Sunday, June 11, 2023

कृत्रिम मेधा के खतरे और वरदान


पिछले हफ्ते तमाम बड़ी खबरों के बीच तकनीक और विज्ञान से जुड़ी एक खबर को उतना महत्व नहीं मिला, जितने की वह हकदार थी। ओपनएआई के सीईओ सैम अल्टमैन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की, जिसके बाद प्रधानमंत्री ने ट्वीट किया: अंतर्दृष्टिपूर्ण बातचीत के लिए सैम अल्टमैन को धन्यवाद…हम उन सभी सहयोगों का स्वागत करते हैं, जो नागरिकों को सशक्त बनाने के लिए हमारे डिजिटल बदलाव को गति दे सकते हैं। यह मुलाकात भले ही बड़ी खबर नहीं बनी हो, पर आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस यानी एआई इन दिनों तकनीकी-विमर्श के शिखर पर है। मई के महीने में जापान में हुई जी-7 की बैठक में आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस पर विचार भी एजेंडा में शामिल था। उन्हीं दिनों जब ओपनएआई ने आईओएस के लिए चैटजीपीटी ऍप लॉन्च किया, तब से इसका ज़िक्र काफी हो रहा है। चैटजीपीटी ओपन एआई द्वारा विकसित नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग मॉडल है। इसके बारे में विवरण पहली बार 2018 में एक शोधपत्र  में प्रकाशित किया गया था। इसे आप गूगल की तरह का एक टूल मान सकते हैं, जो आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस की मदद से प्रश्नों के जवाब देता है। महत्वपूर्ण चैटजीपीटी या ओपनएआई नहीं, आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस है, जिसे मनुष्य-जाति के लिए तकनीकी वरदान माना जा रहा है, वहीं इसे खतरा भी माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि यह तकनीक अंततः मनुष्य-जाति के अस्तित्व के लिए खतरे पैदा कर सकती है। 

ओपनएआई

आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (एआई) से जुड़ी रिसर्च लैबोरेटरी ओपनएआई आईएनसी, नॉन-प्रॉफिट संस्था है, जिससे जुड़ी ओपनएआई एलपी लाभकारी संस्था है। इसकी स्थापना 2015 में सैम अल्टमैन, एलन मस्क और कुछ अन्य व्यक्तियों ने सैन फ्रांसिस्को में की थी। फरवरी, 2018 में मस्क ने इसके बोर्ड से इस्तीफा दे दिया था, पर वे डोनर के रूप में इसके साथ बने रहे। इसके बाद माइक्रोसॉफ्ट और मैथ्यू ब्राउन कंपनी ने इसमें निवेश किया। इस साल माइक्रोसॉफ्ट ने इसमें 10 अरब डॉलर का एक और निवेश किया है। आईआईटी दिल्ली में डिजिटल इंडिया डायलॉग्स कार्यक्रम में, अल्टमैन ने खुलासा किया कि प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनकी मुलाकात मजेदार रही। पीएम मोदी आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर उत्साहित हैं। अल्टमैन ने कहा कि उन्होंने उभरती प्रौद्योगिकी के डाउनसाइड्स, यानी खतरों पर भी चर्चा की।

खतरा कैसा खतरा?

यह अंदेशा कंप्यूटर-युग की शुरुआत में ही व्यक्त किया गया था कि जब मशीनें मनुष्य का स्थान लेने लगेंगी, तब उसका विस्तार एक दिन इंसान के अंत के रूप में भी हो सकता है। अब विशेषज्ञ खुलकर कह रहे हैं कि आर्टिफ़ीशियल इंटेलिजेंस से इंसानी वजूद को ख़तरा हो सकता है। उसका हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। मसलन ड्रग डिस्कवरी टूल्स की मदद से रासायनिक हथियार बनाए जा सकते हैं। फ़ेक जानकारियाँ अस्थिरता पैदा करेंगी। साथ ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित होगी। एआई की ताक़त थोड़े से हाथों में सिमटने का खतरा भी है।  सरकारें बड़े पैमाने पर लोगों की निगरानी करने और दमनकारी सेंसरशिप के लिए इस्तेमाल करेंगी। मनुष्य एआई पर निर्भर होकर जबर्दस्त आलसी बन जाएंगे और मशीनें अमर होने के तरीके खोज लेंगी, जैसा पिक्सेल फ़िल्म वॉल ई जैसी फिल्मों में दिखाया गया है। दूसरी तरफ एआई वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि ऐसे सर्वनाश की परिकल्पना भी कुछ ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर बताई जा रही है।

Friday, June 9, 2023

संस्कृति और अपनी ज़मीन से जुड़े भारतीय मुसलमान

कुछ प्रसिद्ध मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानी

नवंबर 2003 की बात है. अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश जूनियर ने लोकतंत्र से जुड़े एक कार्यक्रम में कहा कि भारत ने लोकतंत्र और बहुधर्मी-समाज के निर्माण की दिशा में अद्भुत काम किया है. उन्होंने कहा कि भारतीय मुसलमानों ने साबित किया है कि इस्लाम का लोकतंत्र के साथ समन्वय संभव है.

जॉर्ज बुश ने एक जगह इस बात का जिक्र भी किया है कि अल-कायदा के नेटवर्क में भारतीय मुसलमान नहीं हैं. हालांकि बाबरी मस्जिद और गुजरात के प्रकरण के बाद भारतीय मुसलमानों को भड़काने के प्रयास किए गए, पर उन्हें सफलता नहीं मिली.

उसके भी पहले अस्सी के दशक में अफगानिस्तान में सोवियत सेना के खिलाफ लड़ने वाले 'मुजाहिदीन' के बीच भारत के मुसलमान या तो थे ही नहीं और थे भी, तो बहुत कम संख्या में थे. आज तो स्थिति और भी बदली हुई है. भारतीय-संस्कृति और लोकतंत्र में मुसलमानों की भूमिका अपने आप में विषद विषय है.  इस छोटे से संदर्भ में भी उनकी भूमिका पर नज़र डालें, तो रोचक बातें सामने आती हैं.  

वैश्विक लड़ाई से दूर

भारत में मुसलमानों की आबादी इंडोनेशिया और पाकिस्तान की आबादियों के करीब-करीब बराबर है. पश्चिम एशिया के देशों के नागरिक जितनी बड़ी संख्या में विदेशी-युद्धों में लड़ते दिखाई पड़ते हैं, उनकी तुलना में भारतीयों की संख्या नगण्य है. उन छोटे देशों की कुल आबादी की तुलना में उनके लड़ाकों का प्रतिशत देखा जाए तो वह बहुत ज्यादा होगा.

भारतीय मुसलमान ने वैश्विक-आतंकवाद को नकारा है. इसकी वजह भारतीय समाज और संस्कृति में खोजी जा सकते हैं. हमें इस बात को हमेशा ध्यान में रखना होगा कि जिस भारत का विभाजन इस्लाम के आधार पर हुआ, उसमें आज भी तकरीबन उतने ही मुसलमान नागरिक हैं, जितने पाकिस्तान में हैं. उन्होंने भारत में ही रहना चाहा, तो उसका कोई कारण जरूर था.

उनकी देशभक्ति को लेकर किसी प्रमाण की जरूरत ही नहीं है. काउंटर-टेरर रणनीति बनाने वालों को इस फैक्टर पर गहराई से विचार करना चाहिए कि कौन से सांस्कृतिक-भावनात्मक और मानसिक कारण भारतीय मुसलमानों को अपनी ज़मीन से जोड़कर रखते हैं.

अतिवादी तत्व

यह भी नहीं कह सकते कि उनके बीच चरमपंथी नहीं हैं. उनके बीच अतिवादी तत्व भी हैं, पर सीमित संख्या में हैं. महत्वपूर्ण बात यह है कि जब वैश्विक-स्तर पर काफी बड़ी आबादी टकराव के रास्ते पर है, भारतीय मुसलमान उससे अपेक्षाकृत दूर हैं. हमारे जीवन में दोनों तरफ से जहरीली बातें भी हैं. उनकी प्रतिक्रिया भी होती है, पर देश की न्यायपालिका और जिम्मेदार नागरिक इस बदमज़गी को बढ़ने से रोकते हैं.  

