Wednesday, July 14, 2021

प्रशांत किशोर क्या कांग्रेस में शामिल होंगे?


बीबीसी का हिंदी वैबसाइट के अनुसार प्रशांत किशोर के साथ राहुल, सोनिया और प्रियंका गांधी की एक साथ हुई मुलाक़ात काफ़ी सुर्खियाँ बटोर रही है। समाचार पत्रों से लेकर तमाम न्यूज़ चैनल में सूत्र बस ये बता रहे हैं कि 'कुछ बड़ा' होने वाला है। यह 'बड़ा' क्या है? इसके बारे खुल कर कोई कुछ नहीं बता रहा है। चारों की मुलाक़ात की आधिकारिक पुष्टि भी अंततः हो गई। और लग यह रहा है कि यह बड़ा प्रशांत किशोर हैं, जो कांग्रेस में बाकायदा शामिल हो सकते हैं। कांग्रेस में उनके शामिल होने की खबर इतने जोरदार तरीके से सुनाई पड़ी है कि राहुल गांधी की करीबी मानी जाने वाली एक नेता ने ट्वीट करके इस खबर का स्वागत भी कर दिया। इसके फौरन बाद यह ट्वीट डिलीट कर दिया गया। पार्टी सूत्रों ने बताया कि इस मुलाकात का अनुरोध प्रशांत किशोर ने किया था। यह मुलाकात चार घंटे तक चली थी।  

हालांकि प्रशांत किशोर ने कहा था कि बंगाल के चुनाव के बाद मैं इस काम से हट जाऊंगा, पर लगता है कि वे राजनीति में सक्रिय रहेंगे। कहा यह भी जा रहा है के वे अब कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। इसबार सलाहकार के रूप में नहीं बल्कि किसी पदाधिकारी के रूप में आएंगे। सच यह भी है कि चारों की मुलाक़ात ऐसे वक़्त में हुई, जब कांग्रेस आलाकमान चौतरफ़ा संकट से घिरी है। अब विश्लेषण इस बात पर होगा कि वे पार्टी के किसी महत्वपूर्ण पद पर शामिल हुए, तो संगठन पर क्या प्रभाव पड़ेगा? हालांकि प्रशांत किशोर इसके पहले जेडीयू में भी शामिल हो चुके हैं और वहाँ उपाध्यक्ष पद पर रहे हैं, पर वे खांटी राजनीतिक नेता नहीं है। 

कई लोग इस मुलाक़ात को पंजाब कांग्रेस में चल रही कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के खींचतान से जोड़ कर देख रहे थे, तो कहीं राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच चल रही रस्साकशी से इसे जोड़ा गया। कांग्रेस शासित राज्य छत्तीसगढ़ में भी टीएस सिंह देव और भूपेश बघेल के बीच भी सब कुछ ठीक नहीं है। पता यह लगा है कि इस मुलाकात में राज्यों की राजनीति पर विचार नहीं हुआ, बल्कि प्रशांत किशोर को कोई महत्वपूर्ण भूमिका देने पर विचार हुआ।

उधर कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी की संसदीय नीति समूह की बैठक भी आज बुलाई है। इस बैठक में लोकसभा में पार्टी के नेता अधीर रंजन चौधरी को हटाकर उनकी जगह किसी दूसरे नेता की नियुक्ति किए जाने की संभावना थी, पर बैठक के बाद कांग्रेस के सूत्रों के हवाले से समाचार एजेंसी एएनआई ने बताया कि आगामी सत्र में भी अधीर रंजन चौधरी ही कांग्रेस के नेता होंगे। पार्टी ने उनकी जगह किसी और को नेता चुनने की अटकलों को खारिज कर दिया।

संसद का मानसून सत्र 19 जुलाई से शुरू होगा और 11 अगस्त तक चलेगा। इस सत्र की तारीख आने के साथ ही बीते कुछ दिन सें अधीर रंजन को हटाने की खबरें लगातार आ रही थीं। कहा जा रहा था कि कांग्रेस सदन में और संसद से बाहर केंद्र की मोदी सरकार को घेरने के लिए विपक्षी रणनीति को उत्प्रेरित करने वाले एक नया चेहरा को नियुक्त करने पर विचार कर रही है। पार्टी के आधिकारिक सूत्र के मुताबिक, संसद सत्र में एक हफ्ते से भी कम समय बचा है। ऐसे में लोकसभा में पार्टी के नेता का बदलाव संभव नहीं है। बहरहाल बुधवार की बैठक में संसद के मानसून सत्र के दौरान पार्टी द्वारा उठाए जाने वाले विभिन्न मुद्दों पर भी चर्चा हुई।

राहुल गांधी, सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी की चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के साथ हुई बैठक के बारे में बताया गया कि बैठक के दौरान कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ऑनलाइन जुड़ीं। उनके अलावा केसी वेणुगोपाल भी बैठक में मौजूद रहे। यह बैठक करीब एक घंटे तक चली। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में पंजाब में कांग्रेस नेताओं के बीच विवाद पर कोई बात नहीं हुई, और न शरद पवार को यूपीए अध्यक्ष बनाए जाने को लेकर कोई चर्चा की हुई। प्रशांत किशोर ने आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की संभावनाओं को लेकर बात की।

 

 

 

अफगानिस्तान में भारत क्या करे?


विदेशमंत्री एस जयशंकर ने मंगलवार को अफगानिस्तान के विदेशमंत्री हनीफ अतमर से ताजिकिस्तान की राजधानी दुशान्बे में मुलाकात की और इस दौरान अफगानिस्तान के ताजा घटनाक्रम पर चर्चा की। जयशंकर शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के विदेश मंत्रियों की परिषद और अफगानिस्तान पर एससीओ संपर्क समूह की बैठकों में भाग लेने के लिए मंगलवार को दो दिवसीय दौरे पर दुशान्बे पहुंचे। जयशंकर ने ट्वीट किया,''मेरे दुशान्बे दौरे की शुरुआत अफगानिस्तान के विदेशमंत्री मोहम्मद हनीफ अतमर से मुलाकात के साथ हुई। हाल के घटनाक्रम जानकारी मिली। अफगानिस्तान पर एससीओ संपर्क समूह की बुधवार को हो रही बैठक को लेकर उत्साहित हूं।''

दुशान्बे बैठक काफी अहम

यह बैठक ऐसे समय में हो रही है, जब तालिबानी लड़ाके अफगानिस्तान के अधिकतर इलाकों को तेजी से अपने नियंत्रण में ले रहे हैं, जिसने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। भारत ने अफगान बलों और तालिबान लड़ाकों के बीच भीषण लड़ाई के मद्देनज़र कंधार स्थित अपने वाणिज्य दूतावास से लगभग 50 राजनयिकों एवं सुरक्षा कर्मियों को एक सैन्य विमान के जरिए निकाला है।

एससीओ देशों के साथ होने वाली यह बैठक अफगानिस्तान के लिए भी काफी अहम होगी। अमेरिकी सेना की वापसी की के बाद वहां तालिबान का वर्चस्व बढ़ा है। ऐसे में अफगानिस्तान को वैश्विक सहायता की जरूरत पड़ेगी। यह बैठक अफगानिस्तान के लिए बहुत अहम है। अफ़ग़ानिस्तान में बीते कुछ हफ्तों में एक के बाद एक लगातार कई आतंकी हमले हुए हैं। अमेरिकी सैनिक अगस्त के अंत तक पूरी तरह से अफगानिस्तान से चले जाएंगे। ऐसे में अफगानिस्तान को भारत समेत अन्य देशों से सहायता की आशा है।

भारत की भूमिका

अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता लाने के लिए भारत काफी अहम रोल निभा सकता है। भारत इस देश में कई निर्माण गतिविधियों में 300 करोड़ डॉलर का निवेश कर चुका है। भारत हमेशा से अफगानिस्तान में शांति का समर्थक रहा है और इसके लिए अफगान नेतृत्व और अफगान द्वारा संचालित प्रक्रिया का ही समर्थक भी रहा है। सवाल है कि हम क्या कर सकते हैं और क्या कर रहे हैं?

