Thursday, December 24, 2015

संसद केवल शोर का मंच नहीं है

संसद के शीत सत्र को पूरी तरह धुला हुआ नहीं मानें तो बहुत उपयोगी भी नहीं कहा जा सकता. पिछले कुछ वर्षों से हमारी संसद राजनीतिक रोष और आक्रोश व्यक्त करने का मंच बनती जा रही है. वह भी जरूरी है, पर वह मूल कर्म नहीं है.  शीत सत्र में पहले दो दिन गम्भीर विमर्श देखने को मिला, जब संविधान दिवस से जुड़ी चर्चा हुई. अच्छी-अच्छी बातें करने के बाद के शेष सत्र अपने ढर्रे पर वापस लौट आया. सत्र के समापन के एक दिन पहले जुवेनाइल जस्टिस विधेयक के पास होने से यह भी स्पष्ट हुआ कि हमारी राजनीति माहौल के अनुसार खुद को बदलती है.

राजनीतिक दलों की दिलचस्पी होमवर्क में नहीं

प्रमोद जोशी


भारतीय संसदImage copyrightAP
संसद का शीत सत्र पूरी तरह नाकाम नहीं रहा. एक अर्थ में मॉनसून सत्र से बेहतर रहा पर उसे सफल कहना सही नहीं होगा. सरकार कुछ महत्वपूर्ण विधेयक पास नहीं करा पाई.
सवाल जीएसटी या ह्विसिल ब्लोवर जैसे क़ानूनों के पास न हो पाने का नहीं है. पूरे संसदीय विमर्श में गिरावट का भी है.
इस सत्र में दोनों सदनों ने संविधान पर पहले दो दिन की चर्चा को पर्याप्त समय दिया. यह चर्चा आदर्शों से भरी थी. उन्हें भुलाने में देर भी नहीं लगी.
संसदीय कर्म की गुणवत्ता केवल विधेयकों को पास करने तक सीमित नहीं होती. प्रश्नोत्तरों और महत्वपूर्ण विषयों पर भी निर्भर करती है.
देश में समस्याओं की कमी नहीं. संसद में उन्हें उठाने के अवसर भी होते हैं, पर राजनीतिक दलों की दिलचस्पी होमवर्क में नहीं है.
तमिलनाडु में भारी बारिश के कारण अचानक बाढ़ की स्थिति पैदा हो गई. उस पर दोनों सदनों में चर्चा हुई. सूखे पर भी हुई.
लोकसभा Image copyrightPTI
महंगाई को 23 मिनट का समय मिला. इन दिनों दिल्ली में प्रदूषण की चर्चा है, पर संसद में कोई खास बात नहीं हुई. विसंगति है कि विधायिका और कार्यपालिका को जो काम करने हैं, वे अदालतों के मार्फ़त हो रहे हैं.
जुवेनाइल जस्टिस विधेयक पास हो गया. इसमें 16 साल से ज़्यादा उम्र के किशोर अपराधी पर जघन्य अपराधों का मुक़दमा चलाने की व्यवस्था है. किशोर अपराध के तमाम सवालों पर बहस बाक़ी है.
कांग्रेस ने लोकसभा में इसका विरोध किया था. अनुमान था कि राज्यसभा उसे प्रवर समिति की सौंप देगी.
इसके पहले शुक्रवार को सर्वदलीय बैठक में जिन छह विधेयकों को पास करने पर सहमति बनी थी उनमें इसका नाम नहीं था, पर मंगलवार को राज्यसभा में इस पर चर्चा हुई और यह आसानी से पास हो गया. कांग्रेस का नज़रिया तेजी से बदल गया.
वजह थी निर्भया मामले से जुड़े किशोर अपराधी की रिहाई के ख़िलाफ़ आंदोलन. यह लोकलुभावन राजनीति है. विमर्श की प्रौढ़ता की निशानी नहीं.

Sunday, December 20, 2015

इतनी तेजी में क्यों हैं केजरीवाल?

