Sunday, May 20, 2018

कर्नाटक में हासिल क्या हुआ?

येदियुरप्पा की पराजय के बाद सवाल है कि क्या कर्नाटक-चुनाव की तार्किक परिणति यही थी? एचडी कुमारस्वामी की सरकार बन जाने के बाद क्या मान लिया जाए कि कर्नाटक की जनता उन्हें राज्य की सत्ता सौंपना चाहती थी?  इस सवाल का जवाब मिलने में कुछ समय लगेगा, क्योंकि राजनीति में तात्कालिक परिणाम ही अंतिम नहीं होते।


बीजेपी की दृष्टि से देखें तो कांग्रेस और जेडीएस का गठबंधन अपवित्र है। येदियुरप्पा ने कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों से अंतरात्मा की आवाज पर समर्थन माँगा था, जिसमें विफल रहने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उधर कांग्रेस-जेडीएस के नज़रिए से देखें, तो दो धर्मनिरपेक्ष दलों ने साम्प्रदायिक भाजपा को रोकने के लिए गठबंधन किया। यह राजनीति अब से लेकर 2019 के चुनाव तक चलेगी। बीजेपी के विरोधी दल एक साथ आएंगे।


उपरोक्त दोनों दृष्टिकोणों के अंतर्विरोध हैं। बीजेपी का पास स्पष्ट बहुमत नहीं था। निर्दलीयों और अन्य दलों के सदस्यों की संख्या इतनी नहीं थी कि बहुमत बन पाता। ऐसे में सरकार बनाने का दावा करने की कोई जरूरत नहीं थी। अंतरात्मा की जिस आवाज पर वे कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों को तोड़ने की उम्मीद कर रहे थे, वह संविधान-विरोधी है। संविधान की दसवीं अनुसूची का वह उल्लंघन होता। दल-बदल कानून अब ऐसी तोड़-फोड़ की इजाजत नहीं देता। कांग्रेस और जेडीएस ने समझौता कर लिया था, तो राज्यपाल को उन्हें ही बुलाना चाहिए था। बेशक अपने विवेकाधीन अधिकार के अंतर्गत वे सबसे बड़े दल को भी बुला सकते हैं, पर येदियुरप्पा सरकार के बहुमत पाने की कोई सम्भावना थी ही नहीं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप सही हुआ।


कर्नाटक के बहाने राज्यपाल, स्पीकर और सुप्रीम कोर्ट की भूमिकाओं को लेकर, जो विचार-विमर्श शुरू हुआ है, वह इस पूरे घटनाक्रम की उपलब्धि है। कांग्रेस की याचिका पर अदालत में अब सुनवाई होगी और सम्भव है कि ऐसी परिस्थिति में राज्यपालों के पास उपलब्ध विकल्पों पर रोशनी पड़ेगी कि संविधान की मंशा क्या है। हमने ब्रिटिश संसदीय पद्धति को अपनाया जरूर है, पर उसकी भावना को भूल चुके हैं। राज्यपालों और पीठासीन अधिकारियों की राजनीतिक भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कर्नाटक के राज्यपाल पहले नहीं हैं, जिनपर राजनीतिक तरफदारी का आरोप लगा है। सन 1952 से लेकर अबतक अनेक मौके आए हैं, जब यह भूमिका खुलकर सामने आई है।


विधायिका के पीठासीन अधिकारियों के मामले में आदर्श स्थिति यह होती है कि वे अपना दल छोड़ें। आदर्श संसदीय व्यवस्था में जब स्पीकर चुनाव लड़े तो किसी राजनीतिक दल को उसके खिलाफ प्रत्याशी खड़ा नहीं करना चाहिए। हमारी संसद में चर्चा के दौरान जो अराजकता होती है, वह भी आदर्शों से मेल नहीं खाती। कर्नाटक प्रकरण हमें इन सवालों पर विचार करने का मौका दे रहा है। कर्नाटक का यह चुनाव सारे देश की निगाहों में था। इसके पहले शायद ही दक्षिण के किसी राज्य की राजनीति पर पूरे देश की इतनी गहरी निगाहें रहीं हों। इस चुनाव की यह उपलब्धि है। मेरा यह आलेख दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित हुआ है। इसका यह इंट्रो मैंने 20 मई की सुबह लिखा है। इस प्रसंग को ज्यादा बड़े फलक पर देखने का मौका अब आएगा। 
हमें कोशिश करनी चाहिए कि यथा सम्भव तटस्थ रहकर देखें कि इस चुनाव में हमने क्या खोया और क्या पाया। राजनीतिक शब्दावली में हमारे यहाँ काफी प्रचलित शब्द है जनादेश। तो कर्नाटक में जनादेश क्या था? कौन जीता और कौन हारा? चूंकि किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, तो किसी की जीत नहीं है। पर क्या हार भी किसी की नहीं हुई? चुनाव में विजेता की चर्चा होती है, हारने वाले की चर्चा भी तो होनी चाहिए। गठबंधन की सरकार बनी, पर यह चुनाव बाद का गठबंधन है। 

