Thursday, February 27, 2025

भाजपा और ‘फासिज़्म’ को लेकर वामपंथी खेमे में नई बहस


भारत के वामपंथियों और कांग्रेस पार्टी के बीच एक नई बहस शुरू हो गई है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार ‘फासिस्ट’ या ‘नव-फासिस्ट’ है या नहीं। अब ‘फासिज्म’ की भारतीय परिभाषा को लेकर भी बहस होगी। इसकी वजह यह है कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की अप्रैल में होने वाली 24वीं पार्टी कांग्रेस की बैठक से पहले राज्य इकाइयों को भेजे गए राजनीतिक प्रस्तावों में एक यह भी है कि पार्टी केंद्र सरकार को ‘फासिस्ट’ या ‘नव-फासिस्ट’ क्यों नहीं मानती। 

सीपीआई (एम) ने हाल में 24वीं पार्टी कांग्रेस के लिए अपना मसौदा राजनीतिक प्रस्ताव जारी किया है-जो 2 से 6 अप्रैल तक मदुरै में आयोजित किया जाना है। इसमें कहा गया है कि (मोदी सरकार का) प्रतिक्रियावादी हिंदुत्व एजेंडा थोपने का प्रयास और विपक्ष और लोकतंत्र को दबाने का सत्तावादी अभियान नव-फासीवादी विशेषताओं को प्रदर्शित करता है...। मोदी सरकार के लगभग ग्यारह वर्षों के शासन के परिणामस्वरूप नव-फासीवादी विशेषताओं के साथ दक्षिणपंथी, सांप्रदायिक, सत्तावादी ताकतों का एकीकरण हुआ है। 

नव-फासीवाद के लक्षण

गत 17-19 जनवरी के दौरान कोलकाता में आयोजित पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक में मसौदा राजनीतिक प्रस्ताव को अपनाया गया था। इसमें कहा गया है, हालाँकि मोदी सरकार ‘नव-फासीवादी विशेषताओं’ को प्रदर्शित करती है, लेकिन उसे ‘फासीवादी या नव-फासीवादी सरकार’ कहना उचित नहीं।

सीपीआई (एम) के वैचारिक मुखपत्र मलयालम साप्ताहिक ‘चिंता’ के ताजा अंक में पार्टी पोलित ब्यूरो ने मसौदा राजनीतिक प्रस्ताव पर स्पष्टीकरण नोट जारी किया है। इसमें कहा गया, यह पहली बार है जब हम राजनीतिक प्रस्ताव के राष्ट्रीय परिस्थिति वाले खंड में 'नव-फासीवादी' शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसमें कहा गया है कि नव-फासीवाद, नव-उदारवाद से उत्पन्न संकट और वैश्विक प्रवृत्ति का परिणाम है। बीजेपी-आरएसएस के तहत मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था हिंदुत्व-कॉर्पोरेट दबंग शासन है, जो नव-फासीवादी विशेषताओं को प्रदर्शित करता है। हम यह नहीं कहते कि मोदी सरकार फासीवादी या नव-फासीवादी है। हम भारत सरकार को नव-फासीवादी शासन के रूप में नहीं दर्शाते हैं। 

नोट में कहा गया है, 22वीं कांग्रेस (2018 में हैदराबाद में आयोजित) में, हमने कहा था कि अति-सत्तावादी हिंदुत्व के हमले 'उभरती फासीवादी प्रवृत्तियों' के संकेत थे। 23वीं कांग्रेस (2022 में कन्नूर में आयोजित) में, हमने यह भी कहा कि मोदी सरकार आरएसएस के फासीवादी एजेंडे को लागू कर रही है।

सीपीआई की उलझन

माकपा का यह दृष्टिकोण उसकी सहयोगी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के नज़रिए से मेल नहीं खाता। सीपीआई, मोदी सरकार को ‘फासीवादी’ कहने में मुखर रही है तथा उसने अपने सीपीएम से अपने रुख में सुधार की माँग की है। सीपीआई के केरल राज्य सचिव बिनॉय विश्वम ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि आरएसएस एक फासीवादी संगठन है। आरएसएस के तहत मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार वास्तव में एक फासीवादी सरकार है। सीपीएम को अपनी स्थिति पर पुनर्विचार करना होगा।

