Sunday, October 23, 2022

कांग्रेस का आंतरिक लोकतंत्र: उम्मीदें और अंदेशे


मल्लिकार्जुन खड़गे की जीत को लेकर शायद ही किसी को संदेह रहा हो, पर असली सवाल है कि इस चुनाव से कांग्रेस की समस्याओं का समाधान होगा या नहीं? इस सिलसिले में दो तरह की तात्कालिक प्रतिक्रियाएं हैं। पहली यह कि खड़गे ने सिर पर काँटों का ताज पहन लिया है और उनके सामने समस्याओं के पहाड़ हैं, जिनका समाधान गांधी परिवार नहीं कर पाया, तो वे क्या करेंगे? दूसरी तरफ कुछ संजीदा राजनीति-शास्त्री मानते हैं कि यह चुनाव केवल कांग्रेस पार्टी के लिए ही युगांतरकारी साबित नहीं होगा, बल्कि इससे दूसरे दलों के आंतरिक लोकतंत्र की संभावनाएं बढ़ेंगी। फिलहाल कांग्रेस की सारी समस्याओं के समाधान नहीं निकलें, पर पार्टी के पुनरोदय के रास्ते खुलेंगे और एक नई शुरुआत होगी।

अंदेशे और सवाल

करीब 24 साल बाद कांग्रेस की कमान किसी गैर-गांधी के हाथ में आई है। पर जिस बदलाव की आशा पार्टी के भीतर और बाहर से की जा रही है, वह केवल इतनी ही नहीं है। इसे बदलाव का प्रस्थान-बिंदु माना जा सकता है, पर केवल इतना ही, क्योंकि सवाल कई हैं? इस चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है हाईकमान से आशीर्वाद प्राप्त प्रत्याशीका होना। उसके पीछे सबसे बड़ा सवाल है कि अब हाईकमान के मायने क्या होंगे? पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रम से यह बात रेखांकित हो रही है कि पार्टी में कोई धुरी नहीं है और है भी तो कमज़ोर है। अब नए अध्यक्ष की भूमिका क्या होगी, कितनी उसकी चलेगी और कितनी परिवार की, जिसे हाईकमान कहा जाता है?  और अध्यक्ष के रहते क्या कोई हाईकमान भी होगी? सबसे बड़ा सवाल है कि गैर-गांधी अध्यक्ष खुद कब तक चलेगा?  बात केवल अध्यक्ष के पदस्थापित होने तक है या पार्टी के भीतर वैचारिक और संगठनात्मक सुधारों की कोई योजना भी है?

चुनौतियों के पहाड़

मल्लिकार्जुन खड़गे के सामने चुनौतियों के पहाड़ हैं और समय कम है। समय से आशय है 2024 का लोकसभा चुनाव। यह बदलाव मई 2019 में राहुल गांधी के इस्तीफे के फौरन बाद हो गया होता, तब भी बात थी। नए अध्यक्ष को अपना काम करने का मौका मिल गया होता। पता नहीं उस स्थिति में भारत जोड़ो यात्रा होती या कुछ और होता। पंजाब में कांग्रेस हारती या नहीं हारती वगैरह-वगैरह। खड़गे के पास अब समय नहीं है। लोकसभा चुनाव के लिए डेढ़ साल का समय बचा है। उसके पहले 11 राज्यों के और उसके फौरन बाद को भी जोड़ लें, तो कुल 18 विधानसभाओं के चुनाव होने हैं, जिनमें हिमाचल प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, झारखंड, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण राज्य शामिल हैं। हिमाचल और गुजरात के चुनाव तो सामने खड़े हैं और फिर 2023 में उनके गृह राज्य कर्नाटक के चुनाव हैं। अगले साल फरवरी-मार्च में त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड के चुनाव हैं, मई में कर्नाटक के और नवंबर-दिसंबर में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मिजोरम और तेलंगाना के। राजस्थान में अशोक गहलोत प्रकरण अभी अनसुलझा है। भले ही खड़गे पार्टी अध्यक्ष हैं, पर कम से कम इस मामले में परिवार की सलाह काम करेगी।

Wednesday, October 19, 2022

बाइडन ने पाकिस्तान को ‘खतरनाक देश’ क्यों बताया?


अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने पाकिस्तान को दुनिया के सबसे ख़तरनाक देशों में से एक बताया है. बाइडन ने इस साल हो रहे मध्यावधि चुनाव के सिलसिले में अपनी पार्टी के लिए हुए एक धन-संग्रह कार्यक्रम में कहा, मुझे लगता है कि शायद (अंग्रेजी में मे बी) पाकिस्तान दुनिया के सबसे ख़तरनाक देशों में से एक है. एक ग़ैर-ज़िम्मेदार देश के पास परमाणु हथियार हैं.

बाइडन के इस बयान पर पाकिस्तान में तो तीखी प्रतिक्रिया हुई है, भारत में भी लोगों ने इसका मतलब लगाने की कोशिश की है. कुछ दिन पहले लग रहा था कि अमेरिका फिर से पाकिस्तान की तरफदारी कर रहा है. ऐसे में यू-टर्न क्यों? वह भी ऐसे मौके पर जब पाकिस्तान सरकार उसके साथ अपने रिश्ते सुधारना चाहती है.

इमरान खान का तो आरोप ही यही है कि शहबाज़ शरीफ की इंपोर्टेड सरकार है. दूसरी तरफ देखना यह भी होगा कि अमेरिका धीरे-धीरे पाकिस्तान की तकलीफों को कम कर रहा है. उसे आईएमएफ से कर्ज मिलने लगा है, इस हफ्ते एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट से भी उसके बाहर निकलने की आशा है. 

भौगोलिक स्थिति के कारण अमेरिका की दिलचस्पी पाकिस्तान को अपने साथ जोड़कर रखने में है. पर पाकिस्तान के साथ विसंगतियाँ जुड़ी हैं. उसे खतरनाक देश बताकर बाइडन इस विसंगति की ओर ही इशारा कर रहे हैं. उसके एक हाथ में एटम बम का बटन है, और दूसरा हाथ बेकाबू राजनीति से पंजे लड़ा रहा है. 

राजनीतिक बयान?

बाइडन ने चुनाव-अभियान के दौरान यह बात कही है. इसका मतलब क्या है? क्या अमेरिकी मतदाता की दिलचस्पी ऐसे बयानों में है? या बाइडन ने भारत की नाराज़गी को कम करने की कोशिश की है? या इसका भारत से कोई संबंध नहीं है?

इस महीने के शुरू में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल क़मर जावेद बाजवा का अमेरिका में भव्य स्वागत किया गया था. अमेरिका के रक्षामंत्री लॉयड ऑस्टिन के आमंत्रण पर जनरल बाजवा अमेरिका गए थे और उनका उसी प्रकार स्वागत हुआ, जैसा अप्रेल के महीने में भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का हुआ था.

बाइडन के बयान को पढ़ने के लिए जनरल बाजवा की यात्रा के उद्देश्य को भी समझना होगा. लगता है कि यह यात्रा भू-राजनीति के बजाय पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति से जुड़ी है, जिसमें जनरल बाजवा और सेना की भूमिका है.

