Sunday, October 8, 2017

गालियों का ट्विटराइज़ेशन

चौराहों, नुक्कड़ों और भिंडी-बाजार के स्वर और शब्दावली विद्वानों की संगोष्ठी जैसी शिष्ट-सौम्य नहीं होती। पर खुले गाली-गलौज को तो मछली बाजार भी नहीं सुनता। वह भाषा हमारे सोशल मीडिया में प्रवेश कर गई है। हम नहीं जानते कि क्या करें। जरूरत इस बात की है कि हम देखें कि ऐसा क्यों है और इससे बाहर निकलने का रास्ता क्या है? सोशल मीडिया की आँधी ने सूचना-प्रसारण के दरवाजे अचानक खोल दिए हैं। तमाम ऐसी बातें सामने आ रहीं हैं, जो हमें पता नहीं थीं। कई प्रकार के सामाजिक अत्याचारों के खिलाफ जनता की पहलकदमी इसके कारण बढ़ी है। पर सकारात्मक भूमिका के मुकाबले उसकी नकारात्मक भूमिका चर्चा में है। 

हमारी अदालतें हमेशा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करती रहीं हैं, पर पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि अब तो हद हो रही है। गाली-गलौज और तकरीबन हर मुद्दे पर आक्रामक टिप्पणियाँ रोकने के लिए नियम बनने चाहिए। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा, एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने पिछले बुधवार को अपनी यह चिंता जताई। यह चिंता मूलतः जजों और न्यायिक प्रक्रिया पर सोशल मीडिया की बेलगाम टिप्पणियों को लेकर थी, पर वास्तव में यह जीवन के हर क्षेत्र पर लागू होती है।

हाल में जजों के तबादलों को लेकर एक चैनल पर चली चर्चा में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने प्रकारांतर से कहा कि ज्यादातर न्यायाधीश सरकार समर्थक हैं। इस सुनवाई के दौरान इसके पहले नरीमन ने कहा था कि हमारे देश के कानून सरकार द्वारा व्यक्ति के अधिकारों का हनन होने पर उपचार देते हैं। लेकिन किसी व्यक्ति द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति के अधिकारों के हनन पर कोई व्यवस्था नहीं है। इसके लिए सिविल लॉ होना चाहिए।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री आजम खां की टिप्पणियों से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान यह मुद्दा उठा। कोर्ट ने कहा कि लोग तथ्यों की जांच किए बगैर अदालत की कार्यवाही के बारे में भी गलत जानकारी फैला देते हैं। इसपर वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने कहा कि सोशल मीडिया पर इतनी गलत सूचनाओं और गलत भाषा का इस्तेमाल किया जाता है कि मैंने अपना ट्विटर अकाउंट ही बंद कर दिया है। एक अन्य वरिष्ठ वकील एफएस नरीमन ने कहा कि मैंने सोशल मीडिया पर की जाने वाली टिप्पणियों को देखना ही बंद कर दिया है।

सोशल मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दो पहलू हैं। संविधान ने व्यक्ति को अनुच्छेद 19 (1-ए) के अंतर्गत यह स्वतंत्रता दी है। पर यह स्वतंत्रता असीमित नहीं है। इसपर विवेक-सम्मत पाबंदियाँ भी संविधान ने लागू की हैं। पर सूचना तकनीक के विकास ने इस परिभाषा और पाबंदियों के सामने नए सवाल खड़े किए हैं। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम-2008 की धारा 66ए के कारण जब एक के बाद एक गिरफ्तारियाँ होने लगीं तो फिर इस बात के दूसरे पहलू की ओर भी हमारा ध्यान गया। कानून के इस उपबंध को पास करते वक्त संसद ने ऐसी स्थितियों के बारे में सोचा ही नहीं था, जो भविष्य में पैदा होने वाली थीं।

कानून बनाते वक्त कहा गया था कि इसका उद्देश्य महिलाओं को भद्दे, अश्लील मोबाइल संदेश भेजने वालों को पकड़ना था। पर हुआ क्या? विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, लेखक, कार्टूनिस्ट, छात्र-छात्राएं और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी तक इस कानून के दायरे में आ गए। अंततः 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को खारिज किया। मूलतः यह कानून सन 2000 में बना था। विषय नया था। कम्प्यूटर और इंटरनेट के दुरुपयोग के मामले सामने आने लगे थे। इसलिए कानून में समयानुकूल बदलाव करने की जरूरत महसूस की जा रही थी। इस कानून की धारा 66 मूल रूप में हैकिंग के अपराध के खिलाफ है। इसमें 66ए जोड़ने का उद्देश्य भद्दे संदेशों के खिलाफ कार्रवाई करने का था।

