Thursday, April 3, 2025

टैरिफ-संग्राम के साथ शुरू हुआ, वैश्विक-चुनौतियों का एक नया दौर


अमेरिका का टैरिफ-युद्ध इस हफ्ते पूरी तरह शुरू हो गया, उसका असर अब चीन, कनाडा और मैक्सिको से आगे निकलकर विश्वव्यापी होगा, जिसमें भारत भी शामिल है. वैश्विक-अर्थव्यवस्था के लिए यह एक नया संधिकाल है. 

भारत के मामले में, 5 अप्रैल को सार्वभौमिक 10 प्रतिशत टैरिफ के पहले चरण के प्रभावी होने के बाद, 9 अप्रैल के बाद 17 प्रतिशत टैरिफ लागू होगा, जिससे कुल शुल्क 27 प्रतिशत हो जाएगा.

भारत पर 27 प्रतिशत की यह दर चीन पर लगाए गए 34 प्रतिशत, वियतनाम पर 46 प्रतिशत, बांग्लादेश पर 37 प्रतिशत और थाईलैंड पर 36 प्रतिशत की तुलना में बहुत कम है, ये सभी भारतीय निर्यातकों के लिए प्रतिस्पर्धी हैं, जबकि वे किसी न किसी कमोडिटी सेगमेंट में अमेरिकी बाजार तक पहुँचते हैं.

भारत पर टैरिफ अन्य एशियाई प्रतिस्पर्धियों की तुलना में भी कम है, जिसमें थाईलैंड पर प्रस्तावित 36 प्रतिशत और इंडोनेशिया पर 32 प्रतिशत शामिल हैं.

मामला केवल आर्थिक-रिश्तों तक सीमित नहीं है. सामरिक, पर्यावरणीय और अंतरराष्ट्रीय-प्रशासन से जुड़े मसले भी इससे जुड़े हैं. अमेरिका की नीतियों को बदलते वैश्विक-संबंधों के लिहाज से देखने की ज़रूरत है, खासतौर से हमें भारत-अमेरिका रिश्तों के नज़रिए से इसे देखना होगा. 

केवल 2 अप्रैल की घोषणाओं से ही नहीं, बल्कि उससे पैदा होने वाली अनुगूँज से भी बहुत कुछ बदलेगा. ट्रंप-प्रशासन ने इसे ‘लिबरेशन डे’ कहा है. रेसिप्रोकल यानी पारस्परिक टैरिफ का मतलब यह कि दूसरे देशों से अमेरिका आने वाले माल पर वही शुल्क वसूला जाएगा, जो वे देश अमेरिकी वस्तुओं पर लगाते हैं. 

अमेरिकी पराभव 

बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में सोवियत संघ पर अमेरिकी विजय के पीछे केवल भौतिक-शक्ति ही जिम्मेदार नहीं थी. अमेरिकी संस्कृति की कई आकर्षक विशेषताओं ने उसे सफलता दिलाई थी. 

इसमें सबसे भूमिका थी अमेरिकी समाज के राजनीतिक खुलेपन की. नोम चॉम्स्की जैसे अमेरिका के सबसे बड़े आलोचक भी वहीं रहते हैं, और आदर पाते हैं. अब लगता है कि अमेरिका की उस सॉफ्ट पावर का भी क्षरण हो रहा है. 

Friday, March 28, 2025

फिर क्यों शुरू हो गया, गज़ा के दुःस्वप्न का दौर?


इस साल की शुरुआत में जब 19 जनवरी को इसराइल और हमास ने तीन चरणों में युद्ध-विराम पर सहमति जताई थी, तभी कुछ पर्यवेक्षकों ने कहा था कि  स्थायी-शांति तो छोड़िए, युद्ध-विराम का पहला चरण ही पूरा हो जाए, इसकी दुआ कीजिए. 

किसी तरह से रोते-बिलखते पहला चरण 1 मार्च को पूरा हो गया, पर उसके पहले दूसरे चरण के लिए जो बातचीत होनी थी, वह नहीं हुई. उस बातचीत का उद्देश्य इसराइली सेना की पूरी तरह वापसी और सभी बंधकों की रिहाई के साथ युद्ध को समाप्त करना था. ऐसा नहीं हुआ और गज़ा-पट्टी पर इसराइली बमबारी फिर शुरू हो गई.

