Friday, March 27, 2020

‘सोशल डिस्टेंसिंग’ यानी हमारी परीक्षा की घड़ी


कोरोना वायरस के बढ़ते खतरे के कारण देश में लॉकडाउन के साथ लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की सलाह भी दी गई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि ये नियम मुझपर भी लागू होते हैं. बुधवार को प्रधानमंत्री आवास पर बुलाई गई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में सभी मंत्री करीब एक-एक मीटर की दूरी पर बैठे. विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा निर्देशों के अनुसार सोशल डिस्टेंसिंग यानी रोजमर्रा के कार्य-व्यवहार में हम एक-दूसरे से कम से कम एक मीटर या तीन फुट की दूसरी बनाकर रखें.
कैबिनेट बैठक के अलावा गुजरात की कुछ दुकानों की तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर वायरल हुईं हैं, जिनमें दुकानदारों ने एक-एक मीटर की दूरी पर गोले बना दिए हैं. ग्राहकों से कहा गया है कि वे उनके भीतर खड़े रहें और जब उनसे आगे वाला बढ़े, तो उसकी जगह ले लें. हालांकि करीब एक अरब 30 करोड़ लोगों के देश में इस किस्म के अनुशासन को स्थापित कर पाना आसान नहीं है, पर जब उन्हें लगेगा कि जान पर बन आई है, तो वे इसे स्वीकार भी करेंगे.  

कोरोना वायरस आया है और खत्म भी होगा, पर वह हमें बेहतर इनसान बनने के कुछ सबक भी सिखा जाएगा. सबसे बड़ा सबक है मनुष्य के रूप में एक-दूसरे से सहयोग करना. आपका जीवन दूसरे के जीवन के लिए भी जरूरी है और दूसरे का आपके लिए. इस बात को साबित करने के लिए ऐसे मौके महत्वपूर्ण होते हैं. हम स्वार्थी भी हैं. जब भी मौका लगता है, हम लाइन तोड़कर अपना काम पहले कराना चाहते हैं. प्रधानमंत्री लॉकडाउन की घोषणा कर ही रहे थे कि लोग डिपार्टमेंटल स्टोरों में पहुँच गए और तमाम जरूरी और दैर-जरूरी चीजों को खरीद ले गए. यह नासमझी है.  
सोशल डिस्टेंसिंग ही नहीं सामाजिक सहयोग से जुड़े दूसरे जरूरी पाठ स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा होने चाहिए. आपने अक्सर देखा होगा, जब चौराहों पर ट्रैफिक लाइट खराब हो जाती है, तब सारी गाड़ियाँ जल्दबाजी के चक्कर में जाम कर देती हैं. समझदारी से यदि वे एक-एक करके आगे बढ़ें और दूसरों को भी रास्ता दें, तो दिक्कतें पैदा नहीं हों, पर हम जल्दी के फेर में अपने ही काम बिगाड़ लेते हैं. कोविड-19 शायद हमें सामाजिक सहयोग के कुछ जरूरी पाठ पढ़ाने आया है.
सोशल डिस्टेंसिंग नया शब्द नहीं है. करीब सौ साल पहले जब पहला विश्व युद्ध समाप्त हो रहा था, दुनिया को इसी तरह की एक भयानक बीमारी ने घेरा था. स्पेनिश फ्लूनाम की वह बीमारी इसी तरह के संक्रमण से फैली थी. इसमें दुनियाभर के करीब पाँच से दस करोड़ लोग मरे थे. इतिहास की वह सबसे बड़ी महामारी थी. बहरहाल सितम्बर 1918 की बात है. अमेरिका में लिबर्टी बॉण्ड नाम से एक योजना चलाई जा रही थी, जिसका उद्देश्य था यूरोप के पुनर्निर्माण के लिए जनता से धन एकत्र करना। इस बॉण्ड का प्रचार करने के लिए अलग-अलग शहरों में परेड की जा रही थीं.
उन्हीं दिनों खबरें थीं कि फिलाडेल्फ़िया, पेंसिल्वेनिया में 600 सैनिक फ्लू के शिकार हो गए हैं. बावजूद इसके शहर के नेतृत्व ने परेड जारी रखने का फैसला किया. दूसरी तरफ सेंट लुई, मिज़ूरी शहर ने परेड रद्द कर दी. इसके एक महीने बाद फिलाडेल्फ़िया में 10,000 मौतें हो चुकी थीं, जबकि सेंट लुई में मरने वालों की तादाद 700 भी नहीं थी. इस परिघटना ने सोशल डिस्टेंसिंग के महत्व को स्थापित किया.
जब यह स्पष्ट है कि कोई बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के बीच विषाणु के संक्रमण से पैदा हो रही है, तब सबसे जरूरी काम है कि दोनों व्यक्तियों के बीच दूरी पैदा की जाए. अमेरिका का सन 1918 का अनुभव था कि जिस शहर ने सार्वजनिक समारोहों, रंगमंचों, स्कूलों, गिरजाघरों को बंद किया, वहाँ बीमारी का असर कम हुआ. उस घटना के सौ साल बाद आज दुनिया की आबादी उस समय की आबादी से करीब छह सौ करोड़ ज्यादा है. इतना ही नहीं आज परिवहन के साधन कहीं ज्यादा हैं. उस वक्त रेलगाड़ी ही ढंग से नहीं थी, हवाई परिवहन तो होता ही नहीं था. एक शहर से दूसरे तक बीमारी का पहुँचना इतना आसान नहीं थी, फिर भी दुनिया की चौथाई से लेकर आधी आबादी को मौत का मुँह देखना पड़ा.
इसकी वजह यह थी कि लोग सोशल डिस्टेंसिंग का महत्व नहीं समझते थे. चिकित्सा विज्ञान भी इतना विकसित नहीं था. संक्रामक बीमारी का गणित यह है कि यदि एक बीमार व्यक्ति से संक्रमण दो व्यक्तियों तक पहुँचता है, तो चौबीस घंटे में केवल एक व्यक्ति का संक्रमण सैकड़ों व्यक्तियों तक पहुँच जाएगा. सैकड़ों का संक्रमण हजारों और लाखों में. स्पेनिश फ्लू ने दुनिया को न केवल बीमारियों के प्रति संसार को सचेत किया, साथ ही इस बात को स्थापित किया कि यह लड़ाई मिलकर ही लड़ी जा सकती है. यह मनुष्य मात्र की लड़ाई है, एक या दो इनसानों की नहीं.
भारत सरकार ने लॉकडाउन का जो फैसला किया है, वह दुनिया के इतिहास का अपने ढंग का सबसे बड़ा फैसला है. यदि हम इसमें विजेता बनकर निकले, तो यह बात इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखी जाएगी. हम इटली के उदाहरण को देखें. वहाँ के अस्पतालों में हमारे देश के मुकाबले प्रति व्यक्ति आईसीयू और आइसोलेशन बिस्तरों की संख्या कहीं ज्यादा है. फिर भी बीमारी पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है. बेशक सोशल डिस्टेंसिंग ही सब कुछ नहीं है, पर वह बहुत कुछ है. यह बात अब साबित होगी. हमें इसे सफल बनाना चाहिए, क्योंकि यह हम सब की परीक्षा की घड़ी है. दो से तीन हफ्ते तक यदि हम संक्रमण को बढ़ने से रोक सकें, तो वायरस का प्रभाव अपने आप कम हो जाएगा. चीन का अनुभव यही कहता है और हम इस बात को साबित करने वाले हैं.




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