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Wednesday, March 18, 2026

ईरान-युद्ध और भारत का ‘डिप्लोमैटिक-कैलकुलेशन’


पश्चिम एशिया की लड़ाई अब तीसरे हफ्ते में है. इसके साथ जुड़े भारत के गहरे हित नज़र आने लगे हैं. वहाँ रहने वाले एक करोड़ भारतीयों के अलावा ऊर्जा आवश्यकताओं, पूँजी निवेश और रक्षा-तकनीक से जुड़े मसलों के कारण भी हमारी दिलचस्पी इस इलाके में रही है और रहेगी.

हमारी विदेश-नीति, सामाजिक-सांस्कृतिक संवेदनशीलता और नैतिकता के अलावा सकल राष्ट्रीय हितों से निर्धारित होती है. यह गणित यानी कैलकुलेशन है, जो दीर्घकालीन हितों पर आधारित होता है.  

इस गणित का सहारा सभी देश लेते हैं, और इसी गणित का परिणाम है कि जबर्दस्त फायर वर्क्स के बीच से पेट्रोलियम और एलपीजी के कुछ टैंकर होर्मुज जलडमरूमध्य पार करते हुए भारत आने में कामयाब हुए हैं. यही गणित हमें मुखर होने और कई बार खामोश रहने का सुझाव देता है.

हाल में अमेरिकी प्रशासन ने रूसी तेल पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों को 30 दिन के लिए निलंबित करने का निर्णय ऐसे ही गणित के तहत ही किया है. ट्रंप के इस कदम से वैश्विक ऊर्जा बाजार को आकार देने में तेल समृद्ध रूस के महत्त्व के प्रति वाशिंगटन की व्यावहारिक समझ व्यक्त होती है.

Friday, March 6, 2026

औद्योगिक-आत्मनिर्भरता के प्रवेशद्वार पर भारत

भारत ने हाल में कुछ ऐसे औद्योगिक क्षेत्रों में प्रवेश किया है, जो अपेक्षाकृत नए हैं और जिनमें भारी पूँजी निवेश की ज़रूरत होती है। ये क्षेत्र हैं: आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, अक्षय ऊर्जा और रक्षा उत्पादन। इसके अलावा हमारा परंपरागत वस्त्र और परिधान-उद्योग, ऑटोमोबाइल्स, फार्मा और सॉफ्टवेयर उद्योग पहले से ज्यादा मजबूती के साथ अपने कदम बढ़ा रहा है। इन बातों का सकल परिणाम है: नई पूंजी+ नई तकनीक=औद्योगिक गुणवत्ता में सुधार। हमारे वस्त्र, ऑटो पार्ट्स, औषधियाँ, केमिकल ज़्यादा प्रतिस्पर्धी बनेंगे। इससे निर्यात-आधारित उद्योगों को सीधा फ़ायदा मिलेगा। नतीजा: उत्पादन बढ़ेगा, रोज़गार बढ़ेगा, उद्योगों का विस्तार होगा।

इस प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए हमें दो स्तरों पर काम करने की ज़रूरत है। एक स्तर छोटे और मध्यम दर्जे के उद्योगों का है, जो बड़ी संख्या में रोज़गार उपलब्ध कराते हैं और आम उपभोग की वस्तुएँ तैयार करते हैं। ऐसे उद्योग भी तभी सफल होंगे, जब हमारे पास नवीनतम उच्चस्तरीय तकनीक होगी। साथ ही हमें ऐसे सामाजिक विकास की ज़रूरत है, जो बड़ी संख्या में लोगों की समृद्धि का कारण बने। जब लोगों के पास पैसा होगा, तभी वे अपनी ज़रूरत की चीज़ें खरीदेंगे। जब उनका उपभोग बढ़ेगा, तब औद्योगिक विकास भी होगा।

भारी उद्योगों की भूमिका

हमने ऊपर जिन उद्योगों का ज़िक्र किया है, उनमें से ज्यादातर भारी उद्योगों की श्रेणी में आते हैं। भारी उद्योगों से आशय उन बड़े पैमाने के विनिर्माण उद्यमों से है, जिनमें भारी मात्रा में पूँजी, जटिल मशीनरी और कच्चे माल का उपयोग होता है। ये उद्योग, जैसे इस्पात, भारी इंजीनियरिंग, मशीनरी, सीमेंट, पोत और विमान निर्माण और ऑटोमोबाइल आदि बुनियादी ढाँचे के विकास, अन्य उद्योगों के लिए मशीनें बनाने और अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

Tuesday, March 3, 2026

ईरानी आपदा पर चीन की चुप्पी

 

इकोनॉमिस्ट से साभार

ईरान के सुप्रीमो आयतुल्ला अली खामनेई की हत्या की चीन ने निंदा की है, पर उसने अमेरिका का उतना कड़ा विरोध नहीं किया है, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। इसके पीछे के कारणों को विशेषज्ञों ने समझने की कोशिश भी की है।

हांगकांग के अखबार साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट ने लिखा है कि चीन ने ईरान में अपने एक चीनी नागरिक की मौत और देश से अपने 3,000 नागरिकों को निकालने की पुष्टि की और शनिवार को रूस के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपातकालीन बैठक बुलाई और सैन्य कार्रवाई की निंदा की। सोमवार को रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ फोन कॉल में, चीन के शीर्ष राजनयिक वांग यी ने ईरान के सुप्रीमो आयतुल्ला अली खामनेई की हत्या की निंदा करते हुए इसे अस्वीकार्य बताया।

