Monday, January 9, 2023

आपने कभी शिकायती चिट्ठी लिखी?


हाल में एक शाम मेरे पुराने मित्र और सहयोगी संतोष तिवारी का फोन आया। बातों के दौरान एक पुरानी घटना का जिक्र हुआ। हम दोनों कभी लखनऊ के नवभारत टाइम्स में एक साथ काम कर चुके थे। बाद में तिवारी जी एकैडमिक्स में चले गए। अलग-अलग विश्वविद्यालयों के पत्रकारिता विभाग से संबद्ध रहने के बाद वे सेवामुक्त हो गए और आजकल लखनऊ के अपने घर में रह रहे हैं। 6 अक्टूबर 1995 के स्वतंत्र भारत में मैंने एक लेख लिखा था, जिसकी शुरुआत उनका संदर्भ देते हुए ही हुई थी। इस बात का जिक्र इसके पहले भी एकाध बार मैं उनसे कर चुका था। उन्होंने कहा, आप वह लेख मुझे भेज सकते हों, तो भेजें। मुझे वह लेख खोजने में एक दिन लगा। वॉट्सएप से उसकी तस्वीर मैंने उनके पास भेज दी। बहरहाल।

उस लेख को छपे 27 साल हो गए हैं, पर मुझे वह अब भी प्रासंगिक लगता है। ऐसा नहीं कि उसमें मैंने कोई बड़ी बात लिख दी हो, पर मन की बात थी, जो लिख दी थी। बहुत साधारण बात थी। उसमें तिवारी जी के अलावा हमारी एक और संपादकीय सहयोगी तृप्ति जी का जिक्र भी था। लेख में दोनों के नाम नहीं थे, उसकी जरूरत भी नहीं थी। तिवारी जी को तो मैंने बताया भी था, तृप्ति जी से शायद मैंने कभी इसका जिक्र किया भी नहीं। बहुत व्यक्तिगत प्रसंग भी नहीं था, और कभी ऐसा मौका मिला भी नहीं। पता नहीं तृप्ति जी को उस बात की याद है भी या नहीं। इस लेख की कतरन लगाई है। समय मिला, तो लेख को दुबारा टाइप करके अपने ब्लॉग में लगाऊंगा। यों तस्वीर का रिजॉल्यूशन अच्छा है। कतरन को पढ़ा जा सकता है।   

उपरोक्त वक्तव्य के साथ मैंने इस कतरन को फेसबुक पर लगा दिया। नवभारत टाइम्स, लखनऊ के ही पुराने साथी परवेज़ अहमद ने लिखा आपने लखनऊ याद दिला दिया...दोनों दोस्तों को सलाम। प्रमोद जी इसे पढ़ पाना आसान नहीं है। मुझे समझ में आ रहा था कि कुछ दोस्तों को पढ़ने में दिक्कत होगी। मैंने लिखा, मैं कल इसे टाइप करके ब्लॉग में लगाऊँगा।इसके बाद मैं सो गया।

सुबह उठने पर मैंने अपने मोबाइल फोन पर नवभारत टाइम्स, लखनऊ के ही पुराने मित्र मुकेश कुमार सिंह का संदेश देखा। उन्होंने कतरन का लेख टाइप करके भेजा था। फेसबुक को खोला, तो उसमें मुकेश ने परवेज़ को जवाब दिया था, लीजिए, मैंने आपका काम आसान कर दिया और परवेज़ अहमद जी की सहूलियत के लिए लेख को आसानी से पढ़ने लायक लेख में तब्दील कर दिया 😃😃। उन्होंने फेसबुक के कमेंट बॉक्स में पूरा लेख लगा दिया। चूंकि कमेंट के लिए शब्दों की सीमा होती है, इसलिए उसे तीन टुकड़ों में बाँट दिया। यह बात मेरे लिए खुशी और विस्मय दोनों का विषय है। बहरहाल इस लेख को पढ़ें:

 

पहले बताएं आपने कभी किसी से कोई शिकायत की?

बात कहने और उसे सुनने की संस्कृति विकसित हो, तब काफी कुछ किया जा सकेगा। क्या वह संस्कृति हमने विकसित की है? रोडवेज़ की बसों में एक जब वे नई होती हैं, डिब्बा लगा होता है 'सुझाव शिकायतें' या फिर यह सूचना लिखी होगी 'परिवाद पुस्तिका कंडक्टर से मांगें!परिवाद पुस्तिका देश भर के विभागों और दफ्तरों में होती है। हैरत है कि उनमें शिकायतें और सुझाव दर्ज नहीं होते। क्या शिकायतें हैं। नहीं और सुझाव देने की जरूरत नहीं रही? बात यह है कि शिकायतें इतनी है कि उन्हें सुना ही नहीं जा सकता। शिकायत है कि परिवाद पुस्तिका नहीं है। बस के कंडक्टर, ट्रेन के गार्ड, बैंक के मैनेजर या राशन के दुकानदार से परिवाद पुस्तिका मांग कर देखें। सुझाव इतने सारे हैं कि उन पर अमल करना असंभव। ज्यादातर लोग अपना काम कराना चाहते हैं। नियम-कानून की फिक्र किए बगैर।

 

कुछ साल पहले की बात है, लखनऊ के एक हिन्दी दैनिक पत्र के एक पत्रकार ने कहीं से पते लेकर अमेरिका और ब्रिटेन के कुछ प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों, खासकर पत्रकारिता के प्रशिक्षण और शोध से जुड़े संस्थानों को पत्र लिखे आशय यह था कि उन संस्थानों में शिक्षण, प्रशिक्षण और शोध कार्यों की जानकारी हासिल की जाए और यह पता लगाया जाए कि वहां प्रवेश पाने का 'जुगाड़' क्या है? 'जुगाड़' का अंग्रेजी पर्याय भले ही मिल जाए, पर इसका जो अर्थ भारत में है वह अनोखा है। पत्रकार बंधु ने पत्र लिख दिए थे, उन्हें उम्मीद नहीं थी कि कहीं से जवाब मिलेगा। उन्हें आश्चर्य तब हुआ जब प्रायः सभी संस्थानों से पत्रकारिता विभाग के अध्यक्षों ने व्यक्ति रूप से पत्र के उत्तर लिखे और साथ यह भी कहा कि योग्य सेवा के लिए भविष्य में भी पत्र लिखें।

Sunday, January 8, 2023

एंटनी की 'नरम हिंदुत्व'अपील पर हिलाल अहमद की टिप्पणी


कतरनें यानी मीडिया में जो इधर-उधर प्रकाशित हो रहा है
, उसके बारे में अपने पाठकों को जानकारी देना. ये कतरनें केवल जानकारी नहीं है, बल्कि विमर्श को आगे बढ़ाने के लिए हैं.

