Sunday, September 18, 2022

समरकंद में बढ़ा भारत का रसूख


वैश्विक राजनीति और भारतीय विदेश-नीति की दिशा को समझने के लिए समरकंद में हुए शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन के संवाद पर ध्यान देना होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रूसी राष्ट्रपति पुतिन की आमने-सामने की बैठक ने दुनिया के मीडिया ने ध्यान खींचा है। मोदी ने प्रकारांतर से पुतिन से कह दिया कि आज लड़ाइयों का ज़माना नहीं है। यूक्रेन की लड़ाई बंद होनी चाहिए। पुतिन ने जवाब दिया कि मैं भारत की चिंता को समझता हूँ और लड़ाई जल्द से जल्द खत्म करने का प्रयास करूँगा। इन दो वाक्यों में छिपे महत्वपूर्ण संदेश को पढ़ें। भारत की स्वतंत्र विदेश-नीति को रूस, चीन और अमेरिका की स्वीकृति और असाधारण सम्मान मिला है। इस साल फरवरी में रूस और यूक्रेन के बीच शुरू हुए संघर्ष के बाद दोनों नेताओं के बीच पहली मुलाकात थी। दोनों के बीच कई बार फ़ोन पर बातचीत हुई है।

समरकंद का संदेश

भारत ने यूक्रेन पर आक्रमण के लिए रूस की आलोचना नहीं की है, पर यह संदेश महत्वपूर्ण है। युद्ध के मोर्चे पर रूस थक रहा है। चीन भी रूस से दूरी बना रहा है। मोदी-पुतिन वार्ता से पहले शी चिनफिंग ने भी पुतिन से कहा कि हम युद्ध को लेकर चिंतित हैं। इस साल जनवरी-फरवरी में रूस-चीन रिश्ते आसमान पर थे, तो वे अब ज़मीन पर आते दिखाई पड़ रहे हैं। अलबत्ता चीन का प्रभाव मध्य एशिया के देशों पर है। उसके वन बेल्ट, वन रोड कार्यक्रम का भारत को छोड़ सभी देश समर्थन करते हैं। संयुक्त घोषणापत्र में इसका उल्लेख है। भारत के साथ ये देश कारोबार चाहते हैं, पर पाकिस्तान जमीनी रास्ता देने को तैयार नहीं हैं। मोदी ने अपने वक्तव्य में पारगमन सुविधा का जिक्र किया है।  

भारत की भूमिका

इस संगठन में चीन और रूस के बाद भारत तीसरा सबसे बड़ा देश है, जिसका कद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ रहा है। एससीओ भी धीरे-धीरे दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन बनता जा रहा है। भारत की दिलचस्पी अपनी ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के अलावा आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई में है। सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हम भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना चाहते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था में इस साल 7.5 फीसदी की वृद्धि की उम्मीद है जो दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक होगी। उन्होंने मिलेट्स यानी बाजरे का भी ज़िक्र किया और कहा, दुनिया की खाद्य-समस्या का एक समाधान यह भी है। इसकी खेती में लागत कम होती है। इसे एससीओ देशों के अलावा दूसरे देशों में हज़ारों साल से उगाया जाता रहा है। एससीओ देशों के बीच आयुर्वेद और यूनानी जैसी पारंपरिक औषधियों का सहयोग बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए भारत पारंपरिक दवाओं पर एक नया एससीओ वर्किंग ग्रुप बनाने की पहल करेगा।

अगला अध्यक्ष

भारत को एससीओ के अगले अध्यक्ष के रूप में मनोनीत किया गया है। अगला शिखर सम्मेलन अब 2023 में भारत में होगा। एससीओ में नौ देश पूर्ण सदस्य हैं-भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, क़ज़ाक़िस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान और ईरान। ईरान की सदस्यता अगले साल अप्रेल से मानी जाएगी। तीन देश पर्यवेक्षक हैं-अफ़ग़ानिस्तान, बेलारूस और मंगोलिया। छह डायलॉग पार्टनर हैं-अजरबैजान, आर्मीनिया, कंबोडिया, नेपाल, तुर्की, श्रीलंका। नए डायलॉग पार्टनर हैं-सऊदी अरब, मिस्र, क़तर, बहरीन, मालदीव, यूएई, म्यांमार। शिखर सम्मेलन में इनके अलावा आसियान, संयुक्त राष्ट्र और सीआईएस के प्रतिनिधियों को भी बुलाया जाता है। मूलतः यह राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा सहयोग का संगठन है, जिसकी शुरुआत चीन और रूस के नेतृत्व में यूरेशियाई देशों ने की थी। अप्रैल 1996 में शंघाई में हुई एक बैठक में चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान जातीय और धार्मिक तनावों को दूर करने के इरादे से आपसी सहयोग पर राज़ी हुए थे। इसे शंघाई फाइव कहा गया था। इसमें उज्बेकिस्तान के शामिल हो जाने के बाद जून 2001 में शंघाई सहयोग संगठन की स्थापना हुई। पश्चिमी मीडिया मानता है कि एससीओ का मुख्य उद्देश्य नेटो के बराबर खड़े होना है। भारत इसमें सबसे बड़ी संतुलनकारी शक्ति के रूप में उभर कर आ रहा है।

