Sunday, March 21, 2021

बीजेपी का अश्वमेध यज्ञ

अगले शनिवार को असम और बंगाल में विधानसभा चुनावों के पहले दौर के साथ देश की राजनीति का रोचक पिटारा खुलेगा। इन दो के अलावा 6 अप्रेल को पुदुच्चेरी, तमिलनाडु और केरल में चुनाव होंगे, जहाँ की एक-एक सीट का राजनीतिक महत्व है। इन पाँचों से कुल 116 सदस्य लोकसभा में जाते हैं, जो कुल संख्या का मोटे तौर पर पाँचवां हिस्सा हैं। यहाँ की विधानसभाएं राज्यसभा में 51 सदस्यों (21%) को भी भेजती हैं।

इस चुनाव को भारतीय जनता पार्टी के अश्वमेध यज्ञ की संज्ञा दी जा सकती है। सन 2019 के चुनाव में हालांकि भारतीय जनता पार्टी को जबर्दस्त सफलता मिली, पर उसे मूलतः हिंदी-पट्टी की पार्टी माना जाता है। पुदुच्चेरी में उसका गठबंधन सत्ता पाने की उम्मीद कर रहा है, जो तमिलनाडु का प्रवेश-द्वार है। पूर्वांचल में उसने असम और त्रिपुरा जैसे राज्यों में पैठ बना ली है, पर उसका सबसे महत्वपूर्ण मुकाबला पश्चिम बंगाल में हैं, जहाँ विधानसभा की कुल 294 सीटें हैं। 2016 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने यहां 211 सीटें जीती थीं। लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन को 70 और बीजेपी को सिर्फ तीन। फिर भी वह मुकाबले में है, तो उसके पीछे कुछ कारण हैं।  

लोकसभा 2019 के चुनाव में भाजपा ने बंगाल में भी झंडे गाड़े। राज्य के तकरीबन 40 फ़ीसदी वोटों की मदद से 18 लोकसभा सीटें उसे हासिल हुईं। तृणमूल ने 43 फ़ीसदी वोट पाकर 22 सीटें जीतीं। दो सीटें कांग्रेस को मिलीं और 34 साल तक बंगाल पर राज करने वाली सीपीएम का खाता भी नहीं खुला। पिछले कई वर्षों से बीजेपी इस राज्य में शिद्दत से जुटी है। अब पहली बार उसकी उम्मीदें आसमान पर हैं। अमित शाह का दावा है, अबकी बार 200 पार। क्या यह सच होगा?

बंगाल का महत्व

बंगाल का महत्व कितना है, इसे समझने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों पर ध्यान दें। गत 18 मार्च को उन्होंने पुरुलिया को संबोधित किया। यह रैली शनिवार 20 मार्च को होनी थी लेकिन इसे दो दिन पहले ही आयोजित कराया गया। 20 मार्च को खड़गपुर में रैली हुई। आज बांकुड़ा में और 24 को कांटी मिदनापुर में रैलियाँ होंगी। पार्टी पहले चरण से ही माहौल बनाने की कोशिश में है। इससे पहले मोदी 7 मार्च को बंगाल आए थे। तब उन्होंने कोलकाता के बिग्रेड मैदान में जनसभा को संबोधित कर ममता पर निशाना साधा था।

Saturday, March 20, 2021

मोदी की बांग्लादेश यात्रा से भी जुड़ा है पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव

पिछले साल मतुआ समाज की बोरो मां वीणापाणि देवी से आशीर्वाद लेते नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले हफ्ते बांग्लादेश की दो दिन की यात्रा पर जा रहे हैं। इस यात्रा का दो देशों के रिश्तों से जितना वास्ता है, उतना ही पश्चिमी बंगाल में हो रहे विधानसभा चुनाव से भी है। हो सकता है कि भविष्य के तीस्ता जैसे समझौतों से भी हो। बांग्लादेश में इस साल मुजीब वर्ष यानी शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है। इसके साथ ही बांग्लादेश की मुक्ति और स्वतंत्रता संग्राम के 50 वर्ष भी इस साल पूरे हो रहे हैं। दोनों देशों के राजनयिक संबंधों के 50 साल भी।

बांग्लादेश में मोदी तुंगीपाड़ा स्थित बंगबंधु स्मारक में जाएंगे। इसके अलावा वे ओराकंडी स्थित हरिचंद ठाकुर के मंदिर में भी जाएंगे। नरेंद्र मोदी 27 मार्च को ओराकंडी में मतुआ मंदिर जाएंगे। यह पहली बार है जब कोई भारतीय प्रधानमंत्री इस मंदिर का दौरा करेगा। वे बारीसाल जिले के शिकारपुर में सुगंध शक्तिपीठ में भी जाएंगे। इसके अलावा वे कुश्तिया में रवीन्द्र कुटी बाड़ी और बाघा जतिन के पैतृक घर में भी जा सकते हैं। इन सभी जगहों का राजनीतिक महत्व है।

ओराकंडी मतुआ समुदाय के गुरु हरिचंद ठाकुर और गुरुचंद ठाकुर का जन्मस्थल है। इसकी स्थापना 1860 में एक सुधार आंदोलन के रूप में की गई थी। इस समुदाय के लोग नामशूद्र कहलाते थे और अस्पृश्य माने जाते थे। हरिचंद ठाकुर ने इनमें चेतना जगाने का काम किया। उनके समुदाय के लोग उन्हें विष्णु का अवतार मानते हैं। मतुआ धर्म महासंघ समाज के दबे-कुचले तबके के उत्थान के लिए काम करता है। 2011 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में कुल आबादी के 23.5 प्रतिशत दलित और 5.8 प्रतिशत आदिवासी हैं। बंगाल के दलित एवं आदिवासी मतुआ धर्म महासंघ के स्वाभाविक समर्थक माने जाते हैं।

उत्तर 24 परगना जिले में बनगांव स्थित मतुआ धर्म महासंघ के मुख्यालय में मतुआ माता वीणापाणि देवी के साथ गत वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैठक की थी। वीणापाणि देवी के दबाव में ही ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार को मतुआ कल्याण परिषद का गठन करना पड़ा। वीणापाणि देवी का गत वर्ष निधन हो गया। अब उनके पुत्र और पौत्र मतुआ आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं।

Friday, March 19, 2021

पाकिस्तान से शांति का संदेश

 


पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने और फिर सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा ने कहा है, कि भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में सुधार होना चाहिए। प्रधानमंत्री के साथ जनरल बाजवा के बयान का आना भी बड़ा संदेश दे रहा है।

पिछले बुधवार को इमरान खान ने पाकिस्तान के थिंकटैंक नेशनल सिक्योरिटी डिवीजन के दो दिन के इस्लामाबाद सिक्योरिटी डायलॉग का उद्घाटन करते हुए कहा कि हम भारत के साथ रिश्तों को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं, पर भारत को इसमें पहल करनी चाहिए। पर उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि उनका आशय क्या है।

इसी कार्यक्रम में बाद में जनरल बाजवा बोले थे। इसमें उन्होंने कहा, ''जब तक कश्मीर मुद्दा हल नहीं हो जाता तब तक उपमहाद्वीप में शांति का सपना पूरा नहीं होगा। अब अतीत को भुला कर आगे बढ़ने का समय आ गया है।" पाकिस्तान की तरफ़ से हाल ही में सीमा पर युद्ध विराम समझौता किया गया है। जिसके बाद सेना प्रमुख जनरल जावेद बाजवा की भारत से बातचीत की पेशकश सामने आई है। उनकी इस पेशकश की सकारात्मक बात यह है कि इसमें कश्मीर से अनुच्छेद 370 की वापसी और इसी किस्म के विवादास्पद विषयों के नहीं उठाया गया है।

इस सिलसिले में एक और रोचक खबर यह है कि क़मर जावेद बाजवा ने अपनी सेना के जवानों को भारतीय लोकतंत्र की सफलता पर आधारित किताब पढ़ने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि यह जानने की ज़रूरत है कि भारत ने किस तरह से राजनीति को अपनी सेना को अलग रखा है।

Tuesday, March 16, 2021

बंगाल की भगदड़ और मीडिया का यथास्थितिवादी नज़रिया


पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम विधानसभा सीट पर सबकी निगाहें हैं। यहाँ से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मुकाबला उनसे बगावत करके भारतीय जनता पार्टी में आए शुभेंदु अधिकारी से है। इस क्षेत्र का मतदान 1 अप्रेल को यानी दूसरे दौर में होना है। शुरुआती दौर में ही राज्य की राजनीति पूरे उरूज पर है। एक तरफ बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर भागने की होड़ लगी हुई है, वहीं मीडिया के चुनाव-पूर्व सर्वेक्षणों में अब भी ममता बनर्जी की सरकार बनने की आशा व्यक्त की गई है। शायद यह उनकी यथास्थितिवादी समझ है। चुनाव कार्यक्रम को पूरा होने में करीब डेढ़ महीने का समय बाकी है, इसलिए इन सर्वेक्षणों के बदलते निष्कर्षों पर नजर रखने की जरूरत भी होगी।

