Friday, March 15, 2019

शिखर पर पहुँचाएंगे नई पीढ़ी के वोटर


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लोकसभा के आगामी चुनाव में भारत के 89.9 करोड़ वोटर भाग लेंगे. दुनिया के किसी लोकतंत्र में एकसाथ इतने वोटरों की भागीदारी कभी नहीं हुई. सन 2014 के चुनाव में 81.5 करोड़ वोटरों ने हिस्सा लिया था. इसबार 8.4 करोड़ वोटरों की वृद्धि हुई है. इनमें भी 1.6 करोड़ वोटरों की आयु 18 से 19 वर्ष के बीच है. उनके अलावा छह करोड़ से ऊपर वोटर भी नौजवानों की परिभाषा में आते हैं. इतनी बड़ी संख्या में युवा वोटरों की चुनाव में भागीदारी क्या बताती है? ये वोटर अपनी राजनीति और व्यवस्था से क्या चाहते हैं?

राष्ट्रीय राजनीति के ज्यादातर नियंता अपने जीवन के संध्याकाल में प्रवेश कर चुके हैं. सही या गलत उनके पास अनुभव हैं और अतीत की यादें हैं. पर नए मतदाताओं के पास केवल उम्मीदें और हौसले हैं. इनमें से काफी नौजवान कुपोषण, गरीबी और तमाम असुविधाओं की बाधाओं को पार करके यहाँ तक पहुँचे हैं. व्यवस्था के निर्माण में उनकी भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है। उनके सपने पूरे होंगे, तो इसी व्यवस्था की मदद से होंगे. और वे इस व्यवस्था को पुष्ट करेंगे. सवाल है कि क्या हमारा लोकतंत्र इतनी बड़ी संख्या में नौजवानों की उम्मीदों को पूरा करेगा?

संयुक्त राष्ट्र की परिभाषाएं सामान्यतः 15 से 24 साल की अवस्था को युवा की श्रेणी में रखती हैं. भारत की राष्ट्रीय युवा नीति-2003 में 13 से 35 वर्ष की आयु को युवा की श्रेणी में रखा गया था. बाद में 2014 की राष्ट्रीय नीति में इसे 15-29 वर्ष कर दिया गया. यह परिभाषा बदलती रहती है, पर किसी भी परिभाषा से देखें, तो पाएंगे कि दुनिया के सबसे युवा देशों में भारत सबसे आगे है. सन 2018 में भारत की सकल आबादी की औसत उम्र 27.9 वर्ष थी और 2020 में देश की कुल आबादी में 34 फीसदी युवा होंगे. ऐसे युवा-देश में चुनाव के मुद्दे क्या युवा-केन्द्रित होते हैं? और युवा वोटर क्या इन मुद्दों पर वोट डालते हैं? सन 2014 का लोकसभा चुनाव खासतौर से युवा-भावनाओं के प्रस्फुटन के लिए याद रखा जाएगा. सन 2010 के बाद शुरू हुए जनलोकपाल आंदोलन में सबसे बड़ी भागीदारी युवाओं की थी. उसके बाद दिसम्बर 2012 में दिल्ली रेपकांड ने देशभर के युवाओं, खासतौर से लड़कियों में जागरूकता पैदा की. इस जागरूकता ने चुनाव परिणामों को भी प्रभावित किया. क्या वह जागरूकता इसबार के चुनाव में भी दिखाई पड़ेगी?

युवाओं से जुड़े सबसे बड़े मसले हैं शिक्षा और रोजगार. शिक्षा के भी कई स्तर हैं. प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा, तकनीकी और कौशल विकास की शिक्षा को लेकर युवाओं की सरकारों और राजनीति दलों से अपेक्षाएं हैं. जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक दल इन मसलों पर अपने स्पष्ट कार्यक्रम लेकर सामने आएं. पिछले कई वर्षों से शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही संस्था एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर) जारी करती रही है. इसकी नवीनतम रिपोर्ट जनवरी में जारी हुई है, जिसके अनुसार ग्रामीण भारत में 3 से 16 वर्ष के बच्चों का अपनी भाषा को पढ़ने और गणित के सवाल हल करने का स्तर बहुत खराब है. सन 2010 में लागू हुए शिक्षा के अधिकार से कुछ लाभ जरूर हुए हैं, मसलन स्कूलों की इमारतों, शौचालयों के निर्माण और पाठ्य पुस्तकों की उपलब्धता बेहतर हुई है, पर बुनियादी स्तर पर शिक्षा के स्तर में सुधार नहीं हुआ है.

