जिन लोगों को आज से तीन दशक पहले की बातें याद हैं, उन्हें गैस एजेंसियों, सरकारी राशन और चीनी की दुकानों के आगे लगी कतारें भी याद होंगी. पश्चिम एशिया के युद्ध के साथ कुछ यादें ताज़ा हो गई हैं.
उसके पहले चीन युद्ध के बाद देश में खाद्य संकट
पैदा हुआ था और हमें काफी समय तक अमेरिकी गेहूँ खाना पड़ा था. शायद वह काफी पुरानी
बात हो गई, पर कोविड महामारी तो हाल की बात है, जब शहर-शहर गाँव-गाँव लॉकडाउन के
कारण रोज़ी-रोज़गार पर तो संकट आया, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता भी चुनौती बन गई.
पश्चिम एशिया की लड़ाई ने हमें एकबार फिर से
चौंकाया है. आपदाएँ किसी भी वक्त आ सकती हैं, पर भारत की विशेषता है कि वह संकटों
का सामना आसानी से कर लेता है. आपको समझना ही है, तो इस समय अपने पड़ोसी देशों की
स्थिति पर एक बार नज़र ज़रूर डालें.
कहना मुश्किल है कि लड़ाई जल्द खत्म होगी या देर
से होगी. इसलिए मानकर चलिए कि समस्याएँ नए रूप में भी आ सकती है. ऐसे में आपके
धैर्य, अनुशासन और एकजुटता की सबसे बड़ी ज़रूरत है. भाईचारा बनाकर रखें. बेशक संकट
आया है, तो दूर भी होगा.
प्रधानमंत्री का बयान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया में
चल रही लड़ाई को लेकर संसद के दोनों सदनों में भारत के सामने खड़ी 'अप्रत्याशित चुनौतियों' का ज़िक्र करते हुए कहा है
कि हम उनका सामना करने में समर्थ हैं. सच यह है कि देश अतीत में ऐसे संकटों का
सफलतापूर्वक सामना कर चुका है.
अलबत्ता प्रधानमंत्री ने इस बात को रेखांकित
किया कि इस टकराव का असर लंबे समय तक बने रहने की आशंका है. ऐसा शायद पहली बार हो
रहा है कि महामारी और युद्ध का आगमन आगे-पीछे हुआ है. कोविड के दौरान भी सप्लाई
चेन में संकट पैदा हुआ था और देश ने एकजुटता से उसका मुकाबला किया.
भारत में बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, गैस और उर्वरक जैसी अनेक ज़रूरी चीजें होर्मुज़ जलसंधि मार्ग से आती हैं. युद्ध के बाद से ही वहाँ से जहाज़ों का आना-जाना बहुत चुनौतीपूर्ण हो गया है. बावजूद इसके, हमारी सरकार का प्रयास रहा है कि पेट्रोल-डीज़ल और गैस की सप्लाई बहुत ज़्यादा प्रभावित न हो.




