Sunday, April 23, 2023

जातीय-जनगणना: प्रतिगामी या प्रगतिगामी


भारतीय जनता पार्टी के हिंदुत्व के जवाब में विरोधी दलों ने सामाजिक न्याय के लिए एकताबद्ध होने का निश्चय किया है। गत 3 अप्रेल को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने विरोधी दलों की बैठक इसी इरादे से बुलाई थी। हाल में कोलार की एक रैली में राहुल गांधी ने नारा लगाया,  ‘जितनी आबादी, उतना हक। वस्तुतः यह बसपा के संस्थापक कांशी राम के नारे का ही एक रूप है, जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। राहुल गांधी ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने जातीय आधार पर आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तक रखी है, उसे खत्म करना चाहिए। इसके पहले रायपुर में हुए पार्टी महाधिवेशन में इस आशय का एक प्रस्ताव पास भी किया गया है। ज़ाहिर है कि पार्टी ने मंडल-राजनीति का वरण करके आगे बढ़ने का निश्चय किया है। पार्टी की जिन दलों के साथ गठबंधन की बातें चल रही हैं, उनमें से ज्यादातर मंडल-समर्थक हैं। इन पार्टियों की माँग है कि देश में जाति-आधारित जनगणना होनी चाहिए। बिहार सरकार ने इस मामले में पहल की है, जहाँ इन दिनों जातीय आधार पर जनगणना चल रही है, जो मई में पूरी होगी। इसके अलावा 2011 में हुए सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्टों को सार्वजनिक करने की माँग भी की गई है। केंद्र सरकार इन दोनों बातों के लिए तैयार नहीं है। जुलाई 2022 में केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि 2011 में की गई सामाजिक आर्थिक जातिगत जनगणना में हासिल किए गए जातिगत आंकड़ों को जारी करने की कोई योजना नहीं है। 2021 में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक शपथ पत्र में केंद्र ने कहा, 'साल 2011 में जो सामाजिक आर्थिक और जातिगत जनगणना करवाई गई, उसमें कई कमियां थीं। इससे जो आंकड़े हासिल हुए थे वे गलतियों से भरे और अनुपयोगी थे।'

सामाजिक अंतर्विरोध

विशेषज्ञ मानते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना देर सवेर होनी ही है। इस सवाल को राजनीति से अलग रखकर देखना भी मुश्किल है। राज्य सरकारें कई तरह की अपेक्षाओं के साथ जातिगत जनगणना करा रही हैं। जब उनकी राजनीतिक अपेक्षाएं सही नहीं उतरती हैं, तब जनगणना से मिले आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं किया जाता है। बिहार से पहले कर्नाटक में भी जातिगत जनगणना हुई थी, पर उसके आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए। इसी तरह की एक जनगणना नब्बे के दशक में उत्तर प्रदेश में भी हो चुकी है। दुनिया के तमाम देश ‘एफर्मेटिव एक्शन’ के महत्व को स्वीकार करते हैं। ये कार्यक्रम केवल शिक्षा से ही जुड़े नहीं हैं। इनमें किफायती आवास, स्वास्थ्य और कारोबार से जुड़े कार्यक्रम शामिल हैं। अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया, ब्राजील आदि अनेक देशों में ऐसे सकारात्मक कार्यक्रम चल रहे हैं। इनके अच्छे परिणाम भी आए हैं। सामाजिक शोध बताते हैं कि अमेरिका में गोरों की तुलना में कम अंक और ग्रेड लेकर विशिष्ट संस्थानों में प्रवेश करने वाले अश्वेतों ने कालांतर में अपने गोरे सहपाठियों की तुलना में बेहतर स्थान पाया। भारत के संदर्भ में अर्थशास्त्री विक्टोरिया नैटकोवस्का, अमर्त्य लाहिड़ी और सौरभ बी पॉल ने 1983 से 2005 तक पाँच राष्ट्रीय सैंपल सर्वे के आँकड़ों विश्लेषण से साबित किया कि अनुसूचित जातियों, जनजातियों के प्रदर्शन में सुधार हुआ है।