सेना की भूमिका

पाकिस्तान की सेना के भीतर राष्ट्रीय राजनीति और अमेरिका के साथ रिश्तों को लेकर दो तरह के विचार हैं. जनरल बाजवा का कार्यकाल हालांकि अब एक महीने का ही बचा है, पर लगता है कि सेना के भीतर उनकी पकड़ अच्छी है. वे कई बार कह चुके हैं कि सेना अब राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करेगी.

इसमें दो राय नहीं कि 2018 के चुनाव में वहाँ की सेना ने भूमिका अदा की थी और इमरान खान को गद्दी पर बैठाया. इमरान खान ने न केवल राजनीति में, बल्कि सेना के भीतर भी कुछ बुनियादी पेच पैदा कर दिए हैं, जिन्हें लेकर अमेरिका परेशान है.   

चीन के प्रभाव में इमरान खान ने रूस के साथ रिश्तों को सुधारने की कोशिश भी की थी. यूक्रेन पर हमले के ठीक पहले इमरान खान मॉस्को में थे. पाकिस्तान की वर्तमान सरकार ने अमेरिका से रिश्ते सुधारे जरूर हैं, पर चीन के साथ उसके रिश्ते बदस्तूर हैं.

चीन का मुकाबला

अमेरिका को लग रहा है कि पाकिस्तान का झुकावचीन की ओर बढ़ रहा है, जिसे रोकने के लिए वह पाकिस्तान को एक तरफ खुश करने की कोशिश कर रहा है, वहीं धमका भी रहा है. पिछले साल अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान को जिम्मेदार माना था.

Monday, October 17, 2022

समस्या समाज की है, केवल भाषा की नहीं


भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा-3

इससे पहले की दूसरी कड़ी पढ़ें यहाँ

गृहमंत्री अमित शाह ने रविवार, 16 अक्टूबर 2022 को भोपाल में मेडिकल शिक्षा की हिंदी किताबों का लोकार्पण किया। गृहमंत्री ने कहा कि देश विद्यार्थी जब अपनी भाषा में पढ़ाई करेंगे, तभी वह सच्ची सेवा कर पाएंगे। 10 राज्यों में इंजीनियरिंग की पढ़ाई उनकी मातृभाषा में शुरू होने वाली है। इस पर काम चल रहा है। मैं देश भर के युवाओं से अह्वान से कहता हूं कि अब भाषा कोई बाध्यता नहीं है। आने वाले दिनों में ये सिलसिला और तेजी से आगे बढ़ेगी. पढ़ाई लिखाई और अनुसंधान मातृभाषा में होगा तो देश तेज़ी से तरक़्क़ी करेगा।

इस कार्यक्रम को आप किस तरह से देखते हैं, यह आप पर निर्भर करता है। मध्य प्रदेश में हिंदी माध्यम की मेडिकल पुस्तकों के मसले को काफी लोग राजनीतिक दृष्टि से देख रहे हैं। दक्षिण भारत, खासतौर से तमिलनाडु में हिंदी-विरोध राजनीतिक-विचारधारा की शक्ल भी अख्तियार कर चुका है। यह विचारधारा पहले से उस इलाके में पल्लवित-पुष्पित हो रही थी, पर 2014 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आने के बाद से इसे बल मिला है। मेरा सुझाव है कि इस मसले को राजनीतिक नज़रिए से देखना बंद करें।

भारतीय जनता पार्टी हिंदी-माध्यम से शिक्षण को प्रचार के लिए इस्तेमाल करे या द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम इसके विरोध को अपनी राजनीति की ज़रिया बनाए, दोनों परिस्थितियों में हम उद्देश्य से भटकेंगे। जब आप राजनीतिक हानि-लाभ या रणनीतियों का विवेचन करें, तब भाषा की राजनीति पर भी विचार करें। पर जब शिक्षा-नीति की दृष्टि से विचार करें, तब यही देखें कि सामान्य-छात्र के लिए कौन सी भाषा उपयोगी है।

भाषा की राजनीति

भाषा की राजनीति अलग विषय है। सामाजिक पहचान के रूप में भाषा का इस्तेमाल होता है। यह राजनीति है। राष्ट्रवाद का महत्वपूर्ण अवयव है भाषा। हिंदी को संघ की राजभाषा बनाने का फैसला एक प्रकार से राजनीतिक समझौता था। संविधान सभा ने आधे-अधूरे तरीके से इस मसले का समाधान किया और इसे समस्या के रूप में छोड़ दिया। इसके लिए राजनीति ही दोषी है, जिसका विवेचन शुरू करते ही हम एक दूसरे रणक्षेत्र में पहुँच जाते हैं।

फिलहाल मैं प्राथमिक रूप से शिक्षा के माध्यम से जुड़े सवालों पर बात करना चाहूँगा, जिसकी विशेषज्ञता मेरे पास नहीं है। विशेषज्ञों की राय के सहारे ही मैंने अपनी राय बनाई है। मेरी दृष्टि की विसंगतियों को पाठक इंगित करें तो अच्छा है। इससे मुझे अपनी राय को सुस्पष्ट बनाने में आसानी होगी।

स्थानीयता का महत्व

नब्बे के दशक में अंग्रेजी के दो काफी प्रचलित हुए थे। एक लोकल और दूसरा ग्लोबल। कहा गया कि थिंक ग्लोबल, एक्ट लोकल। स्थानीयता और अंतरराष्ट्रीयता को जोड़ने की यह कोशिश थी। इसे भाषा की दृष्टि से देखें, तो बनता है वैश्विक भाषा और स्थानीय भाषा। आपकी समस्याएं और उनके समाधानों की स्थानीयता उतनी ही या उससे कुछ ज्यादा महत्वपूर्ण है, जितनी आप वैश्विकता को महत्वपूर्ण मानते हैं। मध्य प्रदेश में हिंदी के माध्यम से मेडिकल पढ़ाई अभी शुरू ही नहीं हुई है कि आपने अमेरिका और यूरोप जाकर वहाँ उच्च शिक्षा प्राप्त करने या प्रैक्टिस से जुड़ी परेशानियों का जिक्र शुरू कर दिया।

Sunday, October 16, 2022

यूक्रेन की लड़ाई से जुड़ी पेचीदगियाँ


यूक्रेन की लड़ाई अब ऐसे मोड़ पर आ गई है, जहाँ खतरा है कि कहीं यह एटमी लड़ाई में न बदल जाए। एक तरफ खबरें हैं कि रूस के फौजी-संसाधन बड़ी तेजी से खत्म हो रहे हैं। वहीं रूसी हमलों में तेजी आने की खबरें भी हैं। रूस को क्राइमिया से जोड़ने वाले पुल पर हुए विस्फोट के बाद 10 अक्टूबर को यूक्रेन पर सबसे बड़ा हवाई हमला किया गया। एक के बाद एक कई रूसी मिसाइलों का रुख यूक्रेन की तरफ मुड़ गया। उधर बेलारूस ने भी रूस के पक्ष में युद्ध में कूदने की घोषणा कर दी है। 10 अक्तूबर को बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको ने कहा, हमें पता लगा है कि बेलारूस पर यूक्रेन हमला करने वाला है। इसलिए हमने अपनी सेना को रूसी सेना के साथ तैनात करने का फैसला किया है। हम रूसी सेना को बेस कैंप बनाने और तैयारी के लिए अपनी जमीन देंगे। पश्चिमी विश्लेषकों का कहना है कि सीधे भिड़ने के बजाय पुतिन बेलारूस के जरिए यूक्रेन पर परमाणु हमला कर सकते हैं। इससे रूस को सीधे हमले का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकेगा। जी-7 देशों को भी ऐसा ही अंदेशा है। इसीलिए जी-7 की इमरजेंसी बैठक के बाद रूस को धमकी दी गई कि यूक्रेन पर रासायनिक, जैविक या न्यूक्लियर हमला हुआ तो रूस को बुरा अंजाम भुगतना पड़ेगा।