भारत में चुनाव-पूर्व सर्वेक्षणों का इतिहास अच्छा नहीं रहा है। आमतौर पर उनके निष्कर्ष भटके हुए होते हैं। फिर ममता बनर्जी की पराजय की घोषणा करने के लिए साहस और आत्मविश्वास भी चाहिए। बंगाल का मीडिया लम्बे अर्से से उनके प्रभाव में रहा है। बंगाल के ही एक मीडिया हाउस से जुड़ा एक राष्ट्रीय चैनल इस बात की घोषणा कर रहा है, तो विस्मय भी नहीं होना चाहिए। अलबत्ता तृणमूल के भीतर जैसी भगदड़ है, उसपर ध्यान देने की जरूरत है। मीडिया के विश्लेषण 27 मार्च को मतदान के पहले दौर के बाद ज्यादा ठोस जमीन पर होंगे। पर 29 अप्रैल के मतदान के बाद जो एक्ज़िट पोल आएंगे, सम्भव है उनमें कहानी बदली हुई हो।

भगदड़ का माहौल

सन 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद से टीएमसी के 17 विधायक, एक सांसद कांग्रेस, सीपीएम और सीपीआई के एक-एक विधायक अपनी पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। यह संख्या लगातार बदल रही है। हाल में मालदा के हबीबपुर से तृणमूल कांग्रेस की प्रत्याशी सरला मुर्मू ने टिकट मिलने के बावजूद तृणमूल छोड़ दी और सोमवार 8 मार्च को भाजपा में शामिल हो गईं। बंगाल में यह पहला मौका है, जब किसी प्रत्याशी ने टिकट मिलने के बावजूद अपनी पार्टी छोड़ी है। बात केवल बड़े नेताओं की नहीं, छोटे कार्यकर्ताओं की है। केवल तृणमूल के कार्यकर्ता ही नहीं सीपीएम के कार्यकर्ता भी अपनी पार्टी को छोड़कर भागे हैं। इसकी वजह पिछले दस वर्षों से व्याप्त राजनीतिक हिंसा है।

Monday, March 15, 2021

सियासी आँधी में घिरे इमरान खान

पाकिस्तानी संसद के ऐवान-ए-बाला यानी सीनेट के चुनाव में हार के बाद प्रधानमंत्री इमरान खान ने वहाँ की राष्ट्रीय असेम्बली में विश्वासमत हासिल कर लिया है। शनिवार 6 मार्च को हुए मतदान में उनके पक्ष में 178 वोट पड़े, जबकि विरोधी दलों ने मतदान का बहिष्कार किया। पर ये 178 वोट खुले मतदान में पड़े हैं, जबकि सीनेट का चुनाव गुप्त मतदान से हुआ था। लगता है कि कुछ सदस्यों को मौके का इंतजार है, पर वे खुलकर सामने आना भी नहीं चाहते।

इस वक़्त सबसे अहम सवाल है कि देश के विरोधी दलों का उगला हदफ़ (निशाना) क्या होगा? पर्यवेक्षकों का कहना है कि एकबार शिगाफ़ (दरार) पड़ जाए, तो बार-बार उसपर वार करना जरूरी होता है। लगता है कि इमरान खान की सत्ता कमज़ोर पड़ रही हैं। अलबत्ता विरोधी दलों ने 26 मार्च को पूरे देश में लांग मार्च का कार्यक्रम बनाया है। इस लांग मार्च के साथ ही देश में फिर से चुनाव कराने की माँग शुरू हो गई है।

फौज किसके साथ?

फिलहाल विपक्ष सीनेट में अपना अध्यक्ष लाने की कोशिश करेगा और उसके बाद पंजाब की सूबाई सरकार को गिराने या बदलवाने की। मरियम नवाज शरीफ का कहना है कि पंजाब में पीटीआई के विधायकों ने अब हमसे सम्पर्क करना शुरू कर दिया है। यानी कहानी अभी खत्म नहीं हुई है, बल्कि उसका अगला अध्याय शुरू होने जा रहा है। सवाल यह भी है कि फौज (जिसे पाकिस्तान में एस्टेब्लिशमेंट या व्यवस्था कहा जाता है) किसके साथ है?

इमरान खान का विश्वासमत हासिल करना भी पाकिस्तान की राजनीति के लिहाज से अटपटा है। अप्रेल 2010 में हुए संविधान के 18वें संशोधन के बाद यह पहला मौका था, जब किसी प्रधानमंत्री ने विश्वासमत हासिल किया है। इसके पहले जरूरी होता था कि नवनियुक्त प्रधानमंत्री अपना पद संभालने के 30 दिन के भीतर विश्वासमत हासिल करे। अब सांविधानिक-व्यवस्था में इसकी जरूरत नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 91 की धारा 7 के अनुसार जब तक बहुमत को लेकर राष्ट्रपति को संदेह नहीं हो, वह अपने अधिकार का इस्तेमाल नहीं करेगा।

इमरान खान को अपनी तरफ से विश्वासमत हासिल करने की कोई जरूरत थी भी नहीं थी। उनसे राष्ट्रपति ने नहीं कहा था। शायद वे असुरक्षा से घिरे हैं और अपना बहुमत साबित करके अपने सुरक्षा-घेरे को मजबूत करना चाहते हैं। इमरान के पक्ष 155 वोट उनकी पार्टी पीटीआई के थे, सात एमक्यूएम (पी) के पाँच-पाँच बलोचिस्तान अवामी पार्टी, और पाकिस्तान मुस्लिम लीग-क़ायद और एक-एक वोट अवामी मुस्लिम लीग और जम्हूरी वतन पार्टी का था।

Saturday, March 13, 2021

टेक्नो-लोकतंत्र की खुली खिड़की और हवाओं को कैद करने की कोशिशें


डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया के विनियमन के लिए केंद्र सरकार की नवीनतम कोशिशों को लेकर तीन तरह की दलीलें सुनाई पड़ रही हैं। पहली यह कि विनियमन न केवल जरूरी है, बल्कि इसे
नख-दंत की जरूरत है। यह बात सुप्रीम कोर्ट ने भी कही है। दूसरी, विनियमन ठीक है, पर इसका अधिकार सरकार के पास नहीं रहना चाहिए। इस दलील में उन बड़ी तकनीकी कंपनियों के स्वर भी शामिल हैं, जिनके हाथों में डिजिटल (या सोशल) मीडिया की बागडोर है। और तीसरी दलील मुक्त-इंटरनेट के समर्थकों की है, जिनका कहना है कि सरकारी गाइडलाइन न केवल अनैतिक है, बल्कि असांविधानिक भी हैं। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन का यह विचार आगे जाकर आधार, आरोग्य सेतु और  प्रस्तावित डीएनए कानून को भी सरकारी सर्विलांस का उपकरण मानता है।  

लोकतंत्र के तीन स्तम्भ धीरे-धीरे आकार ले रहे हैं। इनमें पहला राज्य है, जिसमें सरकार एक निकाय है, और जिसमें न्यायपालिका और राजनीतिक संस्थाएं शामिल हैं। दूसरे बाजार है, यानी बड़ी तकनीकी कम्पनियाँ। तीसरे स्वयं नागरिक। दुनिया के करीब सात अरब नागरिकों में से हरेक का अपना एजेंडा है। उनके प्रतिनिधित्व का दावा करने वाला एक अलग संसार है।

ग्लोबल ऑडियंस

सूचना के नियमन की कोशिश केवल भारत में ही नहीं है। युवाल नोवा हरारी के शब्दों में वैश्विक समस्याओं के वैश्विक समाधानखोजे जा रहे हैं। हाल में पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि को जमानत पर रिहा करने का आदेश देते हुए अदालत ने कहा था, बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में ग्लोबल ऑडियंस की तलाश का अधिकार शामिल है। संचार पर भौगोलिक बाधाएं नहीं हैं। एक नागरिक के पास कानून के अनुरूप संचार प्राप्त करने के सर्वोत्तम साधनों का उपयोग करने का मौलिक अधिकार है।

स्वतंत्रता का यह एक नया आयाम है। इंटरनेट ने यह वैश्विक-खिड़की खोली है। नागरिक के जानकारी पाने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों को पंख लगाने वाली तकनीक ने उसकी उड़ान को अंतरराष्ट्रीय जरूर बना दिया है, पर उसकी आड़ में बहुत से खतरे राष्ट्रीय सीमाओं में प्रवेश कर रहे हैं। सोचना उनके बारे में भी होगा।

Wednesday, March 10, 2021

पीसी चाको के हटने से कांग्रेस को एक और झटका


कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पीसी चाको ने पार्टी से नाता तोड़कर कांग्रेस पार्टी की आंतरिक राजनीति को चौराहे पर खड़ा कर दिया है। ऐसा नहीं है कि इस इस्तीफे से केरल में पार्टी की गुटबंदी खत्म हो जाएगा, पर इतना जरूर है कि केंद्रीय नेतृत्व का ध्यान इस ओर जाएगा। चाको ने कहा है कि पार्टी लगातार कमजोर होती जा रही है। इसके पीछे कोई और नहीं, खुद पार्टी है।

पीसी चाको ने अपना इस्तीफा पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को भेजा। केरल में 6 अप्रैल को होने जा रहे विधानसभा चुनाव से पहले इस इस्तीफे से पार्टी की संभावनाओं पर भी असर पड़ेगा। यों भी माना जा रहा है कि इसबार वाममोर्चे की सरकार बनने जा रही है, जो केरल की राजनीति में एक नई बात होगी। अभी तक का चलन था कि एकबार वामपंथी सरकार बनती थी, तो उसके बाद कांग्रेसी। पर इसबार शायद वामपंथी सरकार लगातार दूसरी बार बनेगी।

