Sunday, August 29, 2021

अहमद रशीद की किताब ‘तालिबान’ को फिर से पढ़ने की जरूरत

मेरा विचार एक-दो किताबें लिखने का है। पता नहीं मैं लिख पाऊँगा या नहीं। पर उन किताबों को लिखने की कोशिश में इन दिनों मैं कुछ न कुछ पढ़ता और जानकारियों को पुष्ट या उनके सहारे दूसरी जानकारियाँ हासिल करने का प्रयास करता रहता हूँ। जानकारियों का बड़ा भंडार तैयार हो गया है। अब मैं अपने इस ब्लॉग में किताब नाम से एक नया क्रम शुरू कर रहा हूँ। इसमें केवल किताब का ही नहीं, महत्वपूर्ण लेखों का जिक्र भी होगा।

संयोग से अखबार हिन्दू के रविवारीय परिशिष्ट में मुझे रिप्राइज़ बुक्स (पुस्तक पुनर्पाठ)  नाम का कॉलम देखने को मिला। महीने में एकबार स्तम्भकार किसी पहले पढ़ी हुई किताब को फिर से याद करते हैं। आज 28 अगस्त के अंक में सुदीप्तो दत्ता ने अहमद रशीद की किताब तालिबान को याद किया है। पाकिस्तानी पत्रकार अहमद रशीद की यह किताब तालिबान पर बहुत विश्वसनीय मानी जाती है। इसमें उन्होंने तालिबान के उदय और पश्तून-क्षेत्र में उसकी जड़ों की बहुत अच्छी पड़ताल की है। सन 2000 में अपने प्रकाशन के बाद से यह लगातार बेस्ट सैलर्स में शामिल रही है। कम से कम 26 भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ है। यह हिन्दी में भी उपलब्ध है। इसके बाद अहमद रशीद ने एक और किताब लिखी थी, डिसेंट इनटू कैयॉस: द युनाइटेड स्टेट्स एंड दे फेल्यर ऑफ नेशन बिल्डिंग इन पाकिस्तान, अफगानिस्तान एंड सेंट्रल एशिया। बहरहाल अब पढ़ें सुदीप्तो दत्ता के कॉलम के अंश:-

तालिबान पहली बार सत्ता में 1996 में आए और उसके चार साल बाद पाकिस्तानी पत्रकार अहमद रशीद ने अपनी किताब तालिबान : द पावर ऑफ मिलिटेंट इस्लाम इन अफगानिस्तान एंड बियॉण्ड के माध्यम से दुनिया का परिचय तालिबान से कराया। यह किताब इस देश और उसके निवासियों की सच्ची जानकारी देती है और विदेशी ताकतों के नए ग्रेट गेम का विवरण देती है।

मुद्रीकरण का राजनीतिकरण!


पिछले सोमवार को केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने अस्ति मुद्रीकरण (असेट मॉनिटाइजेशन) के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम का शुभारम्भ किया। राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन (एनएमपी) के तहत केंद्र सरकार की करीब छह लाख करोड़ रुपये की परिसम्‍पत्तियों का अगले चार साल यानी 2024-25 तक मुद्रीकरण किया जाएगा। चालू वित्तवर्ष में इससे करीब 88,000 करोड़ रुपये की आय होगी। कार्यक्रम का मूल-विचार है कि पुरानी चल रही या बंद पड़ी परियोजनाओं (ब्राउनफील्ड प्रोजेक्ट्स) को पट्टे पर देकर पूँजी का सृजन किया जाए और उस पूँजी से नई परियोजनाएं (ग्रीनफील्‍ड प्रोजेक्ट्स) शुरू की जाएं। परियोजनाओं का स्वामित्व केंद्र सरकार के पास ही रहेगा, जबकि उनको चलाने के जोखिम निजी क्षेत्र को उठाने होंगे।

तेज इंफ्रास्ट्रक्चर विकास

इस कार्यक्रम में कुल पूँजी का करीब 65 फीसदी हिस्सा सड़कों, रेलवे और बिजली की परियोजनाओं से प्राप्त होगा। इस योजना के दायरे में 12 मंत्रालयों और विभागों की 20 तरह की संपत्तियां आएंगी, जिनमें मूल्य के हिसाब से सड़क, रेलवे और बिजली क्षेत्र की परियोजनाएं प्रमुख हैं। सूची बहुल बड़ी है, जिसमें टेलीकॉम, उड्डयन, खनन तथा भंडारण जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं। इस कार्यक्रम की जरूरत चार कारणों से है। पहली जरूरत तेज आर्थिक विकास के लिए नई परियोजनाओं को, खासतौर से इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में, शुरू करने की है। तेज गति से आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त पूँजी नहीं है और तीसरे, संसाधन एकत्र करने के लिए सरकार के राजस्व संग्रह में सुस्ती आई है और विनिवेश में अपेक्षित सफलता नहीं मिली है। चौथे, यह विकल्प उपलब्ध है, जिसका इस्तेमाल हुआ नहीं था। 

गति-शक्ति

यह कार्यक्रम अचानक पेश नहीं हुआ है। स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री ने 100 लाख करोड़ के गति-शक्तिकार्यक्रम की घोषणा की। वे 2019 से यह बात कह रहे हैं। वित्तमंत्री ने इस साल के बजट भाषण में इस तरफ इशारा किया था। वित्तमंत्री ने बजट भाषण में कहा था कि राष्‍ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन (एनआईपी) के लक्ष्य को हासिल करने के लिए तीन कदम प्रस्तावित हैं: 1.संस्‍थागत संरचनाएं बनें, 2.परिसंपत्तियों का मुद्रीकरण हो और 3. केंद्र तथा राज्यों के बजट में पूंजीगत व्यय बढ़े। इसके पहले दिसंबर 2019 में वित्तमंत्री ने 6,835 परियोजनाओं के साथ एनआईपी को लॉन्च किया था। अब एनआईपी का विस्‍तार कर दिया गया है और इसमें 7,400 परियोजनाएं हो गई हैं। कुछ महत्‍वपूर्ण अवसंरचना मंत्रालयों के अधीन 1.10 लाख करोड़ रुपये की लागत की 217 परियोजनाएं पूरी की जा चुकी हैं।

Saturday, August 28, 2021

उलझन में कांग्रेस


पंजाब, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के घटनाक्रम को देखने से निष्कर्ष कुछ निकाले जा सकते हैं। या तो कांग्रेस पार्टी में उच्च स्तर किसी प्रकार का भ्रम है, या नेतृत्व की पकड़ पार्टी पर कम होती जा रही है या फिर संगठन को मजबूत बनाने का कोई नया प्रयोग है, जिसे हम समझ नहीं पा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में यह स्थिति उतनी चिंताजनक नहीं थी, जितनी पंजाब में हो गई थी। नवजोत सिंह खुलेआम किसकी ईंट से ईंट बजाने की धमकी दे रहे थे, यह समझ में नहीं आया। यह अजब राज्य है, जहाँ का पार्टी ध्यक्ष अपनी ही सरकार की बाजा बजाने पर तुला था और केंद्रीय नेतृत्व सो रहा था।

