Wednesday, June 3, 2026

महँगाई और विदेशी-मुद्रा पलायन रोकने के भारतीय प्रयास

पश्चिम एशिया की लड़ाई का कोई हल नजर नहीं आ रहा है। होर्मुज जलसंधि मार्ग को, अमेरिका और ईरान दोनों ने बंद कर रखा है। इस रास्ते से भारत के 45-55 फीसदी खनिज तेल का आवागमन होता है। भारत के निर्यात पर भी असर पड़ा है। अर्थव्यवस्था पर दबाव नज़र आने लगा है। रुपये और शेयर बाजार की गिरावट ने भी चिंता का माहौल बनाया है।

लड़ाई शुरू होने के बाद से विदेशी मुद्रा भंडार में 38 अरब डॉलर की गिरावट और खनिज तेल की कीमतों के 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने रहने के कारण बढ़ता दबाव नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय है। हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से मितव्ययिता का आह्वान किया है, जिसके पीछे कारण है सोने का आयात और विदेश-यात्राओं पर विदेशी मुद्रा का खर्च।

खबर है कि इस तनाव के कारण भारत पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों और विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों को बचाने के लिए रिजर्व बैंक ने अपने सोने के भंडार का एक हिस्सा बेचा है। ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स (BE) की एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है।

ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स के वरिष्ठ भारत अर्थशास्त्री अभिषेक गुप्ता के अनुसार, RBI ने 22 मई को समाप्त हुए दो हफ्तों के भीतर लगभग 12 अरब डॉलर (करीब 1.14 लाख करोड़ रुपये) मूल्य का सोना बेचा है। इसी अवधि के दौरान केंद्रीय बैंक ने 7.5 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां खरीदीं। हालांकि इस मामले पर अभी तक रिजर्व बैंक की तरफ से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

अमेरिका-ईरान: कभी हाँ, कभी ना की राजनीति


अनुमान है कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता अब किसी भी क्षण हो सकता है. फिर भी दोनों ने अपने हाथ खींच रखे हैं. इसके पीछे दो कारण नज़र आते हैं.

एक तरफ अमेरिका चाहता है कि ईरान पर ज्यादा से ज्यादा दबाव बना ले, वहीं ईरान का नेतृत्व दो हिस्सों में बँटा हुआ है. वहाँ का अनुदार तबका छूट देना नहीं चाहता.

अमेरिका इसे और व्यापक आधार देना चाहता है, जिसमें इसराइल की समस्या का समाधान भी है. वह मुस्लिम देशों से इसराइल को मान्यता दिलाना चाहता है, जो इस लड़ाई की बुनियाद में है.

बहरहाल दोनों देशों की सहमतियों के बावज़ूद, समझौता अटका हुआ है. राष्ट्रपति ट्रंप ने शुक्रवार को वाइट हाउस के सिचुएशन रूम में अपने प्रमुख सलाहकारों के साथ बैठक की, लेकिन उन्होंने अंतिम फैसला टाल दिया.

इस कक्ष का इस्तेमाल बड़े संकटों से निपटने की रणनीति बनाने या चर्चा करने के लिए होता है. अभी स्पष्ट नहीं है कि समझौते की घोषणा कब होगी, होगी भी या नहीं.

ईरान के मुख्य वार्ताकार, जनरल मोहम्मद बग़ेर ग़ालिबफ़ ने दिन में  सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, तेहरान को वाशिंगटन पर भरोसा नहीं है. उनके किसी कदम के बिना, हम पहला कदम नहीं उठाएँगे.

Friday, May 29, 2026

दही होता है या होती है?


