Thursday, December 31, 2020

नेपाल का संकट क्या चीन के सीधे हस्तक्षेप से सुलझ पाएगा?

 


नेपाल में गत 20 दिसंबर को संसद हो जाने के बाद से असमंजस की स्थिति है। पिछले हफ्ते ऐसा लगा था कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी किसी प्रकार का हस्तक्षेप कर रही है। वहाँ से पार्टी की एक उच्च स्तरीय टीम नेपाल का दौरा करके वापस चली गई है, पर स्थितियाँ जस की तस हैं। चीनी प्रतिनिधिमंडल ने जानने का प्रयास किया कि क्या संसद की पुनर्स्थापना संभव है। यदि संभव नहीं है, तो क्या चुनाव उन तारीखों में हो सकेंगे, जिनकी घोषणा की गई है। बुधवार 30 दिसंबर को यह टीम वापस लौट गई।

सवाल है कि क्या इस राजनीतिक संकट का समाधान चीन कर पाएगा? इस बीच खबर है कि नेपाली विदेशमंत्री प्रदीप ग्यावली भारत और नेपाल के बीच बने संयुक्त आयोग की बैठक में भाग लेने के लिए जनवरी में भारत आएंगे। अभी इसकी तारीख तय नहीं है। यह यात्रा औपचारिक है, पर संभव है कि इस दौरान कुछ महत्वपूर्ण बातें हों।

Wednesday, December 30, 2020

औद्योगिक विकास में मददगार होगा डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर

 


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार 29 दिसंबर को ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (ईडीएफसी) राष्ट्र को समर्पित किया। देश के तेज औद्योगिक विकास के लिए यह महत्वपूर्ण परिघटना है। इस मौके पर पीएम ने 351 किलोमीटर लंबे रेल खंड न्यू खुर्जा से न्यू भाऊपुर डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का वर्चुअल उद्घाटन किया। उन्होंने प्रयागराज के सूबेदारगंज में बनाए गए ईडीएफसी के ऑपरेशन कंट्रोल सेंटर का भी उद्घाटन किया। यह कंट्रोल रूम अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है। यहाँ से पूरे कॉरिडोर की मॉनिटरिंग की जा सकेगी देश में ऐसा पहली बार होगा जब कंट्रोल रूम में लगे स्क्रीन पर ट्रेन लाइव दिखाई देगी

जब आप दिल्ली से कानपुर की तरफ ट्रेन से जाएं, तो आपको अपनी लाइन के साथ चलती कुछ और रेलवे लाइनें दिखाई पड़ेंगी। यह ईडीएफसी है। देश के तेज आर्थिक विकास के लिए कनेक्टिविटी की भूमिका है। हाईवे, रेलवे, एयर वे, वॉटर वे, आईवे की जरूरत है। प्रधानमंत्री के इस मौके पर दिए गए भाषण के राजनीतिक निहितार्थ पर ध्यान न दे, तो इतना साफ है कि जैसा हमारी ज्यादातर योजनाओं के साथ हुआ है, यह कार्यक्रम भी समय से पीछे चला गया है। मोदी का कहना है कि साल 2006 में इस प्रोजेक्ट को मंजूरी मिली, उसके बाद यह सिर्फ कागजों और फाइलों में बनता रहा। केंद्र को राज्यों के साथ जिस गंभीरता से बात करनी चाहिए थी वह किया ही नहीं। साल 2014 तक एक किमी ट्रैक भी नहीं बिछाया गया। 2014 में हमारी सरकार बनने के बाद इस प्रोजेक्ट की फाइलों को फिर खंगाला गया, अधिकारियों को नए सिरे से आगे बढ़ने के लिए कहा गया। इसका बजट 11 गुना यानी 45 हजार करोड़ रुपये से अधिक बढ़ गया।

Tuesday, December 29, 2020

जीवन-शैली को बदल गया यह साल


इस साल मार्च में जब पहली बार लॉकडाउन घोषित किया गया, तब बहुत से लोगों को पहली नजर में वह पिकनिक जैसा लगा था। काफी लोगों की पहली प्रतिक्रिया थी, आओ घर में बैठकर घर का कुछ खाएं। काफी लोगों ने लॉकडाउन का आनंद लिया। फेसबुक पर रेसिपी शेयर की जाने लगीं। पर जैसे ही बीमारी बढ़ने और मौत की खबरें आने लगीं, लोगों के मन में दहशत ने धीरे-धीरे प्रवेश करना शुरू दिया। मॉल, रेस्त्रां और सिनेमाघरों के बंद होने से नौजवानों की पीढ़ी को धक्का लगा। अचानक कई तरह की सेवाएं खत्म हो गईं। सिर और दाढ़ी के बाल बढ़ने लगे। ब्यूटी पार्लर बंद हो गए। ज़ोमैटो और स्विगी की सेवाएं बंद। पीत्ज़ा और बर्गर की सप्लाई बंद। अस्पतालों में सिवा कोरोना के हर तरह का इलाज ठप। 