मामला केवल हवाई हमलों तक सीमित नहीं रहा. नेत्ज़ारिम कॉरिडोर तक पहुँचने के लिए इसराइली सेना ने ज़मीनी हमला बोलकर कब्ज़ा कर लिया. यह कॉरिडोर गज़ा के उत्तर और दक्षिण को विभाजित करता है. उधर हमास द्वारा संचालित स्वास्थ्य अधिकारियों ने बताया है कि युद्ध शुरू होने के बाद से गज़ा में मरने वालों की कुल संख्या रविवार को 50,000 को पार कर गई. 

Thursday, March 27, 2025

बेहद ज़रूरी है न्याय-व्यवस्था की साख को बचाना


नेशनल ज्यूडीशियल डेटा ग्रिड के अनुसार इस हफ्ते 26 मार्च तक देश की अदालतों में चार करोड़ 54 लाख से ज्यादा मुकदमे विचाराधीन पड़े थे। इनमें 46.43 लाख से ज्यादा केस 10 साल से ज्यादा पुराने हैं। यह मान लें कि औसतन एक मुकदमे में कम से कम दो या तीन व्यक्ति पक्षकार होते हैं तो देश में करीब 10 से 15 करोड़ लोग मुकदमेबाजी के शिकार हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। सामान्य व्यक्ति के नजरिए से देखें तो अदालती चक्करों से बड़ा चक्रव्यूह कुछ नहीं है। एक बार फँस गए, तो बरसों तक बाहर नहीं निकल सकते। 

सरकार और न्यायपालिका लगातार कोशिश कर रही है कि कम से कम समय में मुकदमों का निपटारा हो जाए। यह तभी संभव है जब प्रक्रियाएं आसान बनाई जाएँ, पर न्याय व्यवस्था का संदर्भ केवल आपराधिक न्याय या दीवानी मुकदमों तक सीमित नहीं है। व्यक्ति को कारोबार का अधिकार देने, मुक्त वातावरण में अपना धंधा चलाने, मानवाधिकारों तथा अन्य अधिकारों की रक्षा के लिए भी उपयुक्त न्यायिक संरक्षण की जरूरत है। उसके पहले हमें अपनी न्याय-व्यवस्था की सेहत पर भी नज़र डालनी होगी, जिसके उच्च स्तर को लेकर कुछ विवाद खड़े हो रहे हैं। 

इस समय सवाल तीन हैं। न्याय-व्यवस्था को राजनीति और सरकारी दबाव से परे किस तरह रखा जाए? जजों की नियुक्ति को पारदर्शी कैसे बनाया जाए? तीसरे और सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि सामान्य व्यक्ति तक न्याय किस तरह से उपलब्ध कराया जाए? अक्सर कहा जाता है कि देश में न्यायपालिका का ही आखिरी सहारा है। पर पिछले कुछ समय से न्यायपालिका को लेकर उसके भीतर और बाहर से सवाल उठने लगे हैं। उम्मीदों के साथ कई तरह के अंदेशे हैं। कई बार लगता है कि सरकार नहीं सुप्रीम कोर्ट के हाथ में देश की बागडोर है। पर न्यायिक जवाबदेही को लेकर हमारी व्यवस्था पारदर्शी नहीं बन पाई है। 

Friday, March 21, 2025

अपने नागरिक को रिहा कराने अमेरिकी दूत काबुल पहुँचे


अफगानिस्तान में दो साल से अधिक समय तक बंधक रखे जाने के बाद एक अमेरिकी एयरलाइन मिकेनिक को तालिबान ने रिहा कर दिया है। इस सामान्य सी खबर का महत्व इस तथ्य से बढ़ जाता है कि इस रिहाई के लिए बंधक मामलों के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति के दूत एडम बोहलर और अफगानिस्तान के लिए अमेरिका के पूर्व विशेष दूत ज़लमय खलीलज़ाद खासतौर से काबुल गए और उन्होंने तालिबान के विदेशमंत्री से भी मुलाकात की। इस खबर का एक विशेष पहलू यह भी है कि संभवतः अमेरिका ने अपनी इस गतिविधि से पाकिस्तानी सेना को अलग रखा है।  