चीनी तेवर ढीले

चीन के तेवर ढीले पड़े हैं। एससीओ का प्रवर्तन चीन ने किया है। वह अपने राजनयिक-प्रभाव का विस्तार करने के लिए इस संगठन का इस्तेमाल करना चाहता है। साथ ही यह भी लगता है कि पश्चिमी देशों का दबाव उसपर बहुत ज्यादा है। उसकी अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे मंदी की ओर बढ़ रही है। समरकंद में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ़ भी मौजूद थे, लेकिन सम्मेलन में औपचारिक भेंट के अलावा इन दोनों से पीएम मोदी की अलग से मुलाक़ात नहीं हुई। ईरानी राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी से मुलाकात जरूर हुई। पर्यवेक्षकों का अनुमान था कि पूर्वी लद्दाख के कुछ इलाकों में हाल में हुई सेनाओं की वापसी के बाद शायद शी चिनफिंग और शहबाज़ शरीफ से उनकी सीधी बात हो। चीन और पाकिस्तान के प्रति अपने रुख को नरम करने के लिए भारत तैयार नहीं है। भारत-चीन सीमा पर तनाव कम करने के लिए दोनों पक्षों में कोर कमांडर स्तर पर बातचीत के 16 दौर हो चुके हैं, लेकिन तनाव पूरी तरह कम नहीं हो सका है।

पाकिस्तान से रिश्ते

पाकिस्तान के साथ भी भारत के रिश्ते बीते कई साल से बिगड़ते गए हैं। 2019 में पुलवामा-बालाकोट हमलों और अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाए जाने के बाद दोनों देशों के राजनयिकों को वापस बुला लिया गया और सभी व्यापार संबंधों को रद्द कर दिया गया। करतारपुर कॉरिडोर के ज़रिए संबंधों को पटरी पर लाने की कोशिश की गई थी, लेकिन उसमें सफलता नहीं मिली। पिछले साल फरवरी में नियंत्रण रेखा पर गोलाबारी बंद करने का समझौता हुआ था, जिसके बाद उम्मीदें बढ़ी थीं कि दोनों के कारोबारी रिश्ते फिर से शुरू होंगे, पर पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति के कारण वह भी संभव नहीं हुआ। इमरान ख़ान के बाद शहबाज़ शरीफ़ जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने भारत के साथ संबंधों को बेहतर बनाने के संकेत दिए थे। वे समरकंद में मौजूद थे, पर वहाँ से किसी नई पहल की खबर नहीं मिली है।

स्वतंत्र विदेश-नीति

इस दौरान भारतीय विदेश-नीति की दृढ़ता और स्वतंत्र-राह स्थापित हो रही है। हाल में चीनी मीडिया के हवाले से खबर थी कि चीनी जनता मानती है कि भारत अमेरिका की पिट्ठू नहीं है, जैसाकि वहाँ की सरकार दावा करती है। पिछले दो-तीन वर्षों में भारत ने रूस के सामने भी इस बात को दृढ़ता से रखा है कि हमारी दिलचस्पी राष्ट्रीय-हितों में है। हम किसी के पिछलग्गू नहीं हैं और दब्बू भी नहीं हैं। अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत ने रूसी एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम को अपने यहाँ स्थापित कर लिया है। दूसरी तरफ अमेरिका को भी आश्वस्त किया है कि हम लोकतांत्रिक मूल्यों से आबद्ध हैं और चीनी आक्रामकता से दबने को तैयार नहीं हैं। अमेरिका ने हाल में पाकिस्तान को एफ-16 विमानों के कल-पुर्जे सप्लाई करने का फैसला किया है, जिसका भारत ने पुरज़ोर विरोध किया है।  

राष्ट्रहित सर्वोपरि

अपनी रक्षा-व्यवस्था को लेकर हम किसी प्रकार का समझौता नहीं करेंगे। हिंद प्रशांत क्षेत्र में हम क्वॉड में शामिल हैं। सुदूर पूर्व में जापान के साथ हमारी दोस्ती भी बहुत मजबूत है। समरकंद सम्मेलन के एक हफ्ते पहले भारत और जापान के बीच टू प्लस टू वार्ता हुई है, जिसमें कारोबारी रिश्तों के साथ-साथ सहयोग पर भी विचार किया गया। बंगाल की खाड़ी में 11 सितंबर से शुरू हुआ जिमेक्स (जापान-इंडिया मैरीटाइम एक्सरसाइज़) नौसैनिक युद्धाभ्यास चल रहा है, जो 22 सितंबर तक चलेगा। हर साल होने वाले मालाबार-युद्धाभ्यास में अब भारत और अमेरिका के अलावा जापान और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं। दूसरी तरफ भारत ने रूसी युद्धाभ्यास वोस्तोक-2022 में भी भाग लिया, जो 30 अगस्त से 5 सितंबर तक चला। इसमें चीन भी शामिल था। इस अभ्यास में तीनों तरह के बलों का इस्तेमाल करते हुए उसे आतंकवाद-विरोधी अभ्यास बताया गया। यह अभ्यास रूस के सुदूर पूर्व और जापान सागर में दक्षिणी कुरील द्वीप समूह (जिस पर जापान और रूस दोनों अपना दावा करते हैं) के निकटवर्ती क्षेत्र में हुआ था। भारत ने इस युद्धाभ्यास में गोरखा रेजिमेंट की थलसेना की एक टुकड़ी को भेजा, पर जापान की संवेदनशीलता को देखते हुए नौसैनिक अभ्यास से खुद को अलग रखा और अपने पोत नहीं भेजे। यह बात राजनयिक सूझ-बूझ और स्वतंत्र विदेश-नीति को रेखांकित करती है। रूसी-चीनी गरमाहट के बावजूद हमने रूस से किनाराकशी नहीं की।