इस प्रकार के शाब्दिक विरोध के अलावा, चीन ने ईरान के लिए किसी प्रकार की ठोस मदद की पेशकश से परहेज किया है, ठीक वैसे ही जैसे उसने तब किया था जब इसराइल ने पिछले साल जून में ईरान के सैन्य और परमाणु स्थलों पर हमले किए थे।

बीजिंग की प्रतिक्रिया राजनयिक समर्थन देने और प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से बचने की उसकी पुरानी रणनीति के अनुरूप है, जैसा कि उसने जनवरी में वेनेजुएला के नेता निकोलस मादुरो के अमेरिकी अपहरण के समय भी किया था। लेकिन हमलों से एक दिन पहले प्रकाशित चैटम हाउस के एसोसिएट फैलो अहमद अबूदूह के एक विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका-ईरान विवाद में चीन के राजनयिक संयम को चीनी अविश्वसनीयता या उदासीनता के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए

Wednesday, February 18, 2026

बांग्लादेश की ‘लोकतांत्रिक’ पेचीदगियाँ


शेख हसीना के अपदस्थ होने के 18 महीने बाद, बांग्लादेश में जन-प्रतिनिधि सरकार की स्थापना हो गई है. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की भारी जीत के बाद अब वहाँ स्थिरता की उम्मीदें हैं.  

आम चुनाव के साथ संवैधानिक-सुधारों के लिए जनमत संग्रह भी हुआ है. तमाम बदलावों को जनता ने स्वीकार कर लिया है, पर असल सवाल है कि वास्तव में बांग्लादेश का लोकतंत्र कैसा होगा? वहाँ क्या शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण की व्यवस्था कायम हो पाएगी?

नए सांसदों ने शपथ ले ली है, लेकिन संवैधानिक सुधार परिषद को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. यह स्थिति इसलिए उत्पन्न हुई है क्योंकि बीएनपी सदस्यों ने सांसदों के रूप में शपथ तो ले ली, लेकिन प्रस्तावित परिषद के सदस्यों के रूप में शपथ नहीं ली. उन्होंने कहा कि संविधान में इस परिषद के लिए पद की शपथ लेने का कोई प्रावधान नहीं है.

यह सब मुहम्मद यूनुस की अस्थायी सरकार की देखरेख में हुआ, जो अपनी घोषणाओं के बावज़ूद बढ़ते सांप्रदायिक उन्माद और आर्थिक बदहाली को रोक नहीं पाई. भारत से रिश्ते बिगाड़ने में भी उसने कसर नहीं छोड़ी.  

दक्षिण एशिया में समावेशी-आधुनिकता और संकीर्ण सांप्रदायिक-प्रवृत्तियों का टकराव बड़ी समस्या है. भारत, पाकिस्तान या बांग्लादेश में होने वाली घटनाएँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं. तीनों के साझा अतीत में नकारात्मक और सकारात्मक दोनों बातें हैं.

Wednesday, January 28, 2026

‘ट्रंप-टैंट्रम’ के बाद यूरोप से ‘मदर ऑफ ऑल डील्स!’

गणतंत्र दिवस की परेड एक तरफ भारत की सांस्कृतिक-विविधता और सामरिक शक्ति का प्रदर्शन करती है, वहीं विदेश-नीति की झलक भी पेश करती है. कम से कम इस साल ऐसा ही हुआ है.

इस साल मुख्य अतिथि के रूप में यूरोपीय संघ को बुलाया गया. यह पहला मौका था, जब 27 देशों के संघ को मुख्य अतिथि बनने का आमंत्रण दिया गया. 27 जनवरी को नई दिल्ली में यूरोपीय संघ के साथ एक व्यापार समझौते पर दस्तखत हो गए.

ईयू का प्रतिनिधित्व, यूरोपीय आयोग की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय कौंसिल के प्रेसीडेंट एंटोनियो कोस्टा ने किया. उर्सुला वॉन डेर लेयेन, जहाँ जर्मनी की रक्षामंत्री रह चुकी हैं, वहीं भारतीय मूल के कोस्टा पुर्तगाल के पूर्व प्रधानमंत्री हैं.

स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक फोरम में शिरकत करते हुए उर्सुला वॉन डेर लेयेन कह चुकी हैं कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ होने जा रही है.

रक्षा और रणनीतिक भी

यह केवल व्यापार समझौता ही नहीं होगा, बल्कि रक्षा और दूसरे रणनीतिक मसलों पर भी सहमतियाँ बनने जा रही हैं. उर्सुला ने कहा कि यूरोप, अरब प्रायद्वीप के रास्ते महाद्वीप को भारत से जोड़ने वाले एक नए व्यापारिक गलियारे में निवेश करेगा.

Wednesday, January 7, 2026

वेनेजुएला पर हमला और ‘ग्लोबल-ऑर्डर’ में दरारें


अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप एक तरफ शांति का नोबेल पुरस्कार हासिल करना चाहते हैं, वहीं वेनेजुएला पर हमला करके और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का अपहरण करके उन्होंने विकासशील देशों में बेचैनी पैदा कर दी है.

अमेरिका के इस कदम ने भारत के सामने भी दुविधा की स्थिति पैदा की है. नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय-व्यवस्था को लेकर भारत का एक सैद्धांतिक स्टैंड है, और ऐसे वक्त में जब टैरिफ को लेकर अमेरिका के साथ उसकी तनातनी चल रही है, वेनेजुएला-प्रसंग दुविधा को बढ़ाएगा.