चाको ने केरल में कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं रमेश चेन्नीथला और ओमान चैंडी और उनके दो गुटों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि दोनों नेता हमेशा सीटें और संगठन के बाद आपस में बांट लेते हैं। केरल में केवल उन नेताओं का भविष्य है जो इनमें से किसी ग्रुप का हिस्सा हैं, अन्य को हमेशा दरकिनार कर दिया जाता है। मैं हाईकमान से कहता रहा हूं कि इस पर रोक लगनी चाहिए, लेकिन आलाकमान भी इन समूहों के दिए प्रस्तावों से सहमत है।''

चाको ने पार्टी के भीतर ग्रुप-23 का जिक्र भी किया। उन्होंने कहा, नेताओं ने मुझसे भी सम्पर्क साधा था, पर मैं किसी पत्र-अभियान के पक्ष में नहीं था। अलबत्ता मैं पत्र में उठाए गए सवालों से सहमत था। अफसोस की बात है कि पार्टी पिछले डेढ़ साल में अपने लिए अध्यक्ष नहीं खोज पाई।

Tuesday, March 9, 2021

अफगानिस्तान में बाइडेन की पहल के जोखिम

 


पिछले साल तालिबान के साथ हुए समझौते के तहत अफगानिस्तान से अमेरिकी सेनाओं की वापसी की तारीख 1 मई करीब आ रही है। सवाल है कि क्या अमेरिकी सेना हटेगी? ऐसा हुआ, तो क्या देश के काफी बड़े इलाके पर तालिबान का नियंत्रण हो जाएगा? अमेरिका क्या इस बात को देख पा रहा है? ऐसे में भारत की भूमिका किस प्रकार की हो सकती है? ऐसे तमाम सवालों को लेकर आज के इंडियन एक्सप्रेस में सी राजा मोहन का लेख प्रकाशित हुआ है, जिसमें भारतीय नीति के बरक्स इन सवालों का जवाब देने की कोशिश की गई है। इसमें उन्होंने लिखा है:-

इससे न तो 42-साल पुरानी लड़ाई खत्म होगी और न अफगानिस्तान में अमेरिकी हस्तक्षेप खत्म हो जाएगा। पर पिछले कुछ दिनों में जो बाइडेन प्रशासन द्वारा शुरू किए गए शांति-प्रयासों से अफगानिस्तान के हिंसक घटनाचक्र में, जिसने दक्षिण एशिया और अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, एक नया अध्याय शुरू हो सकता है।

अफगानिस्तान में अपने हितों को देखते हुए, अमेरिका की नई महत्वाकांक्षी नीतिगत संरचना और उसे लागू करने में सामने आने वाली चुनौतियों के मद्देनज़र भारत की इसमें जबर्दस्त दिलचस्पी होगी।

ताजा पहल के बारे में पिछले सप्ताहांत अमेरिका के विशेष दूत जलमय खलीलज़ाद ने अफगानिस्तान से विदेशमंत्री एस जयशंकर के साथ बातचीत की। उम्मीद है कि इस महीने अमेरिकी रक्षामंत्री जनरल लॉयड ऑस्टिन की यात्रा के दौरान इस सवाल पर और ज्यादा बातचीत होगी।  

ट्रंप प्रशासन द्वारा शुरू की गई शांति-प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए बाइडेन प्रशासन ने भी इस क्षेत्र में चल रही लड़ाई को जल्द से जल्द खत्म करने की मनोकामना को रेखांकित किया है। इस सिलसिले में पाँच खास बातें सामने आती हैं।

पहली, बाइडेन की शांति-योजना में यह संभावना खुली हुई है कि अफगानिस्तान में तैनात करीब 2500 अमेरिकी सैनिक कुछ समय तक और रुक सकते हैं। वॉशिंगटन में बहुत से विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप प्रशासन ने एक निश्चित तारीख की घोषणा करके अमेरिकी पकड़ को ढीला कर दिया है। बाइडेन उसे मजबूत करना चाहेंगे। बाइडेन इस पकड़ को इसलिए बनाए रखना चाहेंगे, क्योंकि तालिबान ने हिंसा के स्तर को कम करने के अपने वायदे को पूरा नहीं किया है। अमेरिका दूसरी तरफ अफ़ग़ान राष्ट्रपति अशरफ ग़नी पर भी दबाव डालेगा, क्योंकि वह उन्हें भी समस्या का हिस्सा मानता है।

Monday, March 8, 2021

क्या अब पिघलेगी भारत-पाक रिश्तों पर जमी बर्फ?


गुरुवार 25 फरवरी को जब भारत और पाकिस्तान की सेना ने जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर युद्धविराम को लेकर सन 2003 में हुए समझौते का मुस्तैदी से पालन करने की घोषणा की, तब बहुतों ने उसे मामूली घोषणा माना। घोषणा प्रचारात्मक नहीं थी। केवल दोनों देशों के डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस (डीजीएमओ) ने संयुक्त बयान जारी किया। कुछ पर्यवेक्षक इस घटनाक्रम को काफी महत्वपूर्ण मान रहे हैं। उनके विचार से इस संयुक्त बयान के पीछे दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व की भूमिका है, जो इस बात को प्रचारित करना नहीं चाहता।

दोनों के बीच बदमज़गी इतनी ज्यादा है कि रिश्तों को सुधारने की कोशिश हुई भी तो जनता की विपरीत प्रतिक्रिया होगी। इस घोषणा के साथ कम से कम तीन घटनाक्रमों पर हमें और ध्यान देना चाहिए। एक, अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडेन की भूमिका, जो इस घोषणा के फौरन बाद अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता के बयान से स्पष्ट दिखाई पड़ती है। अफगानिस्तान में बदलते हालात और तीसरे भारत और चीन के विदेशमंत्रियों के बीच हॉटलाइन की शुरुआत।

उत्साहवर्धक माहौल

सन 2003 के जिस समझौते का जिक्र इस वक्त किया जा रहा है, वह इतना असरदार था कि उसके सहारे सन 2008 आते-आते दोनों देश एक दीर्घकालीन समझौते की ओर बढ़ गए थे। पाकिस्तान के पूर्व विदेशमंत्री खुर्शीद कसूरी ने अपनी किताब में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के कार्यकाल में हुई बैठकों का हवाला दिया है। भारतीय मीडिया में भी इस आशय की काफी बातें हवा में रही हैं। नवंबर 2008 के पहले माहौल काफी बदल गया था।

Sunday, March 7, 2021

फ्रीडम-हाउस के अर्धसत्य

वैश्विक स्वतंत्रता पर नज़र रखने वाले अमेरिकी थिंकटैंक 'फ्रीडम हाउस' की नजर में भारत अब ‘पूर्ण-स्वतंत्र’ नहीं ‘आंशिक-स्वतंत्र देश’ है। हालांकि इस रिपोर्ट से आधिकारिक या औपचारिक रूप से देश पर प्रभाव नहीं पड़ता है, पर प्रतिष्ठा जरूर प्रभावित होती है। इसीलिए भारत सरकार ने शुक्रवार को इस रिपोर्ट में उठाए गए मुद्दों का जवाब दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता और वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन ने भी इसकी आलोचना की है।

सालाना जारी होने वाली इस रिपोर्ट में पिछले कुछ वर्षों से भारत की रैंक लगातार गिर रही थी, फिर भी उसे ‘स्वतंत्र’ की श्रेणी में रखा जा रहा था, पर इस साल की रिपोर्ट में ‘आंशिक-स्वतंत्र देश’ का दर्जा देकर इस संस्था ने कुछ सवाल खड़े किए हैं। पिछले तीन साल में भारत को दिए गए अंक 77 से घटकर इस साल 67 पर आ गए हैं। यह अंक स्वतंत्र देश होने के लिए आवश्यक 70 से तीन अंक नीचे है।

‘आंशिक-स्वतंत्रता’

'फ्रीडम हाउस' के आकलन में दो प्रकार की स्वतंत्रताओं के आधार पर किसी देश की स्वतंत्रता का फैसला होता है। एक राजनीतिक स्वतंत्रता और दूसरे नागरिक स्वतंत्रता। राजनीतिक स्वतंत्रता यानी चुनाव और अन्य व्यवस्थाएं, जिसके लिए इस रेटिंग में 40 अंक रखे गए हैं। इसमें भारत को 34 अंक दिए गए हैं। यानी राजनीतिक स्वतंत्रता में भारत दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल है, पर नागरिक स्वतंत्रता में 60 में से 33 अंक मिले हैं। इस प्रकार कुल 67 अंक हैं। इनमें इंटरनेट पर लगी बंदिशें भी शामिल हैं, जो अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 की वापसी के बाद कश्मीर की घाटी में लगाई गई थीं।

Saturday, March 6, 2021

इमरान सरकार बची, पर खतरा टला नहीं

युसुफ रजा गिलानी ने सीनेट की सीट जीतकर तहलका मचाया

 सीनेट चुनाव में हार के बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने वहाँ की राष्ट्रीय असेम्बली में विश्वासमत हासिल कर लिया है। शनिवार को हुए मतदान में उनके पक्ष में 178 वोट पड़े, जबकि विरोधी दलों ने मतदान का बहिष्कार किया। इमरान और उनकी पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ की निगाहें उन नेताओं पर रहीं जिन पर सीनेट चुनाव में पार्टी का साथ छोड़ विपक्ष का दामन थामने का आरोप लगाया गया था। जब वोट पड़े तो सरकार को आसानी से बहुमत मिल गया। 