Wednesday, April 19, 2023

विश्वमंच पर ‘शोकेस’ होगा कश्मीर

 


देस-परदेश

श्रीनगर और लेह में जी-20 कार्यक्रमों के आयोजन पर पाकिस्तान की आपत्ति को खारिज करते हुए भारत ने कहा है कि इन दोनों जगह जी-20 कार्यक्रमों का आयोजन स्वाभाविक है, क्योंकि ये भारत के अभिन्न अंग हैं. दूसरी तरफ पाकिस्तान और चीन इन आयोजनों का विरोध कर रहे हैं. कश्मीर को लेकर इन दोनों देशों की वैश्विक-डिप्लोमेसी की धार का पता भी इस दौरान लगेगा. जी-20 देश खामोश हैं और ओआईसी ने भी अभी तक कुछ कहा नहीं है.   

कश्मीर और लद्दाख की इन बैठकों के पहले एक बैठक अरुणाचल की राजधानी ईटानगर में 26 मार्च को हो चुकी है. अब श्रीनगर में 22 से 24 मई तक जी-20 टूरिज्म वर्किंग ग्रुप की बैठक होने वाली है. उसके पहले 26 से 28 अप्रेल तक लेह में यूथ इंगेजमेंट समूह की बैठक होगी. कुल मिलाकर देश के 55 केंद्रों में 215 कार्यक्रम होंगे, पर सारी निगाहें श्रीनगर और लेह पर लगी हैं.  

अटूट अंग

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने पिछले गुरुवार अपने मंत्रालय की ब्रीफिंग के दौरान एक सवाल के जवाब में कहा, जी-20 कार्यक्रम पूरे देश में हो रहे हैं. हर क्षेत्र में इनका आयोजन किया जा रहा है. जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में इनका आयोजन बहुत स्वाभाविक है, क्योंकि वे भारत के अभिन्न अंग हैं. अरुणाचल की बैठक को लेकर चीन की आपत्ति पर उन्होंने कहा कि अरुणाचल भारत का अटूट अंग था, है और रहेगा.

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने मंगलवार 11 अप्रेल को इन बैठकों के आयोजन पर तीव्र आक्रोश व्यक्त किया था. उन्होंने भारत के इस कदम को गैर-जिम्मेदार बताया और कहा था कि इस तरह से भारत, संरा प्रस्तावों की अनदेखी करते हुए जम्मू-कश्मीर पर अपने अवैध कब्जे को वैध बनाने का प्रयास कर रहा है.

चीन को जवाब

गृहमंत्री अमित शाह सोमवार 10 अप्रैल को दो दिन के दौरे पर अरुणाचल पहुंचे और वहाँ एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा, भारत सुई की नोक पर भी अतिक्रमण स्वीकार नहीं करेगा. गृहमंत्री के दौरे को अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताते हुए चीन ने धमकी दी थी कि यह दौरा शांति के लिए खतरा पैदा कर सकता है. बीजिंग में चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने एक मीडिया ब्रीफ में दावा किया कि अरुणाचल चीन का हिस्सा है, और वहां भारत के किसी अधिकारी और नेता का दौरा हमारी संप्रभुता का उल्लंघन है.

