Tuesday, May 19, 2026

किसे चाहिए ईमानदारी?

पत्रकारिता या दूसरे शब्दों में कहें, तो ईमानदार पत्रकारिता की ज़रूरत किसे है? पत्रकारों को, उनके संगठनों को, प्रेस क्लबों को, मीडिया-मालिकों को, राजनीतिक दलों को या आम जनता यानी पाठकों और दर्शकों को? सिद्धांततः पत्रकारिता खुद में एक प्रकार की राजनीति है। ऐसी राजनीति जिसका केंद्रीय विषय सार्वजनिक हित है, सत्ता पाना नहीं। सत्ता की राजनीति भी ऐसा ही दावा करती है, पर वह जिन आधारों पर चल रही है, वे संकीर्ण होते जा रहे हैं। पत्रकारिता की जिम्मेदारी है कि वह उन संकीर्ण आधारों पर चोट करे। इसके लिए उसे अपनी साख बनानी होगी।

यह काम पत्रकारिता ने अपने लिए खुद तय नहीं किया है, बल्कि समाज ने तय किया है। शुरूआती पत्रकार ताकतवर राजनेताओं के लिए पैम्फलेट लिखते हुए ही इस धंधे में आए थे। पर आज की लोकतांत्रिक-व्यवस्था में पत्रकार की जरूरत सोसायटी को है, और इस बात में ही तमाम पेच हैं। वोटर को सूचना चाहिए, जिसके आधार पर वह अपनी राय बनाए।

सोलह साल पहले नीरा राडिया ने बड़ी ईमानदारी से अपना काम किया। पता नहीं वे अपने क्लाइंट्स के दृष्टिकोण को किस हद तक मीडिया में ला पाने में कामयाब हुईं, पर इतना तय है कि उन्होंने उसी तरह काम किया जैसी हमारे मीडिया की संरचना है। एक दौर तक इस मीडिया के भीतर कुछ आदर्श थे, जो अब आउटडेटेड हैं। ओल्ड स्टाइल मीडिया माने जो सूचना के गैर-वाजिब इस्तेमाल को तैयार न हो। और नए स्कूल के माने? सवाल है कि क्या सब ऐसे ही रहेगा?

मुझे रसूख चाहिए

कुछ साल पहले मुझे माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल जाने और नए पुराने छात्रों से संवाद करने का मौका मिला। मौका था नए सत्र का आरम्भ, जिसका समारोह था। मैंने सभा में बैठे छात्रों से पूछा- आप पत्रकार क्यों बनना चाहते हैं?  ज्यादातर का जवाब था- सामाजिक जरूरत के लिए। पाठकों को सही जानकारी देने के लिए। एक छात्र ने खड़े होकर कहा, “ मैं पैसे, पहचान और ऊंची पहुंच और रसूख बनाने के लिए पत्रकार बनना चाहता हूं।” पूरे हाउस में ठहाका लगा।

पता नहीं उस छात्र ने वह बात गंभीरता में कही या मजाक में, पर यह महत्वपूर्ण बात थी। सभी न सही कुछ पत्रकार सेलिब्रिटी बन रहे हैं। पैसे, पद औऱ पहचान के लिहाज से वे टॉप पर आने लगे हैं। इसकी कीमत कौन देता है? पत्रकार महात्मा गांधी थे, तिलक भी। महावीर प्रसाद द्विवेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी से लेकर राजेंद्र माथुर तक तमाम नाम हैं। उस छात्र का आशय जो भी रहा हो, पर उसने कहा, मैं ताकत चाहता हूँ जिससे लोग डरें।

जमानत पर अलग राय

सोमवार को कथित नार्को-आतंकवाद मामले में एक कश्मीरी व्यक्ति को जमानत देते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने शीर्ष न्यायालय में न्यायिक दृष्टिकोणों की विविधता को रेखांकित किया, जिसमें विभिन्न पीठों ने इस जटिल प्रश्न पर अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाए कि क्या कड़े गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत जमानत प्रतिबंध संवैधानिक सुरक्षा उपायों पर हावी हो सकते हैं।