Monday, July 12, 2021

अफगानिस्तान पर बढ़ता तालिबानी कब्जा और उसका भारत पर असर


अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा है कि अफगानिस्तान में करीब बीस साल से जारी अमेरिका का सैन्य अभियान 31 अगस्त को समाप्त हो जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि अब अफगान लोग अपना भविष्य खुद तय करेंगे। युद्ध-ग्रस्त देश में अमेरिका ‘राष्ट्र निर्माण' के लिए नहीं गया था। अमेरिका के सबसे लंबे समय तक चले युद्ध से अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने के अपने निर्णय का बचाव करते हुए बाइडेन ने कहा कि अमेरिका के चाहे कितने भी सैनिक अफगानिस्तान में लगातार मौजूद रहें लेकिन वहां की दुःसाध्य समस्याओं का समाधान नहीं निकाला जा सकेगा। बाइडेन ने बृहस्पतिवार 6 जुलाई को राष्ट्रीय सुरक्षा दल के साथ बैठक के बाद अफगानिस्तान पर अपने प्रमुख नीति संबोधन में कहा कि अमेरिका ने देश में अपने लक्ष्य पूरे कर लिए हैं और सैनिकों की वापसी के लिए यह समय उचित है।

बाइडेन ने कहा कि पिछले बीस साल में हमारे दो हजार अरब डॉलर से ज्यादा खर्च हुए, 2,448 अमेरिकी सैनिक मारे गए और 20,722 घायल हुए। दो दशक पहले, अफगानिस्तान से अल-कायदा के आतंकवादियों के हमले के बाद जो नीति तय हुई थी अमेरिका उसी से बंधा हुआ नहीं रह सकता है। बिना किसी तर्कसम्मत उम्मीद के किसी और नतीजे को प्राप्त करने के लिए अमेरिकी लोगों की एक और पीढ़ी को अफगानिस्तान में युद्ध लड़ने नहीं भेजा जा सकता। उन्होंने इन खबरों को खारिज किया कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के तुरंत बाद तालिबान देश पर कब्जा कर लेगा। उन्होंने कहा, अफगान सरकार और नेतृत्व को साथ आना होगा। उनके पास सरकार बनाने की क्षमता है। उन्होंने कहा, सवाल यह नहीं है कि उनमें क्षमता है या नहीं। उनमें क्षमता है। उनके पास बल हैं, साधन हैं। सवाल यह है कि क्या वे ऐसा करेंगे?

इस प्रकार अमेरिका ने अपनी सबसे लम्बी लड़ाई के भार को अपने कंधे से निकाल फेंका है। यह सच है कि 9 सितम्बर 2001 को न्यूयॉर्क के ट्विन टावर्स पर हमला करने वाला अल-कायदा अब अफगानिस्तान में परास्त हो चुका है, पर वह पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। उसके अलावा इस्लामिक स्टेट भी अफगानिस्तान में सक्रिय है। अल-कायदा को जमीन देने वाले तालिबान फिर से काबुल पर कब्जा करने को आतुर हैं। इन सब बातों को अमेरिका की पराजय नहीं तो और क्या मानें? अफगानिस्तान में अमेरिका ने जिस सरकार को बैठाया है, उसके और तालिबान के बीच सत्ता की साझेदारी को लेकर बातचीत चल रही है। यह भी सही है कि अमेरिकी पैसे और हथियारों से लैस काबुल की अशरफ ग़नी सरकार एक सीमित क्षेत्र में ही सही, पर वह काम कर रही है। अमेरिका सरकार तालिबान और पाकिस्तान पर एक हद तक दबाव बना रही है, ताकि हालात सुधरें, पर अभी समझ में नहीं आ रहा कि यह गृहयुद्ध कहाँ जाकर रुकेगा।

Sunday, July 11, 2021

उड़न-तश्तरियों का रहस्य, जिसे पेंटागन की जाँच भी खोल नहीं पाई


दुनिया हर साल 2 जुलाई को यूएफओ दिवस मनाती है। यूएफओ यानी अनआइडेंटिफाइड फ्लाइंग ऑब्जेक्ट्स या उड़न-तश्तरियाँ। एक वैश्विक संस्था यह दिन मनाती है। इस साल जब यह दिन मनाया जा रहा था तब  यूएफओ को लेकर एक रोचक जानकारी भी हमारे पास थी। अमेरिकी रक्षा विभाग ने यूएफओ पर गठित अपनी टास्क फोर्स की रिपोर्ट गत 25 जून को प्रकाशित की है। इस टीम को आकाश में विचरण करने वाली अनोखी वस्तुओं से जुड़ी जानकारी जमा करने को कहा गया था। जाँच में कोई निर्णायक जानकारी नहीं मिली, पर कुछ महत्वपूर्ण सूत्र जरूर जुड़े हैं। इस रिपोर्ट के बाद अचानक लोगों का ध्यान अंतरिक्ष में जीवन की सम्भावनाओं की ओर भी गया है।

अमेरिका के ऑफिस ऑफ डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस (ओडीएनआई) की इस रिपोर्ट का लम्बे अरसे से इंतजार था। पिछले साल जून में सीनेट की इंटेलिजेंस कमेटी ने ओडीएनआई  से कहा था कि वह इस मामले में उपलब्ध विवरणों को एकत्र करने के लिए एक टास्क-फोर्स बनाए, जो प्राप्त विवरणों को एक जगह एकत्र करे। इस साल जनवरी में इस टास्क-फोर्स को छह महीने का समय रिपोर्ट दाखिल करने के लिए दिया गया था। अब नौ पेज की यह प्राथमिक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है।

सबसे बड़ा रहस्य

यह दस्तावेज इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण रहस्य पर रोशनी डालने वाले बीज-विवरण के रूप में दर्ज जरूर किया जाएगा। इसने हालांकि रहस्य को खोला नहीं है, पर जो विवरण दिया है, उससे नए सवाल खड़े हुए हैं। इस बात की पुष्टि हुई है कि परिघटना सच्ची है, पर यह क्या है, हम नहीं कह सकते। अमेरिकी सेना ने इस परिघटना के लिए यूएफओ की जगह नया शब्द गढ़ा है, यूएपी (अनआइडेंटिफाइड एरियल फेनॉमेना)। वह यूएफओ से जुड़ी दकियानूसी धारणाओं से बचना चाहती है।

Friday, July 9, 2021

साँसों के सौदागर

शुक्रवार 25 जून की सुबह भारतीय मीडिया में खबरें थीं कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली के लिए गठित 'ऑक्सीजन ऑडिट कमेटी' ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि 'केजरीवाल सरकार ने कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान ज़रूरत से चार गुना ज़्यादा ऑक्सीजन की माँग की थी।' रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली सरकार को असल में क़रीब 289 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की दरकार थी, लेकिन उनके द्वारा क़रीब 1200 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की माँग की गई। ज़रूरत से अधिक माँग का असर उन 12 राज्यों पर देखा गया जहाँ ऑक्सीजन की कमी से कई मरीज़ों को अपनी जान गँवानी पड़ी।

दिल्ली में 25 अप्रेल से 10 मई के बीच कोरोना वायरस की दूसरी लहर चरम पर थी। उस समय दिल्ली की जरूरत को लेकर पहले हाईकोर्ट में और फिर सुप्रीम कोर्ट में बहस हुई। उसकी परिणति में ऑडिट टीम का गठन हुआ, जिसने  छानबीन में पाया कि दिल्‍ली सरकार ने जरूरत से चार गुना ज्यादा ऑक्सीजन की माँग की थी। हालांकि अभी अंतिम रूप से निष्कर्ष नहीं निकाले गए हैं, पर मीडिया में प्रकाशित जानकारी के अनुसार कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि दिल्ली को माँग से ज्यादा ऑक्सीजन की आपूर्ति की गई थी।

