Friday, February 20, 2026

एआई फिज़ूल सपना नहीं, उसमें दम है

 


दिल्ली में गलगोटिया विवि के रोबोटिक डॉग औरड्रोन सॉकर एरीनाके कारण हुई फज़ीहत के बाद कुछ लोग पूछ रहे हैं कि आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में भारत वास्तव में क्या कुछ कर भी पाएगा? हमारे पास उसके लिए पर्याप्त तकनीकी आधार और टेलेंट है भी या नहीं? बहरहाल इस घटना ने सरकार समर्थित टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्मों पर स्वदेशी नवाचार की गलत व्याख्या की ओर देश का ध्यान आकर्षित किया है। साथ ही हमारे प्रचार-प्रिय सूचना तंत्र की पोल भी खोली है, जिससे सारी दुनिया में हमारी भद्द पिटी। सोशल-मीडिया के लिए ऐसी घटनाएँ चटपटे मसाले की तरह होती हैं, कुछ समय तक याद रहती हैं और फिर बिसरा दी जाती हैं। बहरहाल इस घटना ने हमें इसकी उपयोगिता और अपनी उपलब्धियों पर विचार करने की सलाह भी दी है।  

इसके पहले जनवरी में दावोस सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जिवा की इस टिप्पणी को लेकर भी विवाद हुआ था कि भारत 'सेकंड-टियर' एआई पावर है। राजनीति-शास्त्री आयन ब्रेमर ने भी इस बात का हवाला देते हुए कहा था कि नए उभरते देशों को अमेरिका या चीन के साथ तालमेल बिठाना चाहिए। इन दोनों बातों का तीखा जवाब देते हुए भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री, अश्विनी वैष्णव ने कहा, भारत एआई देशों क ‘साफ पहली कतार’ में है।

उन्होंने एआई आर्किटेक्चर की पाँच परतों के रूप में वर्णित भारत की प्रगति का विवरण दिया: एप्लीकेशन, मॉडल, चिप, बुनियादी ढाँचे और ऊर्जा के सभी पाँच स्तरों पर ' भारत अच्छी प्रगति' कर रहा है। उन्होंने स्टैनफर्ड विवि की एक रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें भारत को एआई प्रवेश और तैयारियों में तीसरे स्थान पर और वैश्विक स्तर पर एआई प्रतिभा में दूसरे स्थान पर रखा गया है। बाद में आईएमएफ की चीफ ने इस विवाद को ठंडा करते हुए कहा कि संगठन भारत की एआई प्रगति के लिए भारी प्रशंसा करता है। उन्होंने इस गलतफहमी के लिए मॉडरेटर को दोषी ठहराया।

अंतरिक्ष-विज्ञान, कंप्यूटिंग-सॉफ्टवेयर, बायोटेक्नोलॉजी, सेमी कंडक्टर, एआई और डेटा साइंस जैसी तकनीकों को हाईटेकमाना जाता है। इनका इस्तेमाल चिकित्सा (ईएचआर सिस्टम), विनिर्माण (रोबोटिक्स), और अनुसंधान (लैब डायग्नोस्टिक) के अलावा रक्षा-तकनीक और अंतरिक्ष-विज्ञान जैसे क्षेत्रों में प्रमुखता से होता है। स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी की 2025 ग्लोबल एआई वाइब्रेंसी रैंकिंग में भारत को अमेरिका और चीन के बाद तीसरे स्थान पर रखा गया है, जो लंबी छलाँग है। नवंबर में जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत एक साल में ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और जापान को पीछे छोड़ते हुए, चार पायदान ऊपर चढ़ गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नीति और शासन श्रेणी में भारत पाँच पायदान फिसला भी है, जिस पर ध्यान देने की ज़रूरत है।

भारत का 2023 में सातवें से तीसरे स्थान पर पहुँचना वैश्विक एआई दौड़ में तेज गति को रेखांकित करता है। सरकार का अनुमान है कि भारत में अगले दो वर्षों में 200 अरब डॉलर से ज्यादा का पूँजी निवेश एआई पर ही आएगा। अमेरिका और चीन के भारी पूँजी निवेश को देखते हुए यह प्रगति प्रशंसनीय है। रिपोर्ट इस बात पर प्रकाश डालती है कि दुनिया भर की सरकारें एआई निवेश बढ़ा रही हैं: कनाडा ने 2.4 अरब डॉलर, चीन ने 47.5 अरब डॉलर का सेमीकंडक्टर फंड लॉन्च किया है, फ्रांस ने 109 अरब यूरो का वादा किया है, भारत ने 1.25 अरब डॉलर की घोषणा की है, और सऊदी अरब का प्रोजेक्ट ट्रांसेंडेंस 100 अरब डॉलर के व्यापक प्रयास का प्रतिनिधित्व करता है।

इन देशों के निवेश का कुछ हिस्सा भारत भी आएगा, क्योंकि भारत एआई के बड़े बाज़ार के रूप में विकसित हो रहा है। इसकी एक झलक दिल्ली में हुए एआई शिखर सम्मेलन में देखने को मिली, जिसमें 20 से अधिक राष्ट्राध्यक्ष, 60 मंत्री और 500 वैश्विक एआई लीडर शामिल हुए हैं। ग्लोबल साउथ में यह पहला वैश्विक एआई सम्मेलन है। इनमें फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ पेरेज़-कास्टेजोन और श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके के अलावा ओपनएआई के सीईओ सैम अल्टमैन, गूगल डीपमाइंड के सीईओ डेमिस हसाबिस और रिलायंस इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक, मुकेश अंबानी और माइक्रोसॉफ्ट के अध्यक्ष ब्रैड स्मिथ जैसे बड़े औद्योगिक पदाधिकारी शामिल थे। इससे पहले ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया और फ्रांस में ऐसे सम्मेलन हो चुके हैं। बेशक भारत के पास अभी एआई की उन्नत विनिर्माण-सामर्थ्य नहीं है, क्योंकि उसके लिए आवश्यक चिप्स का उत्पादन हमारे यहाँ अभी नहीं हो रहा है, पर देश का सेमीकंडक्टर मिशन बहुत तेजी से गति पकड़ रहा है, जो चिप्स उपलब्ध कराएगा।

