Sunday, September 17, 2017

राहुल का पुनरागमन

राहुल गांधी ने अपने पुनरागमन की सूचना अमे‍रिका के बर्कले विश्वविद्यालय से दी है। पुनरागमन इसलिए कि सन 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के वक्त उन्होंने भारतीय राजनीति में पूरी छलांग लगाई थी। पर उस चुनाव में वे विफल रहे। इसके बाद जनवरी 2013 में पार्टी के जयपुर चिंतन शिविर में उन्हें एक तरह से पार्टी की बागडोर पूरी तरह सौंप दी गई, जिसकी पूर्णाहुति 2014 की ऐतिहासिक पराजय में हुई। उसके बाद से उनका मेक-ओवर चल रहा है।

राहुल ने जिस मौके पर पार्टी के नेतृत्व की जिम्मेदारी हाथ में लेने का निश्चय किया है, वह बहुत अच्छा नहीं है। उनकी पहचान चुनाव जिताऊ नेता की नहीं है। हालांकि उन्होंने टेक्स्ट बुक स्टाइल में राजनीति की शुरुआत की थी, पर उनका पहला राउंड पूरी तरह विफल रहा है। अगले दौर में वे किस तरह सामने आएंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है।

ज्यादा बड़े सवाल दो हैं। पहला यह कि कांग्रेस क्या विपक्षी दलों के महागठबंधन के रूप में सामने आएगी या अकेले चुनाव लड़ेगी? दूसरा यह कि यदि महागठबंधन बना तो क्या राहुल गांधी उसका नेतृत्व करेंगे? क्या महागठबंधन उन्हें प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में पेश करेगा?

इन दो सवालों के पहले देखना होगा कि क्या वे पार्टी की पूर्ण अध्यक्षता को स्वीकार करते हैं या नहीं। राहुल ने बर्कले में कुछ बातें ऐसी कहीं हैं, जिनसे उनकी व्यक्तिगत योजना और पार्टी के भविष्य के कार्यक्रम पर रोशनी पड़ती है। उन्होंने कहा, मैं 2019 के आम चुनावों में पार्टी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के लिए पूरी तरह से तैयार हूँ। पहली बार उन्होंने सार्वजनिक रूप से ऐसी बात कही है। उन्होंने कहा, मेरी तरफ से इसे सार्वजनिक करना उचित नहीं है, क्योंकि पहले पार्टी को इसे मंजूर करना है।

व्यावहारिक सच यह है कि राहुल को केवल इशारा करना है। पार्टी को इस विषय में कभी संदेह नहीं रहा। चूंकि वे उस मानसिक भँवर से बाहर निकल आए हैं, जिसने उन्हें रोक रखा था, इसलिए पार्टी को फैसला करने में देर नहीं लगेगी। पार्टी अध्यक्ष का चुनाव 15 अक्टूबर तक होना है। सब सही रहा तो उन्हें अध्यक्ष बन जाना चाहिए। यों भी सोनिया गांधी के अध्यक्ष रहते उनका उपाध्यक्ष पद भी पार्टी प्रमुख का ही पद है।

औपचारिक रूप से अध्यक्ष बनने के प्रतीकात्मक मायने हैं। यों पार्टी कार्यसमिति नवंबर 2016 की बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास करके उनसे पार्टी की कमान संभालने का अनुरोध कर चुकी है। उस समय वरिष्ठ पार्टी नेता एके एंटनी ने कहा था कि राहुल के लिए कांग्रेस अध्यक्ष बनने का यह सही समय है। लंबे समय तक पार्टी और देश को असमंजस में रखना न तो उनके हित में है और न पार्टी के। गर्द-गुबार जितनी जल्दी साफ हो उतना अच्छा।

पार्टी का बोझ औपचारिक रूप से स्वीकार करने के बाद राहुल को अपने संगठन पर भी ध्यान देना होगा। ज्यादातर राज्यों में संगठन ध्वस्तप्राय है। पुराने और नए नेताओं के बीच खींचतान है। पिछले चार महीनों में पार्टी और अनुषंगी संगठनों के महत्वपूर्ण पदों पर राहुल गांधी के विश्वस्त सहयोगी आते जा रहे हैं। सबसे नया फैसला है कांग्रेस महासचिव (मध्य प्रदेश प्रभार) पद पर दीपक बाबरिया की नियुक्ति का। दीपक बाबरिया को राज्य में होने वाले चुनाव के पहले यह जिम्मेदारी देकर पार्टी ने स्पष्ट किया है कि वह पुराने की जगह नए नेतृत्व को कमान देना चाहती है। इस साल मई में कर्नाटक का प्रभार दिग्विजय सिंह से लेकर अपेक्षाकृत जूनियर केसी वेणुगोपाल को सौंपा गया।