रूस-चीन ठंडापन

दूसरी तरफ रूस और चीन के रिश्ते कुछ महीने पहले जितने सरगर्म लग रहे थे, उतने इस समय नज़र नहीं आ रहे हैं। इस साल क शुरु में रूस और चीन के नेताओं ने कहा था कि हमारी दोस्ती की कोई सीमा नहीं है, पर समरकंद में रिश्ते ठंडे पड़ते दिखाई पड़े। इस सम्मेलन में शी जिनपिंग ने यूक्रेन युद्ध का ज़िक्र भी नहीं किया। पिछले कुछ महीनों का अनुभव है कि आर्थिक प्रतिबंधों की मार झेल रहे रूस की चीन ने किसी किस्म की आर्थिक सहायता नहीं की। उसने रूस की सीधे तौर पर मदद करने से खुद को रोका, ताकि अपनी अर्थव्यवस्था को पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के असर से बचा सके। पश्चिमी देशों के साथ चीन अपने रिश्ते बिगाड़ना नहीं चाहता, क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था पश्चिम से जुड़ी है।

हरिभूमि में प्रकाशित

Thursday, September 15, 2022

असली-नकली लोकतंत्र की बहस में भारत


इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में हम इस बात पर बहस कर रहे हैं कि लोकतंत्र क्या है. दिसंबर, 2021 में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने ‘डेमोक्रेसी समिट’ का आयोजन किया था, जिसके जवाब में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने कहा कि असली और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र चीन में है.

हम मानते हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत में है, पर इकोनॉमिस्ट के डेमोक्रेसी इंडेक्स में भारत को उतना अच्छा स्थान नहीं दिया जाता, जितना हम चाहते हैं. पश्चिम में हमारी आलोचना हो रही है. वैसे ही जैसे 1975-77 की इमर्जेंसी के दौर में हुई थी.

सूप बोले तो बोले…

कुछ साल पहले, जब हम भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर बहस कर रहे थे एक अख़बार में खबर छपी कि चीन के लोग मानते हैं कि भारत के विकास के सामने सबसे बड़ा अड़ंगा है लोकतंत्र. कई चीनी अख़बारों ने इस आशय की टिप्पणियाँ कीं कि भारत का छुट्टा लोकतंत्र उसके पिछड़ेपन का बड़ा कारण है.

कुछ साल पहले नीति आयोग के तत्कालीन सीईओ अमिताभ कांत ने कहा, 'हमारे देश में कुछ ज्यादा ही लोकतंत्र है.' 2011 में दिल्ली आए मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री मोहम्मद महातिर ने कहा था कि अतिशय लोकतंत्र स्थिरता और समृद्धि की गारंटी नहीं होता.

चीनी आर्थिक विकास के पीछे एक बड़ा कारण वहाँ की निरंकुश राजनीतिक व्यवस्था है. क्या हमें भी वैसी व्यवस्था चाहिए? सिंगापुर की आर्थिक प्रगति के पीछे वहाँ की राजनीतिक संस्कृति है. वहाँ छोटे-छोटे अपराधों के लिए कोड़े लगाए जाते हैं.

जागरूक लोकतंत्र

सिस्टम के अलावा लोकतंत्र की इकाई के रूप में नागरिकों की गुणवत्ता भी उसकी सेहत तय करती है. लोकतंत्र की वैश्विक पहल 1988 में फिलिपीन्स के राष्ट्रपति एक्विनो ने शुरू की थी. उनके देश में फर्दिनांद मार्कोस के नेतृत्व में 20 साल से चली आ रही तानाशाही का अंत हुआ था, जिसका उत्सव मनाने के लिए एक्विनो ने जनशक्ति क्रांति या पीपुल पावर रिवॉल्यूशन नाम से यह पहल शुरू की थी.

16 सितंबर 1997 को इंटर-पार्लियामेंट्री यूनियन (आईपीयू) ने लोकतंत्र का सार्वभौमिक घोषणापत्र जारी किया, जिसका फैसला उसके एक दिन पहले काहिरा सम्मेलन में किया गया था. दस साल बाद 2007 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने हर साल 15 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय लोकतांत्रिक दिवस मनाने का फैसला किया. इसका उद्देश्य है कि दुनिया में जागरूकता फैलाना.

हमारी सफलता

हम गर्व से कहते हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत में है. हर पाँच साल में होने वाला आम चुनाव दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक गतिविधि है. चुनावों की निरंतरता और सत्ता के निर्बाध-हस्तांतरण ने हमारी सफलता की कहानी भी लिखी है. इस सफलता के बावजूद हमारे लोकतंत्र को लेकर कुछ सवाल हैं.