कांग्रेस पार्टी को 2013 में 121 सीटें मिली थीं, इसबार 78 मिलीं। 43 सीटों पर पार्टी हारी, 13 मंत्री चुनाव हारे, जिनमें मुख्यमंत्री सिद्धारमैया शामिल हैं। तो कांग्रेस इसे कैसे जनादेश कह सकती है? अब जेडीएस को देखें। उसे पिछली बार 40 सीटों पर जीत मिली थी, इसबार 38 पर मिली है। बीजेपी को पिछली बार 40 सीटें मिलीं थीं, इसबार 104 मिली हैं। बेशक चुनाव के बाद का गठबंधन हो जाने के बाद कांग्रेस और जेडीएस की कुल सीटें बीजेपी की कुल सीटों से ज्यादा हो गईं, पर क्या यह जनादेश है?

कांग्रेस के प्रत्याशियों ने जब वोट माँगा तब बीजेपी के अलावा जेडीएस के खिलाफ भी माँगा। ऐसे ही जेडीएस ने बीजेपी के अलावा कांग्रेस के खिलाफ वोट भी माँगा। एक सामान्य सा गणित है कि कांग्रेस के 38 फीसदी और जेडीएस के 18.3 फीसदी वोट जोड़ दें तो 56.3 फीसदी वोटरों ने बीजेपी के खिलाफ वोट दिया। पर क्या ये सारे वोट बीजेपी के ही खिलाफ थे?

इन 56.3 फीसदी में कितने फीसदी वोट कांग्रेस के खिलाफ हैं और कितने फीसदी जेडीएस के खिलाफ हैं, इसका पता कैसे लगेगा? एक मासूम सा निष्कर्ष है कि 56.3 फीसदी वोट इस गठबंधन को मिले होते तो उसके पास 140 से ऊपर सीटें होतीं। सवाल है कि क्यों नहीं बना ऐसा गठबंधन?

जिस वक्त कर्नाटक के चुनाव परिणाम आ रहे थे, तब ममता बनर्जी ने ट्वीट किया, कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर चुनाव लड़ा होता तो परिणाम दूसरे होते, बहुत अलग। बेशक यह सामान्य गणित है। पर यह उतना सामान्य भी नहीं है। वस्तुतः जेडीएस के वोटरों में कुछ ऐसे वोटर भी हैं, जो कांग्रेस के विरोधी हैं। ऐसे ही कांग्रेस के वोटरों में ऐसे हैं, जो जेडीएस को नापसंद करते हैं। जब आप मिलकर खड़े होंगे, तब हालात दूसरे होंगे। बेशक काफी वोट ऐसा भी होगा, जो साथ आने से बढ़ेगा। सवाल है कि दोनों पार्टियों ने मिलकर चुनाव क्यों नहीं लड़ा?

लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, वैसे-वैसे विपक्षी एकता की सम्भावनाएं बढ़ती जा रहीं हैं। कहा जा रहा है कि बीजेपी को हराना है, तो हमें साथ आना होगा। पिछले चुनाव में बीजेपी को 31 फीसदी वोट मिले थे। इसे देखते हुए कुछ लोग कहते हैं कि देश में 69 फीसदी लोगों ने बीजेपी के खिलाफ वोट दिया। सच यह है कि इन 69 फीसदी वोटों में कुछ वोट कांग्रेस के खिलाफ, कुछ सीपीएम के खिलाफ और कुछ तृणमूल या दूसरे दलों के खिलाफ थे। काफी वोट जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा और न जाने किन वजहों से पड़े होंगे।  

राजनीतिक दल इसे विचारधारा का नाम देते हैं। विचारधारा भी वोट का एक कारण है, पर वही एक कारण नहीं है। ज्यादातर राजनीतिक दल चुनाव के पहले घोषणापत्र जारी करते हैं, पर वह प्रचार का पर्चा भर होता है। हमारी फर्स्ट पास्ट द पोस्ट के पीछे सिद्धांत है कि देश को कुछ चुनाव क्षेत्रों में बाँट दिया जाए और हर क्षेत्र से सबसे ज्यादा लोकप्रिय व्यक्ति को अपने इलाके की समूची जनता का प्रतिनिधित्व करने का मौका दिया जाए। इस व्यवस्था में वह उनका प्रतिनिधि भी होता है, जिन्होंने उसे वोट नहीं दिया।