एआई का मतलब केवल चिप्स निर्माण नहीं है। टेक्नोलॉजी का निर्माण करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होगी, जो अपना समय लेगा। अलबत्ता उसका इस्तेमाल करने वालों और उससे जुड़े इंजीनियरों और डेटा सेंटरों की संख्या हमारी प्रगति को बता रही है। एआई शोधकर्त्ताओं की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। इसकी प्रदर्शनी में उद्योग जगत के लीडरों, स्टार्टअप्स, शैक्षणिक संस्थानों, सरकारी प्रतिनिधियों और युवाओं की जैसी भीड़ आई, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि उत्सुकता का स्तर क्या है। हाल के वर्षों में देश की व्यवस्था में डिजिटाइज़ेशन ने भी इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के दरवाज़े खोले हैं।

इस बात को समझने की ज़रूरत है कि एआई केवल रोबोटिक्स या गेमिंग नहीं है। उसकी भूमिका चिकित्सकीय और वैज्ञानिक अनुसंधान में है, प्रशासनिक कार्यों में है, खेती-किसानी में है। भारत में 90 करोड़ से ज्यादा इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं, जो प्रतिदिन औसतन सात घंटे ऑनलाइन बिताते हैं। एनवीडिया, ओपन एआई, एंथ्रॉपिक और गूगल जैसी कंपनियाँ भारत में पैर जमाने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। भारत सरकार प्रशासनिक और न्याय-व्यवस्थाओं को तेजी से प्रभावशाली बनाना चाहती है, जिसके लिए एआई-गवर्नेंस के मॉडल सामने आ रहे हैं, वैसे ही जैसे देश ने डिजिटल-गवर्नेंस को सफल बनाया।

भारत में एकसाथ कई भाषाओं में तत्काल अनुवाद करने वाले एआई मॉडल की ज़रूरत महसूस की जा रही थी। बेंगलुरु स्थित सर्वम एआई ने 18 फरवरी को दिल्ली में शिखर सम्मेलन के दौरान ,चैटजीपीटी और डीपसीक जैसे अपने स्वयं के बड़े भाषा मॉडल विक्रम का अनावरण करके इस काम को पूरा कर दिखाया है। विदेशी मॉडलों के साथ भारतीय भाषाओं का मेल नहीं बैठ पाता है। टी-20 क्रिकेट विश्व कप के टीवी प्रसारण के दौरान चैटजीपीटी के विज्ञापन स्लॉट के पीछे की व्यावसायिक-योजना पर शायद आपने ध्यान नहीं दिया होगा। कई लोगों की अच्छे स्कूलों तक पहुँच नहीं है, एआई उनकी मदद करेगा। भारत के जुगाड़-विशेषज्ञ बहुत जल्द इनके किफायती और आसान तरीके निकाल लेंगे।

इंडिया एआई मिशन के तहत सरकार ने 38,000 जीपीयू को तैनात करने की योजना बनाई है, जो राष्ट्रीय स्तर पर साझा इंफ्रास्ट्रक्चर बनाएगी। इस साल एआई मिशन 2.0 के तहत 20,000 अतिरिक्त जीपीयू जोड़े जा रहे हैं, जिससे कुल क्षमता 58,000 जीपीयू हो जाएगी। जीपीयू या ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट शक्तिशाली कंप्यूटर चिप है जो मशीनों को तेज़ी से सोचने, छवियों को प्रोसेस करने, एआई प्रोग्राम चलाने, और जटिल कार्यों को सामान्य प्रोसेसर की तुलना में अधिक कुशलता से संभालने में मदद करता है। यह मिशन स्वास्थ्य, कृषि और सस्टेनेबल शहरों जैसे क्षेत्रों में एआई इनोवेशन को बढ़ावा दे रहा है।

आप कह सकते हैं कि भारत के पास हार्डवेयर का और शोध का व्यापक आधार नहीं है, इसका फायदा विदेशी कंपनियों को मिलेगा। बेशक मिलेगा, इसीलिए वे भारत में निवेश करेंगे, पर तकनीकी बदलाव का तरीका भी यही है। खासतौर से उस देश में जिसके पास तकनीक और पूँजी दोनों का अभाव है। नब्बे के दशक में कंप्यूटर क्रांति और उसके दस साल बाद मोबाइल क्रांति का अनुभव क्या बताता है? आज हम फुल स्केल कंप्यूटर बनाते हैं और मोबाइल फोन भी। हमने सेमी कंडक्टर उद्योग में विलंब से प्रवेश किया है, पर चिप बनाना शुरू कर दिया है। भारत के पास चिप डिजाइनरों का काफी बड़ा पूल पहले से मौजूद है। 

भारत में एआई टेलेंट पूल 2027 तक 6 लाख से बढ़कर 12.5 लाख तक पहुँचने की उम्मीद है, लेकिन कंप्यूट पावर और फ्रंटियर मॉडल्स में अभी पीछे है। फिर भी, देश की विशाल जनसंख्या से उत्पन्न डेटा और युवा इंजीनियरिंग टेलेंट इस एआई रेस में हमें आगे रखेंगे।

दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित

 

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