Tuesday, April 23, 2019

दिल्ली में ज़ाहिर हुआ बीजेपी-विरोधी मोर्चे का कठोर सच

महीनों की बातचीत और गहमागहमी के बाद भी दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच समझौता नहीं हुआ और मुकाबला तिकोना होकर रह गया. यह स्थिति दोनों पार्टियों के खिलाफ और बीजेपी के पक्ष में है. इस तरह से बीजेपी-विरोधी मोर्चे के अंतर्विरोधों का निर्मम सत्य दिल्ली में खुलकर सामने आया है. जब आप दिल्ली में बीजेपी के खिलाफ एक नहीं हो सकते, तो शेष देश में क्या होंगे? 

दिल्ली का प्रतीकात्मक महत्व है. यहाँ सीधा मुकाबला होने पर राष्ट्रीय राजनीति में एक संदेश जाता, जिसकी अलग बात होती. दिल्ली के परिणामों का प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति में देखने को मिलता और अब मिलेगा.

वह कौन सी जटिल गुत्थी थी, जो दिल्ली में सुलझ नहीं पाई? आखिर क्या बात थी कि दोनों का गठबंधन नहीं हुआ? कांग्रेस कुछ पीछे हटती या ‘आप’ कुछ छूट देती, तो क्या समझौता सम्भव नहीं था?

अधकचरी समझ

लगता है कि दोनों तरफ परिपक्वता का अभाव है. पिछले कई महीनों से दोनों तरफ से ट्विटर-संवाद चल रहा था. कभी इसका ‘यू टर्न’ कभी उसका. कभी इसके दरवाजे खुले रहते, कभी उसके बंद हो जाते. पता नहीं आपस में बैठकर बातें करते भी थे या नहीं. दोनों तरफ से क्या असमंजस थे कि ऐन नामांकन तक भ्रम बना रहा? लगता है कि किसी निश्चय पर पहुँचे बगैर बातें हो रहीं थीं.

यूपी में सपा-बसपा और बिहार में बीजेपी-जेडीयू तथा महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना के गठबंधनों पर गौर करें, तो पाएंगे कि इन पार्टियों ने समय रहते न केवल गठबंधन किए, बल्कि किसी न किसी ने एक कदम पीछे खींचा. बीजेपी ने बिहार में अपनी जीती सीटों को छोड़ा, तो यह उसकी समझदारी थी. राजनीति में देश-काल के अनुसार ही फैसले होते हैं.



दोनों तरफ से अनिर्णय

दिल्ली में वोटर को अभी तक यह बात समझ में नहीं आई कि मसला क्या था? एक साल पहले तक आम आदमी पार्टी दिल्ली में गठबंधन चाहती थी, कांग्रेस की दिलचस्पी नहीं थी. अब लग रहा था कि कांग्रेस चाहती थी, वह भी सिर्फ दिल्ली में, पर ‘आप’ की दिलचस्पी नहीं थी.

अजय माकन के रहते कुछ और बात थी, उनकी जगह शीला दीक्षित के आने के बाद लगा कि नेतृत्व नहीं चाहता, कार्यकर्ता चाहता है. फिर मामला हरियाणा और पंजाब की सीटों का उठा. अंत में राहुल गांधी का ट्वीट आया कि हम दिल्ली में गठबंधन को तैयार हैं. तब तक ‘आप’ के घोड़े मुँह मोड़ चुके थे.

किसे, क्या मिलेगा?

बहरहाल अब दो-तीन सवाल हैं. एक, चुनाव परिणाम क्या होगा? गठबंधन न हो पाने का ज्यादा नुकसान किसे होगा? और कुछ महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में क्या होगा? गठबंधन होगा या नहीं? उसके पहले लोकसभा चुनाव परिणामों से जुड़ी कुछ पहेलियाँ भी हैं. जिनके जवाब 23 मई के बाद मिलेंगे.

गठबंधन होने पर बीजेपी को नुकसान होता, जो अब काफी हद तक नहीं होगा. यह भी सच है कि गठबंधन की सूरत में कांग्रेस और ‘आप’ के सारे वोटर एक जगह नहीं आ जाते. ‘आप’ के काफी समर्थक कांग्रेस विरोधी हैं और कांग्रेस के बहुत से वोटर ‘आप’ विरोधी. कुछ न कुछ वोट तब भी बिखरते. पर एक राजनीतिक सूरत बनती, जो भविष्य की बुनियाद डालती.


  

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल गुरुवार (25-04-2019) को "एक दिमाग करोड़ों लगाम" (चर्चा अंक-3316) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
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    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 90वां जन्म दिवस - 'शम्मी आंटी' जी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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