Monday, September 13, 2021

स्त्रियों की उपेक्षा और अनदेखी करने वाले समाज का नाश निश्चित है


शनिवार 11 सितम्बर को काबुल विश्वविद्यालय के लेक्चर रूम में तालिबान समर्थक करीब 300 अफगान महिलाएं इकट्ठा हुईं थी। सिर से पांव तक पूरी तरह से ढंकी ये महिलाएं हाथों में तालिबान का झंडा लिए हुए थीं। इस दौरान कुछ महिलाओं ने मंच से संबोधित कर तालिबान के प्रति वफादारी की कसमें भी खाईं। इन अफगान महिलाओं की तस्वीरों ने इस्लामिक अमीरात में महिलाओं के अधिकारों और सम्मान की झलक दिखाई है। कोई इनके हाथ को न देख सके इसके लिए उन्होंने काले रंग के दस्ताने पहन रखे थे। इन महिलाओं ने वायदा किया कि वे लैंगिक अलगाव की तालिबान-नीति का पूरी तरह पालन भी करेंगी।

इसके पहले 2 सितम्बर को अफगानिस्तान के पश्चिमी हेरात प्रांत में गवर्नर कार्यालय के बाहर लगभग तीन दर्जन महिलाओं ने प्रदर्शन किया। उनकी मांग थी कि नई सरकार में महिला अधिकारों के संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए। इस रैली की आयोजक फ्रिबा कबरजानी ने कहा कि ‘लोया जिरगा’ और मंत्रिमंडल समेत नई सरकार में महिलाओं को राजनीतिक भागीदारी मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अफगान महिलाएं आज जो कुछ भी हैं, उसे हासिल करने के लिए उन्होंने पिछले 20 साल में कई कुर्बानियां दी हैं। कबरजानी ने कहा, “हम चाहते हैं कि दुनिया हमारी सुने और हम अपने अधिकारों की रक्षा चाहते हैं।” 

Sunday, September 12, 2021

भारत ऑस्ट्रेलिया टू प्लस टू

टू प्लस टू वार्ता में शामिल भारत और ऑस्ट्रेलिया के रक्षा और विदेशमंत्री

भारत ने शनिवार को ऑस्ट्रेलिया के साथ नई दिल्ली में पहली बार 2+2 मंत्रिस्तरीय संवाद की मेजबानी की। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और विदेशमंत्री एस. जयशंकर ने ऑस्ट्रेलिया के रक्षामंत्री पीटर ड्यूटन और विदेशमंत्री मैरिस पाइन
 के साथ अफगानिस्तान के राजनीतिक बदलाव पर चर्चा की।

जून 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन के बीच वर्चुअल वार्ता के दौरानभारत-ऑस्ट्रेलिया व्यापक साझेदारी पर बातचीत हुई थी। दोनों देशों के बीच यह साझेदारी एक मुक्तखुलेसमावेशी और नियम-आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र के साझा दृष्टिकोण पर आधारित थी। इस क्षेत्र में शांतिविकास और व्यापार के मुक्त प्रवाहनियम-आधारित व्यवस्था और आर्थिक विकास में ऑस्ट्रेलिया और भारत दोनों का अहम योगदान है।

बैठक के बाद संयुक्त बयान के अनुसार मंत्रियों ने आतंकवाद और हिंसक उग्रवाद का मुकाबला करनेआतंकवाद के वित्तपोषण का मुकाबला करनेआतंकवाद और हिंसक उग्रवाद के लिए इंटरनेट के शोषण को रोकनेकानून प्रवर्तन सहयोग को मजबूत करने सहित आतंकवाद के क्षेत्र में सहयोग जारी रखने पर सहमति व्यक्त की। बयान में कहा गया है कि दोनों पक्षों ने संयुक्त राष्ट्रजी20जीसीटीएफएआरएफआईओआरए और एफएटीएफ जैसे बहुपक्षीय मंचों के साथ-साथ क्वॉड परामर्श में आतंकवाद का मुकाबला करने में सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

मालाबार अभ्यास

भारत और ऑस्ट्रेलिया ने रक्षा संबंधों के महत्व को दोहराया। साथ ही मंत्रियों ने दोनों देशों के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग को स्वीकार किया और रक्षा जुड़ाव बढ़ाने की पहल पर चर्चा की. बयान में कहा गया कि दोनों पक्षों ने हाल ही में संपन्न मालाबार अभ्यास 2021 की सफलता का भी स्वागत किया। मंत्रियों ने मालाबार अभ्यास में ऑस्ट्रेलिया की निरंतर भागीदारी का स्वागत किया। इस बात की सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि ऑस्ट्रेलिया अब मालाबार अभ्यास में स्थायी रूप से भाग लेगा। ऑस्ट्रेलिया ने भारत को भविष्य के तलिस्मान सैबर युद्धाभ्यास में भाग लेने के लिए आमंत्रित कियाजो अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बीच हरेक दो साल में आयोजित होता है।

तालिबान समर्थक स्त्रियाँ भी सामने आईं



शनिवार को काबुल विश्वविद्यालय के लेक्चर रूम में तालिबान समर्थक करीब 300 अफगान महिलाएं इकट्ठा हुईं थी। सिर से पांव तक पूरी तरह से ढंकी ये महिलाएं हाथों में तालिबान का झंडा लिए हुए थीं। इस दौरान कुछ महिलाओं ने मंच से संबोधित कर तालिबान के प्रति वफादारी की कसमें भी खाईं।

इन अफगान महिलाओं की तस्वीरों ने इस्लामिक अमीरात में महिलाओं के अधिकारों और सम्मान की झलक दिखाई है। कोई इनके हाथ को न देख सके इसके लिए उन्होंने काले रंग के दस्ताने पहन रखे थे। इन महिलाओं ने वायदा किया कि वे लैंगिक अलगाव की तालिबान-नीति का प्रतिबद्धता के साथ पालन भी करेंगी।

नवभारत टाइम्स में पढ़ें विस्तार से

जेहादी-जीत का जश्न

9/11 की 20वीं बरसी को जेहादी अपनी दोहरी जीत के तौर पर मना रहे हैं. यह मौका तालिबान की सत्ता में वापसी का भी है। अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की वापसी को जेहाद के लिए एक तख़्तापलट और देश से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के तौर पर देखा जा रहा है। 20 साल पहले अमेरिका में विमानों को अगवा किए जाने के लिए ज़िम्मेदार आतंकी संगठन अल-क़ायदा ने तालिबान को उसकी 'ऐतिहासिक जीत' के लिए आगे बढ़कर बधाई दी है। यह सब कुछ ऐसे वक़्त में हो रहा है जब पश्चिमी ताक़तें मुस्लिम बहुल हिंसा प्रभावित देशों से अपनी सेनाओं की संख्या कम कर रही हैं।