Sunday, April 16, 2023

‘एनकाउंटर-न्याय’ और उससे जुड़े सवाल


उत्तर प्रदेश के माफिया अतीक अहमद के बेटे असद की एनकाउंटर से हुई मौत ने आधुनिक भारत की न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था के सामने कुछ सवाल खड़े किए हैं। इस मौत ने उत्तर प्रदेश सरकार की कानून-व्यवस्था से जुड़ी नीतियों पर सवालिया निशान भी लगाए हैं। यह आलेख जब लिखा गया था, तब तक अतीक अहमद और उनके भाई की हत्या नहीं हुई थी, पर शनिवार की शाम अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की प्रयागराज में गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस घटना में तीन आरोपी कथित रूप से शामिल है, जिन्हें पुलिस ने बाद में गिरफ्तार कर लिया है। अब इस मामले ने एक और मोड़ ले लिया है। 

यह भी माना जा रहा है कि यूपी में पूँजी निवेश लाना है, औद्योगीकरण करना है और विकास से जुड़ी नीतियों को लागू करना है, तो प्रदेश को अपराध-मुक्त करना होगा। पर क्या अपराधियों के घरों को बुलडोज़ करके और उनका एनकाउंटर करने से समस्या का समाधान हो जाएगा?  इस कार्रवाई के शिकार बड़ी संख्या में मुसलमान हैं, पर केवल मुसलमान नहीं हैं। जुलाई 2020 में विकास दुबे के एनकाउंटर से यह बात स्पष्ट हुई थी। दिल्ली में चले शाहीनबाग आंदोलन के समांतर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुई हिंसा के बाद प्रदेश सरकार ने जुर्माना वसूलने का अभियान भी चलाया, जिसमें अदालत ने हस्तक्षेप किया। क्या इस कार्रवाई के पीछे राजनीति है? देश की न्याय-व्यवस्था क्या इसकी अनुमति देगी? अनुमति नहीं देगी, तो फिर उसके पास समाधान क्या है? पिछले तीन-चार दशक से उत्तर प्रदेश में अपराधियों ने जिस तरह से खुलकर खेला, उसे रोकने में न्याय-व्यवस्था की भूमिका क्या है? सत्तर के दशक में नक्सली आंदोलन, नब्बे के दशक में पंजाब के आतंकवाद और अगस्त, 2019 के बाद कश्मीर में आतंकवाद-विरोधी कार्रवाइयों का अनुभव क्या बताता है?

जनता क्या चाहती है?

हिंसा और अपराध के इस चक्रव्यूह में राजनीति और समाज-व्यवस्था की भी बड़ी भूमिका है। जनता के बड़े तबके ने, जिस तरह से असद की मौत पर खुशी मनाई है, तकरीबन वैसा ही 2019 में हैदराबाद में दिशा-बलात्कार मामले के चार अभियुक्तों की हिरासत में हुई मौत के बाद हुआ था। उन दिनों ट्विटर पर एक प्रतिक्रिया थी, ‘लोग भागने की कोशिश में मारे गए, तो अच्छा हुआ। पुलिस ने जानबूझकर मारा, तो और भी अच्छा हुआ।’ किसी ने लिखा, ‘ऐसे दस-बीस एनकाउंटर और होंगे, तभी अपराधियों के मन में दहशत पैदा होगी।’ अतीक के बेटे के एनकाउंटर को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी विचारधारा के आधार पर भी प्रतिक्रिया दी है, पर हैदराबाद प्रकरण में ज्यादातर राजनीतिक नेताओं और सेलेब्रिटीज़ ने एनकाउंटर का समर्थन किया था। जया बच्चन ने बलात्कार कांड के बाद राज्यसभा में कहा था कि रेपिस्टों को लिंच करना चाहिए और उस एनकाउंटर के बाद कहा-देर आयद, दुरुस्त आयद। कांग्रेसी नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने, जो खुद वकील हैं ट्वीट किया, हम ‘जनता की भावनाओं का सम्मान’ करें। यह ट्वीट बाद में हट गया। मायावती ने कहा, यूपी की पुलिस को तेलंगाना से सीख लेनी चाहिए। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी समर्थन में ट्वीट किया, जिसे बाद में हटा लिया। दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने परोक्ष रूप से इसका समर्थन किया। पी चिदंबरम और शशि थरूर जैसे नेताओं ने घूम-फिरकर कहा कि एनकाउंटर की निंदा नहीं होनी चाहिए। हैदराबाद पुलिस को बधाइयाँ दी गईं।  इस टीम में शामिल पुलिस वालों के हाथों में लड़कियों ने राखी बाँधीं, टीका लगाया, उनपर फूल बरसाए।

क्या यही न्याय है?

