Saturday, April 1, 2017

किसके पास है ‘नए भारत’ के सपने का कॉपीराइट?

इसे 'आइडिया ऑफ इंडिया' कहते हैं। अपने अतीत और वर्तमान के आधार पर हम अपने समाज की दशा-दिशा के बारे में सोचते हैैं। कुछ को इसमें राष्ट्रवाद दिखाई पड़ता है और कुछ को अंतरराष्ट्रीयतावाद। पर सपने पूरा समाज देखता है, तभी वे पूरे होते हैं। नेता उन सपनों के सूत्रधार बनते हैं। आधुनिक भारत का सपना आजादी के आंदोलन के दौरान इस देश ने देखना शुरू कर दिया था। क्योंकि आजादी एक सपना थी। पिछले महीने इंडिया टुडे कॉनक्लेव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, आजादी के आंदोलन के कालखंड में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं पर राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं भारी पड़ती थीं। उनकी तीव्रता इतनी थी कि वह देश को सैकड़ों सालों की गुलामी से बाहर निकाल लाई। पर अब समय की मांग है-आजादी के आंदोलन की तरह विकास का आंदोलन- जो व्यक्तिगत आकांक्षाओं का सामूहिक आकांक्षाओं में विस्तार करे और देश का सर्वांगीण विकास हो।