एके एंटनी की यह टिप्पणी कि कांग्रेस को 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए बहुसंख्यक हिंदू समुदाय को लामबंद करना चाहिए और अल्पसंख्यक ‘इस लड़ाई में काफी नहीं हैं‘ विचारों के गंभीर संकट को रेखांकित करता है...एंटनी की स्पष्ट रूप से ‘हिंदू हाव-भाव’ रखने की सलाह गैर-हिंदू समुदायों, विशेष रूप से मुस्लिमों के साथ जो कि वाजिब राजनीतिक हितधारक हैं को डील करने को लेकर कांग्रेस की बेचैनी को उजागर करती है. साथ ही, ये टिप्पणियां कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं द्वारा किए गए दावे को डिगाती हैं कि राहुल गांधी की अगुवाई वाली भारत जोड़ो यात्रा राजनीति क एक वैकल्पिक विजन पेश करेगी. दिप्रिंट में हिलाल अहमद का पूरा लेख पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें

वास्तविक आशावाद का समय

बजट पेश किए जाने में चार सप्ताह से भी कम समय बचा है। ऐसा खासतौर पर इस​लिए कि अतीत में जताए गए पूर्वानुमान, खासतौर पर सरकार के प्रवक्ताओं के अनुमान हकीकत से बहुत दूर रहे हैं। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के आरंभ में ही दो अंकों की वृद्धि के दावे के साथ इसकी शुरुआत हुई थी। यहां तक कि दूसरे कार्यकाल के पहले वर्ष 2019-20 में भी तत्कालीन मुख्य ​आर्थिक सलाहकार ने 7 फीसदी की वृद्धि का अनुमान जताया था जबकि वर्ष का समापन 4 फीसदी के साथ हुआ। बिजनेस स्टैंडर्ड में टीएन नायनन का साप्ताहिक लेख

जोशीमठ का धँसाव

जोशीमठ नगर में धँसाव 1970 के दशक में भी महसूस किया गया था। तब सरकारी स्तर पर गढ़वाल आयुक्त महेश चंद्र मिश्रा की अध्यक्षता में धँसाव के कारणों की जांच के लिए एक कमेटी बनाई गई थी। कमेटी ने 1978 में अपनी रिपोर्ट दी थी। इस रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि जोशीमठ नगर के साथ पूरी नीती और माणा घाटियां हिमोढ़ (मोरेन) पर बसी हुई हैं। ग्लेशियर पिघलने के बाद जो मलबा पीछे रह जाता है, उसे हिमोढ़ कहा जाता है। ऐसे में इन घाटियों में बड़े निर्माण कार्य नहीं किए जाने चाहिए। लेकिन मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट पर कभी किसी ने ध्यान नहीं दिया और इन घाटियों में दर्जनों जल विद्युत परियोजनाओं के साथ ही कई दूसरे निर्माण भी लगातार हो रहे हैं। जोशीमठ से करीब 7 किमी दूर स्थित रैणी गाँव 7 फरवरी 2021 को ग्लेशियर टूटने से तबाह हुआ रैणी गाँव जून 2021 में फिर से आई बाढ़ के कारण पूरी तरह असुरक्षित हो गया था। गाँव के ठीक नीचे जमीन अब भी लगातार खिसक रही है। यहाँ पढ़ें डाउन टु अर्थ में राजू सजवान की रिपोर्ट

 

विरोधी दलों को कितना जोड़ पाए राहुल?


राहुल गांधी की भारत-जोड़ो यात्रा का दूसरा चरण शुरू हो गया है। अब यात्रा का काफी छोटा हिस्सा शेष रह गया है, जिसमें उत्तर प्रदेश की सीमा को तो वे छूकर ही चले गए हैं। यूपी से ज्यादा समय वे हरियाणा और पंजाब को दे रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के नगाड़े बजने लगे हैं। राहुल गांधी की यह यात्रा प्रकारांतर से लोकसभा-अभियान की शुरुआत है। उधर अमित शाह पूर्वोत्तर में चुनाव-अभियान शुरू कर चुके हैं। यह अभियान त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड को लेकर है, जहाँ अगले महीने चुनाव हैं। इसके बाद नवंबर में मिजोरम में चुनाव होंगे। पूर्वोत्तर में एक जमाने में बीजेपी का नामोनिशान नहीं था, पर अब वह उसका गढ़ बन गया है। अभी दोनों, तीनों तरफ के पत्ते फेंटे जा रहे हैं। राजनीति का पर्दा धीरे-धीरे खुलेगा।

तीन सवाल

कुल मिलाकर राष्ट्रीय राजनीति के तीन सवाल उभर कर आ रहे हैं। भारत-जोड़ो यात्रा से कांग्रेस ने क्या हासिल किया? दूसरा सवाल है कि क्या विरोधी दल इसबार एक मोर्चा बनाकर बीजेपी का मुकाबला करेंगे? तीसरा सवाल है कि बीजेपी की रणनीति उपरोक्त दोनों सवालों के बरक्स क्या है? राहुल गांधी की यात्रा के उद्देश्य और निहितार्थ भी अब उतने महत्वपूर्ण नहीं रहे, जितना महत्वपूर्ण यह सवाल है कि कांग्रेस की रणनीति अब क्या होने वाली है? यात्रा का दूसरा चरण शुरू करने के पहले राहुल गांधी ने शनिवार 31 दिसंबर को दिल्ली में जो प्रेस कांफ्रेंस की, उससे कुछ संकेत मिलते हैं। इससे पता लग सकता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस किस रणनीति के साथ उतरने वाली है। इस रणनीति में दूसरे विरोधी दलों के साथ कांग्रेस का समन्वय किस प्रकार से होगा और इस एकता का आधार क्या होगा?

विरोधी एकता

राहुल गांधी ने विरोधी दलों की एकता से जुड़ी तीन महत्वपूर्ण बातों को रेखांकित करने का प्रयास किया। उन्होंने कहा एक, विपक्ष के तमाम नेता कांग्रेस से वैचारिक तौर पर जुड़े हैं। दो, ये अपने प्रभाव वाले राज्यों में क्षेत्रीय स्तर पर बीजेपी को चुनौती जरूर दे सकते हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के लिए वैचारिक चुनौती कांग्रेस ही खड़ी कर सकती है। तीन, यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी कांग्रेस की ही है कि विरोधी दल न केवल आरामदेह महसूस करें बल्कि उन्हें उचित सम्मान मिले। इसमें तीसरा बिंदु सबसे महत्वपूर्ण है। राहुल गांधी ने खासतौर से समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव के एक बयान के संदर्भ में कहा कि उनकी विचारधारा उत्तर प्रदेश तक सीमित है, जबकि हम राष्ट्रीय विचारधारा के साथ हैं। यह बात गले से उतरती नहीं है। यह माना जा सकता है कि समाजवादी पार्टी की रणनीति उत्तर प्रदेश केंद्रित है, पर वैचारिक आधार पर वह भी राष्ट्रीय होने का दावा कर सकती है। केंद्र में जब जनता पार्टी की सरकार बनी थी, वह इसी विचारधारा से जुड़ी थी। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने यात्रा में शामिल न होने के अखिलेश यादव और मायावती के फैसले को तूल न देते हुए बताया कि वे यात्रा में शामिल हों या न हों, विपक्ष की राजनीति में उनका अहम स्थान है। इसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश के नेताओं को पत्र भी लिखा। वे भले ही यात्रा में शामिल नहीं हुए, पर मान लेते हैं कि राहुल गांधी ने अपने व्यवहार से उन्हें खुश किया होगा।

Saturday, January 7, 2023

बिहार में जातिगत सर्वेक्षण के निहितार्थ


कतरनें यानी मीडिया में जो इधर-उधर प्रकाशित हो रहा है,
 उसके बारे में अपने पाठकों को जानकारी देना. ये कतरनें केवल जानकारी नहीं है, बल्कि विमर्श को आगे बढ़ाने के लिए हैं.