इस जीत से इमरान सरकार बच तो गई है, पर ऐसा लग रहा है कि सेना ने खुद को तटस्थ बना लिया है। यों विश्वासमत के दो दिन पहले गुरुवार को इमरान देश के सेनाध्यक्ष और आईएसआई के प्रमुख से मिले थे। उसके बाद उन्होंने विश्वासमत हासिल करने की घोषणा की। विरोधी दल जानते हैं कि पीटीआई के पास अभी बहुमत है। उनकी लड़ाई सड़क पर चल रही है। देश पर छाया आर्थिक संकट अभी टला नहीं है। विदेश-नीति में भी इमरान को विशेष सफलता मिली नहीं है। सरकार के पास वैक्सीन खरीदने तक का पैसा नहीं है। उसकी अलोकप्रियता बढ़ती जा रही है। 

Friday, March 5, 2021

'फ्रीडम हाउस' की नजर में भारत अब ‘आंशिक-स्वतंत्र देश’




अमेरिकी थिंकटैंक फ्रीडम हाउस ने भारत को स्वतंत्र से आंशिक-स्वतंत्र देशों की श्रेणी में डाल दिया है। यह रिपोर्ट मानती है कि दुनियाभर में स्वतंत्रता का ह्रास हो रहा है, पर उसमें भारत का खासतौर से उल्लेख किया गया है। फ्रीडम हाउस एक निजी संस्था है और वह अपने आकलन के लिए एक पद्धति का सहारा लेती है। उसकी पद्धति को समझने की जरूरत है। भारत का श्रेणी परिवर्तन हमारे यहाँ चर्चा का विषय नहीं बना है, क्योंकि हमने लोकतंत्र और लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं को महत्व अपेक्षाकृत कम दिया है। हम उसके राजनीतिक पक्ष को आसानी से देख पाते हैं। मेरी समझ से फ्रीडम हाउस के स्वतंत्रता-सूचकांक के भी राजनीतिक निहितार्थ हैं। बेशक मानव-विकास, मानवाधिकार और नागरिक अधिकारों को लेकर देश के भीतर सरकार के आलोचकों की बड़ी संख्या है, पर स्वतंत्रता हमारी बुनियाद में है।

अंग्रेजी के कुछ अखबारों को छोड़ आमतौर पर भारतीय मीडिया में इस रिपोर्ट को लेकर ज्यादा विवेचन हुआ नहीं है। हिंदी के अखबार यों भी गंभीर मसलों पर टिप्पणियाँ करने से बचते हैं। इस रिपोर्ट से हमारे ऊपर सीधे कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, पर संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार से जुड़ी संस्थाओं में भारत को निशाने पर लिया जा सकेगा। ऐसा भी नहीं है कि रिपोर्ट में जिन तथ्यों का उल्लेख किया गया है, वे पूरी तरह आधारहीन हैं, पर उनसे जो निष्कर्ष निकाले गए हैं, उनमें कई प्रकार के छिद्र हैं।

आंतरिक राजनीति की प्रतिच्छाया

भारतीय राष्ट्र-राज्य को निशाने पर लेने वाली इस रिपोर्ट में भारत की आंतरिक राजनीति की प्रतिच्छाया भी नजर आती है। रिपोर्ट में इस बात का जिक्र तो है कि भारतीय पुलिस ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया है, पर इस बात का जिक्र नहीं है कि देश की अदालतों ने कई मौकों पर देशद्रोह के आरोपों को लेकर सरकार के विरुद्ध टिप्पणियाँ की हैं। तबलीगी जमात को लेकर आरोप लगे, पर अदालतों ने न केवल पुलिस की आलोचना की, साथ ही मीडिया को भी लताड़ बताई है। यह भी सच है कि देश में अनेक कठोर कानून बने हैं, पर उनके पीछे आतंकवादी गतिविधियों का इतिहास है और इन कानूनों का सीधा रिश्ता 2014 के राजनीतिक बदलाव से नहीं है।  

'फ्रीडम हाउस' एक अमेरिकी शोध संस्थान है जो हर साल 'फ्रीडम इन द वर्ल्ड' रिपोर्ट निकालता है। इस रिपोर्ट में दुनिया के अलग-अलग देशों में राजनीतिक आजादी और नागरिक अधिकारों के स्तर की समीक्षा की जाती है। ताजा रिपोर्ट में संस्था ने भारत में अधिकारों और आजादी में आई कमी को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। इस रिपोर्ट को देखने और समझने के पहले इसकी अंक पद्धति पर भी एक नजर डालना उपयोगी होगा। 2021 की रिपोर्ट में 195 देशों और 15 इलाकों में 1 जनवरी 2020 से लेकर 31 दिसंबर 2020 तक हुए घटनाक्रमों का विश्लेषण किया गया है।

पीछे का नजरिया

'फ्रीडम हाउस' की दृष्टि भी भारतीय मीडिया, लेखकों, राजनीति और अमेरिका तथा अन्य देशों में रहने वाले भारतीयों की दृष्टि से प्रभावित होती है। क्या भारत का पूरा मीडिया गोदी-मीडिया है? क्या मीडिया में नागरिक-स्वतंत्रता के सवाल उठने बंद हो गए हैं? भारत के बारे में यह दृष्टि सन 1947 के बाद से ही बन रही है। कश्मीर के मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ में लेकर जाने के समय से। भारतीय स्वतंत्रता और खासतौर से विभाजन से जुड़ी ब्रिटिश राजनीति में भी उसके बीज छिपे हैं। 'फ्रीडम हाउस' के वैबपेज पर भारत का नक्शा इसकी गवाही देता है। उन्होंने जम्मू कश्मीर और लद्दाख को भारत के नक्शे से ही हटा दिया है। 

Thursday, March 4, 2021

‘हिन्दू’ में सोनिया गांधी का लेख


आज के
हिन्दू के सम्पादकीय पेज पर सोनिया गांधी का लेख The distress sale of national assets is unwiseप्रकाशित हुआ है। एक साल के भीतर हिन्दू में सोनिया गांधी का यह दूसरा लेख है। इसके पहले अगस्त, 2020 में उनका एक लेख प्रकाशित हुआ था। यह लेख शुद्ध राजनीति पर नहीं है, बल्कि आर्थिक-नीति से जुड़े विषय पर है। इसमें उन्होंने कहा है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों और बैंकों के पूँजीगत विनिवेश से देश की सार्वजनिक सम्पदा का दीर्घकालीन क्षय होगा। एकबारगी यह बात मन में आती है कि सोनिया गांधी और कांग्रेस पार्टी इसके माध्यम से क्या कहना चाहती हैं। हिन्दू में उनके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लेख भी प्रकाशित हुए हैं। मनमोहन सिंह नवंबर 2016 की नोटबंदी को लेकर मोदी सरकार की आलोचना करते रहे हैं। यह आलोचना अब भी जारी है। वे सामान्यतः रोजमर्रा की राजनीति पर टिप्पणी नहीं करते, पर नोटबंदी के बाद उन्होंने हिन्दू में इस विषय पर लेख लिखा। उनकी पार्टी ने नोटबंदी को लेकर बीजेपी पर हमला बोला तो उसमें मनमोहन सिंह को आगे रखा। नवम्बर, 2016 में उन्होंने राज्यसभा में कहा, नोटबंदी का फैसला ‘संगठित लूट और कानूनी डाकाजनी’ (ऑर्गनाइज्ड लूट एंड लीगलाइज्ड प्लंडर) है। उसके बाद प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में मनमोहन सिंह पर ‘रेनकोट पहन कर नहाने’ के रूपक का इस्तेमाल करते हुए हमला बोला था। लगता यह है कि कांग्रेस इन लेखों के माध्यम से अपनी आर्थिक-सामाजिक नीतियों को भी स्पष्ट कर रही है, जो कई कारणों से अब सन 1991 की राह से अलग हैं। इसकी वजह या तो बीजेपी की नीतियों का विरोध है या पार्टी की दीर्घकालीन रणनीति। हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में निजीकरण और सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों के बड़े स्तर पर विनिवेश या निजीकरण की वकालत करके इस बहस को तेज कर दिया है। चूंकि विनिवेश की नीति उनकी सरकार की भी रही है, इसलिए उन्होंने इस बात को रखने में सावधानी बरती है और अपने तरीके का भी उल्लेख कर दिया है। मुझे लगता है कि यह बहस अब आगे बढ़ेगी, जिसका केंद्रीय विषय होगा कि हमारी अर्थव्यवस्था की गति में ठहराव के बुनियादी कारण क्या हैं। सोनिया गांधी के लेख के कुछ महत्वपूर्ण अंश इस प्रकार हैं:-

भारतीय अर्थव्यवस्था के चालू संकट के पीछे 8 नवंबर, 2016 की रात का वह फैसला है। डॉ मनमोहन सिंह ने संसद में कहा था कि इस फैसले से अर्थव्यवस्था में 2 प्रतिशत की गिरावट आएगी, पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी बात नहीं मानी। इसके विपरीत जल्दबाजी में खराब तरीके से बने जीएसटी को लागू किया गया, जिससे बड़ी संख्या में मझोले और छोटे कारोबार और अर्थव्यवस्था के अनौपचारिक क्षेत्र तबाह हो गया। इन दोनों तबाहियों ने करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी को छीना और अर्थव्यवस्था को मंदी की ओर धकेल दिया, जो कोविड-19 की महामारी के दौर में उपस्थित हुई।

