मिस्र के सरकारी रेडियो पर हिजाब पहने फातमा नबील नाम की महिला खबरें पढ़ती नज़र आई। मिस्री टेलीविज़न चैनल 1 पर हिजाब की अनुमति नहीं थी। पर लगता है कि राष्ट्रपति मुहम्मद मुरसी देश में इस्लामी भावनाओं को बढ़ावा देंगे। हिजाब की अनुमति की घोषणा शनिवार को देश के सूचना मंत्री सलाह अब्दल मसूद ने की थी। देश के प्राइवेट चैनलों पर हिजाब पहने महिलाएं पहले से खबरें पढ़ती रहीं हैं। फातमा नबील इसके पहले मुस्लिम ब्रदरहुड के मिस्र25 में खबरें पढ़ती रहीं हैं।

मिस्री समाज पर पश्चिमी प्रभाव अपेक्षाकृत ज्यादा है। पिछले पचास साल से सरकारी टीवी पर हिजाब पहन कर आने पर रोक थी।  सूचना मंत्री सलाह अब्दल मसूद ने  कहा कि जिस देश में 70 फीसदी स्त्रियाँ हिजाब पहनती हैं वहाँ टीवी पर रोक लगाना ठीक नहीं। हिजाब या पर्दा स्त्रियों के लिए क्यों ज़रूरी है यह बात समझ में नहीं आती।

Monday, September 3, 2012

भारत-पाकिस्तान रिश्तों में उम्मीदें और उलझाव

तेहरान में राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी से मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि मैं पाकिस्तान यात्रा पर ज़रूर जाना चाहूँगा, पर उसके पहले माहौल बेहतर बनना चाहिए। व्यावहारिक रूप में इसका मतलब यह है कि मुम्बई हमले के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। पर इस मामले से जुड़े सात अभियुक्तों के खिलाफ पाकिस्तानी अदालत में कारवाई बेहद सुस्ती से चल रही है। रावलपिंडी की अडियाला जेल में सुनवाई कर रही अदालत में पाँच जज बदले जा चुके हैं। अभियुक्तों के खिलाफ साक्ष्य पेश करने की जिम्मेदारी भारत की है। पाकिस्तान के वकील और जज सातों अभियुक्तों से हमदर्दी रखते हैं। यह अदालत इंसाफ करे तो भारत-पाक रिश्तों को बेहतर बनाने में इससे बड़ा कदम कोई नहीं हो सकता। भारत की सबसे बड़ी निराशा इस कारण है कि लश्करे तैयबा का प्रमुख हफीज़ सईद खुले आम घूम रहा है। पाकिस्तानी अदालतों को उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला।

Sunday, September 2, 2012

रोचक राजनीति बैठी है इस काजल-द्वार के पार

कोल ब्लॉक्स के आबंटन पर सीएजी की रपट आने के बाद देश की राजनीति में जो लहरें आ रहीं हैं वे रोचक होने के साथ कुछ गम्भीर सवाल खड़े करती हैं। ये सवाल हमारी राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्था तथा मीडिया से ताल्लुक रखते हैं। कांग्रेस पार्टी का कहना है कि बीजेपी इस सवाल पर संसद में बहस होने नहीं दे रही है, जो अलोकतांत्रिक है। और बीजेपी कहती है कि संसद में दो-एक दिन की बहस के बाद मामला शांत हो जाता है। ऐसी बहस के क्या फायदा? कुछ तूफानी होना चाहिए।

भारतीय जनता पार्टी की यह बात अन्ना-मंडली एक अरसे से कहती रही है। तब क्या मान लिया जाए कि संसद की उपयोगिता खत्म हो चुकी है? जो कुछ होना है वह सड़कों पर होगा और बहस चैनलों पर होगी। कांग्रेस और बीजेपी दोनों पक्षों के लोग खुद और अपने समर्थक विशेषज्ञों के मार्फत बहस चलाना चाहते हैं। यह बहस भी अधूरी, अधकचरी और अक्सर तथ्यहीन होती है। हाल के वर्षों में संसदीय लोकतंत्र की बुनियाद को अनेक तरीकों से ठेस लगी है। हंगामे और शोरगुल के कारण अनेक बिलों पर बहस ही नहीं हो पाती है। संसद का यह सत्र अब लगता है बगैर किसी बड़े काम के खत्म हो जाएगा। ह्विसिल ब्लोवर कानून, गैर-कानूनी गतिविधियाँ निवारण कानून, मनी लाउंडरिंग कानून, कम्पनी कानून, बैंकिंग कानून, पंचायतों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी सीटों के आरक्षण का कानून जैसे तमाम कानून ठंडे बस्ते में रहेंगे। यह सूची काफी लम्बी है। क्या बीजेपी को संसदीय कर्म की चिंता नहीं है? और क्या कांग्रेस ईमानदारी के साथ संसद को चलाना चाहती है?