सिद्धू ने कहा कि अगर मुझे फैसले करने की आजादी नहीं दी गई तो मैं ईंट से ईंट बजा दूँगा। सिद्धू के इस बयान पर बवाल मचा तो पंजाब कांग्रेस के प्रभारी हरीश रावत ने कहा कि सभी लोग सभ्य हैं और उन्हें मालूम है कि उन्हें क्या करना है। सबके बोलने का तरीका होता है इसलिए विद्रोही नहीं कहा जा सकता। पर कहीं न कहीं बात गम्भीर है, इसलिए उन्होंने कल सोनिया गांधी से और आज राहुल गांधी मुलाकात करके उन्हें स्थिति से अवगत कराया। बाद में उन्होंने मीडिया से चर्चा में कहा कि मैंने राहुल गांधी को हालात से अवगत करा दिया है। यह बहुत ही संक्षिप्त बैठक थी। आज उनका व्यस्त शिड्यूल है।

रावत ने कहा कि मैं उत्तराखंड पर ज्यादा ध्यान देना चाहता हूं, लेकिन पंजाब पर जो पार्टी फैसला करेगी, मैं उसका पालन करूंगा। रावत ने गुरुवार को कहा था कि मैं चाहता हूँ कि उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव पर पूरा ध्यान लगाने के लिए मुझे पंजाब प्रदेश कांग्रेस की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया जाए। साथ में उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी कहती है, पंजाब की जिम्मेदारी जारी रखें तो मैं इस जिम्मेदारी का निर्वहन करता रहूंगा। पंजाब और उत्तराखंड में अगले साल फरवरी-मार्च में विधानसभा चुनाव होने हैं। रावत के करीबियों का कहना है कि पंजाब कांग्रेस में विवाद को सुलझाने के प्रयास में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अपने राज्य में पूरा ध्यान नहीं दे पा रहे हैं, जबकि वह कांग्रेस की ओर से उत्तराखंड के सबसे बड़े चेहरे हैं।

पंजाब अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू की खींचतान के दायरे में मनीष तिवारी भी आ गए हैं। मनीष तिवारी ने ट्विटर हैंडल पर सिद्धू का वह वीडियो शेयर किया है, जिसमें वह कह रहे हैं कि अगर कांग्रेस हाईकमान उन्हें फैसले लेने की आजादी नहीं देती है तो फिर मैं ईंट से ईंट बजा दूँगा। इस वीडियो के कैप्शन में मनीष तिवारी ने लिखा- हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।

 

 

Friday, August 27, 2021

काबुल-धमाके खतरे का संकेत


गुरुवार देर शाम काबुल के अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर हुए दो धमाकों में कम से कम 73 लोगों की मौत हो गई है और 140 लोग घायल हुए हैं। बीबीसी को यह जानकारी अफ़ग़ानिस्तान के स्वास्थ्य अधिकारी ने दी है। पेंटागन के मुताबिक़ इस हमले में 13 अमेरिकी सैनिक मारे गए हैं। 2011 के बाद अमेरिकी सैनिकों पर यह सबसे ख़तरनाक हमला है। विस्फोटों की ज़िम्मेदारी इस्लामिक स्टेट समूह ने ली है। उन्होंने अपने टेलीग्राम चैनल के ज़रिए किया है कि एयरपोर्ट पर हुए हमले के पीछे इस्लामिक स्टेट खुरासान (आईएसके) का हाथ है।

प्राचीन खुरासान मध्य एशिया का एक ऐतिहासिक क्षेत्र था, जिसमें आधुनिक अफ़ग़ानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और पूर्वी ईरान के बहुत से भाग शामिल थे। आधुनिक ईरान में ख़ोरासान नाम का एक प्रांत है, जो इस ऐतिहासिक खुरासान इलाक़े का केवल एक भाग है। इस इलाके में सक्रिय इस आतंकी संगठन को इस्लामिक स्टेट खुरासान कहा जाता है।

अफगानिस्तान में चल रहे जबर्दस्त राजनीतिक बदलाव के बीच इस परिघटना के निहितार्थ समझने की जरूरत है। हाल में इस्लामिक स्टेट ने तालिबान को अमेरिका का पिट्ठू बताया था। इस्लामिक स्टेट का कहना है कि अफगानिस्तान में तालिबान शरिया लागू नहीं कर पाएंगे। इसके पहले यह आरोप भी लगाया जाता रहा है कि इस्लामिक स्टेट को अमेरिका ने खड़ा किया है। बहरहाल अब कम से कम दो बातों पर विचार करने की जरूरत होगी। पहले, यह कि अफगानिस्तान से विदेशियों की निकासी पर इस घटना का क्या असर होगा। और दूसरे यह कि क्या तालिबान इस इलाके में स्थिरता कायम करने में सफल होंगे? और क्या वे इस क्षेत्र को आतंकी संगठनों का अभयारण्य बनने से रोक पाएंगे?

रॉयटर्स के अनुसार अमेरिका को अंदेशा है कि इस किस्म के हमले और हो सकते हैं। अमेरिकी सेना यहाँ से 31 अगस्त तक पूरी हट जाने की घोषणा कर चुकी है। दूसरी तरफ तालिबानी व्यवस्था अभी पूरी तरह लागू हो नहीं पाई है। बाजारों में सामान की कमी हो गई है। बैंक-व्यवस्था शुरू हुई है, पर अराजकता है। हजारों-लाखों लोग बेरोजगार हो चुके हैं। ऐसे में इस इलाके में एक और मानवीय त्रासदी खड़ी होने का खतरा है।

 

 

 

 

Thursday, August 26, 2021

तालिबान क्या टिकाऊ साबित होंगे?


तालिबान ने काबुल में प्रवेश जरूर कर लिया है, पर उनकी सरकार पूरी तरह बनी नहीं है। विदेशी सेना और नागरिकों की निकासी अधूरी है। दुनिया ने अभी तय नहीं किया है कि तालिबान-शासन को मान्यता दी जाए या नहीं। भारत से जुड़े मसले भी हैं, जिनपर अभी बात करने का मौका नहीं है, क्योंकि नई सरकार और उसकी नीतियाँ स्पष्ट नहीं हैं। फिलहाल तालिबानी-क्रांति के दूरगामी निहितार्थ को देखने की जरूरत है। 

वैश्विक-प्रतिक्रिया की वजह से तालिबान अपना चेहरा सौम्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वे कितने सौम्य साबित होंगे, यह अब देखना है। इसके बाद क्या?  वे जो व्यवस्था बनाएंगे, उसमें नया क्या होगा? यह क्रांति तब हुई है, जब सऊदी अरब और खाड़ी के देश आधुनिकता की ओर बढ़ रहे है। क्या तालिबान पहिए को उल्टी दिशा में घुमाएंगे? लड़कियों की पढ़ाई और कामकाज में उनकी भागीदारी का क्या होगा? वैज्ञानिक शिक्षा, मनोरंजन और खेलकूद पर उनकी नीति क्या होगी?