तेल-टैक्स, निजीकरण

ऐतिहासिक रूप से अंतरराष्ट्रीय तेल-मूल्य में गिरावट होने से सरकार को मौका मिला था कि वह उसका लाभ उपभोक्ता को देकर अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा होने में मदद करती। पर मौके का लाभ उठाने के बजाय मोदी सरकार बढ़े हुए पेट्रोलियम टैक्स और उपकर के मार्फत हरेक परिवार के घटते बजट को निचोड़ती रही। इसके विपरीत 2019 में उसने कम्पनियों का टैक्स कम किया जिससे निवेश तो नहीं बढ़ा, हाँ देश के बजट में 1.45 लाख करोड़ रुपये का छिद्र जरूर हो गया।

Wednesday, March 3, 2021

अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के साथ साझा-सरकार की पेशकश की

जलमय खलीलज़ाद
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की अफगानिस्तान नीति अब स्पष्ट होने लगी है। अफगान मीडिया टोलोन्यूज के अनुसार अमेरिका ने तालिबान सहित देश के सभी गुटों के साथ एक साझा सरकार की पेशकश की है। इसके साथ ही अफगान समस्या को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का सुझाव भी दिया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान के मामलों पर अमेरिका के विशेष प्रतिनिधि जलमय खलीलज़ाद ने राष्ट्रपति अशरफ गनी और देश के अन्य शीर्ष नेताओं के साथ हाल में बैठकों में इस प्रस्ताव पर चर्चा की। टोलोन्यूज ने खबर यह भी दी है कि हाल में अफ़ग़ान राष्ट्रीय सुरक्षा बल जहाँ से भी हटे हैं, उन जगहों पर तालिबान ने कब्जा कर लिया है। हाल में सरकार ने कुछ इलाकों से सेना को हटाकर दूसरे इलाकों में तैनात किया है, जिसपर तालिबान ने मौके पा फायदा उठाया है।

खलीलज़ाद हाल में काबुल में थे जहां उन्होंने पिछले साल तालिबान के साथ हुए अमेरिकी समझौते पर चर्चा करने के लिए राष्ट्रपति गनी और अफगानिस्तान हाई काउंसिल ऑफ नेशनल रिकांसिलिएशन के प्रमुख अब्दुल्ला अब्दुल्ला से मुलाकात की। अमेरिकी प्रस्ताव में दोहा में चल रही शांति वार्ता को दरकिनार करने और तालिबान की भागीदारी के साथ एक अंतरिम सरकार का खाका तैयार करने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय वार्ता शुरू करना शामिल है, जो अफगानिस्तान के पारंपरिक लोया जिरगा की मंजूरी दे सकती है।

Tuesday, March 2, 2021

जी-23 के कार्यक्रम और होंगे, पर हाईकमान की कार्रवाई फिलहाल नहीं


पिछले शनिवार और रविवार को असंतुष्ट नेताओं के कड़वे बयानों के बावजूद कांग्रेस पार्टी ने कोई कार्रवाई करने का इरादा जाहिर नहीं किया है। दूसरी तरफ जी-23 ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र में एक और कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई है। इसी तरह की रैलियाँ हिमाचल प्रदेश, पंजाब, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में हो सकती हैं। कांग्रेस के इस धड़े का आग्रह इस बात पर है कि हम हिन्दू-विरोधी नहीं हैं। दूसरी तरफ पार्टी हाईकमान अपने कदम पर काफी सोच-विचार कर रही है। पर पार्टी का असंतुष्ट तबका खुलकर सामने आ गया है। 

गत शनिवार को जम्मू में हुए गांधी ग्लोबल फैमिली कार्यक्रम में शामिल नेताओं से अभी तक स्पष्टीकरण नहीं माँगा गया है। उधर पार्टी जम्मू-कश्मीर अध्यक्ष गुलाम अहमद मीर का कहना है कि गुलाम नबी के बयान से राज्य में पार्टी कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास डोल गया है। इसके साथ ही जम्मू में पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं ने आजाद का पुतला भी जलाया है। दूसरी तरफ पार्टी के वरिष्ठ नेता वीरप्पा मोइली ने अपने आपको जम्मू के इस कार्यक्रम से अलग कर लिया है। उन्होंने पार्टी के आंतरिक मतभेदों के बाहर आने पर चिंता व्यक्त की और साथ ही राहुल गांधी को फिर से अध्यक्ष बनाने का समर्थन किया।

आईएसएफ से गठबंधन

सोमवार को आनंद शर्मा ने पश्चिम बंगाल में इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) के साथ गठबंधन को लेकर सवाल खड़े किए। उन्होंने ट्वीट किया कि आईएसएफ जैसी पार्टी के साथ गठबंधन करके कांग्रेस गांधी-नेहरू के धर्मनिरपेक्ष विचारों से दूर जा रही है, जो पार्टी की आत्मा है। इन मसलों पर कांग्रेस कार्यसमिति की अनुमति होनी चाहिए। ऐसे मौके पर पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष की उपस्थिति दर्दनाक और शर्मनाक है।

इसपर बंगाल के प्रभारी जितिन प्रसाद ने ट्वीट किया, गठबंधन के निर्णय पार्टी और कार्यकर्ताओं के हितों को ध्यान में रखकर किए जाते हैं। सबको मिलकर कांग्रेस को मजबूत करना चाहिए। उनके अलावा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और लोकसभा में पार्टी के नेता अधीर रंजन चौधरी ने ट्वीट किया, आनंद शर्मा जी सीपीएम-नीत वाम मोर्चा पश्चिम बंगाल में सेक्युलर गठबंधन का नेतृत्व कर रहा है। कांग्रेस उसका अभिन्न अंग है। हम भाजपा और सांप्रदायिक शक्तियों को परास्त करने को कृतसंकल्प हैं।

जी-23 के एक सदस्य आनंद शर्मा के नजदीकी सूत्रों का कहना है कि एक समय तक आनंद शर्मा परिवार के काफी करीब थे, पर पिछले कुछ वर्षों में यह नजदीकी खत्म हो गई है। राज्यसभा में मल्लिकार्जुन खड़गे को नेता और उन्हें उपनेता बनाया गया है। इसका मतलब है कि उन्हें खड़गे के अधीन रहना होगा। खड़गे को राहुल गांधी का करीबी माना जाता है और वे सोनिया गांधी के भी आनंद शर्मा के मुकाबले ज्यादा करीबी हैं। सोनिया और राहुल गांधी के करीबियों के टकराव के कारण जी-23 का जन्म हुआ है। ये नेता अब जून में होने वाले पार्टी अध्यक्ष के चुनाव में भी अपना प्रत्याशी खड़ा करेंगे। वे जानते हैं कि यदि राहुल गांधी खड़े हुए तो उनकी जीत तय है, फिर भी जी-23 अपना प्रत्याशी खड़ा करेगा।

हार्दिक पटेल भी निराश

उधर गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव में कांग्रेस को मिली हार के बाद पार्टी में मतभेद उभरे हैं। पाटीदार बहुल इलाकों में मिली हार के बाद प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल की आलोचना भी हो रही है। करीब दो साल पहले कांग्रेस में शामिल हुए युवा पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने अपनी निराशा व्यक्त की है। उन्होंने अपने एक ट्वीट में कहा कि पार्टी उनका सही से प्रयोग नहीं कर पा रही है। पार्टी के भीतर अपने ही नेता उनकी टांग खींचने का काम कर रहे हैं।

Monday, March 1, 2021

मंगल तक जाने की वैश्विक होड़ क्यों?


एकसाथ तीन देशों के यान मंगल ग्रह पर जा पहुँचे हैं। बुधवार 10 फरवरी को चीन ने दावा किया कि उसके अंतरिक्षयान तियानवेन-1 ने शाम 7.52 बजे (बीजिंग के समयानुसार) मंगल ग्रह की कक्षा में प्रवेश कर लिया। उसके एक दिन पहले मंगलवार को संयुक्त अरब अमीरात का ऑर्बिटर ‘होप प्रोब’ मंगल की कक्षा में पहुंचा था। चीनी अभियान का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण काम मंगल ग्रह पर रोवर को उतारने का है, जिसकी कोशिश मई या जून में की जाएगी। वहाँ उसकी असली परीक्षा है। यदि चीनी रोवर मंगल पर उतरने में कामयाब हुआ, तो वह दुनिया का दूसरा ऐसा देश होगा। अब तक केवल अमेरिका ही नौ बार अपने रोवर मंगल पर उतारने में कामयाब हुआ है।

चीनी सफलता के एक सप्ताह बाद 18 फरवरी को अमेरिकी यान पर्सीवरेंस न केवल मंगल ग्रह की सतह पर उतरा, बल्कि उसके रोवर और एक प्रयोगात्मक हेलीकॉप्टर ने अपना काम भी शुरू कर दिया। पर्सीवरेंस मामूली रोवर मिशन नहीं है, बल्कि अबतक का सबसे उन्नत श्रेणी का अनुसंधान कार्यक्रम है। यह अपने आप में पूरी प्रयोगशाला है। यह अभियान आने वाले समय में मनुष्य के मंगल अभियानों की दिशा निर्धारित करेगा।

यह रेस क्यों?