खासतौर से इसलिए भी कि ग्लोबल साउथ के अनेक देश इस मामले में भारत की ओर देखेंगे. पिछले साल से ही दुनिया के पुराने ऑर्डरमें दरार पड़ने लगी हैं, जो इस साल और गहरी हो जाएगी.

भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया, वेनेजुएला में हालिया घटनाक्रम गहरी चिंता का विषय है. हम वहाँ की बदलती स्थिति पर क़रीबी नज़र रखे हुए हैं…हम सभी संबंधित पक्षों से अपील करते हैं कि मुद्दों का समाधान बातचीत के ज़रिए और शांतिपूर्ण तरीक़े से किया जाए.

डॉनरो सिद्धांत

वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप से कोई हैरत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इसके आसार पिछले एक साल से भी ज्यादा समय से थे. वेनेजुएला के बाद अब वे कोलंबिया को भी धमकी दे रहे हैं.

नवंबर में ट्रंप ने अपनी रक्षा-नीति का जो दस्तावेज़ जारी किया था, उसमें कहा गया था, पहला मुद्दा हमारा अपना क्षेत्र है—पश्चिमी गोलार्ध. यह विचार, ‘मुनरो सिद्धांत का ट्रंप-निहितार्थ (कॉरोलरी)’ है. इसे कुछ लोग डॉनरो सिद्धांत कह रहे हैं.

मुनरो सिद्धांत उन्नीसवीं सदी में अमेरिकी विदेश नीति थी. उसे 1823 में राष्ट्रपति जेम्स मुनरो ने प्रतिपादित किया था. उसका मुख्य उद्देश्य पश्चिमी गोलार्ध, यानी पूरे अमेरिका महाद्वीप में यूरोपीय देशों के किसी भी नए उपनिवेश-निर्माण को रोकना था.

बदले में, अमेरिका ने यूरोपीय देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वादा किया था. यह सिद्धांत अमेरिका को लैटिन अमेरिका का संरक्षक या दारोगा बनाता था.

Sunday, December 21, 2025

2025: महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरता भारत


2025 में भारत की विदेश नीति महाशक्तियों अमेरिका, चीन और रूस के साथ संतुलन बैठाने, दक्षिण एशिया में अपनी उपस्थिति को मज़बूत करने और ग्लोबल साउथ के साथ रिश्तों को बेहतर बनाने पर केंद्रित रही.

पुतिन की यात्रा के साथ, जहाँ रूस के साथ खड़े होकर भारत ने अपनी स्वतंत्र-नीति का परिचय दिया, वहीं धैर्य का परिचय देते हुए अंततः अमेरिका के साथ व्यापार-समझौते का आधार तैयार करके व्यावहारिक राजनीति का परिचय भी दिया.

यूक्रेन के युद्ध में हालाँकि भारत ने रूस की प्रकट आलोचना नहीं की, पर प्रकारांतर से यह संदेश देने में देरी भी नहीं की कि यह वक्त लड़ाइयों का नहीं है. पुतिन की यात्रा के बाद यूक्रेन के राष्ट्रपति की भारत-यात्रा इस संतुलन को प्रकट करती है. इस साल चीन के साथ भारत के रिश्तों में भी बर्फ पिघली है.

वैश्विक-राजनीति में संतुलन बैठाते हुए भारत ने हार्ड-डिप्लोमेसी, आर्थिक लचीलेपन और सामरिक-शक्ति को बढ़ाने पर जोर दिया. इस साल वह विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है.

भारत सक्रिय रूप से ग्लोबल साउथके एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसे अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों में सुधारों की वकालत कर रहा है. अपनी वैश्विक स्थिति को बढ़ाने के लिए जी20, ब्रिक्स और एससीओ जैसे मंचों का उपयोग कर रहा है.

Wednesday, December 10, 2025

पुतिन की यात्रा और तलवार की धार पर भारत


पुतिन के भारत दौरे से भारत ने अपनी विदेश-नीति की स्वतंत्रता का परिचय दिया वहीं, रूस को अलग-थलग करने की कोशिशों को विफल करने में मदद भी की है. भारत को यह संदेश भी देना है कि हम किसी की दादागीरी के दबाव में नहीं आएँगे और अपनी स्वतंत्र सत्ता को बनाकर रखेंगे.

रूस को अलग-थलग करना इसलिए भी आसान नहीं है, क्योंकि विकासशील देशों के साथ उसके रिश्ते सोवियत-युग से बने हुए हैं. रूस ने बहुत लंबे समय तक इन देशों का साथ दिया है और अब ये देश उसका साथ दे रहे हैं.

इसका अर्थ यह भी नहीं है कि भारत ने अमेरिका से दूरी बनाई है या वह वैश्विक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया में किसी एक पाले में जाकर बैठेगा. अलबत्ता यह संकेत ज़रूर दिया कि भारत और रूस की दोस्ती ख़ास है, जो समय की कसौटी पर परखी गई है.

भारत को अमेरिका से रिश्तों में बदलाव आने पर धक्का जरूर लगा है. पिछले दो दशक से भारत यह कोशिश कर रहा था कि अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी विकसित हो. डॉनल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत का दर्जा रणनीतिक रूप से घटाया गया है.