नाटो का विस्तार

नाटो ने कहा है कि हम यूक्रेन को हथियारों की मदद जारी रखेंगे और जो कोई भी नाटो से भिड़ेगा उसे देख लिया जाएगा। नाटो के प्रमुख स्टोल्टेनबर्ग ने कहा है कि नाटो अगले हफ्ते न्यूक्लियर ड्रिल करेगा। बेलारूस की सीमा लात्विया, लिथुआनिया और पोलैंड से लगती है। तीनों नाटो के सदस्य हैं। इस बीच यूक्रेन ने यूरोपियन यूनियन और नाटो दोनों में शामिल होने के लिए अर्जी दे दी है। बारह सदस्य देशों के साथ शुरू हुए नाटो में शामिल होने के लिए फिनलैंड और स्वीडन की अर्जी मंजूर होने के बाद उनके 31वें और 32वें देश के रूप में शामिल होने की उम्मीदें हैं। अब बोस्निया और हर्ज़गोवीना, जॉर्जिया और यूक्रेन के भी इसमें शामिल होने के आसार हैं। उधर रूस ने यूक्रेन के चार इलाकों में जनमत संग्रह कराकर उन्हें अपने देश में शामिल करने की घोषणा कर दी है। इन बातों से तनाव घटने के बजाय बढ़ ही रही है। इतना स्पष्ट है कि लड़ाई उसके अनुमान से कहीं ज्यादा लंबी खिंच गई है। हाल में रूस ने जो लगातार बमबारी की है उससे यही लगता है कि रूस इस युद्ध को और बढ़ाना चाहता है। पर अंतहीन लड़ाई के लिए अंतहीन संसाधनों की जरूरत होगी। बेशक रूस ने मिसाइलों की बौछार करके अपनी ताकत का प्रदर्शन किया है, पर ऐसा करके उसने अपने संसाधनों को बर्बाद भी किया है। सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि रूसी हथियारों की सप्लाई कम हो रही है। उसके संसाधनों की भी एक सीमा है। लड़ाई के लंबा खिंचने से जटिलताएं बढ़ रही हैं। रूस के भीतर भी असंतोष बढ़ रहा है।

Friday, October 14, 2022

अंग्रेजी भाषायी साम्राज्यवाद से बचने की जरूरत


भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा-2

आजादी के 75 साल बाद भी यदि मैं आपको सुझाव दूँ कि अंग्रेजी साम्राज्यवाद की दासता छोड़ें, तो आपको हैरत होगी। काफी लोग समझते हैं कि ब्रिटिश सरकार का शासन तो गया। वस्तुतः जब आप अंग्रेजी भाषा की शिक्षा को ज्ञान-विज्ञान की भाषा मानते हुए आगे बढ़ते हैं, तब यह सवाल पैदा होता है कि उच्च शिक्षा या ज्ञान-विज्ञान का माध्यम भारतीय भाषाएं क्यों न बनें? भारत में अंग्रेजी का स्तर दुनिया के बहुत से गैर-अंग्रेजी देशों से बेहतर है, इसमें दो राय नहीं, पर क्या केवल इसी वजह से हमें अपनी शिक्षा-व्यवस्था को अंग्रेजी के हवाले कर देना चाहिए? हमने भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा के बारे में क्यों नहीं सोचा? इसके भी दो-तीन बड़े कारण हैं। एक तो भारतीय भाषाओं में विज्ञान और तकनीकी साहित्य की कमी और इनके माध्यम से शिक्षा प्रदान करने वाली व्यवस्थाओं की अनुपस्थिति।

माना यह भी जाता है कि हम अंग्रेजी में शिक्षा पाने के बाद वैश्विक समुदाय के बराबर आ जाते हैं और वैश्विक विद्वानों से हमारा संवाद आसानी से संभव है। हमारी तुलना में चीन जैसे देशों को दिक्कत होती है। पर क्या चीन का अकादमिक स्तर हम से कम है? हम से कम नहीं हमसे बेहतर ही है। हमें अपने सॉफ्टवेयर कार्यक्रम पर गर्व है, क्योंकि उसमें अंग्रेजी की सहायता हमें मिली। पर सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में भी चीन हमसे पीछे नहीं है। फर्क केवल यह है कि हम पश्चिमी देशों के लिए सॉफ्टवेयर का काम करते हैं और चीन अपने आंतरिक कार्यों के लिए सॉफ्टवेयर बनाता है।

आप अपने मोबाइल फोनों को देखें, तो पाएंगे कि चीनी सॉफ्टवेयर गेमिंग और मनोरंजन से जुड़े सॉफ्टवेयरों में भी काफी आगे हैं। मेडिकल साइंस, नाभिकीय ऊर्जा और अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़े तमाम शोध वे अपनी भाषा में ही करते हैं। यही बात जापान, कोरिया और इसरायल जैसे देशों पर लागू होती है। यूरोप के गैर-अंग्रेजी भाषी देशों की बात करना उचित नहीं होगा, क्योंकि उनकी भाषाएं पहले से काफी समृद्ध हैं।

भारत की समस्या राजनीतिक है, जिसके पीछे सामाजिक-सांस्कृतिक बहुलता को बड़ा कारक माना जाता है। माना जाता है कि अंग्रेजी हमें जोड़ती है। देश के सभी इलाके के लोगों को अंग्रेजी स्वीकार्य है। ऐसी कोई भारतीय भाषा नहीं है, जो पूरे देश को जोड़ती हो और जिसे पूरा देश स्वीकार करता हो। यह बात एक हद तक सही है, पर पूरी तरह सही नहीं है। देश के स्वतंत्रता संग्राम की भाषा काफी हद तक हिंदी या हिंदुस्तानी थी, अंग्रेजी नहीं। महात्मा गांधी ने भारत आने से पहले दक्षिण अफ्रीका से अपना अखबार शुरू किया तो उसमें अंग्रेजी के अलावा गुजराती हिन्दी और तमिल का इस्तेमाल भी किया और भारत आने बाद तो देशभर में जनता के बीच वे हिंदी या हिंदुस्तानी का इस्तेमाल ही करते थे।

Thursday, October 13, 2022

क्या भारतीय भाषाओं में पढ़ाई की पहल को हिंदी थोपना माना जाए?


भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा-1

हिंदी को लेकर दक्षिण के दो राज्यों ने विरोध का झंडा फिर उठाया है। पहले तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने और बाद में केरल के मुख्यमंत्री  पिनाराई विजयन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है। केरल के मुख्यमंत्री ने लिखा है कि राजभाषा को लेकर बनी संसदीय समिति की सिफारिशों को केरल स्वीकार नहीं करेगा। किसी एक भाषा को दूसरों से ऊपर बढ़ावा देना अखंडता को नष्ट कर देगा। इस मामले में उन्होंने प्रधानमंत्री से दखल देने की मांग की है।

इसके पहले तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने कहा था कि हिंदी थोपकर केंद्र सरकार को एक और भाषा युद्ध की शुरुआत नहीं करनी चाहिए। हिंदी को अनिवार्य बनाने के प्रयास छोड़ दिए जाएं और देश की अखंडता को कायम रखा जाए। दोनों नेताओं ने यह बातें राजभाषा पर संसदीय समिति के अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को हाल में सौंपी गई एक रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया में कहीं।

संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में आईआईटी, आईआईएम, एम्स, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और केंद्रीय विद्यालयों में हिंदी को भी माध्यम बनाने की सिफारिश की है। स्टालिन ने कहा कि संविधान की आठवीं अनुसूची में तमिल समेत 22 भाषाएं हैं। इनके समान अधिकार हैं। कुछ समय पहले स्टालिन ने कहा था कि हमें हिंदी दिवस की जगह भारतीय भाषा दिवस मनाना चाहिए। साथ ही ‘केंद्र को संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज सभी 22 भाषाओं को आधिकारिक भाषा घोषित कर देना चाहिए। हिंदी न तो राष्ट्रीय भाषा है और न ही इकलौती राजभाषा।

स्टालिन ने कहा कि हिंदी की तुलना में दूसरी भाषाओं के विकास पर बहुत कम संसाधन खर्च किए जाते हैं। केंद्र को इस फर्क को कम करना चाहिए। स्टालिन ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत सिर्फ हिंदी और संस्कृत को ही बढ़ावा देने का आरोप भी केंद्र सरकार पर लगाया था।’

उधर हाल में अमित शाह ने सूरत में 14 सितंबर को हिंदी दिवस के मौके पर अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में अमित शाह ने कहा था, ‘मैं एक बात साफ कर देना चाहता हूं। कुछ लोग गलत जानकारी फैला रहे हैं कि हिंदी और गुजराती, हिंदी और तमिल, हिंदी और मराठी प्रतिद्वंद्वी हैं। हिंदी कभी किसी भाषा की प्रतिद्वंद्वी नहीं हो सकती है। हिंदी देश की सभी भाषाओं की दोस्त है।

हिंदी-विरोध

हर साल हम 14 सितंबर को हिंदी दिवस इसलिए मनाते हैं, क्योंकि 14 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा बनाने का फैसला किया था। पिछले कुछ वर्षों से 14 सितंबर को इंटरनेट पर #StopHindiImposition (हिंदी थोपना बंद करो) जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे हैं। 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस के नेता सिद्धारमैया ने कन्नड़-गौरव, हिंदी-विरोध और उत्तर-दक्षिण भावनाओं को भड़काने सहारा लेकर कन्नड़-प्रेमियों का समर्थन हासिल करने का प्रयास किया। बेंगलुरु में मेट्रो स्टेशनों के हिंदी में लिखे नाम मिटाए गए और अंततः हिंदी नाम पूरी तरह हटा दिए गए। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस तीन भाषा सूत्र की समर्थक है, पर बेंगलुरु मेट्रो में हिंदी-विरोध का उसने समर्थन किया।

हिंदी के प्रयोग को लेकर कुछ गैर-हिंदी राज्यों में आंदोलन चलाया जाता है। इस आंदोलन को अंग्रेजी मीडिया हवा देता है। कुछ समय पहले दक्षिण भारत में राष्ट्रीय राजमार्गों के नाम-पटों में हिंदी को शामिल करने के विरोध में आंदोलन खड़ा हुआ था। राम गुहा और शशि थरूर जैसे लोगों ने बेंगलुरु मेट्रो-प्रसंग में हिंदी थोपे जाने का विरोध किया। मेरी नज़र में यह एक तरह से भारतीय भाषाओं को आपस में लड़ाने की कोशिश है, साथ ही अंग्रेजी के ध्वस्त होते किले को बचाने का प्रयास भी। चूंकि इस समय इस कार्यक्रम को भारतीय जनता पार्टी की सरकार आगे बढ़ा रही है, इसलिए इसे राजनीतिक रंग देकर सामाजिक-टकराव वगैरह के रूप में भी देखा जा रहा है, हालांकि यह विरोध काफी पहले से चल रहा है और 1965 से तमिलनाडु में यह राजनीतिक पैंतरे का रूप ले चुका है।

Wednesday, October 12, 2022

चीन की रहस्यमय राजनीति पर एक नज़र


सितंबर के आखिरी हफ्ते में सोशल मीडिया पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के तख़्तापलट की अफवाह फैली थी. इस अफवाह के पीछे चीन के ही नाराज़ लोग थे, जो भागकर अमेरिका या दूसरे देशों में रहते हैं. अफवाह इतनी तेजी से फैली कि वह ट्विटर की ट्रेंडिंग सूची में शामिल हो गई. इसे गति प्रदान करने में भारतीय ट्विटर हैंडलों की भी भूमिका थी.

महत्व उस अफवाह का नहीं, समय का था, जब यह अफवाह फैली. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं कांग्रेस 16 अक्तूबर को शुरू होने जा रही है. इसमें दूसरे महत्वपूर्ण फैसलों के अलावा शी चिनफिंग को तीसरी बार पार्टी महासचिव और देश का राष्ट्रपति चुनने की तैयारी है. ऐसे सवाल अपनी जगह पर हैं कि शी ताकतवर हो रहे हैं या कमज़ोर, और चीन किस दिशा में जा रहा है?

असमंजस और असंतोष

चीन में आय की असमानता को लेकर असंतोष है. पूँजीवादी रीति-नीति अपनाने के कारण कई प्रकार के अंतर्विरोध उभर कर आए हैं. आर्थिक मंदी के बादल भी मंडरा रहे हैं. विदेश-नीति को लेकर सवाल हैं. भले ही शी चिनफिंग का कार्यकाल बढ़ जाएगा, पर उनके उत्तराधिकारी और भविष्य के नेतृत्व की संभावनाओं के लिहाज से भी यह कांग्रेस महत्वपूर्ण है. इसलिए शी चिनफिंग के उद्घाटन भाषण को गौर से सुनना होगा. 

तमाम बड़े फैसले पार्टी कांग्रेस के पहले ही कर लिए जाते हैं, पर सम्मेलन का महत्व है, क्योंकि वहाँ फैसलों को औपचारिक रूप दिया जाता है और उनकी घोषणा की जाती है. दूसरे नम्बर की आर्थिक महाशक्ति जो सामरिक ताकत से लेकर ओलिम्पिक खेलों के मैदान तक अपना झंडा गाड़ चुकी है, अपने राजनीतिक नेतृत्व की अगली पीढ़ी को किस प्रकार आगे लाएगी या किस प्रकार पुराने नेतृत्व में से कुछ को विश्राम देगी, यह इस सम्मेलन में देखने को मिलेगा.