ज्यादातर लोग इस बात पर जाना नहीं चाहते कि एनकाउंटर सही है या गलत। कोई यह भी नहीं जानना चाहता कि मारे गए चारों अपराधी थे भी या नहीं। जनता नाराज है। उसके मन में तमाम पुराने अनुभवों का गुस्सा है। अपराधियों को सीधे गोली मारने की पुकार इससे पहले कभी इतने मुखर तरीके से नहीं की गई। क्या वजह है कि इसे जनता सही मान रही है? जनता को लगता है कि अपराधियों के मन में खौफ नहीं है। उन्हें सजा मिलती नहीं है। पर सरकारी हिंसा को जनता का इस कदर समर्थन भी कभी नहीं मिला। कम से कम पुलिस पर ऐसी पुष्पवर्षा कभी नहीं हुई। जनता की हमदर्दी पुलिस के साथ यों भी नहीं होती। तब ऐसा अब क्यों हो रहा हैहैदराबाद की परिघटना के समर्थन के साथ विरोध भी हुआ था, पर समर्थन के मुकाबले वह हल्का था। वह मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया और अब तेलंगाना पुलिस पर दबाव है कि वह अपनी टीम के खिलाफ हत्या का मुकदमा चलाए, तब सवाल उठता है कि पुलिस वाले हीरो थे या विलेन? एनकाउंटर उन्होंने अपनी इच्छा से किया या ऊपर के आदेश थे? अदालत किसे पकड़ेगी? क्या अपराधियों का इलाज यही है? क्या हमें कस्टोडियल मौतें स्वीकार हैं? पुलिस की हिरासत में मरने वाले सभी अपराधी नहीं होते। निर्दोष भी होते हैं, पर पुलिस का कुछ नहीं होता। ऐसे मामलों में भी किसी को सजा नहीं मिलती।

न्याय से निराशा

पुलिस हिरासत में मौत का समर्थन जनता नहीं करती है। तालिबानी-इस्लामी स्टेट की तर्ज पर सरेआम गोली मारने या गर्दन काटने का समर्थन भी वह नहीं करती है, पर उसके मन में यह बात गहराई से बैठ रही है कि अपराधी कानूनी शिकंजे से बाहर रहते हैं। अक्सर कहा जाता है कि भारत में न्यायपालिका ही आखिरी सहारा है। पर पिछले कुछ समय से न्यायपालिका को लेकर निराशा है। उसके भीतर और बाहर से कई तरह के सवाल उठे हैं। कल्याणकारी व्यवस्था के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा के साथ न्याय-व्यवस्था बुनियादी ज़रूरत है। इन तीनों मामलों में मनुष्य को बराबरी से देखना चाहिए। दुर्भाग्य से देश में तीनों जिंस पैसे से खरीदी जा रही हैं। वास्तव में बड़े अपराधी साधन सम्पन्न हैं। वे अपने साधनों की मदद से सुविधाएं हासिल कर लेते हैं। जेल जाते हैं, तो वहाँ भी उन्हें सुविधाएं मिलती हैं। सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि सामान्य व्यक्ति को न्याय किस तरह से मिले? उसके मन में बैठे अविश्वास को कैसे दूर किया जाए? इन सवालों के इर्द-गिर्द केवल न्याय-व्यवस्था से जुड़े मसले ही नहीं है, बल्कि देश की सम्पूर्ण व्यवस्था है।

Wednesday, April 12, 2023

पाकिस्तानी सत्ता-प्रतिष्ठान में आपसी टकराव से बढ़ता असमंजस


देस-परदेश

पाकिस्तान में सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सरकार के बीच तलवारें खिंच गई हैं. मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में तीन जजों की बेंच ने पंजाब में चुनाव कराने का आदेश दिया है, जिसे मानने से सरकार ने इनकार कर दिया है. चुनाव दो सूबों में होने हैं, पर सुप्रीम कोर्ट ने केवल पंजाब में 14 मई को चुनाव कराने का निर्देश दिया है. खैबर पख्तूनख्वा के बारे में कोई निर्देश नहीं दिया है.