बीबीसी हिंदी पर विस्तार से पढ़ें मीना अल-लामी का यह आलेख

ग्वांतानामो बे के पाँच कैदी

9/11 हमले की मनहूस वर्षगांठ पर नए सिरे से उसके उन पांच संदिग्धों पर ध्यान देने की ज़रूरत है जिन पर उस साज़िश को रचने का आरोप है। ख़ालिद शेख़ मोहम्मद समेत ये पांचों अभियुक्त ग्वांतानामो बे में इसी हफ़्ते कोरोना वायरस की वजह से 18 महीने के अंतराल के बाद पेश हुए। इस प्री-ट्रायल को देखने वहां इस हमले के शिकार लोगों के रिश्तेदार, एनजीओ के सदस्य और कुछ चुनिंदा पत्रकार भी मौजूद थे। पहले ही दुनिया से कटा हुआ महसूस करने वाले ग्वांतानामो बे और इस मुक़दमे की भयावहता को देखते हुए यह कोर्ट-रूम पहले ही अपने आप में अनूठा था।

विस्तार से पढ़ें बीबीसी हिंदी पर

अफगानिस्तान पर असमंजस

अफगानिस्तान की तालिबान सरकार एक बड़ी गलती करने से बच गई। नई सरकार के शपथ-ग्रहण समारोह के लिए 11 सितम्बर की तारीख घोषित कर दी गई थी, जिसे बाद में रद्द किया गया। बताया जाता है कि चीन ने सलाह दी कि ऐसी गलती मत करना। फिर भी तालिबान ने उस रोज अपने राष्ट्रपति भवन पर तालिबानी झंडा फहरा कर नई सरकार के औपचारिक कार्यारम्भ की घोषणा की। यानी वे इस दिन से जुड़ी प्रतीकात्मकता को छोड़ेंगे नहीं। 9/11 का आतंकी हमला अमेरिका के इतिहास का काला दिन है। इस दिन शपथ-ग्रहण का मतलब था अमेरिका को साफ इशारा। चूंकि वह हमला अलकायदा ने किया था, इसलिए मतलब साफ था कि हम अलकायदा के साथ हैं। तालिबान और चीन अभी अमेरिका से पंगा लेना नहीं चाहेंगे।

ब्रिक्स सम्मेलन

अफगानिस्तान में कई तरह का धुँधलका है, जिसे साफ होने में समय लगेगा। गत 9 सितम्बर को हुए ब्रिक्स देशों के शिखर सम्मेलन में इस बात पर आम सहमति थी कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल वैश्विक आतंकवाद के लिए नहीं होना चाहिए। सम्मेलन का घोषणापत्र हालांकि भारत की अध्यक्षता में जारी हुआ है, पर इसे भारतीय विदेश-नीति की पूरी अभिव्यक्ति नहीं मान लेना चाहिए। आतंकवाद को लेकर भारत और दूसरी तरफ रूस और चीन के दृष्टिकोणों में अंतर है और ब्रिक्स में इन देशों का खासा प्रभाव है।

चीनी रवैया

यह बात पाँच साल पहले अक्तूबर 2016 में गोवा में हुए ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन में स्पष्ट हो गई थी। लगभग उसी समय अमेरिका ने तालिबान के साथ गुपचुप सम्पर्क बना लिया था। सन 2018 को अमेरिका और कतर के प्रभाव से पाकिस्तान ने मुल्ला बरादर को जेल से रिहा कर दिया था। पाकिस्तान ने उन्हें 2010 में गिरफ्तार किया था। अमेरिका-पाकिस्तान-चीन-रूस रिश्तों की भावी रूपरेखा तभी से बनने लगी थी। गोवा ब्रिक्स सम्मेलन जिस साल हुआ उसी साल पठानकोट और उड़ी पर पाकिस्तानी हमले हुए थे और इस सम्मेलन के ठीक पहले भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक किया था।

Saturday, September 11, 2021

‘राजनीतिक हिन्दुत्व’ पर सम्मेलन

 

राजनीतिक हिन्दुत्व को लेकर दुनिया के 53 से ज्यादा विश्वविद्यालयों से जुड़े अकादमिक विद्वानों का एक वर्चुअल सम्मेलन 10 से 12 सितम्बर के बीच चल रहा है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस सम्मेलन का आयोजन विश्वविद्यालयों के इन विभागों के सहयोग से हो रहा है। सम्मेलन को लेकर विवाद की एक लहर है, जो भारतीय राजनीति और समाज को जरूर प्रभावित करेगी। सम्मेलन का शीर्षक विचारोत्तेजक है। शीर्षक है, ग्लोबल डिस्मैंटलिंग ऑफ ग्लोबल हिंदुत्व यानी वैश्विक हिंदुत्व का उच्छेदन। इस सम्मेलन के आलोचक पूछते हैं कि क्या आयोजक ऐसा ही कोई सम्मेलन ग्लोबल इस्लाम को लेकर करने की इच्छा रखते हैं? छोड़िए इस्लाम क्या वे डिस्मैंटलिंग कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चायना का आयोजन कर सकते हैं?  

हिंदू और हिंदुत्व का फर्क

सम्मेलन के आयोजक राजनीतिक हिंदुत्व और हिंदू धर्म के बीच सैद्धांतिक रूप से अंतर मानते हैं, पर भारतीय राजनीति में हिंदू और हिंदुत्व का अंतर किया नहीं जाता और व्यावहारिक रूप से हिंदुत्व के आलोचक भी हिंदू और हिंदुत्व के अंतर को अपनी प्रतिक्रियाओं में व्यक्त नहीं करते। बल्कि सम्मेलन के पहले ही दिन विमर्श में शामिल पैनलिस्ट मीना धंढा ने साफ कहा कि मुझे दोनों में कोई फर्क नजर नहीं आता है। बहरहाल इस सम्मेलन के नकारात्मक प्रभाव होंगे। इसके समर्थक मानते हैं कि इसे हिंदू धर्म के खिलाफ अभियान नहीं मानना चाहिए, पर इसके विरोधी सम्मेलन को हिंदू विरोधी मान रहे हैं।

Thursday, September 9, 2021

अब खुलेंगे तालिबान से जुड़े मुद्दे


तालिबान सरकार घोषित होने के अफगानिस्तान के दूतावासों का क्या होगा
? क्या वहाँ नए कर्मचारी आएंगे? यह सवाल तब खड़ा होगा, जब दुनिया की सरकारें तालिबान सरकार को मान्यता देंगी। काबुल में नई सरकार की घोषणा होने के बाद अफगानिस्तान के नई दिल्ली स्थित दूतावास ने एक बयान जारी करके कहा है कि यह सरकार अवैध है। अफगान दूतावास का बयान तालिबान से खुद को दूर करता है, जिन्होंने पिछले महीने सत्ता संभाली थी। सवाल यह भी है कि दूतावास की हैसियत क्या होगी? दुनिया भर में अफगानिस्तान के दूतावासों का अब क्या होगा?