ट्रंप प्रशासन ने इस हफ़्ते अपनी बहुप्रतीक्षित राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति जारी की है, जिसे देखते हुए लगता है कि अमेरिका ने एशिया में चीन से शत्रुता को कम करने और यूरोप में अपने प्रभाव को बढ़ाने का फैसला किया है.

Wednesday, November 26, 2025

वैश्विक-राजनीति क्या जी-20 को विफल कर देगी?


हाल में जोहानेसबर्ग में हुए जी-20 शिखर सम्मेलन से वैश्विक व्यवस्था के लिए कुछ महत्वपूर्ण संदेश निकले हैं. भारत की दृष्टि से इस सम्मेलन का दो कारणों से महत्व है.

एक, भारत ग्लोबल साउथ के नेता के रूप में उभर रहा है, जिसमें अफ्रीका की बड़ी भूमिका है. 2023 में भारत की जी-20 की अध्यक्षता के दौरान, अफ्रीकी संघ जी-20 का सदस्य बनाने की घोषणा की गई थी. ग्लोबल साउथ में अफ्रीकी देशों की महत्वपूर्ण भूमिका है.

दूसरी तरफ अमेरिकी बहिष्कार के कारण यह सम्मेलन वैश्विक राजनीति का शिकार भी हो गया. कहना मुश्किल है कि आगे की राह कैसी होगी, क्योंकि जी-20 का अगला मेजबान अमेरिका ही है, जिसका कोई प्रतिनिधि अध्यक्षता स्वीकार करने के लिए सम्मेलन में उपस्थित नहीं था.

खाली कुर्सी की अध्यक्षता

अजीब बात है कि वह देश, जिसे अध्यक्षता संभालनी है, सम्मेलन में आया ही नहीं. ऐसे  दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने कहा कि हमें यह अध्यक्षता किसी ‘खाली कुर्सी’ को सौंपनी होगी.

दक्षिण अफ्रीका ने ट्रंप के स्थान पर कार्यभार सौंपने के लिए दूतावास के किसी अधिकारी को भेजने के अमेरिकी प्रस्ताव को प्रोटोकॉल का उल्लंघन बताते हुए अस्वीकार कर दिया. अब शायद किसी और तरीके से इस अध्यक्षता का हस्तांतरण होगा.

Wednesday, November 5, 2025

बदलती भू-राजनीति और भारत-अमेरिका-चीन त्रिकोण


अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के बयानों और टैरिफ को लेकर भारत और अमेरिका के बीच चलती तनातनी के दौरान दो-तीन घटनाएँ ऐसी हुई हैं, जो इस चलन के विपरीत हैं.

एक है, दोनों देशों के बीच दस साल के रक्षा-समझौते का नवीकरण और दूसरी चाबहार पर अमेरिकी पाबंदियों में छह महीने की छूट. इसके अलावा दोनों देश एक व्यापार-समझौते पर बात कर रहे हैं, जो इसी महीने होना है.

इन बातों को देखते हुए पहेली जैसा सवाल जन्म लेता है कि एक तरफ दोनों देशों के बीच आर्थिक-प्रश्नों को लेकर तीखे मतभेद हैं, तो सामरिक और भू-राजनीतिक रिश्ते मजबूत क्यों हो रहे हैं? उधर अमेरिका और चीन का एक-दूसरे के करीब आना भी पहेली की तरह है.

डॉनल्ड ट्रंप और शी चिनफिंग के बीच मुलाकात के बाद कुछ दिनों के भीतर  अमेरिकी युद्धमंत्री (या रक्षामंत्री) पीट हैगसैथ ने रविवार को बताया कि उन्होंने चीन के रक्षामंत्री एडमिरल दोंग जून से मुलाकात की और दोनों ने आपसी संपर्क को मजबूत करने और सैनिक-चैनल स्थापित करने पर सहमति व्यक्त की है.

Thursday, October 30, 2025

आगे जाता आसियान और पिछड़ता सार्क


हाल में दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया को लेकर दो तरह की खबरें मिली थीं, जिनसे दो तरह की प्रवृत्तियों के संकेत मिलते हैं। आसियान-भारत शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वर्चुअल तरीके से और विदेशमंत्री एस जयशंकर स्वयं उपस्थित हुए थे। इस मौके पर प्रधानमंत्री ने कम्युनिटी विज़न 2045 को अपनाने के लिए आसियान की सराहना की। कम्युनिटी विज़न 2045 अगले बीस वर्षों में इस क्षेत्र को एक समेकित समन्वित विकास-क्षेत्र में तब्दील करने की योजना है।

अपने आसपास के राजनीतिक माहौल को देखते हुए यह ज़ाहिर होता जा रहा है कि भारत को पूर्व की दिशा में अपनी कनेक्टिविटी का तेजी से विस्तार करना होगा। यह विस्तार हो भी रहा है, पर म्यांमार की अस्थिरता और बांग्लादेश की अनिश्चित राजनीति के कारण कुछ सवाल खड़े हो रहे हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया के पाँच देशों (कंबोडिया, लाओस, म्यांमार, थाईलैंड और वियतनाम) के साथ सांस्कृतिक और वाणिज्यिक संबंधों को बढ़ावा देने वाले गंगा-मीकांग सहयोग कार्यक्रम में हमें तेजी लानी चाहिए।

