Friday, October 5, 2012

हिन्दी में रक्षा और सामरिक विषयों पर पत्रिका ‘डिफेंस मॉनिटर’


हिन्दी में रक्षा, आंतरिक सुरक्षा, विदेशनीति और नागरिक उड्डयन जैसे विषयों पर केन्द्रित पत्रिका डिफेंस मॉनिटर का पहला अंक प्रकाशित होकर सामने आया है। अंग्रेज़ी में निश या विशिष्ट पत्रिकाओं का चलन है। हिन्दी में यह अपने किस्म की पहली पत्रिका है। इसका पहला अंक वायुसेना विशेषांक है। इसमें पूर्व नौसेनाध्यक्ष अरुण प्रकाश, एयर मार्शल(सेनि) एके सिंह, एयर वाइस मार्शल(सेनि) कपिल काक, हर्ष वी पंत, घनश्री जयराम और राजीव रंजन के अलावा मृणाल पांडे का उन्नीसवी सदी के भारतीय फौजियों पर विशेष लेख है। इसके अलावा सुखोई विमानों में ब्रह्मोस मिसाइल तैनात करने पर एक विशेष आलेख है। हिन्दी सिनेमा और भारतीय सेना पर आलेख है साथ ही एचएएल के चेयरमैन आरके त्यागी और डीआरडीओ के प्रमुख वीके सारस्वत के इंटरव्यू हैं। पत्रिका के प्रबंध सम्पादक सुशील शर्मा ने बताया कि इसी विषय पर केन्द्रित द्विभाषी वैबसाइट भारत डिफेंस कवच की सफलता के बाद इसे द्वैमासिक पत्रिका के रूप में शुरू किया गया है। कुछ समय बाद इसकी समयावधि मासिक करने की योजना है। पत्रिका के मुख्य सम्पादक हैं प्रमोद जोशी।   

Tuesday, October 2, 2012

न्यूयॉर्कर में समीर जैन और टाइम्स ऑफ इंडिया



बुनियादी तौर पर अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर के जीवन और संस्कृति पर केन्द्रित पत्रिका न्यूयॉर्कर निबंध लेखन, फिक्शन, व्यंग्य लेखन, कविता और खासतौर से कार्टूनों के लिए विशिष्ट है। किसी ज़माने में हिन्दी में भी ऐसी पत्रिकाएं थीं, पर आधुनिकता की दौड़ में हमने सबको खत्म होने दिया। इधर पिछले कुछ वर्षों में भारत केन्द्रित लेख भी प्रकाशित हुए हैं। पत्रिका के ताज़ा अंक (8अक्टूबर,2012) में भारत के समीर जैन, विनीत जैन और टाइम्स ऑफ इंडिया के बारे में इसके प्रसिद्ध मीडिया क्रिटिक केन ऑलेटा का नौ पेज का आलेख छपा है। ऑलेटा 1992 से एनल्स ऑव कम्युनिकेशंस कॉलम लिख रहे हैं। सिटिज़ंस जैन शीर्षक आलेख में उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया के विस्तार का विवरण दिया है। आलेख के पहले सफे के सबसे नीचे इसका सार इन शब्दों में दिया गया है, "Their success is a product of an unorthodox philosophy." 

Monday, October 1, 2012

बीजेपी को चाहिए हाजमोला

लाल कृष्ण आडवाणी ने अपने ब्लॉग में 15 सितम्बर को फ्रांसिस फुकुयामा की इतिहास का अंत अवधारणा का हवाला देते हुए भारतीय राजनीति के युगांतरकारी मोड़ का ज़िक्र किया है। उनके अनुसार 1989 भारत के राजनीतिक इतिहास का निर्णायक मोड़ रहा। इस वर्ष के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने एक लम्बी छलांग लगाते हुए 1984 की दयनीय दो सीटों के मुकाबले 86 सीटों का सम्मानजनक स्थान प्राप्त किया। भाजपा राष्ट्रीय राजनीति पर कांग्रेस पार्टी के एकाधिकार को चुनौती देने वाले मुख्य दल के रुप में उभरी। अगले दशक में भाजपा 1996 तक, तेजी से बढ़ती रही और कांग्रेस पार्टी सिकुड़ती गई, जब भाजपा लोक सभा में सर्वाधिक बड़े दल के रुप में उभरी, और 1998-1999 में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए ने केंद्र सरकार का पूर्ण नियंत्रण संभाल लिया। आडवाणी जी ने लिखा, तब से, जब भी कोई मुझसे पूछता है: राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा के मुख्य योगदान को आप कैसे निरूपित करेंगें; तो सदैव मेरा उत्तर रहता है: भारत की एकदलीय प्रभुत्व वाली राजनीति को द्विध्रुवीय राजनीति में परिवर्तित करना। यह उपलब्धि न केवल भाजपा अपितु कांग्रेस और निस्संदेह देश तथा इसके लोकतंत्र के लिए वरदान सिध्द हुई है। दुर्भाग्य से कांग्रेस पार्टी इसे इस रुप में नहीं लेती, भाजपा को एक मुख्य विपक्ष मानकर जिसके साथ सतत् सवांद करना शासन के लिए लाभकारी हो सकता है के बजाय इसे एक शत्रु के रुप में मानती है जिसे हटाना और किसी भी कीमत पर मिटाना उसका लक्ष्य है। प्रणव मुखर्जी अपवाद थे। नेता लोकसभा के रुप में यूपीए के अधिकांश कार्यकाल में उन्होंने मुख्य विपक्ष के नेतृत्व से निरंतर संवाद बनाए रखा। 