बिहार में आज 7 जनवरी से जातिगत सर्वेक्षण का काम शुरू हो गया है। यह काम दो चरणों में होगा। 7 से 21 जनवरी ( पहले चरण ) तक घरों की गिनती होगी। दूसरे चरण में जातियों को गिना जाएगा। इस कार्यक्रम के अंतर्गत केवल जाति की गणना नहीं हो रही है, लोगों की आर्थिक स्थिति का सर्वेक्षण भी किया जाएगा। राज्य सरकार इसे पूरा करने के लिए अपने आकस्मिक कोष से 500 करोड़ रुपये खर्च कर रही है। बिहार सरकार ने पिछले साल 2 जून को जातिगत सर्वेक्षण को मंज़ूरी दी थी। इस सर्वेक्षण में 12.7 करोड़ जनसंख्या, 2.58 करोड़ घरों को कवर किया जाएगा जो 31 मई को पूरा होगा। इसे जातिगत जनगणना नहीं कहा गया है, लेकिन इसमें जाति संबंधी जानकारी जुटाई जाएगी। बीबीसी हिंदी में पढ़ें विस्तार से

भारत जोड़ो यात्रा पर योगेंद्र यादव का एक और लेख

भारत-जोड़ो यात्रा पर वैबसाइट दिप्रिंट में जय किसान आंदोलन और स्वराज इंडिया के संस्थापक योगेंद्र यादव ने एक और लेख लिखा है. इसके तीन गिन पहले भी उन्होंने इसी वैबसाइट पर एक और लेख लिखा था. नए लेख के स्वर पिछले लेख से कुछ अलग हैं, इसलिए दोनों लेखों को एकसाथ पढ़ना चाहिए. बहरहाल 7 जनवरी के नवीनतम लेख में उन्होंने लिखा है, क्या भारत जोड़ो यात्रा ने सांप्रदायिक गुस्से को कम किया है? मैंने किसी कार्य-कारण प्रभाव के दावे को साबित करने के लिए हमेशा से ठोस सबूत भी मांगा है. लेकिन यह प्रश्न कठिन सबूत को भी स्वीकार नहीं कर रहा है. कम से कम इतने कम समय में तो नहीं…तो, मैं इसे सावधानी से बता दूं. मैं केवल एक सवाल खड़ा कर रहा हूं, फाइनल जवाब नहीं दे रहा हूं. जैसा कि सामाजिक विज्ञान में कहते हैं न कि यह एक अवधारणा (हाइपोथीसिस) है जिसकी जांच की जानी है. साथ ही, मैं साम्प्रदायिकता के संगठित या पूर्व नियोजित कृत्यों जैसे दंगों, हिंसा और हेट क्राइम के बारे में नहीं बोल रहा. अगर इन कृत्यों को घृणा की राजनीति से प्रेरित समूहों द्वारा डिजाइन और अंजाम नहीं दिया गया है, जिसका कि यह यात्रा विरोध करना चाहती है, मैं उनके दिल में अचानक बदलाव की उम्मीद नहीं करता, और वह भी भारत जोड़ो यात्रा से. मुझे रोज़मर्रा के सांप्रदायिक तनाव में दिलचस्पी है जो कि अव्यक्त शत्रुता और अविश्वास, अपशब्द, अपमान, पड़ोस के विवाद में मौजूद है–मुझे इस बात में दिलचस्पी है कि क्या यात्रा ने सांप्रदायिक कट्टरता में आम लोगों के शामिल होने को कम किया है…मेरा अनुमान है कि यात्रा का संदेश जहां भी पहुंचा है, इसने स्थानीय सांप्रदायिक तनाव में कमी लाने की भरसक कोशिश की है.. यहाँ पढ़ें यह लेख

नेपाल में प्रचंड के प्रधानमंत्री बनने से कितना ख़ुश है चीन?

नेपाल में नई सरकार के गठन के अगले ही दिननेपाल-चीन के बीच रेल संपर्क स्थापित करने के व्यावहारिक पहलू के अध्ययन के लिए चीन की एक तकनीकी टीम काठमांडू पहुंची। इसके एक दिन बादचीनी पक्ष ने रसुवागढी-केरुंग क्रॉसिंग को खोलने का फ़ैसला कियाजो कोविड-19 के समय से बंद था। हाल में चीन सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने नेपाल को लेकर दो महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की हैं। 3 जनवरी की एक टिप्पणी में कहा गया है कि चीन और नेपाल के सहयोग को लेकर भारत को ईर्ष्या नहीं होनी चाहिए। प्रचंड को प्रधानमंत्री नियुक्त किए जाने के बाद 29 दिसंबर 2022 को 'घुसपैठ द्वारा काठमांडू को नियंत्रित करने का अमेरिकी प्रयास विफल' शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया था।बीबीसी हिंदी में पढ़ें यह रिपोर्ट 

Friday, January 6, 2023

2024 में संभव है बीजेपी को हराना: डेरेक ओ’ब्रायन


कतरनें यानी मीडिया में जो इधर-उधर प्रकाशित हो रहा है, उसके बारे में अपने पाठकों को जानकारी देना. ये कतरनें केवल जानकारी नहीं है, बल्कि विमर्श को आगे बढ़ाने के लिए हैं.

तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओब्रायन ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि 2024 में बीजेपी को हराया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि लोकसभा चुनाव को अनेक राज्यों के विधानसभा चुनावों को रूप में जोड़ा जाए। जब भी किसी इलाके की मजबूत पार्टी से बीजेपी को सामना करना पड़ा, तो वह कमज़ोर साबित हुई है। उन्होंने लिखा है कि मैं जानबूझकर क्षेत्रीय पार्टी (रीज़नल पार्टी) शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहा हूँ, क्योंकि बहुत सी पार्टियों को राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता मिली हुई है। यदि आप हिमाचल प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश या तेलंगाना के चुनाव परिणामों को जोड़कर उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित करें, तो पाएंगे कि बीजेपी को 240 तक पहुँचने में भी मुश्किल होगी। मई, 2021 में पश्चिम बंगाल में क्या हुआ था? मोदी और अमित शाह दोनों ने ज़ोर लगा दिया, पर हार गए। पूरा लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