एकसाथ तीन अभियानों की सफलता के साथ एक सवाल पूछा जा सकता है कि मंगल ग्रह में ऐसा क्या है, जो वहाँ तक जाने की होड़ लगी है? इस सवाल का जवाब देने के पहले यह समझना जरूरी है कि मंगल ग्रह तक जाने के लिए हर दो साल में एकबार ऐसा मौका आता है, जब यह ग्रह धरती के सबसे नजदीक होता है। वहाँ अंतरिक्ष यान भेजने के लिए यह सबसे अच्छा समय होता है। इसलिए हमें एकसाथ तीनों अभियानों की खबरें मिली हैं। पर यह बात केवल  मंगल अभियान से ही नहीं जुड़ी है। अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर दुनिया ने अचानक ज्यादा ध्यान देना शुरू कर दिया है।  

Sunday, February 28, 2021

अब मोदी की तारीफ की आजाद ने

 

शनिवार को जी-23 के कार्यक्रम में भगवा पगड़ी बाँधे नेता

कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं की अगुवाई करने वाले गुलाम नबी आजाद ने पार्टी नेतृत्व को तीखे तेवर दिखाने के एक दिन बाद रविवार को एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ कर दी। आज़ाद जम्मू कश्मीर में गुज्जर समुदाय के एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। राज्यसभा में विपक्ष के नेता रहे ग़ुलाम नबी आज़ाद के विदाई समारोह में प्रधानमंत्री मोदी ने भी हाल ही में उनकी जमकर तारीफ की थी और वह भावुक भी हो गए थे। इसके पहले आजाद शनिवार को जम्मू में पार्टी के अन्य असंतुष्ट नेता कपिल सिब्बल, राज बब्बर, भूपिंदर सिंह हुड्डा, पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा, राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा के साथ नजर आए थे।

गुलाम नबी आजाद ने एक कार्यक्रम में कहा कि उन्हें बहुत सारे नेताओं की बहुत सी अच्छी-अच्छी बातें पसंद आती हैं। लोगों को नरेंद्र मोदी से सीख लेनी चाहिए, जो प्रधानमंत्री बन गए लेकिन उन्होंने अपनी जड़ों को नहीं भुलाया। वे ख़ुद को गर्व से 'चायवाला' कहते हैं। उन्होंने कहा, मेरे नरेंद्र मोदी के साथ राजनीतिक मतभेद हैं, लेकिन प्रधानमंत्री जमीन से जुड़े व्यक्ति हैं। आपने अपनी असलियत छिपाई तो आप एक खयाली और बनावटी दुनिया में रहते हैं। आदमी को अपनी असलियत पर फख्र होना चाहिए।

डिजिटल मीडिया पर नकेल


सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म हमेशा निरंकुश-निर्द्वंद नहीं रह सकते थे। जिस तरह उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में प्रिंट मीडिया के नियमन ने शक्ल ली, उसी तरह नब्बे के दशक में आकाश मीडिया के नियमन की शुरुआत हुई। पहले उसने केबल के रास्ते आकाश मार्ग से प्रवेश किया, फिर उसका नियमन हुआ, उसी तरह नए डिजिटल माध्यमों के विनियमन की जरूरत होगी। इनकी अंतर्विरोधी भूमिका पर भारत में ही नहीं दुनियाभर में चर्चा है। अमेरिका, ब्रिटेन, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में ओटीटी प्लेटफॉर्मों की सामग्री का नियमन होता है और उल्लंघन होने पर सजा देने की व्यवस्था भी है। पर इस विनियमन को युक्तिसंगत भी होना चाहिए। इस मामले में विवेकशीलता नहीं बरती गई, तो लोकतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति का गला घुट सकता है।

पिछले गुरुवार को सरकार ने जो सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती संस्थानों के लिए दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021 जारी किए हैं, उन्हें आना ही था। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को इस आशय के निर्देश दिए थे और हालात खुद कह रहे हैं कि कुछ करना चाहिए। हाल में अमेरिकी संसद और लालकिले पर हुए हमलों से इसकी जरूरत और पुख्ता हुई है।

मर्यादा रेखाएं

इंटरनेट और डिजिटल मीडिया ने सामाजिक-शक्तियों और राजशक्ति के बीच भी मर्यादा रेखा खींचने जरूरत को रेखांकित किया है। सामान्यतः माना जाता है कि सार्वजनिक हितों की रक्षा करने की जिम्मेदारी राज्य की है। पर जैसे-जैसे तकनीक का दायरा हमें राज्य की राजनीतिक सीमाओं से भौगोलिक रूप से बाहर ले जा रहा है, नए सवाल उठ रहे हैं। नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर तक होती है, पर भविष्य में अंतरराष्ट्रीय नियमन की जरूरत भी होगी।

Saturday, February 27, 2021

चीन में गरीबी का खात्मा


आज के बिजनेस स्टैंडर्ड में टीएन नायनन के इस लेख में चीन के इस दावे का विश्लेषण किया गया है कि वहाँ गरीबी को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। इस दावे पर आप यकीन करें या नहीं करें, अलबत्ता टीएन नायनन इस बात पर जोर दे रहे हैं कि यह सूचना भारतीय संदर्भों में बहुत महत्वपूर्ण है। उनका लेख पढ़ें
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चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के मुताबिक उनके देश ने गरीबी का पूरी तरह खात्मा कर दिया है। इस बयान को चाहे जैसे देखा जाए लेकिन यह बहुत महत्त्वपूर्ण है। दुनिया के सबसे गरीब समाजों में से एक रहा और भारत के साथ दुनिया के अधिकांश गरीबों वाला चीन अब प्रति व्यक्ति आय के ऐसे स्तर पर (क्रय शक्ति समता के अनुसार) पहुंच गया है जो वैश्विक औसत के करीब है। चीन का दावा है कि उसने 85 करोड़ लोगों को गरीबी से उबारा।

चीन के तमाम आंकड़ों की तरह इसे लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। चीन मानक के रूप में विश्व बैंक द्वारा बताए गए गरीबी के स्तर के आय संबंधी बुनियादी आंकड़ों को अपनाता है जबकि उसे मध्य आय वाले देशों द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले उच्च आंकड़ों का इस्तेमाल करना चाहिए। परंतु उस हिसाब से भी देखा जाए तो चीन में गरीबी का आंकड़ा प्रति 20 लोगों में से एक ही निकलता है। भारत की बात करें तो उच्च स्तर के आंकड़ों के मुताबिक आधी आबादी गरीब निकलेगी जबकि निचले स्तर पर भी आबादी का 10 प्रतिशत गरीब है। भारत यह दावा जरूर कर सकता है कि वह दुनिया के सर्वाधिक गरीब लोगों वाला देश नहीं रह गया है। यह दर्जा अब नाइजीरिया को मिल गया है जबकि कॉन्गो दूसरे स्थान पर आ सकता है। यकीनन अगर कोविड (जिसने भारत में गरीबों की संख्या बढ़ाई) नहीं आया होता तो शायद हम भी संयुक्त राष्ट्र के 2030 के पहले गरीबी उन्मूलन के लक्ष्य के करीब पहुंच चुके होते।

Friday, February 26, 2021

तीसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था संकुचन से बाहर


लगातार दो तिमाही में संकुचन का सामना करने के बाद तीसरी तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था तीसरी तिमाही में संकुचन से बाहर आ गई है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा शुक्रवार को जारी दूसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार तीसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था की संवृद्धि दर 0.4 प्रतिशत हो गई है। इस प्रकार इस वित्तीय वर्ष में अर्थव्यवस्था की संकुचन दर -8 प्रतिशत हो गई है।

सरकार ने पिछली दो तिमाहियों के संवृद्धि अनुमानों में संशोधन भी किया है। पहली तिमाही का अनुमान पहले 24.4 फीसदी था, जो अब -23.9 प्रतिशत और दूसरी तिमाही में पहले का अनुमान -7.5 प्रतिशत था, जो अब 7.3 प्रतिशत है। इससे लगता है कि इस साल की संवृद्धि पहले के अनुमानों से बेहतर होगी।

तीसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था की संवृद्धि अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में पहले से बेहतर रही। आंकड़ों से साफ है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अब मंदी के दौर से निकल आई है। दो तिमाही के बाद जीडीपी ग्रोथ पॉजिटिव ज़ोन में आई है।

देश के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने 7 जनवरी को इस वित्त वर्ष के लिए राष्ट्रीय आय (जीडीपी) का पहला अग्रिम अनुमान (एफएई) जारी किया था, जिसमें केवल कृषि को छोड़कर अर्थव्यवस्था के लगभग सभी क्षेत्रों में संकुचन (कांट्रैक्शन) का अनुमान लगाया गया है। एनएसओ के मुताबिक, देश की अर्थव्यवस्था में चालू वित्त वर्ष (2020-21) में 7.7 प्रतिशत के संकुचन का अनुमान है, जबकि इससे पिछले वित्त वर्ष 2019-20 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 4.0 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई थी। इस संकुचन के लिए कोविड-19 वैश्विक महामारी को मुख्य कारण बताया गया है।

भारत-पाक रिश्तों को लेकर सकारात्मक खबर


पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक बयान की ओर बहुत कम लोगों ने ध्यान दिया था, जिसमें उन्होंने चिकित्सा आपात स्थिति के दौरान दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र के देशों के बीच डॉक्टरों, नर्सों और एयर एंबुलेंस की निर्बाध आवाजाही के लिए क्षेत्रीय सहयोग योजना के संदर्भ में कहा कि 21 वीं सदी को एशिया की सदी बनाने के लिए अधिक एकीकरण महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान सहित 10 पड़ोसी देशों के साथ कोविड-19 प्रबंधन, अनुभव और आगे बढ़ने का रास्ता विषय पर एक कार्यशाला में उन्होंने यह बात कही थी। उस बैठक में मौजूद पाकिस्तानी प्रतिनिधि ने भारत के रुख का समर्थन किया था। बैठक में यह भी कहा गया कि अति-राष्ट्रवादी मानसिकता मदद नहीं करेगी। पाकिस्तान ने कहा कि वह इस मुद्दे पर किसी भी क्षेत्रीय सहयोग का हिस्सा होगा।

