Saturday, October 31, 2026

इसराइली राजनीति की भूलभुलैया


इसराइल में बहुदलीय (multiparty) प्रणाली है।
कोई भी एक दल अकेले बहुमत नहीं जीत पाता, इसलिए सरकार हमेशा कई दलों के गठबंधन (coalition) से बनती है। नेसेट (Knesset) में कुल 120 सीटें होती हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सीटें जरूरी होती हैं। चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व (proportional representation) प्रणाली से होते हैं, जिसमें 3.25% वोट थ्रेशहोल्ड पार करने वाले दलों/सूचियों को सीटें मिलती हैं।

अक्तूबर 2026 के चुनाव (26वीं नेसेट) के अंतिम परिणामों के अनुसार, लगभग 11-12 प्रमुख दल/सूचियाँ नेसेट में पहुँचीं। चुनाव में कुल 30+ सूचियाँ (lists) शामिल हुई थीं, लेकिन ज्यादातर प्राथमिक सीमा यानी थ्रेशहोल्ड पार नहीं कर पाईं।

2026 चुनाव के प्रमुख दल और सीटें (अंतिम गणना के अनुसार)

दल/सूचीनेता/नेतृत्वसीटेंप्रकार/विचारधारा
लिकुड (Likud)बेंजामिन नेतन्याहू27दक्षिणपंथी, राष्ट्रवादी
याशर (Yashar)गदी आइज़ेनकोट21मध्यपंथी, सुरक्षा-केंद्रित
बेयाहाद / B'Yachad (Together)नफ्ताली बेनेट + यैर लैपिड12मध्य-दक्षिणपंथी गठबंधन
जॉइंट लिस्ट (Joint List)यूसुफ जबरीन आदि11अरब दल (हादाश-ताअल आदि का गठबंधन)
द डेमोक्रेट्स (The Democrats)यैर गोलान8वामपंथी/सामाजिक लोकतांत्रिक
रा'अम (Ra'am)मनसौर अब्बास8अरब, इस्लामी-रूढ़िवादी
यिसराइल बेइतेनु (Yisrael Beiteinu)अविग्दोर लिबरमैन7दक्षिणपंथी, धर्मनिरपेक्ष, रूसी-यहूदी हित
ओत्ज़मा येहुदित (Otzma Yehudit)इतामार बेन-ग्वीर7अति-दक्षिणपंथी, काहानिस्ट
यूनाइटेड तोराह जूडाइज्म (UTJ)याकोव आशेर7हरेदी (अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स) अशकेनाजी
शास (Shas)अर्येह देरी6हरेदी, सेफार्डी/मिज़राही
रिलिजियस ज़ायोनिज़्म-ज़ेहुत (Religious Zionism-Zehut)बेज़ालेल स्मोट्रिच आदि6धार्मिक ज़ायोनिस्ट, अति-दक्षिणपंथी

कुल: नेतन्याहू गुट ~53 सीटें, विपक्षी गुट (आइज़ेनकोट आदि) ~48 सीटें, अरब दल ~19 सीटें। कोई भी गुट अकेले 61 तक नहीं पहुँचा, इसलिए गठबंधन वार्ता चल रही है।

Tuesday, October 27, 2026

यूरोप की अराजकता ने बजाई खतरे की घंटी


फ्रांस, इटली, स्पेन, पुर्तगाल, बेल्जियम, अल्बानिया, जर्मनी और सर्बिया सहित कई यूरोपीय देशों में महंगाई, बढ़ते जीवन-यापन, आवास की कमी, वेतन संकट और शिक्षा सुधारों को लेकर भारी विरोध प्रदर्शन और अराजकता का माहौल है.

क्या यह किसी बड़े बदलाव का संकेत है? बदलाव कैसा? कुछ पर्यवेक्षकों का अंदेशा है कि इसकी प्रतिक्रिया में इन देशों में दक्षिणपंथी राजनीति की एक और लहर आ सकती है. मूलतः यह लोकतांत्रिक-व्यवस्था में सामाजिक कल्याण से जुड़े प्रश्नों का मसला है. 

पहले इस अराजकता पर एक नज़र डालें. पिछले कुछ समय से महंगाई, शिक्षकों की भारी किल्लत और शिक्षा तथा सार्वजनिक सेवाओं में बजट कटौती के खिलाफ फ्रांस में पेरिस से लेकर मार्सेलिस तक सड़कों पर हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं.

सोशल कॉन्ट्रैक्ट का टूटना

अमेरिकी काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के एक विश्लेषण के अनुसार हाल के हफ़्तों में हमने जो देखा है, वह बिल्कुल अलग तरह का लगता है. ये विरोध प्रदर्शन फ्रांस के ‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ के पूरी तरह से खत्म होने से पैदा हुए हैं.