Tuesday, September 13, 2022

महंगाई बढ़ने से चिंता


सोमवार को जारी किए गए डेटा के अनुसार अगस्त के महीने में भारत की खुदरा मुद्रास्फीति की दर बढ़कर 7 फीसदी हो गई है, जो जुलाई में 6.71 प्रतिशत और पिछले साल अगस्त में 5.3 प्रतिशत थी। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन ने हाल में उम्मीद जाहिर की थी, यह दर गिरकर 6 फीसदी से नीची हो जाएगी, पर उनका अनुमान गलत साबित हुआ है। जुलाई के महीने में देश का खुदरा मूल्य सूचकांक (सीपीआई-सी) 6.71 हो गया था, जो पिछले पाँच महीनों में सबसे कम था।

अच्छी संवृद्धि और मुद्रास्फीति में क्रमशः आती गिरावट से उम्मीदें बढ़ी थीं, पर लगता है कि रिजर्व बैंक को पहले महंगाई से लड़ना होगा। मुद्रास्फीति में तेजी से केंद्रीय बैंक पर इस महीने के आखिर में नीतिगत दरों में बढ़ोतरी करने का दबाव बढ़ सकता है भले ही जुलाई में औद्योगिक उत्पादन में भारी गिरावट क्यों न दिखी हो।

खाद्य-वस्तुओं में तेजी

इस साल अप्रैल में यह 7.79 प्रतिशत हो गई थी, जो पिछले आठ साल का उच्चतम स्तर था। उसके बाद से इसमें गिरावट देखने को मिली है, पर अगस्त में आई तेजी चिंताजनक है। महंगाई बढ़ने का प्रमुख कारण बारिश सामान्य नहीं होने से अनाज और सब्जियों के दाम में तेजी है। अचानक गर्मी बढ़ने से उत्पादन प्रभावित होने के कारण गेहूं की मुद्रास्फीति पहले से दहाई अंक में है। वहीं कम मॉनसूनी बारिश के कारण धान की बुवाई का रकबा कम होने से उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है। इन दोनों कारणों से अनाज की महंगाई दर ऊंची बनी रहने की आशंका है।

स्थिर कीमत पर आधारित सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में 12.7 फीसदी बढ़ा, जबकि नॉमिनल जीडीपी में 26.7 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई, जो अर्थव्यवस्था में ऊँची मुद्रास्फीति के असर को दर्शाता है। इसका मतलब है कि खुदरा महंगाई भले ही क़ाबू में दिख रही हो, असली महंगाई सुरसा की तरह मुंह खोले खड़ी है। रिजर्व बैंक को इस समस्या के समाधान पर विचार करना होगा।

ब्याज दरों पर असर

इस महीने 30 सितंबर को रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक होने वाली है। अनुमान है कि बैंकों की ब्याज दरों में 25 से 35 आधार अंकों (बीपीएस) की बढ़ोतरी हो सकती है। पर अगस्त महीने के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को देखते हुए लगता है कि ब्याज दरें बढ़ेंगी। इससे सिस्टम में तरलता कम होगी और औद्योगिक उत्पादन प्रभावित होगा।

अभी 21 सितंबर को अमेरिकी फेडरल बैंक की ब्याज दरों की घोषणा होगी। रिजर्व बैंक को इस घोषणा का भी इंतजार है। उसका असर भारत में विदेशी पूँजी-निवेश पर पड़ेगा। रिजर्व बैंक मुद्रास्फीति को 2-6 प्रतिशत के बीच रखना चाहता है। फिलहाल ऐसा होता नजर आ नहीं रहा है।

रिज़र्व बैंक जब से महंगाई को कम करने की कोशिश कर रहा है, तब से यह दूसरी बार है जब खुदरा मुद्रास्फीति आरबीआई के छह प्रतिशत की ऊपरी सीमा से लगातार आठवें महीने ऊपर बनी हुई है। इससे पहले अप्रैल, 2020 से नवंबर, 2020 के दौरान यह स्थिति देखने को मिली थी। विनिर्माण, बिजली और खनन जैसे क्षेत्रों में खराब प्रदर्शन के कारण देश में औद्योगिक उत्पादन (आईआईपी) की वृद्धि दर जुलाई में सुस्त पड़कर चार महीने के निचले स्तर 2.4 प्रतिशत पर आ गई। पिछले महीने जून में यह 12.7 प्रतिशत थी।

सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, विनिर्माण क्षेत्र में इस साल जुलाई में 3.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई जो चार महीने का निचला स्तर है। बिजली क्षेत्र में 2.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई जो छह महीने का निचला स्तर है। खनन क्षेत्र में कोयला उत्पादन बढ़ने के बावजूद 16 महीने के अंतराल के बाद जुलाई में 3.3 प्रतिशत की गिरावट आई।