अभूतपूर्व संकट

कोरोना वायरस की दूसरी लहर के कारण अप्रेल-मई में देश के कई हिस्सों में अस्पतालों में ऑक्सीजन सप्लाई को लेकर कुछ दिन तक विकट स्थिति रही। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री ने स्वयं इस सिलसिले में कई बैठकों में भाग लिया। गृह मंत्रालय ने हस्तक्षेप करके राज्यों को निर्देश दिया कि वे ऑक्सीजन-वितरण योजना का ठीक से अनुपालन करें।

प्रधानमंत्री को जानकारी दी गई थी कि 20 राज्यों ने 6,785 मीट्रिक टन प्रतिदिन की अभूतपूर्व कुल माँग रखी है, जिसे देखते हुए केंद्र ने 21 अप्रेल से 6,882 मीट्रिक टन प्रतिदिन की स्वीकृति दी थी। यह सामान्य से कहीं ज्यादा बड़ी आपूर्ति थी। एक हफ्ते के भीतर 12 राज्यों में ऑक्सीजन की माँग में एकदम से भारी वृद्धि हो गई थी। उसके पहले 15 अप्रेल को केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने राज्य सरकारों को पत्र लिखा था कि 12 राज्यों ने 20 अप्रेल के लिए ऑक्सीजन की जिस सम्भावित आवश्यकता जताई थी, वह 4,880 मीट्रिक टन की थी।

Thursday, July 8, 2021

असाधारण मंत्रिमंडल विस्तार


एक तरीके से यह समुद्र-मंथन जैसी गतिविधि है। प्रधानमंत्री ने झाड़-पोंछकर एकदम नई सरकार देश के सामने रख दी है।  इसे विस्तार के बजाय नवीनीकरण कहना चाहिए। अतीत में किसी मंत्रिमंडल का विस्तार इतना विस्मयकारी नहीं हुआ होगा। संख्या के लिहाज से देखें, तो करीब 45 फीसदी नए मंत्री सरकार में शामिल हुए हैं। इस मेगा-कैबिनेट विस्तार का मतलब है कि या तो सरकार अपनी छवि को लेकर चिंतित है या फिर यह इमेज-बिल्डिंग का कोई नया प्रयोग है। नए मंत्रियों के आगमन से ज्यादा विस्मयकारी है कुछ दिग्गजों का सरकार से पलायन। नरेन्द्र मोदी छोटी सरकार के हामी हैं, पर यह सरकार भारी-भरकम हो गई है। यह उनके विचार के साथ विसंगति है, पर जो भी हुआ है वह राजनीतिक कारणों से है। 

इस मंत्रिमंडल विस्तार को जातीय, भौगोलिक और क्षेत्रीय राजनीति के लिहाज से परखने और समझने में समय लगेगा, पर इतना स्पष्ट है कि इसमें महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश की आंतरिक राजनीति को संबोधित किया गया है। जिस तरीके से उत्तर प्रदेश का जातीय-रसायन इस मंत्रिपरिषद में मिलाया गया है, उससे साफ है कि न केवल विधान सभा के अगले साल होने वाले चुनाव, बल्कि 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए सरकार ने अभी से कमर कस ली है। दूसरी तरफ सरकार अपनी छवि को सुधारने के लिए भी कृतसंकल्प लगती है। इसलिए इसमें राजनीतिक-मसालों के अलावा विशेषज्ञता को भी शामिल किया गया है।

सरकार ने महसूस किया है कि छवि को लेकर उसे कुछ करना चाहिए। प्रशासनिक अनुभव और छवि के अलावा सामाजिक-संतुलन बल्कि देश के अलग-अलग इलाकों के माइक्रो-मैनेजमेंट की भूमिका भी इसमें दिखाई पड़ती है। कई प्रकार के फॉर्मूलों को इस विस्तार में पढ़ा जा सकता है। स्वाभाविक रूप से मंत्रिमंडल का गठन राजनीतिक गतिविधि है। इसका रिश्ता चुनाव जीतने से ही है। नए मंत्रियों में उत्तर प्रदेश से सात, महाराष्ट्र से पाँच और गुजरात और कर्नाटक से चार-चार शामिल हुए हैं। उत्तर प्रदेश में अगले साल चुनाव हैं, जहाँ सोशल-इंजीनियरी की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। उत्तर प्रदेश में पार्टी ने न केवल जातीय संरचना को बल्कि राज्य की भौगोलिक संरचना को भी ध्यान में रखा है। गुजरात में भी अगले साल चुनाव हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्थापित किया है कि मैं बड़े से बड़ा फैसला करने को तैयार हूँ। इस परिवर्तन से यह बात भी स्थापित हुई है कि पार्टी और सरकार के भीतर अपनी छवि को लेकर गहरा मंथन है। कुछेक महत्वपूर्ण नेताओं को छोड़ दें, तो इस बदलाव के छींटे पुरानेमंत्रियों पर पड़े हैं। उनमें रविशंकर प्रसाद, प्रकाश जावडेकर, हर्षवर्धन, संतोष गंगवार, रमेश पोखरियाल निशंक जैसे सीनियर नेता भी शामिल हैं। डॉ हर्षवर्धन को महामारी और खासतौर से दूसरी लहर का सामना करने में विफलता की सजा मिली है, पर अर्थव्यवस्था भी मुश्किल में है, फिर भी निर्मला सीतारमन अपनी जगह कायम हैं। 

प्रधानमंत्री ने निर्मला सीतारमन पर भरोसा जताया है। दूसरी तरफ रविशंकर प्रसाद और प्रकाश जावडेकर को लेकर अभी समझ में नहीं आ रहा है कि वे क्यों हटे हैं। रविशंकर प्रसाद के कंधों पर इलेक्ट्रॉनिक्स-क्रांति की जिम्मेदारी थी। ट्विटर और फेसबुक जैसी सोशल मीडिया कम्पनियों के खिलाफ मोर्चा भी उन्होंने खोला था। क्या उन्हें विफल माना गया? या उन्हें कोई दूसरी भूमिका देने की योजना है? यही बात प्रकाश जावडेकर पर लागू होती है। इस समय वे सरकार के सबसे महत्वपूर्ण प्रवक्ता माने जाते थे। जितना जबर्दस्त मंत्रिमंडल का विस्तार है, उससे ज्यादा जबर्दस्त है सरकार का संकुचन।

Wednesday, July 7, 2021

असमंजस में अफगानिस्तान


दक्षिण एशिया में जो सबसे बड़ा बदलाव इन दिनों हो रहा है, वह अफगानिस्तान में है। अमेरिका और उसके मित्र देशों की सेनाएं तकरीबन पूरी तरह अफगानिस्तान से वापस लौट चुकी हैं। केवल नाममात्र की उपस्थिति अब शेष  है। राष्ट्रपति जो बाइडेन ने 11 सितम्बर की तारीख इस काम को पूरा करने के लिए दी है, पर लगता है कि अमेरिका उसके पहले ही अफगानिस्तान से हट जाएगा। इस दौरान वहाँ तालिबान लड़ाके तेजी से अपने प्रभाव-क्षेत्र का विस्तार कर रहे हैं। इससे कुछ सवाल पैदा हो रहे हैं। इसी सिलसिले में भारत के विदेशमंत्री एस जयशंकर रूस जा रहे हैं। भारत जो भी कदम उठाएगा, उसके पहले अमेरिका और रूस दोनों के साथ परामर्श करेगा। इस दौरान भारत ने तालिबान के साथ भी सम्पर्क स्थापित किया है।