यह सवाल भारत सहित अधिकतर तालिबान के नेतृत्व वाले नए शासन की मान्यता के मुद्दों को खोलेगा। भारत की स्थिति महत्वपूर्ण होगी क्योंकि यह सुरक्षा परिषद का एक अस्थायी सदस्य है और यूएनएससी प्रतिबंध समिति की अध्यक्षता करता है। संयुक्त राष्ट्र को अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन के भविष्य के बारे में फैसला करना होगा, जिसका कार्यादेश इसी महीने समाप्त हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध समिति को भी उन प्रतिबंधित आतंकवादियों के बारे में विचार करना होगा जो मंत्रिमंडल का हिस्सा हैं। नई सरकार के 33 में से कम से कम 17 संयुक्त राष्ट्र की आतंकवादी सूची में हैं। हाल में सुरक्षा परिषद के एक प्रस्ताव से पर्यवेक्षकों ने अनुमान लगाया था कि तालिबान के साथ आतंकवाद का विशेषण हटा लिया गया है। पर यह अनुमान ही है, क्योंकि ऐसी कोई घोषणा नहीं है। पश्चिमी देशों के जिस ब्लॉक के साथ भारत जुड़ा है, उसकी सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर है कि अफगानिस्तान अब चीनी पाले में चला जाएगा। 

तालिबान से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मसला है कि अल कायदा के साथ उसके रिश्तों का। बीबीसी मॉनिटरिंग के द्रिस अल-बे की एक टिप्पणी में पूछा गया है कि तालिबान की वापसी से एक अहम सवाल फिर उठने लगा है कि उनके अल-क़ायदा के साथ के संबंध किस तरह के हैं। अल-क़ायदा अपने 'बे'अह' (निष्ठा की शपथ) की वजह से तालिबान से जुड़ा हुआ है। पहली बार यह 1990 के दशक में ओसामा बिन लादेन ने तालिबान के अपने समकक्ष मुल्ला उमर से यह 'कसम' ली थी। उसके बाद यह शपथ कई बार दोहराई गई, हालाँकि तालिबान ने इसे हमेशा सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया है।

Wednesday, September 8, 2021

तालिबान की इस सरकार को दुनिया आसानी से मान्यता नहीं देगी

इसे विस्तार से देखने के लिए चित्र पर क्लिक करें
तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान में नई सरकार की कमान जिन हाथों में दी है वे अमेरिकी सरकार की चिंता बढ़ाने वाले हैं। अमेरिकी प्रतिनिधि जलमय खलीलज़ाद ने दोहा में तालिबान के जिन प्रतिनिधियों के साथ बात करके समझौता किया था, वे लचीले तालिबानी थे, पर सरकार में उनकी हैसियत महत्वपूर्ण नहीं है। कहना मुश्किल है कि वे आने वाले समय में अमेरिका या पश्चिमी देशों को समझ में आएंगे। अमेरिका अभी यह भी देखना चाहेगा कि इस सरकार के साथ अल कायदा के रिश्ते किस प्रकार के हैं। सरकार में कई लोग ऐसे हैं जिन्हें या तो संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवादियों की सूची में डाल रखा है या जिनकी अमेरिका को तलाश है। नए गृहमंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी पर तो अमेरिका ने 50 लाख डॉलर का इनाम घोषित कर रखा है। अमेरिका को दूसरी चिंता अफगानिस्तान में बढ़ते चीनी प्रभाव की है। मंगलवार को जो बाइडेन ने कहा कि अब चीन इस इलाके में अपना असर बढ़ाने की कोशिश ज़रूर करेगा।

बीबीसी हिंदी ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को उधृत करते हुए लिखा है कि बाइडेन से पत्रकारों ने पूछा, क्या आप इस बात से चिंतित हैं कि अमेरिका ने जिसे प्रतिबंधित कर रखा है, उसे चीन फंड देगा? इस पर बाइडन ने कहा, चीन एक वास्तविक समस्या है। वह तालिबान के साथ व्यवस्था बनाने की कोशिश करने जा रहा है। पाकिस्तान, रूस, ईरान सभी अपनी रणनीति पर काम कर रहे हैं। उधर ईयू ने कहा है कि तालिबानी सरकार समावेशी नहीं है और उसमें उचित प्रतिनिधित्व भी नहीं है। नई सरकार में सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व नहीं हैं। खासतौर से स्त्रियाँ और शिया शामिल नहीं हैं।

कहा यह भी जा रहा है कि तालिबान बगराम एयरबेस चीन के हवाले कर सकता है। अलबत्ता मंगलवार को चीनी विदेश मंत्रालय ने अपनी दैनिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस सम्भावना को ख़ारिज किया। पर क्या मौखिक रूप से खारिज कर देने के बाद खत्म हो जाती है?  अफगानिस्तान को छोड़ते समय अमेरिकी ने सीआईए के अपने दफ्तर की लगभग सारी चीजें फूँक दीं, पर न जाने कितने प्रकार के गोपनीय सूत्र अमेरिका यहाँ छोड़कर गया है। चीन की दिलचस्पी इन बातों में होगी।

अमेरिका और रूस के बीच क्या सम्पर्क-सेतु का काम करेगा भारत?

निकोल पत्रुशेव के साथ अजित डोभाल

दिल्ली में रूस की सिक्योरिटी कौंसिल के प्रमुख और अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए के प्रमुख का एकसाथ होना महत्वपूर्ण समाचार है।
सीआईए चीफ विलियम बर्न्स मंगलवार 7 सितम्बर को दिल्ली पहुंचे थे। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से मुलाकात की थी। इस चर्चा में तालिबान की सरकार के गठन और अफगानिस्तान से लोगों को निकालने के प्रयासों पर बात हुई। अब आज बुधवार को रूस की सुरक्षा परिषद के सचिव जनरल निकोल पत्रुशेव दिल्ली आए हैं। उन्होंने रक्षा सलाहकार अजित डोभाल से मुलाकात की है। इनके अलावा वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेशमंत्री एस जयशंकर से भी मुलाकात कर रहे हैं।

अफगानिस्तान के बदले घटनाक्रम को लेकर पर्यवेक्षकों में मन में इस बात को लेकर सवाल हैं कि भारतीय विदेश-नीति की दिशा क्या है? अफगानिस्तान में सरकार बनने में हुई देरी के कारण अभी तालिबान को मान्यता देने के सवाल पर असमंजस है। तालिबान के भीतर अभी कई प्रकार के अंतर्विरोध हैं, जो देर-सबेर सामने आएंगे। तालिबान के पास लड़ाई का अनुभव है, सरकार चलाने का नहीं। दूसरे उन्होंने दुनिया से कई तरह के वायदे कर रखे हैं, पर वायदे करने वाले धड़े की भूमिका सरकार में कमज़ोर है। बहरहाल फिर भी देर-सबेर भारत नई सरकार को मान्यता दे सकता है, पर ज्यादा बड़ा सवाल यह है कि वैश्विक राजनीति किस दिशा में जाने वाली है। भारत ने पहले ही कहा कि जब लोकतांत्रिक ब्लॉक तालिबान को मान्यता देगा, हम भी दे देंगे।