यह केवल संयोग नहीं है कि दोनों देशों ने जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर भारत और पाकिस्तान के बीच गोलीबारी रोकने के सन 2003 के समझौते को पुख्ता तरीके से लागू करने की घोषणा की है। उधर दूसरी खबर यह है कि एफएटीएफ ने पाकिस्तान को जून तक ग्रे लिस्ट में ही रखने का फैसला किया है। पाकिस्तान लगातार अपनी छवि सुधारने का प्रयास कर रहा है। तीसरे भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में सीमा पर शांति बनाए रखने की जो बातचीत चल रही है, उसके बहुत से पहलू भारत-पाकिस्तान रिश्तों से भी जुड़ते हैं। चीन की दिलचस्पी भारत से रिश्तों को एकदम खराब करने में नहीं है। यों लगता है कि भारत ने अपने मित्र देशों को घटनाक्रम से परिचित करा रखा होगा। अमेरिका की प्रतिक्रिया से ऐसा लगता है। अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता का कहना है कि हमने दोनों देशों को आपसी मसलों को सीधे बातचीत से सुलझाने की  सलाह दी है। 

भारतीय प्रतिक्रिया

युद्धविराम की घोषणा के कुछ घंटों के भीतर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि भारत, पाकिस्तान के साथ सामान्य पड़ोसी जैसे रिश्ते चाहता है और शांतिपूर्ण तरीके से सभी मुद्दों को द्विपक्षीय ढंग से सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कहा, ‘भारत, पाकिस्तान के साथ सामान्य पड़ोसी जैसे रिश्ते चाहता है और शांतिपूर्ण तरीके से सभी मुद्दों को द्विपक्षीय ढंग से सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध है।’ दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम को लेकर फैसला बुधवार आधी रात से लागू हो गया।

इन खबरों के पीछे की खबर यह है कि भारत-पाकिस्तान के बीच पिछले तीन महीने से बैक-चैनल बातचीत चल रही थी। इस सिलसिले में भारत के रक्षा सलाहकार अजित डोभाल और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के रक्षा मामलों में विशेष सलाहकार मोईद युसुफ के बीच किसी तीसरे देश में मुलाकात भी हुई है। बताया यह भी जाता है कि अजित डोभाल और पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा के बीच भी सम्पर्क है। पाकिस्तानी अखबार डॉन ने भी इसकी पृष्ठभूमि पर रोशनी डाली है। इसका मतलब यह भी है कि दोनों देशों के बीच आने वाले समय में कुछ और कदम उठाए जा सकते हैं। हालांकि पाकिस्तानी सूत्रों ने दोनों देशों के रक्षा सलाहकारों के बीच मुलाकात की बातों का खंडन किया है, पर लगता यह है कि दोनों सरकारें इस सम्पर्क को धीरे-धीरे ही सामने लाना चाहती हैं। दोनों तरफ इतनी ज्यादा बदमज़गी फैल चुकी है कि उसे रास्ते पर लाने में समय लगेगा।

Thursday, February 25, 2021

कांग्रेस के भविष्य पर पाँच राज्यों में लटकी तलवार


सोमवार 22 फरवरी को पुदुच्चेरी में वी नारायणसामी के इस्तीफे के बाद दक्षिण भारत में कांग्रेस की एकमात्र सरकार का पतन हो गया। अब केवल पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकारें हैं। इनके अलावा महाराष्ट्र और झारखंड के सत्तारूढ़ गठबंधनों में वह शामिल है। एक साल के भीतर उसकी दूसरी सरकार का पतन हुआ है। उसके पहले कर्नाटक की सरकार गई थी और पिछले साल सचिन पायलट के असंतोष के कारण राजस्थान में सरकार पर संकट आया था।

पर्यवेक्षकों के सामने अब दो-तीन सवाल हैं। अगले कुछ महीनों में पाँच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव होने वाले हैं। इनमें पुदुच्चेरी के अलावा असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल शामिल हैं। सवाल है कि इन चुनावों में कांग्रेस की सम्भावनाएं क्या हैं और उनसे आगे पार्टी की राजनीति किस रास्ते पर जाएगी? दूसरा सवाल पार्टी संगठन को लेकर है। पार्टी अध्यक्ष का चुनाव फिलहाल जून तक के लिए टाल दिया गया है। तबतक इन पाँचों राज्यों के चुनाव परिणाम आ जाएंगे, जिनसे पार्टी की दिशा और साफ होगी।

नेतृत्व का सवाल

पिछले कुछ समय से संसद के दोनों सदनों में कांग्रेसी रणनीति के अंतर्विरोध दिखाई पड़ रहे थे। लोकसभा में राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी अपेक्षाकृत आक्रामक रही है। उनका साथ दिया अधीर रंजन चौधरी, गौरव गोगोई, के सुरेश, मणिकम टैगोर और रवनीत सिंह बिट्टू ने। राज्यसभा में पार्टी के नेता गुलाम नबी आजाद और उनके सहायक आनंद शर्मा की भूमिका से हाईकमान संतुष्ट नजर नहीं आया। ये दोनों 23 उन नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने पिछले साल अपना असंतोष व्यक्त करते हुए पार्टी अध्यक्ष को चिट्ठी लिखी थी।

मई 2019 में राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद से सोनिया गांधी कार्यकारी अध्यक्ष हैं, पर व्यावहारिक रूप से राहुल गांधी ही सर्वेसर्वा हैं। उन्होंने अपने विश्वासपात्र जितेन्द्र सिंह को असम की, तारिक अनवर को केरल की, जितिन प्रसाद को पश्चिम बंगाल की और दिनेश गुंडूराव को तमिलनाडु और पुदुच्चेरी की जिम्मेदारी दी है। पाँचों गठबंधनों पर राहुल गांधी की मुहर ही होगी।

Wednesday, February 24, 2021

दिशा रवि पर लगे आरोप और अदालत से मिली जमानत का निहितार्थ


 टूलकिट मामले में गिरफ्तार दिशा रवि को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने  मंगलवार को जमानत पर रिहा कर दिया। कोर्ट ने पुलिस की कहानी और दावों को खारिज करते हुए कहा कि पुलिस के कमजोर सबूतों के चलते एक 22 साल की लड़की जिसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है,उसे जेल में रखने का कोई मतलब नहीं है। दिशा को 23 फरवरी तक न्यायिक हिरासत में लिया गया था और मंगलवार को उसके ख़त्म होने पर उन्हें मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट पंकज शर्मा के सामने पेश किया गया था और पुलिस ने चार दिन की कस्टडी की मांग की थी।

पुलिस को हिरासत नहीं मिली क्योंकि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने दिशा को एक लाख रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के दो जमानत बॉण्ड भरने की शर्त पर जमानत दे दी थी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र में नागरिक सरकार की अंतरात्मा के संरक्षक होते हैं। उन्हें केवल इसलिए जेल नहीं भेजा जा सकता क्योंकि वे सरकार की नीतियों से असहमत हैं। देशद्रोह के क़ानून का ऐसा इस्तेमाल नहीं हो सकता।

बहरहाल यह मामला खत्म नहीं हुआ है। अभी इस मामले में जाँच चलेगी। पुलिस को अब साक्ष्य लाने होंगे। अठारह पृष्ठ के एक आदेश में, न्यायाधीश राणा ने पुलिस द्वारा पेश किए गए सबूतों को ‘अल्प और अधूरा’ बताते हुए कुछ कड़ी टिप्पणियां कीं। बेंगलुरु की रहने वाली दिशा को अदालत के आदेश के कुछ ही घंटों बाद मंगलवार रात तिहाड़ जेल से रिहा कर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि हमें कोई कारण नजर नहीं आता कि 22 साल की लड़की को जेल में रखा जाए, जबकि उसका कोई आपराधिक इतिहास भी नहीं है। वॉट्सऐप ग्रुप बनाना, टूल किट एडिट करना अपने आप में अपराध नहीं है। महज वॉट्सऐप चैट डिलीट करने से दिशा रवि और ‘पोयटिक जस्टिस फाउंडेशन’ (पीजेएफ) के खालिस्तान समर्थक कार्यकर्ताओं के बीच प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करने के लिए कोई सबूत नहीं है।

राष्ट्रीय विकास के लिए जरूरी है महिला सशक्तीकरण

नल से जल

अपने दो कमरों वाले घर से महज कुछ ही गज़ की दूरी पर स्थित अपने छोटे से खेत में काम कर रही हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के बल्लही गांव की निवासी एकदम खुश है. अब से पहले करीब दो दशक तक फूलकली अपने परिवार की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए नजदीकी सप्लाई पॉइंट से बाल्टियां भरकर पानी लाती थी, जो कि उसके घर से 400 मीटर दूरी पर है.