क्या अमेरिका अब इस इलाके में तालिबान के प्रभाव को बढ़ने देगा? क्या अमेरिका ने जिस सरकार को काबुल में बैठाया है, वह गिर जाएगी? क्या तालिबान की आड़ में वहाँ पाकिस्तान का प्रभाव बढ़ेगा? और क्या भारत के लिए यह चिंता की बात नहीं है? अमेरिका और पाकिस्तान के अलावा इस इलाके में ईरान, रूस, चीन, कतर और तुर्की की दिलचस्पी भी है। इसमें ईरान को अलग कर दें, तो शेष देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अफगानिस्तान से जुड़ी ज्यादातर बातचीत से जुड़े रहे हैं। तुर्की काबुल के पास बगराम हवाई अड्डे की सुरक्षा का जिम्मा लेना चाहता है। यह हवाई अड्डा आने वाले समय में काबुल को दुनिया से जोड़े रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। काबुल सरकार विरोधी तालिबानी लड़ाकों की पूरी कोशिश इसपर कब्जा करने की होगी।

अनेक दूतावास बंद

तालिबान की कोशिश मध्य एशिया से लगी अफगान-सीमा के प्रमुख मार्गों पर कब्जा करने की है। इन रास्तों से अफगानिस्तान रूस समेत दुनिया के दूसरे देशों से जुड़ा रहता है। तालिबान ने कुंदुज शहर के उत्तर में शेर खान बंदर क्रॉसिंग पर कब्जा कर लिया है। यहाँ से ताजिकिस्तान के साथ व्यापार होता है। बल्ख प्रांत के सीमावर्ती शहर बंदर-ए-हैरातान पर भी खतरा है, पर सरकार ने कहा है कि वहाँ कुमुक भेजी जा रही है। दूसरी तरफ अफगान सरकार का कहना है कि हम उन जिलों पर फिर से कब्जा करेंगे, जो तालिबान के नियंत्रण में चले गए हैं। 

Tuesday, July 6, 2021

भारत-पाकिस्तान रिश्तों में फिर से लू-लपट


भारत और पाकिस्तान के आपसी रिश्तों में कितनी तेजी से उतार-चढ़ाव आता है इसकी मिसाल पिछले चार महीनों में देखी जा सकती है। गत 25 फरवरी को दोनों देशों के बीच अचानक नियंत्रण रेखा पर युद्ध-विराम के एक पुराने समझौते को मजबूती से लागू करने का समझौता हुआ। इससे अचानक शांति का माहौल बनने लगा। पाकिस्तान की तरफ से एक के बाद एक बयान आए। भारतीय प्रधानमंत्री ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को शुभकामनाएं भेजीं।

केवल युद्ध-विराम ही नहीं आपसी व्यापार फिर से शुरू करने की बातें होने लगीं। ऐसे संकेत मिले कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब गणराज्य के बीच में पड़ने से दोनों देशों के बीच बैकरूम-बातचीत भी हो रही है। इसके बाद जम्मू में भारतीय वायुसेना के हवाई अड्डे पर ड्रोन हमले की खबरें आईं और सब कुछ अचानक यू-टर्न हो गया। उधर 23 जून को लाहौर में हाफिज सईद के घर के पास एक बम धमाका हुआ, जिसके लिए पाकिस्तान ने भारत को जिम्मेदार ठहराया है।

पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मोईद युसुफ ने कहा है कि लाहौर धमाके का मास्टर माइंड एक भारतीय नागरिक है जो रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (भारतीय ख़ुफिया एजेंसी रॉ) से जुड़ा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने सीधे-सीधे इसे 'भारत प्रायोजित आतंकवादी हमला' क़रार दिया है। इमरान खान ने ट्वीट किया, मैंने अपनी टीम को निर्देश दिया कि वे जौहर टाउन लाहौर धमाके की जाँच की जानकारी कौम को दें। मैं पंजाब पुलिस के आतंकवादी निरोधक विभाग की तेज़ रफ़्तार से की गई जाँच की तारीफ़ करूंगा कि उन्होंने हमारी नागरिक और ख़ुफ़िया एजेंसियों की शानदार मदद से सबूत निकाले।

सवाल है कि क्या वास्तव में ऐसी कोई जाँच हुई? क्या पाकिस्तान के पास कोई सबूत है या वह इस दौरान बनी शांति की सम्भावनाओं से बाहर निकलना चाहता है? वह बाहर निकलना चाहता है, तो इन सम्भावनाओं में शामिल ही क्यों हुआ था? क्या वहाँ सेना और सरकार के बीच मतभेद हैं? या पाकिस्तान अपने बुने जाल में फँसता जा रहा है? ऐसे तमाम सवालों ने दक्षिण एशिया को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। एक तरफ अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी हो रही है और दूसरी तरफ भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक-प्रक्रियाओं को तेज कर दिया है। इससे पाकिस्तानी अंतर्विरोध खुलकर सामने आने लगे हैं।

Monday, July 5, 2021

महामारी ने दुनिया की शैक्षिक-तस्वीर भी बदली

कोविड-19 ने केवल वैश्विक-स्वास्थ्य की तस्वीर को ही नहीं बदला है, बल्कि खान-पान, पहनावे, रहन-सहन, रोजगार, परिवहन और शहरों की प्लानिंग तक को बदल दिया है। इन्हीं बदलावों के बीच एक और बड़ा बदलाव वैश्विक स्तर पर चल रहा है। वह है शिक्षा-प्रणाली में बदलाव। यह बदलाव प्रि-स्कूल से लेकर इंजीनियरी, चिकित्सा और दूसरे व्यवसायों की शिक्षा और छात्रों के मूल्यांकन तक में देखा जा रहा है।

भारत के सुप्रीम कोर्ट में इन दिनों एक याचिका पर सुनवाई हो रही है, जिसमें राज्य सरकारों को महामारी के मद्देनज़र बोर्ड परीक्षाएं आयोजित नहीं करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। अदालत को सूचित किया गया कि 28 राज्यों में से छह ने बोर्ड की परीक्षाएं पहले ही करा ली हैं, 18 राज्यों ने उन्हें रद्द कर दिया है, लेकिन चार राज्यों (असम, पंजाब, त्रिपुरा और आंध्र प्रदेश) ने अभी तक उन्हें रद्द नहीं किया है। बाद में आंध्र ने भी परीक्षा रद्द कर दी। सीबीएसई समेत ज्यादातर राज्यों ने परीक्षाएं रद्द कर दी हैं। अब मूल्यांकन के नए तरीकों को तैयार किया जा रहा है, पर प्याज की परतों की तरह इस समस्या के नए-नए पहलू सामने आते जा रहे हैं, जो ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

160 करोड़ बच्चे प्रभावित

महामारी का असर पूरी दुनिया की शिक्षा पर पड़ा है। खासतौर से उन बच्चों पर जो संधि-स्थल पर हैं। मसलन या तो डिग्री पूरी कर रहे हैं या नौकरी पर जाने की तैयारी कर रहे हैं या स्कूली पढ़ाई पूरी करके ऊँची कक्षा में जाना चाहते हैं। तमाम अध्यापकों का रोजगार इस दौरान चला गया है। बहुत छोटी पूँजी से चल रहे स्कूल बंद हो गए हैं। ऑनलाइन पढ़ाई का प्रचार आकर्षक है, पर व्यावहारिक परिस्थितियाँ उतनी आकर्षक नहीं हैं।

गरीब परिवारों में एक भी स्मार्टफोन नहीं है। जिन परिवारों में हैं भी, तो महामारी के कारण आर्थिक विपन्नता ने घेर लिया है और वे रिचार्ज तक नहीं करा पा रहे हैं। यह हमारे और हमारे जैसे देशों की कहानी है। ऑनलाइन शिक्षा लगती आकर्षक है, पर बच्चों और शिक्षकों के आमने-समाने के सम्पर्क से जो बात बनती है, वह इस शिक्षा में पैदा नहीं हो सकती।