पिछले बीस साल में अफगानिस्तान की करीब बीस फीसदी आबादी नई व्यवस्था की आदी हो गई है। नौजवान नई व्यवस्था में बड़े हुए हैं। तालिबान का क्या आधुनिक-व्यवस्था से मेल सम्भव है? क्या उनकी व्यवस्था टिकाऊ होगी? क्या वे दुनिया को कोई नया सामाजिक-आर्थिक मॉडल देने में सफल होंगे?  दूसरी तरफ सवाल यह भी है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की, कजाकिस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों में भी क्या तालिबानी प्रवृत्तियाँ नहीं उभरेंगी?

Tuesday, August 24, 2021

उद्धव ठाकरे को राजनीतिक नुकसान पहुँचाएगी नारायण राणे की गिरफ्तारी


महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से जुड़े बयान देने के कारण  केंद्रीय मंत्री नारायण राणे की गिरफ्तारी से महाराष्ट्र की ठंडी पड़ती राजनीति में फिर से गर्मा आ गई है। मुम्बई में एक तरफ शिवसेना के कार्यकर्ताओं का आंदोलन शुरू हो गया है, दूसरी तरफ राणे समर्थकों ने मुंबई-गोवा के पुराने हाईवे को जाम कर दिया है। पर इसका नुकसान शिवसेना को ही होगा। नारायण राणे खाँटी मराठा नेता है और उनका जनाधार मजबूत है। इस
 गिरफ्तारी से उनका राजनीतिक आधार न केवल मजबूत होगा, बल्कि शिवसेना की छवि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

राणे शिवसेना के भीतर से निकले नेता हैं और वे उद्धव ठाकरे के परम्परागत विरोधी हैं। बीजेपी उन्हें ठाकरे के मुकाबले खड़ा करने में कामयाब होती नजर आ रही है। इतना ही नहीं उनकी सहायता से वह शिवसेना के आंतरिक असंतोष को भी उघाड़ने का प्रयास करेगी। महाराष्ट्र सरकार में शामिल कांग्रेस और एनसीपी बाहरी तौर पर कुछ भी कहें, पर ठाकरे के व्यवहार से वे भी बहुत खुश नहीं हैं।

राजनीतिक निहितार्थ

ठाकरे का भाषण और राणे की प्रतिक्रिया भारतीय राजनीति के लिहाज से सामान्य परिघटना है, पर लगता है कि तिल का ताड़ बन गया है। राणे के खिलाफ तीन एफआईआर दर्ज हुई हैं। महाराष्ट्र सरकार ने गिरफ्तारी का फैसला करके अपना ही नुकसान किया है। सच यह है कि गिरफ्तारियाँ राजनेताओं को नुकसान नहीं लाभ पहुँचाती रही हैं।

नारायण राणे केंद्रीय कैबिनेट मंत्री हैं और उनके गिरफ्तारी आम गिरफ्तारी नहीं है, इसके गहरे राजनीतिक निहितार्थ हैं। पहले देखें कि राणे ने कहा क्या था। हाल में मोदी सरकार में शामिल अन्य मंत्रियों की तरह नारायण राणे महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों में जन-आशीर्वाद यात्रा निकाल रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी इस तरीके से जनता के बीच अपनी जगह बना रही है। खासतौर से उत्तर प्रदेश में इसका ज्यादा महत्व है, क्योंकि वहाँ विधानसभा चुनाव काफी करीब हैं।

Monday, August 23, 2021

अहमद मसूद क्या कर पाएंगे पंजशीर घाटी में तालिबान का मुकाबला?

 

अहमद शाह मसूद का बेटा अहमद मसूद
तालिबानी व्यवस्था अच्छी तरह पैर जमाने की कोशिश कर रही है, वहीं कुछ जगहों से प्रतिरोध की खबरें हैं। खासतौर से पंजशीर घाटी को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। तालिबान की तरफ से पहले कहा गया था कि अहमद वली मसूद ने हमसे हाथ मिला लिया है और वे प्रतिरोध नहीं करेंगे, पर आज सुबह खबर थी कि तालिबान ने काफी बड़ा दस्ता पंजशीर घाटी की ओर रवाना किया है।

आज दिन में खबर थी कि तालिबान ने नॉर्दर्न अलायंस के लोगों के हाथों से उन तीन जिलों को छुड़ा लिया है, जिनपर उन्होंने हफ्ते कब्जा कर लिया था। ये जिले हैं बागलान प्रांत के बानो, देह सालेह और पुल-ए-हेसार। तालिबान के प्रवक्ता ज़बीउल्ला मुज़ाहिद ने ट्वीट किया कि हमारे सैनिक पंजशीर घाटी के पास बदख्शां, ताखर और अंदराब में जमा हो रहे हैं। दूसरी तरफ़ विरोधी ताक़तों ने तीन सौ तालिबानी लड़ाकों को मार गिराने का दावा किया है। तालिबान ने इस दावे को ग़लत बताया है।

समाचार एजेंसी एएफपी ने तालिबान की ओर से किए गए दावा के जानकारी देते हुए बताया है कि तालिबान के लड़ाके पंजशीर में आगे बढ़ रहे हैं। बीबीसी उर्दू सेवा ने तालिबान सूत्रों के हवाले से बताया है कि तालिबानी कमांडर कारी फ़सीहुद्दीन इन दस्तों का नेतृत्व कर रहे हैं।

उधर पंजशीर घाटी में अहमद मसूद के सैनिकों ने मोर्चेबंदी कर ली है। इसके एक दिन पहले तालिबान की अलमाराह सूचना सेवा ने दावा किया था कि सैनिकों तालिबानी सैनिक पंजशीर की ओर गए हैं। ज़बीउल्ला मुज़ाहिद ने दावा किया कि दक्षिणी अफगानिस्तान से उत्तर की ओर जाने वाले मुख्य हाईवे पर सलांग दर्रा खुला हुआ है और दुश्मन की सेना पंजशीर घाटी में घिरी हुई है। बहरहाल इस इलाके से किसी लड़ाई की खबर नहीं है।

Sunday, August 22, 2021

अफगानिस्तान में ‘प्रतिक्रांति’


हालांकि अफगानिस्तान में तालिबानी व्यवस्था पैर जमा चुकी है, वहीं देश के कई शहरों से प्रतिरोध की खबरें हैं। उधर अंतरिम व्यवस्था के लिए दोहा में बातचीत चल रही है, जिसमें तालिबान और पुरानी व्यवस्था से जुड़े नेता शामिल हैं। विश्व-व्यवस्था ने तालिबान-प्रशासन को मान्यता नहीं दी है। भारत ने कहा है कि जब लोकतांत्रिक-ब्लॉक कोई फैसला करेगा, तब हम भी निर्णय करेंगे। लोकतांत्रिक-ब्लॉक का अर्थ है अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और जापान। डर है कि कहीं अफगानिस्तान से नए शीतयुद्ध की शुरुआत न हो।  

तालिबान अपने चेहरे को सौम्य बनाने का प्रयास कर रहे हैं, पर उनका यकीन नहीं किया जा सकता। वे वैश्विक-मान्यता चाहते हैं, पर दुनिया को मानवाधिकार की चिंता है। अफ़ग़ानिस्तान में पहले के मुक़ाबले ज़्यादा लड़कियाँ पढ़ने जा रही है,  नौकरी कर रही हैं। वे डॉक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिक हैं। क्या तालिबान इन्हें बुर्का पहना कर दोबारा घर में बैठाएंगे? इस सवाल का जवाब कोई नहीं जानता। ऐसा लग रहा है कि बीस साल से ज्यादा समय तक लड़ाई लड़ने के बाद अमेरिका ने उसी तालिबान को सत्ता सौंप दी, जिसके विरुद्ध उसने लड़ाई लड़ी थी। देश के आधुनिकीकरण की जो प्रक्रिया शुरू हुई थी, वह एक झटके में खत्म हो गई है। खासतौर से स्त्रियाँ, अल्पसंख्यक, मानवाधिकार कार्यकर्ता और नई दृष्टि से देखने वाले नौजवान असमंजस में हैं।

सेना क्यों हारी?