नया भारत केवल एक नेता का सपना नहीं हो सकता। पर सपनों को साकार करने के लिए एक नेता का इंतजार होता है। वैसे ही जैसे बीसवीं सदी के दूसरे दशक में भारत को गांधी का इंतजार था। देश के रूपांतरण के लिए तेज बदलाव की जरूरत है, पर उसमें निरंतरता भी चाहिए। नए भारत का सपना, हमारा अपना है। इसमें गांधी, नेहरू, पटेल से लेकर वाजपेयी और मोदी तक की दृष्टि शामिल है। हजारों, लाखों भारतीय अर्थशास्त्रियों, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, लेखकों और मनीषियों का योगदान भी इसमें है।
नेहरू का सपना
जवाहर लाल नेहरू को भारत की बुनियादी अवसंरचना को तैयार करने का श्रेय जाता है। उनकी विरासत के रूप में कम से कम चार बातें आज भी सार्थक हैं। 1.मिश्रित अर्थ-व्यवस्था, 2.योजना यानी ‘दृष्टि’, 3.विदेश नीति और 4.कौशल या ज्ञान। इसके साथ-साथ बहु-जातीय, बहुधर्मी धर्म-निरपेक्ष भारत की परिकल्पना में भी उनका योगदान है। सबसे बड़ा योगदान है लोकतांत्रिक आजादी कायम करने का।
इंदिरा गांधी ने भारतीय राष्ट्र-राज्य को लोहे के दस्ताने पहनाए। वह बिजली थी जो शोला बनकर आसमान में चमकने लगी थी। सन 1962 की पराजय से आहत देश को सन 1971 में विजय का तोहफा दिया। राष्ट्रीय शक्ति और देश के एकीकरण का काफी श्रेय उन्हें जाता है। राजीव गांधी ने इक्कीसवीं सदी का सपना दिया। उनका आगमन दुर्घटनावश हुआ और निधन भी, पर इस दौरान वे नए भारत का सपना सौंपकर गए।
पीवी नरसिंह राव ने ऐसे दौर में सत्ता संभाली जब देश आजादी के बाद सबसे बड़ा संशय में था। एक तरफ मंदिर-मस्जिद का झगड़ा था और दूसरी तरफ देश का सोना गिरवी रखा जा रहा था। ऐसे वक्त में एक अल्पसंख्यक सरकार की बागडोर संभालते हुए वे अर्थ-व्यवस्था में बुनियादी बदलाव करने में सफल हुए। इक्कीसवीं सदी यदि भारत की है, तो इसके पीछे बीसवीं सदी के आखिरी दशक पीवी नरसिंहराव का बड़ा योगदान है। संशय के पथरीले रास्ते को पार करने के बाद नई राहें खोजने का काम अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने शुरू किया। यह निरंतरता मनमोहन सिंह सरकार ने जारी रखी। देखें तो आपको निरंतरता दिखाई पड़ेगी।
इक्कीसवीं सदी का भारत
भारत अब दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थ-व्यवस्था बनने के कगार पर है। बावजूद इसके सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, भोजन और पानी जैसे मामलों में हम दुनिया के तमाम पिछड़े देशों से भी पीछे हैं। इन मानकों पर तेजी से आगे बढ़ने के लिए भी आर्थिक विकास की गति तेज करनी होगी। यह एक नया सपना है। पर इस गति का नेतृत्व करने वाली राजनीति जबर्दस्त अंतर्विरोधों की शिकार है। इसके तोड़ को खोजने की जरूरत भी है। यह भी एक सपना है।
मोदी का कहना है कि दशकों तक हम गलत नीतियों के साथ गलत दिशा में चले। फिर गलती समझ में आई। उसे सुधारने का प्रयास हुआ और उसे ही रिफॉर्म मान लिया गया। ज्यादातर समय देश ने या तो एक ही तरह की सरकार देखी या फिर मिली-जुली। उसके कारण देश की यही समझ बनी। हमें स्वीकार करना होगा कि 200 साल में तकनीक जितनी बदली, उससे ज्यादा पिछले 20 साल में बदली है। यह स्वीकार करना होगा कि 30 वर्ष पहले के युवा और आज के युवा की आकांक्षाओं में बहुत अंतर है। मानना होगा दो ध्रुवीय दुनिया और इंटर-डिपेंडेंट दुनिया के समीकरण बदल चुके हैं।
मेरा नेता, तेरा नेता
महापुरुषों को ईश्वरत्व प्रदान करना हमारे समाज की विशेषता है। यह अच्छी बात है, क्योंकि उसके पीछे समाज एकजुट होता है, पर यह घातक भी है। किसी एक दृष्टि से बँधकर चलना समय के साथ मेल नहीं खाता। नवम्बर 2015 में संसद के शीत सत्र के पहले दो दिन की विशेष चर्चा संविधान दिवस के संदर्भ में हुई। डॉ भीमराव आम्बेडकर की स्मृति में हुई इस विशेष चर्चा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संविधान की सर्वोच्चता और भारतीय समाज की बहुलता का उल्लेख किया।
इस वक्तव्य में उन्होंने जवाहर लाल नेहरू का नाम भी लिया। क्या यह इसलिए था कि वे जीएसटी पर कांग्रेस का समर्थन चाहते थे? या इसलिए कि वे नेहरू के योगदान को अस्वीकार नहीं करते? केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद से कुछ बुनियादी सवालों पर बहस फिर से चल निकली है। राजनीतिक मंचों पर भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस मुक्त भारत की बात कर रही है। उसका निशाना नेहरू गांधी परिवार है। क्या राष्ट्र-निर्माता के परिवार को तबाही का कारण मान लें? परिवार पर अतिशय जोर नेताओं के कृतित्व पर पानी भी फेरता है।
नए भारत की नई राजनीति