…और यह है बीजेपी की रणनीति

आज के इंडियन एक्सप्रेस में लिज़ मैथ्यूस की लंबी रिपोर्ट भी प्रकाशित हुई है, जिसमें बताया गया है कि 2024 के लिए बीजेपी की रणनीति क्या है। इसके अनुसार पार्टी ने अपने बूथ-स्तर के कार्यकर्ता से लेकर केंद्रीय मंत्रिस्तर के नेता तक को अपनी संगठनात्मक प्रक्रिया का हिस्सा बनाया है। गृहमंत्री अमित शाह मानते हैं कि मजबूत संगठन के बगैर बीजेपी अपनी जीत को दोहरा नहीं पाएगी। पार्टी ने पिछले साल अपनी लोकसभा प्रवास योजना शुरू कर दी है, जिसके तहत मंत्रियों सहित पार्टी के नेताओं को उन मुश्किल चुनाव-क्षेत्रों की जिम्मेदारी दी है, जहाँ 2019 में पार्टी दूसरे नंबर पर रही या बहुत मामूली अंतर से जीती थी। शुरू में ऐसे 144 चुनाव-क्षेत्र तय किए गए थे, जिनकी संख्या अब 160 हो गई है। 2019 में पार्टी ने 436 स्थानों पर चुनाव लड़ा था, जिनमें से 303 पर उसे जीत मिली। इस प्रकार 133 पराजित और 11 मामूली अंतर से जीती गई सीटों के आधार पर 144 की संख्या बनी थी, जिसे अब 160 कर लिया गया है। पूरी रिपोर्ट पढ़ें यहाँ

आसान नहीं है वैकल्पिक ऊर्जा की राह

अगर वर्ष 2022 ने दुनियाभर के नीति-निर्माताओं को कुछ सिखाया है तो वह यह कि उन्हें अपनी स्वच्छ ऊर्जा नीतियों को लेकर व्यावहारिक होना जरूरी था। रूस-यूक्रेन के बीच युद्ध सभी विकसित और विकासशील देशों के लिए एक कड़वे सच को पहचानने जैसा था, क्योंकि ये देश इस बात को लेकर बड़े आश्वस्त थे कि वे कोयले से बहुत ही जल्दी निजात पा लेंगे और हाइड्रोकार्बन पर अपनी निर्भरता को बड़ी तेजी से कम करने में सफल हो जाएंगे। मगर वर्ष ने कोयले की मांग और कीमत दोनों को और बढ़ा दिया।

विकसित देश जैसे अमेरिका और जर्मनी अब फिर से ईंधन की ओर रुख कर रहे हैं और कोयले के बंद पड़े संयंत्रों को फिर से शुरू कर रहे हैं। विशेष रूप से, पश्चिमी यूरोप इस बात को समझ गया है कि अगर इसे सस्ती दरों पर प्राकृतिक गैसों की आपूर्ति नहीं मिलती तो उसे सौर और पवन ऊर्जाओं से मदद नहीं मिलने वाली है। इसने यह भी पाया है कि पारंपरिक ऊर्जा आपूर्ति में रुकावट आने से लीथियम और निकल जैसे खनिजों की कीमतें बढ़ जाएंगी। बिजनेस स्टैंडर्ड में पढ़ें प्रसेनजित दत्ता का आलेख


Thursday, January 5, 2023

नैनो उर्वरकों की सफलता

 कतरनें

कतरनें यानी मीडिया में जो इधर-उधर प्रकाशित हो रहा है, उसके बारे में अपने पाठकों को जानकारी देना. ये कतरनें केवल जानकारी नहीं है, बल्कि विमर्श को आगे बढ़ाने के लिए हैं.

नैनो यूरिया की सफलता के बाद, अब दूसरे सबसे अ​धिक खपत वाले उर्वरक डीएपी (डाई अमोनियम फॉस्फेट) के नैनो संस्करण को जैव सुरक्षा और विषाक्तता परीक्षणों में मंजूरी मिल गई है और इसके साथ ही अगले खरीफ सत्र में इसे खेतों में इस्तेमाल करने की औपचारिक स्वीकृति का मार्ग भी प्रशस्त हो गया है। ये नवाचारी और स्वदेशी तौर पर विकसित तरल उर्वरक फसलों के जरूरी पोषण के लिए किए जाने वाले आयात और सरकारी स​सब्सिडी के क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाने वाले साबित हो सकते हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड का संपादकीय, जिसने मेरी जानकारी को बढ़ाया

जम्मू-क्षेत्र में फिर हत्याएं

जेहादियों द्वारा नए साल की सुबह राजौरी के छह निवासियों की हत्या ने, जो कि वर्षों में इस तरह की पहली सामूहिक हत्या है, आशंका जताई है कि जम्मू क्षेत्र में जानलेवा सांप्रदायिक युद्ध फिर से शुरू हो सकता है. तीस साल पहले किश्तवाड़ बस यात्रियों की हत्या ने भी, जो अपनी तरह की पहली घटना थी, इस हफ्ते की साम्प्रदायिक हत्याओं-और उससे पहले हुए कई नरसंहारों की तरह का खाका तैयार किया था. दिप्रिंट में प्रवीण स्वामी का आलेख

अल नस्र से नाता क्यों जोड़ा रोनाल्डो ने?

एक महीने से भी कम वक्त गुज़रा है, जब पुर्तगाल की फ़ुटबॉल टीम के कप्तान क्रिस्टियानो रोनाल्डो क़तर में हो रहे विश्व कप के क्वॉर्टर फ़ाइनल में मोरक्को से 1-0 से हारने के बाद आंखों में आंसू लिए मैदान से बाहर जाते दिखे थे. पुर्तगाल को हराने के बाद मोरक्को वर्ल्ड कप के सेमीफ़ाइनल तक पहुँचने वाला पहला अफ़्रीकी अरब देश बना था. विश्व कप जीतने का सपना टूटने के कुछ सप्ताह बाद अब पुर्तगाल के कप्तान क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने यूरोपीय फ़ुटबॉल क्लब मैनचेस्टर यूनाइटेड छोड़कर, सऊदी अरब के 'अल-नस्र' से नाता जोड़ लिया है. अल नस्र और रोनाल्डो के बीच हुआ क़रार अब तक का सबसे महंगा सौदा बताया जा रहा है. अल-नस्र 2025 तक हर साल रोनाल्डो को क़रीब 1800 करोड़ रुपये का भुगतान करेगा. सऊदी अरब की टीम रोनाल्डो पर इतना पैसा क्यों बहा रही है इसपर पढ़ें बीबीसीहिंदी की यह रिपोर्ट

 

Wednesday, January 4, 2023

जजों की नियुक्तियों से जुड़ा विवाद

 कतरनें
कतरनें यानी मीडिया में जो इधर-उधर प्रकाशित हो रहा है, उसके बारे में अपने पाठकों को जानकारी देना. ये कतरनें केवल जानकारी नहीं है, बल्कि विमर्श को आगे बढ़ाने के लिए हैं.