पिछले बीस साल में अफगान सेना ने एयर-पावर, इंटेलिजेंस, लॉजिस्टिक्स, प्लानिंग और दूसरे महत्वपूर्ण मामलों में अमेरिकी समर्थन के सहारे काम करना सीखा था। अब उसी सेना की वापसी से वह बुरी तरह हतोत्साहित थी। राष्ट्रपति अशरफ ग़नी को उम्मीद थी कि बाइडेन कुछ भरोसा पैदा करेंगे, पर ऐसा नहीं हुआ। अमेरिकी सेना के साथ सहयोगी देशों के आठ हजार सैनिक और अठारह हजार ठेके के कर्मी भी चले गए, जिनसे अफगान सेना हवाई कार्रवाई और लॉजिस्टिक्स में मदद लेती थी। हाल के महीनों में अफगान सेना देश के दूर-दराज चौकियों तक खाद्य सामग्री और जरूरी चीजें भी नहीं पहुँचा पा रही थी। चूंकि कहानी साफ दिखाई पड़ रही थी, इसलिए उन्होंने निरुद्देश्य जान देने के बजाय हथियार डालने में ही भलाई समझी। मनोबल गिराने के बाद किसी सेना से लड़ाई की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

बाइडेन ने अफगान सेना की जो संख्या बताई, वह भी वह भी सही नहीं थी। वॉशिंगटन पोस्ट के अफगान पेपर्स प्रोजेक्ट में सेना और पुलिसकर्मियों की संख्या 3,52,000 दर्ज है, जबकि अफगान सरकार ने 2,54,000 की पुष्टि की। कमांडरों ने फर्जी सैनिकों की भरती कर ली और उन सैनिकों के हिस्से का वेतन मिल-बाँटकर खा लिया। इस भ्रष्टाचार को रोकने में अमेरिका ने दिलचस्पी नहीं दिखाई।

Saturday, August 21, 2021

भारतीय विदेश-नीति की विफलता

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व विदेशमंत्री सलमान खुर्शीद ने अफगानिस्तान के घटनाक्रम को लेकर भारतीय विदेश-नीति के बारे में कहा है कि कई साल से हम सबके मन में यह सवाल घुमड़ता रहा था कि क्या अफगानिस्तान लंबे समय से चले आ रहे संकट के दौर से निकल पाएगा और क्या वहां स्थिर सरकार देने की दिशा में किए जा रहे अथक प्रयास आगे भी जारी रहेंगे? यूपीए सरकार के दौरान हमने नए संसद भवन, स्कूलों-जैसे अहम संस्थानों के पुनर्निर्माण के अतिरिक्त सलमा बांध-जैसी विकास परियोजनाओं पर भारी धनराशि खर्च की। अब सब कुछ तालिबान के हाथ में है और लोकतांत्रिक संस्थानों को मजबूत करने के प्रयास छिन्न-भिन्न हो गए हैं। हम पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई जैसे अपने दोस्तों की खैरियत के लिए फिक्रमंद ही हो सकते हैं जो अपने परिवार के साथ, जिसमें छोटी-छोटी बच्चियां भी हैं, काबुल में ही रह रहे हैं। मैं मानकर चलता हूं कि सरकार ने हमारे नागरिकों के साथ-साथ भारत से दोस्ती निभाने वाले अफगानों को वहां से सुरक्षित निकालने के लिए पर्याप्त राजनीतिक उपाय बचाकर रखे होंगे।

Friday, August 20, 2021

सोनिया गांधी के साथ 18 विरोधी दलों के नेताओं का वर्चुअल-संवाद


कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने शुक्रवार की शाम को प्रमुख विपक्षी दलों के नेताओं के साथ वर्चुअल बैठक की। 19पार्टियों की इस बैठक में सोनिया ने कहा कि विपक्ष को वर्ष 2024 के आम चुनाव के लिए व्यवस्थित योजना बनानी होगी और दबावों/बाध्यताओं से ऊपर उठना होगा। सोनिया गांधी ने तमाम मतभेदों को भुलाकर मिलकर काम करने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। बैठक में कांग्रेस के अलावा 1.तृणमूल कांग्रेस, 2.एनसीपी, 3.डीएमके, 4.शिवसेना, 5.जेएमएम, 6.सीपीआई, 7.सीपीएम, 8.नेशनल कॉन्फ्रेंस, 9.आरजेडी,10.एआईयूडीएफ, 11.वीसीके, 12.लोकतांत्रिक जनता दल, 13.जेडीएस, 14.आरएलडी, 15.आरएसपी, 16.केरल कांग्रेस मनीला, 17.पीडीपी और 18आईयूएमएल के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

बैठक में कांग्रेस की ओर से पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह और राहुल गांधी भी शामिल थे। दूसरी पार्टियों के प्रमुख नेताओं में फारूक अब्दुल्ला, एमके स्टालिन, ममता बनर्जी, हेमंत सोरेन, उद्धव ठाकरे, शरद पवार, शरद यादव और सीताराम येचुरी शामिल थे। यह उपस्थिति काफी आकर्षक बताई जा रही है। इसे देखते हुए कहा जा सकता है कि विरोधी दलों के बीच एकजुटता है। खासतौर से ममता बनर्जी की उपस्थिति ने इसे स्पष्ट किया है।

संवाद में आम आदमी पार्टी, बसपा और सपा की उपस्थिति दिखाई नहीं पड़ी। बताते हैं कि आम आदमी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी को निमंत्रित नहीं किया गया था। समाजवादी पार्टी का भी कोई नेता मीटिंग से नहीं जुड़ा। अखिलेश यादव किसी कार्यक्रम में व्यस्त होने के कारण जुड़ नहीं पाए और उनकी अनुपस्थिति में कोई दूसरा नेता भी इस संवाद में शामिल नहीं हो पया। इस बैठक के पहले हाल में कपिल सिब्बल के घर में भी रात्रिभोज पर एक बैठक हुई थी। हालांकि आज की बैठक से उसका कोई टकराव नहीं था, पर चूंकि कपिल सिब्बल जी-23 में शामिल किए जाते हैं, इसलिए उस बैठक के निहितार्थ भी इस बैठक के साथ देखे जाएंगे।  

