Monday, October 2, 2017

साख कायम रखनी है तो फर्जी खबरों से निपटना होगा

चुनींदा-2
समाचार मीडिया को तलाशने होंगे फर्जी खबरों से निपटने के तरीके

बिजनेस स्टैंडर्ड में वनिता कोहली-खांडेकर / 

September 29, 2017
फेसबुक ने अंग्रेजी, गुजराती और कुछ अन्य भाषाओं में जारी विज्ञापनों में फर्जी खबर की पहचान करने के बारे में सुझाव दिए हैं। इस विज्ञापन को देखकर ऐसा लगता है कि फेसबुक अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फर्जी खबरों का प्रसार रोकने की अपनी जिम्मेदारी को लेकर आखिरकार सचेत हुआ है। यह एक ऐसे 'इको-चैम्बर' की तरह हो चुका है जिसके भीतर करीब 2 अरब लोग अपनी राय जाहिर करते हैं, दूसरे लोगों के विचारों, खबरों, तस्वीरों या वीडियो पर टिप्पणी करते हैं और सूचनाओं को साझा करते हैं। सोशल मीडिया का लोगों के मतदान व्यवहार, उनके खानपान और खरीदारी के तरीके तय करने में भी बड़ी भूमिका होती है। लोग इस पर भरोसा करते हैं और उनके इस भरोसे की ही वजह से फेसबुक को मोटी कमाई होती है। गूगल के साथ मिलकर फेसबुक पूरी दुनिया में डिजिटल विज्ञापन हासिल करने वाली सबसे बड़ी कंपनी है। इसके नाते उसकी जिम्मेदारी भी बनती है।


वैसे भारत ही नहीं, अधिकांश विकसित देशों में फर्जी खबरें बड़ी चिंता का विषय बनकर उभरी हैं। हाल ही में एम्सटर्डम में संपन्न अंतरराष्ट्रीय ब्रॉडकास्टिंग सम्मेलन (आईबीसी) में भी यह मुद्दा जोर-शोर से उभरा। दुनिया भर से आए 57,000 प्रतिभागियों ने मीडिया, मनोरंजन और तकनीक क्षेत्र के इस सबसे बड़े आयोजन में छह दिनों तक कई ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा की। तकनीकी पैरोकार और विक्रेता जहां नई मीडिया तकनीकों पर चर्चा कर रहे थे वहीं संगोष्ठियों में फर्जी खबरों का मुद्दा छाया रहा। सम्मेलन के पहले दिन इस मुद्दे पर तीन सत्र हुए जिनमें चर्चा फर्जी खबरों के खिलाफ लड़ाई में भारतीय मीडिया की मदद के तरीकों पर ही केंद्रित रही।

पहली बात तो यह है कि समाचार उद्योग को फर्जी खबरों के मामले में अधिक आवेग में आने की जरूरत नहीं है। उसे विचारों की अभिव्यक्ति या नियमन की कोशिशों के खिलाफ हो-हल्ला करने की जरूरत नहीं है। सैली बज़बी के सत्र में शामिल होने पर मुझे यही महसूस हुआ। एसोसिएटेड प्रेस की कार्यकारी संपादक सैली का नजरिया संतुलित था, वह न तो वाम और न ही दक्षिण पंथ के प्रति आलोचनात्मक दिखीं। इसके बजाय उन्होंने फर्जी खबरों से जुड़ी चुनौतियों और तथ्यों को तवज्जो दी। सैली का मानना है कि फर्जी खबरों के लिए मुख्यधारा मीडिया और उसके अभिजनवादी रुख को तो जिम्मेदार ठहराया जा सकता है लेकिन अगर मीडिया गलतियों का भी जिक्र नहीं करता है तो 'असली खतरा' पैदा होगा। हालांकि फर्जी खबर को रोकने का मतलब विचारों की अभिव्यक्ति पर लगाम लगाना नहीं है।

दूसरी बात, कोई भी खबर किस हद तक फर्जी है? एक सत्र में ब्रिटेन के चैनल 4 के समाचार संपादक बेन डी पियर ने नियामक संस्था ऑफकॉम की तरफ से फटकार लगाए जाने का जिक्र किया। चैनल ने इस साल लंदन के वेस्टमिंस्टर में हुए हमले के लिए गलत व्यक्ति को षड्यंत्रकर्ता बता दिया था। बाद में चैनल ने उसके लिए माफी मांगी और अपनी गलती दुरुस्त करने की हरसंभव कोशिश की। हालांकि समाचार प्रस्तोता केट बल्कली कहती हैं कि एक त्रुटि और फर्जी खबर में फर्क है। अगर कोई नेता डींग हांक रहा है और एक समाचारपत्र संबंधित तथ्यों की पुष्टि के बगैर ही उन्हें पेश कर देता है तो यह खराब रिपोर्टिंग मानी जाएगी, न कि फर्जी खबर। अगर कोई स्तंभकार विरोधाभासी तथ्यों के बावजूद एक खास रुझान वाला लेख लिखता है तो उसे पूर्वग्रह-आधारित खराब लेखन ही कहा जाएगा।

2 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, भूत, वर्तमान और भविष्य “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. जमान फर्जियों का है साख भी चाहिये फर्जी
    असंभव नहीं है अगर खबर सिले कोई दर्जी।

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