Sunday, July 4, 2021

नए दौर का भारत यानी ‘डिजिटल इंडिया’


पिछले गुरुवार को डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के छह साल पूरे हो गए। पिछले छह साल में सरकार ने डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी), कॉमन सर्विस सेंटर, डिजिलॉकर और मोबाइल-आधारित उमंग सेवाओं जैसी कई डिजिटल पहल इसके तहत शुरू की हैं। इस साल सीबीएसई की परीक्षाएं स्थगित होने के बाद मूल्यांकन की केंद्रीय-व्यवस्था में तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। बहरहाल डिजिटल इंडिया के छह साल पूरे होने पर इसके सकारात्मक पहलुओं के साथ उन चुनौतियों पर नजर डालने की जरूरत भी है जो रास्ते में आ रही हैं।

डिजिटल-विसंगतियाँ

सबसे बड़ी चुनौती गैर-बराबरी यानी डिजिटल डिवाइड की है। दूसरी चुनौती उस इंफ्रास्ट्रक्चर की है, जिसके कंधों पर बैठकर इसे आना है। जनता का काफी बड़ा हिस्सा या तो इस तकनीक का इस्तेमाल करने में असमर्थ है या न चाहते हुए भी उससे दूर है। छह साल पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वनिधि योजना के लाभों तथा स्वामित्व योजना के माध्यम से मालिकाना हक की सुरक्षा का उल्लेख किया। ई-संजीवनी की चर्चा की और बताया कि राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत एक प्रभावी प्लेटफॉर्म के लिए काम जारी है। विश्व के सबसे बड़े डिजिटल कॉण्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप में से एक आरोग्य सेतु ने कोरोना संक्रमण को रोकने में काफी मदद की है। टीकाकरण के लिए भारत के कोविन ऐप में बहुत से देशों ने दिलचस्पी दिखाई है।

दूसरी तरफ भारत की कहानी विसंगतियों से भरी है। हमारे पास दुनिया का दूसरे नम्बर का ई-बाजार है। कोरोना काल में खासतौर से इसका विस्तार हुआ है, पर देश की करीब आधी आबादी कनेक्टेड नहीं है। संसद के पिछले सत्र में बताया गया कि जहाँ देश में मोबाइल कनेक्शनों की संख्या 116.3 करोड़ हो गई है, वहीं देश के 5.97 लाख गाँवों में से 25,000 गाँवों में मोबाइल या इंटरनेट कनेक्टिविटी नहीं है। इनमें से 6099 गाँव अकेले ओडिशा में हैं। ग्यारह राज्यों के 90 जिले वामपंथी-उग्रवाद के शिकार हैं। देश में इस साल 5-जी सेवाएं शुरू करने की योजना है, पर जब हम ब्रॉडबैंड पर नजर डालते हैं, तब खास प्रगति नजर नहीं आती।

ऊकला स्पीडटेस्ट ग्लोबल के अनुसार वैश्विक स्तर पर जनवरी 2021 में भारत की ब्रॉडबैंड स्पीड पिछले साल में एक प्रतिशत ही बढ़ी है। हम पिछले साल भी दुनिया के 65वें पायदान पर थे और इस साल भी वहीं पर हैं। जनवरी 2021 में ब्रॉडबैंड की औसत स्पीड 54.73 एमबीपीएस थी, जबकि पिछले साल वह 53.90 एमबीपीएस थी। सिंगापुर 247.54, हांगकांग 229.45 और थाईलैंड 220.59 के साथ हमसे काफी ऊपर थे। मोबाइल इंटरनेट डेटा की स्पीड में जनवरी 2021 में भारत 131 की पायदान पर था, जबकि दिसंबर 2020 में 129 पर था। जनवरी में भारत की औसत मोबाइल डाउनलोड स्पीड 12.41 एमबीपीएस थी, जबकि संयुक्त अरब अमीरात में 183.03 और दक्षिण कोरिया में 171.26 थी।

Thursday, July 1, 2021

भारत के आर्थिक सुधार तीन दशक और अब उससे आगे...

भारत के आर्थिक उदारीकरण के तीस साल पूरे हो गए हैं। उदारीकरण को लेकर तब भी भ्रांतियाँ थीं और आज भी हैं। इन दिनों इस विषय पर फिर से लेख पढ़ने को मिल रहे हैं। आज के बिजनेस स्टैंडर्ड में एके भट्टाचार्य का यह आलेख पढ़ने को मिला, जो मुझे विचारणीय लगता है।

एके भट्टाचार्य

July 01, 2021

तीस वर्ष पहले एक वित्त मंत्री ने (जो उस समय संसद सदस्य भी नहीं थे) साहसी सुधारों की एक ऐसी शृंखला शुरू की जिसने देश में आर्थिक नीति निर्माण की प्रक्रिया को नाटकीय रूप से बदल दिया।

उस वक्त भारतीय अर्थव्यवस्था असाधारण राजकोषीय संकट तथा भुगतान संतुलन के संकट से जूझ रही थी। उसे उबारने के लिए तत्कालीन सरकार के शुरुआती 100 दिनों में इनमें से अधिकांश सुधारों को जिस तरह शुरू किया गया वह भी कम नाटकीय नहीं था।

जिस समय इन बड़े सुधारों को अंजाम दिया गया उस समय सरकार को लोकसभा में बहुमत हासिल नहीं था और वित्त मंत्री की तरह तत्कालीन प्रधानमंत्री भी संसद के सदस्य नहीं थे। संकट इतना बड़ा था कि इन निर्णयों की राजनीतिक उपयुक्तता पर भी सवाल उठाए गए। प्रधानमंत्री नवंबर 1991 में एक उपचुनाव के जरिये लोकसभा पहुंचे और वित्त मंत्री भी लगभग उसी समय असम से राज्य सभा में पहुंचे। जी हां, हम सन 1991 से 1996 तक कांग्रेस सरकार का नेतृत्व करने वाले पीवी नरसिंह राव और उनके वित्त मंत्री मनमोहन सिंह की बात कर रहे हैं।

इस अल्पमत सरकार के कार्यकाल के शुरुआती 100 दिनों में सुधारों की बात करें तो इस सरकार ने बेहद तेजी से काम किया। सरकार गठन के एक पखवाड़े से भी कम समय के भीतर 2 जुलाई को सिंह ने डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का 9.5 फीसदी अवमूल्यन किया और एक दिन बाद 12 फीसदी अवमूल्यन और कर दिया गया। रुपये के मूल्य में दो चरणों में की गई यह कमी कोई इकलौता कदम नहीं था। न ही यह केवल सिंह और राव के सुधार थे। तत्कालीन वाणिज्य मंत्री पी चिदंबरम ने भी साहसी वाणिज्य नीति सुधारों का पैकेज पेश किया था।

Wednesday, June 30, 2021

पंजाब में कांग्रेस आत्मघात की ओर


सम्भव है कि कांग्रेस के पास भविष्य की कोई रणनीति हो, पर वह कम से कम मुझे नजर नहीं आ रही है। पंजाब में जिस तरीके से नवजोत सिंह सिद्धू को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है और उसका प्रचार भी जोर-शोर से किया जा रहा है, उससे नेतृत्व की नासमझी ही दिखाई पड़ रही है। वह भी चुनाव के ठीक पहले। पार्टी यदि सिद्धू के नेतृत्व में चुनाव लड़ना चाहती है, तो उसे इसे स्पष्ट करना चाहिए और खुलकर सामने आना चाहिए। इस तरीके से तो न तो कैप्टेन अमरिंदर सिंह का भला होगा और न सिद्धू को कुछ मिलेगा। हाँ, यह हो सकता है कि यह पंछी उड़कर किसी और जहाज पर जाकर न बैठ जाए।