शिखर नेतृत्व

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ही चीन का लोकतंत्र है. इसके सदस्यों की संख्या नौ करोड़ से ज्यादा है. पिरैमिड जैसी इसकी संरचना में सबसे महत्वपूर्ण है शिखर यानी 25 सदस्यों का पोलित ब्यूरो. इसमें सैनिक अधिकारी, केंद्रीय और प्रांतों के नेता शामिल होते हैं. इन 25 के बीच चुनींदा सात सदस्यों की स्थायी समिति होती है, जो सीधे तौर पर बड़े फैसले करती है. इनमें ही राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री होते हैं.

जयशंकर ने कहा, पश्चिम ने हमें रूस की ओर धकेला


भारत के विदेशमंत्री एस जयशंकर ने हाल में अपनी अमेरिका-यात्रा के दौरान कुछ कड़ी बातें सही थीं। वे बातें अनायास नहीं थीं। पृष्ठभूमि में जरूर कुछ चल रहा था, जिसपर से परदा धीरे-धीरे हट रहा है। यूक्रेन पर रूसी हमले को लेकर भारतीय नीति से अमेरिका और यूरोप के देशों की अप्रसन्नता इसके पीछे एक बड़ा कारण है। अमेरिका ने पाकिस्तान को एफ-16 विमानों के लिए उपकरणों को सप्लाई करके इसे प्रकट कर दिया और अब जर्मन विदेशमंत्री के एक बयान से इस बात की पुष्टि भी हुई है।

अमेरिका और जर्मन सरकारों की प्रतिक्रियाओं को लेकर भारतीय विदेशमंत्री ने गत सोमवार और मंगलवार को फिर करारे जवाब दिए हैं। उन्होंने सोमवार 10 अक्तूबर को ऑस्ट्रेलिया में एक प्रेस-वार्ता को दौरान कहा कि हमारे पास रूसी सैनिक साजो-सामान होने की वजह है पश्चिमी देशों की नीति।

स्वतंत्र विदेश-नीति

अपनी विदेश-नीति की स्वतंत्रता को साबित करने के लिए भारत लगातार ऐसे वक्तव्य दे रहा है, जिनसे महाशक्तियों की नीतियों पर प्रहार भी होता है। उदाहरण के लिए भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में रूस यूक्रेन युद्ध से जुड़े एक ड्राफ्ट पर पब्लिक वोटिंग के पक्ष में मतदान किया है। यह ड्राफ्ट यूक्रेन के चार क्षेत्रों को मॉस्को द्वारा अपना हिस्सा बना लिए जाने की निंदा से जुड़ा है। इस प्रस्ताव पर भारत समेत 100 से ज्यादा देशों ने सार्वजनिक रूप से मतदान करने के पक्ष में वोट दिया है, जबकि रूस इस मसले पर सीक्रेट वोटिंग कराने की मांग कर रहा था।

जयशंकर ने यह भी साफ कहा कि आम नागरिकों की जान लेना भारत को किसी भी तरह स्वीकार नहीं है। उन्होंने रूस और यूक्रेन, दोनों से आपसी टकराव को कूटनीति व वार्ता के जरिए सुलझाने की राह पर लौटने की सलाह दी है।

भारत इससे पहले यूक्रेन युद्ध को लेकर संरा महासभा या सुरक्षा परिषद में पेश होने वाले प्रस्तावों पर वोटिंग के दौरान अनुपस्थित होता रहा है। इस बार भी निंदा प्रस्ताव के मसौदे पर मतदान को लेकर भारत ने अपना रुख स्पष्ट नहीं किया था। विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा था कि यह विवेक और नीति का मामला है, हम अपना वोट किसे देंगे, यह पहले से नहीं बता सकते। हालांकि विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने सोमवार को ही कहा था कि रूस-यूक्रेन के बीच तनाव घटाने वाले सभी प्रयासों का समर्थन करने के लिए भारत हमेशा तैयार है।

पश्चिम की नीतियाँ

एस जयशंकर ने सोमवार को ऑस्ट्रेलिया में कहा कि पश्चिमी देशों ने दक्षिण एशिया में एक सैनिक तानाशाही को सहयोगी बनाया था। दशकों तक भारत को कोई भी पश्चिमी देश हथियार नहीं देता था। ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री पेनी वॉन्ग के साथ प्रेस-वार्ता में जयशंकर ने कहा कि रूस के साथ रिश्तों के कारण भारत के हित बेहतर ढंग से निभाए जा सके।

Sunday, October 9, 2022

वैश्विक मंदी की छाया में भारत


ब्रिटिश साप्ताहिक ‘इकोनॉमिस्ट’ ने कहा है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था करवट ले रही है। मुद्रास्फीति ने दुनियाभर के अर्थशास्त्रियों का ध्यान खींचा है। वैश्विक मुद्रास्फीति 9.8 प्रतिशत हो गई है। अभी तक इसका आसान हल माना जाता है ब्याज दरों को बढ़ाना, पर यह कदम मंदी को बढ़ा रहा है। केंद्रीय बैंकों को मॉनिटर करने वाली एक संस्था ने पाया है कि जिन 38 बैंकों का उसने अध्ययन किया उनमें से 33 ने इस साल ब्याज दरें बढ़ाई हैं। आईएमएफ ने भी चेतावनी दी है कि देशों की सरकारें महंगाई को रोकने में नाकाम रहीं तो दुनियाभर में आर्थिक मंदी का खतरा है। दूसरी तरफ अर्थशास्त्री मानते हैं कि यह नीति चलेगी नहीं। अमेरिकी फेडरल बैंक दरें बढ़ा रहा है, जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है।

भारत पर असर

भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर पिछले दो हफ्तों की खबरें इस बात की पुष्टि कर रही हैं। रिज़र्व बैंक ने रेपो रेट बढ़ाया है, जिससे ब्याज की दरें बढ़ेंगी। ज्यादातर संस्थाओं ने भारतीय जीडीपी के अपने अनुमानों को घटाना शुरू कर दिया है। रुपये की कीमत गिर रही है और विदेशी मुद्रा भंडार कम हो रहा है। कोविड-19 का असर पहले से था, अब यूक्रेन की लड़ाई ने ‘कोढ़ में खाज’ पैदा कर दिया है। पेट्रोलियम की कीमतें गिरने लगी थीं, पर इस गिरावट को रोकने के लिए ओपेक और उसके सहयोगी संगठनों ने उत्पादन में कटौती का फैसला किया है। इसका असर अब आप देखेंगे। 