अपने उद्देश्य के विपरीत यह कानून पुलिस के हाथों में चला गया। इस मुद्दे पर पहली जनहित याचिका 2012 में कानून की छात्रा श्रेया सिंघल ने दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश अल्तमस कबीर की अदालत में यह मामला पहुँचा तो उन्होंने इस बात पर विस्मय व्यक्त किया कि किसी ने अभी तक इसे चुनौती क्यों नहीं दी है। यह जनहित याचिका दो लड़कियों शाहीन ढाडा और रीनू श्रीनिवासन को महाराष्ट्र में ठाणे जिले के पालघर में गिरफ्तार करने के बाद दायर की गई थी। एक ने शिवसेना नेता बाल ठाकरे के निधन के बाद मुंबई में बंद को लेकर टिप्पणी की थी और दूसरी लड़की ने उसे लाइक किया था।

इसके पहले भी प्रताड़ित करने और गिरफ्तारी की कई शिकायतें सामने आईं थीं। असीम त्रिवेदी को फेसबुक पर एक कार्टून पोस्ट करने के बाद गिरफ्तार किया गया। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ एक कार्टून पोस्ट करने पर पुलिस ने जाधवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अंबिकेश महापात्रा को गिरफ्तार कर लिया। पी चिदंबरम के बेटे कीर्ति चिदंबरम के खिलाफ ट्वीट करने पर पुदुच्चेरी के एक व्यापारी को गिरफ्तार कर लिया गया। लेखक कँवल भारती को फेसबुक पर पोस्टिंग के कारण गिरफ्तार किया गया। ऐसी घटनाओं की अचानक बाढ़ आने लगी।

सुप्रीम कोर्ट में धारा 66ए के खारिज होने के बाद सरकार ने एक विशेषज्ञ समिति की नियुक्ति की, जिसने सलाह दी कि ऑनलाइन हेट स्पीच और अन्य दुरुपयोगों को देखते हुए अपराध दंड प्रक्रिया संहिता में संशोधन करके पूरी न्याय-व्यवस्था को नए हालात के अनुरूप तैयार किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी 2015 में 66ए को खारिज करते वक्त यही चाहा था। अपने फैसले में जस्टिस रोहिंटन एफ नरीमन और जे चेलमेश्वर ने कहा था कि कुछ नए किस्म के अपराध इस बीच उभरे हैं, जो सांविधानिक पाबंदियों के दायरे से बाहर हैं। चुनौती यह है कि लक्ष्मण रेखा कहाँ और कैसे खींची जाए।

गालियाँ देने वालों की मनोदशा को समझने की भी जरूरत है। व्यक्ति असहाय होने पर गाली देता है या दलील खत्म हो जाने के बाद। ईर्ष्या और द्वेष भी गालियों के पीछे होते हैं और अक्सर सामने वाले को दबाव में लेने के लिए भी। गालियाँ पूरे समाज की मनोदशा को भी व्यक्त करती हैं। जिस समाज में तर्क, विवेक और आत्मविश्वास का ह्रास होता है, उसमें गालियाँ तर्क की जगह लेती जाती हैं। सोशल मीडिया भी हमारे समाज का आइना है।

पहुँच-प्रभाव और स्पीड में सायबर मीडिया जिस तेजी से बढ़ा है उसी तेजी से इसके कंटेंट की गुणवत्ता का ह्रास हो रहा है। दोष तकनीक का है या पूरे समाज का? फेसबुक, ट्विटर पर जो शब्दावली प्रवेश कर गई है, वह मुख्यधारा की शब्दावली कभी नहीं थी। लगाम नहीं लगी तो गाली-गलौज का ट्विटराइज़ेशन सामान्य व्यवहार बन जाएगा। साथ ही फेक न्यूज बढ़ रही हैं। जानकारी देने की जगह मीडिया झूठ फैला रहा है। इस अराजकता को रोकने के प्रयास होने चाहिए और जल्द होने चाहिए।

हरिभूमि में प्रकाशित

2 comments:

  1. Beautiful analysis of a negative social media trend

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन भारतीय वायुसेना दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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