अफगानिस्तान में ‘अमीरात’ और ‘गणतंत्र’ का फर्क

बाईं ओर गणतंत्र का और दाईं ओर अमीरात का ध्वज 

तालिबान-प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद ने घोषणा की है कि अफ़ग़ानिस्तान में चल रही जंग ख़त्म हो गई है, लेकिन किसी अज्ञात स्थान से जारी संदेश में उप-राष्ट्रपति अमीरुल्ला सालेह ने कहा है कि जंग अभी जारी है। इससे पहले, एक फ़्रांसीसी पत्रिका के लिए लिखे गए एक लेख में, शेर-ए-पंजशीर के नाम से मशहूर अफ़ग़ान नेता अहमद शाह मसूद के बेटे अहमद मसूद ने अपने पिता के नक़्शे-क़दम पर तालिबान के ख़िलाफ़ 'जंग की घोषणा' कर दी है। ऐसी घोषणाएं हों या नहीं भी हों, जंग तो यों भी जारी रहेगी। यह जंग आधुनिकता और मध्ययुगीन-प्रवृत्तियों के बीच है।

हालांकि तालिबान ने गत 15 अगस्त को काबुल में प्रवेश कर लिया था, पर उन्होंने 19 अगस्त को अफगानिस्तान में इस्लामी अमीरात की स्थापना की घोषणा की। इस तारीख और इस घोषणा का प्रतीकात्मक महत्व है। 19 अगस्त अफगानिस्तान का राष्ट्रीय स्वतंत्रता है। 19 अगस्त, 1919 को एंग्लो-अफगान संधि के साथ अफगानिस्तान ब्रिटिश-दासता से मुक्त हुआ था। अंग्रेजों और अफगान सेनानियों के बीच तीसरे अफगान-युद्ध के बाद यह संधि हुई थी।

नाम नहीं काम

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है इस्लामी अमीरात की घोषणा। अभी तक यह देश इस्लामी गणराज्य था, अब अमीरात हो गया। क्या फर्क पड़ा? केवल नाम की बात नहीं है। गणतंत्र का मतलब होता है, जहाँ राष्ट्राध्यक्ष जनता द्वारा चुना जाता है। अमीरात का मतलब है वह व्यवस्था, जिसमें अपारदर्शी तरीके से राष्ट्राध्यक्ष कुर्सी पर बैठते हैं। तालिबानी सूत्र संकेत दे रहे हैं कि अब कोई कौंसिल बनाई जाएगी, जो शासन करेगी और उसके सर्वोच्च नेता होंगे हैबतुल्‍ला अखूंदजदा।

कौन बनाएगा यह कौंसिल, कौन होंगे उसके सदस्य, क्या अफगानिस्तान की जनता से कोई पूछेगा कि क्या होना चाहिए? इन सवालों का अब कोई मतलब नहीं है। तालिबान की वर्तमान व्यवस्था बंदूक के जोर पर आई है। सारे सवालों का जवाब है बंदूक। यानी कि इसे बदलने के लिए भी बंदूक का सहारा लेने में कुछ गलत नहीं। इस बंदूक और अमेरिकी बंदूक में कोई बड़ा फर्क नहीं है, पर सिद्धांततः आधुनिक लोकतांत्रिक-व्यवस्था पारदर्शिता का दावा करती है। वह पारदर्शी है या नहीं, यह सवाल अलग है। 

पारदर्शिता को लेकर उस व्यवस्था से सवाल किए जा सकते हैं, तालिबानी व्यवस्था से नहीं। आधुनिक लोकतंत्रों में उसके लिए संस्थागत व्यवस्था है, जिसका क्रमशः विकास हो रहा। वह व्यवस्था सेक्युलर है यानी धार्मिक नियमों से मुक्त है। कम से कम सिद्धांततः मुक्त है। हमें नहीं पता कि अफगानिस्तान की नई न्याय-व्यस्था कैसी होगी। वर्तमान अदालतों का क्या होगा वगैरह। 

सन 1919 की आजादी के बाद अफगान-अमीरात की स्थापना हुई थी, जिसके अमीर या प्रमुख अमानुल्ला खां थे, जो अंग्रेजों के विरुद्ध चली लड़ाई के नेता भी थे। इन्हीं अमानुल्ला खां ने 1926 में स्वयं को पादशाह या बादशाह घोषित किया और देश का नया नाम अफगान बादशाहत (किंगडम) रखा गया। वह अफगानिस्तान 29 अगस्त 1946 को संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बना।

स्कर्टधारी लड़कियाँ

बीसवीं सदी के अफगानिस्तान पर नजर डालें, तो पाएंगे कि अपने शुरूआती वर्षों में यह देश अपेक्षाकृत आधुनिक और प्रगतिशील था। हाल में सोशल मीडिया पर पुराने अफगानिस्तान की एक तस्वीर वायरल हुई थी, जिसमें स्कर्ट पहने कुछ लड़कियाँ दिखाई पड़ती हैं। उस तस्वीर के सहारे यह बताने की कोशिश की गई थी कि देखो वह समाज कितना प्रगतिशील था।

इस तस्वीर पर एक सज्जन की प्रतिक्रिया थी कि छोटे कपड़े पहनना प्रगतिशीलता है, तो लड़कियों को नंगे घुमाना महान प्रगतिशीलता होगी। यह उनकी दृष्टि है, पर बात इतनी थी कि एक ऐसा समय था, जब अफगानिस्तान में लड़कियाँ स्कर्ट पहन सकती थीं। स्कर्ट भी शालीन लिबास है। बात नंगे घूमने की नहीं है। जब सामाजिक-वर्जनाएं इतनी कम होंगी, वहाँ नंगे घूमने पर भी आपत्ति नहीं होगी। दुनिया में आज भी कई जगह न्यूडिस्ट कैम्प लगते हैं।

शालीनता की परिभाषाएं सामाजिक-व्यवस्थाएं तय करती हैं, पर उसमें सर्वानुमति, सहमति और जबर्दस्ती के द्वंद्व का समाधान भी होना चाहिए। उसके पहले हमें आधुनिकता को परिभाषित करना होगा। बहरहाल विषयांतर से बचने के लिए बात को मैं अभी अफगानिस्तान पर ही सीमित रखना चाहूँगा। फिलहाल इतना ही कि तमाम तरह की जातीय विविधता और कबायली जीवन-शैली के बावजूद वहाँ कट्टरपंथी हवाएं नहीं चली थीं।

Thursday, August 19, 2021

कितना बदलाव आया है तालिबान में?