हाल में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा की जोरदार जीत के एक दिन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया, ‘एक नया भारत उभर रहा है, जिसके पास 125 करोड़ भारतीयों की ताकत और क्षमता है। यह भारत विकास का पक्षधर है। मोदी ने आगे लिखा, वर्ष 2022 में जब हम आजादी के 75 वर्ष पूरे करेंगे तब तक हमें ऐसा भारत बना लेना चाहिए जिस पर गांधी जी, सरदार पटेल और बाबा साहेब आंबेडकर को गर्व हो। यहाँ नेहरू का नाम नहीं था। इसमें विस्मय की बात भी नहीं है। यह ट्वीट चुनाव की विजय से जुड़ा था। और इसमें नए भारत से ज्यादा नई राजनीति के उदय पर जोर था।
हाल में मोदी ने अपने 30वें  मन की बात कार्यक्रम में नए भारत की रूपरेखा पर रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि देश के 125 करोड़ नागरिक भव्य और दिव्य भारत का निर्माण करेंगे। पर इसके पहले इंडिया टुडे कॉनक्लेव में उन्होंने काफी विस्तार से अपनी बातों को कहा। भारत दुनिया की तेजी से विकसित होती अर्थ-व्यवस्थाओं में से एक है। वैश्विक निवेश रिपोर्ट में भारत को दुनिया की टॉप तीन सम्भावित अर्थ-व्यवस्थाओं में शामिल किया गया है।
नेहरूवाद से छुटकारा
नेता को स्थापित किया जाता है और इसमें समय लगता है। कांग्रेस ने भी नेहरू को स्थापित किया था। सन 2015 में जब सरकार ने योजना आयोग की जगह ‘नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया’ (राष्ट्रीय  भारत परिवर्तन संस्थान) यानी ‘नीति’ आयोग बनाया तब कुछ लोगों ने इसे छह दशक से चले आ रहे नेहरूवादी समाजवाद की समाप्ति के रूप में लिया। पर वह राजनीतिक प्रतिशोध नहीं था, बल्कि भारतीय रूपांतरण के नए फॉर्मूले की खोज थी। वह एक संस्था की समाप्ति जरूर थी, पर योजना की जरूरत खत्म नहीं हुई थी।
नेहरू का हो या मोदी का ‘विज़न’ या दृष्टि की जरूरत हमें तब भी थी और आज भी है। आर्थिक दृष्टि से सन 1991 में भारत ने जो रास्ता पकड़ा वह नेहरू के रास्ते से अलग था। बावजूद इसके कि पीवी नरसिंहराव और मनमोहन सिंह दोनों नेहरू की विरासत वाली पार्टी के नेता थे। और यह बदलाव इंदिरा गांधी के दौर में ही शुरू हो गया था। इसके कारणों को समझने की जरूरत है।
नेहरू ऐसे दौर में प्रधानमंत्री रहे, जब देश परिभाषित हो रहा था। उनका ज़ोर औद्योगीकरण पर था। उन्हें मालूम था कि देश में निजी पूँजी का विकास नहीं हो पाया है। इसलिए सार्वजनिक उद्यमों की हमें जरूरत थी। नेहरू-महालनबीस रणनीति प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने पर केंद्रित थी। उन्हें जो अर्थ-व्यवस्था विरासत में मिली उसकी संवृद्धि शून्य के आसपास थी। नेहरूवादी व्यवस्था ने देश को 4 फीसदी के आसपास की गति दी जो वैश्विक औसत के आसपास थी। इस लिहाज से यह गति चीन जैसे देश बेहतर थी, जिसने अपनी विकास यात्रा हमारी आजादी के दो साल बाद शुरू की थी।
भारत और चीन
दोनों देशों की यात्राएं समांतर चलीं, पर बुनियादी मानव-विकास में चीन ने हमें पीछे छोड़ दिया। बावजूद इसके कि हमारी गति बेहतर थी। नेहरू के नेतृत्व ने मध्यवर्ग को तैयार करने पर जोर दिया, जबकि चीन ने बुनियादी विकास पर। आज भारत सॉफ्टवेयर, फार्मास्युटिकल्स या चिकित्सा के क्षेत्र में आगे है तो इसके पीछे आजादी के पहले दो दशकों की नीतियाँ हैं।
नेहरू ने प्राथमिक शिक्षा की उपेक्षा की। सन 2011 में नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एजुकेशनल प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन से डॉक्टरेट की मानद उपाधि ग्रहण करते हुए अमर्त्य सेन ने कहा, भारत समय से प्राथमिक शिक्षा पर निवेश न कर पाने की कीमत आज अदा कर रहा है। नेहरू ने तकनीकी शिक्षा के महत्व को पहचाना जिसके कारण आईआईटी जैसे शिक्षा संस्थान खड़े हुए। पर प्राइमरी शिक्षा के प्रति उनका दृष्टिकोण ‘निराशाजनक’ रहा।
नेहरू को देश के एकीकरण का श्रेय जाता है। भारत जैसे बिखरे राष्ट्र राज्य को एक धागे से बाँधना आसान काम नहीं था। राज्य पुनर्गठन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी, जिसे उन्होंने निभाया। नेहरू का जोर आर्थिक पुनर्गठन पर था। आलोचक मानते हैं कि यदि उनका समाजवाद पर अतिशय जोर नहीं होता और निजी क्षेत्र को बढ़ने का मौका दिया गया होता तो आज स्थितियाँ बेहतर होतीं। उन्होंने राजनीतिक स्वतंत्रता पर जितना जोर दिया उतना आर्थिक स्वतंत्रता पर नहीं दिया।

किसी भी नेता का या उसके विचार का मूल्यांकन उसके दौर में इतना अच्छा नहीं होता, जितना परवर्ती वर्षों में होता है। नए की परिकल्पना हमेशा रहती है, पर युगांतरकारी मोड़ कभी-कभी आते हैं। भारत आज एक महत्त्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। इस वक्त उसे ताकतवर नेता की जरूरत है। नेता बनने की इच्छाएं तमाम होती हैं, पर इतिहास उसे नेता बनाता है, जो भविष्य देखता है। पीछे मुड़कर देखें तो आप ऐसा ही पाएंगे।  

2 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन और केदारनाथ अग्रवाल में शामिल किया गया है।कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  2. बहुत अच्छी विचार प्रस्तुति

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