कुछ दिन पहले अमरिंदर सिंह दिल्ली आए और दो दिन यहाँ रहे। उनकी मुलाकात गांधी परिवार के किसी से नहीं हो पाई, तो उसमें विस्मय की बात नहीं थी। पर सिद्धू के साथ 30 जून को पहले प्रियंका गांधी के साथ और शाम को राहुल गांधी के साथ हुई मुलाकातें और फिर उसका प्रचार साफ बता रहा है कि हाईकमान के सोच की दिशा क्या है। हाल में पार्टी की तरफ से पार्टी के पंजाब प्रभारी हरीश रावत ने कहा था कि पार्टी अध्यक्ष जुलाई के पहले या दूसरे हफ्ते तक इस मामले में कोई फैसला करेंगी। अलबत्ता पार्टी ने मुख्यमंत्री से 18 मामलों पर काम करने को कहा है। मुख्यमंत्री इस विषय पर प्रेस कांफ्रेंस करके जानकारी देंगे।

Monday, June 28, 2021

कोरोना के इलाज में ‘एंटीबॉडी-कॉकटेल’ से उम्मीदें

कोविड-19 के मोर्चे से मिली-जुली सफलता की खबरें हैं। जहाँ इसकी दूसरी लहर उतार पर है, वहीं तीसरी का खतरा सिर पर है। दूसरे, दुनिया में टीकाकरण की प्रक्रिया तेज है रही है। और तीसरे, मोनोक्लोनल एंटीबॉडी कॉकटेल के रूप में एक उल्लेखनीय दवाई सामने आई है। ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड विवि में हुए क्लिनिकल परीक्षणों में रिजेन-कोव2 नाम की औषधि ने कोविड-19 संक्रमित मरीजों के इलाज में अच्छी सफलता हासिल की है। यह मोनोक्लोनल एंटीबॉडी कॉकटेल है, जो इसके पहले कैंसर, एबोला और एचआईवी के इलाज में भी सफल हुई हैं। पिछले साल जब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कोरोना हुआ, तब उन्हें भी यह दवा दी गई थी।

यह दवा नहीं रोग-प्रतिरोधक है, जो शरीर का अपना गुण है, पर किसी कारण से जो रोगी कोविड-19 का मुकाबला कर नहीं पा रहे हैं, उन्हें इसे कृत्रिम रूप से देकर असर देखा जा रहा है। इसकी तुलना प्लाज़्मा थिरैपी से भी की जा सकती है। परीक्षण अभी चल ही रहे हैं। यह तय भी होना है कि यह दवा मरीजों के किस तबके के लिए उपयोगी है। पिछले साल इसी किस्म के परीक्षणों में ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने डेक्सामैथासोन (स्टीरॉयड) को उपयोगी पाया था।

कॉकटेल क्यों?

अमेरिकी फार्मास्युटिकल कम्पनी रिजेनेरॉन की रिजेन-कोवमें दो तरह की एंटीबॉडी 'कैसिरिविमैब' और 'इमडेविमैब' का कॉम्बीनेशन है। ये एंटीबॉडी शरीर में रोगाणु को घेरती है। दो किस्म की एंटीबॉडी का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है, ताकि वायरस किसी एक की प्रतिरोधी क्षमता विकसित करने न पाए। पिछले एक साल में इस दवाई की उपयोगिता तो काफी हद तक साबित हुई है, पर इसका व्यापक स्तर पर इस्तेमाल अभी शुरू नहीं हुआ है।

Sunday, June 27, 2021

कश्मीर से सकारात्मक-संदेश


इस हफ्ते 24 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ कश्मीरी नेताओं की वार्ता ने न केवल जम्मू-कश्मीर में बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता की सम्भावनाओं का द्वार खोला है। इस बातचीत के सही परिणाम मिलेंगे या नहीं, यह भी कहना मुश्किल है, पर कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के शब्दों में यह सही दिशा में उठाया गया कदम है। कश्मीर में लोकतांत्रिक-प्रक्रिया की प्रक्रिया शुरू होने के साथ दूसरी प्रक्रियाएं शुरू होंगी, जिनसे हालात को सामान्य बनाने का मौका मिलेगा। इनमें सांस्कृतिक, शैक्षिक और सामाजिक गतिविधियाँ शामिल हैं।

पहले परिसीमन

सरकार ने जो रोडमैप दिया है उसके अनुसार राज्य में पहले परिसीमन, फिर चुनाव और उसके बाद पूर्ण राज्य का दर्जा देने की प्रक्रिया होगी। पिछले साल स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा था कि राज्य में परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव होंगे। उसके पहले अगस्त 2019 में गृहमंत्री अमित साह ने संसद में कहा था कि समय आने पर जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाएगा। वस्तुतः यह कश्मीर के नव-निर्माण की प्रक्रिया है।

सन 2019 में संसद से जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक के पारित होने के बाद मार्च 2020 में परिसीमन आयोग का गठन किया गया था। इस आयोग को रिपोर्ट सौंपने के लिए एक साल का समय दिया गया था, जिसे इस साल मार्च में एक साल के लिए बढ़ा दिया गया है। 6 मार्च, 2020 को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई के नेतृत्व में आयोग का गठन किया था।

प्रधानमंत्री के साथ बातचीत का सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू यह है कि पूरी बातचीत में बदमज़गी पैदा नहीं हुई। बैठक में राज्य के तीन पूर्व मुख्यमंत्री ऐसे थे, जो 221 दिन से 436 दिन तक कैद में रहे। उनके मन में कड़वाहट जरूर होगी। वह कड़वाहट इस बैठक में दिखाई नहीं पड़ी। बेशक बर्फ पिघली जरूर है, पर आगे का रास्ता आसान नहीं है।

Friday, June 25, 2021

जम्मू-कश्मीर में अब तेज होगी चुनाव-क्षेत्रों के परिसीमन की व्यवस्था


कश्मीर में पहले परिसीमन, फिर चुनाव और पूर्ण राज्य का दर्जा। सरकार ने अपना रोडमैप स्पष्ट कर दिया है। संसद में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक के पारित होने के बाद मार्च  2020 में परिसीमन आयोग का गठन किया गया था। इस आयोग को रिपोर्ट सौंपने के लिए एक साल का समय दिया गया था, जिसे इस साल मार्च में एक साल के लिए बढ़ा दिया गया है।

पिछले साल स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा था कि राज्य में परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव होंगे। 6 मार्च, 2020 को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई के नेतृत्व में आयोग का गठन किया। जस्टिस देसाई के अलावा चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा और जम्मू-कश्मीर राज्य के चुनाव आयुक्त केके शर्मा आयोग के सदस्य हैं। इसके अलावा आयोग के पाँच सहायक सदस्य भी हैं, जिनके नाम हैं नेशनल कांफ्रेंस के सांसद फारूक अब्दुल्ला, मोहम्मद अकबर लोन और हसनैन मसूदी। ये तीनों अभी तक आयोग की बैठकों में शामिल होने से इनकार करते रहे हैं। अब आशा है कि ये शामिल होंगे। इनके अलावा पीएमओ के राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह और भाजपा के जुगल किशोर शर्मा के नाम हैं।

इस आयोग को एक साल के भीतर अपना काम पूरा करना था, जो इस साल मार्च में एक साल के लिए बढ़ा दिया गया है। कोरोना के कारण आयोग निर्धारित समयावधि में अपना काम पूरा नहीं कर पाया। यदि लद्दाख की चार सीटों को अलग कर दें, तो पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्र की सीटों को मिलाकर इस समय की कुल संख्या 107 बनती है, जो जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के अंतर्गत 111 हो जाएगी। बढ़ी हुई सीटों का लाभ जम्मू क्षेत्र को मिलेगा।  