मुद्रास्फीति

इस महीने का डेटा अभी आया नहीं है, पर सितंबर के डेटा के अनुसार अगस्त में भारत की खुदरा मुद्रास्फीति की दर बढ़कर 7 फीसदी हो गई, जो जुलाई में 6.71 प्रतिशत और पिछले साल अगस्त में 5.3 प्रतिशत थी। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन ने हाल में उम्मीद जाहिर की थी, यह दर गिरकर 6 फीसदी से नीची हो जाएगी, पर उनका अनुमान गलत साबित हुआ। जुलाई के महीने में देश का खुदरा मूल्य सूचकांक (सीपीआई-सी) 6.71 हो गया था, जो पिछले पाँच महीनों में सबसे कम था। अच्छी संवृद्धि और मुद्रास्फीति में क्रमशः आती गिरावट से उम्मीदें बढ़ी थीं, पर अब कहानी बदल रही है। लगता है कि रिजर्व बैंक को पहले महंगाई से लड़ना होगा।

जीडीपी संवृद्धि

गुरुवार 6 अक्तूबर को विश्व बैंक ने चालू वित्तीय वर्ष के लिए भारतीय जीडीपी की संवृद्धि के 7.5 फीसदी के अपने अनुमान में एक फीसदी की कटौती करते हुए उसे 6.5 प्रतिशत कर दिया है। रिज़र्व बैंक ने 7.2 फीसदी से घटाकर 7 फीसदी कर दिया है। सबसे कम अनुमान अंकटाड का 5.7 फीसदी है। दूसरी तरफ मूडीज़ ने हाल में 7.7 फीसदी अनुमान लगाया था, जो इन सबसे ज्यादा है। विश्व बैंक ने यह भी कहा है कि शेष दुनिया से भारत की स्थिति बेहतर रहेगी। भारत में अधिक बफर हैं, विशेष रूप से केंद्रीय बैंक में बड़े भंडार हैं। बैंक के दक्षिण एशिया से संबद्ध मुख्य अर्थशास्त्री हैंस टिमर के मुताबिक, भारत पर कोई बड़ा विदेशी कर्ज नहीं है। उसकी मौद्रिक नीति विवेकपूर्ण रही है। इसके बावजूद हमने अनुमान को घटाया है, क्योंकि वैश्विक माहौल बिगड़ रहा है। उधर भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन मानते हैं कि हम अब भी 7 फ़ीसदी की रेस में शामिल है। ऐसे दौर में जब दुनिया के तमाम देशों की जीडीपी ग्रोथ निगेटिव होने की आशंका है ऐसे में भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए 7 फ़ीसदी ग्रोथ रेट शानदार प्रदर्शन होगा।

Friday, October 7, 2022

कितनी मजबूत है कांग्रेस की धुरी?


नाटकीयता भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा गुण है। नरेंद्र मोदी की सफलता के पीछे नाटकीयता की बड़ी भूमिका है। मुलायम सिंह के बाद अखिलेश के ताकतवर बनने का मौका नाटकीय घटनाक्रम से भरा रहा। इस राजनीतिक-नाटकीयता के जन्म का श्रेय भी कांग्रेस को ही जाता है। स्वतंत्रता के पहले गांधी और सुभाष, स्वतंत्रता के बाद नेहरू और टंडन, फिर 1969 के राष्ट्रपति चुनाव में नाटकीयता चरम पर थी। 1998 में सीताराम केसरी को नाटकीय परिस्थितियों में हटाकर ही सोनिया गांधी आई थीं।
 

अब कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव के मौके पर परिस्थितियों ने नाटकीय मोड़ ले लिया। शुरुआत अशोक गहलोत के प्रत्याशी बनने की संभावनाओं और फिर उनके समर्थकों की बगावत से हुई। पार्टी हाईकमान और अशोक गहलोत दोनों एक तीर से दो निशाने लगा रहे थे। हाईकमान को लगा कि गहलोत को जयपुर से हटाकर दिल्ली बैठाने से सचिन पायलट को काम मिल जाएगा। गहलोत की योजना थी कि दिल्ली जाएंगे, पर जयपुर में अपना कोई बंदा बैठाएंगे। सचिन पायलट की कहानी शुरू नहीं होने देंगे।

गहलोत प्रकरण फिलहाल पृष्ठभूमि में चला गया है, पर यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि वह खत्म हो गया है। इसका दूसरा अध्याय पार्टी अध्यक्ष के चुनाव के बाद शुरू होगा। फिलहाल देखें कि नए अध्यक्ष के चुने जाने की औपचारिक घोषणा होने के पहले या बाद में नाटकीय परिस्थितियों की गुंजाइश है या नहीं?  पर उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह समझना है कि नया पार्टी अध्यक्ष 2024 के चुनाव में पार्टी की संभावनाओं को बेहतर करने में मददगार होगा या नहीं

Thursday, October 6, 2022

भारत-अमेरिका: ‘तलवार की धार पर’ दौड़ते रिश्ते


हाल में भारत के विदेशमंत्री एस जयशंकर ने अपनी 11 दिन की अमेरिका के दौरान दो तरह के बयान दिए. विदेशमंत्री एंटनी ब्लिंकेन के साथ बातचीत में उन्होंने कहा, भारत-अमेरिका रिश्तों को लेकर मैं बहुत ज्यादा आशावान हूँ. उसके एक दिन पहले उन्होंने पत्रकारों से बातचीत के दौरान एफ-16 विमानों के रख-रखाव के सिलसिले में पाकिस्तान को दिए गए अमेरिकी पैकेज की आलोचना की.


जयशंकर क्या संशय में थे? या इसे भारतीय डिप्लोमेसी का नया आक्रामक अंदाज़ मानें?  डिप्लोमेसी में कोई बात यों ही नहीं कही जाती. जयशंकर का यह दौरा बेहद व्यस्त रहा. उन्होंने न केवल अमेरिका के नेताओं से संवाद किया, साथ ही दूसरे देशों के कम से कम 40 महत्वपूर्ण व्यक्तियों के साथ बैठकें कीं.

यह बात भारत के महत्व को रेखांकित करती हैं. भू-राजनीतिक, सामरिक और आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए दुनिया को भारत की अहमियत को स्वीकार करना ही होगा, पर अंतर्विरोधों से भी इनकार नहीं किया जा सकता.

भारतीय कंपनी पर प्रतिबंध

जयशंकर की यात्रा के फौरन बाद अमेरिका ने पेट्रोलियम का कारोबार करने वाली मुंबई की एक कंपनी पर प्रतिबंध लगाए हैं, जिसपर आरोप है कि उसने ईरानी पेट्रोलियम खरीद कर चीन को उसकी सप्लाई की. हाल के वर्षों में यह पहला मौका है, जब अमेरिका ने किसी भारतीय कंपनी पर प्रतिबंध लगाए हैं.

हमारी विदेश-नीति अमेरिका और रूस के रिश्तों को लेकर तलवार की धार पर चलती नज़र आती है. कभी लगता है कि रूस और अमेरिका के बीच संतुलन बैठाने के फेर में नैया डगमगा रही है. दूसरी तरफ भारत के महत्व को रेखांकित करने, गुटों या देशों के दबाव से खुद को मुक्त करने और अपने हितों से जुड़ाव को व्यक्त करने की इस प्रवृत्ति को हम जयशंकर के बयानों में पढ़ सकते हैं.