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने शुक्रवार को ट्वीट किया कि केंद्र सरकार उन सभी विरोधियों के खिलाफ सीबीआई का इस्तेमाल करने जा रही है जो बीजेपी की बात नहीं मानते। ट्वीट में केजरीवाल ने दावा किया कि यह बात उन्हें एक सीबीआई अधिकारी ने बताई है। प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने इन आरोपों को नकारते हुए कहा, केजरीवाल को सीबीआई के अधिकारी का नाम बताना चाहिए और सबूत देने चाहिए, पर नाम कौन बताता है? यह बात सच हो तब भी यह राजनीतिक बयान है। इसका उद्देश्य मोदी विरोधी राजनीति और वोटों को अपनी तरफ खींचना है।

केजरीवाल धीरे-धीरे विपक्षी एकता की राजनीति की अगली कतार में आ गए हैं। इस प्रक्रिया में एक बात तो यह साफ हो रही है कि केजरीवाल ‘नई राजनीति’ की अपनी परिभाषाओं से बाहर आ चुके हैं। वे अपने अंतर्विरोधों को आने वाले समय में किस तरह सुलझाएंगे, इसे देखना होगा। फिलहाल उनकी अगली परीक्षा पंजाब में है। शायद वे असम की वोट-राजनीति में भी शामिल होने की कोशिश करेंगे।

अपने संरक्षकों की बेरुखी का शिकार नेशनल हेरल्ड

नेशनल हेरल्ड अख़बार को कांग्रेस पार्टी के उत्थान और पतन के साथ जोड़कर भी देखा जाना चाहिए. सन 1938 में जब यह अख़बार शुरू हुआ था देश में 11 प्रांतीय असेम्बलियों के पहली बार हुए चुनावों में से आठ में जीत हासिल करके कांग्रेस ने अपनी धाक जमाई थी. और 2008 में जब यह बंद हुआ कांग्रेस का पराभव शुरू हो चुका था.

अख़बार के मास्टहैड के ठीक नीचे उद्देश्य वाक्य लिखा रहता था, फ्रीडम इज़ इन पेरिल, डिफेंड इट विद ऑल योर माइट-जवाहर लाल नेहरू (आज़ादी खतरे में है, अपनी पूरी ताकत से इसकी रक्षा करो). यह वाक्य एक पोस्टर से उठाया गया था, जिसे सन 1939 में इंदिरा गांधी ने ब्रेंटफोर्ड, मिडिलसेक्स से नेहरू जी को भेजा था. यह ब्रिटिश सरकार का पोस्टर था. नेहरू को यह वाक्य इतना भा गया कि इसे उन्होंने अपने अख़बार के माथे पर चिपका दिया. दुर्भाग्य है कि नेहरू के वारिस तमाम बातें करते रहे, पर वे इस अख़बार और उसके संदेश की रक्षा करने में असफल रहे.

Tuesday, December 15, 2015

ग्लोबल इंडिया की खोज में

प्रमोद जोशी
First Published:06-09-2009 10:38:53 PMLast Updated:06-09-2009 10:39:10 PM
हमारे गाँवों के विकास की निशानी है, बिजली का बल्ब। जिस गाँव में बिजली का लट्टू जल जाय, समझ लो उसका विकास हो गया। पिछले मंगलवार को यूरोपियन यूनियन ने बिजली के इस बल्ब को हमेशा के लिए विदा कर दिया। नागरिक अधिकारवादियों के विरोध के बावजूद इसके इस्तेमाल पर पाबंदी लग गई। उन्नीसवीं सदी की वैज्ञानिक क्रांति के बाद जितने आविष्कार हुए, उनमें शायद यह लट्टू ही अकेला ऐसा था, जिसने तकरीबन अपने मूल रूप में इतनी लम्बी सेवा की।

करीब 120 साल की सेवा के बाद इसके रिटायर होने की एक वजह  थी कि ग्लोबल वार्मिग बढ़ाने में इसका बड़ा हाथ था। इसका उत्तराधिकारी सीएफएल इसकी तुलना में कम बिजली खर्च करता है और चलता भी ज्यादा है। परम्परागत बल्ब की सेवानिवृत्ति के बाद ईयू को आशा है कि करीब डेढ़ करोड़ टन कार्बनडाईऑक्साइड का उत्सजर्न कम होगा। सीएफएल के उत्तराधिकारी के रूप में एलईडी बल्ब भी तैयार हो रहा है। शायद कुछ दिन बाद वही जलता नजर आए। विडंबना है कि जो यूरोप में अवांछित है, वह भी हमें उपलब्ध नहीं।