गायब होती औरत। बुशरा अलमुतवकील (यमन, जन्म 1969) का यह फोटो
कोलाज 'माँ-बेटी गुड़िया' हिजाब सीरीज-2010 की एक कृति है।
(साभार- म्यूजियम ऑफ फाइन आर्ट्स, बोस्टन) 
 Boushra Almutawakel (Yemen, b. 1969), Mother, Daughter, Doll
 from the Hijab series, 2010. (Courtesy Museum of Fine Arts, Boston)
यह बात बार-बार कही जा रही है कि तालिबान.1 यानी बीस साल पहले वाले तालिबान की तुलना में आज के यानी तालिबान.2 बदले हुए हैं। वे पहले जैसे तालिबान नहीं हैं। आज के इंडियन एक्सप्रेस में एमके भद्रकुमार ने लिखा है कि आज के तालिबान ने अफगानिस्तान के सभी समुदायों के बीच जगह बनाई है, उन्होंने पश्चिम और दोनों तरफ अपने वैदेशिक-रिश्ते बेहतर बनाए हैं और वे अपनी वैधानिकता को लेकर उत्सुक हैं। एमके भद्रकुमार पूर्व राजनयिक हैं और वे वर्तमान सरकार की विदेश-नीति से असहमति रखने वालों में शामिल हैं।

भद्रकुमार के अनुसार अफगानिस्तान में 1992 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित सत्ता-परिवर्तन हुआ था, जो लम्बे समय तक चला नहीं। 1996 में अहमद शाह मसूद हटे और बगैर ज्यादा बड़े प्रतिरोध के तालिबान आए। इसबार भी करीब-करीब वैसा ही हो रहा है। अलबत्ता तीन तरह के अंतर दिखाई पड़ रहे हैं। पिछली बार के विपरीत इसबार राज-व्यवस्था बदस्तूर नजर आ रही है। इस बात का अंदाज तालिबान के नाटकीय संवाददाता सम्मेलन को देखने से लगता है।

दूसरे सत्ता का अंतिम रूप क्या होगा, इसका पता लगने में कुछ समय लगेगा। उसके पहले कोई अंतरिम व्यवस्था सामने आएगी। इसका मतलब है कि तालिबान सर्वानुमति को स्वीकार करेंगे।

तीसरे, पिछली दो बार के विपरीत इसबार अंतरराष्ट्रीय समुदाय, खासतौर से आसपास के देश, अंतरिम-व्यवस्था का निर्धारण कर रहे हैं। विजेता तालिबान राष्ट्रीय-सर्वानुमति की दिशा में विश्व-समुदाय की सलाह या निर्देश मानने को तैयार हैं। इस प्रकार से नए शीत-युद्ध का खतरा दूर हो रहा है और बड़ी ताकतें तालिबान को सकारात्मक तरीके से जोड़ पा रही हैं।

भद्रकुमार ने यह भी लिखा है कि भारत का अपने दूतावास को बंद करना समझ में नहीं आता है। भद्रकुमार का निष्कर्ष ऐसा क्यों है, पता नहीं। हमारा दूतावास बंद नहीं हुआ है, केवल स्टाफ वापस बुलाया गया है। बहरहाल वे लिखते हैं कि हमें नई अफगान नीति पर चलने का मौका मिला है, जो अमेरिकी संरक्षण से मुक्त हो। ऐसा शायद इसलिए है, क्योंकि सरकार की ज़ीरो सम दृष्टि है कि पाकिस्तानी जीत मायने भारत की हारपर यह भारत का परम्परागत नज़रिया नहीं है। हमें अफगान-राष्ट्र की अंतर्चेतना, परम्पराओं और संस्कृति तथा भारत के प्रति उनके स्नेह-भाव की जानकारी है।

तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने मुज़ाहिदीन-समूहों (पेशावर सेवन) के साथ फौरन सम्पर्क स्थापित किया था, गो कि वे जानते थे कि इनके पाकिस्तान के साथ करीबी रिश्ते हैं। यह कहना पर्याप्त है कि भारतीय बयानिया (नैरेटिव) में खामियाँ हैं। हम एक पुरानी स्ट्रैटेजिक-डैप्थ की अवधारणा से उलझे हुए हैं और मानते हैं कि तालिबान पाकिस्तानी व्यवस्था के हाथ का खिलौना हैं।

Wednesday, August 18, 2021

तालिबान-सरकार को क्या मान्यता मिलेगी?

तालिबान-प्रवक्ता जबीहुल्ला मुज़ाहिद 
अफगानिस्तान में तालिबान की स्थापना करीब-करीब पूरी हो चुकी है। अब दो सवाल हैं। क्या विश्व-समुदाय उन्हें मान्यता देगा?  इसी से जुड़ा दूसरा सवाल है कि भारत क्या करेगा?  आज के टाइम्स ऑफ इंडिया ने सरकारी सूत्र के हवाले से खबर दी है कि विश्व का लोकतांत्रिक-ब्लॉक जो फैसला करेगा भारत उसके साथ जाएगा। इसका मतलब है कि दुनिया में ब्लॉक बन चुके हैं और जिस शीतयुद्ध की बातें हो रही थीं, वह अफगानिस्तान में अब लड़ा जाएगा।

अफ़ग़ानिस्तान को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच प्रतिद्वंद्विता तो है ही, पर ज्यादा बड़ा टकराव पश्चिमी देशों और रूस के बीच है। इसके अलावा अब चीन भी बड़ा दावेदार है और वह तालिबान के समर्थन में उतर आया है। सोवियत संघ ने 1979 में अफ़ग़ानिस्तान पर धावा बोला था। उसका सामना तब अफ़ग़ान मुजाहिदीन से हुआ था, जिन्हें अमेरिका, ब्रिटेन और पाकिस्तान का समर्थन हासिल था। पिछले दो दिन में तालिबान-विरोधी पुराना नॉर्दर्न अलायंस पंजशीर-प्रतिरोध के नाम से खड़ा हो गया है, जिसके नेता पूर्व उपराष्ट्रपति अमीरुल्ला सालेह हैं, जिनका कहना है कि राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति ही कार्यवाहक राष्ट्रपति होता है। अफगान सेना से जुड़े ताजिक मूल के काफी सैनिक इस समूह में शामिल हो गए हैं।

लोकतांत्रिक-ब्लॉक

सवाल है कि क्या लोकतांत्रिक-ब्लॉक पंजशीर-रेसिस्टेंस को उसी तरह मान्यता देगा, जिस तरह से नब्बे के दशक में बुरहानुद्दीन रब्बानी को मान्यता दी गई थी। ध्यान दें कि अफगानिस्तान में पंजशीर अकेला ऐसा क्षेत्र है, जो तालिबानी नियंत्रण के बाहर है और इस बात की उम्मीद नहीं कि तालिबान उसपर कब्जा कर पाएंगे। पश्चिमी पर्यवेक्षकों का विचार है कि अमेरिका ने गलती की। उसके 3000 सैनिक तालिबान को रोकने के लिए काफी थे। बहरहाल अगले कुछ दिन में तय होगा कि अफगानिस्तान में ऊँट किस करवट बैठने वाला है।

Tuesday, August 17, 2021

अफगान सेना ने इतनी आसानी से हार क्यों मानी?


पिछले महीने 8 जुलाई को एक अमेरिकी रिपोर्टर ने राष्ट्रपति जो बाइडेन से पूछा, क्या तालिबान का आना तय है? इसपर उन्होंने जवाब दिया, नहीं ऐसा नहीं हो सकता। अफगानिस्तान के पास तीन लाख बहुत अच्छी तरह प्रशिक्षित और हथियारों से लैस सैनिक हैं। उनकी यह बात करीब एक महीने बाद न केवल पूरी तरह गलत साबित हुई, बल्कि इस तरह समर्पण दुनिया के सैनिक इतिहास की विस्मयकारी घटनाओं में से एक के रूप में दर्ज की जाएगी।  

अमेरिकी थिंकटैंक कौंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के विशेषज्ञ मैक्स बूट ने अपने अपने लेख में सवाल किया है कि अमेरिका सरकार ने करीब 83 अरब डॉलर खर्च करके जिस सेना को खड़ा किया था, वह ताश के पत्तों की तरह बिखर क्यों गई? उसने आगे बढ़ते तालिबानियों को रोका क्यों नहीं, उनसे लड़ाई क्यों नहीं लड़ी?