देश में असमंजस का माहौल है. सोमवार को संसद के दोनों सदनों के विशेष सेशन में सरकार ने चुनाव खर्च से जुड़ा विधेयक पेश कर दिया है. अब संसद के फैसले पर काफी बातें निर्भर करेंगी. संभव है कि संसद पूरे देश में चुनाव एकसाथ कराने का फैसला करे. 

सोमवार को नेशनल असेंबली विदेशमंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी ने कहा कि पाकिस्तान के इतिहास में निडर जज भी हुए हैं. ऐसे भी जज थे जो ज़ुल्फिकार अली भुट्टो को मौत की सजा देने के फैसले से असहमत थे. उसके विपरीत ऐसे न्यायाधीश भी, जो तब भी साजिश में शामिल थे और आज भी न्यायपालिका में मौजूद हैं.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रतिक्रिया में गुरुवार 6 अप्रेल को राष्ट्रीय असेंबली ने प्रस्ताव पास करके प्रधानमंत्री से कहा है कि इस फैसले को मानने की जरूरत नहीं है. उसके अगले ही दिन नेशनल सिक्योरिटी कमेटी (एनएससी) ने देश की पश्चिमी सीमा पर आतंकवाद के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करने का फैसला करके इस बात का संकेत दे दिया है कि चुनाव नहीं, अब लड़ाई पश्चिमी सरहद पर लड़ाई होगी. सरकार ने 10 अप्रेल को संविधान दिवस मनाया और अब से हर साल यह दिवस मनाने की घोषणा भी की है. 10 अप्रेल 1973 को देश का वर्तमान संविधान लागू हुआ था.   

अवमानना का खतरा

सवाल यह भी है कि हुकूमत यदि सुप्रीमकोर्ट के फ़ैसले को तस्लीम नहीं करेगी, तो क्या उसे तौहीन-ए-अदालत की बिना पर वैसे ही हटाया जा सकता है, जैसे यूसुफ़ रज़ा गिलानी को सादिक़ और अमीन ना होने की वजह से तौहीन-ए-अदालत पर जून 2012 में हटा दिया गया था? पर जजों के बीच आपसी मतभेद हैं. पूरी न्यायपालिका एकसाथ नहीं है.

उधर रविवार 9 अप्रेल को छुट्टी के दिन कैबिनेट की बैठक बुलाई गई, जिसमें वित्त मंत्रालय से कहा गया है कि चुनाव के खर्चों का ब्योरा तैयार करे, ताकि उसे संसद के सामने रखा जा सके. सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि सरकार 10 अप्रेल तक 21 अरब रुपया चुनाव आयोग को दे, ताकि चुनाव कराए जा सकें. सरकार कानूनी स्थितियों का भी गंभीरता से अध्ययन कर रही है. संसद से धनराशि की स्वीकृति नहीं मिलने पर जो वैधानिक स्थिति बनेगी, वह हालात को और जटिल बनाएगी.

Sunday, April 9, 2023

केवल मुग़लों पर क्यों ठिठकी शिक्षा की बहस?


केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के पाठ्यक्रम और पुस्तकों में हुए बदलाव अचानक फिर से चर्चा के विषय बने हैं। हालांकि इन बदलावों की घोषणा और सूचना पिछले साल अप्रेल के महीने में ही हो गई थी, पर चूंकि नया पाठ्यक्रम इस वर्ष लागू किया जा रहा है, शायद इसलिए यह चर्चा फिर से हो रही है। हालांकि पाठ्यक्रम का पुनर्संयोजन कक्षा 6 से 12 तक के अलग-अलग विषयों का हुआ है, पर सबसे ज्यादा चर्चा इतिहास के पाठ्यक्रम को लेकर है। 

भारत में इतिहास राजनीति का विषय है। भारतीय राजनीति इस समय सेक्युलरिज़्म और सांस्कृतिक पुनरुत्थान की बहस से गुजर रही है, इसलिए छोटे से छोटे बदलाव को भी संदेह की निगाहों से देखा जाता है। शिक्षा को संकीर्ण नजरिए से देखना नहीं चाहिए, पर इतिहास, साहित्य, राजनीति-शास्त्र और संस्कृति ऐसे विषय हैं, जिन्हें लेकर वस्तुनिष्ठता आसान भी नहीं है। यह काम विशेषज्ञों की मदद से ही होगा। पर हम यह भी जानते हैं कि हमारे देश में विशेषज्ञ भी वस्तुनिष्ठ कम, वैचारिक प्रतिबद्ध ज्यादा हैं। 

बहस करने वालों में से ज्यादातर ने इनमें से कोई किताब एकबार भी उठाकर नहीं देखी होगी। हिंदी लेखक भी कक्षा 12 की इतिहास की जिस किताब का जिक्र कर रहे हैं, उसके हटाए गए विषय का नाम अंग्रेजी में ही लिख रहे हैं, क्योंकि पूरा मीडिया किसी एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट के आधार पर बहस कर रहा है। किसी ने तो हिंदी की किताब देखी होती, तो उसका उल्लेख करता। हालांकि इससे फर्क कुछ नहीं पड़ता। मुझे केवल यह रेखांकित करना है कि सारी बातें किसी एक मीडिया रिपोर्ट के आधार पर है। 

बहरहाल इस विषय पर काफी बहस पिछले साल ही हो गई है, पर दो-एक बातें हाल की हैं। खासतौर से महात्मा गांधी की हत्या को लेकर पाठ्य पुस्तक से हटाई गई कुछ पंक्तियों का मसला सामने आया है, जिनका नोटिफिकेशन पिछले साल नहीं हुआ। एनसीईआरटी ने माना है कि उसकी अनदेखी हुई है।

बदलाव क्यों
2017 में जब इन किताबों का पुनरीक्षण किया गया, तब उसके पीछे ज्यादा बड़ी जरूरत उन्हें अपडेट करने की थी। उसके दस साल पहले किताबों में बदलाव हुआ था। बहुत सी किताबें उसके भी दस-पंद्रह साल पहले से हूबहू उसी रूप में छपती आ रही थीं, जैसी कि मूल रूप में लिखी गईं। सामाजिक विज्ञान की एक पुस्तक मे, जिसकी प्रस्तावना पर नवंबर 2007 की तारीख पड़ी थी, देश में आवास, विद्युत आपूर्ति और पाइप से पानी की सप्लाई के आँकड़े 1994 के थे। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उस साल 182 पाठ्य पुस्तकों में 1,334 बदलाव किए गए। औसतन हरेक किताब में सात बदलाव। इनमें जीएसटी टैक्स या ऐसी ही बातें शामिल की गईं। 

इसबार के बदलाव उससे भी ज्यादा हैं, क्योंकि ज्यादातर किताबों का आकार छोटा किया गया है। इस साल बदलाव के पीछे केवल अपडेट करने की इच्छा नहीं है, बल्कि कहा गया है कि कोविड-19 के दौरान महसूस किया गया कि बच्चों पर पढ़ाई का बोझ बहुत ज्यादा है। उसे कम करना चाहिए। इस लिहाज से इसबार अपडेट के साथ-साथ पुस्तकों का आकार भी छोटा किया गया है।