Saturday, October 1, 2022

बंद होना चाहिए नफ़रती बहसों का ज़हरीला कारोबार

मीडिया की सजगता या अतिशय सनसनी फैलाने के इरादों के कारण पिछले कुछ महीनों से देश में जहर-बुझे बयानों की झड़ी लग गई। अक्सर लोग इसे अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानते हैं, पर जब यह सुरुचि और स्वतंत्रता का दायरा पार कर जाती है, तब उसे रोकने की जरूरत होती है। हेट स्पीच का नवीनतम सुप्रीम कोर्ट से आया है। अदालत ने काफी कड़े शब्दों में चैनलों के एंकरों को फटकार लगाई है और इससे जुड़े सभी पक्षों से कहा है कि वे रास्ता बताएं कि किस तरह से इस आग को बुझाया जाए।

हालांकि देश में आजादी के पहले से ऐसे बयानों का चलन रहा है, पर 1992 में बाबरी विध्वंस के कुछ पहले से इन बयानों ने सामाजिक जीवन के ज्यादा बड़े स्तर पर प्रभावित किया है। इस परिघटना के समांतर टीवी का प्रसार बढ़ा और न्यूज़ चैनलों ने अपनी टीआरपी और कमाई बढ़ाने के लिए इस ज़हर का इस्तेमाल करना शुरू किया है। नब्बे के दशक में लोग गलियों-चौराहों और पान की दुकानों ज़हर बुझे भाषणों के टेपों को सुनते थे। विडंबना है कि हेट स्पीच रोकने के लिए देश में तब भी कानून थे और आज भी हैं, पर किसी को सजा मिलते नहीं देखा गया है।

सब मूक-दर्शक

गत 21 सितंबर को जस्टिस केएम जोसफ और जस्टिस हृषीकेश रॉय की बेंच ने हेट-स्पीच से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह एंकर की जिम्मेदारी है कि वह किसी को नफरत भरी भाषा बोलने से रोके। बेंच ने पूछा कि इस मामले में सरकार मूक-दर्शक क्यों बनी हुई है, क्या यह एक मामूली बात है? यही प्रश्न दर्शक के रूप में हमें अपने आप से भी पूछना चाहिए। यदि यह महत्वपूर्ण मसला है, तो टीवी चैनल चल क्यों रहे हैं? हम क्यों उन्हें बर्दाश्त कर रहे हैं? मूक-दर्शकतो हम और आप हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि सामान्य नागरिकों के भीतर चेतना का वह स्तर नहीं है, जो विकसित लोकतंत्र में होना चाहिए।

सुरक्षा परिषद में रूस का वीटो

 


रूस ने शुक्रवार को सुरक्षा परिषद में प्रस्तुत एक प्रस्ताव को वीटो कर दिया है जिसमें यूक्रेन के चार क्षेत्रों को अपनी सीमाओं में मिलाने के प्रयासों को अवैध क़रार दिया गया है. प्रस्ताव में रूस की इस कार्रवाई को “अन्तरराष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा के लिये एक ख़तरा” बताया गया है और इस निर्णय को तत्काल व बिना शर्त पलटने की माग भी की गई है.

 रूस ने यूक्रेन में पहले से ही अपने क़ब्ज़े वाले चार क्षेत्रों को, औपचारिक रूप से रूस के क्षेत्र में मिलाने की घोषणा करने के लिये, शुक्रवार को, राजधानी मॉस्को में एक समारोह भी आयोजित किया.

 सूरक्षा परिषद इस प्रस्ताव का प्रारूप संयुक्त राज्य अमेरिका और यूक्रन ने वितरित किया था, जिसे 15 में से 10 सदस्यों का समर्थन हासिल हुआ, रूस ने इस प्रस्ताव पर वीटो किया.

 चार सदस्यों – ब्राज़ील, चीन, गैबॉन और भारत ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया.

Monday, September 26, 2022

यूक्रेन में लड़ाई और भड़कने का अंदेशा


वैश्विक राजनीति का घटनाक्रम तेजी से बदल रहा है. गत 16 सितंबर को समरकंद में हुए एससीओ शिखर सम्मेलन में नरेंद्र मोदी और व्लादिमीर पुतिन के बीच हुए संवाद से लगा था कि शायद यूक्रेन का युद्ध जल्द समाप्त हो जाएगा. पर उसके बाद
पुतिन के बयान और पश्चिमी देशों के तुर्की-ब-तुर्की जवाब से लग रहा है कि लड़ाई बढ़ेगी.

अब व्लादिमीर पुतिन ने अपने राष्ट्रीय प्रसारण में देश में आंशिक लामबंदी की घोषणा की है और एटमी हथियारों के इस्तेमाल की बात को दोहराया है. बुधवार 21 सितंबर को उन्होंने  कहा कि पश्चिम रूस को ब्लैकमेल कर रहा है, लेकिन रूस के पास जवाब देने के लिए कई हथियार हैं. हम अपने नागरिकों की रक्षा के लिए हरेक हथियार का इस्तेमाल करेंगे. रूसी जनता के समर्थन में मुझे पूरा भरोसा है.

सिर्फ भभकी

दूसरी तरफ यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की का कहना है कि हमें नहीं लगता कि रूस परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करेगा. ज़ेलेंस्की ने जर्मनी के बिल्ड न्यूज़पेपर के टीवी कहा,  मुझे नहीं लगता कि दुनिया उन्हें परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की इजाजत देगी.

पुतिन के इस बयान पर जहां दुनिया भर के नेताओं ने टिप्पणी की है वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा परिषद में कहा कि रूस यूक्रेन के एक देश के रूप में बने रहने के उसके अधिकारों को ख़त्म करने का लक्ष्य बना रहा है. रूसी हमले के विरोध में हम यूक्रेन के साथ खड़े हैं. बाइडन ने सुरक्षा परिषद में वीटो के इस्तेमाल पर रोक लगाने की बात भी कही और साथ ही कहा कि अमेरिका सुरक्षा परिषद में सदस्यों की संख्या बढ़ाने का समर्थन करता है.

थक रहा है रूस

यह भी लगता है कि इस लड़ाई में रूस थक गया है, पर अपमान का घूँट पीने को भी वह तैयार नहीं है. दूसरी तरफ उसे मिल रहे चीनी-समर्थन में कमी आ गई है. इस साल जनवरी-फरवरी में रूस-चीन रिश्ते आसमान पर थे, तो वे अब ज़मीन पर आते दिखाई पड़ रहे हैं.

Sunday, September 25, 2022

भिंडी-बाजार क्यों बने टीवी स्टूडियो?