“यदि छोटी बेंचें बड़ी बेंच द्वारा निर्धारित सिद्धांत से सहमत नहीं हो पाती हैं, तो उचित और एकमात्र उपाय यह है कि मामले को माननीय मुख्य न्यायाधीश के समक्ष एक और बड़ी बेंच के विचारार्थ प्रस्तुत किया जाए। दो न्यायाधीशों की बेंच होने के नाते, हम केए नजीब मामले में तीन न्यायाधीशों के बेंच द्वारा निर्धारित सिद्धांत से बँधे हुए हैं। हम बस इतना ही कहते हैं,” न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने 102 पृष्ठों के अपने फैसले में कहा।

अदालत की चिंता उन मिसालों की श्रृंखला से उपजी है जिनकी उसने जांच की है कि क्या यूएपीए की धारा 43 (डी) (5) की कठोरता - जो जमानत देने पर प्रतिबंध लगाती है - "पिघल जाएगी" जहां लंबे समय तक कारावास और विलंबित परीक्षण संविधान के अनुच्छेद 21 के उल्लंघन की ओर ले जाता है।

भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा 2021 में दिए गए फैसले ने इस मुद्दे पर पालन किए जाने वाले "सही कानून" को स्थापित किया। अदालत ने कहा था कि आपराधिक मुकदमे के अंत की कोई उम्मीद न होने पर लंबे समय से कारावास झेल रहे विचाराधीन अभियुक्त को जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए।

अदालत ने तब यूएपीए मामलों में जमानत पर सबसे महत्वपूर्ण फैसले - एनआईए बनाम ज़हूर अहमद शाह वटाली मामले में 2019 के फैसले - की समीक्षा की थी। वटाली मामले में दो-न्यायाधीशों की पीठ ने फैसला सुनाया था कि यूएपीए के तहत जमानत याचिकाओं पर विचार करते समय अदालतों को राज्य के मामले को उसके गुण-दोषों की जांच किए बिना स्वीकार करना चाहिए।

इंडियन एक्सप्रेस एक्सप्लेंड में पढ़ें विस्तार से

 

बदलते वैश्विक-संदर्भों में भारत की चुनौतियाँ


वैश्विक-राजनीति में हमेशा ही कोई न कोई घटना ऐसी होती रहती है, जो किसी खास इलाके के लिए महत्त्वपूर्ण होती है. पिछले हफ्ते भारत में ‘ब्रिक्स’ विदेशमंत्रियों का सम्मेलन और प्रधानमंत्री का पाँच देशों की यात्रा पर निकलना भी ऐसी ही घटनाएँ हैं.

पिछले हफ्ते भारत ने नई दिल्ली में ‘ब्रिक्स’ के विदेशमंत्रियों की बैठक की मेजबानी की और अगले सप्ताह ‘क्वॉड’ के विदेश मंत्रियों मेजबानी और महीने के अंत में भारत-अफ़्रीका शिखर सम्मेलन का आयोजन भी करेगा. इनमें से हरेक आयोजन भारतीय डिप्लोमेसी के अलग-अलग पहलुओं पर रोशनी डालता है.

‘ब्रिक्स’ और ‘क्वॉड’ को अक्सर वैचारिक रूप से विरोधी संगठनों के रूप में चित्रित किया जाता है. ‘ब्रिक्स’ को पूर्वी देशों द्वारा पश्चिमी वर्चस्व को उखाड़ फेंकने के साधन के रूप में, जबकि ‘क्वॉड’ को चीन के विरुद्ध एक रणनीतिक सुरक्षा कवच के रूप में. इस प्रकार के वर्णन दोनों समूहों की अतिरंजना करते हैं.

‘ब्रिक्स’ में टकराव

‘ब्रिक्स’ में ऐसे देश शामिल हैं, जिनके बीच प्रत्यक्ष संघर्ष हैं. ‘क्वॉड’, अपने बढ़ते सहयोग के बावजूद, औपचारिक गठबंधन नहीं है. भारत ने तो ‘क्वॉड’ को सुनियोजित सुरक्षा सहयोग के मंच में बदलने का हमेशा विरोध किया है.