Friday, August 31, 2012

कसाब की फाँसी से हमारे मन शांत नहीं होंगे

जिन दिनों अजमल कसाब के खिलाफ मुकदमा शुरू ही हुआ था तब राम जेठमलानी ने पुणे की एक गोष्ठी में कहा कि इस लगभग विक्षिप्त व्यक्ति को मौत की सजा नहीं दी जानी चाहिए। उनका आशय यह भी था कि किसी व्यक्ति को जीवित रखना ज्यादा बड़ी सजा है। मौत की सजा दूसरों को ऐसे अपराध से विचलित करने के लिए भी दी जाती है। पर जिस तरीके से कसाब और उनके साथियों ने हमला किया था उसके लिए आवेशों और भावनाओं का सहारा लेकर लोगों को पागलपन की हद तक आत्मघात के लिए तैयार कर लिया जाता है। आज पाकिस्तान में ऐसे तमाम आत्मघाती पागल अपने देश के लोगों की जान ले रहे हैं। हाल में कामरा के वायुसेना केन्द्र पर ऐसा ही एक आत्मघाती हमला किया गया। ऐसे पगलाए लोगों को समय सजा देता है। बहरहाल कसाब की फाँसी में अब ज्यादा समय नहीं है। पर फाँसी से जुड़े कई सवाल हैं।

Thursday, August 30, 2012

आर्मस्ट्रांगः ब्लैकहोल या ध्रुवतारा?

यूनानी मिथकों का मृत्युंजय पक्षी फीनिक्स अपनी राख में से बार-बार जीवित होकर नए जोश के साथ उड़ान भरता है। अमेरिकी साइकिलिस्ट लैंस आर्मस्ट्रांग का जीवन फीनिक्स सरीखा है, कुछ विडंबनाओं के साथ। वैश्विक मीडिया इन दिनों अर्मस्ट्रांग के प्रति हमदर्दी से पटा पड़ा है। पर ऐसा कहने वाले भी हैं कि उन्होंने जिस तरीके से व्यवस्था से हार मानी वह ठीक नहीं। आर्मस्ट्रांग कहते हैं, “बहुत हुआ मैं कब तक जवाब देता रहूँगा? अब कोई जवाब नहीं, जिसको जो करना है करे।” अमेरिका की एंटी डोपिंग एजेंसी यूएसएडीए ने उन्हें न सिर्फ जीवन भर के लिए बैन कर दिया है, बल्कि ‘टुअर डी फ्रांस’ के सातों ताज़ और इनसे जुड़े सारे इनाम-इकराम वापस लेने की घोषणा की है। आर्मस्ट्रांग की उम्मीद तब खत्म हो गई, जब ऑस्टिन की एक अदालत ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हालांकि अमेरिकी डिस्ट्रिक्ट जज सैम स्पार्क्स ने यह भी लिखा कि यूएसएडीए का बर्ताव कुछ गम्भीर सवाल खड़े करता है कि उसका इरादा डोपिंग से लड़ना है या कुछ और। बहरहाल मामला जनता की अदालत में है। क्या एक कृतघ्न समाज अपने नायक के साथ दुर्व्यवहार कर रहा है जैसा सॉक्रेटीस के साथ हुआ? या आर्मस्ट्रांग ने खुद को दोषी स्वीकार कर लिया है? यह हार है या रार?

Tuesday, August 28, 2012

देश चाहता है हर कालिख पर खुली बहस हो


लोकतंत्र के माने अराजकता, असमंजस, अनिश्चय और अस्थिरता है तो वह हमारे यहाँ सफल है। संसद के मौजूदा सत्र में प्रस्तावित 20 बैठकों में से आधी के आसपास गुज़र चुकीं हैं और काम-काज के नाम अ आ इ ई भी नहीं है। पहले असम और म्यामार से जुड़ी अफवाहों का बाज़ार गर्म था, फिर दक्षिण भारत के शहरों से भगदड़ की खबरें आईं। अब कोयले के काले धंधे की वजह से संसद ठप है। पिछले दो साल में तीसरी या चौथी बार संसद इस तरीके से ठप हुई है। सम्भव है आज की सर्वदलीय बैठक में कोई रास्ता निकल आए, पर हालात अच्छे नहीं हैं। देश पर सूखे की मार है। विकास-दर लगातार नीचे जा रही है। ऐसा चलता रहा तो रोजगार की स्थितियाँ बिगड़ जाएंगी। मुफलिसो-मज़लूम के सामने खड़ी मुश्किलों के पहाड़ बढ़ते ही जाएंगे।

Monday, August 20, 2012

विकीलीक्स की साख पर राजनीति का साया

विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज को जानने वालों की संख्या हमारे देश में ज्यादा नहीं है, पर जो जानते हैं वे उनके साहस की तारीफ करते हैं। विकीलीक्स धीरे-धीरे एक वैश्विक शक्ति बनता जा रहा है। यह पत्रकारिता वह मिशनरी पत्रकारिता है, जो इस कर्म का मर्म है। जिस तरह से विकीपीडिया ने ज्ञान की राह खोली है उसी तरह विकीलीक्स ने इस ज़माने की पत्रकारिता का रास्ता खोला है। पर यह रास्ता बेहद खतरनाक है। इसमें मुकाबला दुनिया की ताकतवर सरकारों से है। पर उसे यह भी साबित करना होगा कि यह न तो कोई खुफिया संस्था है और न अमेरिका-विरोधी। यह सिर्फ अनाचार और स्वयंभू सरकारों के विरुद्ध है। इसने अमेरिका, चीन, सोमालिया, केन्या और आइसलैंड तक हर जगह असर डाला है। कुछ समय पहले तक कोई नहीं जानता था कि इसके पीछे कौन है। बाद में ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार जूलियन असांज सामने आए। दुनिया की सबसे ताकतवर सरकारों के बारे मे निगेटिव सामग्री का प्रकाशन बेहद खतरनाक है। विकीलीक्स के पास न तो इतना पैसा है और न ताकत। अदालतें उसके खिलाफ कार्रवाई करतीं है। पर धीरे-धीरे इसे दुनिया के सबसे अच्छे वकीलों की सेवाएं मुफ्त मिलने लगीं हैं। जनता के दबाव के आगे संसदें झुकने लगीं हैं।