वस्तुतः इस दृष्टिकोण को केरल की राजनीति की रोशनी में देखना चाहिए। केरल में सीपीएम को कारोबारी-परिस्थितियाँ तैयार करने की जरूरत महसूस हो रही है। ऐसा नज़रिया बंगाल में बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने अपनाने की कोशिश की थी, पर तब तक देर हो चुकी थी, जिसके बाद ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने राज्य में जगह बना ली। हालांकि कांग्रेस की शब्दावली इन वामपंथी दलों से अलग किस्म की रही है। ये तीनों पार्टियां राष्ट्रीय स्तर पर सहयोगी हैं, पर केरल में सीपीएम और सीपीआई सत्तारूढ़ एलडीएफ का हिस्सा हैं, जबकि कांग्रेस विपक्षी यूडीएफ का नेतृत्व कर रही है।

कांग्रेसी प्रतिक्रिया

कांग्रेस अब 2026 में केरल में सीपीएम को सत्ता से बेदखल करने की कोशिश करेगी। उसने सीपीएम के इस रुख की तीखी आलोचना करते हुए कहा, सीपीएम का मतलब सचमुच व्यापार है! केरल कांग्रेस ने एक्स न्यूज चैनल पर लिखा, यह पार्टी, जिसे भाजपा के साथ गुप्त लेन-देन के कारण केरल में कम्युनिस्ट जनता पार्टी (सीजेपी) कहा जाता है, अपने अपमानजनक सिद्धांत के साथ भाजपा के फासीवादी शासन को सफेदपोश करके आग से खेल रही है कि भाजपा फासीवादी नहीं है।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता रमेश चेन्नीथला ने कहा कि सीपीआई(एम) का नोट अप्रैल 2026 में होने वाले राज्य विधानसभा चुनावों में भाजपा समर्थकों के वोट हासिल करने की पार्टी की रणनीति का हिस्सा है। उन्होंने आरोप लगाया, 2021 के चुनावों में, माकपा ने भाजपा के वोटों के साथ केरल में सत्ता बरकरार रखी थी। यह संदर्भ कि मोदी शासन फासीवादी या नव-फासीवादी नहीं है, आगामी चुनाव में भाजपा के वोटों को सुरक्षित करने के एजेंडे का हिस्सा है और चौंकाने वाला है। यह माकपा और संघ परिवार के बीच की अंतर्धारा को उजागर करता है। केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने अब तक भाजपा या मोदी की आलोचना नहीं की है।

इसमें कहा गया है, जो लोग सीपीएम पर धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को कायम रखने के लिए भरोसा करते थे, उन्हें 'वामपंथी' समझकर, वे इस नए सिद्धांत से निराश होंगे, जिसे उन्होंने पार्टी लाइन के रूप में उच्चतम स्तर से आगे बढ़ाया है। यह, पिछले विधानसभा, लोकसभा और उपचुनावों में अन्य दक्षिणपंथी सांप्रदायिक बदलावों के साथ, सीपीएम के अंत का संकेत है और देश में बड़े विपक्ष के बीच उनकी जगह लगभग समाप्त हो गई है। केरल विधानसभा में विपक्ष के नेता वीडी सतीशन ने आरोप लगाया कि नया दस्तावेज सीपीएम और भाजपा के बीच ‘गुप्त संबंध’ को दर्शाता है।

सीपीएम की सफाई

सीपीएम के मसौदा प्रस्ताव में कहा गया है, ‘हम यह नहीं कह रहे हैं कि मोदी सरकार फासीवादी या नव-फासीवादी सरकार है। न हम भारतीय राज्य को नव-फासीवादी राज्य के रूप में चित्रित कर रहे हैं। हम इस बात पर जोर दे रहे हैं कि भाजपा के, जो आरएसएस की राजनीतिक शाखा है के, ग्यारह वर्षों के लगातार शासन के बाद, राजनीतिक शक्ति का समेकन हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप 'नव-फासीवादी विशेषताओं' का प्रकटीकरण हुआ है।’