यह व्यवस्था तबतक ठीक काम करती है, जबतक फैसला दो प्रत्याशियों या दो दलों के बीच हो। जैसे-जैसे राजनीतिक दलों की संख्या बढ़ती है, भ्रम बढ़ता है। इसके विकल्प में कुछ देशों में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली है, जिसके तहत जिस दल को जितने फीसदी वोट मिलते हैं, उसके उतने फीसदी सदस्य चुन लिए जाते हैं। जाहिर है इस व्यवस्था में क्षेत्रीय संतुलन नहीं बनता।

सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में समन्वय हमारी सबसे बड़ी जरूरत है। क्षत्रप शब्द पश्चिमी लोकतंत्र से नहीं आया है। आधुनिक भारतीय राजनीति पर परम्परागत क्षेत्रीय सूबेदारों के हावी होने की वजह है हमारी भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता। एक धीमी प्रक्रिया से क्षेत्रीयता और राष्ट्रीयता का समागम हो रहा है। प्रमाण है पार्टियों की बढ़ती संख्या। सन 1951 के चुनाव में हमारे यहाँ 14 राष्ट्रीय और 39 अन्य पार्टियाँ थीं। जबकि 2009 के लोकसभा चुनाव में 363 पार्टियाँ उतरीं थीं। इनमें 7 राष्ट्रीय, 34 प्रादेशिक और 242 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियाँ थीं। सन 2014 के चुनाव में 6 राष्ट्रीय पार्टियाँ, 45 प्रादेशिक और 419 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियाँ उतरी थीं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है।

कर्नाटक के परिणाम आने के बाद किसी ने सुझाव दिया था कि बीजेपी को सरकार बनाने की कोशिश करने के बजाय कांग्रेस और जेडीएस को सरकार बनाने का मौका देना चाहिए। इससे वह नैतिक रूप से खुद को पवित्र साबित कर सकती थी। कुछ समय बाद कुमारस्वामी सरकार अपने बोझ से खुद ही गिरती। अब उनकी ही सरकार बनने जा रही है।

विसंगति यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक ध्रुवीकरण नहीं हो पा रहा है। ज्यादातर राजनीतिक गठबंधन चुनाव बाद होते हैं। ऐसे गठबंधनों को मौकापरस्ती कहा जाएगा, क्योंकि इनके कार्यक्रम और नीतियाँ हवाई होती हैं। जरूरत इस बात की है कि गठबंधन चुनाव से पहले बनें और एक कार्यक्रम के साथ बनें। कांग्रेस पार्टी को यह बात समझ में आ रही है कि उसे क्षेत्रीय पार्टियों और उसके नेताओं के लिए जगह छोड़नी होगी। कर्नाटक के परिणाम के बावजूद सीपीएम के नेता सीताराम येचुरी ने कहा है कि चुनाव-पूर्व गठबंधन की जरूरत नहीं है। उनके अनुसार 1996 का संयुक्त मोर्चा चुनाव के बाद ही बना था। ऐसे ही यूपीए-1 सरकार भी उत्तर-चुनाव गठबंधन का परिणाम थी।

राजनीतिक शक्तियों के बीच इतने किस्म के अंतर्विरोध हैं कि उनके करीब आने में दिक्कतें होती हैं। कर्नाटक में कुमारस्वामी सरकार बनने के बाद अब उसके अंतर्विरोधों का इंतजार करना होगा। सम्भव है कि सन 2019 के चुनाव तक वहाँ अंतर्विरोध न उभरें। अलबत्ता इस दौरान राज्यपालों, पीठासीन अधिकारियों और न्यायपालिका की भूमिका पर शुरू हुई चर्चा आगे बढ़ेगी। इसे भी तार्किक परिणति तक पहुँचने दीजिए।

हरिभूमि में प्रकाशित

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (21-05-2017) को "गीदड़ और विडाल" (चर्चा अंक-2977) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जन्म दिवस - सुमित्रानंदन पंत और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. निमंत्रण

    विशेष : 'सोमवार' २१ मई २०१८ को 'लोकतंत्र' संवाद मंच अपने साप्ताहिक सोमवारीय अंक के लेखक परिचय श्रृंखला में आपका परिचय आदरणीय गोपेश मोहन जैसवाल जी से करवाने जा रहा है। अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/



    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

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