सुप्रीम कोर्ट ने इस हफ्ते एक ऐसे मसले को उठाया है, जिसपर बातें तो लगातार हो रही हैं, पर व्यवहार में कुछ हो नहीं रहा है। अदालत ने हेट-स्पीच से भरे टॉक शो और रिपोर्टों को लेकर टीवी चैनलों को फटकार लगाई है। गत 21 सितंबर को जस्टिस केएम जोसफ और जस्टिस हृषीकेश रॉय की बेंच ने हेट-स्पीच से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह एंकर की जिम्मेदारी है कि वह किसी को नफरत भरी भाषा बोलने से रोके। बेंच ने पूछा कि इस मामले में सरकार मूक-दर्शक क्यों बनी हुई है, क्या यह एक मामूली बात है? यही प्रश्न दर्शक के रूप में हमें अपने आप से भी पूछना चाहिए। यदि यह महत्वपूर्ण मसला है, तो टीवी चैनल चल क्यों रहे हैं? हम क्यों उन्हें बर्दाश्त कर रहे हैं? मूक-दर्शकतो हम और आप हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि सामान्य नागरिकों के भीतर चेतना का वह स्तर नहीं है, जो विकसित लोकतंत्र में होना चाहिए।

मीडिया की आँधी

चौराहों, नुक्कड़ों और भिंडी-बाजार के स्वर और शब्दावली विद्वानों की संगोष्ठी जैसी शिष्ट-सौम्य नहीं होती। पर खुले गाली-गलौज को तो मछली बाजार भी नहीं सुनता। वह भाषा सोशल मीडिया में पहले प्रवेश कर गई थी, अब मुख्यधारा के मीडिया में भी सुनाई पड़ रही है। मीडिया की आँधी ने सूचना-प्रसारण के दरवाजे भड़ाक से  खोल दिए हैं। बेशक इसके साथ ही तमाम ऐसी बातें सामने आ रहीं हैं, जो हमें पता नहीं थीं। कई प्रकार के सामाजिक अत्याचारों के खिलाफ जनता की पहलकदमी इसके कारण बढ़ी है, पर सकारात्मक भूमिका के मुकाबले उसकी नकारात्मक भूमिका चर्चा में है। हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हामी हैं, पर नहीं जानते कि इससे जुड़ी मर्यादाएं भी हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंदिश लगाने के जोखिम भी हैं।

अभिव्यक्ति की आज़ादी

अदालत ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जरूरी है, लेकिन टीवी पर अभद्र भाषा बोलने की आजादी नहीं दी जा सकती है। संविधान के अनुच्छेद 19(1) ए के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता असीम नहीं है। उसपर विवेकशील पाबंदियाँ हैं। सिनेमाटोग्राफिक कानूनों के तहत सेंसरशिप की व्यवस्था भी है। पर समाचार मीडिया को लाइव प्रसारण की जो छूट मिली है, उसने अति कर दी है। टीवी मीडिया और सोशल मीडिया बिना रेग्युलेशन के काम कर रहे हैं। उनका नियमन होना चाहिए। इन याचिकाओं पर अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी। कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया है कि वह स्पष्ट करे कि क्या वह हेट-स्पीच पर अंकुश लगाने के लिए विधि आयोग की सिफारिशों पर कार्रवाई करने का इरादा रखती है।

परिभाषा नहीं

देश में हेट-स्पीच से निपटने के लिए कई तरह के कानूनों का इस्तेमाल होता है, पर किसी में हेट-स्पीच को परिभाषित नहीं किया गया है। केंद्र सरकार अब पहले इसे परिभाषित करने जा रही है। विधि आयोग की सलाह है कि जरूरी नहीं कि सिर्फ हिंसा फैलाने वाली स्पीच को हेट-स्पीच माना जाए। इंटरनेट पर पहचान छिपाकर झूठ और आक्रामक विचार आसानी से फैलाए जा रहे हैं। ऐसे में भेदभाव बढ़ाने वाली भाषा को भी हेट-स्पीच के दायरे में रखा जाना चाहिए। सबसे ज्यादा भ्रामक जानकारियां फेसबुक, ट्विटर और वॉट्सएप जैसे प्लेटफॉर्मों के जरिए फैलती हैं। इनके खिलाफ सख्त कानून बनने से कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुलेगा, पर फ्री-स्पीच के समर्थक मानते हैं कि एंटी-हेट-स्पीच कानून का इस्तेमाल विरोधियों की आवाज दबाने के लिए किया जा सकता है।

Sunday, September 18, 2022

लाइक करवा लो!

फेसबुक, ट्विटर और दूसरे सोशल मीडिया पर लाइक के बटन का मतलब है बात अच्छी लगी। फेसबुक लेखक अपनी पोस्ट पर विपरीत टिप्पणियाँ पसंद नहीं करते, लाइक पसंद करते हैं। इसकी वजह से अक्सर 'लाइक-बटोर लेखकों' के बीच प्रतियोगिता चलती रहती है।

'लाइक-सहयोग समझौतों' का चलन भी है। तू मेरी लाइक कर मैं तेरी करता हूँ। 'लाइक सहयोग परिषदें' और 'लाइक-मंडलियाँ' बन गईं हैं। अलाँ-फलाँ-लाइक संघ। अलाँ-फलाँ जैकारा समाज। अलाँ-फलाँ गरियाओ समाज भी है।

जब लाइक-प्रिय लेखक को पर्याप्त लाइक नहीं मिलते तो वह अपने भक्तों को ब्लॉक करने की धमकी देने लगता है। लाइक में गुण बहुत हैं। किसी को खुश करना है तो उसकी अल्लम-गल्लम को लाइक कर दीजिए। नाराज़ करना है तो उसकी 'महान-रचना' की अनदेखी कर दीजिए।

एक नया 'लाइक समुदाय' पैदा हो गया है। फेसबुक साहित्य की इस प्रवृत्ति को देखते हुए हिंदी विभागों को चाहिए कि लाइक की अधुनातन प्रवृत्तियों पर शोध कराएं। 'इक्कीसवीं सदी के दशोत्तरी पोस्ट लेखन में लाइक-प्रवणता: झुमरी तलैया के दस फेसबुक लेखकों का एक तुलनात्मक अध्ययन।'

कई साल पहले लिखी यह पोस्ट मामूली संशोधन के साथ फिर से लगा दी है, क्योंकि प्रासंगिक लग रही है। मैं इसमें दो बातें और जोड़ना चाहता हूँ। मैंने कई साल पहले जब यह पोस्ट लिखी थी, तब लाइक के साथ हँसने वाले इमोजी नहीं लगते थे। अब लगने लगे हैं।

इसे पढ़े-लिखों यानी अंग्रेजी के जानकारों की भाषा में lol कहते हैं। आँसू बहाने वाला भी है। यानी कि अब यह केवल इस बात की रसीद नहीं है कि पढ़ लिया या देख लिया। अब का मामला है कि मजा आ गया, परेशान हैं या दुखी हो गए।

फेसबुक और ट्विटर ने अभी तक ऐसा बटन नहीं बनाया है कि बहुत वाहियात बात लिख दी। सत्यानाश हो तेरा वगैरह। बनाया होता, तो न जाने क्या हो जाता। अलबत्ता आज के मार्केटिंग युग में ये लाइक टीआरपी की तरह आपकी बिक्री का पता भी देते हैं। कितना माल उठा?

शायद मंदी का पता भी इसी से लगता है। इस पोस्ट को फेसबुक पर लगाया, तो किसी ने अपनी प्रतिक्रिया में ऊपर वाला कार्टून (चप्पल मारूँ क्या?) लगा दिया। यानी इस विषय पर काफी लोग काम कर भी रहे हैं। चप्पल-जूते, थप्पड़ और लातों की जरूरत भी है।