Thursday, February 12, 2015

भेड़ों की भीड़ नहीं, जागरूक जनता बनो

दिल्ली की नई विधानसभा में 28 विधायकों की उम्र 40 साल या उससे कम है. औसत उम्र चालीस है. दूसरे राज्यों की तुलना में 7-15 साल कम. चुने गए 26 विधायक पोस्ट ग्रेजुएट हैं. 20 विधायक ग्रेजुएट हैं, और 14 बारहवीं पास हैं. बीजेपी के तीन विधायकों को अलग कर दें तो आम आदमी पार्टी के ज्यादातर विधायकों के पास राजनीति का अनुभव शून्य है. वे आम लोग हैं. उनके परिवारों का दूर-दूर तक रिश्ता राजनीति से नहीं है. उनका दूर-दूर तक राजनीति से कोई वास्ता नहीं है. दिल्ली के वोटर ने परम्परागत राजनीति को दूध की मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया है. यह नई राजनीति किस दिशा में जाएगी इसका पता अगले कुछ महीनों में लगेगा. यह पायलट प्रोजेक्ट सफल हुआ तो एक बड़ी उपलब्धि होगी.  


राज-व्यवस्था के संचालक बड़ी बातें करते हैं, पर छोटी समस्याओं के समाधान नहीं खोजते. सामान्य नागरिक को छोटी बातें परेशान करती हैं. दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने केवल जनता के साथ अपना सम्पर्क बढ़ाया. इतनी सी बात ने बड़ा बदलाव कर दिया. हर आदमी की ज़ुबान पर एक बात है 49 दिन की सरकार बनने पर हफ़्ता वसूली बंद हो गई थी, सरकारी दफ्तरों में दलाली बंद हो गई थी.’ सामान्य व्यक्ति को पुलिस की हफ़्ता वसूली, असुरक्षा, बिजली, पानी, परिवहन, सड़क, सफाई और रोशनी वगैरह से जुड़ी बातें परेशान करती हैं. इन बातों को कोई सुनता तक नहीं तब उसका गुस्सा बढ़ जाता है. रोजगार, स्वास्थ्य, आवास और भोजन जैसे मामले भी हैं। इनके समाधान इतने मुश्किल नहीं, जितने लगते हैं. इन्हें सुनिश्चित करने वाली व्यवस्था अकुशल, सुस्त और अविचारित है. पर राजनीति बजाय इनका समाधान करने के विचारधाराओं के भारी-भारी जुमले परोसती है. 

सन 1947 में जब देश आज़ाद हुआ था, तब भी हमारी राजनीति नई थी. जनता को उससे अपेक्षाएं थीं. ज्यादातर चेहरे नए थे. यानी जितने भी राजनीतिक दल थे उनमें से ज्यादातर दल आम आदमी पार्टी जैसे थे. पर 1967 आते-आते वह राजनीति असहनीय हो गई और जनता ने सात-आठ राज्यों में कांग्रेस को अपदस्थ कर दिया. तब फिर आम आदमी पार्टी जैसी नई ताकतें सामने आईं. सन 1971 में इंदिरा गांधी नई उम्मीदें लेकर सामने आईं. उन्होंने सबसे बड़ा वादा किया. गरीबी हटाने का. अपेक्षाएं इतनी बड़ी थीं कि जनता ने उन्हें समर्थन देने में देर नहीं की. पाँच साल के भीतर इंदिरा गांधी की सरकार अलोकप्रियता के गड्ढे में जा गिरी. सन 1977 में उन्हें भारी शिकस्त ही नहीं मिली, एक नए राजनीतिक जमावड़े का ऐतिहासिक स्वागत हुआ. साल भर के भीतर इस जमावड़े के अंतर्विरोध सामने आने लगे.

सन 1984 में जब राजीव गांधी जीते, तब वे ईमानदार और भविष्य की ओर देखने वाले राजनेता के रूप में सामने आए थे. उन दिनों अरुण शौरी इसी तरह की ‘ईमानदार राजनीति’ की बात कर रहे थे जैसे आज अरविंद केजरीवाल कर रहे हैं. देश की जनता ने मौका आने पर हर बार बदलाव किया है. हर बार कोई न कोई नया अनुभव हुआ है. बदलाव केवल राजनीतिक नहीं होता. संस्थागत भी होता है. एक समय तक हमारी समझ थी कि वोट देने के बाद जनता की भूमिका खत्म हो जाती है. वह धारणा गलत थी. जैसे-जैसे वोटर की भूमिका बदल रही है, राजनीति बदल रही है. सारा बदलाव भीतर से ही नहीं हुआ. बाहर से भी हुआ है. चुनाव सुधार का ज्यादातर काम चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के दबाव से हुआ है. राजनीतिक दलों ने ज्यादातर इन सुधारों का विरोध किया. इसी कारण जनता के मन में राजनीति के प्रति वितृष्णा पैदा हुई है. दिल्ली के इस चुनाव में सबसे ज्यादा आलोचना अहंकार की हुई है. जनता को सत्ता के अहंकार से नफरत है.