न्यायाधीशों तथा निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर सार्वजनिक विवाद चल रहा है। सरकार संविधान के प्रासंगिक प्रावधानों के सहारे है और दलील दे रही है कि नियुक्तियों के निर्णय का अधिकार कार्यपालिका के पास है। जबकि इससे अलग नजरिया रखने वालों को संविधान की मूल भावना की चिंता है। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की मौजूदा प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के 1993 और 1998 के निर्णयों पर आधारित है और यह चयन सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का एक कॉलेजियम करता है जिसकी अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पास होती है। कार्यपालिका उनसे पुनर्विचार करने को कह सकती है, लेकिन अगर कॉलेजियम अपनी अनुशंसा पर टिका रहता है तो उसे स्वीकार करना होगा। हालांकि सरकार इन अनुशंसाओं को महीनों तक रोककर नियुक्तियों को लंबित रख सकती है। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की स्थापना को लेकर संसद ने एक कानून भी बनाया, जिसके पास उच्च न्यायालय की नियुक्तियों का अधिकार होता। इस आयोग की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश के पास होती और इसमें दो वरिष्ठ न्यायाधीश, केंद्रीय कानून मंत्री और दो ‘प्रतिष्ठित’ व्यक्ति शामिल होते, जिनकी सहमति मिलने पर ही नियुक्तियां होतीं। उच्चतम न्यायालय ने इसे असंवैधानिक बताते हुए निरस्त कर दिया। दलील दी गई कि यह न्यायिक स्वायत्तता के साथ समझौता करने जैसा है जबकि वह संविधान की विशेषताओं में से एक है जिसमें संसद संशोधन नहीं कर सकती। बिजनेस स्टैंडर्ड में नितिन देसाई का पूरा लेख पढ़ें यहाँ

ब्रेक्जिट का असर

ब्रिटिश साप्ताहिक इकोनॉमिस्ट ने इस असर को कुछ चार्टों और विशेषज्ञों के बातचीत से बताया है। मोटी राय है कि ब्रिटिश अर्थव्यवस्था की संवृद्धि, कारोबार और उससे जुड़ी सभी बातों पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। पूरी रिपोर्ट पढ़ें यहाँ

भारत-जोड़ो यात्रा

जय किसान आंदोलन और स्वराज इंडिया के संस्थापकों में से एक योगेंद्र यादव भी राहुल गांधी की भारत-जोड़ो यात्रा के सहयात्री हैं। उन्होंने वैबसाइट द प्रिंट में एक लेख लिखा है, जिसमें कहा है कि संयोग देखिए कि यात्रा का देश की राजधानी में पहुंचना और देश के मानस में पैठ बनाना एक साथ हुआ है. और, जो ऐसा हुआ है तो शुक्रिया कहना बनता है मुख्यधारा की मीडिया के उस बड़े हिस्से का जिसने बड़ी देर और ना-नुकुर के बाद अब मान लिया है कि दिलों को जोड़ने के लिए देश में एक यात्रा हो रही है. उनका लेख पढ़ें यहाँ

हल्द्वानी में अतिक्रमण-आंदोलन

उत्तराखंड के हल्द्वानी शहर में रेलवे की जमीन पर से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के विरोध में चार हजार से ज्यादा परिवार सड़कों पर आ गए हैं। इनमें ज्यादातर मुस्लिम परिवार है। यह विवाद 2007 से चल रहा है और उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रेलवे की जमीन से अतिक्रमण हटाने का आदेश पारित किया है। अतिक्रमण हटाए जाने का विरोध करने वालों ने धरने और रास्ता जाम का सहारा लिया है। ऑपइंडिया की नूपुर जे शर्मा ने इस परिघटना के राजनीतिक पहलू को समेटते हुए जो रिपोर्ट लिखी है, उसे पढ़ें यहाँ  

 

 

 

भारत-रूस रिश्तों में आता बदलाव


देस-परदेश

भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में शामिल है, जहाँ सोवियत-व्यवस्था को तारीफ की निगाहों से देखा गया. भारत की तमाम देशों से मैत्री रही. शीतयुद्ध के दौरान गुट-निरपेक्ष आंदोलन में भी भारत की भूमिका रही. देश की जनता ने वास्तव में सोवियत संघ को मित्र-देश माना. आज के रूस को भी हम सोवियत संघ का वारिस मानते हैं.

यूक्रेन पर हमले की भारत ने निंदा नहीं की. संरा राष्ट्र सुरक्षा परिषद या महासभा में लाए गए ज्यादातर रूस-विरोधी प्रस्तावों पर मतदान के समय भारतीय प्रतिनिधि अनुपस्थित रहे. जरूरत पड़ी भी तो रूस की आलोचना में बहुत नरम भाषा की हमने इस्तेमाल किया.

शंघाई सहयोग संगठन के समरकंद में हुए शिखर सम्मेलन में नरेंद्र मोदी व्लादिमीर पुतिन से सिर्फ इतना कहा कि आज युद्धों का ज़माना नहीं है, तो पश्चिमी मीडिया उस बयान को ले दौड़ा. भारत-रूस मैत्री के शानदार इतिहास के बावजूद रिश्तों में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है और परिस्थितियाँ बता रही हैं कि दोनों की निकटता का स्तर वह नहीं रहेगा, जो सत्तर के दशक में था.

व्यावहारिक धरातल

सच यह है कि आज भारत न तो रूस का उतना गहरा मित्र है, जितना कभी होता था. पर वह उतना गहरा शत्रु कभी नहीं बन पाएगा, जितनी पश्चिम को उम्मीद हो सकती है. यूक्रेन पर हमले को लेकर भारत ने रूस की सीधी आलोचना नहीं की, पर भारत मानता है कि रूस के इस फौजी ऑपरेशन ने दुनिया में गफलत पैदा की है. विदेशमंत्री एस जयशंकर कई बार कह चुके हैं कि आम नागरिकों की जान लेना भारत को किसी भी तरह स्वीकार नहीं है.

भारत और रूस के रिश्तों के पीछे एक बड़ा कारण रक्षा-तकनीक है. भारतीय सेनाओं के पास जो उपकरण हैं, उनमें सबसे ज्यादा रूस से प्राप्त हुए हैं. विदेशमंत्री एस जयशंकर ने गत 10 अक्तूबर को ऑस्ट्रेलिया में एक प्रेस-वार्ता के दौरान कहा कि हमारे पास रूसी सैनिक साजो-सामान होने की वजह है पश्चिमी देशों की नीति. पश्चिमी देशों ने हमें रूस की ओर धकेला. पश्चिमी देशों ने दक्षिण एशिया में एक सैनिक तानाशाही को सहयोगी बनाया था. दशकों तक भारत को कोई भी पश्चिमी देश हथियार नहीं देता था.

रक्षा-तकनीक के अलावा कश्मीर के मामले में महत्वपूर्ण मौकों पर रूस ने संरा सुरक्षा परिषद में ऐसे प्रस्तावों को वीटो किया, जो भारत के खिलाफ जाते थे. कश्मीर के मसले पर पश्चिमी देशों के मुकाबले रूस का रुख भारत के पक्ष में था. यह बात मैत्री को दृढ़ करती चली गई. फिर अगस्त,1971 में हुई भारत-सोवियत संधि ने इस मैत्री को और दृढ़ किया.

Tuesday, January 3, 2023

क्या हिंदू-मन श्रेष्ठता के नशे में चूर है?

कतरनें यानी मीडिया में जो इधर-उधर प्रकाशित हो रहा है, उसके बारे में अपने पाठकों को जानकारी देना. ये कतरनें केवल जानकारी नहीं है, बल्कि विचारणीय हैं.