दही होता है या होती है? हाथी चलता है या चलती है? पतंग उड़ती है या उड़ता है? प्याज होती है या होता है? जेब होती है या होता है? चौपाल लगती है या लगता है? ऐसे एक-दो नहीं सैकड़ों शब्द हैं। हिंदी की वर्तनी को लेकर, जितनी ज्यादा बहस है, उतने समाधान नहीं हैं। हिंदी में 'शिकागो मैनुअल ऑफ स्टाइल' जैसा ग्रंथ बनाने की कोशिश नहीं हुई, जिसे कम से कम भाषा-बरतने वाले बड़े वर्ग का समर्थन मिले। केंद्रीय भाषा निदेशालय की वर्तनी पुस्तिका है, पर वह केवल वर्तनी तक सीमित है, और उसे भी पूरा समर्थन प्राप्त नहीं है। हिंदी की पाठ्य पुस्तकों, पत्र सूचना कार्यालय की प्रेस विज्ञप्तियों, रेलवे और मेट्रो स्टेशनों के सूचना पटों, यहाँ तक कि करेंसी नोटों में भी विसंगतियाँ हैं। सरकारी वैबसाइटों के हिंदी संस्करण गूगल ट्रांसलेटर की हिंदी के सहारे चलते हैं।   

करीब डेढ़ दशक पहले मुझसे एक पत्रकार मित्र ने पूछा मॉनसून क्यों, मानसून क्यों नहीं? दक्षिण भारतीय भाषाओं में और अंग्रेज़ी सहित अनेक विदेशी भाषाओं में ओ और औ के बीच में एक ध्वनि और होती है। ऐसा ही ए और ऐ के बीच है। Call को देवनागरी में काल लिखना अटपटा है। देवनागरी ध्वन्यात्मक लिपि है तो हमें अधिकाधिक ध्वनियों को उसी रूप में लिखना चाहिए। इसलिए वृत्तमुखी ओ को ऑ लिखते हैं। हिंदी के अलग-अलग क्षेत्रों में औ और ऐ को अलग-अलग ढंग से बोला जाता है। मेरे विचार से बाल और बॉल को अलग-अलग ढंग से लिखना बेहतर होगा।

Thursday, May 28, 2026

मुस्लिम देश क्या अब्राहम समझौते को स्वीकार करेंगे?

15 सितंबर 2020 को वाइट हाउस में हुए समझौते के समय की तस्वीर

 अब्राहम समझौते को पश्चिम एशिया में ऐतिहासिक शांति पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया था। वास्तव में, वे अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के पहले दौर में किए गए समझौते थे, जिसके तहत कुछ अरब देशों ने फलस्तीनी मुद्दे को हल किए बिना इसराइल के साथ संबंधों को सामान्य कर लिया । अब ट्रंप फिर से समझौतों का विस्तार करने के इच्छुक दिखाई देते हैं। वे वर्तमान क्षेत्रीय-अस्थिरता का इस्तेमाल करते एक बड़ा समझौता करना चाहते हैं, जो पश्चिम एशिया की एक मूल समस्या को संबोधित करता है।

क्या वे इसमें सफल होंगे? हालाँकि कुछ देश इसमें शामिल हो चुके हैं, पर शेष मुस्लिम देशों के लिए इसे स्वीकार करना बहुत मुश्किल होगा। पर इसमें सऊदी अरब शामिल हुआ, तो पाकिस्तान जैसे देश के लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी। पाकिस्तानी दृष्टिकोण रहा है कि इसराइल को तब तक मान्यता नहीं दी जा सकती जब तक कि फलस्तीनियों  के लिए एक उचित समाधान और एक स्वतंत्र फलस्तीनी राज्य के निर्माण पर स्पष्टता नहीं होती है।

उधर इसराइल ने इस समस्या के वास्तविक समाधान की ओर बढ़ने की बहुत कम इच्छा दिखाई है। उसके कब्जे वाले क्षेत्र में यहूदी बस्तियों का विस्तार जारी है। गज़ा का इलाका बमबारी से तबाह हो गया है। जॉर्डन नदी के पश्चिमी किनारे में हिंसा जारी है। ऐसी परिस्थितियों में ट्रंप की नए सिरे से रुचि इसराइली लॉबी के प्रभाव को दर्शाती है। सरकारें रणनीतिक कारणों से इस किस्म की डिप्लोमेसी में शामिल हो सकती हैं, पर आम लोग फलस्तीनी समस्या को पश्चिम एशिया में न्यायपूर्ण समझौते के रूप में देखना चाहते हैं।

अब्राहम समझौते क्या हैं?