Wednesday, June 7, 2023

इमरान बनाम सेना बनाम पाकिस्तानी लोकतंत्र


पाकिस्तानी राजनीति में इमरान खान का जितनी तेजी से उभार हुआ था, अब उतनी ही तेजी से पराभव होता दिखाई पड़ रहा है. उनकी पार्टी के वफादार सहयोगी एक-एक करके साथ छोड़ रहे हैं. कयास हैं कि उन्हें जेल में डाला जाएगा, देश-निकाला हो सकता है, उनकी पार्टी को बैन किया जा सकता है वगैरह.

पाकिस्तान में कुछ भी हो सकता है. ऊपर जो बातें गिनाई हैं, ऐसा अतीत में कई बार हो चुका है. पहले भी सेना ने ऐसा किया था और इस वक्त इमरान के खिलाफ कार्रवाई भी सेना ही कर रही है. परीक्षा पाकिस्तानी नागरिकों की है. क्या वे यह सब अब भी होने देंगे?

कुल मिलाकर यह लोकतंत्र की पराजय है. इमरान खान ने सेना का सहारा लेकर प्रतिस्पर्धी राजनीतिक दलों को पीटा, अब वे खुद उसी लाठी से मार खा रहे हैं. पर उन्होंने अपनी इस गलती को कभी नहीं माना. 

ब्रिटिश पत्रिका इकोनॉमिस्ट ने लिखा है कि इमरान को पिछले साल अपदस्थ करने के बजाय, लँगड़ाते हुए ही चलने दिया जाता, तो अगले चुनाव में जनता उसे रद्द कर देती. लोकतंत्र में खराब सरकारों को जनता खारिज करती है. इसकी नज़ीर बनती है और आने वाले वक्त की सरकारें डरती हैं.

सेना का हस्तक्षेप

जनरलों ने किसी भी सरकार को पूरे पाँच साल काम करने नहीं दिया. पिछले साल इमरान को हटाने के पीछे भी जनरल ही थे, जिन्होंने एक विफल राजनेता को सफल बनने का मौका दिया. इमरान ने साजिशों की कहानियाँ गढ़ लीं, और उनके समर्थकों की तादाद बढ़ती चली गई.

Tuesday, June 6, 2023

भारत-जर्मनी के बीच एआईपी युक्त छह पनडुब्बियाँ बनाने का करार होगा

 


भारत दौरे पर आए जर्मनी के रक्षामंत्री  बोरिस पिस्टोरियस ने मंगलवार को भारतीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के साथ वार्ता की. खबरों के मुताबिक, भारत और जर्मनी के बीच छह पनडुब्बियों के निर्माण का समझौता होने जा रहा है। इस करार का मतलब है कि लंबे अर्से से रुका पड़ा प्रोजेक्ट 75(आई) अब तेजी पकड़ेगा।

राजनाथ सिंह ने जर्मनी के रक्षामंत्री  बोरिस पिस्टोरियस से व्यापक चर्चा की और द्विपक्षीय रक्षा व सामरिक संबंध मजबूत करने के तरीकों पर ध्यान दिया।  पिस्टोरियस भारत के चार दिवसीय दौरे पर हैं। मंगलवार की बैठक के बाद मीडिया रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि भारत और जर्मनी, भारत में पनडुब्बी बनाने पर समझौते के करीब आ गए हैं। ये पनडुब्बियां भारतीय नौसेना के लिए बनाई जानी हैं।

Monday, June 5, 2023

विरोधी-एकता के असमंजस


आगामी 12 जून को पटना में प्रस्तावित विरोधी दलों की एकता-बैठक एक बार फिर से स्थगित हो गई है। हालांकि इसकी अगली तारीख तय नहीं है, पर संभावना है कि अब यह बैठक 23 जून को हो सकती है। इसका स्थान भी पटना के बजाय कहीं और हो सकता है। इसे शिमला में भी किया जा सकता है। कांग्रेस पहले से 23 जून की बात कह रही थी, पर जेडीयू ने 12 जून की घोषणा कर दी थी।

विरोधी-एकता की एक परीक्षा संसद के मॉनसून सत्र में होगी, जब दिल्ली की प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े अध्यादेश का स्थान लेने वाला विधेयक पेश किया जाएगा। बहरहाल 12 जून की बैठक में शामिल होने के लिए 16 पार्टियों ने सहमति दी थी, जिनमें आम आदमी पार्टी भी शामिल है। इस बैठक को लेकर नीतीश कुमार के अलावा अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे, शरद पवार इसे लेकर काफी उत्साहित हैं।

हिंदी बेल्ट

ममता बनर्जी ने एक वीडियो जारी करके पटना आने और बैठक में शामिल होने का बयान भी दिया है। ममता बनर्जी ने कहा कि पटना में होने वाली विपक्ष की एकता की बैठक से हिंदी बेल्ट में बेहतर असर होगा। हालांकि ममता ने इस बात को खुलकर नहीं कहा है, पर जो बातें सामने आ रही हैं, उनसे संकेत मिलता है कि उन्होंने ही नीतीश कुमार को सलाह दी थी कि आप अपनी तरफ से पहल करें। 12 जून की बैठक उसी पहल का परिणाम थी। ममता बनर्जी सत्तर के दशक में जय प्रकाश नारायण की पहल का इस सिलसिले में उदाहरण देती हैं।

Sunday, June 4, 2023

पूर्वोत्तर की चुनौती: मणिपुर-हिंसा


मणिपुर में एक महीने से चल रही हिंसा की गंभीरता को इस बात से समझा जा सकता है कि गृहमंत्री अमित शाह को खुद वहाँ जाकर स्थिति पर नियंत्रण करने के निर्देश देने पड़े। उन्होंने अलग
-अलग जनजातियों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से बातचीत की है, पर दीर्घकालीन समाधान एक-दो दिनों में नहीं आते। उसके लिए पहले माहौल को बनाना होगा। यह हिंसा देश की बहुजातीय पहचान और सांस्कृतिक-बहुलता के लिए खतरनाक है। इसका राजनीतिक इस्तेमाल और भी खतरनाक है। राज्य के पाँच जिलों में जितनी तेजी से बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ, लोगों की जान गई, घरों, चर्चों, मंदिरों में तोड़फोड़ और आगजनी हुई, वह राज्य में लंबे अर्से से चली आ रही पहाड़ी और घाटी की पहचान के विभाजन का नतीजा है। प्रशासनिक समझदारी से उसे टाला जा सकता था।

पक्षपात का आरोप

इस वक्त सबसे ज्यादा सवाल राज्य सरकार की भूमिका को लेकर उठाए जा रहे हैं। अमित शाह ने विभिन्न वर्गों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के दौरान कहा कि राज्य में शांति बहाल करना सरकार की सबसे पहली प्राथमिकता है। मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह का दावा है कि स्थिति को नियंत्रण में कर लिया गया है और 20 हज़ार के क़रीब लोगों को हिंसाग्रस्त इलाकों से निकालकर शिविरों में पहुंचा दिया गया है। राज्य सरकार ने तत्परता और समझदारी से काम किया होता तो यह धारणा जन्म नहीं लेती कि वह एक खास समुदाय की हिमायती है। ‘ड्रग्स के खिलाफ युद्ध’ से प्रेरित होकर सरकार ने अति उत्साह में अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया, जिसमें कुकी समुदाय के गाँव प्रभावित हुए थे। भाजपा के कुछ आदिवासी विधायकों ने इस पक्षपात का मुद्दा उठाया था और नेतृत्व में बदलाव की मांग भी की थी।