द वायर में अपूर्वानंद का एक आलेख न केवल पठनीय है, बल्कि इसपर चर्चा होनी चाहिए. उन्होंने लिखा है:

‘नए साल में किन चिंताओं, चुनौतियों और उम्मीदों के साथ प्रवेश कर रहे हैं?’, मित्र का प्रश्न था. अमूमन नए साल के इरादों का जिक्र होता है. लेकिन एक समाज या एक देश के तौर पर हम कुछ इरादे करें और वे कारगर हों, इसके पहले ईमानदारी से अपनी हालत का जायज़ा लेना ज़रूरी होगा.

चिंता सबसे बड़ी क्या है? कुछ लोग कहते हैं समाज में समुदायों के बीच बढ़ती हुई खाई. मुख्य रूप से हिंदू मुसलमान के बीच अलगाव. लेकिन ऐसा कहने से भरम होता है कि इसमें दोष दोनों पक्षों का है. बात यह नहीं है.

असल चिंता का विषय है, भारत में ऐसे हिंदू दिमाग का निर्माण जो श्रेष्ठतावाद के नशे में चूर है. इसी से बाकी बातें जुड़ी हुई हैं. एक श्रेष्ठतावादी मस्तिष्क बाहरी प्रभावों से डरा हुआ, संकुचित और बंद दिमाग होता है. इस वजह से वह कमजोर भी हो जाता है.

स्वीकार करने में बुरा लगता है, लेकिन सच है कि आज का आम हिंदू मन बाहरी, विदेशी के प्रति द्वेष और घृणा से भरा हुआ है. बाहरी तरह-तरह के हो सकते हैं. वे मुसलमान हैं और ईसाई भी. उनसे उसका रिश्ता शत्रुता का ही हो सकता है. इस लेख को पूरा पढ़ें यहाँ

चीन से रिश्ते

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने चीन के साथ बने हालात को 'प्रचंड चुनौती' बताया है. हालांकि उन्होंने इस बारे में और कुछ नहीं कहा है कि 'प्रचंड चुनौती' से उनका क्या मतलब है. बीबीसी हिंदी ने कोलकाता से छपने वाले अंग्रेज़ी अख़बार टेलीग्राफ़ की रिपोर्ट का हवाला देते हुए लिखा है कि एस जयशंकर इससे पहले चीन के साथ भारत के द्विपक्षीय संबंधों को 'असामान्य' कहते रहे हैं और इस लिहाज से विदेश मंत्री की ताज़ा टिप्पणी एक क़दम आगे बढ़ने जैसी है.

Monday, January 2, 2023

यूक्रेन-युद्ध और रूस का घटता रसूख

25 दिसंबर को क्रेमिलन में खामोशी का आलम था. राष्ट्रपति भवन पर पूरी तरह से बोरिस येल्तसिन का नियंत्रण था. गोर्बाचेव अपने दफ़्तर और कुछ कमरों में सिमट कर रह गए थे.उसी शाम 7:32 मिनट पर सोवियत संघ के रेड फ्लैग की जगह रूस के पहले राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन की अगुवाई में रूसी संघ का झंडा लहरा दिया गयादुनिया के सबसे बड़े कम्युनिस्ट देश के विघटन के साथ 15 स्वतंत्र गणराज्यों- आर्मीनिया, अज़रबैजान, बेलारूस, एस्स्तोनिया, जॉर्जिया, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, लात्विया, लिथुआनिया, मालदोवा, रूस, ताजकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, यूक्रेन और उज़्बेकिस्तान का उदय हुआ.

रूस से जुड़ी दो महत्वपूर्ण तारीखें हाल में गुज़री हैं. नवंबर, 1917 की बोल्शेविक क्रांति के बाद 30 दिसंबर, 1922 को सोवियत संघ की स्थापना की घोषणा हुई थी. उसके 100 साल गत 30 दिसंबर को पूरे हुए. आज रूस में इस शताब्दी का समारोह मनाने के लिए कम्युनिस्ट सरकार नहीं है, पर यह पिछली सदी की सबसे बड़ी परिघटनाओं में से एक थी.

इस बात को याद करने की एक बड़ी वजह है यूक्रेन-युद्ध, जिसके पीछे कुंठित रूसी साम्राज्यवाद की आहट भी है, जो बीसवीं सदी में ही हंगरी, चेकोस्लोवाकिया और अफगानिस्तान में नज़र आया था. पिछले साल फरवरी में यूक्रेन पर हमला करने के पहले व्लादिमीर पुतिन के भाषण में रूसी-राष्ट्रवाद की गंध आ रही थी. वह अपने पुराने रसूख को कायम करना चाहता है. हालांकि लड़ाई जारी है, पर लगता नहीं कि रूस अपने उस मकसद को पूरा कर पाएगा, जिसके लिए यह लड़ाई शुरू हुई है. 

पिछले महीने रूस की कम्युनिस्ट पार्टी ने सोवियत संघ की शताब्दी का समारोह मनाया, पर इसे रूस में ही खास महत्व नहीं दिया गया. पचास साल पहले जब 1972 में सोवियत संघ के पचास साल का समारोह मनाया गया था, तब वह अमेरिका के मुकाबले की ताकत था. कोई कह नहीं सकता था कि अगले बीस साल में यह व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी. 

दूसरी परिघटना थी सोवियत संघ का विघटन जो 26 दिसंबर, 1991 को हुआ. इस परिघटना की प्रतिक्रिया हमें यूक्रेन-युद्ध के रूप में दिखाई पड़ रही है, जो पिछले साल फरवरी में शुरू हुआ था. एक सदी पहले सोवियत संघ के उदय ने एक नई विश्व-व्यवस्था का स्वप्न दिया था, जो पूँजीवादी-साम्यवाद के विरोध में सामने आई थी. इस व्यवस्था ने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में प्रगति के नए मानक स्थापित किए, और एक नई सैन्य-शक्ति को खड़ा किया.

Sunday, January 1, 2023

साल का सवाल, कब रुकेगा यूक्रेन-युद्ध?


आमतौर पर नया साल नई उम्मीदें और नए सपने लेकर आता है, पर इसबार नया साल कई तरह के सवाल लेकर आया है। इनमें से ज्यादातर सवाल पिछले साल फरवरी में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद से पैदा हुई परिस्थितियों से जुड़े हैं। यह लड़ाई मामूली साबित नहीं हुई। पिछले साल फरवरी में समझा जा रहा था कि कुछ दिन में खत्म हो जाएगी। लड़ाई न केवल जारी है, बल्कि उसने दुनिया की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। दो साल से महामारी की शिकार दुनिया को उम्मीद थी कि शायद अब गाड़ी फिर से पटरी पर वापस आएग, पर ऐसा हुआ नहीं। इस लड़ाई ने विश्व-व्यवस्था को लेकर कुछ बुनियादी धारणाएं ध्वस्त कर दीं। इनमें सबसे बड़ी धारणा यह थी कि अब देशों के बीच लड़ाइयों का ज़माना नहीं रहा। यूक्रेन के बाद ताइवान को लेकर चीनी गर्जन-तर्जन को देखते हुए सारे सिद्धांत बदल रहे हैं। दक्षिण चीन सागर में चीन संरा समुद्री कानून संधि का खुला उल्लंघन करके विश्व-व्यवस्था को चुनौती दे रहा है।