पिछले हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की चीन-यात्रा के पीछे भी हमारे लिए कुछ संकेत छिपे हैं. उधर ‘ब्रिक्स’ के सम्मेलन में ईरान और यूएई के मतभेद उभर कर आए, जिनके कारण संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका.

अमेरिका और चीन की वार्ता के केंद्र में भारत भले ही नहीं था, पर दोनों के रिश्ते सुधरे, तो उसका, भारत-अमेरिका और भारत-चीन रिश्तों पर भी प्रभाव पड़ेगा. सवाल है कि क्या रिश्ते सुधरे?

Monday, May 18, 2026

जलधारा की सफाई का पर्व


आज, हिंदू के पहले पेज पर एक रोचक तस्वीर छपी है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग टोकरियाँ लेकर एक जलधारा की सफाई करते नज़र आ रहे हैं। यह तस्वीर दक्षिण कश्मीर के काजीगुंड के पंजाथ नाग गाँव के लोगों की है, जिन्होंने अपने पूर्वजों की सदियों पुरानी परंपरा को आज भी कायम रखा है। यहाँ धान की रोपाई से पहले झरनों की सफाई के साथ-साथ मछली पकड़ने की प्रतियोगिता होती है।  यह एक स्थानीय पर्व के रूप में उभरा है, जो अब दूसरे गाँवों के लोगों को भी आकर्षित करता है।

अब यहाँ आसपास के करीब 45 समुदायों के लोग एकत्र होकर पानी की सफाई करते हैं और निर्धारित मानकों के भीतर रहते हुए मछलियाँ भी पकड़ते हैं। यह झरना स्थानीय अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग है, क्योंकि इससे नीचे की ओर स्थित कई गांवों की सिंचाई होती है और लगभग 25 गाँवों को पीने का पानी मिलता है।

इस झरने और इसके संरक्षण का उल्लेख कल्हण रचित 12वीं सदी के ऐतिहासिक ग्रंथ राज तरंगिणी में भी किया गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पंजाथ अर्थात पाँच हाथ, जो 500 झरनों का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें पीर पंजाल की तलहटी पर स्थित झरने भी शामिल हैं। माना जाता है कि एक समय में इस गाँव में 500 से अधिक प्राकृतिक झरने हुआ करते थे।

पंजाथ झरना काजीगुंड के सैकड़ों परिवारों के लिए सिंचाई और पीने के पानी का एक मुख्य स्रोत है। हर साल धान की खेती शुरू होने से पहले स्थानीय निवासी उचित सिंचाई व्यवस्था के लिए गाद और खरपतवार हटाकर जलाशय को साफ करते हैं। इस उत्सव को देखने 50 किलोमीटर दूर से भी लोग आते हैं।

हर साल मई के तीसरे या चौथे सप्ताह में ग्रामीण एक दिन चुनते हैं जब सेब, बादाम और अखरोट के बाग फूलों से भरे होते हैं। 500 मीटर के क्षेत्र में फैले पंजाथ नाग की सफाई करते हैं और मछली पकड़ते हैं। यह एक ऐसी परंपरा है जो उन्हें पूर्वजों से विरासत में मिली है। लोग इस दिन पकड़ी गई मछलियों को घर ले जाते हैं और उस दिन दोस्तों और परिवार के लिए दावत मनाते हैं।

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Sunday, May 17, 2026

भारत का सुपरफूड गुड़

उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर का 'जीआई टैग्ड गुड़'