अब उस दूसरी खबर की ओर आएँ, जो इस सिलसिले में महत्वपूर्ण है। भारत के सरकारी स्वामित्व वाले भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) ने गत 22 अक्तूबर से अपने पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए बांग्लादेश से इंटरनेट बैंडविड्थ का आयात बंद कर दिया। इस कदम का सीधा असर पूर्वोत्तर की इंटरनेट कनेक्टिविटी पर पड़ेगा, जो अभी तक बांग्लादेश अखौरा बंदरगाह के माध्यम से आयातित बैंडविड्थ पर निर्भर थी।

यह फैसला अचानक नहीं हुआ है। पिछले साल दिसंबर में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने हसीना सरकार के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें भारत के पूर्वोत्तर को बैंडविड्थ की आपूर्ति के लिए बांग्लादेश को ट्रांज़िट पॉइंट के रूप में उपयोग करने की अनुमति दी गई थी। बांग्लादेश टेलीकम्युनिकेशंस रेग्युलेटरी कमीशन (बीटीआरसी) का कहना था कि भारत को ट्रांज़िट पॉइंट देने से क्षेत्रीय इंटरनेट हब बनने की हमारी क्षमता कमज़ोर हो जाएगी।

भारत का पूर्वोत्तर पहले घरेलू फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क का उपयोग करके चेन्नई में समुद्री केबलों के माध्यम से सिंगापुर से जुड़ा हुआ था। चूंकि चेन्नई में लैंडिंग स्टेशन पूर्वोत्तर से लगभग 5,500 किमी दूर है, इसलिए इंटरनेट की गति पर असर पड़ता था।

Wednesday, October 1, 2025

बिगड़ती विश्व-व्यवस्था और संयुक्त राष्ट्र


सितंबर के महीने में हर साल होने वाले संरा महासभा के सालाना अधिवेशन का राजनीतिक-दृष्टि से कोई विशेष महत्व नहीं होता. अलबत्ता 190 से ऊपर देशों के शासनाध्यक्ष या उनके प्रतिनिधि सारी दुनिया से अपनी बात कहते हैं, जिसमें राजनीति भी शामिल होती है.

भारत के नज़रिए से देखें, तो पिछले कई दशकों से इस दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों की कड़वाहट सामने आती रही है. भारत भले ही पाकिस्तान का ज़िक्र न करे पर पाकिस्तानी नेता किसी न किसी तरीके से भारत पर निशाना लगाते हैं.

यह अंतर दोनों देशों के वैश्विक दृष्टिकोण को रेखांकित करता है. दोनों देशों के नेताओं के पिछले कुछ वर्षों के भाषणों का तुलनात्मक अध्ययन करें, तो पाएँगे कि पाकिस्तान का सारा जोर कश्मीर मसले के अंतरराष्ट्रीयकरण और उसकी नाटकीयता पर होता है और भारत का वैश्विक-व्यवस्था पर.

इस वर्ष इस अधिवेशन पर हालिया सैनिक-टकराव की छाया भी थी। ऐसे में इन भाषणों पर सबकी निगाहें थी, पर इस बार अमेरिका के राष्ट्रपति के भाषण ने भी हमारा ध्यान खींचा, जिसपर आमतौर पर हम पहले ध्यान नहीं देते थे.

दक्षिण एशिया

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ और भारत के विदेशमंत्री एस जयशंकर के भाषणों में उस कड़वाहट का ज़िक्र था, जिसके कारण दक्षिण एशिया दुनिया के सबसे पिछड़े इलाकों में बना हुआ है. अलबत्ता जयशंकर ने भारत की वैश्विक भूमिका का भी ज़िक्र किया.

इससे पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने मई में तनाव बढ़ने के दौरान पाकिस्तान को राजनयिक समर्थन देने के लिए चीन, तुर्की, सऊदी अरब, क़तर, अजरबैजान, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और संयुक्त राष्ट्र महासचिव सहित पाकिस्तान के ‘मित्रों और साझेदारों’ को धन्यवाद दिया.

उन्होंने एक से ज्यादा बार भारत का नाम लिया और यहाँ तक कहा कि पाकिस्तान ने भारत के साथ युद्ध जीत लिया है और अब हम शांति जीतना चाहते हैं.

उनके इस दावे के जवाब में भारत के स्थायी मिशन की फ़र्स्ट सेक्रेटरी पेटल गहलोत ने 'राइट टू रिप्लाई' का इस्तेमाल करते हुए कहा, ‘तस्वीरों को देखें, अगर तबाह रनवे और जले हैंगर जीत है, तो पाकिस्तान आनंद ले सकता है.’

उन्होंने कहा, इस सभा ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की बेतुकी नौटंकी देखी, जिन्होंने एक बार फिर आतंकवाद का महिमामंडन किया, जो उनकी विदेश नीति का मूल हिस्सा है.’