भले ही यह दूरी बहुत ज्यादा न रही हो लेकिन दो बच्चों की मां फूलकली कहती है कि केंद्र के फ्लैगशिप कार्यक्रम ‘नल से जल ’ के तहत प्रशासन द्वारा उसके घर तक जलापूर्ति उपलब्ध कराए जाने से तीन महीने के अंदर उसके जीवन में कितना बदलाव आ गया है इस बात को केवल वही समझ सकता है जो पिछले दो दशकों से लगातार हर दिन दो बार पानी की बाल्टियां भरकर ला रहा हो.

फूलकली ने दिप्रिंट से कहा, ‘बाल्टी छूट गई. आप नहीं जानते कि यह कितनी बड़ी नियामत है. हर एक दिन, चाहे बारिश हो या फिर सर्दी मुझे पानी लाने के लिए बाहर जाना ही पड़ता था.’

द प्रिंट में पढ़ें पूरा आलेख

उपरोक्त प्रकरण मैंने सिर्फ इसलिए उधृत किया है, ताकि मैं बता सकूँ कि महिला सशक्तीकरण कैसे होता है। भारत सरकार की पत्रिका कुरुक्षेत्र में लिखने का आनंद यह है कि इसे बहुत ज्यादा लोग पढ़ते हैं। सरकारी सेवाओं की तैयारी करने वाले युवा इसे और योजना को पढ़ते हैं। मेरा यह लेख कुरुक्षेत्र के फरवरी 2021 के अंक में प्रकाशित हुआ है।

भारत को आत्मनिर्भर बनाने में स्त्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। स्त्री-शक्ति के कारगर इस्तेमाल से देश की आर्थिक संवृद्धि को तेजी से बढ़ाया जा सकता है।  महिलाओं को सशक्त बनाने का अर्थ है समूचे समाज को समर्थ बनाना। भारत में स्त्री-सशक्तीकरण के चार प्रमुख आधार हैं। 1.शिक्षा, 2.स्वास्थ्य, 3.रोजगार और 4.सामाजिक परिस्थितियाँ। पहली तीन बातों के लिए सरकारी कार्यक्रम मददगार हो सकते हैं, पर चौथा आधार सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। अलबत्ता सामाजिक परिवर्तनों पर भी शिक्षा और आधुनिक संस्कृति में आ रहे परिवर्तनों, खासतौर से बदलती तकनीक की भी, भूमिका होती है।

हाल में जब नेशनल फैमिली हल्थ सर्वे (एनएफएचएस) के पाँचवें दौर के परिणाम प्रकाशित हुए, तब एक नई तरह की जानकारी की ओर हमारा ध्यान गया। इस सर्वेक्षण में पहली बार यह पूछा गया था कि क्या आपने कभी इंटरनेट का इस्तेमाल किया है? बिहार में ऐसी महिलाओं का प्रतिशत सबसे कम था, जिनकी इंटरनेट तक पहुंच है (20.6%) और सिक्किम में सबसे ज्यादा (76.7%)। एनएफएचएस के ये आंकड़े अधूरे हैं, क्योंकि इनमें केवल 22 राज्यों के परिणाम हैं। उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे बड़े राज्यों के परिणाम इसमें शामिल नहीं हैं, फिर भी जो विवरण सामने आए हैं, वे बताते हैं कि स्त्रियों के सशक्तीकरण के संदर्भ में हमें परंपरागत बातों के अलावा कुछ नई बातों की तरफ भी ध्यान देना होगा। मसलन इंटरनेट की भूमिका।  

Tuesday, February 23, 2021

कांग्रेस हाईकमान ने पुदुच्चेरी की अनदेखी की

निवर्तमान मुख्यमंत्री वी नारायणसामी और राज्यपाल तमिलसाई सौंदरराजन

पुदुच्चेरी में कांग्रेस सरकार गिर गई है। वहाँ किसी नए गठबंधन की सरकार बनेगी या नहीं, यह बात कुछ दिन में स्पष्ट होगी। कांग्रेसी पराजय के बाद कहा जा रहा है, हालांकि पार्टी को भरोसा है कि आगामी चुनाव में उसे हमदर्दी का लाभ मिलेगा, पर मुख्यमंत्री वी नारायणसामी तथा हाईकमान ने पार्टी के भीतर असंतोष की अनदेखी की। इंडियन एक्सप्रेस में मनोज सीजी ने लिखा है कि कांग्रेस के नेता मानते हैं कि पार्टी के भीतर पनप रहे असंतोष और कुछ विधायकों की कमजोरी को लेकर नारायणसामी और हाईकमान के मन में अतिशय आत्मविश्वास था और उन्होंने स्थिति की गंभीरता को नहीं पहचाना। पार्टी ने पिछले साल मध्य प्रदेश में बनी बनाई सरकार को खोया है और उससे पहले 2019 में कर्नाटक में जेडीएस के साथ बनी गठबंधन सरकार गिरी थी।

कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि पुदुच्चेरी में उसके विधायकों को चारा डालने का काम 2018 में ही शुरू हो गया था। विधायक ई थीप्पैंथन और विज़ियावैनी वी ने तत्कालीन स्पीकर वी वैदिलिंगम से शिकायत की थी कि अद्रमुक के दो और एनआर (नमतु राज्यम) कांग्रेस के एक विधायक ने दल बदलने के लिए धन देने की पेशकश की है। स्पीकर को ऑडियो रिकॉर्डिंग सौंपी गई थीं।

सम्पर्क करने पर वैदिलिंगम ने इस बात की पुष्टि की कि उन्हें शिकायत मिली थी। उन्होंने जाँच की, तो वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाए। सन 2019 में उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि उनके बाद स्पीकर बने वीपी सिवकोलुन्दु ने इस मामले को आगे बढ़ाना उचित नहीं समझा। एक नेता का कहना है कि हम जानते थे कि कोशिशें हुई थीं…हमारे कुछ विधायक और पूर्व पीडब्ल्यूडी मंत्री ए नमस्सिवायम परेशान भी थे। पर हम इस मामले में कुछ कर नहीं पाए।

पार्टी हाईकमान से जुड़े एक नेता ने कहा, नमस्सिवायम जैसे नेताओं को महत्वपूर्ण पोर्टफोलियो दिया गया था। और क्या देते? यदि वे मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, तो उन्हें विधायकों का समर्थन हासिल करना चाहिए था। अब वे बीजेपी में शामिल हो गए हैं। बीजेपी का अद्रमुक और एनआर कांग्रेस के साथ गठबंधन होगा। एनआर कांग्रेस के नेता एन रंगासामी मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। वे पहले भी मुख्यमंत्री रहे हैं। नमस्सिवायम को क्या मिलेगा? नमस्सिवायम के ससुर रंगासामी के बड़े भाई हैं।

किसानों की आड़ में अपने-अपने खेल


देखते ही देखते किसान आंदोलन खेती से जुड़ी माँगों को छोड़कर तीन अलग-अलग रास्तों पर चला गया है। जिस आंदोलन के नेताओं ने शुरू में खुद को गैर-राजनीतिक बताया था और जिसके शुरुआती दिनों में राजनीतिक दलों के नेता उसके पास फटक नहीं रहे थे, वह राजनीतिक शक्ल ले रहा है। दूसरा रास्ता भारतीय किसान यूनियन के टिकैत ग्रुप ने पकड़ा है, जिसने इसे जाट-अस्मिता का रंग देकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में खाप-महापंचायतों और रैलियों की धूम मचा दी है। तीसरे जिस खालिस्तानी साजिश का संदेह शुरू में था, उसकी भी परतें खुल रही हैं।

आंदोलनों की वैश्विक मशीनरी भी इसमें शामिल हो गई है। आमतौर पर यह मशीनरी पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और संधारणीय विकास के सवालों को लेकर चलती है। संयोग से इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में पराली जलाने और उत्तर भारत के पर्यावरण प्रदूषण में खेती की भूमिका से जुड़े सवाल भी थे। वे इस आंदोलन के साथ गड्ड-मड्ड हो गए हैं।

पीछे रह गए खेती के सवाल

इस पूरी बहस में भारतीय कृषि की बदहाली और आर्थिक सुधारों की बात लगभग शून्य है। कोई यह समझने का प्रयास नहीं कर रहा कि भविष्य की अर्थव्यवस्था और खासतौर से रोजगार सृजन में किस किस्म की कृषि-व्यवस्था की हमें जरूरत है। खेती से जुड़े नए कानून कृषि-कारोबार और उसकी बाजार-व्यवस्था के उदारीकरण की दीर्घकालीन प्रक्रिया का एक हिस्सा हैं और उन आर्थिक सुधारों का हिस्सा हैं, जो पूरे नहीं हो पाए। सन 1950 में हमारी अर्थव्यवस्था में खेती की हिस्सेदारी 55 फीसदी से ज्यादा थी। आज 16 फीसदी से कुछ कम है। खाद्य सुरक्षा के लिए खेती की भूमिका है और हमेशा रहेगी। खासतौर से भारत जैसे देश में जहाँ गरीबी बेइंतहा है।

हमारी खेती की उत्पादकता कम है। कम से कम चीन या दूसरे ऐसे देशों के मुकाबले कम है, जिनकी तुलना हम खुद से करते हैं। खेती में पूँजी निवेश और दलहन, तिलहन के उत्पादन को बढ़ाने की जरूरत है, जिसका हमें आयात करना पड़ता है। यह काम कैसे होगा और उसके लिए किस प्रकार की नीतियाँ अपनानी होंगी, यह समझने के लिए हमें विशेषज्ञों की शरण में जाना होगा।