अतिक्रमण-विरोधी अभियान

मणिपुर सरकार ने फ़रवरी में संरक्षित इलाक़ों से अतिक्रमण हटाना शुरू किया था, तभी से तनाव था। लोग सरकार के इस रुख़ का विरोध कर रहे थे, लेकिन मणिपुर हाईकोर्ट के एक आदेश के बाद 3 मई से स्थिति बेकाबू हो गई, जब ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ मणिपुर (एटीएसयूएम) ने 3 मई को जनजातीय एकता मार्च निकाला। इस मार्च के दौरान कई जगह हिंसा हुई। यह मार्च मैती समुदाय को जनजाति का दर्जा दिए जाने के प्रयास के विरुद्ध हुआ था। हाईकोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया था कि वह 10 साल पुरानी सिफ़ारिश को लागू करे, जिसमें ग़ैर-जनजाति मैती समुदाय को जनजाति में शामिल करने की बात कही गई थी। यह शिकायत, कि मैती समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने पर पहाड़ी आदिवासी समुदायों के आरक्षण लाभों को काम कर देगा, एक सीमा तक ठीक लगता है। पर उनकी यह चिंता सही नहीं है कि इससे पारंपरिक भूमि स्वामित्व बदल जाएगा। आदिवासी नेताओं ने घाटी विरोधी भावनाओं को भड़काने में जमीन खोने के दाँव का इस्तेमाल किया है।

Thursday, June 1, 2023

अमेरिकी ऋण-सीमा बढ़ेगी


अमेरिकी संसद की प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव ने सरकार की ऋण-सीमा बढ़ाने वाले विधेयक को स्पष्ट बहुमत से पारित कर दिया है. विधेयक के समर्थन में 314 और विरोध में 117 मत पड़े. दोनों ही पक्षों की तरफ़ से विरोध में मतदान हुआ है.

विधेयक के समर्थन में 165 डेमोक्रेट (राष्ट्रपति जो बाइडेन की पार्टी) और 149 रिपब्लिकन सदस्यों ने मतदान किया है. इससे अमेरिकी सरकार के क़र्ज़ संकट का समाधान हो सकता है और सरकार के डिफॉल्टर होने का ख़तरा टल सकता है. सरकार को डिफॉल्ट होने से बचाने के लिए अब सोमवार से पहले इस विधेयक को सीनेट में पारित कराना अनिवार्य होगा.

रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टियों के बीच इस समझौते के कारण व्यवस्था के बिखर जाने का खतरा टल जरूर गया है, पर देश का आर्थिक संकट बरकरार है. उधर रिपब्लिकन पार्टी को इस बात का संतोष है कि राष्ट्रपति जो बाइडन से उसने कुछ सरकारी खर्च कम करवा लिए हैं. अनुमान है कि अगले एक दशक में सरकारी खर्चों में 1.3 ट्रिलियन डॉलर की कटौती होगी. ये कटौतियाँ 2024 और 2025 से लागू होंगी.   

संसद की प्रतिनिधि सभा में रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत है. जबकि, सीनेट में डेमोक्रेटिक पार्टी का बहुमत है. ऐसे में इस बिल का प्रतिनिधि सभा में पास होना महत्वपूर्ण है. इस बिल को पारित कराने में दोनों पार्टियों के बीच समझौता कराने में अहम भूमिका निभाने वाले रिपब्लिकन पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेता केविन मैकार्थी ने इसे ऐतिहासिक कहा है.

वर्चुअली होगा एससीओ शिखर सम्मेलन

दूसरी बड़ी अंतरराष्ट्रीय खबर यह है कि जुलाई के महीने में भारत में होने वाला शंघाई सहयोग संगठन का शिखर सम्मेलन अब वर्चुअल होगा. केंद्र सरकार ने मंगलवार को एलान किया कि 4 जुलाई को दिल्ली में प्रस्तावित एससीओ की बैठक अब वर्चुअली आयोजित होगी. इस साल एससीओ की अध्यक्षता भारत के पास है, जिसकी वजह से ये बैठक दिल्ली में आयोजित होनी थी.

 

इस बैठक में शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों को हिस्सा लेना था. इनमें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, पाकिस्तानी पीएम शाहबाज़ शरीफ़ और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जैसे नेता शामिल होते.

केंद्र सरकार इस बैठक को आयोजित करने के लिए पिछले कई महीनों से तैयारी भी कर रही थी. इन नेताओं को भारत आने का न्यौता भी भेजा गया था. मंगलवार को सरकार ने एकाएक अपना फ़ैसला बदल दिया. दो-तीन बातें हवा में हैं. एक, दिल्ली में सम्मेलन की तैयारी पूरी नहीं है. दूसरे चीन, पाकिस्तान और रूस के राष्ट्राध्यक्षों ने अभी तक सम्मेलन में आने की पुष्टि नहीं की है. संभवतः रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन यूक्रेन-युद्ध के कारण आने की स्थिति में नहीं हैं.

 

उम्मीद से बेहतर जीडीपी संवृद्धि


देश की ​आर्थिक-वृद्धि दर विश्लेषकों के अनुमान को पीछे छोड़ते हुए वित्त वर्ष 2023 की चौथी तिमाही में 6.1 फीसदी रही। मैन्युफैक्चरिंग और निर्माण गतिविधियों में तेजी से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि ने चकित किया है। साथ ही यह कमजोर वै​श्विक परिदृश्य के बीच मजबूत घरेलू मांग को दर्शाता है। पिछले हफ्ते रॉयटर्स द्वारा 56 अर्थशास्त्रियों के बीच कराए गए सर्वेक्षण में वित्त वर्ष 2023 की चौथी तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 5 फीसदी रहने का अनुमान लगाया गया था।

चौथी तिमाही में उम्मीद से ज्यादा वृद्धि से पूरे वित्त वर्ष 2023 में जीडीपी वृद्धि दर पहले के 7 फीसदी के अनुमान को पार कर 7.2 फीसदी पहुंच गई। राष्ट्रीय सां​ख्यिकी कार्यालय ने पहले अंतरिम अनुमान में जीडीपी वृद्धि दर 7 फीसदी रहने का अनुमान लगाया था। बुनियादी मूल्य पर सकल मूल्य वर्धन (GVA) वित्त वर्ष 2023 की मार्च तिमाही में 6.5 फीसदी और पूरे वित्त वर्ष में 7 फीसदी बढ़ा है। हालांकि देश की अर्थव्यवस्था का आकार वित्त वर्ष 2023 में 272.4 लाख करोड़ रुपये रहा जो वित्त वर्ष 2024 के बजट से पूर्व जारी किए गए पहले अग्रिम अनुमान से 67,039 करोड़ रुपये कम है।

लगातार दो तिमाही में गिरावट झेलने के बाद जनवरी-मार्च 2023 तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र ने अच्छी वापसी की और कच्चे माल की लागत कम होने तथा मार्जिन में सुधार के साथ इस क्षेत्र के उत्पादन में 4.5 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की गई। ब्याज दरों में बढ़ोतरी और ऊंची खुदरा मुद्रास्फीति के बावजूद श्रम प्रधान निर्माण क्षेत्र में भी मार्च तिमाही के दौरान 10.4 फीसदी की तेजी देखी गई।

बेमौसम बारिश के बावजूद जनवरी-मार्च 2023 तिमाही में कृषि क्षेत्र का उत्पादन 5.5 फीसदी बढ़ा है जबकि व्यापार, होटल और परिवहन के बेहतर प्रदर्शन के दम पर सेवा क्षेत्र में 6.9 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। यहाँ पढ़ें बिजनेस स्टैंडर्ड में असित रंजन मिश्र का विश्लेषण और अखबार का संपादकीय

 आर्टिफ़ीशियल इंटेलिजेंस से मानव सभ्यता के अंत का ख़तरा

'आर्टिफ़ीशियल इंटेलिजेंस से इंसानी वजूद को ख़तरा हो सकता है.कई विशेषज्ञों ने इसे लेकर आगाह किया है. ऐसी चेतावनी देने वालों में ओपनएआई और गूगल डीपमाइंड के प्रमुख शामिल हैं.इसे लेकर जारी बयान 'सेंटर फ़ॉर एआई सेफ़्टी' के वेबपेज़ पर छपा है. कई विशेषज्ञों ने इस बयान के साथ अपनी सहमति जाहिर की है. विशेषज्ञों ने चेतावनी देते हुए कहा है, "समाज को प्रभावित कर सकने वाले दूसरे ख़तरों, मसलन महामारी और परमाणु युद्ध के साथ-साथ एआई (आर्टिफ़ीशियल इंटेलिजेंस) की वजह से वजूद पर मौजूद ख़तरे को कम करना वैश्विक प्राथमिकता होनी चाहिए." बीबीसी हिंदी की रिपोर्ट पढ़ें यहाँ