Friday, September 26, 2025

वाइट हाउस में शरीफ


अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने गुरुवार को ओवल ऑफिस में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से मुलाकात की। इस मुलाकात में शरीफ के साथ पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर भी मौजूद थे, जिनकी इस गर्मी की शुरुआत में ट्रंप ने वाइट हाउस में लंच पर मेजबानी की थी। इस मुलाकात में विदेश मंत्री मार्को रूबियो भी मौजूद थे। बैठक से पहले अमेरिकी नेता ने आगंतुकों को ‘महान नेता’ कहा, जो अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों में आई मधुरता का संकेत है।

ट्रंप ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा, ‘हमारे पास एक महान नेता आ रहे हैं, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और फील्ड मार्शल। फील्ड मार्शल बहुत महान व्यक्ति हैं, और प्रधानमंत्री भी, दोनों, और वे आ रहे हैं, और वे शायद अभी इसी कमरे में उपस्थित होंगे।’ यह बैठक अमेरिका और पाकिस्तान के बीच व्यापार समझौते के बाद हुई है और मंगलवार को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा में ट्रंप और शरीफ के बीच हुई संक्षिप्त मुलाकात के तुरंत बाद हुई है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने अरब देशों और मिस्र, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब और तुर्की सहित अन्य देशों के नेताओं के साथ बहुपक्षीय बैठक की थी।

Wednesday, September 24, 2025

सऊदी-पाक समझौते ने बदला प.एशिया का परिदृश्य

 

सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हाल में हुए आपसी सुरक्षा के समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद इसके निहितार्थ को लेकर कई तरह की अटकलें हैं. खासतौर से हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं भारतीय-सुरक्षा से जुड़े सवाल.

समझौता होने का समय उतना ही महत्वपूर्ण है, जितनी कि उसकी विषयवस्तु है. इसकी घोषणा इसराइल के क़तर पर हुए हमले के बमुश्किल एक हफ़्ते बाद हुई है. इससे खाड़ी देशों की असुरक्षा व्यक्त हो रही है, वहीं पश्चिम एशिया में पाकिस्तान की बढ़ती भूमिका दिखाई पड़ रही है.

समझौते के साथ एक गीत भी जारी किया गया है. अरबी में लिखे इस गीत में कहा गया है, पाकिस्तान और सऊदी अरब, आस्था में भाई-भाई. दिलों का गठबंधन और मैदान में एक तलवार.’

मोटे तौर पर सऊदी अरब अपनी सुरक्षा मज़बूत करना चाहता है और पैसों की तंगी से जूझ रहे पाकिस्तान को अपनी सैन्य शक्ति के कारण सुरक्षा-प्रदाता के रूप में पेश करने और अपने आर्थिक-आधार को पुष्ट करने का मौका मिल रहा है.

Wednesday, July 30, 2025

द्विपक्षीय व्यापार-समझौतों का मायाजाल

 


भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता हो गया, पर भारत-अमेरिका समझौता नहीं हो पाया है, जिसकी उम्मीदें लगाई जा रही थीं. हालाँकि कहा जा रहा है कि जल्द ही वह भी होगा.

अमेरिका की एक टीम अगस्त में भारत आने वाली है. इसके बाद भारत और यूरोपियन यूनियन के समझौते की भी आशा है, जिसके लिए बातचीत चल रही है.

इन समझौतों में इतनी बारीकियाँ होती हैं कि उन्हें पूरी तरह समझे बिना कोई भी देश कदम आगे नहीं बढ़ाता है. कुछ बातें तब समझ में आती हैं, जब वे लागू हो जाती हैं.

रिश्तों के पेच

इधर भारत और चीन के बीच संबंधों में सुधार की प्रक्रिया भी चल रही है, जिसमें आर्थिक-रिश्तों की केंद्रीय भूमिका होगी. दूसरी तरफ अमेरिका के चीन, ईयू और ब्रिटेन के साथ आर्थिक-संबंध भी हमारी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेंगे.

रूस, चीन और खासतौर से ब्रिक्स के साथ भारत के रिश्ते, अमेरिका के साथ होने वाले समझौते का हमारे लिए भी महत्व है, क्योंकि घूम-फिरकर ये हमें भी प्रभावित करते हैं.

व्यापार के समांतर जियो-पॉलिटिक्स भी चल रही है. अमेरिका सरकार चीन के व्यापार-विस्तार को काबू करने की कोशिशें भी साथ-साथ कर रही है. इसलिए इन देशों के आपसी समझौतों और उनसे पड़ने वाले क्रॉस-प्रभावों को समझना जटिल काम है.

Wednesday, July 23, 2025

भारत-अमेरिका रिश्तों में ‘पाकिस्तानी’ ख़लिश


पिछले कुछ महीनों में भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के बीच में अमेरिका की एक अटपटी सी भूमिका सामने आ रही है. इसमें सबसे ज्यादा ध्यान खींच रहा है, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का बार-बार दावा करना कि मैंने लड़ाई रुकवा दी.

ट्रंप ने यहाँ तक कहा था कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान को व्यापार बंद करने की धमकी दी थी, जिसके बाद दोनों देश संघर्ष-विराम के लिए राज़ी हुए. इतना ही काफी नहीं था, हाल में उन्होंने एक से ज्यादा बार कहा है कि इस लड़ाई में पाँच जेट विमान गिराए गए.

शुरू में साफ-साफ कहा कि भारत के जेट गिराए गए, पर नवीनतम वक्तव्य में यह स्पष्ट नहीं किया है कि ये किसके विमान थे, पर इशारा साफ है. सवाल यह नहीं है कि यह सच है या नहीं, सवाल यह है कि ट्रंप बार-बार ऐसा क्यों बोल रहे हैं.

नीतिगत बदलाव

पर्यवेक्षकों को अब कुछ और बातें नज़र आने लगी हैं. एक तो यह कि एक दशक पहले अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान को डिहाइफनेट करने की जो नीति बनाई थी, वह खत्म हो रही है. दक्षिण एशिया को लेकर अमेरिकी नीति में बदलाव हो रहा है.