भारत दुनिया के
70 प्रतिशत से ज़्यादा गुड़ का उत्पादन करता है, जिससे वह प्राकृतिक मिठास के मामले में दुनिया का नेतृत्व कर रहा है। देश के गन्ने के कुल उत्पादन का लगभग 20–30 प्रतिशत हिस्सा गुड़ बनाने में इस्तेमाल होता है, जिससे लगभग 25 लाख ग्रामीण लोगों को आजीविका मिली हुई है। इस क्षेत्र में निर्यात में भी काफी बढ़ोतरी देखने को मिली है। 2015–16 से 2024–25 के बीच गुड़ के निर्यात के मूल्य में 106.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जो इसकी बढ़ती अंतरराष्ट्रीय माँग का संकेत है। आयरन, मिनरल्स और जरूरी माइक्रो-न्यूट्रिएंट्स जैसे पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण, गुड़ रिफाइंड चीनी का एक ज़्यादा सेहतमंद विकल्प है। इस बढ़ोतरी को और बढ़ावा देने के लिए, सरकार की कई योजनाएं जैसे प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना, पीएम सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्योग उन्नयन योजना और एक जिला एक उत्पाद के साथ-साथ जीआई टैगिंग भी अहम भूमिका निभा रही हैं। ये योजनाएं उत्पादों की वैल्यू बढ़ाने, ग्रामीण उद्यमों को मजबूत करने और निर्यात की संभावनाओं को बढ़ाने में मदद कर रही हैं।

 भारत में गुड़ सेक्टर

गुड़, एक पारंपरिक, बिना रिफाइन और प्राकृतिक मीठा पदार्थ है। इसे बिना किसी रसायन का इस्तेमाल किए, गन्ने के रस को गाढ़ा करके बनाया जाता है। इसे अक्सर ‘औषधीय चीनी’ भी कहा जाता है, और पोषक तत्वों के मामले में यह शहद के बराबर होता है। गुड़ का सेवन एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरीबियन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर किया जाता है, जहां इसे अलग-अलग स्थानीय नामों से जाना जाता है। गुड़ को प्राकृतिक रुप से बनाने के पारंपरिक तरीकों और रसायन-मुक्त मीठे पदार्थों के प्रति उपभोक्ताओं की बढ़ती पसंद के कारण इसे काफी महत्व दिया जाता है।

दुनिया भर में गुड़ के कुल उत्पादन का 70 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा भारत में होता है। इस वजह से भारत दुनिया का सबसे बड़ा गुड़ उत्पादक देश है। देश में गन्ने के कुल उत्पादन का लगभग 20–30 प्रतिशत हिस्सा गुड़ बनाने में इस्तेमाल होता है। यह ग्रामीण भारत के प्रमुख कृषि-प्रसंस्करण उद्योगों में से एक है। इस क्षेत्र की खासियत विकेंद्रित प्रसंस्करण, परिवहन की कम लागत, छोटे पैमाने पर उद्यमिता और कुटीर उद्योग है। इससे लगभग 25 लाख लोगों की आजीविका चलती है।

बढ़ती गुड़ अर्थव्यवस्था

भारत के गुड़ क्षेत्र को गन्ने के भारी उत्पादन का लाभ मिलता है। वर्ष 2024-25 में, गन्ने का कुल उत्पादन 44.49 करोड़ टन (एमटी) रहने का अनुमान था। कुल उत्पादन में उत्तर प्रदेश का योगदान 48.5 प्रतिशत रहा, जिसके बाद महाराष्ट्र (24.1 प्रतिशत) और कर्नाटक (10.5 प्रतिशत) का स्थान था। अन्य उत्पादक राज्यों में गुजरात, तमिलनाडु, बिहार, उत्तराखंड, पंजाब, मध्य प्रदेश और हरियाणा शामिल हैं।

भारत गुड़ और कनफैक्शनरी उत्पादों (जिनमें पारंपरिक भारतीय मिठाइयाँ और टॉफियाँ शामिल हैं) के प्रमुख निर्यातकों में से एक है। वर्ष 2015-16 में, इसका 292.8 मीट्रिक टन निर्यात हुआ जिससे 19.7 करोड़ अमेरिकी डॉलर मिले। वर्ष 2024-25 तक निर्यात बढ़कर 471.9 मीट्रिक टन हो गया जिससे 40.68 करोड़ अमेरिकी डॉलर प्राप्त हुए। इस अवधि के दौरान, मूल्य में लगभग 106.5 प्रतिशत और मात्रा में 61.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।वर्ष 2024-25 में निर्यात के प्रमुख ठिकानों में इंडोनेशिया, अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), नाइजीरिया और नेपाल शामिल थे।