ग्रामीण महंगाई

अगस्त में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के कारण ईंधन महंगाई दर घटकर 10.78 फीसदी रह गई लेकिन अनाज, फल एवं सब्जियां और मसाले में तेजी दर्ज की गई। महीने के दौरान अजान की कीमतों में 9.6 फीसदी, फल की कीमतों में 7.4 फीसदी, सब्जियों की कीमतों में 7.4 फीसदी और मसालों की कीमतों में 14.9 फीसदी की वृद्धि हुई है। जहां तक सेवाओं का सवाल है तो शिक्षा और घरेलू वस्तुएं एवं सेवाएं अगस्त में कहीं महंगी हो गईं।

 

अगस्त में ग्रामीण महंगाई दर शहरी मुद्रास्फीति के मुकाबले अधिक रही। महीने के दौरान ग्रामीण महंगाई दर 7.15 फीसदी रही जबकि शहरी महंगाई दर 6.7 फीसदी दर्ज की गई। राज्यों के बीच पश्चिम बंगाल में 8.9 फीसदी, गुजरात में 8.2 फीसदी, तेलंगाना में 8.1 फीसदी और महाराष्ट्र में 7.99 फीसदी मुद्रास्फीति दर्ज की गई। इन राज्यों में मुद्रास्फीति राष्ट्रीय औसत से ऊपर रहीं। जबकि दिल्ली (4.2 फीसदी), हिमाचल प्रदेश (4.9 फीसदी) और कनार्टक (4.98 फीसदी) में महंगाई दर देश की औसत मुद्रास्फीति से कम रही।

औद्योगिक उत्पादन सुस्त

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की ओर से जारी आंकड़ों से पता चलता है कि जुलाई में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) में वृद्धि की रफ्तार सुस्त पड़ गई। महीने के दौरान औद्योगिक उत्पादन सूचकांक घटकर महज 2.4 फीसदी रह गया जो एक महीना पहले 12.7 फीसदी रहा था। मॉनसूनी बारिश के कारण खनन गतिविधियां थमने से खनन उत्पादन में 3.3 फीसदी का संकुचन देखा गया। जबकि विनिर्माण उत्पादन में 3.2 फीसदी की वृद्धि हुई और बिजली उत्पादन में 2.3 फीसदी का इजाफा हुआ।

जहां तक उपयोग आधारित उद्योगों का सवाल है तो अर्थव्यवस्था में निवेश मांग का प्रतिनिधित्व करने वाले पूंजीगत वस्तु उद्योग में 5.8 फीसदी की वृद्धि हुई जबकि कंज्यूमर नॉन-ड्यूरेबल्स में 2 फीसदी का संकुचन दिखा जो ग्रामीण भारत में कमजोर मांग का संकेत देता है।

 

Sunday, September 11, 2022

‘मिशन 24’ की राजनीतिक यात्राएं


राष्ट्रीय-राजनीति का चुनाव-विमर्श अचानक तेज हो गया है। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा जिस दिन शुरू हो रही थी, उसके एक दिन पहले नीतीश कुमार दिल्ली में 2024 के चुनाव की संभावनाओं को लेकर मुलाकातें कर रहे थे। उन्होंने राहुल गांधी और राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल के अलावा शरद पवार, एचडी कुमारस्वामी, ओम प्रकाश चौटाला, सीताराम येचुरी और दूसरे कुछ नेताओं से भी मुलाकात की। पार्टी उन्हें पीएम-उम्मीदवार के तौर पर पेश कर रही है, वहीं नीतीश कुमार ने दिल्ली में कहा कि मैं दावेदार नहीं बनना चाहता। सिर्फ विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास कर रहा हूँ। 4 सितंबर को रामलीला मैदान में हुई रैली में राहुल गांधी ने कहा कि नरेंद्र मोदी का मुकाबला सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस ही कर सकती है। यानी कि बीजेपी को हराना है तो उन्हें कांग्रेस के नेतृत्व में ही आना होगा। पर विरोधी-खिचड़ियाँ अलग-अलग बर्तनों में पक रही हैं। विपक्ष बिखरा हुआ है, लेकिन एकजुटता की कोशिशें जारी है। इस एकता का एक प्रदर्शन 25 सितंबर को हरियाणा में हिसार के नजदीक विपक्ष की रैली में देखने को मिलेगा।

एकता के प्रयास

विरोधी राजनीति के नजरिए से बिहार में हुए राजनीतिक बदलाव के बाद संभावनाएं बेहतर हुई हैं। इसका संकेत ममता बनर्जी के ताजा बयान से मिलता है। उन्होंने कहा, नीतीश जी, अखिलेश, हेमंत और मेरा वादा है कि ये चार मिलकर बीजेपी को 2024 लोकसभा चुनाव में 100 सीटों पर रोक देंगे। इनमें से पश्चिम बंगाल में 42, बिहार में 40, उत्तर प्रदेश में 80 और झारखंड में 14 लोकसभा सीटे हैं। भाजपा कहती है कि उनके पास 300 सीटें हैं। उन्हें याद रखना चाहिए कि राजीव गांधी के पास 400 सीटें थीं लेकिन अगले चुनाव में कांग्रेस हार गई। बीजेपी भी हारेगी। इन राज्यों में उसे 100 सीटों का नुकसान होगा। देश के अन्य हिस्सों की पार्टियां भी जल्द ही हमारे साथ आएंगी। क्या बीजेपी को 100 सीटों पर रोका जा सकता है?