इस बदलाव का मतलब यह नहीं है कि अमेरिका के भारत से रिश्तों में खिंचाव आएगा. शायद वह पाकिस्तान को अपने हाथ से बाहर नहीं जाने देना चाहता, जो हाल के वर्षों में पूरी तरह चीन की गोदी में जाकर बैठ गया है.

Saturday, July 12, 2025

दक्षिण एशिया में प्रवेश की चीनी कोशिशें


हाल में भारतीय सेना के उप प्रमुख ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन और तुर्की ने पाकिस्तान का खुलकर साथ दिया. हम एक सीमा पर दो विरोधियों या असल में तीन से जंग लड़ रहे थे. पाकिस्तान अग्रिम मोर्चे पर था और चीन उसे हर संभव सहायता प्रदान कर रहा था.

यह बात बरसों से कही जा रही है कि भारत को अब दो मोर्चों पर एकसाथ लड़ाई लड़नी होगी. अभी यह परोक्ष सहयोग है, बाद में प्रत्यक्ष लड़ाई भी हो सकती है. इस खबर के पहले एक और खबर आई थी, जो बताती है कि दक्षिण एशिया में चीन की दिलचस्पी बढ़ती जा रही है.

गत 19 जून को चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान ने चीन के युन्नान प्रांत के कुनमिंग में विदेश कार्यालय स्तर पर अपनी पहली त्रिपक्षीय बैठक की. वैकल्पिक संगठन के लिए चीन-पाकिस्तान की योजना कोई आश्चर्य की बात नहीं है.

Wednesday, July 2, 2025

व्यापार-समझौते और बदलता वैश्विक-परिदृश्य


अमेरिका के दंडात्मक
पारस्परिक टैरिफ से बचने की 9 जुलाई की समय-सीमा जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, भारत-अमेरिका व्यापार-समझौते की संभावनाएँ बढ़ रही हैं. इसमें सबसे बड़ी बाधा भारत के किसानों और पशुपालकों के हितों की लक्ष्मण रेखा है.

पिछले सप्ताह राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के इस बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कि नई दिल्ली के साथ होने वाला अंतरिम द्विपक्षीय व्यापार समझौता (बीटीए) अमेरिका के लिए भारतीय बाजार को खोल देगा’, वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है, हाँ, हम समझौता करना चाहेंगे.

ट्रंप की टिप्पणी ऐसे समय में आई, जब मुख्य वार्ताकार राजेश अग्रवाल के नेतृत्व में एक भारतीय दल 26 जून को ही अमेरिका के साथ अगले दौर की व्यापार वार्ता के लिए वाशिंगटन पहुँचा. अग्रवाल वाणिज्य विभाग में विशेष सचिव हैं.

भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता के अंतिम चरण में पहुंचने के साथ ही राष्ट्रपति  ट्रंप ने बुधवार को कहा कि यह समझौता ऐसा होगा, जिसमें अमेरिका की कंपनियां ‘‘आगे बढ़कर प्रतिस्पर्धा कर सकेंगी’’ क्योंकि यह समझौता ‘‘बहुत कम शुल्क’’ सुनिश्चित करेगा.

एयरफोर्स वन में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा: "मुझे लगता है कि हम भारत के साथ एक समझौता करने जा रहे हैं। और यह एक अलग तरह का समझौता होगा. यह एक ऐसा समझौता होगा जिसमें हम शामिल होकर प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे. अभी भारत किसी को भी स्वीकार नहीं करता. मुझे लगता है कि भारत ऐसा करने जा रहा है, और अगर वे ऐसा करते हैं, तो हम बहुत कम टैरिफ पर एक समझौता करने जा रहे हैं..."

राष्ट्रपति की यह टिप्पणी अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेन्ट द्वारा मंगलवार को दिए गए बयान के कुछ घंटों बाद आई है जिसमें उन्होंने कहा था कि अमेरिका और भारत दक्षिण एशियाई देश में अमेरिकी आयात पर शुल्क कम करने तथा भारत को अगले सप्ताह तेजी से बढ़ने वाले ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए जाने वाले शुल्कों से बचने में मदद करने के लिए एक समझौते के करीब पहुंच रहे हैं.

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सोमवार को न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम में कहा था, "हम एक बहुत ही जटिल व्यापार वार्ता के बीच में हैं - उम्मीद है कि बीच से भी ज़्यादा बीच में." "ज़ाहिर है, मेरी उम्मीद है कि हम इसे एक सफल निष्कर्ष पर ले जाएँगे। मैं इसकी गारंटी नहीं दे सकता, क्योंकि उस चर्चा में एक और पक्ष भी है."

पहला चरण

अमेरिका ने 2 अप्रैल को घोषित उच्च टैरिफ को 9 जुलाई तक निलंबित कर दिया था. इसलिए उम्मीद की जा रही है कि भारत के साथ समझौता उसके पहले हो जाएगा. यह दीर्घकालीन व्यापार-समझौते का पहला चरण होगा.

इस समझौते से भारतीय अर्थव्यवस्था की बदलती दिशा का पता लगेगा. नब्बे के दशक के आर्थिक-उदारीकरण, के बाद आंतरिक-राजनीति में फिर से नई लहरें पैदा होंगी. अमेरिका के सस्ते कृषि-उत्पादों के भारत आने का मतलब है, खेतों और गाँवों में हलचल.

