यकीन मानिए भारत के आम चुनाव को दुनिया में काले धन से
संचालित होने वाली सबसे बड़ी लोकतांत्रिक गतिविधि है। हमारे लोकतंत्र का सबसे खराब
पहलू है काले धन की वह विशाल गठरी जिसे ज्यादातर पार्टियाँ खोल कर बैठती हैं। काले
धन का इस्तेमाल करने वाले प्रत्याशियों के पास तमाम रास्ते हैं। सबसे खुली छूट तो
पार्टियों को मिली हुई है, जिनके खर्च की कोई सीमा नहीं है। चंदा लेने की उनकी व्यवस्था काले पर्दों से
ढकी हुई है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी के चंदे को लेकर
मीडिया में दो दिन का शोर-गुल हुआ। और उसके बाद खामोशी हो गई। बेहतर हो कि न केवल
इस मामले में बल्कि पार्टियों के चंदे को लेकर तार्किक परिणति तक पहुँचा जाए।
सामाजिक सेवा का ऐसा कौन सा सुफल है, जिसे हासिल करने के लिए पार्टियों के प्रत्याशी करोड़ों के
दाँव लगाते हैं? जीतकर
आए जन-प्रतिनिधियों को तमाम कानून बनाने होते हैं, जिनमें चुनाव सुधार से जुड़े
कानून शामिल हैं। अनुभव बताता है कि वे चुनाव सुधार के काम को वरीयता में सबसे
पीछे रखते हैं। ऐसा क्यों? व्यवस्था
में जो भी सुधार हुआ नजर आता है वह वोटर के दबाव, चुनाव आयोग की पहल और अदालतों के हस्तक्षेप से हुआ है। सबसे
बड़ा पेच खुद राजनीतिक दल हैं जिनके हाथों में परोक्ष रूप से नियम बनाने का काम
है। चुनाव से जुड़े कानूनों में बदलाव का सुझाव विधि आयोग को देना है, पर दिक्कत
यह है कि राजनीतिक दल विधि आयोग के सामने अपना पक्ष रखने में भी हीला-हवाला करते
हैं।
पार्टियाँ अपने हिसाब-किताब को कानूनी मकड़जाल में छिपा कर क्यों
रखती हैं? उन्हें आयकर कानून की 1961 की धारा 13 ए के
तहत पूरी छूट प्राप्त है। आयकर रिटर्न जरूर दाखिल करना होता है, लेकिन इसमें देरी करने पर कोई जुर्माना नहीं है। चैरिटेबल
ट्रस्टों और संस्थाओं को भी आयकर में छूट होने के बावजूद रिटर्न दाखिल करने में
देरी करने पर उन पर जुर्माना लगाया जाता है। पार्टियों को आयकर से छूट मिली जरूर है,
पर उन्हें अपनी आय का ब्योरा चुनाव आयोग को देना होता है। उन्हें 20 हजार रुपए से
अधिक आय या चंदा प्राप्त होने पर बुक ऑफ अकाउंट रखना होता है। व्यवहारिक सच यह है
कि पार्टियों की ज्यादातर यानी 75 से 80 फीसदी कमाई 20,000 रुपए से नीचे के चंदे
की है। यानी जिसे बड़ा चंदा भी देना है तो वह छोटी-छोटी राशि में कई बार और बेनामी
देता है। चूंकि उसका विवरण देश के सामने नहीं है इसलिए अंदेशा है कि यह चंदा काले
धन के रूप में होगा।
इस मकड़जाल को तोड़ने के लिए नागरिक संगठन लगातार कोशिश
करते रहे हैं। इस 75 या 80 फीसदी कमाई का विवरण हासिल करने के लिए जब आरटीआई के
तहत अर्जी दी गई तो पार्टियों ने उसे खारिज करते हुए कहा कि हम सार्वजनिक
प्रतिष्ठान नहीं है। इसके बाद केंद्रीय सूचना आयुक्त से दरयाफ्त की गई। अंततः 3
जून 2013 को सूचना आयोग की फुल बेंच ने छह राष्ट्रीय दलों को सूचना के अधिकार के
अंतर्गत लाने का फैसला किया। इस फैसले का लगभग सभी राजनीतिक दलों ने विरोध किया।
कांग्रेस के प्रमुख प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि पार्टियां किसी कानून से
नहीं बनी हैं। वे सरकारी सहायता से नहीं चलतीं।
सूचना आयुक्त का तब अनुमान था कि केवल दो बड़ी राष्ट्रीय
पार्टियों, कांग्रेस
और भारतीय जनता पार्टी को सरकार तकरीबन 255 करोड़ रुपए की सब्सिडी देती है। सूचना आयोग के इस फैसले के
बाद भी पार्टियों ने अपना विवरण नागरिक संगठनों को नहीं दिया। इस बारे में चुनाव
आयोग और सूचना आयोग के नोटिस का जवाब भी वे नहीं देते। दूसरी ओर तत्कालीन सरकार ने
अध्यादेश लाकर पार्टियों को सूचना आयुक्त के इस फैसले से बाहर करने की शुरुआत कर
दी। उन्हीं दिनों अदालतों से सज़ा प्राप्त जन-प्रतिनिधियों की सदस्यता खत्म करने
का प्रकरण भी चल रहा था। राहुल गांधी के हस्तक्षेप के कारण दागी सांसदों वाला
मामला लटक गया। उधर जनता के दबाव में पार्टियों को सूचना-अधिकार कानून के दायरे से
बाहर करने से जुड़ा विधेयक भी संसद से पास नहीं हो पाया। उसे स्थायी समिति को सौंप
दिया गया। पिछले साल इस बारे में विचार कर रही संसद की स्थायी समिति ने भी कानून
में संशोधन की सिफारिश की थी। बहरहाल यह मामला अभी तक तार्किक परिणति तक नहीं