कांग्रेस से परहेज

ध्यान देने वाली बात है कि ममता बनर्जी ने राहुल गांधी, केजरीवाल, शरद पवार और चंद्रशेखर राव के नामों का उल्लेख नहीं किया है। क्या इस बयान को भविष्य के राजनीतिक गठजोड़ का संकेत मानें? या सिर्फ बयान मानें, जो माहौल बनाने के लिए है? सवाल तीन हैं। नंबर एक, क्या राष्ट्रीय स्तर पर विरोधी एकता है? दो, क्या इस एकता में कांग्रेस भी शामिल है? और तीन, बीजेपी के पास इसकी काट की रणनीति क्या है? इन सवालों के आगे-पीछे अनेक किंतु-परंतु हैं। इंडियन नेशनल लोकदल अपने संस्थापक देवीलाल की जयंती पर 25 सितंबर को रैली का आयोजन कर रहा है। इसमें कांग्रेस को छोड़कर विपक्षी दलों के कई नेताओं को निमंत्रण भेजा गया है। दूसरी तरफ हालांकि ममता बनर्जी विरोधी-एकता की समर्थक हैं, पर उनकी पार्टी ने उन्हें प्रधानमंत्री पद के योग्य उम्मीदवार माना है। कोलकाता में आयोजित पार्टी की बैठक के दौरान उन्होंने जिन दलों के नाम लिए उनमें कांग्रेस का नाम गायब था। यह भी साफ है कि बीजेपी को हराने के लिए लेफ्ट के साथ भी उनका गठबंधन नहीं होने वाला है।

भारत जोड़ो यात्रा

राहुल गांधी की यात्रा का उद्देश्य क्या है? कन्याकुमारी से यात्रा शुरू करते हुए राहुल गांधी ने दो तरह की बातें कहीं, यह मार्च राष्ट्रीय ध्वज के मूल्यों के तले सभी भारतीयों को एकजुट करने की कोशिश है, जिसका मूल सिद्धांत विविधता है। साथ ही यह भी कहा कि हिंदुत्व की विचारधारा के साए में ये मूल्य अब खतरे में हैं। ज़ाहिर है कि यह कांग्रेस को बचाने की कोशिश है और 2024 के चुनाव के पहले की राजनीतिक गतिविधि। यह यात्रा पार्टी के झंडे के पीछे नहीं चल रही है, बल्कि तिरंगे के पीछे है, पर संदेश राजनीतिक है और कांग्रेस के नेतृत्व में बनी योजना भी राजनीतिक है। अब इसे विरोधी एकता के लिए किए जा रहे प्रयासों के साथ जोड़कर देखें।

धुरी या परिधि?

विरोधी दलों की एकता में कांग्रेस कहाँ है? धुरी में या परिधि में? कांग्रेस साबित करना चाहती है कि यह एकता उसके नेतृत्व में ही संभव है, जबकि क्षेत्रीय स्तर पर दूसरे नेताओं को लगता है कि कांग्रेस अब नेतृत्व के लायक नहीं रही। डीएमके, राकांपा और शिवसेना जैसे दल कहते रहे हैं कि कांग्रेस के बिना विरोधी एकता संभव नहीं है, पर जल्द ही होने वाले बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के चुनाव में राकांपा और शिवसेना मिलकर लड़ेंगे। कांग्रेस उसमें शामिल नहीं होगी। महाराष्ट्र में सरकार गिरने के बाद महा विकास अघाड़ी (एमवीए) की पहली बैठक में तीनों सहयोगी पार्टियों ने फैसला किया कि शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस विधानसभा और लोकसभा दोनों चुनाव एक साथ लड़ेंगी, जबकि स्थानीय निकाय चुनावों को साथ लड़ने पर कोई सहमति नहीं बनी।

यात्रा की राजनीति

राहुल गांधी खुद को हिंदुत्व का सबसे मुखर आलोचक, संघवाद और उदारवाद का प्रवर्तक मानते हैं। पर चुनाव परिणामों को देखें, तो लगता है कि वे पर्याप्त जन समर्थन जुटाने की स्थिति में नहीं हैं। कांग्रेस ने हिंदू-जनाधार को खो दिया है, जबकि बीजेपी ने गहरी जड़ें जमा ली हैं। राहुल गांधी अब यात्रा के फॉर्मूले का इस्तेमाल करना चाहते हैं। अतीत में महात्मा गांधी, चंद्रशेखर, मुरली मनोहर जोशी से लेकर लालकृष्ण आडवाणी तक ने इसका लाभ लिया है। क्या राहुल गांधी को इसका लाभ मिलेगा? आंशिक-परिणाम सामने आने में कुछ महीने लगेंगे और अंतिम-परिणाम 2024 के चुनाव के बाद आएंगे।  

Thursday, September 8, 2022

शेख हसीना की राजनीतिक सफलता पर निर्भर हैं भारत-बांग्लादेश रिश्ते


शेख हसीना और नरेंद्र मोदी की मुलाकात और दोनों देशों के बीच हुए सात समझौतों से ज्यादा चार दिन की इस यात्रा का राजनीतिक लिहाज से महत्व है. दोनों की कोशिश है कि विवाद के मसलों को हल करते हुए सहयोग के ऐसे समझौते हों, जिनसे आर्थिक-विकास के रास्ते खुलें.