माल्थस को अंदेशा था कि एक रोज दुनिया में इतनी खाद्य सामग्री नहीं होगी कि बढ़ती आबादी की जरूरत पूरी हो सके। उसके वक्त से ही बहस चली आ रही है कि क्या मानवीय समझ इतनी अच्छी है कि वह आसन्न संकटों का सामना करते हुए समानता, न्याय और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर आधारित खुशहाल समाज बना सके। बहरहाल उन्नीसवीं सदी की वैज्ञानिक क्रांति ने औद्योगीकरण और कृषि क्रांति का रास्ता साफ किया। वह संकट यूरोप का था। उसने ही उसका समाधान खोज। तकनीक और विज्ञान का विकास भी वहीं हुआ। पर आज वैश्वीकरण का दौर है।

वैश्वीकरण सिर्फ पूँजी का नहीं। हर चीज का। ग्लोबल वॉर्मिग का और स्वाइन फ्लू का। आर्थिक मंदी भी वैश्वीकृत है। फर्क इतना है कि हमारे जसे विकासशील देशों की भूमिका बढ़ गई है। पिछले हफ्ते विश्व व्यापार संगठन के वाणिज्य मंत्रियों की अनौपचारिक बैठक दिल्ली में होने का कारण इस बात को रेखांकित करना भी था कि भारत पर कुछ वैश्विक जिम्मेदारियाँ हैं। इस बैठक का औपचारिक अर्थ नवम्बर-दिसम्बर में जेनेवा में होने वाली बैठक के बाद समझ में आएगा। बल्कि सन् 2010 के अंत तक दोहा-चक्र पूरा होने पर पता लगेगा कि हम किधर जा रहे हैं। बहरहाल हमारे कंधों पर दुनिया बदलने का बोझ है, पर हम अभी बिजली के लट्टू के दौर में हैं।

दुनिया की राजनैतिक, व्यापारिक, मानसिक, सांस्कृतिक और सामाजिक सीमाएं खुल रहीं हैं। बीसवीं सदी के आखिरी दशक में जब हमने वैश्वीकरण शब्द का इस्तेमाल शुरू किया तब उसका अर्थ अमेरिकी संस्कृति और जीवन-शैली की वैश्विक स्वीकृति से था। फ्रांसिस फुकुयामा के इतिहास का अंत यहीं पर था। पर तबसे अब तक दो बड़ी घटनाएं हुईं। एक 9/11 और दूसरे वैश्विक मंदी। अल कायदा ने बताया कि आतंक का वैश्वीकरण भी सम्भव है। सम्भावना है कि पूँजी के वैश्विक विस्तार के विरोध में वश्विक जनांदोलन भी खड़ा होगा। पर उससे बड़ा वैश्वीकरण प्रकृति कर रही है। ग्लोबल वॉर्मिग, मौसम में बदलाव, बीमारियां, पीने के पानी और भोजन का संकट पूरी मानवता के प्रश्न हैं। इनके समाधान के लिए हमें अपनी चेतना का लेवल बढ़ाना चाहिए।

सन् 2008 ने बड़े स्तर पर खाद्य संकट देखा। इस संकट के पीछे फसलों के खराब होने के अलावा वैश्विक व्यापार की प्रवृत्तियां भी थीं। एक थी तेल के लिए वनस्पतियों का इस्तेमाल। पिछले साल पेट्रोलियम की कीमतों में जबर्दस्त इजाफे के साथ-साथ इथेनॉल जैसे एग्रोफ्यूल की ओर उत्पादकों का ध्यान गया। मक्का, सोया और पामऑयल का इस्तेमाल बायोफ्यूल के लिए होने लगा है। दूसरी ओर विश्व में मांसाहार बढ़ रहा है। अमेरिका के किसान सुअरों को खिलाने के लिए मक्का उगा रहे हैं। व्यापारिक कारण मानवीय कारणों पर हावी हो रहे हैं। खेती का कॉरपोरेटाइजेशन उत्पादकता को बढ़ाने में मददगार हो तो हर्ज नहीं, पर भोजन सबके लिए जरूरी है। ऐसा न हो कि गरीब भूखे रह जाएं।