दक्षिण एशिया में शांति और विकास की राह भी कश्मीर से होकर गुजरेगी


 अच्छी बात यह है कि गुरुवार को प्रधानमंत्री के साथ कश्मीरी नेताओं की बातचीत में बदमज़गी नहीं थी। इस बैठक में राज्य के तीन पूर्व मुख्यमंत्री ऐसे थे, जो 221 दिन से 436 दिन तक कैद में रहे। उनके मन में कड़वाहट जरूर होगी। वह कड़वाहट इस बैठक में दिखाई नहीं पड़ी। बेशक इससे बर्फ पिघली जरूर है, पर आगे का रास्ता आसान नहीं है।

इस बातचीत पहले देश के प्रधानमंत्री के साथ कश्मीरी नेताओं की वार्ता का एक उदाहरण और है। 23 जनवरी 2004 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ कश्मीर के (हुर्रियत के) अलगाववादी नेताओं की बात हुई थी। तत्कालीन उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने उन्हें बुलाया था। उस बातचीत के नौ महीने पहले अटल जी ने श्रीनगर की एक सभा में इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत का संदेश दिया था।

पाकिस्तान की कश्मीर-योजना

तब में और अब में परिस्थितियों में गुणात्मक परिवर्तन आया है। कश्मीरी मुख्यधारा की राजनीति के सामने भी अस्तित्व का संकट है और दिल्ली में जो सरकार है, वह कड़े फैसले करने को तैयार हैं। दोनों पक्षों के पास टकराव का एक अनुभव है। समझदारी इस बात में है कि दोनों अब आगे का रास्ता समझदारी के साथ तय करें। हालात को सुधारने में पाकिस्तान की भूमिका भी है। भारत-द्वेष की कीमत भी उन्हें चुकानी होगी। सन 1965 के बाद से पाकिस्तान ने कश्मीर को जबरन हथियाने का जो कार्यक्रम शुरू किया है, उसकी वजह से उसकी अर्थव्यवस्था रसातल में पहुँच गई है।

भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और म्यांमार यदि एक प्लेटफॉर्म पर आकर आर्थिक सहयोग करें तो यह क्षेत्र चीन की तुलना में कहीं ज्यादा तेजी से विकास कर सकता है। यह सपना है, जो आसानी से साकार हो सकता है। इसके लिए सभी पक्षों को समझदारी से काम करना होगा।

एकीकरण की जरूरत

गत 18 फरवरी को नरेंद्र मोदी ने चिकित्सा आपात स्थिति के दौरान दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र के देशों के बीच डॉक्टरों, नर्सों और एयर एंबुलेंस की निर्बाध आवाजाही के लिए क्षेत्रीय सहयोग योजना के संदर्भ में कहा था कि 21 वीं सदी को एशिया की सदी बनाने के लिए अधिक एकीकरण महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान सहित 10 पड़ोसी देशों के साथ ‘कोविड-19 प्रबंधन, अनुभव और आगे बढ़ने का रास्ता’ विषय पर एक कार्यशाला में उन्होंने यह बात कही। इस बैठक में मौजूद पाकिस्तानी प्रतिनिधि ने भारत के रुख का समर्थन किया। बैठक में यह भी कहा गया कि ‘अति-राष्ट्रवादी मानसिकता मदद नहीं करेगी।’ पाकिस्तान ने कहा कि वह इस मुद्दे पर किसी भी क्षेत्रीय सहयोग का हिस्सा होगा।

मोदी ने कहा, महामारी के दौरान देखी गई क्षेत्रीय एकजुटता की भावना ने साबित कर दिया है कि इस तरह का एकीकरण संभव है। कई विशेषज्ञों ने घनी आबादी वाले एशियाई क्षेत्र और इसकी आबादी पर महामारी के प्रभाव के बारे में विशेष चिंता व्यक्त की थी, लेकिन हम एक समन्वित प्रतिक्रिया के साथ इस चुनौती सामना कर रहे हैं। इस बैठक और इस बयान के साथ पाकिस्तानी प्रतिक्रिया पर गौर करना बहुत जरूरी है। कोविड-19 का सामना करने के लिए भारत की वैक्सीन डिप्लोमेसी इन दिनों खासतौर से चर्चा का विषय है। इस वक्तव्य के एक हफ्ते बाद 25 फरवरी को भारत और पाकिस्तान ने नियंत्रण रेखा पर युद्धविराम की घोषणा की।

Thursday, June 24, 2021

परिसीमन के बाद होंगे कश्मीर में चुनाव

 


प्रधानमंत्री के साथ कश्मीरी नेताओं की करीब तीन घंटे तक चली वार्ता सम्पन्न हो गई है। हालांकि अभी सरकारी ब्रीफिंग नहीं हुई है, पर बातचीत से बाहर निकले कांग्रेसी नेता गुलाम नबी आजाद ने बताया कि बातचीत ने हमारी तरफ से पाँच बातें रखी गईं। राज्य का दर्जा जल्द बहाल हो, विधान सभा चुनाव कराए जाएं, कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी हो, सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा किया जाए और स्थायी निवास को बनाए रखा जाए।

जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी के नेता अल्ताफ बुखारी ने बैठक के बाद कहा, बातचीत बड़े अच्छे माहौल में हुई। प्रधानमंत्री ने सभी नेताओं के मुद्दे सुने। पीएम ने कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव को लेकर प्रक्रिया शुरू की जाएगी। गुलाम नबी ने बताया कि बैठक में सभी नेताओं को किसी भी विषय पर, कितना भी बोलने की छूट थी। पहले प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने अपनी बात रखी।

आजाद के मुताबिक, सरकार ने कोविड को चुनावों में देरी की वजह बताया। बैठक में शामिल बीजेपी नेता कवींद्र गुप्ता ने बताया कि पीडीपी (पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी) की नेता महबूबा मुफ्ती ने बैठक के दौरान पाकिस्तान का नाम लिया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के साथ व्यापार जारी रहना चाहिए।

उधर सरकारी सूत्रों का कहना है कि हम सभी मसलों पर विचार-विमर्श के लिए तैयार हैं। फिलहाल हम चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन का काम पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं, ताकि चुनाव कराए जा सकें। परिसीमन का काम पूरा होने के बाद जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराए जाएंगे। गृहमंत्री ने कहा कि पूरी प्रक्रिया के तहत पूर्ण राज्य का दर्जा भी बहाल किया जाएगा।

पंजाब में कांग्रेस का संशय


कांग्रेस हाईकमान ने पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह से 18 चुनावी वायदों को एक समय-सीमा में पूरा करने को कहा है। वायदों को पूरा करने के निर्देश में कुछ गलत नहीं है, पर इस बात की सार्वजनिक घोषणा के मायने हैं। दूसरे अमरिंदर सिंह दिल्ली आए, दो दिन रहे और सोनिया गांधी या राहुल गांधी से उन्हें मिलने का अवसर नहीं मिला। बुधवार को राहुल गांधी ने हरीश रावत, पंजाब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुनील जाखड़, सांसदों मनीष तिवारी और प्रताप सिंह बाजवा, राज्य के वित्तमंत्री मनप्रीत बादल और विधायक इंदरबीर बुलारिया से मुलाकात की।