 

बांग्लादेश में अगले साल के अंत में आम चुनाव हैं और उसके तीन-चार महीने बाद भारत में. दोनों चुनावों को ये रिश्ते भी प्रभावित करेंगे. दोनों सरकारें अपनी वापसी के लिए एक-दूसरे की सहायता करना चाहेंगी.  

 

पिछले महीने बांग्लादेश के विदेशमंत्री अब्दुल मोमिन ने एक रैली में कहा था कि भारत को कोशिश करनी चाहिए कि शेख हसीना फिर से जीतकर आएं, ताकि इस क्षेत्र में स्थिरता कायम रहे. दो राय नहीं कि शेख हसीना के कारण दोनों देशों के रिश्ते सुधरे हैं और आज दक्षिण एशिया में भारत का सबसे करीबी देश बांग्लादेश है.

 

विवादों का निपटारा

असम के एनआरसी और हाल में रोहिंग्या शरणार्थियों से जुड़े विवादों और बांग्लादेश में कट्टरपंथियों के भारत-विरोधी आंदोलनों के बावजूद दोनों देशों ने धैर्य के साथ मामले को थामा है.

 

दोनों देशों ने सीमा से जुड़े तकरीबन सभी मामलों को सुलझा लिया है. अलबत्ता तीस्ता जैसे विवादों को सुलझाने की अभी जरूरत है. इन रिश्तों में चीन की भूमिका भी महत्वपूर्ण है, पर बांग्ला सरकार ने बड़ी सफाई से संतुलन बनाया है.

 

बेहतर कनेक्टिविटी

पाकिस्तान के साथ बिगड़े रिश्तों के कारण पश्चिम में भारत की कनेक्टिविटी लगभग शून्य है, जबकि पूर्व में काफी अच्छी है. बांग्लादेश के साथ भारत रेल, सड़क और जलमार्ग से जुड़ा है. चटगाँव बंदरगाह के मार्फत भारत अपने पूर्वोत्तर के अलावा दक्षिण पूर्व के देशों से कारोबार कर सकता है.

 

इसी तरह बांग्लादेश का नेपाल और भूटान के साथ कारोबार भारत के माध्यम से हो रहा है. बांग्लादेश की इच्छा भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग कार्यक्रम में शामिल होने की इच्छा भी है.

 

शेख हसीना सरकार को आर्थिक मोर्चे पर जो सफलता मिली है, वह उसका सबसे बड़ा राजनीतिक-संबल है. भारत के साथ विवादों के निपटारे ने इसमें मदद की है. इन रिश्तों में विलक्षणता है.

 

सांस्कृतिक समानता

दोनों एक-दूसरे के लिए ‘विदेश’ नहीं हैं. 1947 में जब पाकिस्तान बना था, तब वह ‘भारत’ की एंटी-थीसिस था, और आज भी दोनों के अंतर्विरोधी रिश्ते हैं. पर ‘सकल-बांग्ला’ परिवेश में बांग्लादेश, ‘भारत’ जैसा लगता है, विरोधी नहीं.

 

बेशक वहाँ भी भारत-विरोध है, पर सरकार के नियंत्रण में है. कुछ विश्लेषक मानते हैं कि पिछले एक दशक में शेख हसीना के कारण भारत का बांग्लादेश पर प्रभाव बहुत बढ़ा है. क्या यह मैत्री केवल शेख हसीना की वजह से है? ऐसा है, तो कभी नेतृत्व बदला तो क्या होगा?

 

यह केवल हसीना शेख तक सीमित मसला नहीं है. अवामी लीग केवल एक नेता की पार्टी नहीं है. पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी काफी लोग बांग्लादेश की स्थापना को भारत की साजिश मानते हैं. ज़ुल्फिकार अली भुट्टो या शेख मुजीब की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं या ऐसा ही कुछ और.

 

आर्थिक सफलता

केवल साजिशों की भूमिका थी, तो बांग्लादेश 50 साल तक बचा कैसे रहा? बचा ही नहीं रहा, बल्कि आर्थिक और सामाजिक विकास की कसौटी पर वह पाकिस्तान को काफी पीछे छोड़ चुका है, जबकि 1971 तक वह पश्चिमी पाकिस्तान से काफी पीछे था.

मंटो का लेख ‘हिंदी और उर्दू’


आज़ादी के फौरन बाद के वर्षों की बात है। साहित्यकार सआदत हसन मंटो ने एक छोटी सी कथा लिखी, जिसमें स्वतंत्रता संग्राम के शुरूआती दिनों से ही खड़े हो गए भाषा-विवाद पर टिप्पणी थी। हिंदी बनाम उर्दू बहस मंटो को अजीब लगी। उन्होंने इस बहस को लेमन-सोडा और लेमन-वॉटर की तुलना से समझाया।