टूटती धारणाएं

माना जा रहा था कि जब दुनिया के सभी देशों का आपसी व्यापार एक-दूसरे से हो रहा है, तब युद्ध की स्थितियाँ बनेंगी नहीं, क्योंकि सब एक-दूसरे पर आश्रित हैं। यह धारणा भी थी कि जब पश्चिमी देशों के साथ चीन की अर्थव्यवस्था काफी जुड़ गई है, तब मार्केट-मुखी चीन इस व्यवस्था को तोड़ना नहीं चाहेगा। पर हो कुछ और रहा है। एक गलतफहमी यह भी थी कि अमेरिका और पश्चिमी देशों की आर्थिक-पाबंदियों का तोड़ निकाल पाना किसी देश के बस की बात नहीं।  उसे भी रूस ने ध्वस्त कर दिया है। रूस का साथ देने वाले देश भी दुनिया में हैं। मसलन भारत के साथ रूस ने रुपये के माध्यम से व्यापार शुरू कर दिया है। चीन के साथ उसका आर्थिक सहयोग पहले से ही काफी मजबूत है। ईरान के साथ भी रूस के अच्छे कारोबारी रिश्ते हैं।

विश्व-व्यवस्था

ज्यादा बड़ी समस्या वैश्विक-व्यवस्था यानी ग्लोबल ऑर्डर से जुड़ी है। आज की विश्व-व्यवस्था की अघोषित धुरी है अमेरिका और उसके पीछे खड़े पश्चिमी देश। इसकी शुरुआत पहले विश्व-युद्ध के बाद से हुई है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने लीग ऑफ नेशंस के मार्फत ‘नई विश्व-व्यवस्था’ कायम करने का ठेका उठाया। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद गठित संयुक्त राष्ट्र और दूसरी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के पीछे अमेरिका है। उसके पहले उन्नीसवीं सदी में एक और अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स मुनरो ने अमेरिका के महाशक्ति बनने की घोषणा कर दी थी। बीसवीं सदी में अमेरिका और उसके साथ वैश्विक-थानेदार बने रहे, पर यह अनंतकाल तक नहीं चलेगा। 2021 में अफगानिस्तान में हुई अमेरिका की अपमानजनक पराजय के बाद 2022 में यूक्रेन में भी अमेरिकी-नीतियाँ विफल ही हैं। साथ ही उसके परंपरागत यूरोपीय मित्र भी पूरी तरह उसके साथ नहीं है। इसकी वजह है खुली हुई आर्थिक-व्यवस्था। शीतयुद्ध के दौर में अर्थव्यवस्थाएं पूरी तरह अलग थीं। आज यूरोप के देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस पर आश्रित हैं। पूँजी निवेश के लिए वे चीन का मुँह देख रहे हैं। यह भी जरूरी नहीं कि उसी तौर-तरीके से चले जैसे अभी तक चला आ रहा था। दुनिया के सामने इस समय महामारी के अलावा मुद्रास्फीति, आर्थिक मंदी से लेकर जलवायु परिवर्तन तक के खतरे खड़े हैं। दूसरी तरफ इनका सामना करने वाली वैश्विक-व्यवस्था कमज़ोर पड़ रही है, यह बात भी यूक्रेन-युद्ध ने साबित की है।

Saturday, December 31, 2022

राहुल गांधी की दृष्टि

कांग्रेस नेता राहुल गांधी इन दिनों भारत जोड़ो यात्रा पर हैं। वह लगातार जनसभाओं और मीडिया को भी संबोधित कर रहे हैं। शनिवार 31 दिसंबर को उन्होंने दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय पर मीडिया से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने कई पत्रकारों के कई सवालों के जवाब दिए। वे बहुत ही सधे हुए नजर आए और उन्होंने हर सवाल का बहुत सावधानी से जवाब दिया। यह कहना मुश्किल है कि उनसे पूछे गए सवाल पूर्व नियोजित थे या नहीं।

'टी-शर्ट में ठंड क्यों नहीं लगती' जैसे सवालों से राहुल गांधी का एक बार फिर सामना हुआ। मीडिया से उन्होंने करीब 46 मिनट बात की और और आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश की 'मीडिया के सामने आने से डरते हैं.। 

क सवाल से राहुल गांधी चौंके और उन्होंने बहुत ही शालीनता और समझदारी से उसका जवाब दिया। दरअसल, राहुल गांधी से पूछा गया था कि अगर वह देश के प्रधानमंत्री बन जाएंगे तो सबसे पहले तीन काम क्या करेंगे? यहाँ पढ़ें कि राहुल गांधी ने क्या दिए जवाब...

भारत की महानता

भारतीय मतदाताओं को यह विश्वास दिलाया गया है कि दुनिया में उनका देश एक अग्रणी भूमिका निभाएगा। पिछली सरकारों की तुलना में वर्तमान सरकार के लिए यह बात काफी हद तक लागू होती है। राजनीतिक महकमे में कोई भी वैश्विक संरचना में भारत की भूमिका को लेकर कम आश्वस्त नहीं दिखना चाहता है। यह धारणा केवल राजनीतिज्ञों एवं अधिकारियों तक ही सीमित नहीं है बल्कि निजी क्षेत्र भी यह सोचने लगा है कि दुनिया में भारत का रसूख पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है।

क्या दुनिया में भारत की अहमियत वाकई बढ़ गई है और इसके बिना कोई काम नहीं हो सकता है? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए हमें तीन संदर्भों पर विचार करना चाहिए। पहला है निवेश के लिहाज से माकूल स्थान, दूसरा वैश्विक कंपनियों के लिए बड़े बाजार और तीसरा भू-आर्थिक एवं भू-राजनीतिक साझेदार के रूम में। पहली नजर में निवेश के लिहाज से एक अहम बाजार के रूप में भारत का प्रदर्शन संतोषजनक लग रहा है। वित्त वर्ष 2021-22 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) बढ़कर 85 अरब डॉलर के अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। मगर सवाल है कि क्या यह आंकड़ा काफी है? बिजनेस स्टैंडर्ड हिंदी में पढ़ें मिहिर शर्मा का यह लेख

प्रणय रॉय पर शेखर गुप्ता

मीडिया जगत की बीते साल की सबसे बड़ी खबर यह रही कि प्रणय और राधिका रॉय ने एनडीटीवी का स्वामित्व छोड़ दिया और उसे अडाणी समूह ने हासिल कर लिया रॉय दंपति ने जो विदाई संदेश दिया वह साथ स्पष्ट करता है कि उन्होंने पत्रकारिता किस भावना से की। टीवी समाचार की बेहद बेचैन दुनिया में उनके जैसा स्थिरचित्त होना दुर्लभ है, यह लिखा है शेखर गुप्ता ने अपने साप्ताहिक कॉलम में पढ़ें यहाँ