अभी तक राजनीति का मतलब हम पार्टियों के गठबंधन, सरकार बनाने के दावों और आरोपों-प्रत्यारोपों तक सीमित मानते थे. राजनीति के मायने चालबाज़ी, जोड़तोड़ और जालसाज़ी हो गए. दिसम्बर 2013 में इस परिभाषा में कुछ नई बातें जुड़ीं. इसके पीछे कारण ‘आप’ नहीं, बल्कि वह वोटर था जिसने ‘आप’ को ताकत दी. ‘आप’ की जीत वोटर की जीत थी. पर आप ने भी उस संदेश को नहीं समझा.  देश के दूसरे इलाकों में जाने के पहले उसे अपने लक्ष्य निर्धारित करने चाहिए थे. तब पार्टी जल्दी में थी. उसने राजनीतिक जुमलों का भी सोचे-समझे बगैर इस्तेमाल शुरू कर दिया, जिसका उसे नुकसान उठाना पड़ा. पर उसने जल्द अपनी गलती को समझ लिया.

इस नई राजनीति की अपील छोटे शहरों और गाँवों तक जा पहुँची है, पर असर महानगरों में ही है. दिल्ली की प्रयोगशाला छोटी है. यहाँ इसका पायलट प्रोजेक्ट ही तैयार हुआ है. इसका व्यावहारिक रूप अगले कुछ महीनों में देखने को मिलेगा. देश का मध्य वर्ग, प्रोफेशनल युवा और स्त्रियाँ ज्यादा सक्रियता के साथ राजनीति में प्रवेश कर रहे हैं. लंबे समय तक ‘आम आदमी’ या ‘मैंगो मैन’ मज़ाक का विषय बना रहा. अब यह मज़ाक नहीं है. टोपी पहने मैंगो मैन राजनीतिक बदलाव का प्रतीक बनकर सामने आया है.

जनता परम्परागत राजनीति का ढर्रा तोड़ना चाहती है. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जो भाजपा लगातार जीत रही थी वह दिल्ली में हार गई. भाजपा ने बदलाव का वादा किया था. वोटर ने उसका साथ दिया, पर वोटर की अपेक्षाएं ज्यादा हैं. दिल्ली में अचानक बीजेपी परम्परागत, दकियानूस और साख-विहीन नजर आने लगी. वोटर उस तरीके से चीजों को नहीं देखता जैसे बीजेपी और दूसरी पार्टियाँ देखती हैं. नई राजनीति अंदेशों की जगह उम्मीदों, अतीत की जगह भविष्य और डर की जगह निर्भीकता की जीत चाहती है. वह विचारधारा के आडंबरों से भी मुक्त है. परम्परागत राजनीति के प्रणेताओं को इसकी प्रवृत्तियों को समझना चाहिए व्यक्तियों को नहीं. यह सावधानी आम आदमी पार्टी को भी बरतनी होगी.

 बदलाव केवल भारत में ही नहीं है. आप’ आंदोलन के पीछे ‘अरब-स्प्रिंग’ से लेकर ‘ऑक्यूपेशन वॉल स्ट्रीट’ तक के तार थे. हाल में ग्रीस के चुनाव में वोटर ने परम्परागत पार्टियों को नकार कर वामपंथी पार्टी सिरिजा को जिताया है. सिरिजा कोई क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी नहीं है यह कई तरह के रुझानों वाला गठबंधन है। उसका रुझान वामपंथी है, पर पूंजीवाद और साम्राज्यवाद जैसे जुमलों का इस्तेमाल वह नहीं करता. बल्कि पूंजीपति वर्ग के एक हिस्से को भी उसने सहमत कराने का प्रयास किया है. यूरोप के दूसरे देशों में भी कमोबेश ऐसे आंदोलन खड़े हैं जो नयी राजनीतिक परिभाषा देना चाहते हैं. वह समाज हमारे मुकाबले ज्यादा जागरूक है. पर यदि भारत में हम राजनीति का कोई नया मुहावरा खोज पाए तो यह बड़ी बात होगी.



प्रभात खबर में प्रकाशित

4 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (13.02.2015) को "भावना और कर्तव्य " (चर्चा अंक-1888)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  2. Anonymous7:25 PM

    bilkul sahi kahaa hai aapne, bhedo ki bheed nahi jagruk janta bananaa hoga, apne hit ki hi nahi rashtrahit ka bhi dekhna hoga...

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  3. साकार प्रस्तुति...

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  4. साकार प्रस्तुति...

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