बोझ कम करना
पिछले साल एनसीईआरटी ने पाठ्य पुस्तकों में पाठ्य सामग्री का पुनर्संयोजन करने की घोषणा करते हुए कहा था कि कोविड-19 महामारी को देखते हुए विद्यार्थियों के ऊपर से पाठ्य सामग्री का बोझ कम करना जरूरी समझा गया।  राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भी विद्यार्थियों के लिए पाठ्य-सामग्री का बोझ कम करने और रचनात्मक नज़रिए से अनुभव करते हुए सीखने के अवसर प्रदान करने पर ज़ोर दिया गया है। इस पृष्ठभूमि में एनसीईआरटी ने सभी कक्षाओं की पुस्तकों का पुनर्संयोजन किया है। 

इसमें ध्यान रखा गया है कि एक ही कक्षा में अलग-अलग विषयों में या उससे आगे या पीछे की कक्षाओं में पाठ्य सामग्री की दोहर नहीं हो। बाकी बातें कठिनाई और शिक्षकों की आसानी से भी जुड़ी हैं। विद्यार्थी बाहरी हस्तक्षेप के बगैर स्वयं पढ़ सकें। इन सबके अलावा सामग्री अप्रासंगिक नहीं हो। इन पंक्तियों के लेखक ने जब इन बदलावों को देखने का प्रयास किया, तब एक बात स्पष्ट हुई कि जिन प्रश्नों से मीडिया जूझ रहा है, वे महत्वपूर्ण भले ही हैं, पर समुद्र में बूँद जैसे हैं। उन्हें लेकर छिड़ी बहस इन विषयों के पीछे छिपी राजनीति को उछालने के लिए हैं।

राजनीतिक नज़रिया
किताबों के शैक्षिक-प्रश्नों पर चर्चा उतनी नहीं है, जितनी राजनीतिक-नज़रिए को लेकर है। कांग्रेस, बीजेपी, साम्यवादी, समाजवादी, द्रविड़ और आंबेडकरवादी पार्टियों की अपनी-अपनी मान्यताएं हैं। सवाल है कि बच्चों को वस्तुनिष्ठ शिक्षा प्रदान करना क्या संभव नहीं है? ज्यादातर टकराव इतिहास, समाज-विज्ञान और साहित्य की शिक्षा में देखने को मिलेंगे। गणित, विज्ञान, भूगोल, कला और संगीत वगैरह में इसबात की संभावनाएं काफी कम हैं। जबकि सबसे ज्यादा बदलाव गणित और विज्ञान की पुस्तकों में ही करने की जरूरत होगी, क्योंकि उन्हें समय के साथ चलना होता है। 

भारतीय जनता पार्टी का दृष्टिकोण रहा है कि पाठ्य-सामग्री में भारत की मौलिकता भी झलकनी चाहिए। इससे असहमति नहीं होनी, पर ज्यादा बड़े सवाल सांप्रदायिक सद्भाव  और विद्वेष से जुड़े हैं। शिक्षा का काम वस्तुनिष्ठ तरीके से इतिहास की शिक्षा देना है। इन बातों के राजनीतिक निहितार्थ हैं, अब उनपर ध्यान दें। मसलन सामाजिक विज्ञान की पुस्तक से 2002 के गुजरात दंगों के संदर्भ या भारतीय राजनीति के एक खंड में अटल बिहारी वाजपेयी की 'राजधर्म' टिप्पणी का हटना और  ‘हिंदू चरमपंथियों की गांधी के प्रति नफरत’, महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर लगे प्रतिबंध वगैरह। ये तथ्य राजनीतिक नज़रिए को बताते हैं। देखना यह भी होगा कि ये बातें इन किताबों में कब जोड़ी गईं, उस समय किसकी सरकार थी वगैरह। इन्हें जोड़े बगैर काम चलता था या नहीं? और जुड़ गए, तो हटाया क्यों गया?