पहुँचा है।
अभी तक का अनुभव है कि पार्टियों ने पारदर्शिता का स्वागत कभी
नहीं किया। उदाहरण के लिए हलफनामे की व्यवस्था को देखें। लम्बे समय से
प्रत्याशियों की आपराधिक और वित्तीय पृष्ठभूमि की जानकारी उजागर करने की माँग होती
रही है। जून 2002 में
मुख्य चुनाव आयुक्त ने अधिसूचना जारी कर चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों के लिए
अपनी आपराधिक और वित्तीय जानकारियाँ देना अनिवार्य किया तो लगभग सभी पार्टियों ने
इसका विरोध किया। जबकि यह पहल सुप्रीम कोर्ट की मंशा के अनुरूप थी। उधर सरकार ने 16 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विपरीत एक अध्यादेश
ज़ारी कर दिया। और संसद ने इस अध्यादेश के स्थान पर जन प्रतिनिधित्व(तीसरा संशोधन)
अधिनियम 2002 पास कर दिया, जिससे सरकार और समूची राजनीति की मंशा ज़ाहिर हो गई। इस
संशोधन के मार्फत जन प्रतिनिधित्व कानून में 33बी को जोड़ा गया, जो वोटर के जानकारी पाने के अधिकार को सीमित करता था।
आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने 13 मार्च 2003 के
अपने ऐतिहासिक फैसले में वोटर को प्रत्याशी के बारे में जानकारी पाने का मौलिक
अधिकार दिया और चुनाव आयोग की अधिसूचना को वैधता प्रदान की।
लोकसभा के एक चुनाव में 8000 से अधिक उम्मीदवार होते हैं। इस तरह करीब 20,000 करोड़ रुपए की राशि प्रचार पर खर्च होती है। आधिकारिक तौर
पर निर्वाचन आयोग के समक्ष 2009 में दिए गए खर्च के ब्योरे से तो यही लगता है कि इनमें से
किसी ने 25 लाख रुपए की तय सीमा पार नहीं की। ज्यादातर प्रत्याशियों
का आधिकारिक ब्योरा 25 लाख रुपए 10-12 लाख
तक भी नहीं पहुंचता। साफ है कि चुनाव खर्च छिपाया जाता है। जिस काम की शुरूआत ही
छद्म से हो वह आगे जाकर कैसा होगा?
अन्ना आंदोलन एक माने में सम्पूर्ण राजनीति के विरोध में
खड़ा था। आंदोलन शुरू होने पर सबसे पहले कहा गया कि चुनाव का रास्ता खुला है। आप
उधर से आइए। पर चुनाव के रास्ते पर तो व्यवस्थित रूप से बैरियर लगे हैं जो
सीधे-सरल और ईमानदार लोगों को रोक लेते हैं। चुनाव पावर गेम है। इसमें मसल और मनी
मिलकर माइंड पर हावी रहते हैं। जनता का बड़ा तबका भ्रष्टाचार के खिलाफ उस आंदोलन
का समर्थन सिर्फ इसलिए करता रहा क्योंकि उसे लगता था कि व्यवस्था पूरी तरह ठीक न
भी हो,
पर एक हद तक ढर्रे पर लाई जा सकती है।
जिस तरह लोकपाल-व्यवस्था लम्बे अरसे से कानून बनने का
इंतज़ार करती रही उसी तरह चुनाव सुधार का काम भी लम्बे समय से राष्ट्रीय रेडार पर
है। पिछले दो दशक में या उससे ज्यादा समय से चुनाव सुधार के लिए अलग-अलग फोरमों से
जो सुझाव आए हैं उन्हें विधि मंत्रालय और चुनाव आयोग ने एकत्र किया है। 1990 में गोस्वामी समिति, 1993 में वोहरा समिति, सन 1998 में चुनाव के लिए सरकारी फंडिंग पर विचार के लिए इन्द्रजीत गुप्त समिति,
1999 में चुनाव सुधार पर विधि आयोग की
रपट,
सन 2001 में संविधान पुनरीक्षा आयोग की सिफारिशों, सन 2004 में चुनाव आयोग के प्रस्ताव और सन 2007 में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों को एक साथ
रखकर पढ़ें तो समझ में आता है कि पूरी व्यवस्था को रफू करने की जरूरत है। व्यवस्था
जनता के लिए है, जन-प्रतिनिधियों
के लिए नहीं। जनता को धोखा देकर लोकतंत्र नहीं चलेगा।
आप के जीतने का एक कारण तो यह होगा कि कांग्रेस ने पूरा वाक ओवर दे दिया लेकिन मोदी को हराने के चक्कर में उसने अपने पांवों में एक कुल्हाड़ी और मार ली है इस कारण वह ,दलित पिछड़े व अल्प संख्यक वर्ग में से अपना आधार भी खो देगी आप के लिए भी मोदी की तरह इतने ख्वाब दिखाना महंगा पड़ेगा क्योंकि वे सब हवाई ज्यादा हैं ,न तो इन के लिए इतना बजट है और न वास्तिकता के करीब , इसलिए कुछ दिन में लोग इनके भी कपडे फाड़ेंगे याद हो पिछली बार भी सप्ताह बाद ही अपनी मांगे पूरी करने के लिए प्रदर्शन करने लगे थे। केजरीवाल केंद्र से आर्थिक सहयोग न मिलने के कारण दुखड़ा रोयेंगे लेकिन सब्सिडी को खत्म करने पैट उतारू सरकार ज्यादा सहयोग नहीं कर पाएगी क्योंकि अन्य राज्य भी ऐसा ही चाहेंगे ,इसलिए ये तकरार चलती ही रहेगी और जनता मुहं ताकती रहेगी
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