 राहुल गांधी ने मोदी पर साधा निशाना, खालिस्तानियों को भी जवाब

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी और आरएसएस को निशाना बनाया है. अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में भारतीय मूल के लोगों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में लोगों को एक ग्रुप ऐसा है, जिसे लगता है कि वे हर चीज़ जानते हैं. राहुल गांधी 10 दिनों की अमेरिका यात्रा पर हैं. सैन फ्रांसिस्को के बाद वे वॉशिंगटन डीसी और फिर न्यूयॉर्क जाएँगे. संबोधन के दौरान सिख्स फ़ॉर जस्टिस (एसजेएफ़) से जुड़े कुछ लोगों ने खालिस्तान के समर्थन में नारेबाज़ी की और खालिस्तान का झंडा भी दिखाया. इंदिरा गांधी को लेकर भी नारेबाज़ी की गई. एसजेएफ़ का कहना है कि वे राहुल गांधी की हर सभा में जाएँगे और जब पीएम मोदी अमेरिका आएँगे, तब भी ऐसा ही करेंगे. बीबीसी हिंदी की रिपोर्ट पढ़ें यहाँ

 

Wednesday, May 31, 2023

‘राष्ट्रीय-अस्मिता’ ने एर्दोगान को फिर से राष्ट्रपति बनाया

तुर्की की सुप्रीम इलेक्शन कौंसिल ने इस बात की पुष्टि की है कि रजब तैयब एर्दोगान ने राष्ट्रपति पद के चुनाव में कामयाबी हासिल कर ली है. वे एकबार फिर से तुर्की के सदर मुंतख़ब हो गए हैं. इस साल तुर्की अपने लोकतांत्रिक इतिहास की 100वीं वर्षगाँठ मना रहा है. इनमें एर्दोगान के नेतृत्व के 21 साल शामिल हैं.

हालांकि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक परिणाम पूरी तरह आए नहीं हैं, पर उन्हें 52 फीसदी से ज्यादा वोट मिल चुके हैं और उनके प्रतिस्पर्धी कमाल किलिचदारोलू को 47 फ़ीसदी से कुछ ज्यादा वोट मिले हैं.

करीब-करीब सभी बैलट बॉक्स खुल चुके हैं और अब परिणाम में बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं बची है. बाकी सभी वोट भी यदि किलिचदारोलू के खाते में चले जाएं, तब भी परिणाम पर फर्क नहीं पड़ेगा.

चुनाव-परिणाम आने के बाद एर्दोगान ने कहा कि यह तुर्की की जीत है. वे अभी चुनाव की मुद्रा में ही हैं, क्योंकि अब वे आगामी मार्च में होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों की तैयारी में जुट जाएंगे.

विरोधी परास्त

एर्दोगान की विजय के साथ पश्चिमी देशों में लगाई जा रही अटकलें ध्वस्त हो गई हैं कि तुर्की की व्यवस्था में बदलाव होगा, बल्कि एर्दोगान अब ज्यादा ताकत के साथ अगले पाँच या उससे भी ज्यादा वर्षों तक अपने एजेंडा को पूरा करने की स्थिति में होंगे.

एर्दोगान की पार्टी का नाम एकेपी (जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी) है. उनके मुकाबले छह विरोधी दलों ने संयुक्त रूप से चुनाव लड़ने का फैसला किया था और पीपुल्स रिपब्लिकन पार्टी (सीएचपी) के कमाल किलिचदारोलू को अपना प्रत्याशी बनाया था, जिन्हें कुर्द-पार्टी एचडीपी का भी समर्थन हासिल था.

Sunday, May 28, 2023

संसद माने क्या, लोकतंत्र का मंदिर या राजनीति का अखाड़ा?


भविष्य के इतिहासकार इस बात का विश्लेषण करते रहेंगे कि संसद-भवन का उद्घाटन राजनीति का शिकार क्यों हुआ। शायद राजनीति में अब आमराय का समय नहीं रहा। पर संसद केवल राजनीति नहीं है। यह देश का सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक अभिलेखागार है। यह विवाद ही दुर्भाग्यपूर्ण है। बहरहाल आज नए संसद भवन का उद्घाटन हो रहा है। कांग्रेस समेत 20 विरोधी दलों ने उद्घाटन समारोह का बहिष्कार करने का फैसला किया है। उनका कहना है कि इसका उद्घाटन पीएम मोदी के बजाय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों होना चाहिए। 

पूरा विपक्ष भी एकमत नहीं है। 20 दल बहिष्कार कर रहे हैं, तो 25 बहिष्कार के साथ नहीं हैं। सबके राजनीतिक गणित हैं, कोई विचार या सिद्धांत नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया जिसमें माँग की गई थी कि उद्घाटन राष्ट्रपति के हाथों होना चाहिए। लगता है कि कुछ दल अपनी राजनीतिक उपस्थिति को दर्ज कराने के लिए इस बहिष्कार का सहारा ले रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव की गोलबंदी का पूर्वाभ्यास। उनकी राजनीति अपनी जगह है, पर इस संस्था की गरिमा को बनाए रखने की जरूरत है। संसदीय मर्यादा और लोकतांत्रिक परंपराओं से जुड़े सवालों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। बेशक ताली एक हाथ से नहीं बजती। सरकार की भी जिम्मेदारी थी कि वह विरोधी दलों को समझाती। पर सत्तारूढ़ दल का भी राजनीतिक गणित है। उसे भी इस बहिष्कार में कुछ संभावनाएं दिखाई पड़ रही हैं।  

विवाद क्यों?

यह भी सच है कि संसद ही राजनीति का सर्वोच्च अखाड़ा होती है। कमोबेश दुनियाभर की संसदों में यही स्थिति है। बेशक संसदीय बहसें ही राजनीति है, पर संस्था के रूप में संसद सभी पक्षों का मंच है। बहिष्कार करने वाली पार्टियाँ क्या भविष्य में इस भवन में बैठकर संसदीय-कर्म में शामिल नहीं होंगी? बहिष्कार करने वाली पार्टियों को यह भी समझना चाहिए कि जनता उनके काम को किस तरीके से देख रही है।संसद में अच्छे भाषणों को जनता पसंद करती है। दुर्भाग्य से राजनीतिक नेताओं ने इस कला पर मश्क करना कम कर दिया है। संसदीय-बहसों का स्तर लगातार गिर रहा है और सड़क की राजनीति सिर उठा रही है। आप सोचें कि बरसों बाद लोग इस परिघटना को किस रूप में याद करेंगे? इस समारोह को क्या मिल-जुलकर नहीं मनाया जा सकता था? 