सीपीएम की केंद्रीय समिति के सदस्य एके बालन ने कहा, हमारे आकलन में कभी भी पार्टी ने भाजपा सरकार को फासीवादी शासन नहीं कहा। हमने कभी नहीं कहा कि फासीवाद आ गया है। एक बार जब फासीवाद हमारे देश में पहुँच जाएगा, तो राजनीतिक ढाँचा बदल जाएगा।’ उन्होंने अन्य वामपंथी दलों से तुलना करते हुए कहा, सीपीआई और सीपीआई (एमएल) का मानना है कि फासीवाद आ गया है।

सीपीएम ने कहा कि हम शास्त्रीय फासीवाद, जो अंतर-साम्राज्यवादी युग के दौरान उभरा, और नव-फासीवाद, जो नव-उदारवाद के भीतर संकट का एक उत्पाद है, के बीच अंतर करते हैं। नव-फासीवाद में लोकतांत्रिक ढाँचे के भीतर सत्तावादी प्रवृत्तियाँ होती हैं, जबकि शास्त्रीय फासीवाद चुनावी प्रणालियों को पूरी तरह से खारिज कर देता है।

फासीवाद क्या है?

आइए एक नज़र इस विचार की पृष्ठभूमि पर डालें। फासीवाद, एक राजनीतिक विचार और जनांदोलन है, जिसने 1919 और 1945 के बीच यूरोप के कई हिस्सों पर दबदबा कायम किया था। इस विचार का विस्तार अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, जापान, लैटिन अमेरिका और पश्चिम एशिया तक हुआ। पहले फासीवादी नेता, इटली के बेनिटो मुसोलिनी ने अपनी पार्टी का नाम लैटिन शब्द फासेस से लिया, जो कुल्हाड़े की शक्ल का दंड था। उसे प्राचीन रोम में दंडात्मक अधिकार का प्रतीक माना जाता था। दुनियाभर की फासीवादी पार्टियाँ और आंदोलन एक-दूसरे से काफी फर्क थे, फिर भी उनमें कई समानताएँ थीं। मसलन उग्र राष्ट्रवाद, साम्यवाद-विरोध और संसद-विरोध और ‘वोक्सगेमिनशाफ्ट-समुदाय’ बनाने की कामना, जिसमें लोगों के व्यक्तिगत हित, राष्ट्रीय-हितों के अधीन हों। 

द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत में , प्रमुख यूरोपीय फासीवादी दल टूट गए। हालांकि कुछ यूरोपीय ‘नवफासीवादी’ समूहों ने बड़े पैमाने पर अनुयायियों को आकर्षित किया, विशेष रूप से इटली और फ्रांस में , लेकिन उनमें से कोई भी दोनों विश्वयुद्धों के बीच के काल के प्रमुख फासीवादी दलों जितना प्रभावशाली नहीं।

राष्ट्रीय फासीवाद

1922 और 1945 के बीच कई देशों में फासीवादी पार्टियाँ और आंदोलन सत्ता में आए। इटली में नेशनल फासिस्ट पार्टी, जिसका नेतृत्व मुसोलिनी ने किया,  नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी या नाजी पार्टी, जिसका नेतृत्व एडॉल्फ हिटलर ने किया और जो उसके राष्ट्रीय समाजवाद का प्रतिनिधित्व करती थी। इनके अलावा ऑस्ट्रिया में एंजेलबार्ट डॉल्फस नीत फादरलैंड फ्रंट, पुर्तगाल में एंतोनियो डी ओलिवेरा सालाज़ार की नेशनल यूनियन, ग्रीस में आयोनिस मेटाक्सास की पार्टी इलेफ्टेरोफ्रोनोई, क्रोआसिया में एंते पावेलिच के नेतृत्व में उस्तासा ; नॉर्वे में नेशनल यूनियन, जो केवल सप्ताह तक सत्ता में भी रहा। 


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