अमेरिका और रूस के अधिकारियों के साथ दिल्ली में बैठक ऐसे मौके पर हुई है, जब तालिबान ने अंतरिम सरकार का एलान कर दिया है। इसके अलावा आने वाले दिनों में पीएम नरेंद्र मोदी क्वॉड शिखर सम्मेलन और शंघाई सहयोग संगठन की बैठकों में हिस्सा लेने वाले हैं। इस महीने नरेंद्र मोदी तीन दिन की अमेरिका-यात्रा पर जा रहे हैं। उसी दौरान क्वॉड का शिखर सम्मेलन भी होगा। इससे पहले 16-17 सितम्बर को ताजिकिस्तान की राजधानी दुशान्बे में शंघाई सहयोग संगठन का शिखर सम्मेलन होने वाला है। और आज भारत ब्रिक्स का शिखर सम्मेलन आयोजित करने जा रहा है।

Tuesday, September 7, 2021

ब्रेकथ्रू-इंफेक्शन और वैक्सीन को लेकर उठे नए सवाल


देश में कोरोना के नए मामलों की संख्या में आ रही गिरावट में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। उत्तर भारत में गिरावट जारी है, पर केरल में एक नई प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। वहाँ नौ जिलों में वैक्सीन की दोनों डोज ले चुके लोग बड़ी संख्या में कोविड पॉजिटिव पाए गए हैं। पिछले कुछ दिनों में संक्रमण के ऐसे 40,000 केस सामने आ चुके हैं। इनमें भी पथनामथिट्टा की रिपोर्ट बहुत चिंताजनक है। वायनाड में करीब-करीब सौ फीसदी टीकाकरण हुआ है, पर ब्रेकथ्रू के मामले वहां भी हैं।

दूसरी डोज के बाद कुल ब्रेकथ्रू इंफेक्शन के 46 प्रतिशत केस केरल में आए हैं।  केरल में करीब 80 हजार ब्रेकथ्रू इंफेक्शन (टीका लेने के बाद संक्रमण) के मामले सामने आए हैं। इनमें करीब 40 हजार दूसरी डोज के बाद के हैं। इतने ज्यादा मामलों को देखते हुए केंद्र ने राज्य सरकार से सभी मामलों की जीनोम सीक्वेंसिंग कर पता लगाने को कहा कि कहीं नया वेरिएंट तो यह सब नहीं कर रहा।

ब्रेकथ्रू-इंफेक्शन

अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) के अनुसार, ब्रेकथ्रू इंफेक्शन उसे कहते हैं जब वैक्सीन की दोनों डोज लेने के 14 दिन या उससे ज्यादा समय बाद कोई व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव पाया जाए। ऐसे में पहला शक होता है कि कहीं ऐसा कोई वेरिएंट तो नहीं फैल रहा जो टीके से हासिल इम्यूनिटी को ध्वस्त कर रहा हो। केरल में छह सदस्यीय केंद्रीय टीम भेजी गई थी जिसने अपने शुरुआती आकलन में बताया कि ब्रेकथ्रू इंफेक्शन कोवैक्सीन और कोवीशील्ड दोनों ही वैक्सीन लगवाने वाले लोगों में मिले हैं।

Sunday, September 5, 2021

तालिबान सरकार को क्या मान्यता मिलेगी?


28 जुलाई 2021 को चीन के तियानजिन शहर में तालिबान प्रतिनिधि मुल्ला बरादर
और चीनी विदेशमंत्री वांग यी।

अफगानिस्तान में नई सरकार बन जाने के बाद अब अगला सवाल है कि क्या दुनिया इस सरकार को स्वीकार करेगी? स्वीकार करना यानी पहले मान्यता देना, फिर उसके पुनर्निर्माण में सहायता देना। केवल भारत के नजरिए से देखें, तो यह सवाल और ज्यादा पेचीदा है। भारतीय दृष्टिकोण के साथ यह बात भी जुड़ी है कि तालिबान के पाकिस्तान के साथ रिश्ते किस प्रकार के होंगे। कहा जा रहा है कि जिस प्रकार भारत ने सन 1949 में चीन में हुए सत्ता-परिवर्तन के बाद मान्यता देने में जल्दबाजी की थी, वैसा नहीं होना चाहिए।

फिलहाल ज्यादातर सवाल अमेरिका की नीति से जुड़े हैं। इसके अलावा इस बात पर भी कि संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में आमराय क्या बनती है। क्या तालिबान सरकार के नेतृत्व में अफगानिस्तान को संरा की सदस्यता मिलेगी? क्या तालिबान पर लगे सुरक्षा परिषद के प्रतिबंध हटेंगे? संयुक्त अमेरिका से आए बयानों में कहा गया है कि जो अफगानिस्तान सरकार अपने देशवासियों के मानवाधिकार की रक्षा करेगी और अपनी जमीन से आतंकवाद का प्रसार नहीं करेगी, उसके साथ हम मिलकर काम करेंगे। वहाँ के विदेशमंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने कहा है कि हम तालिबान के बयानों के आधार पर फैसला नहीं करेंगे, बल्कि देखेंगे कि उसका व्यवहार कैसा है।

अमेरिका की भूमिका

लगता यह है कि ज्यादातर देश विचार-मंथन में समय लगा रहे हैं। जरूरी नहीं कि कोई देश अफगान सरकार को मान्यता देने के लिए संरा की आमराय का इंतजार करे, पर अभी कोई पहल कर नहीं रहा है। अमेरिका के भीतर अफगानिस्तान के घटनाक्रम को लेकर बहस चल रही है। बाइडेन प्रशासन अपने फैसलों को सही साबित करने का प्रयास कर रहा है, पर उसे तीखी आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है।

सवाल यह भी है कि क्या अफगानिस्तान में अमेरिका की हार हुई है? इसे हार कैसे कह सकते हैं? अमेरिका ने 11 सितम्बर 2001 की घटना के बाद अफगानिस्तान में जब प्रवेश किया था, तब उसका पहला उद्देश्य ओसामा बिन लादेन का सफाया था। उसने तालिबान को परास्त किया, लादेन की हत्या की, अफगानिस्तान में एक सरकार बनाई और उसे बीस साल तक सहायता दी। डोनाल्ड ट्रंप की सरकार के नीति-निर्णय के तहत उसने मुकर्रर वक्त पर अफगानिस्तान को छोड़ दिया।

बेशक इससे तालिबान को वापस आने का मौका मिला, पर इसे तालिबान की जीत कैसे कहेंगे? आज भी तालिबान अमेरिका का मुँह जोह रहा है। तालिबान ने पहले के मुकाबले अपने व्यवहार को सौम्य बनाने की घोषणा किसके दबाव में की है? विजेता का व्यवहार पूरी तरह ऐसा नहीं होता। यह आंशिक विजय है, जो दुनिया में नए ध्रुवीकरण का बीज डाल सकती है। वैश्विक-राजनीति में इसे रूस-चीन गठजोड़ की जीत के रूप में देखा जा रहा है।