शुक्रवार को इस मामले पर सुनवाई के दौरान सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ऐसे मामले सुनवाई के लिहाज से तर्कसंगत और न्यायोचित नहीं हैं। याचिका दायर करने वाले से कहना चाहिए कि वे सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापस लेने के बाद किसी हाईकोर्ट में भी न जाएं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। संयोग से नए संसद-भवन को लेकर अदालत के दरवाजे पर पहली बार दस्तक नहीं दी गई थी। पिछले ढाई साल में कई बार अदालत का दरवाजा खटखटाया गया है। यह सवाल भी वाजिब है कि उद्घाटन बजाय राष्ट्रपति के हाथों होता, तो बेहतर होता या नहीं। जवाबी सवाल है कि प्रधानमंत्री के उद्घाटन करने पर आपत्ति क्यों? वस्तुतः बीजेपी को अपनी सफलता के सूत्र मोदी में दिखाई पड़ते हैं। और कांग्रेस की नज़र में मोदी ही सबसे बड़ा अड़ंगा है।

Friday, May 26, 2023

अमेरिका का राजकोषीय संकट

 

बाल्टीमोर सन में कार्टून

अमेरिका का अभूतपूर्व वित्तीय-संकट से सामना है। देश की संसद समय से ऋण-सीमा को बढ़ाने में विफल हो रही है और कर्जों को चुकाने में डिफॉल्ट का खतरा पैदा हो गया है। इसका परिणाम होगा शेयर बाजार में हड़कंप, बेरोजगारी में वृद्धि और दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं में अफरा-तफरी। अमेरिका को यह सीमा आगामी 1 जून के पहले 31.4 ट्रिलियन डॉलर से ऊपर कर लेनी चाहिए। डेट सीलिंग वह अधिकतम रक़म है, जिसे अमेरिकी सरकार अपने ख़र्चे पूरे करने के लिए उधार ले सकती है। संविधान के अनुसार ऐसा करने का अधिकार अमेरिकी कांग्रेस यानी संसद को है, पर राजनीतिक कारणों से ऐसा हो नहीं पा रहा है।

ऐसे हालात पहले भी पैदा हुए हैं, पर तब राजनीतिक नेताओं की सहमति से सीमा बढ़ गई, पर इसबार अभी ऐसा नहीं हो पाया है। रिपब्लिकन पार्टी का कहना है कि खर्च घटाकर 2022 के स्तर पर ले आओ, तब हम आपके प्रस्ताव का समर्थन करेंगे। ऐसा करने पर सरकारी खर्च में करीब 25 प्रतिशत की कटौती करनी होगी, जो जीडीपी की करीब पाँच फीसदी होगी। इससे राष्ट्रपति बाइडन की ग्रीन-इनर्जी योजनाएं ठप हो जाएंगी और देश मंदी की चपेट में आ जाएगा। रिपब्लिकन और डेमोक्रेट पार्टियों के बीच बातचीत के कई दौर विफल हो चुके हैं। यदि सरकार के पास धनराशि नहीं बचेगी, तो वह बॉण्ड धारकों या जिनसे कर्ज लिए गए हैं, उन्हें भुगतान नहीं कर पाएगी। इससे वैश्विक आर्थिक-संकट पैदा हो जाएगा।

बजट घाटा

2022 के वर्ष में संघ सरकार की प्राप्तियाँ 4.90 ट्रिलियन डॉलर की थीं और व्यय 6.27 ट्रिलियन डॉलर का था। इस प्रकार घाटा 1.38 ट्रिलियन डॉलर का था। सन 2001 के बाद से अमेरिकी की संघ सरकार लगातार घाटे में है। इस घाटे को पूरा करने के लिए ऋण लेने की जरूरत होती है। अमेरिकी संविधान के अनुसार अमेरिका के नाम पर ऋण लेने का अधिकार केवल देश की संसद को है। देश की ऋण-सीमा कानूनी-व्यवस्था है, जो 1917 में तय की गई थी।

उस समय संसद ने सरकार को युद्ध के खर्चों को पूरा करने के लिए बॉण्ड जारी करने का अधिकार दिया था। 1939 में संसद ने सरकार को ऋणपत्र (डेट) जारी करने और उनका प्रबंधन करने का अधिकार दे दिया, पर उसकी सीमा तय कर दी कि कितना ऋण लिया जा सकता है। 1939 से 2018 तक इस सीमा को 98 बार बढ़ाया गया और पाँच बार कम भी किया गया। सिद्धांततः सरकार अपने खर्चे पूरे करने के लिए कर्ज ले सकती है, पर उसकी सीमा क्या होगी, यह संसद तय करती है।

Thursday, May 25, 2023

जी-7 में भारत की बढ़ती भूमिका

जैसी कि उम्मीद थी, हिरोशिमा में जी-7 देशों ने चीन और रूस को निशाना बनाया. हिंद-प्रशांत की सुरक्षा योजना का सदस्य होने के नाते भारत की भूमिका भी चीनी-घेराबंदी में है, पर रूस की घेराबंदी में नहीं. जापान के प्रधानमंत्री किशिदा फुमियो इस समय ज्यादा आक्रामक हैं.

हिरोशिमा में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की को भी बुलाया गया था. सम्मेलन के अंत में जारी संयुक्त बयान में कहा गया कि हम उम्मीद करते हैं कि यूक्रेन युद्ध रोकने के लिए रूस पर चीन दबाव बनाएगा.

भारत जी-7 का सदस्य नहीं है, पर जापान के विशेष निमंत्रण पर भारत भी इस बैठक में गया था. भारत को लगातार तीसरे साल इसके सम्मेलन में शामिल होने का अवसर मिला है. कयास हैं कि अंततः किसी समय इसके आठवें सदस्य के रूप में भारत को भी शामिल किया जा सकता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रकारांतर से वहाँ चीन की आलोचना की. उन्होंने जी-7 के अलावा क्वाड के शिखर सम्मेलन में शिरकत भी की. अब वे पापुआ न्यूगिनी होते हुए ऑस्ट्रेलिया और अब भारत पहुँच गए हैं.

भारत की दिलचस्पी केवल चीन को निशाना बनाने में नहीं है, बल्कि आर्थिक विकास की संभावनाओं को खोजने में है. आगामी 22 जून को पीएम मोदी अमेरिका की राजकीय-यात्रा पर जाने वाले हैं. इस साल एससीओ और जी-20 के शिखर सम्मेलन भारत में हो रहे हैं और अगले साल होगा क्वाड का शिखर सम्मेलन. इस रोशनी में भारत की वैश्विक-भूमिका को देखा जा सकता है.   

Wednesday, May 24, 2023

नया संसद भवन, विरोधी-एकता और उसके छिद्र


राष्ट्रीय स्तर पर देश के विरोधी दलों की एकता के नए कारण जुड़ते जा रहे हैं। दिल्ली की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए जारी केंद्र सरकार के अध्यादेश का विरोध करने के लिए विरोधी एकता के लिए आमराय बन ही रही थी कि कांग्रेस समेत 19 पार्टियों ने संयुक्त बयान जारी कर नए संसद-भवन के 28 मई को होने वाले उद्घाटन समारोह का बहिष्कार करने की घोषणा की है।

28 मई को दोपहर 12 बजे पीएम मोदी नए संसद भवन का उद्घाटन करेंगे। इस पर कांग्रेस नेताओं और कई अन्य विपक्षी नेताओं का मानना है कि पीएम के बजाय राष्ट्रपति को उद्घाटन करना चाहिए। कांग्रेस का कहना है कि नए संसद भवन का उद्घाटन राष्ट्रपति के हाथों ही होना चाहिए। मुर्मू द्वारा नए संसद भवन का उद्घाटन लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक मर्यादा के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता का प्रतीक होगा। इस बीच सूत्रों ने मंगलवार को कहा कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ उद्घाटन के अवसर पर बधाई संदेश जारी कर सकते हैं।

19 पार्टियों ने अपने संयुक्त बयान में कहा है, "राष्ट्रपति मुर्मू को पूरी तरह से दरकिनार करते हुए, नए संसद भवन का उद्घाटन करने का प्रधानमंत्री मोदी का निर्णय न केवल एक गंभीर अपमान है, बल्कि हमारे लोकतंत्र पर सीधा हमला है, जो इसके अनुरूप प्रतिक्रिया की मांग करता है।" हाल के कुछ महीनों में विरोधी दलों की एकता से जुड़ने वाले दलों की संख्या बढ़ी जरूर है, पर इतनी नहीं बढ़ी है कि उसे किसी निर्णायक स्तर की एकता माना जाए। इस एकता में जो सबसे महत्वपूर्ण नाम उभर कर आया है, वह तृणमूल कांग्रेस का है, जो पिछले कुछ वर्षों में इस एकता के साथ लुका-छिपी खेल रही थी।

श्रीनगर जी-20 ने भारत-विरोधी प्रचार की हवा निकाली


श्रीनगर में जी-20 के तीन दिन के कार्यक्रम के आगाज़ के साथ पाकिस्तानी और चीनी प्रचार की हवा ही नहीं निकली है, बल्कि कश्मीर घाटी के निवासियों का आत्मविश्वास भी वापस लौटा है. इस दौरान यह भी साबित हुआ है कि पाकिस्तान यहाँ शांति-व्यवस्था की वापसी नहीं चाहता.