2023 में होने वाले चुनाव


भारत के विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव

·      फरवरी-त्रिपुरा जहाँ इस समय भारतीय जनता पार्टी की सरकार है
·      फरवरी-मेघालय जहाँ इस समय नेशनल पीपुल्स पार्टी की सरकार है
·      फरवरी-नगालैंड जहाँ नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी और बीजेपी के गठबंधन की सरकार है
·      मई-कर्नाटक जहाँ भारतीय जनता पार्टी की सरकार है
·      नवंबर-छत्तीसगढ़ जहाँ कांग्रेस की सरकार है
·      नवंबर-मध्य प्रदेश जहाँ भारतीय जनता पार्टी की सरकार है
·      नवंबर-मिज़ोरम जहाँ मिज़ो नेशनल फ्रंट की सरकार है
·      दिसंबर-राजस्थान जहाँ कांग्रेस की सरकार है
·      दिसंबर-तेलंगाना जहाँ तेलंगाना राष्ट्र समिति की सरकार है

संभव है कि इस साल जम्मू-कश्मीर विधानसभा के चुनाव भी किसी समय हो जाएं

विदेशी चुनाव: कुछ ऐसे देश जहाँ के चुनावों पर नजर रखनी चाहिए

·      25 फरवरी-नाइजीरिया
·      18 जून-तुर्की, जिसका नाम अब तुर्किये हो गया है
·      अगस्त से अक्तूबर-पाकिस्तान
·      29 अक्तूबर-अर्जेंटीना
·      दिसंबर-बांग्लादेश

Thursday, December 29, 2022

कोरोना को लेकर अब घबराने की जरूरत नहीं


दुनिया में एक बार फिर तेज़ी से कोरोना वायरस का संक्रमण बढ़ने की खबरें हैं। खासतौर से चीन के बारे में कहा जा रहा है कि वहाँ जिस रफ़्तार से वायरस का एक नया वेरिएंट फ़ैल रहा है, वहां इससे पहले देखा नहीं गया। चीन के अलावा अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया, फ्रांस और यूरोप के कुछ और देशों में कोरोना की नई लहर की खबरें हैं। इन्हें लेकर भारत में भी डर फैल रहा है कि शायद कोई और भयावह लहर आने वाली है। चीन में जिस नए वेरिएंट की खबर है, उसका नाम बीएफ.7 रखा गया है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ भारत में तीन नए मामले ओमिक्रॉन के इस सब-वेरिएंट बीएफ.7 के पाए गए हैं।

भारत सरकार ने अपनी तरफ से इस सिलसिले में एहतियाती कदम उठाए हैं, पर विशेषज्ञों का कहना है कि इन खबरों से न तो परेशान होने की जरूरत है और न सनसनी फैलाने का कोई मतलब है। हवाई अड्डों पर चीन से आने वाले और अन्य विदेशी यात्रियों की रैंडम टेस्टिंग शुरू कर दी गई है। कुछ भारतीय चैनलों ने इसे जरूरत से ज्यादा तूल दिया है, जिसके कारण अनावश्यक सनसनी फैल रही है। यह सच है कि दुनिया से कोविड-19 अभी खत्म नहीं हुआ है, पर उस तरह की खतरनाक लहर की संभावना अब नहीं है, जैसी पहले आ चुकी है।

जीरो-कोविड नीति का परिणाम

चीन में हो रहे संक्रमण की एक वजह यह है कि वहाँ ज़ीरो कोविड नीति के कारण संक्रमण रुका हुआ था। हाल में जनता के विरोध के बाद प्रतिबंध उठा लिए गए हैं, जिसके कारण संक्रमण बढ़ा है। पर यह संक्रमण कितना है और उसका प्रभाव कितना है, इसे लेकर अफवाहें ज्यादा हैं, तथ्य कम। वस्तुतः चीन सरकार बहुत सी बातें बताती भी नहीं है, जिसके कारण अफवाहें फैलती हैं।

Wednesday, December 28, 2022

मालदीव में भारत-विरोधी अभियान और चीन


देस-परदेश

मालदीव में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन की चीन-समर्थक ‘प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव (पीपीएम) के एक नेता द्वारा राजधानी माले में भारतीय उच्चायोग पर हमले के लिए लोगों को उकसाने की खबर ने एकबार फिर से मालदीव में चल रही भारत-विरोधी गतिविधियों की ओर ध्यान खींचा है. संतोष की बात है कि वहाँ के काफी राजनीतिक दलों ने इस बयान की भर्त्सना की है.

पिछले दो साल से इसी पार्टी के लोग मालदीव में इंडिया आउट अभियान चला रहे हैं. चिंता की बात यह नहीं है कि इन अभियानों के पीछे वहाँ की राजनीति है, बल्कि ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इनके पीछे चीन का हाथ है. यह केवल आंतरिक राजनीति का मसला होता, तब उसका निहितार्थ दूसरा होता, पर चीन और पाकिस्तान की भूमिका होने के कारण इसे गहरी साज़िश के रूप में ही देखना होगा.  

सुनियोजित-योजना

श्रीलंका और पाकिस्तान के अलावा मालदीव की गतिविधियाँ हिंद महासागर में भारत के खिलाफ एक सुसंगत चीनी-सक्रियता को साबित कर रही हैं. यह सक्रियता म्यांमार, बांग्लादेश और नेपाल में भी है, पर उसका सामरिक-पक्ष अपेक्षाकृत हल्का है.    

मालदीव की पार्टी पीपीएम के नेता अब्बास आदिल रिज़ा ने एक ट्वीट में लिखा, 8 फरवरी को अडू में आगजनी और हिंसा भारत के इशारे पर की गई थी. हमने अभी तक इसका जवाब नहीं दिया है. मेरी सलाह है कि हम भारतीय उच्चायोग से शुरुआत करें.

यह मसला दस साल पुराना है. 2012 में पहली बार मालदीव में चीन के इशारे पर भारत-विरोधी गतिविधियों की गहराई का पता लगा था। उसी दौरान श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह का उद्घाटन हुआ था और पाकिस्तान ने ग्वादर के विकास का काम सिंगापुर की एक कंपनी के हाथ से लेकर चीन तो सौंप दिया था.

हंबनटोटा से ग्वादर तक

ग्वादर बंदरगाह के विकास के लिए पाकिस्तान ने सन 2007 में पोर्ट ऑफ सिंगापुर अथॉरिटी के साथ 40 साल तक बंदरगाह के प्रबंध का समझौता किया था. यह समझौता अचानक अक्टूबर, 2012 में खत्म हो गया, और इसे एक चीनी कम्पनी को सौंप दिया गया. इसके बाद ही चीन-पाक आर्थिक गलियारे (सीपैक) का समझौता हुआ.

दिसम्बर 2012 में माले के इब्राहिम नासिर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की देखरेख के लिए मालदीव सरकार ने भारतीय कंपनी जीएमआर के साथ हुआ 50 करोड़ डॉलर का करार रद्द करके उसे भी चीनी कंपनी को सौंप दिया था. इसके पहले उस साल फरवरी में तत्कालीन राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद को ‘बंदूक की नोक’ पर अपदस्थ किया गया था. मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी (एमडीपी) के नेता मोहम्मद नशीद चीन-विरोधी और भारत समर्थक माने जाते थे.