भारत की दुविधा

जहाँ तक भारत का सवाल है, उसके सामने विकट स्थिति है। हालांकि भारत के राजदूत ने दोहा में तालिबान प्रतिनिधि से बातचीत की है, पर इसका मतलब यह नहीं कि तालिबान को स्वीकार कर लिया। तालिबान के पीछे कौन सी ताकतें हैं, यह जानकारी भारत सरकार के पास पूरी है। सवाल है कि भविष्य की रणनीति क्या होगी? संयुक्त राष्ट्र की भूमिका अफगानिस्तान में क्या होगी और दुनिया का फैसला एक जैसा होगा या दो धड़ों के रूप में दुनिया बँटेगी? तालिबान को मान्यता के मामले में तमाम पेचो-खम हैं। सबसे बड़ा सवाल है कि क्या तालिबान पूरे अफगानिस्तान का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं? क्या सारे समुदाय एक झंडे के नीचे हैं? दूसरे वैश्विक-राजनीति में अब अफगानिस्तान सरकार की भूमिका क्या होगी? तालिबान ने अमेरिका के साथ समझौता जरूर किया है, पर उन्होंने चीन के साथ सम्पर्क बढ़ाया है।

टीचर को फटीचर किसने बनाया?

देश में हालांकि कोरोना का असर खत्म नहीं हुआ है, पर काफी राज्यों में स्कूलों को फिर से खोलने की तैयारी हो गई है। कई जगह कक्षाएं लगने भी लगी हैं। आज शिक्षक-दिवस पर शिक्षा और शिक्षकों की स्थिति पर हमें विचार करने का मौका मिला है। सवाल है कि कोरोना के शहीदों में डॉक्टरों, नर्सों और फ्रंटलाइन स्वास्थ्य-कर्मियों के साथ शिक्षकों का नाम भी क्यों नहीं लिखा जाना चाहिए? आज जब समारोहों में हम शिक्षकों का गुणगान करेंगे, तब इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि पिछले 75 साल में और विशेषकर पिछले एक साल में शिक्षकों के साथ देश ने क्या सुलूक किया? खासतौर से छोटे निजी स्कूलों के शिक्षक, जिनके पास न तो अपनी आवाज उठाने का दम है और न कोई उनकी तरफ से आवाज उठाने वाला है। इनमें बड़ी संख्या महिलाओं की है।

शिक्षक कुंठित क्यों?

सरकारी स्कूलों में अध्यापकों को वेतन जरूर मिलता है, पर उनकी हालत भी अच्छी नहीं है। सरकारी स्कूलों में जितने शिक्षकों की जरूरत है, उसके 50 फीसदी की ही नियुक्ति है। शेष पद खाली पड़े हैं। 2016 में तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के बारे में संसद में रिपोर्ट पेश की थी जिसके अनुसार एक लाख स्कूल ऐसे हैं जहां सिर्फ एक शिक्षक है। इनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड का हाल सबसे खराब था।  

Friday, September 3, 2021

जिस दौर में ‘झूठ का बोलबाला’ हो उस दौर में सच की लड़ाई कौन और कैसे लड़ेगा?


सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि मीडिया का एक वर्ग देश को बदनाम करने वाली खबरों को साम्प्रदायिक रंग देता है। देश में हर चीज इस वर्ग को साम्प्रदायिकता के पहलू से नजर आती है। इससे देश की छवि खराब हो रही है। अदालत ने यह भी पूछा है कि क्या केंद्र ने निजी चैनलों के नियमन की कभी कोशिश भी की है? इसके पहले गत 28 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि सत्य को ताकतवर बनाए बगैर लोकतंत्र की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

विचार-अभिव्यक्ति और सूचना तथा समाचार से जुड़ी इन बातों का जवाब नागरिकों को नहीं व्यवस्था को देना है। सुप्रीम कोर्ट भी उसी व्यवस्था का अंग है। सरकार के तीनों अंगों में उसकी भी महत्वपूर्ण भूमिका है। सवाल है कि जिस देश में चार करोड़ से ज्यादा मुकदमे लम्बित हों, वहाँ ऊँची सैद्धांतिक बातों का मतलब क्या है। जब झूठ बोलने से व्यक्ति को लाभ मिलता हो, तो वह सच की लड़ाई कैसे लड़ेगा?  अदालतों को सवाल उठाने के साथ-साथ रास्ते भी बताने चाहिए। बहरहाल यह बहस लम्बी है और इसे आगे बढ़ाने की जरूरत है।

साम्प्रदायिकता का पानी

प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना, जस्टिस सूर्यकांत और एएस बोपन्ना की पीठ फर्जी खबरों के प्रसारण पर रोक के लिए जमीयत उलमा-ए-हिंद की याचिका सहित कई याचिकाओं पर गत 2 सितम्बर को सुनवाई कर रही थी। जमीयत ने अपनी याचिका में निज़ामुद्दीन स्थित मरकज़ में पिछले साल धार्मिक सभा से संबंधित फर्जी खबरें फैलाने से रोकने और इसके लिए जिम्मेदार लोगों पर कड़ी कार्रवाई करने का केंद्र को निर्देश देने का अनुरोध किया है।

अदालत ने वैैब पोर्टलों और यूट्यूब सहित इंटरनेट मीडिया पर परोसी जाने वाली फर्जी खबरों पर गम्भीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वे केवल शक्तिशाली आवाजों को सुनते हैं। किसी मामले में ट्विटर, फेसबुक और यूट्यूब से जवाब मांगा जाए, तो वह जवाबदेही से पल्ला झाड़ लेते हैं। न्यायाधीशों, संस्थानों के खिलाफ बिना किसी जवाबदेही के कई चीजें लिखी जाती हैं।

उच्चतम न्यायालय इंटरनेट मीडिया तथा वेब पोर्टल समेत ऑनलाइन सामग्री के नियमन के लिए हाल में लागू सूचना प्रौद्योगिकी नियमों की वैधता के खिलाफ विभिन्न उच्च न्यायालयों में लम्बित याचिकाओं को सर्वोच्च अदालत में स्थानांतरित करने की केंद्र की याचिका पर छह हफ्ते बाद सुनवाई करने के लिए भी राजी हो गया है।

मीडिया की जवाबदेही

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश रमना ने कहा, मुझे यह नहीं मालूम कि ये इंटरनेट मीडिया, ट्विटर और फेसबुक आम लोगों को कहां जवाब देतेे हैं। वे कभी जवाब नहीं देते। कोई जवाबदेही नहीं है। वे खराब लिखते हैं और जवाब नहीं देते और कहते हैं कि यह उनका अधिकार है। वैब पोर्टल और यूट्यूब चैनलों पर फर्जी खबरों तथा छींटाकशी पर कोई नियंत्रण नहीं है। अगर आप यूट्यूब देखेंगे तो पाएंगे कि कैसे फर्जी खबरें आसानी से प्रसारित की जा रही हैं और कोई भी यूट्यूब पर चैनल शुरू कर सकता है। याचिका दायर करने वाले एक पक्ष का ओर से पेश हुए वकील संजय हेगड़े ने कहा कि ट्विटर ने उनके अकाउंट को निलम्बित कर दिया था। मैंने इस सिलसिले में दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की है।