पिछले दिनों अविनाश पांडे को राजस्थान का, आरपीएन सिंह को झारखंड का और पीएल पुनिया को छत्तीसगढ़ का इंचार्ज बनाया गया है। ज्यादातर जगहों पर बुजुर्ग नेताओं को किनारे किया गया है। हाल में सुष्मिता देव को ऑल इंडिया महिला कांग्रेस का नया अध्यक्ष बनाया है। इससे पहले इस पद पर शोभा ओझा थीं। सुष्मिता देव राहुल गांधी के करीबी मानी जाती हैं।

फेरबदल आसान नहीं होता, क्योंकि संगठन के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे सीनियर नेताओं के हितों पर भी ठेस लगती है। उसकी प्रतिक्रिया होती है। जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहाँ के पार्टी पदाधिकारियों का अनुरोध किया है कि उनके यहाँ चुनाव टाल दें, क्योंकि चुनाव से बदमज़गी फैलती है। यदि राहुल अपने साथ सफलता लेकर आए तो बदलाव कारगर हो जाएंगे। पर सफलता नहीं मिली तो इनका उल्टा असर भी हो सकता है।

सन 2019 के चुनाव में अब तकरीबन डेढ़ साल का समय बचा है। उसके पहले सात विधानसभाओं के चुनाव होंगे। ये हैं हिमाचल, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिजोरम। इन सभी चुनावों में कांग्रेस मुख्य प्रतिस्पर्धी है और कुछ जगहों पर उसकी बेहतर संभावना भी है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में एंटी इनकंबैंसी के कारण बीजेपी के सामने भी चुनौती है। सवाल है कि कांग्रेस इसका लाभ ले पाएगी या नहीं।

राहुल गांधी का उत्साह इन सात चुनावों में कांग्रेस के लिए मददगार हुआ तो ठीक, और मददगार नहीं हुआ तो उनके लिए संकट भी है। राजनीति के जोखिम से वे बचकर चल भी नहीं सकते। जोखिम मोदी सरकार के सामने भी है। उसके साढ़े तीन साल पूरे हो चुके हैं। इस वक्त अर्थ-व्यवस्था में सुस्ती है और खाद्य वस्तुओं की महंगाई बढ़ रही है। सरकार का सारा ध्यान इंफ्रास्ट्रक्चर पर है, जो आर्थिक संवृद्धि और रोजगार दोनों के लिहाज से जरूरी है।

देखना यह भी है कि राहुल गांधी की राजनीति का केंद्रीय बिंदु क्या होगा। वे बीजेपी की सामाजिक राजनीति को निशाना बनाएंगे या युवा वर्ग की उम्मीदें जगाएंगे? सन 2002 के बाद से कांग्रेस ने मोदी को निशाना बनाना शुरू किया है। उसका परिणाम सामने है। कांग्रेस की राजनीतिक दिशा पर अब ध्यान देने की जरूरत होगी।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने हाल में कहा है कि कांग्रेस की वापसी अगले साल होने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव से होगी। उनका यह भी कहना है कि देश की जनता राहुल गांधी को अपने नेता के रूप में स्वीकार करती है। संभव है कि कर्नाटक में कांग्रेस की वापसी हो जाए, पर ऐसा सिद्धरमैया सरकार की प्रशासनिक कुशलता के कारण नहीं होगा, बल्कि कर्नाटक में बीजेपी की संगठनात्मक विफलता के कारण होगा। इसके विपरीत यदि मध्य प्रदेश और राजस्थान वगैरह में मौका मिलने के बावजूद कांग्रेस नहीं जीती तो इसका दोष पार्टी की संगठनात्मक कमजोरी को जाएगा।

2 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जन्म दिवस : अनंत पई और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  2. समझ नहीं आया सिद्धरमैया कर्नाटक के चुनाव से विजय की शुरुआत क्यों देखते हैं ? राहुल बाबा के अध्यक्ष बन ने के बाद व कर्नाटक के चुनाव से पहले और भी कई चुनाव होने हैं , उनसे विजय व उनकी छवि को क्यों नहीं आंकना चाहते ?मुख्य परीक्षा तो गुजरात व हिमाचल के चुनावों में ही होगी साथ ही कई लोक सभा व विधान सभाओं की सीटों के उप चुनाव भी होने हैं, उन से क्या अंदाज नहीं लग जायेगा /

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