कोविड-19 ने हमारे जीवन और समाज को कितने तरीके से बदला इसका पता बरसों बाद लगेगा। भावनात्मक बदलावों को मुखर होकर सामने आने में भी समय लगता है। इस दौरान छोटे बच्चों का जो भावनात्मक विकास हुआ है, उसकी अभिव्यक्ति भी एक पीढ़ी बाद पता लगेगी। इतना समझ में आता है कि जीवन और समाज में किसी एक वैश्विक घटना का इतना गहरा असर शायद इसके पहले कभी नहीं हुआ होगा। पहले और दूसरे विश्व युद्ध का भी नहीं। इसका असर जीवन-शैली, रहन-सहन और मनोभावों के अलावा उद्योग-व्यापार और तकनीक पर भी पड़ा है।

ठहर गई जिंदगी

विमान सेवाएं शुरू होने के बाद दुनिया के इतिहास में पहला मौका था, जब सारी दुनिया की सेवाएं एकबारगी बंद हो गईं। रेलगाड़ियाँ, मोटरगाड़ियाँ थम गईं। गोष्ठियाँ, सभाएं, समारोह, नाटक, सिनेमा सब बंद। खेल के मैदानों में सन्नाटा छा गया। विश्व कप क्रिकेट स्थगित, इस साल जापान में जो ओलिंपिक खेल होने वाले थे, टल गए।

Monday, December 28, 2020

‘सुंदर सपनों’ को तोड़ने वाला साल

आप पूछें कि इस गुजरते साल 2020 को हम किस तरह याद रखें, तो पहला जवाब है महामारी का साल।’ महामारी न होती, तब भी इसे यादगार साल होना था। ‘इंडिया 2020: ए विज़न फॉर द न्यू मिलेनियम’ डॉ एपीजे कलाम की किताब है, जो 1998 में लिखी गई थी। तब वे राष्ट्रपति बने नहीं थे, पर उन्होंने 2020 के भारत का सपना देखा था। इस साल की शुरुआत उस सपने के साथ हुई थी और अंत ‘स्वप्न-भंग’ से हुआ। सपनों पर पानी फेरने वाला साल।

गिलास पूरा खाली नहीं है। यह हमारी परीक्षा का साल था। फिर भी एक मुश्किल दौर को हमने जीता है। साल की शुरूआत आंदोलनों से हुई और समापन किसान आंदोलन के साथ हो रहा है। देश की राजधानी में जामिया मिलिया विवि और शाहीनबाग के नाम से जो आंदोलन शुरू हुआ था, उसकी छाया विधानसभा चुनाव की तैयारी में लगे दिल्ली शहर पर पड़ी। दिल्ली को सांप्रदायिक दंगे ने घेर लिया। उत्तर प्रदेश के शहरों में भी हिंसा हुई।

नमस्ते ट्रंप

फरवरी में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की दिल्ली यात्रा के दौरान दिल्ली में फसाद की बुनियाद पड़ गई थी। इस हिंसा के पहले दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विवि परिसर में हिंसा हुई, जिसकी प्रतिक्रिया में देश के अनेक शिक्षा-संस्थानों में आंदोलनों का दौर बना रहा। कोरोना का हमला न होता, तो शायद यह साल ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ की बहस का विषय बनता। जलते भारत को लेकर तमाम अंदेशे हैं और उम्मीदें भी, जो ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ हैं।

Sunday, December 27, 2020

खेतों में इतनी मायूसी क्यों?


किसान-आंदोलन जिस करवट भी बैठे, भारत में खेती से जुड़े बुनियादी सवाल अपनी जगह बने रहेंगे। विडंबना है कि महामारी से पीड़ित इस वित्तीय वर्ष में हमारी जीडीपी लगातार दो तिमाहियों में संकुचित होने के बावजूद केवल खेती में संवृद्धि देखी गई है। इस संवृद्धि के कारण ट्रैक्टर और खेती से जुड़ी मशीनरी के उत्पादन में भी सुधार हुआ है। अनाज में आत्म निर्भरता बनाए रखने के लिए हमें करीब दो प्रतिशत की संवृद्धि चाहिए, जिससे बेहतर ही हम कर पा रहे हैं, फिर भी हम खेती को लेकर परेशान हैं।

खेती से जुड़े हमारे सवाल केवल अनाज की सरकारी खरीद, उसके बाजार और खेती पर मिलने वाली सब्सिडी तक सीमित नहीं हैं। समस्या केवल किसान की नहीं है, बल्कि गाँव और कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था की है। गाँव, गरीब और किसान को लेकर जो बहस राजनीति और मीडिया में होनी चाहिए थी वह पीछे चली गई है। भारत को इस बात का श्रेय जाता है कि उसने अन्न के लिहाज से एक अभाव-पीड़ित देश की छवि को दूर करके अन्न-सम्पन्न देश की छवि बनाई है, फिर भी हमारा किसान परेशान है। हमारी अन्न उत्पादकता दुनिया के विकसित देशों के मुकाबले कम है। ग्रामीण शिक्षा, संचार, परिवहन और सार्वजनिक स्वास्थ्य के मानकों पर हम अपेक्षित स्तर को हासिल करने में नाकामयाब रहे हैं।