Thursday, September 2, 2021

बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना

कुछ महीने पहले का अफगानिस्तान 

अमेरिका ने अफगानिस्तान में पिछले दो साल में दो ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा रकम खर्च की। हासिल क्या किया
? उसके पहले रूस ने भी करीब एक दशक तक यहाँ अपनी सेना रखी। पाकिस्तान करीब चार दशक से अफगानिस्तान में किसी न किसी शक्ल में उपस्थित है। भारत ने पिछले बीस साल में वहाँ करीब तीन अरब डॉलर का निवेश किया है। इन सबके साधनों को जोड़ा जाए, तो लगता है कि इतनी रकम से अफगानिस्तान का समाज न केवल स्वस्थ, सुशिक्षित और कल्याणकारी बनता, बल्कि दक्षिण और मध्य एशिया में प्रगति की राहें खोलता। एक तरफ धार्मिक संकीर्णता और दूसरी तरफ दबदबा बनाए रखने की साम्राज्यवादी मनोकामना और अपने-अपने देशों के हित साधने की कोशिशें किसी समाज को कहाँ से कहाँ ले जाती हैं, इसका बहुत अच्छा नमूना अफगानिस्तान है। अफसोस यह इक्कीसवीं सदी में हुआ है।

 इन देशों के मीडिया की अफगानिस्तान-कवरेज पर भी ध्यान दें। लोगों की प्रतिक्रिया सुनें। ऐसे में मजाज़ की दो लाइनें याद आती हैं, बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना/ तिरी ज़ुल्फ़ों का पेच-ओ-ख़म नहीं है। आपको समझ में आएगा कि दुनिया को समझना कितना मुश्किल काम है। पाकिस्तान के डॉन न्यूज के एक कार्यक्रम में बताया जा रहा था कि अफगानिस्तान में किस तरह से जीवन तकरीबन ठप हो गया है और जनता बुरी तरह परेशान है। बिजली नहीं, पानी नहीं, दुकानों पर सामान नहीं, घरों में पानी नहीं, एटीएम बंद, जेब में पैसा नहीं वगैरह-वगैरह। चैनल के रिपोर्टर ने लोगों से बात की तो उन्होंने परेशानियाँ बताईं।

जब बातें हो रही थीं, तब बंदूकधारी तालिबान पास में खड़े थे। लोगों ने तालिबान के आने पर ख़ुशी जाहिर की। कहा, अब चोरियाँ नहीं हो रही हैं। क्या चोरियाँ अफगानिस्तान की समस्या थी? पाकिस्तान में तो हो ही रही है, भारत में भी तालिबानी-क्रांति की तारीफ हो रही है। सजा देने के उनके तरीके का जिक्र हो रहा है, उनकी ईमानदारी के किस्से हैं। लड़कियों के पहनावे और उनकी पढ़ाई और नौकरी को लेकर बातें हो रही हैं। जो तालिबान विरोधी हैं, वे उसमें दोष खोज रहे हैं और जो समर्थक हैं, उन्हें उनमें अच्छाइयाँ नजर आ रही हैं।

Wednesday, September 1, 2021

तालिबान से भारत का सम्पर्क

शेर मोहम्मद स्तानिकज़ाई

अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी पूरी तरह से होने के साथ 31 अगस्त को दो खबरें और भारतीय मीडिया में थीं। पहली यह कि दोहा में भारतीय राजदूत और तालिबान के एक प्रतिनिधि की बातचीत हुई है और दूसरी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 2593 में तालिबान से कहा गया कि भविष्य में अफगान जमीन का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों में नहीं होना चाहिए। इन तीनों खबरों को एकसाथ पढ़ने और उन्हें समझने की जरूरत है, क्योंकि निकट भविष्य में तीनों के निहितार्थ देखने को मिलेंगे।

अफगानिस्तान में सरकार बनने में हो रही देरी को लेकर भी कुछ पर्यवेक्षकों ने अटकलें लगाई हैं, पर इस बात को मान लेना चाहिए कि देर-सबेर सरकार बन जाएगी। ज्यादा बड़ा सवाल उस सरकार की नीतियों को लेकर है। वह अपने पुराने नजरिए पर कायम रहेगी या कुछ नया करेगी? 15 अगस्त को काबुल पर कब्जे के बाद तालिबान प्रतिनिधि ने जो वायदे दुनिया से किए हैं, क्या वे पूरे होंगे? और क्या वे वायदे तालिबान के काडर को पसंद हैं?  

तीन बातें

इसके बाद अब यह देखें कि नई सरकार के बारे में वैश्विक-राय क्या है, दूसरे भारत और अफगानिस्तान रिश्तों का भविष्य क्या है और तीसरे पाकिस्तान की भूमिका अफगानिस्तान में क्या होगी। इनके इर्द-गिर्द ही तमाम बातें हैं। फिलहाल हमारी दिलचस्पी इन तीन बातों में है। मंगलवार को संरा सुरक्षा परिषद में भारत की अध्यक्षता का अंतिम दिन था।

Tuesday, August 31, 2021

पहली तिमाही में संवृद्धि 20.1 फीसदी

अच्छी खबर यह है कि देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटी रही है। चालू वित्त-वर्ष की पहली तिमाही अप्रैल-जून देश की जीडीपी संवृद्धि दर 20.1 फीसदी हो गई, जबकि, अर्थशास्त्रियों ने 18.5 फीसदी का अनुमान लगाया था। उधर रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा है कि अर्थव्यवस्था में रिकवरी के संकेत मिल रहे हैं, लेकिन दुनिया पर कोविड का संकट बना हुआ है। अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए हर जरूरी कदम उठा रहे है।

 राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) की ओर से जारी आँकड़ों के मुताबिक, अप्रैल-जून तिमाही में देश की जीडीपी संवृद्धि 20.1 रही, जबकि पिछले वित्त-वर्ष में पहली तिमाही में जीडीपी में 24 फीसदी से ज्यादा का संकुचन हुआ था। एनएसओ के अनुसार जनवरी-मार्च तिमाही के मुकाबले अप्रैल-जून तिमाही में खनन के क्षेत्र में संवृद्धि -5.7 फीसदी से बढ़कर 18.6 फीसदी हो गई है। बिजली और गैस में 9.1 फीसदी से बढ़कर 14.3 फीसदी, निर्माण (कंस्ट्रक्शन) में 14.5 फीसदी से बढ़कर 68.3 फीसदी, फाइनेंशियल-रियल एस्टेट में 5.4 फीसदी से गिरकर 3.7 फीसदी रह गई है।