Friday, September 28, 2012

चुनावी नगाड़े और महाराष्ट्र का शोर

ऐसा लगता है कि एनसीपी के ताज़ा विवाद में अजित पवार नुकसान उठाने जा रहे हैं। शरद पवार का कहना है कि यह विवाद सुलझ गया है। यानी अजित पवार का इस्तीफा मंज़ूर और बाकी मंत्रियों का इस्तीफा नामंज़ूर। आज शुक्रवार को मुम्बई में एनसीपी विधायकों की बैठक हो रही है, जिसमें स्थिति और साफ होगी।
नेपथ्य में चुनाव के नगाड़े बजने लगे हैं। तृणमूल कांग्रेस की विदाई के बाद एनसीपी के विवाद के शोर में नितिन गडकरी का संदेश भी शामिल हो गया है कि जल्द ही चुनाव के लिए तैयार हो जाइए। बीजेपी ने एफडीआई को मुद्दा बनाने का फैसला किया है। पिछले महीने कोल ब्लॉक पर बलिहारी पार्टी को यह मुद्दा यूपीए ने खुद आगे बढ़कर दे दिया है। पर व्यापक फलक पर असमंजस है। बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद की बैठकों के समांतर यूपीए समन्वय समिति की पहली बैठक गुरुवार को हुई। यह समन्वय समिति दो महीने पहले जुलाई के अंतिम सप्ताह में कांग्रेस और एनसीपी के बीच विवाद को निपटाने का कारण बनी थी। संयोग है कि उसकी पहली बैठक के लिए एक और विवाद खड़ा हो गया है। अब एनसीपी के टूटने का खतरा है और महाराष्ट्र में नए समीकरण बन रहे हैं। वास्तव में चुनाव करीब हैं।

Monday, September 24, 2012

आर्थिक नहीं, संकट राजनीतिक है

बारहवीं योजना के दस्तावेज़ में से क्रोनी कैपीटलिज़्म शब्द हटाया जा रहा है। इसका ज़िक्र भारतीय आर्थिक व्यवस्था और हाल के घोटालों के संदर्भ में हुआ था। इस पर कुछ मंत्रियों का कहना था कि इस शब्द का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे क्रोनी कैपीटलिज़्म का भारतीय व्यवस्था में चलन साबित होगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कई बार क्रोनी कैपीटलिज़्म के खतरों की ओर आगाह कर चुके हैं। इसी 12 सितम्बर को उन्होंने हाइवे प्रोजेक्ट्स में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप को लेकर क्रोनी कैपीटलिज़्म के खतरों की ओर चेताया था। मनमोहन सिंह सन 2007 में इस प्रवृत्ति के खतरों की ओर चेता चुके हैं। आप कहेंगे वे खुद प्रधानमंत्री हैं और खुद सवाल उठा रहे हैं। पर सच यह है कि मनमोहन सिंह ने भारतीय पूँजी और राजनीति के रिश्तों पर कई बार ऐसी टिप्पणियाँ की हैं। हालांकि उदारीकरण का ठीकरा मनमोहन सिंह के सिर पर फूटता है, पर यह काजल की कोठरी है और इसमें बगैर दाग वाली कमीज़ किसी ने नहीं पहनी है। बहरहाल क्या हम योजना आयोग के दस्तावेज़ से यह शब्द हटाकर व्यवस्था को पारदर्शी बना सकते हैं? पिछले कुछ दिनों में यह बात बार-बार सामने आ रही है कि उदारीकरण का मतलब संसाधनों का कुछ परिवारों के नाम स्थानांतरण नहीं है। हमारा आर्थिक विकास रोज़गार पैदा करने में विफल रहा है। पर क्या ममता बनर्जी, मुलायम सिंह, मायावती और बीजेपी व्यव्स्था को पारदर्शी बनाना चाहते हैं? क्या उनके विरोध के पीछे कोई आदर्श है? या यह सब ढोंग है? 

प्रधानमंत्री का कहना है कि पैसा पेड़ों में नहीं उगता। क्या ममता, मुलायम और मायावती समेत लगभग सारे दलों को लगता है कि उगता है? आज बंगाल सरकार 23,000 करोड़ रुपए के जिस कर्ज़ को माफ कराना चाहती है, वह रुपया भी पेड़ों नहीं उगा था, पर वाम मोर्चा सरकार ने रुपया लाने के तरीकों के बारे में नहीं सोचा। कांग्रेस को छोड़ लगभग हर पार्टी ने मनमोहन सिंह सरकार के आर्थिक सुधारों का विरोध किया है। कांग्रेस के भीतर भी मनमोहन सिंह समर्थक लगभग न के बराबर हैं। हाल में समाजवादी पार्टी के नेता मोहन सिंह ने कोयला मामले के संदर्भ में कहा था कि पार्टी के भीतर ही बहुत से लोग चाहते हैं कि मनमोहन सिंह हटें। आर्थिक सुधारों को लेकर सोनिया गांधी ने जनता के बीच जाकर कभी कुछ नहीं कहा। बल्कि उन्होंने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद बनाई, जिसकी अधिकतर सलाहों से सरकार सहमत नहीं रही। पार्टी के आर्थिक और राजनीतिक विचारों में तालमेल नज़र नहीं आता। सवाल दो हैं। पहला यह कि सरकार को अचानक आर्थिक सुधारों की याद क्यों आई? और क्या वह मध्यावधि चुनाव के लिए तैयार है? इन सब सवालों के साथ एक सवाल यह भी है कि क्या बीजेपी अपने ‘इंडिया शाइनिंग’ को भुलाकर जिस लोकलुभावन राजनीति के रास्ते पर जा रही है, क्या उसमें पैसा पेड़ों पर उगता है?