फ्रांस में जनता के सड़क पर आने का मतलब है ‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ का टूटना, जो ज्याँ-जाक रूसो के 1762 के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट; या राजनीतिक अधिकार के सिद्धांत’ से जुड़ा है.

‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ एक काल्पनिक या मौन समझौता है, जिसमें हर व्यक्ति अपनी प्राकृतिक स्वतंत्रता और अधिकारों को पूरी तरह से समुदाय को सौंप देता है. बदले में उसे नागरिक स्वतंत्रता, सुरक्षा और समानता मिलती है.

इस विचार ने फ्रांसीसी क्रांति (1789) पर गहरा प्रभाव डाला था. क्रांतिकारियों ने संप्रभुता, समानता और गणतंत्र की अवधारणाओं के लिए रूसो के विचारों का इस्तेमाल किया. फ्रांसीसी राजनीतिक संस्कृति में यह आज भी एक मूल अवधारणा है—नागरिकों और राज्य के बीच का अंतर्निहित समझौता.

Tuesday, October 20, 2026

रूस-अमेरिका और चीन के रिश्तों में बदलाव का भारत पर असर

कार्टून साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट से साभार

वैश्विक-राजनीति का पहिया अचानक उल्टी दिशा में घूमने लगा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को एक कार्यकारी आदेश पर दस्तखत करके रूसी अर्थव्यवस्था को निशाना बनाने वाले प्रतिबंधों के पैकेज को रोक दिया.

इस फैसले के पहले ट्रंप की रूस और चीन के राष्ट्रपतियों के साथ हुई वार्ताओं से वैश्विक-संबंधों में आ रहे बदलाव का संकेत मिलने लगा था. अब इस फैसले के दूरगामी परिणाम होंगे. इसका भारत-अमेरिका रिश्तों पर भी असर पड़ेगा.

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार सोमवार को रूस ने को कहा कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग अगले महीने चीन में होने वाले एपेक शिखर सम्मेलन के दौरान एक त्रिपक्षीय बैठक कर सकते हैं.

क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने वॉलस्ट्रीट जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के बारे में पूछे जाने पर टिप्पणी की, जिसमें कहा गया था कि पुतिन ने यूक्रेन में संघर्ष को समाप्त करने के तरीकों पर चर्चा करने के लिए ऐसी बैठक का प्रस्ताव रखा था.

ट्रंप की राजनीति

राष्ट्रपति ट्रंप ने जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ लंबी फोन बातचीत के बाद डीजल समझौते की घोषणा की, तो इसे अमेरिका के मध्यावधि चुनावों से पहले पेट्रोलियम की कीमतों को कीमतों में वृद्धि रोकने का एक प्रयास मानकर नज़रंदाज़ किया जा सकता था. पर बात इतनी ही नहीं है.

यह चुनाव परिणाम आने के बाद की राजनीति का संकेत भी है. ट्रंप ने यह फैसला ऐसे समय में किया है, जब यूक्रेन के शहरों पर रूसी हमले तेज़ हो रहे हैं. स्पष्ट है कि ट्रंप को यूरोप और यूक्रेन से दोस्ती की परवाह नहीं है.

रूस से डीज़ल आयात की घोषणा के एक दिन बाद, ट्रंप ने यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की को पद से हटाने की माँग शुरू कर दी. वे सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि युद्ध समाप्त करने में ज़ेलेंस्की मुख्य बाधा हैं, पुतिन ही वास्तव में शांति चाहते हैं.

Sunday, October 18, 2026

सोशल-मीडिया पर विमर्श


सोशल-मीडिया का जन्म किसी स्वस्थ विमर्श को बढ़ावा देने के लिए नहीं हुआ है। वह सामान्य संपर्क और यारी-दोस्ती के संपर्कों के लिए शुरू हुआ था। पर अब यह न केवल विमर्श, बल्कि सूचना-समाचार के माध्यम के रूप में भी तैयार हो गया है। यह विकास कहाँ तक जाएगा, अभी कहना मुश्किल है। पर इसके कथ्यों और तथ्यों पर विचार करना संभव है।

बहरहाल जब मेरे या आपके किसी विचार पर ध्यान देने के बजाय लोग उन्हें व्यक्त करने वालों की राजनीतिक वफादारी का अनुमान लगाने लगें, तब यकीनन खुले विमर्श की संभावनाएँ कम हो जाती हैं। बेशक व्यक्तिगत धारणाएँ किसी भी विमर्श या विश्लेषण को प्रभावित करती हैं, पर बौद्धिक वस्तुनिष्ठता का तकाज़ा होता है कि आप अपने तर्कों और तथ्यों को विवाद की संभावनाओं से जितना दूर रख सकें, उतना बेहतर है।