अफगानिस्तान पर सुरक्षा परिषद में महाशक्तियों के मतभेद उभर कर सामने आए

संरा सुरक्षा परिषद की बैठक में अध्यक्ष की कुर्सी पर भारत के विदेश सचिव हर्ष श्रृंगला

अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी पूरी तरह हो चुकी है और अब यह देश स्वतंत्र अफगान इस्लामिक अमीरात है। हालांकि यहाँ की सरकार भी पूरी तरह बनी नहीं है, पर मानकर चलना चाहिए कि जल्द बनेगी और यह देश अपने नागरिकों की हिफाजत, उनकी प्रगति और कल्याण के रास्ते जल्द से जल्द खोजेगा और विश्व-शांति में अपना योगदान देगा। अब कुछ बातें स्पष्ट होनी हैं, जिनका हमें इंतजार है। पहली यह कि इस व्यवस्था के बारे में वैश्विक-राय क्या है, दूसरे भारत और अफगानिस्तान रिश्तों का भविष्य क्या है और तीसरे पाकिस्तान की भूमिका अफगानिस्तान में क्या होगी। इनके इर्द-गिर्द ही तमाम बातें हैं।

जिस दिन अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी पूरी हुई है, उसी दिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने एक प्रस्ताव पास किया है, जिसमें तालिबान को याद दिलाया गया है कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर लगाम लगाने के अपने वायदे पर उन्हें दृढ़ रहना होगा। मंगलवार को संरा सुरक्षा परिषद में भारत की अध्यक्षता का अंतिम दिन था। भारत की अध्यक्षता में पास हुआ प्रस्ताव 2593 भारत की चिंता को भी व्यक्त करता है। यह प्रस्ताव सर्वानुमति से पास नहीं हुआ है। इसके समर्थन में 15 में से 13 वोट पड़े। इन 13 में भारत का वोट भी शामिल है। विरोध में कोई मत नहीं पड़ा, पर चीन और रूस ने मतदान में भाग नहीं लिया।

इस अनुपस्थिति को असहमति भले ही न माना जाए, पर सहमति भी नहीं माना जाएगा। अफगानिस्तान को लेकर पाँच स्थायी सदस्यों के विचार एक नहीं हैं और भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है। दूसरे यह भी स्पष्ट है कि रूस और चीन के साथ भारत की सहमति नहीं है। सवाल है कि क्या है असहमति का बिन्दु? इसे सुरक्षा परिषद की बैठक में रूसी प्रतिनिधि के वक्तव्य में देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस प्रस्ताव के लेखक, यानी अमेरिका ने, अफगानिस्तान में आतंकवादियों को हमारे और उनके (अवर्स एंड देयर्स) के खानों में विभाजित किया है। इस प्रकार उसने तालिबान और उसके सहयोगी हक्कानी नेटवर्क को अलग-अलग खाँचों में रखा है। हक्कानी नेटवर्क पर ही अफगानिस्तान में अमेरिकी और भारतीय ठिकानों पर हमले करने का आरोप लगता रहा है।

Monday, August 30, 2021

आजादी की नींद और नई सुबह के सपने


हाल में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के विकास के लिए एक पहल की घोषणा की, जिसका नाम है दिल्ली@2047। इस पहल के राजनीतिक-प्रशासनिक निहितार्थ अपनी जगह हैं, महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जब हम अपना 75वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहे हैं, तब हमारे मन में 100वें वर्ष की योजनाएं जन्म ले रही हैं। ऐसा तब भी रहा होगा, जब हम स्वतंत्र हो रहे थे।

सवाल है कि हम नए भारत के उस सपने को पूरा कर पाए? वह सपना क्या था? भव्य भारतवर्ष की पुनर्स्थापना, जो हमारे गौरवपूर्ण अतीत की कहानी कहता है। क्या हम उसे पूरा कर पाए? क्या हैं हमारी उपलब्धियाँ और अगले 25 साल में ऐसा क्या हम कर पाएंगे, जो सपनों को साकार करे?

देश के बड़े उद्यमियों में से एक मुकेश अम्बानी मानते हैं कि 2047 तक देश अमेरिका और चीन के बराबर पहुंच सकता है। आर्थिक उदारीकरण के 30 साल के पूरे होने के मौके पर उन्होंने अपने एक लेख में कहा कि साहसी आर्थिक सुधारों की वजह से भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। इस दौरान आबादी हालांकि 88 करोड़ से 138 करोड़ हो गई, लेकिन गरीबी की दर आधी रह गई।

भारत सरकार इस साल ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ मना रही है, पर बातें सपनों की हैं। नरेंद्र मोदी से लेकर अरविंद केजरीवाल तक के पास भविष्य के सपने हैं। पिछले तीन दशक से हमने तेज आर्थिक विकास देखा। नए हाईवे, मेट्रो और दूर-संचार क्रांति को आते देखा। उस इंटरनेट को आते देखा जो सैम पित्रोदा के शब्दों में ‘एटमी ताकत’ से भी ज्यादा बलवान है। इनके साथ हर्षद मेहता से लेकर, टूजी, सीडब्ल्यूजी, कोल-गेट से लेकर आदर्श घोटाले तक को देखा।

आज सोशल मीडिया का जमाना है। लोकतंत्र बहुत पुरानी राज-पद्धति नहीं है। औद्योगिक क्रांति के साथ इसका विकास हुआ है। इसे सफल बनाने के लिए जनता को आर्थिक और शैक्षिक आधार पर चार कदम आगे आना होगा। पर जनता और भीड़ का फर्क भी हमें समझना होगा। हमने अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया है, पर उसकी व्यवस्था नहीं है। हम महिलाओं को विधायिकाओं में आरक्षण देना चाहते हैं, पर दे नहीं पाते। 

लुटी-पिटी आजादी

15 अगस्त, 1947 को जो भारत आजाद हुआ, वह लुटा-पिटा और बेहद गरीब देश था। अंग्रेजी-राज ने उसे उद्योग-विहीन कर दिया था और जाते-जाते विभाजित भी। कैम्ब्रिज के इतिहासकार एंगस मैडिसन लिखा है कि सन 1700 में वैश्विक-व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 22.6 फीसदी थी, जो पूरे यूरोप की हिस्सेदारी (23.3) के करीब-करीब बराबर थी। यह हिस्सेदारी 1952 में केवल 3.2 फीसदी रह गई थी। क्या इतिहास के इस पहिए को हम उल्टा घुमा सकते हैं?

तालिबान को तोहफे जैसी आसान जीत कैसे मिली?