ऐसा लगता है कि पार्टी हाईकमान पंजाब को लेकर सक्रिय जरूर है, पर समाधान आसान नहीं है। कैप्टेन की अनदेखी नहीं हो सकती और सिद्धू की महत्वाकांक्षाओं को रोका नहीं जा सकता। दूसरी तरफ राजस्थान में सचिन पायलट के खेमे की सुनवाई उस स्तर पर नहीं हो रही है, जिस स्तर पर नवजोत सिद्धू खेमे की है। सिद्धू प्रदेश के पार्टी अध्यक्ष बनना चाहते हैं, ताकि अगले चुनाव में ज्यादा से ज्यादा विधायक उनके समर्थक हों। पर वे बाहर से पार्टी में आए हैं और संगठन में मामूली पैठ और सीमित जानकारी ही उनके पास है। यह स्पष्ट है कि वे राहुल गांधी के सम्पर्क से पार्टी में आए हैं और उनका वह बयान प्रसिद्ध है, जिसमें उन्होंने कहा था, कौन कैप्टेन, मेरे कैप्टेन राहुल गांधी हैं।

पार्टी के पंजाब प्रभारी हरीश रावत ने कहा है कि पार्टी अध्यक्ष जुलाई के पहले या दूसरे हफ्ते तक इस मामले में कोई फैसला करेंगी। अलबत्ता पार्टी ने मुख्यमंत्री से 18 मामलों पर काम करने को कहा है। मुख्यमंत्री इस विषय पर प्रेस कांफ्रेंस करके जानकारी देंगे। दूसरी तरफ हाईकमान ने सिद्धू के हाल के बयानों को लेकर भी अपनी अप्रसन्नता व्यक्त की है। मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व में बनी तीन सदस्यीय समिति ने सिद्धू को दिल्ली बुलाया है और अपनी स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।

सूत्रों के मुताबिक हाईकमान ने माना है कि सिद्धू को किसी भी तरह के मतभेद की बात पार्टी फोरम में ही रखनी चाहिए थी पार्टी के पैनल ने अमरिंदर सिंह को ही 2022 के विधानसभा चुनावों के लिए कैप्टन बनाए रखने पर सहमति जताई है और उन्हें टीम चुनने के लिए फ्री-हैंड दिया है।

Wednesday, June 23, 2021

24 की बैठक में स्पष्ट होगा घाटी की मुख्यधारा राजनीति का नजरिया


प्रधानमंत्री के साथ 24 जून को जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक नेताओं की प्रस्तावित बैठक के निहितार्थ क्या हैं? क्यों यह बैठक बुलाई गई है? कश्मीर की जनता इसे किस रूप में देखती है और वहाँ के राजनीतिक दल क्या चाहते हैं? ऐसे कई सवाल मन में आते हैं। इस लिहाज से 24 की बैठक काफी महत्वपूर्ण है। पहली बार प्रधानमंत्री कश्मीर की घाटी के नेताओं से रूबरू होंगे। दोनों पक्ष अपनी बात कहेंगे। सरकार बताएगी कि 370 और 35ए की वापसी अब सम्भव नहीं है। साथ ही यह भी भविष्य का रास्ता यह है। सरकार ने 5 अगस्त, 2019 को यह भी कहा था कि भविष्य में जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य बनाया जाएगा। सवाल है कि ऐसा कब होगा और यह भी कि वहाँ चुनाव कब होंगे

इस सिलसिले में महत्‍वपूर्ण यह भी है कि फारुक़ अब्दुल्ला के साथ-साथ महबूबा मुफ्ती भी इस बैठक में शामिल हो रही हैं। पहले यह माना जा रहा था कि वे फारुक़ अब्दुल्ला को अधिकृत कर देंगी। श्रीनगर में मंगलवार को हुई बैठक में गठबंधन से जुड़े पाँचों दल बैठक में आए। ये दल हैं नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, माकपा, अवामी नेशनल कांफ्रेंस और जम्मू-कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट। हमें नहीं भूलना चाहिए कि ये अलगाववादी पार्टियाँ नहीं हैं और भारतीय संविधान को स्वीकार करती हैं। 

पाकिस्तान में कुछ लोग मान रहे हैं कि मोदी सरकार को अपने कड़े रुख से पीछे हटना पड़ा है। यह उनकी गलतफहमी है। पाकिस्तान की सरकार और वहाँ की सेना के बीच से अंतर्विरोधी बातें सुनाई पड़ रही हैं। पर हमारे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण कश्मीरी राजनीतिक दल हैं। उन्हें भी वास्तविकता को समझना होगा। इन दलों का अनुमान है कि भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय बिरादरी को यह जताना चाहती है कि हम लोकतांत्रिक-व्यवस्था को पुष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं।

इंडियन एक्सप्रेस ने कश्मीरी राजनेताओं से इन सवालों पर बातचीत की है। गुपकार गठबंधन से जुड़े नेताओं को उधृत करते हुए अखबार ने लिखा है कि श्रीनगर में धारणा यह है कि इस वक्त आंतरिक रूप से तत्काल कुछ ऐसा नहीं हुआ है, जिससे इस बैठक को जोड़ा जा सके। केंद्र सरकार के सामने असहमतियों का कोई मतलब नहीं है। जिसने असहमति व्यक्त की वह जेल में गया।

एक कश्मीरी राजनेता ने अपना नाम को प्रकाशित न करने का अनुरोध करते हुए कहा कि 5 अगस्त, 2019 के बाद से जो कुछ भी बदला है, वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है। चीन ने (गलवान और उसके बाद के घटनाक्रम को देखते हुए) इस मसले में प्रवेश किया है। अमेरिका में प्रशासन बदला है। उसकी सेनाएं अब अफगानिस्तान से हट रही हैं और सम्भावना है कि तालिबान की काबुल में वापसी होगी। अमेरिका को फिर भी पाकिस्तान में अपनी मजबूत उपस्थिति की दरकार है। इन सब बातों के लिए वह दक्षिण एशिया में शांत-माहौल चाहता है। जम्मू-कश्मीर में जो होगा, उसके व्यापक निहितार्थ हैं।

Tuesday, June 22, 2021

आज की बैठक के पीछे हैं एनसीपी और तृणमूल की चुनावी महत्वाकांक्षाएं

 


नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के प्रमुख शरद पवार तृणमूल कांग्रेस के यशवंत सिन्हा की पहल पर आज दिल्ली में बुलाई गई बीजेपी-विरोधी बैठक में कांग्रेस और वामदलों के शामिल होने की सम्भावनाएं कम हैं। इस बैठक के पहले सुबह एनसीपी के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की बैठक भी होने जा रही है। दूसरी तरफ कश्मीर को लेकर प्रधानमंत्री द्वारा 24 जून को बुलाई गई बैठक के सिलसिले में गुपकार समूह की बैठक भी आज हो रही है।

यशवंत सिन्हा ने इस बैठक की खबर को मीडिया में मिले महत्व पर हैरत जाहिर की है। उनके विचार से यह मामूली बैठक है। इसके पहले राष्ट्र मंच की बैठकों पर कोई ध्यान नहीं देता था। यह बैठक शरद पवार के घर पर नहीं हुई होती, तो शायद इसबार भी इसपर ध्यान नहीं जाता। और बैठक हो रही है, तो कुछ बातें भी होंगी। बहरहाल आज की बैठक उस फेडरल फ्रंट की तैयारी लगती है, जिसकी पेशकश 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले टीआरएस के चंद्रशेखर राव ने की थी और जिसका समर्थन ममता बनर्जी और नवीन पटनायक ने किया था।

यह गतिविधि उत्तर प्रदेश के चुनाव के पहले हो रही है। तृणमूल कांग्रेस की कामना उत्तर प्रदेश में प्रवेश करने की है। आम आदमी पार्टी ने भी उत्तर प्रदेश के मंसूबे बाँध रखे हैं। देखना होगा कि इस वक्त इस मोर्चे में शामिल होने को उत्सुक कितने दल हैं। क्या समाजवादी पार्टी भी इसमें शामिल होगी? नवाब मलिक ने जो सूची जारी की है, उसमें अखिलेश यादव का नाम नहीं है।