श्रीनगर सम्‍मेलन को विफल साबित करने और भारत की प्रतिष्ठा को कलंकित करने के इरादे से पाकिस्तान के विदेशमंत्री बिलावल भुट्टो गुलाम कश्मीर के तीन दिन के दौरे पर जा पहुँचे हैं.

जिस वक्त श्रीनगर में विदेशी मेहमान आए हुए हैं, बिलावल साहब पीओके में भारत-विरोधी जहर बो रहे हैं. तीन दिन के इस कार्यक्रम के लिए जबर्दस्त व्यवस्था की गई है, क्योंकि इसे विफल साबित करने वालों के इरादों पर भी पानी फेरना है.

Tuesday, May 23, 2023

विरोधी-एकता की पहली परीक्षा: दिल्ली-अध्यादेश को कानून बनने से क्या रोक पाएंगे विरोधी दल?


कर्नाटक में बीजेपी को परास्त करने के बाद कांग्रेस पार्टी और दूसरे विरोधी दल भविष्य की रणनीति बना रहे हैं। इस सिलसिले में मुलाकातों का सिलसिला चल रहा है। कांग्रेस पार्टी ने कहा है कि शीघ्र ही बड़ी संख्या में गैर-बीजेपी दल इस विषय पर विमर्श के लिए एकसाथ मिलकर बैठेंगे। यह बात सोमवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी से मुलाकात के बाद कही गई।

कांग्रेस ने इस बात का संकेत भी किया है कि दिल्ली के प्रशासनिक नियंत्रण के लिए लाए गए अध्यादेश के स्थान पर जब संसद में विधेयक पेश होगा, तब पार्टी की दृष्टिकोण क्या होगा, इस विषय पर भी विरोधी दलों के नेताओं से बातचीत की जाएगी। अलबत्ता उसकी तरफ से यह भी कहा गया कि पार्टी ने अभी तक इस विषय पर कोई फैसला नहीं किया है। पार्टी के महासचिव केसी वेणुगोपाल ने सोमवार को इस आशय का ट्वीट किया। साथ ही बैठक के बाद उन्होंने संवाददाताओं को बताया कि इस सिलसिले में विरोधी दलों के नेताओं की बैठक के स्थान और तारीख की घोषणा एक-दो दिन में कर दी जाएगी।

नीतीश कुमार चाहते हैं कि यह बैठक पटना में हो, पर कांग्रेस के सूत्रों ने कहा कि दूसरे सभी नेताओं की सुविधा को देखते हुए फैसला किया जाएगा। कुछ नेता विदेश-यात्रा पर जाने वाले हैं। मसलन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन सिंगापुर और जापान की नौ दिन की यात्रा पर जा रहे हैं। सोनिया गांधी भी विदेश जा रही हैं। स्टैनफर्ड विवि के एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए राहुल गांधी भी 28 मई को अमेरिका जा रहे हैं।

नीतीश कुमार ने कांग्रेस के नेताओं से मुलाकात करने के एक दिन पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से मुलाकात की थी। उन्होंने अध्यादेश प्रकरण पर केजरीवाल का समर्थन किया था। नीतीश कुमार ने इस बात पर जोर दिया था कि सभी दलों को एकसाथ मिलकर संविधान के बदलने की केंद्र सरकार की कोशिश का विरोध करना चाहिए। नीतीश के साथ जेडीयू के अध्यक्ष ललन सिंह भी थे। बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव इस बैठक में शामिल नहीं हो पाए, क्योंकि वे अस्वस्थ थे।

Sunday, May 21, 2023

जी-7 और बदलती दुनिया में भारत


हिरोशिमा में ग्रुप ऑफ सेवन के शिखर सम्मेलन से एक बात यह निकल कर आ रही है कि चीन-विरोधी मोर्चे को खड़ा करने में अमेरिका और जापान की दिलचस्पी यूरोपियन देशों की तुलना में ज्यादा है. जापान और अमेरिका चाहते हैं कि चीन के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया जाए, जबकि जर्मनी और फ्रांस जैसे यूरोपियन देशों को अब भी लगता है कि चीन के साथ दोस्ताना रिश्ते बनाए रखने में समझदारी है। शुक्रवार को शुरू हुआ तीन दिन का यह सम्मेलन रविवार को समाप्त होगा। इस दौरान दो बातें साफ हो गई हैं। एक, रूस के खिलाफ आर्थिक पाबंदियों को और कड़ा किया जाएगा और दूसरे चीन की घेराबंदी जारी रहेगी। ताइवान की सुरक्षा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र सम्मेलन में छाए हुए हैं। हिरोशिमा जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा का गृहनगर भी है। उन्होंने सम्मेलन में भाग लेने कि लिए जिन सात गैर जी-7 देशों को आमंत्रित किया है, उन्हें देखते हुए इस बात को समझा जा सकता है। भारत, ब्राज़ील और इंडोनेशिया जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की उपस्थिति और दक्षिण कोरिया, वियतनाम और ऑस्ट्रेलिया की उपस्थिति इस बात को स्पष्ट करती है। इसके समांतर क्वाड का शिखर सम्मेलन भी हो रहा है, जिसे पिछले हफ्ते ऑस्ट्रेलिया में होना था। जो बाइडेन के कार्यक्रम में बदलाव के कारण वह सम्मेलन स्थगित कर दिया गया था। जो बाइडेन के दिमाग में अमेरिका-नीत विश्व-व्यवस्था है। उसके केंद्र में वे जी-7 को रखना चाहते हैं। बावजूद इसके यूरोपियन यूनियन और अमेरिकी दृष्टिकोणों में एकरूपता नहीं है।

सात देशों का समूह

दुनिया के सात सबसे ताकतवर देशों के नेता हिरोशिमा में एकत्र हुए हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान एटम बम का पहला शिकार बना था हिरोशिमा शहर। संयोग से आज दुनिया फिर से उन्हीं सवालों को लेकर परेशान है, जो दूसरे विश्वयुद्ध के समय उभरे थे। केवल कुछ नाम इधर-उधर हुए हैं। सात देशों के समूह में जापान और जर्मनी शामिल हैं, जो दूसरे विश्वयुद्ध में शत्रु-पक्ष थे। वहीं चीन और रूस जैसे मित्र-पक्ष के देश आज शत्रु-पक्ष माने जा रहे हैं। कुछ साल पहले तक रूस भी इस समूह का सदस्य था, जो अब दूसरे पाले में है। इस अनौपचारिक समूह के सदस्य हैं कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, युनाइटेड किंगडम और अमेरिका। जी-7 की बैठकों में कुछ मित्र देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को बुलाने की भी परंपरा है। इस साल ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, कोमोरोस, कुक आइलैंड्स, भारत, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया और वियतनाम को आमंत्रित किया गया है। इन सम्मेलनों में आर्थिक नीतियाँ, सुरक्षा से जुड़े सवालों, ऊर्जा, लैंगिक प्रश्नों से लेकर पर्यावरण तक सभी सवालों पर चर्चा होती है। इस सम्मेलन को लेकर हमारी विदेश-नीति के साथ भी कुछ बड़े सवाल जुड़े हुए हैं।

Friday, May 19, 2023

एससीओ में उभरेगी भारतीय विदेश-नीति की दिशा


एससीओ विदेशमंत्रियों के सम्मेलन के हाशिए पर भारत-पाकिस्तान मसलों के उछलने की वजह से एससीओ की गतिविधियाँ पृष्ठभूमि में चली गईं. रूस-चीन प्रवर्तित इस संगठन का विस्तार यूरेशिया से निकल कर एशिया के दूसरे क्षेत्रों तक हो रहा है. जब दुनिया में महाशक्तियों का टकराव बढ़ रहा है, तब इस संगठन की दशा-दिशा पर निगाहें बनाए रखने की जरूरत है. खासतौर से इसलिए कि इसमें भारत की भी भूमिका है.