भारी हतोत्साह

बूट ने लिखा है कि इसका जवाब नेपोलियन बोनापार्ट की इस उक्ति में छिपा है, युद्ध में नैतिक और भौतिक के बीच का मुकाबला दस से एक का होता है। पिछले बीस साल में अफगान सेना ने एयर-पावर, इंटेलिजेंस, लॉजिस्टिक्स, प्लानिंग और दूसरे महत्वपूर्ण मामलों में अमेरिकी समर्थन के सहारे काम करना ही सीखा था और अमेरिकी सेना की वापसी के फैसले के कारण वह बुरी तरह हतोत्साहित थी। अफगान स्पेशल फोर्स के एक ऑफिसर ने वॉशिंगटन पोस्ट को बताया कि जब फरवरी 2020 में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने तालिबान के साथ सेना वापस बुलाने के समझौते पर दस्तखत किए थे, तब अफगानिस्तान के अनेक लोगों के मान लिया कि अब अंत हो रहा है और अफगान सेना को विफल होने के लिए अमेरिका हमारे हाथों से अपना दामन छुड़ा रहा है।  

Monday, August 16, 2021

कौन हैं तालिबान

तालिबानी नेताओं के साथ बैठे मुल्ला अब्दुल ग़नी बारादर

अरबी शब्द तालिब का अर्थ है तलब रखने वाला, खोज करने वाला, जिज्ञासु या विद्यार्थी। अरबी में इसके दो बहुवचन हैं-तुल्लाब और तलबा। भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान में इसका बहुवचन तालिबान बन गया है। मोटा अर्थ है इस्लामी मदरसे के छात्र। अफगानिस्तान में सक्रिय तालिबान खुद को अफगानिस्तान के इस्लामी अमीरात का प्रतिनिधि कहते हैं। नब्बे के दशक की शुरुआत में जब सोवियत संघ अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुला रहा था, उस दौर में सोवियत संघ के खिलाफ लड़ने वाले मुजाहिदीन के कई गुट थे। इनमें सबसे बड़े समूह पश्तून इलाके से थे।

पश्तो-भाषी क्षेत्रों के मदरसों से निकले संगठित समूह की पहचान बनी तालिबान, जो 1994 के आसपास खबरों में आए। तालिबान को बनाने के आरोपों से पाकिस्तान इनकार करता रहा है, पर इसमें  संदेह नहीं कि शुरुआत में तालिबानी पाकिस्तान के मदरसों से निकले थे। इन्हें प्रोत्साहित करने के लिए सऊदी अरब ने धन मुहैया कराया। इस आंदोलन में सुन्नी इस्लाम की कट्टर मान्यताओं का प्रचार किया जाता था। चूंकि सोवियत संघ के खिलाफ अभियान में अमेरिका भी शामिल हो गया, इसलिए उसने भी दूसरे मुजाहिदीन समूहों के साथ तालिबान को भी संसाधन, खासतौर से हथियार उपलब्ध कराए।

अफगानिस्तान से सोवियत संघ की वापसी के बाद भी लड़ाई चलती रही और अंततः 1996 में तालिबान काबुल पर काबिज हुए और 2001 तक सत्ता में रहे। इनके शुरुआती नेता मुल्ला उमर थे। सोवियत सैनिकों के जाने के बाद अफ़ग़ानिस्तान के आम लोग मुजाहिदीन की ज्यादतियों और आपसी संघर्ष से परेशान थे इसलिए पहले पहल तालिबान का स्वागत किया गया। भ्रष्टाचार रोकने, अराजकता पर काबू पाने, सड़कों के निर्माण और कारोबारी ढांचे को तैयार करने और सुविधाएं मुहैया कराने में इनकी भूमिका थी।

तालिबान ने सज़ा देने के इस्लामिक तौर तरीकों को लागू किया। पुरुषों और स्त्रियों के पहनावे और आचार-व्यवहार के नियम बनाए गए। टेलीविजन, संगीत और सिनेमा पर पाबंदी और 10 साल से अधिक उम्र की लड़कियों के स्कूल जाने पर रोक लगा दी गई। उस तालिबान सरकार को केवल सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और पाकिस्तान ने मान्यता दी थी। 11 सितंबर, 2001 को न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के बाद दुनिया का ध्यान तालिबान पर गया।

अमेरिका पर हमले के मुख्य आरोपी ओसामा बिन लादेन को शरण देने का आरोप तालिबान पर लगा। अमेरिका ने तालिबान से लादेन को सौंपने की माँग की, जिसे तालिबान ने नहीं माना। इसके बाद 7 अक्टूबर, 2001 को अमेरिका के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय सैनिक गठबंधन ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर दिया और दिसंबर के पहले सप्ताह में तालिबान का शासन ख़त्म हो गया।

ओसामा बिन लादेन और तालिबान प्रमुख मुल्ला मोहम्मद उमर और उनके साथी अफ़ग़ानिस्तान से निकलने में कामयाब रहे। दोनों पाकिस्तान में छिपे रहे और एबटाबाद के एक मकान रह रहे लादेन को अमेरिकी कमांडो दस्ते ने 2 मई 2011 को हमला करके मार गिराया। इसके बाद अगस्त, 2015 में तालिबान ने स्वीकार किया कि उन्होंने मुल्ला उमर की मौत को दो साल से ज़्यादा समय तक ज़ाहिर नहीं होने दिया। मुल्ला उमर की मौत खराब स्वास्थ्य के कारण पाकिस्तान के एक अस्पताल में हुई थी।

तमाम दुश्वारियों के बावजूद तालिबान का अस्तित्व बना रहा और उसने धीरे-धीरे खुद को संगठित किया और अंततः सफलता हासिल की। उसे कहाँ से बल मिला, किसने उसकी सहायता की और उसके सूत्रधार कौन हैं, यह जानकारी धीरे-धीरे सामने आएगी। वर्तमान समय में तालिबान के चार शिखर नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं, जो इस प्रकार हैं: 1.हिबतुल्‍ला अखुंदज़ादा, 2. मुल्ला बारादर, 3.सिराजुद्दीन हक्कानी और 4.मुल्ला याकूब, जो मुल्ला उमर का बेटा है। इनकी प्रशासनिक संरचना अब सामने आएगी। सत्ता किन तालिबान नेताओं के हाथ में आएगी? इस सवाल के जवाब में जिन दो नामों पर सबसे है ज़्यादा चर्चा है, वे हैं- मुल्ला अब्दुल ग़नी बारादर और हिब्तुल्लाह अख़ुंदज़ादा।

 