अर्थव्यवस्था का काफी बड़ा हिस्सा या समूची अर्थव्यवस्था बाजार के हवाले हो इसमें भी हर्ज नहीं, पर साधनों के वितरण की व्यवस्था सामाजिक देखरेख में ही होगी। बाजार भी सामाजिक निगरानी में ही चल सकते हैं। फ्री मार्केट और फ्री ट्रेड का प्रतिफल पिछले साल अमेरिकन बैंकिंग में देखने को मिला। सामाजिक निगरानी की अभी जरूरत है। संयोग है कि अमेरिका जैसी फ्री इकॉनमी में उद्योगों को बचाने के लिए पिछले साल सरकार का सहारा लेना पड़ा। ओबामा सरकार जिन उम्मीदों पर आई है, वे टूटती जा रहीं हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य और बूढ़े लोगों की पेंशन व्यवस्था के लिए दीर्घकालीन कार्यक्रम बनाना मुश्किल हो रहा है।

भारत जैसे देश कई मानों में बेहतर स्थिति में हैं। हम ऐसी तकनीक ला सकते हैं, जो पर्यावरण-मित्र हो। सार्वजनिक शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय की नई प्रणाली शुरू कर सकते हैं। हम ऐसे विज्ञान और तकनीक को बढ़ावा दे सकते हैं, जो हमारी समस्याओं का समाधान करे। उसके लिए नए ढंग से सोचने की जरूरत है। क्या हम नए ढंग से सोच पाते हैं? हमारा पूरा फिल्म उद्योग हॉलीवुड की नकल करने पर उतारू है। इतनी समृद्ध संगीत परम्परा के बावजूद धुनें नकल की हैं। उद्योग-व्यापार और प्रबंध के सारे मॉडल विदेशी हैं। मगर विकास, नियोजन, राजमार्ग, भवन निर्माण वगैरह की समझ पश्चिमी है। इसमें गलत कुछ नहीं। पश्चिम के पास तकनीक है तो वहां से लेनी चाहिए।

कुछ साल पहले प्रो. यशपाल ने शायद किसी प्रबंध संस्थान में देश भर में चलने वाले जुगाड़ की तारीफ की। तारीफ इसलिए नहीं कि उसकी तकनीक विलक्षण है, बल्कि इसलिए कि ऐसी मशीन जो पानी निकाल दे, बिजली बना दे। जरूरत पड़े तो ठेलागाड़ी बन जाय या नाव चला दे। यानी अपनी जरूरतों को पूरा करे। विज्ञान और तकनीक की यही भूमिका है। अपनी समस्याओं के अपने समाधान खोजने के लिए हमें वैचारिक क्रांति की जरूरत है।

दो साल पहले देश में रिटेल कारोबार का हल्ला था। आज उस कारोबार में मंदा हैं। इसलिए नहीं कि पूँजी कम पड़ गई। इसलिए कि रिटेल के देशी मॉडल के मुकाबले पश्चिमी सुपर मार्केट का बिजनेस मॉडल कमजोर है। आपके मुहल्ले का दुकानदार आपको जो सुविधाएं दे रहा है, उसके मुकाबले फैंसी स्टोर सिर्फ दिखावटी हैं। उसे आप देखने जाते हैं, खरीदारी करने नहीं। यही बाजार का नियम है। पश्चिम का जो ग्राह्य है, उसे जरूर लेना चाहिए। पर हमें आविष्कार करने चाहिए। हमारे माल्थस सवाल उठाएं और हमारे गैलीलियो विश्वदृष्टि के उपकरण दें।
pjoshi @hindustantimes. com

लेखक ‘हिन्दुस्तान’ में दिल्ली संस्करण के वरिष्ठ स्थानीय संपादक हैं।

6.9.2009 के हिन्दुस्तान में प्रकाशित