इस साल भारत में हो रहे जी-20 और एससीओ के कार्यक्रमों में वैश्विक-राजनीति के अंतर्विरोध उभर रहे हैं और उभरेंगे. ज़ाहिर है कि भारत दो ध्रुवों के बीच अपनी जगह बना रहा है. एससीओ पर चीन और रूस का वर्चस्व है. यहाँ तक कि संगठन का सारा कामकाज रूसी और चीनी भाषा में होता है. जी-20 संगठन नहीं एक ग्रुप है, पर उसकी भूमिका बहुत ज्यादा है.

रूस और चीन मिलकर नई विश्व-व्यवस्था बनाना चाहते हैं. यूक्रेन-युद्ध के बाद से यह प्रक्रिया तेज हुई है. इसमें एससीओ और ब्रिक्स की महत्वपूर्ण भूमिका होगी. एससीओ के अलावा भारत, रूस और चीन ब्रिक्स के सदस्य भी हैं. ब्राजील हालांकि बीआरआई में शामिल नहीं है, पर वहाँ हाल में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद उसका झुकाव चीन की ओर बढ़ा है.

भारत की दिलचस्पी

रूस और चीन के बीच भी प्रतिस्पर्धा है. रूस के आग्रह पर ही भारत इसका सदस्य बना है. चीन के साथ भारत दूरगामी संतुलन बैठाता है. सवाल है कि भारत इस संगठन में अलग-थलग तो नहीं पड़ेगा? हमारी दिलचस्पी रूस से लगे मध्य एशिया के देशों के साथ कारोबारी और सांस्कृतिक संपर्क बनाने में है.

भारत क्वाड का सदस्य भी है, जो रूस और चीन दोनों को नापसंद है. अमेरिका, जापान और यूरोप के साथ भारत के अच्छे रिश्ते हैं. इन बातों में टकराव है, जिससे भारत बचता है. फिलहाल संधिकाल है और आर्थिक-शक्ति हमारे महत्व को स्थापित करेगी.

Thursday, May 18, 2023

तुर्की में एर्दोगान का रसूख बरकरार

पहले दौर के परिणाम आने के बाद अपनी पार्टी की बैठक में एर्दोगान

एक तरफ भारत के कर्नाटक राज्य के चुनाव परिणाम आ रहे थे, दूसरी तरफ तुर्की और थाईलैंड के परिणाम भी सामने आ रहे हैं, जिनका वैश्विक मंच पर महत्व है. तुर्की के राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के अनुमान सही साबित नहीं हुए हैं. अब सबसे ज्यादा संभावना इस बात की है कि रजब तैयब एर्दोगान एकबार फिर से राष्ट्रपति बनेंगे और अगले पाँच साल उनके ब्रांड की राजनीति को पल्लवित-पुष्पित होने का मौका मिलेगा.

थाईलैंड के चुनाव परिणामों पर भारत के मीडिया ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया है, पर लोकतांत्रिक-प्रक्रिया की दृष्टि से वे महत्वपूर्ण परिणाम है. वहाँ सेना समर्थक मोर्चे की पराजय महत्वपूर्ण परिघटना है. खासतौर से यह देखते हुए कि थाईलैंड के पड़ोस में म्यांमार की जनता सैनिक शासन से लड़ रही है. पहले तुर्की के घटनाक्रम पर नज़र डालते हैं.

एर्दोगान की सफलता

तुर्की में हालांकि एर्दोगान को स्पष्ट विजय नहीं मिली है, पर पहले दौर में उनकी बढ़त बता रही है कि उनके खिलाफ माहौल इतना खराब नहीं है, जितना समझा जा रहा था. हालांकि 88 प्रतिशत के रिकॉर्ड मतदान से यह भी ज़ाहिर हुआ है कि तुर्की के वोटर की दिलचस्पी अपनी राजनीति में बढ़ी है.

अब 28 मई को दूसरे दौर का मतदान होगा. पहले दौर एर्दोगान और उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी कमाल किलिचदारोग्लू दोनों में से किसी एक को पचास फ़ीसदी से ज्यादा वोट नहीं मिले हैं. एर्दोगान को 49.49 फ़ीसदी और किलिचदारोग्लू को 44.79 फ़ीसदी वोट मिले हैं. अगले दौर में शेष प्रत्याशी हट जाएंगे और मुकाबला इन दोनों के बीच ही होगा.

तीसरे प्रत्याशी राष्ट्रवादी सिनान ओगान को 5.2 फ़ीसदी के आसपास वोट मिले हैं. अब वे चुनाव से हट जाएंगे. देखना होगा कि वे दोनों में से किसका समर्थन करते हैं. हाल में उन्होंने कहा था कि वे सरकार में मंत्रियों के पदों को पाने में दिलचस्पी रखते हैं. वहाँ की संसद ही प्रधानमंत्री और सरकार का चयन करती है. संभव है कि एर्दोगान के साथ उनकी सौदेबाजी हो. 2018 के चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे मुहर्रम इंचे ने मतदान के तीन दिन पहले ख़ुद को दौड़ से बाहर कर लिया था.

Wednesday, May 17, 2023

केवल इमरान की देन नहीं है पाकिस्तानी कलह, पूरी व्यवस्था का हाथ है


इमरान खान की गिरफ्तारी, उसके बाद हुई हिंसा, अफरा-तफरी और फिर सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इमरान खान की रिहाई होने के बावजूद स्थिति सामान्य नहीं हुई है, बल्कि कलह और ज्यादा खुलकर सामने आ गई है. देश की सेना, राजनीति और न्यायपालिका तीनों आरोपों के घेरे में हैं. सोमवार को सत्तारूढ़ पीडीएम के कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट बाहर धरना दिया और संसद ने अदालत की भूमिका की जाँच के लिए एक कमेटी बनाने का प्रस्ताव पास किया है.

पाकिस्तान को इस वात्याचक्र से बाहर निकालने के लिए नए सिरे से अपनी शुरुआत करनी होगी. यह शुरुआत कैसे होगी और इसकी पहल कौन करेगा, कहना मुश्किल है. पिछले 76 साल में वहाँ जो कुछ हुआ है, वह इसके लिए जिम्मेदार है. स्वतंत्रता के बाद से वहाँ जो व्यवस्था कायम की गई है, वह सेना, सुरक्षा और युद्ध पर केंद्रित है. अब पहिया उल्टा घुमाना भी आसान नहीं है.

इरादा क्या है?

यह स्थिति न तो एक दिन में बनी है और न कोई एक व्यक्ति इसके लिए जिम्मेदार है. वहाँ के अवाम और राजनीति को विचार करना चाहिए कि पाकिस्तान की विचारधारा क्या है? वे चाहते क्या हैं?

इमरान खान लोकतंत्र और भ्रष्टाचार की बातें कर ज़रूर रहे हैं, पर उनके पास भी इस बीमारी का कोई इलाज़ नहीं है. वे धार्मिक नारों का इस्तेमाल कर रहे हैं. इनके सहारे वे एकबार को सत्ता में वापस आ भी जाएंगे, तो देश को संकट से बार किस तरह निकालेंगे, यह स्पष्ट नहीं है.

इमरान खान ने राजनीति में अपने विरोधियों को चोर-डाकू बताकर प्रवेश किया था. उन्होंने 2016 में पनामा पेपर्स ने देश के राजनेताओं की कारगुजारियों का पर्दाफाश किया. इसके सहारे इमरान ने सेना की मदद से नवाज़ शरीफ को जेल का रास्ता दिखाने में कामयाबी हासिल की, पर आज वे वैसे ही आरोपों के कठघरे में हैं. उन्हें लेकर दस्तावेजी सबूत भी हैं. सिर्फ आंदोलन और हंगामे की मदद से वे कैसे बचेंगे?