अमेरिकी नागरिक जॉर्ज ग्लीज़मैन, जिन्हें दिसंबर 2022 में एक पर्यटक के रूप में यात्रा करते समय हिरासत में लिया गया था, अमेरिका वापस जाने से पहले गुरुवार शाम को विमान से कतर पहुँच गए। तालिबान सरकार के विदेशमंत्री ने उनकी रिहाई की पुष्टि की। जनवरी में ट्रंप के पदभार ग्रहण करने से पहले, दो अमेरिकियों, रयान कॉर्बेट और विलियम वालेस मैकेंटी को अमेरिका में कैद एक अफगान के बदले में अफगानिस्तान से रिहा किया गया था।

तालिबान के विदेश मंत्रालय ने कहा कि ग्लीज़मैन की रिहाई "मानवीय आधार पर" और "सद्भावनापूर्ण कदम" है, जबकि अमेरिकी विदेशमंत्री मार्को रूबियो ने इस समझौते को "सकारात्मक और रचनात्मक कदम" बताया। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल और तालिबान के बीच यह बैठक जनवरी में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शपथ ग्रहण के बाद से दोनों पक्षों के बीच उच्चतम स्तर की प्रत्यक्ष वार्ता थी। 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से दोनों सरकारों के बीच संपर्क आमतौर पर अन्य देशों में हुआ है। कतर ने कहा है कि उसने ग्लीज़मैन की रिहाई के लिए समझौते में मदद की।

Wednesday, March 19, 2025

पाकिस्तान के गले की हड्डी बना बलोचिस्तान




बलोचिस्तानी-आंदोलन ने पाकिस्तानी सिस्टम का पर्दाफाश कर दिया है. हाल में हुए ट्रेन अपहरण से जुड़ी ‘आतंकी-गतिविधियों’ को लेकर हालाँकि सरकारी तौर पर दावा किया गया है कि उनका दमन कर दिया गया है, पर इस सरकारी दावे पर विश्वास नहीं किया जा सकता है.  

बलोच आतंकवादी समूहों ने एक ‘राष्ट्रीय सेना’ शुरू करने की घोषणा की है. इनकी मजीद ब्रिगेड आत्मघाती हमले कर रही है. पहले, उनके पास आत्मघाती हमलों की ऐसी क्षमता नहीं थी. 

11 मार्च को अपहरण हुआ और करीब 48 घंटे तक मोर्चाबंदी जारी रही, फिर भी अभी तक स्पष्ट नहीं है कि ट्रेन में कुल कितने यात्री थे और कितने वापस आए. कई संख्याएँ मीडिया में तैर रही हैं. 

सेना कहती है कि सारे बंधक ‘छुड़ा’ लिए गए हैं, वहीं दूसरे सूत्र बता रहे हैं कि बड़ी तादाद में पाकिस्तानी फौजियों को बलोच लिबरेशन आर्मी ने बंधक बना लिया है. या उनकी हत्या कर दी गई है. इन बंधकों की संख्या सौ से ढाई सौ के बीच बताई गई है. बलोच विद्रोहियों का दावा है कि उन्होंने बंधक बनाए गए 200 से ज्यादा जवानों की हत्या कर दी है.

बलोच आंदोलन

बलोच लिबरेशन आर्मी या बीएलए पाकिस्तान के बलोचिस्तान प्रांत में सक्रिय उग्रवादी अलगाववादी समूह है, जो एक स्वतंत्र बलोच राज्य की वकालत करता है. बलोच (या बलूच) लोग पाकिस्तान के बलोचिस्तान प्रांत, दक्षिण-पूर्वी ईरान और दक्षिणी अफ़गानिस्तान में फैले क्षेत्र के मूल निवासी एक जातीय समूह हैं. उनकी एक अलग भाषाई, सांस्कृतिक और जनजातीय पहचान है, उनकी अपनी भाषा बलोची है, जो ईरानी भाषा परिवार से संबंधित है.