मतभेद, स्वस्थ समाज का परिचय देते हैं। इसमें आमराय हमेशा संभव नहीं है, पर आमराय भी होती है। यदि बात को सही तरीके से रखा जाए, तो कुछ लोग अपनी धारणाओं को बदलते भी हैं। अपने विचारों पर दृढ़ रहना या तो अत्यधिक समझे-सुलझे व्यक्ति के लिए संभव है या अल्पज्ञानी के लिए। परिधि पर खड़े लोगों के मन में संशय होते हैं। वे एकदम से किसी एक पक्ष के साथ नहीं जाते। अपेक्षाकृत अपनी वैचारिक दृढ़ता को परखने के लिए प्रतिस्पर्धी विचार को समझने की कोशिश भी होनी चाहिए।

सोशल मीडिया में ट्रोल शब्द का चलन है, जिसमें उपहास या उपेक्षा का भाव है। ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि जो लोग एक-दूसरे को करीब से कम जानते हैं, या एकदम अपरिचित हैं, तब उनकी प्रतिक्रिया पथरीली होती है। ट्रोलिंग पथरीली प्रतिक्रिया है।

Saturday, October 17, 2026

कॉक्रोच आंदोलनकारी क्या चाहते हैं?


सीजेपी का आंदोलन सफल हुआ या विफल, इसे लेकर कई तरह के विचार और निष्कर्ष हैं। इसका भविष्य क्या है, यह भी इन निष्कर्षों का हिस्सा है। मुझे लगता है कि यह समूह अपनी गतिविधियों को ठीक से तय नहीं कर पाया है। इसके नेता खुद को प्रेशर ग्रुप बता रहे हैं। प्रेशर ग्रुप के कार्यों का दायरा फोकस्ड होता है। बिखरा हुआ नहीं। मसलन ये युवाओं की मनोकामना लेकर आगे आए हैं, तो वह मनोकामना क्या है?

हालाँकि बड़े निष्कर्ष अभी नहीं निकाले जा सकते हैं, पर ढाई महीने की गतिविधियों से कुछ अनुमान लगाए जा सकते हैं। इसे शुरुआती दो मौकों पर अनायास मिली सफलताएँ इनकी उपलब्धियाँ हैं और उनमें ही इनके पराभव के सूत्र छिपे हैं। पहली सफलता थी, उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी आते ही सोशल मीडिया में इस समूह के जन्म की घोषणा का भारी स्वागत होना। दूसरी सफलता थी, 20 जुलाई का आंदोलन। सोशल मीडिया की सफलता के पीछे बॉट्स का हाथ हो सकता है, पर 20 जुलाई को समस्या वास्तविक थी और उससे प्रभावित किशोरों और उनके अभिभावकों की हताशा भी नकली नहीं थी।

उस आंदोलन के बाद इस समूह ने कुछ जगहों पर स्कूलों की दुर्दशा को उजागर करना शुरू किया। मेरी समझ से वह काम 20 जुलाई के कार्यक्रम से ज्यादा महत्त्वपूर्ण मुद्दे को लेकर था। इसके करता-धरता यदि इस कार्यक्रम को गैर-राजनीतिक बनाते तो और अच्छा होता। यानी कि वे राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे भाजपा शासित राज्यों के साथ पंजाब और कर्नाटक जैसे गैर-भाजपा शासित राज्यों के स्कूलों की दशा को भी सामने लाते, तो उनकी साख बनती। बहरहाल अभी कुछ भी कहना जल्दबाज़ी होगी।

इस आंदोलन के संचालकों की मंशा क्या है, इनका कोई संगठन है भी या नहीं और इनके संसाधन कहा से आ रहे हैं? ऐसे कुछ सवाल जरूर पूछे जाएँगे। यदि पारदर्शिता और ईमानदारी रही, तो देश की जनता इन्हें सिर-आँखों पर बैठा सकती है और जवाब साफ नहीं मिले, तो इन्हें भी इतिहास के कूड़ेदान में भेजा जा सकता है। ऐसा नहीं है कि भारत में आंदोलन से बदलाव नहीं होता या होगा, पर आंदोलन की साख सबसे महत्त्वपूर्ण है। साख बनाने के लिए इन्हें खुद को सत्ता की राजनीति से अलग रखना होगा। और सत्ता की राजनीति करनी है, तो खुलकर वही करें। सवाल है कि क्या यह आम आदमी पार्टी के समांतर कोई नई पार्टी बनाना चाहते हैं? ऐसा है, तो जल्द से जल्द इस आशय की घोषणा करें।