Friday, February 22, 2019

क्या अब कार्टून कम नहीं हो गए हैं?


आज मुझे कीर्तीश भट्ट का यह कार्टून अच्छा लगा। मैं प्रायः अखबारों के कार्टूनों को देखता रहता हूँ। इनमें दो तरह के कार्टून मुझे नजर आते हैं। एक कार्टून बेहद एकतरफा और प्रचारात्मक होते हैं। पर सामान्यतः मैंने पाया है कि विश्लेषकों के मुकाबले कार्टूनिस्ट ज्यादा वस्तुनिष्ठ होते हैं। मेरी समझ में अच्छा कार्टूनिस्ट वही है, जो किसी को बख्शता न हो। दूसरे कार्टूनिस्ट की जरूरत तब ज्यादा होती है, जब कोई सीधे अपनी बात कहने की स्थिति में नहीं हो। यह बात व्यंग्य लेखन पर भी लागू होती है। वह दिन न कभी नहीं आएगा, जब दुनिया को व्यंग्य की जरूरत नहीं होगी। व्यंग्य ही उन लोगों के मन की बात कहता है, जो कुछ कह नहीं पाते। इन दिनों देश के अखबारों में कार्टूनिस्टों की कमी है। खासतौर से हिन्दी अखबारों में कार्टूनिस्ट नहीं हैं। हिन्दी अखबारों का वैचारिक कोना यों भी बहुत कमजोर है। ज्यादातर अखबार महत्वपूर्ण प्रश्नों पर टिप्पणी करने से बचते हैं। बहरहाल यह विषय लम्बा विमर्श माँगता है।

हाल में मुझे  पत्रकारिता से जुड़ी एक वैबसाइट मद्रास कूरियर में एक लेख भारतीय पत्रकारिता के विकास में कार्टूनों की भूमिका पर पढ़ने को मिला। देश के आधुनिक इतिहास को समझने के लिए इन कार्टूनों पर नजर डालना जरूरी है। फिलहाल मैंने यह आलेख इस लेख को पढ़ाने के लिए लिखा है। इस विषय पर भविष्य में कुछ और लिखूँगा।  

3 comments:

  1. कार्टून छाप कर सि‍रदर्द के सि‍वा मि‍लता ही क्‍या है

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (24-02-2019) को "समय-समय का फेर" (चर्चा अंक-3257) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 122वीं जयंती - अमरनाथ झा और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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