अफगानिस्तान में जितनी आसानी से सत्ता का हस्तांतरण हुआ, उसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। पिछले रविवार को न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में कहा गया कि तीन अनुमान-समय, मनोबल और भरोसा-गलत साबित हुए। टाइम्स की एक और रिपोर्ट के अनुसार तालिबान 2001 में तबाह हो चुके थे और वे अंतरिम राष्ट्रपति हामिद करज़ाई से समझौता करना चाहते थे। उनकी कोई माँग नहीं थी। वे केवल आम-माफी चाहते थे। तब अमेरिका मानता था कि समर्पणकारी से कैसा समझौता? इनका सफाया करना है। उसके बीस साल बाद अमेरिका ने ऐसा समझौता किया, जिसे अपमानजनक और अफगान जनता से विश्वासघात माना जा सकता है।

तालिबान की ताकत

टाइम्स की रिपोर्ट में इस बात का ज़िक्र नहीं है कि तालिबान को इतनी ताकत कहाँ से मिली, जो उसने बीस साल की जमी-जमाई व्यवस्था को उखाड़ फेंका। बीस साल पहले तालिबान के आर्थिक और सैनिक-स्रोतों को बंद कर दिया गया था। फिर भी वे इतने ताकतवर बन गए कि अपने से चार गुना बड़ी और आधुनिक हथियारों से लैस सेना को हराने में कामयाब हो गए अमेरिकी सांसद स्टीव कैबॉट ने पिछले रविवार को कहा कि पाकिस्तानी आईएसआई ने तालिबान की जबर्दस्त मदद की है। यह तो स्पष्ट है कि तालिबान से समझौता पाकिस्तानी मध्यस्थता से हुआ है। पाकिस्तानी सरकार और मीडिया ही तालिबानी विजय के प्रति पूर्ण आश्वस्त नजर आते थे।  

बाइडेन के सुरक्षा सलाहकार जेक सुलीवन ने एनबीसी टीवी से कहा, काबुल का पतन अवश्यंभावी नहीं था। अफगान सरकार ने उस क्षमता का इस्तेमाल नहीं किया, जो अमेरिका ने तैयार की थी। हम दस-बीस साल और रुके रहते तब भी अफगान सेना अपने बूते देश को बचाने में कामयाब नहीं होती। पर सेंटर फॉर अ न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी के सीईओ रिचर्ड फोंटेन का कहना है, अंतरराष्ट्रीय सेना की मामूली सी उपस्थिति से, जिसमें अमेरिका की भागीदारी बहुत छोटी थी, तालिबान को हराना सम्भव नहीं था, पर अफगान सरकार को गिरने से बचाया जा सकता था।

जल्दबाजी क्यों?

भागने की ऐसी जल्दी क्या थी? पिछले सात दशक से कोरिया में अमेरिकी सेना जमी है या नहीं, जबकि दक्षिण कोरिया अपने आप में इतना समर्थ है कि उत्तर कोरिया को संभाल सके। सवाल तब खड़े हुए थे, जब 1 जुलाई को अमेरिकी सेना ने बगराम एयर बेस को स्थानीय प्रशासन को जानकारी दिए बगैर अचानक खाली कर दिया। आसपास के लोग सामान लूटने के लिए पहुंचे, तब अफगान सेना को पता लगा।

Sunday, August 29, 2021

तालिबान के प्रति भारत के रुख में नरमी


अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर कब्जा करने के दो सप्ताह बाद ही तालिबान को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का रुख बदलता दिखाई पड़ रहा है। सुरक्षा परिषद ने अफगानिस्तान मसले पर अपने ताजा बयान में आतंकी गतिविधियों से तालिबान का नाम हटा दिया है। काबुल पर कब्जे के एक दिन बाद यानी 16 अगस्त को सुप की तरफ से अफगानिस्तान को लेकर एक बयान जारी किया गया था, जिसमें तालिबान से अपील की गई थी कि वह अपने क्षेत्र में आतंकवाद का समर्थन न करे, मगर अब इसी बयान से तालिबान का नाम हटा दिया गया है। बावजूद इसके तालिबान सरकार को अमेरिका या दूसरे देशों की मान्यता देने की सम्भावना फौरन नजर नहीं आ रही है। ह्वाइट हाउस की प्रवक्ता जेन साकी का कहना है कि हमें अभी मान्यता देने की जल्दी नहीं है।

सुरक्षा परिषद में इस महीने का अध्यक्ष भारत है, जो पहली बार पूरे अध्यक्षता कर रहा है और इस बयान पर भारत के भी हस्ताक्षर हैं। भारत ने 26 अगस्त को काबुल एयरपोर्ट पर हुए आतंकी हमले की निंदा की है। इस आतंकी हमले में करीब 170 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी, जिनमें अमेरिका के 13 जवान भी शामिल थे। इस आतंकी हमले की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट खुरासान ने ली थी।

काबुल हमले के एक दिन बाद 27 अगस्त को भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति ने बतौर यूएनएससी अध्यक्ष परिषद की ओर से एक बयान जारी किया, जिसमें 16 अगस्त को लिखे गए एक पैराग्राफ को फिर से दोहराया गया। पर इसबार पैराग्राफ में लिखा था-‘सुरक्षा परिषद के सदस्यों ने अफगानिस्तान में आतंकवाद का मुकाबला करने के महत्व को फिर से व्यक्त किया, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अफगानिस्तान के क्षेत्र का इस्तेमाल किसी भी देश को धमकी देने या हमला करने के लिए नहीं किया जाए। किसी भी अफगान समूह या व्यक्ति को किसी भी देश के क्षेत्र में सक्रिय आतंकवादियों का समर्थन नहीं करना चाहिए।'

यह पैराग्राफ इसलिए चौंकाने वाला है, क्योंकि इसमें तालिबान का नाम नहीं है। अलबत्ता काबुल पर तालिबान राज होने के बाद 16 अगस्त को यूएनएससी ने जो बयान जारी किया था, उसके पैराग्राफ में तालिबान का नाम था। 16 अगस्त का बयान कहता है, 'सुरक्षा परिषद के सदस्यों ने अफगानिस्तान में आतंकवाद का मुकाबला करने के महत्व का जिक्र किया, ताकि यह सुनिश्चित किया जाए कि अफगानिस्तान के क्षेत्र का इस्तेमाल किसी देश को धमकी देने या हमला करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए और तालिबान और किसी अन्य अफगान समूह या व्यक्ति को किसी अन्य देश के क्षेत्र में सक्रिय आतंकवादियों का समर्थन नहीं करना चाहिए। यानी 27 को जो बदला हुआ पैराग्राफ था, उसमें से तालिबान शब्द को हटा लिया गया। इसका एक अर्थ यह है कि तालिबान को अब स्टेट एक्टर या वैधानिक राज्य के रूप में देखा जा रहा है।

संरा में भारत के पूर्व स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने ट्वीट किया कि राजनय में एक पखवाड़ा लम्बा समय होता है। टी शब्द हट गया। अधिकारियों का कहना है कि यह बदलाव जमीनी स्थितियों को देखते हुए हुआ है। तालिबान ने अफगानिस्तान में फँसे लोगों को निकालने में सहायता की है। हालांकि भारत ने तालिबान के साथ वैसा ही सम्पर्क नहीं बनाया है, जैसा सुरक्षा परिषद के दूसरे सदस्यों का है, पर इस वक्तव्य पर दस्तखत करने से पता लगता है कि भारतीय दृष्टिकोण में बदलाव हुआ है।