भारत चाहता है कि अमेरिकी कृषि-उत्पादों की सब्सिडी पर भी बात हो. अब लगता है कि दोनों देश, व्यापार-समझौते के पहले चरण पर जल्द ही पहुँचेंगे, शायद काफी हद तक अमेरिकी शर्तों पर, लेकिन भविष्य में भारतीय चिंताओं को संबोधित करते हुए संभावित समायोजन के साथ.

भारतीय विदेश-नीति के लिहाज से यह हफ्ता काफी महत्वपूर्ण होगा. अगले कुछ समय में अमेरिका के साथ व्यापार-समझौते के अलावा यूरोप और चीन के साथ रिश्तों को लेकर भी महत्वपूर्ण गतिविधियाँ होने वाली हैं.

Wednesday, June 4, 2025

भारत-पाक रिश्तों में अमेरिका के बदलते स्वर


ट्रंप-फैक्टरके अचानक शामिल हो जाने से भारत-पाकिस्तान और भारत-अमेरिका रिश्तों में उलझाव नज़र आने लगे हैं. कारोबारी कारणों और खासतौर से डॉनल्ड ट्रंप के तौर-तरीकों की वज़ह से ये गुत्थियाँ उलझ रही हैं.

डॉनल्ड ट्रंप ने हाल में भारत और पाकिस्तान को एकसाथ जोड़कर देखना शुरू कर दिया है, जबकि एक दशक पहले अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान को एकसाथ रखने की नीति को त्याग दिया था. क्या अमेरिका की नीतियों में बदलाव आ रहा है?

ट्रंप के बारे में माना जाता है कि वे शेखी बघारने में माहिर हैं, ज़रूरी नहीं कि उनकी नीतियों में बड़ा बदलाव हो. अलबत्ता भारतीय नीति-नियंताओं को सावधानी से देखना होगा कि भारत-पाकिस्तान को डिहाइफनेट करने की अमेरिकी-नीति जारी है या उसमें बदलाव आया है.

बदले स्वर

ट्रंप के बदले स्वरों की तबतक अनदेखी की जा सकती है, जबतक हमें लगे कि यह केवल बयानबाज़ी तक सीमित है. इसलिए हमें भारत-अमेरिका व्यापार-वार्ता के नतीज़ों का इंतज़ार करना चाहिए, जो इस महीने के तीसरे-चौथे हफ्ते में दिखाई पड़ेंगे.  

संभव है कि पाकिस्तान के प्रति अमेरिकी-नीति में बदलाव हो रहा हो. उसके लिए भी हमें तैयार रहना होगा. शायद निजी स्वार्थों के कारण ट्रंप, पाकिस्तान के साथ रिश्ते बना रहे हों, जैसाकि बिटकॉइन कारोबार को लेकर कहा जा रहा है, जिसमें उनका परिवार सीधे जुड़ा है.

अफगानिस्तान-पाकिस्तान में संभावित खनिज भंडार के दोहन का प्रलोभन भी ट्रंप को पाकिस्तान की ओर खींच भी सकता है. इन सभी बातों के निहितार्थ का हमें इंतज़ार करना होगा, पर उसके पहले हमें ट्रंप की टैरिफ-योजना पर नज़र डालनी चाहिए, जो उनके राजनीतिक-भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण है.

Thursday, May 15, 2025

अमेरिकी कोशिशों का स्वागत है, मध्यस्थता का नहीं


दक्षिण एशिया का दुर्भाग्य है कि जिस समय दुनिया के देश, जिनमें भारत भी शामिल है, डॉनल्ड ट्रंप की आक्रामक आर्थिक-नीतियों के बरक्स अपनी नीतियों के निर्धारण में लगे हैं, हमें लड़ाई में जूझना पड़ रहा है. 

इस लड़ाई की पृष्ठभूमि को हमें दो परिघटनाओं से साथ जोड़कर देखना और समझना चाहिए. एक, शनिवार के युद्धविराम की घोषणा भारत या पाकिस्तान के किसी नेता ने नहीं की, बल्कि डॉनल्ड ट्रंप ने की. दूसरे हाल में भारत और ब्रिटेन के बीच मुक्त-व्यापार समझौता हुआ है, जिसकी तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया.  

इसके अलावा हाल के दिनों की भू-राजनीति में महत्वपूर्ण नए मोड़ आए हैं, जिनका भारत पर भी असर पड़ेगा. खबरों के मुताबिक तुर्की और चीन ने पाकिस्तान का एकतरफा समर्थन किया है. 

पाकिस्तान ने आतंकवाद को एक अघोषित नीति के रूप में इस्तेमाल किया है. दूसरी तरफ यह साबित करते हुए कि आतंकवादी हमले की स्थिति में हम पाकिस्तान में घुसकर कार्रवाई कर सकते हैं, मोदी सरकार ने प्रभावी रूप से एक नए सुरक्षा सिद्धांत की घोषणा की है. पाकिस्तान को निर्दोष लोगों की हत्या करने और आतंकवाद को बढ़ावा देने की अनुमति नहीं दी जाएगी. 

ट्रंप की घोषणा

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर घोषणा की कि भारत और पाकिस्तान ‘पूर्ण और तत्काल संघर्ष विराम’ पर सहमत हो गए हैं. ट्रंप ने अपनी आदत के अनुरूप या शायद जल्दबाज़ी में ऐसा किया. वे साबित करना चाहते हैं कि लड़ाइयों को रोकना उन्हें आता है.