Monday, May 15, 2023

कांग्रेस की परीक्षा अब शुरू होगी


कर्नाटक के चुनाव परिणामों को तीन नज़रियों से देखने की ज़रूरत है। एक, कांग्रेस की विजय, बीजेपी की पराजय और राष्ट्रीय-राजनीति पर इन दोनों बातों का असर। कांग्रेस के ज्यादातर नेता मानते हैं कि कांग्रेस की यह जीत राहुल गांधी की भारत-जोड़ो यात्रा का सुपरिणाम है। कांग्रेस ने साबित किया है कि बीजेपी अपराजेय नहीं है। और यह भी कि कांग्रेस ने चुनाव में सफल होने का फॉर्मूला खोज लिया है, जो भविष्य के चुनावों में काम आएगा। खासतौर से 2024 में।

हालांकि बीजेपी की तरफ से कोई ऐसी प्रतिक्रिया नहीं आई है, जिससे हार के कारणों पर रोशनी पड़ती हो, पर यह बात समझ में आती है हिंदुत्व के उसके फॉर्मूले की सीमा दिखाई पड़ने लगी है। जहाँ तक राष्ट्रीय राजनीति का प्रश्न है कांग्रेस की इस विजय का विरोधी-दलों की एकता पर क्या असर पड़ेगा, उसे देखने के लिए कुछ समय इंतज़ार करना होगा। कांग्रेस का यह दावा फिलहाल मजबूत हुआ है कि राष्ट्रीय स्तर पर विरोधी गठबंधन का नेतृत्व राहुल गांधी के नेतृत्व में होना चाहिए। क्या इसे बड़े कद वाले क्षेत्रीय-क्षत्रप स्वीकार करेंगे? इस प्रश्न का जवाब अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के ठीक पहले ही मिलेगा।

इस जीत के बाद कांग्रेस का जैकारा सुनाई पड़ा है कि यह राहुल गांधी की जीत है। उनकी भारत-जोड़ो यात्रा की विजय है। यह बात मल्लिकार्जुन खड़गे से लेकर सिद्धरमैया तक ने कही है। ध्यान से देखें तो यह स्थानीय राजनीति और उसके नेतृत्व की विजय है। राज्य के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे का पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर होना महत्वपूर्ण साबित हुआ, पर कांग्रेस की जीत के पीछे राष्ट्रीय नेतृत्व की भूमिका सीमित है। खड़गे को भी कन्नाडिगा के रूप में देखा गया। वे राज्य के वोटरों से कन्नड़ भाषा में संवाद करते हैं।

Sunday, May 14, 2023

कांग्रेस की जीत और भविष्य के संकेत


कर्नाटक में संशयों से घिरी भारतीय जनता पार्टी को दक्षिण भारत में अपने एकमात्र दुर्ग में पराजय का सामना करना पड़ा है। यह आलेख लिखे जाने तक पूरे परिणाम आए नहीं थे, पर यह लगभग साफ है कि कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलेगा। गौर से देखें, तो पाएंगे कि कांग्रेस का वोट करीब 5 प्रतिशत बढ़ा है। 2018 में वह 38 प्रश था, जो अब 43 प्रश हो गया है। बीजेपी का मत कमोबेश वही 36 प्रश है, जितना 2018 में था। जेडीएस का मत 18.4 से घटकर 13.3 प्रतिशत हो गया है। उसमें करीब पाँच फीसदी की गिरावट है। जेडीएस का घटा वोट कांग्रेस को मिला और परिणामों में इतना अंतर आ गया। इन परिणामों में कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए महत्वपूर्ण संदेश छिपे हैं। बीजेपी के लिए इस हार से उबरना मुश्किल नहीं है, पर कांग्रेस हारती, तो उसका उबरना मुश्किल था। उसने स्पष्ट बहुमत हासिल करके मुकाबले को ही नहीं जीता, यह जीत उसके लिए निर्णायक मोड़ साबित होगी। ऐसा भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस ने चुनाव में सफलता का टेंपलेट हासिल कर लिया है, जिसे वह अब दूसरे राज्यों में दोहरा सकती है। पर यह नहीं मान लेना चाहिए कि 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी के प्रति जनता के बदले हुए मूड का यह संकेत है। लोकसभा चुनाव के मुद्दे अलग होते हैं। साल के अंत में तेलंगाना, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम विधानसभाओं के चुनाव भी होंगे। मिजोरम को छोड़ दें, तो शेष सभी राज्य महत्वपूर्ण हैं। रणनीति में धार देने के कई मौके बीजेपी को मिलेंगे।   

स्थानीय नेतृत्व

इस जीत के बाद कांग्रेस का जैकारा सुनाई पड़ा है कि यह राहुल गांधी की जीत है। उनकी भारत-जोड़ो यात्रा की विजय है। यह बात मल्लिकार्जुन खड़गे से लेकर सिद्धरमैया तक ने कही है। ध्यान से देखें, यह स्थानीय नेतृत्व की विजय है। राज्य के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे का पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर होना महत्वपूर्ण साबित हुआ, पर कांग्रेस की जीत के पीछे राष्ट्रीय नेतृत्व की भूमिका सीमित है। खड़गे को भी कन्नाडिगा के रूप में देखा गया। वे राज्य के वोटरों से कन्नड़ भाषा में संवाद करते हैं। कांग्रेस ने कन्नड़-गौरव, हिंदी-विरोध नंदिनी-अमूल और उत्तर-दक्षिण भावनाओं को बढ़ाने का काम भी किया। इन बातों का असर आप देख सकते हैं। दूसरी तरफ बीजेपी के नेतृत्व की भूमिका देखें। 2021 में येदियुरप्पा को जिस तरह हटाया गया, वह क्या बताता है?

कांग्रेस की उपलब्धि

हिमाचल जीतने के बाद कर्नाटक में भी विजय हासिल करना कांग्रेस की उपलब्धि है। अब वह राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनावों में ज्यादा उत्साह के साथ उतरेगी। मल्लिकार्जुन खड़गे को इस बात का श्रेय मिलेगा कि उन्होंने अपने गृहराज्य में पार्टी को जीत दिलाई। कांग्रेस के पास यह आखिरी मौका था। कर्नाटक जाता, तो बहुत कुछ चला जाता। राहुल और खड़गे के अलावा कर्नाटक में कांग्रेस के सामाजिक-फॉर्मूले की परीक्षा भी थी। यह फॉर्मूला है अल्पसंख्यक, दलित और पिछड़ी जातियाँ। इसकी तैयारी सिद्धरमैया ने सन 2015 से शुरू कर दी थी, जब उन्होंने राज्य की जातीय जनगणना कराई। उसके परिणाम घोषित नहीं हुए, पर सिद्धरमैया ने पिछड़ों और दलितों को 70 फीसदी आरक्षण देने का वादा जरूर किया। आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा नहीं किया जा सकता था, पर उन्होंने कहा कि हम इसे 70 फीसदी करेंगे। ऐसा तमिलनाडु में हुआ है, पर इसके लिए संविधान के 76 वां संशोधन करके उसे नवीं अनुसूची में रखा गया, ताकि अदालत में चुनौती नहीं दी जा सके। कर्नाटक में यह तबतक संभव नहीं, जबतक केंद्र की स्वीकृति नहीं मिले।

कांग्रेसी महत्वाकांक्षा

लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस मज़बूत पार्टी के रूप में उभरना चाहती है। इसी आधार पर वह विरोधी गठबंधन का राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व करना चाहती है। साथ ही वह इसे बीजेपी के पराभव की शुरूआत के रूप में भी देख रही है। इस विजय से उसके कार्यकर्ताओं का उत्साहवर्धन हुआ है। राज्य में पार्टी सिद्धरमैया और डीके शिवकुमार दोनों शीर्ष नेता अपने चुनाव जीत गए हैं, जबकि भारतीय जनता पार्टी के कई मंत्री परास्त हुए हैं। निवृत्तमान मुख्यमंत्री बासवराज बोम्मई जरूर जीत गए हैं। अंतिम समय में बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में गए जगदीश शेट्टार हार गए हैं, जबकि लक्ष्मण सावडी को जीत मिली है। देखना यह भी होगा कि इस विजय से क्या बीजेपी-विरोधी राष्ट्रीय गठबंधन की संभावनाएं बेहतर होंगी? क्या शेष विरोधी दल कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करेंगे? इस प्रश्न का उत्तर लोकसभा चुनाव के ठीक पहले ही मिलेगा। अभी चार राज्यों के चुनाव परिणामों का इंतजार और करें।