ग्रामीण पृष्ठभूमि के युवा इस मामले में मार खाते हैं. लड़कियाँ और भी पीछे रह जाती हैं. पहले तो वे शिक्षा से वंचित रहती हैं, फिर उन्हें रोजगार नहीं मिलता. लड़के तो रोजगार के लिए बाहर निकल भी जाते हैं. जरूरत इस बात की है कि चुनाव के दौरान इन मसलों को जोरदार तरीके से उठाया जाए और समाधानों पर बात की जाए. ये सवाल किसी खास जाति, सम्प्रदाय और क्षेत्रीय वर्ग से नहीं जुड़े हैं. युवा मन अपेक्षाकृत आदर्शवादी होता है और वह संकीर्णता के दायरे से बाहर निकल कर सोचता है. पर क्या हमारी राजनीति इस दायरे को तोड़कर बाहर आएगी?

आँकड़े बताते हैं कि सन 2000 में उच्च शिक्षा पर राष्ट्रीय व्यय जीडीपी का 0.73 फीसदी था, जो 2015 में 0.62 फीसदी रह गया. हाल के वर्षों में केन्द्र सरकार ने कौशल विकास और छोटे उद्यमों के लिए मुद्रा योजना जैसे कार्यक्रम शुरू किए हैं. रोजगार को लेकर हमारी परम्परागत समझ नौकरियों से जुड़ी है, पर अमेरिकी समाज की उद्यमिता पर नजर डालें, तो पता लगेगा कि व्यक्ति को अपने कौशल का विकास का मौका दिया जाए, तो वह बेहतर परिणाम दे सकता है. राजनीतिक दलों पर इस बात की जिम्मेदारी है कि वे इन नए वोटरों के सामने समाधान पेश करें.

हमारी राजनीति का परम्परागत आधार ग्रामीण है. भले ही उसमें मौजूद सारे नेताओं ने अपनी हवेलियाँ शहरों में बनवा ली हैं, पर उनके मुहावरे और बोली ग्रामीण है. उनकी संतानें पूरी तरह शहरी हैं. जो शहर नहीं जा पाए हैं, वे चाहते हैं कि उनके बच्चे शहर जाएं. ये बच्चे गाँव और शहर की वास्तविकता को समझते हैं. यही बच्चे आने वाले वक्त की राजनीति को रास्ता दिखाएंगे.

शहरी मध्य वर्ग को तैयार करने में शिक्षा की सबसे बड़ी भूमिका है. पिछले दो दशकों में नए इंजीनियरिंग, मेडिकल और मैनेजमेंट कॉलेजों ने बड़ी संख्या में नौजवानों को तैयार किया है. इनमें से काफी बड़ी संख्या में छात्र ग्रामीण पृष्ठभूमि से गए. इनसे भी ज्यादा बड़ी संख्या में छात्र तैयार हो रहे हैं. इन नए नागरिकों की प्राथमिकता में ग्रामीण भारत भी होना चाहिए. दूसरी तरफ मोबाइल फोनों और इंटरनेट से लैस नए भारत की नौजवान पीढ़ी जिस रूप में भी राजनीति में शामिल हो रही है, वह शुभ लक्षण है. व्यवस्था के बारे में जानकारी उसके पास है. समस्याओं के समाधान का रास्ता भी उसे मालूम है. यही पीढ़ी भारत को दुनिया के शिखर पर लाएगी.

3 comments:

  1. और नेता जी ऊँचाइयों की ओर ले चलेंगे।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (16-03-2019) को "रिश्वत के दूत" (चर्चा अंक-3276) पर भी होगी।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व नींद दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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