तालिबानी-विजय के बाद

काबुल हवाई अड्डे पर लगी भारी भीड़

अफगानिस्तान में तालिबान का वर्चस्व स्थापित हो चुका है। राष्ट्रपति अशरफ ग़नी, उपराष्ट्रपति अमीरुल्ला सालेह और उनके सहयोगी देश छोड़कर चले गए हैं। फौरी तौर पर लगता है कि सरकार के भीतर उनके ही पुराने सहयोगियों ने उनसे सहयोग नहीं किया या वे अपने अस्तित्व को बचाने के लिए तालिबान से मिल गए हैं। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक वहाँ की अंतरिम व्यवस्था पर विचार-विमर्श चल ही रहा है। इसमें कुछ समय लगेगा। यह व्यवस्था इस बात की गारंटी नहीं कि देश में सब कुछ सामान्य हो जाएगा। उधर देशभर में अफरा-तफरी है। काबुल हवाई अड्डे पर भारी भीड़ जमा है। लोग भागना चाहते हैं, पर हवाई सेवाएं बंद हो गई हैं। भीड़ को काबू करने के लिए गोलियाँ चलानी पड़ीं, जिसमें पाँच लोगों की मौत की खबर है। तमाम लोग बेघरबार हो गए हैं। वे नहीं जानते कि उनके परिवार का क्या होगा। 

बीबीसी हिन्दी ेक अनुसार तालिबान ने काबुल पर क़ब्ज़े और फ़तह का एलान करने के एक दिन बाद एक नया वीडियो जारी किया है। इस वीडियो में तालिबान के उपनेता ने कहा है कि अब अफ़ग़ानिस्तान के लोगों के लिए कुछ करने और उनकी ज़िंदगी बेहतर करने का समय आ गया है। तालिबान के लड़ाकों के साथ बैठे मुल्ला बरादर अखुंद ने इस वीडियो में कहा है- "अब आज़माइश का वक़्त आ गया है, हम सारे देश में अमन लाएँगे, हम लोगों की ज़िंदगी बेहतर बनाने के लिए जहाँ तक बन पड़ेगा प्रयास करेंगे।"

फिलहाल तालिबान अपने चेहरे को सौम्य और सहिष्णु बनाने का प्रयास कर रहे हैं, पर उनका यकीन नहीं किया जा सकता। इस सौम्यता के पीछे दो कारण हैं। एक, वे अपने कठोर व्यवहार की परिणति देख चुके हैं, जिसके कारण वे अलग-थलग पड़ गए थे। दूसरे वे अभी वैश्विक-मान्यता चाहते हैं। अपने पहले दौर में उन्हें केवल तीन देशों ने मान्यता दी थी। हालांकि अपने अंतर्विरोधों के भार से वे खुद ढह गए और अमेरिका ने उनपर हमला कर दिया।

ऐसा नहीं भी हुआ होता, तब भी वह व्यवस्था ध्वस्त होती, क्योंकि मध्ययुगीन समझ के साथ कोई व्यवस्था आज नहीं चल सकती है। फिलहाल उन्हें वैश्विक-मान्यता दिलाने में अमेरिका की महत्वपूर्ण भूमिका होगी, जिसके साथ उन्होंने सम्पर्क बनाकर रखा है। इसके अलावा वे चीन और रूस के सम्पर्क में भी हैं। हो सकता है वे डबल गेम खेल रहे हों। बहरहाल इंतजार कीजिए।

अमेरिकी साख

इस पूरे प्रकरण में अमेरिका की साख सबसे ज्यादा खराब हुई है। ऐसा लग रहा है कि बीस साल से ज्यादा समय तक लड़ाई लड़ने के बाद अमेरिका ने उसी तालिबान को सत्ता सौंप दी, जिसके विरुद्ध उसने लड़ाई लड़ी। ऐसा क्यों हुआ और भविष्य में क्या होगा, इसका विश्लेषण करने में कुछ समय लगेगा, पर इतना तय है कि पिछले बीस वर्ष में इस देश के आधुनिकीकरण की जो प्रक्रिया शुरू हुई थी, वह एक झटके में खत्म हो गई है। खासतौर से स्त्रियों, अल्पसंख्यकों, मानवाधिकार कार्यकर्ता और नई दृष्टि से सोचने वाले युवक-युवतियाँ असमंजस में हैं। तमाम स्त्रियाँ इस दौरान, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, पुलिस अधिकारी और प्रशासक बनी थीं, उनका भविष्य गहरे अंधेरे में चला गया है। 

Sunday, August 15, 2021

काबुल पहुँचे तालिबान


अफगानिस्तान से जो खबरें मिल रही हैं, उनसे लगता है कि तालिबान काबुल में प्रवेश कर गए हैं। समाचार-एजेंसियों ने खबर दी है कि तालिबान हर तरफ से काबुल शहर में प्रवेश कर रहे हैं। अफ़ग़ानिस्तानी राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी अमेरिका के विशेष दूत ज़लमय ख़लीलज़ाद और शीर्ष नेटो अधिकारियों के साथ वार्ता कर रहे हैं। यह बैठक तालिबान के काबुल में दाखिल होने की रिपोर्टों के बीच हो रही है। शनिवार को गनी ने एक संक्षिप्त बयान में कहा था कि अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा को मज़बूत करने और सेना को संगठित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

तालिबान सैनिक आज सुबह काबुल के दरवाज़ों पर पहुंच गए थे। इससे पहले जलालाबाद में बिना किसी प्रतिरोध के सेना ने तालिबान के सामने समर्पण कर दिया। उधर कतर में तालिबान के आधिकारिक प्रवक्ता सुहेल शाहीन ने कहा है कि हमने अभी काबुल में प्रवेश नहीं किया है, हम शहर के बाहर हैं। उनका यह भी कहना है कि हमारी योजना जबरन कब्जा करने की नहीं है। हम शांतिपूर्ण सत्ता-हस्तांतरण चाहते हैं।

भारतीय मीडिया में खबर है कि देश के पूर्व गृहमंत्री अली अहमद जलाली अंतरिम राष्ट्रपति बन सकते हैं। वे अमेरिका में रहते हैं और कम से कम तालिबानी नहीं हैं। क्या वे तालिबान को स्वीकार होंगे? यह अंतरिम व्यवस्था किसकी होगी, तालिबान की या वर्तमान सरकार की?   

लगता यह भी है कि उन्हें सरकार ने भी काबुल में प्रवेश करने दिया है। शायद इसी वजह से कल मज़ारे-शरीफ में सेना ने तालिबान को कब्जा करने दिया। सरकार चाहती, तो वहाँ लड़ाई हो सकती थी, क्योंकि दो ताकतवर क्षेत्रीय सरदार सरकार के साथ थे। फिलहाल ये सब कयास हैं, पर यदि यह सच है, तो इसके पीछे दो कारण हो सकते हैं। पहला यह कि अफगान सरकार और तालिबान भी खून-खराबा नहीं चाहते और दूसरे यह कि उनकी तालिबान के साथ किसी स्तर पर सहमति हुई है, क्योंकि अल जजीरा खबर दे रहा है कि तालिबान प्रतिनिधि राष्ट्रपति के महल में हैं।