राष्ट्रपति ट्रंप ने सोमवार 25 मई को पश्चिम एशियाई देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने का आह्वान किया। अब्राहम समझौते अमेरिका की मध्यस्थता से इसराइल और कई अन्य देशों के बीच हुए सामान्यीकरण समझौते हैं, जिन्हें उन्होंने अपने पहले कार्यकाल की सबसे महत्वपूर्ण राजनयिक उपलब्धियों में से एक बताया था।

ट्रंप ने अब सोशल मीडिया पर कहा कि अगर और देश इस समझौते में शामिल होते हैं तो मध्य पूर्व में सहयोग और भी मजबूत होगा, और उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि ईरान भी उनमें से एक हो सकता है। उन्होंने एक अलग पोस्ट में इस आह्वान को दोहराते हुए कहा कि उन्होंने सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान से आग्रह किया है कि वे समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए ‘तैयार, इच्छुक और समर्थ’ हों। पिछले साल नवंबर में, कजाकिस्तान भी इसमें शामिल हो गया। उसके इसराइल के साथ पहले से ही पूर्ण राजनयिक संबंध थे।

Wednesday, May 27, 2026

भारत-अमेरिका रिश्तों में ‘गाँठ’ तो पड़ ही गई है


हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने बीजिंग में रंगारंग कार्यक्रमों के बीच चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की जमकर तारीफ करते हुए उन्हें ‘महान नेता’ और ‘मित्र’ बताया. इसके बाद वे एशिया के किसी और देश में रुके बिना अमेरिका वापस लौट आए. यात्रा के दौरान और बाद के साक्षात्कारों में उन्होंने अमेरिकी सहयोगियों या साझेदारों के बारे में कोई आश्वस्तिकारक बात नहीं कही.

ऐसा ही उन्होंने पिछले साल भारत-पाकिस्तान टकराव के बाद फील्ड मार्शल आसिम मुनीर का स्वागत करते हुए किया था. भारत की जनता और विश्लेषकों ने पिछले एस साल से खामोशी के साथ उनके बर्ताव को देखा है.

उन्होंने इस बात पर भी ध्यान दिया, कि ट्रंप ने बीजिंग में फॉक्स न्यूज को दिए एक साक्षात्कार में अमेरिका और चीन के बीच संबंधों को संदर्भित करने के लिए जी2 शब्द का इस्तेमाल किया. टू ग्रेट कंट्रीज़.

और अब भारत आए अमेरिकी विदेशमंत्री मार्को रूबियो ने शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ व्यापार और ऊर्जा पर चर्चा की. हालाँकि वे क्वॉड विदेशमंत्रियों की बैठक के सिलसिले में भारत आए हैं, पर पर्यवेक्षक इसे भारत-अमेरिका रिश्तों को पटरी पर वापस लाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं.

दरार पाटेंगे

वे मानते हैं कि यह यात्रा वॉशिंगटन द्वारा लगाए गए टैरिफ और पाकिस्तान और चीन के साथ अमेरिका के बदलते रिश्तों के कारण भारत के साथ संबंधों में आई दरार को भरने के इरादे से की गई है.

भारत के साथ संबंधों को ‘रणनीतिक गठबंधन’ बताते हुए, रूबियो ने रविवार को इस बात पर जोर दिया कि भारत उन चुनिंदा देशों में से एक है जिनका ‘वैश्विक प्रभाव’ है और ‘वैश्विक घटनाओं को प्रभावित करने की क्षमता’ है.

विदेशमंत्री एस जयशंकर के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में रूबियो ने भारत से वैध प्रवासन, भारतीयों और भारतीय-अमेरिकियों के खिलाफ नस्लवादी टिप्पणियों और पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के साथ अमेरिका के घनिष्ठ संबंधों से जुड़ी चिंताओं को दूर करने की कोशिश की. साथ ही आश्वासन दिया कि भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों में कोई कमी नहीं आई है.

रूबियो के बराबर खड़े भारत के विदेशमंत्री एस जयशंकर ने कहा, ट्रंप प्रशासन ने अपनी विदेश-नीति को 'अमेरिका फर्स्ट' के रूप में व्यक्त किया है.’ और, ‘हमारी नीति 'इंडिया फर्स्ट' है.’