हिंदी और उर्दूशीर्षक इस लेख में हिंदू-मुस्लिम अलगाव के बेतुके तर्कों पर रोशनी पड़ती है। गंगा-जमुनी संस्कृति पर इसे व्यंग्य के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। मंटो ने लिखा, मेरी समझ से ये अभी तक बालातर है। कोशिश के बावजूद इस का मतलब मेरे ज़ेहन में नहीं आया। हिंदी के हक़ में हिंदू क्यों अपना वक़्त ज़ाया करते हैं। मुसलमान, उर्दू के तहफ़्फ़ुज़ के लिए क्यों बेक़रार हैं...? ज़बान बनाई नहीं जाती, ख़ुद बनती है और ना इनसानी कोशिशें किसी ज़बान को फ़ना कर सकती हैं। भारत के जीवन, समाज और राजनीति में पैदा हुए विभाजन पर मैं एक किताब लिखना चाहता हूँ। विभाजन जिसने भाषा की शक्ल में जन्म लिया। उसी सिलसिले में इस लेख को रेख्ता से लिया है। आप इसे पढ़ें और अपने निष्कर्ष निकालें।

हिंदी और उर्दू

सआदत हसन मंटो

हिंदी और उर्दू का झगड़ा एक ज़माने से जारी है। मौलवी अब्दुल-हक़ साहब, डाक्टर तारा चंद जी और महात्मा गांधी इस झगड़े को समझते हैं लेकिन मेरी समझ से ये अभी तक बालातर है। कोशिश के बावजूद इस का मतलब मेरे ज़ेहन में नहीं आया। हिंदी के हक़ में हिंदू क्यों अपना वक़्त ज़ाया करते हैं। मुसलमान, उर्दू के तहफ़्फ़ुज़ के लिए क्यों बेक़रार हैं...? ज़बान बनाई नहीं जाती, ख़ुद बनती है और ना इनसानी कोशिशें किसी ज़बान को फ़ना कर सकती हैं। मैंने इस ताज़ा और गर्मा-गर्म मौज़ू पर कुछ लिखना चाहा तो ज़ैल का मुकालमा तैयार हो गया।''

मुंशी निरावन प्रसाद-इक़बाल साहब ये सोडा आप पिएँगे?

मिर्ज़ा मुहम्मद इक़बाल जी। हाँ मैं पियूँगा।

मुंशी-आप लेमन क्यों नहीं पीते?

इक़बाल-यूं ही, मुझे सोडा अच्छा मालूम होता है। हमारे घर में सब सोडा ही पीते हैं।

मुंशी-तो गोया आपको लेमन से नफ़रत है।

इक़बाल-नहीं तो... नफ़रत क्यों होने लगी मुंशी निरावन प्रसाद... घर में चूँकि सब यही पीते हैं। इसलिए आदत सी पड़ गई है। कोई ख़ास बात नहीं बल्कि मैं तो समझता हूँ कि लेमन सोडे के मुक़ाबले में ज़्यादा मज़ेदार होता है।

मुंशी-इसीलिए तो मुझे हैरत होती है कि मीठी चीज़ छोड़कर आप खारी चीज़ क्यों पसंद करते हैं। लेमन में ना सिर्फ ये कि मिठास घुली होती है बल्कि ख़ुशबू भी होती है। आपका क्या ख़्याल है।

इक़बाल-आप बिलकुल बजा फ़रमाते हैं... पर।

Sunday, September 4, 2022

अर्थव्यवस्था का मंथर-प्रवाह


भारत की अर्थव्यवस्था (जीडीपी) चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में 13.5 फीसदी बढ़ी है। सामान्य-दृष्टि से इस संख्या को बहुत उत्साहवर्धक माना जाएगा, पर वस्तुतः यह उम्मीद से कम है। विशेषज्ञों का  पूर्वानुमान 15 से 16 प्रतिशत का था, जबकि रिज़र्व बैंक को 16.7 प्रतिशत की उम्मीद थी।  अब इस वित्त वर्ष के लिए ग्रोथ के अनुमान को विशेषज्ञ 7.2 और 7.5 प्रतिशत से घटाकर 6.8 से 7.00 प्रतिशत मानकर चल रहे हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की ओर से 31 अगस्त को जारी आँकड़ों के अनुसार जीडीपी की इस वृद्ध में सेवा गतिविधियों में सुधार की भूमिका है, बावजूद इसके व्यापार, होटल और परिवहन क्षेत्र की वृद्धि दर अब भी महामारी के पूर्व स्तर (वित्त वर्ष 2020 की जून तिमाही) से कम है। हालांकि हॉस्पिटैलिटी से जुड़ी गतिविधियों में तेजी आई है। जीडीपी में करीब 60 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाले, उपभोग ने जून की तिमाही में 29 फीसदी की मजबूत वृद्धि दर्ज की।

नागरिक का भरोसा

उपभोक्ताओं ने पिछले कुछ समय में जिस जरूरत को टाला था, उसकी वापसी से निजी व्यय में इजाफा हुआ है। इससे इशारा मिलता है कि खर्च को लेकर उपभोक्ताओं का भरोसा बढ़ा है। ‘पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स’ (पीएमआई), क्षमता का उपयोग, टैक्स उगाही, वाहनों की बिक्री के आँकड़े जैसे सूचकांक बताते हैं कि इस वित्त वर्ष के पहले कुछ महीनों में वृद्धि की गति तेज रही। अगस्त में मैन्युफैक्चरिंग की पीएमआई 56.2 थी, जो जुलाई में 56.4 थी। यह मामूली वृद्धि है, पर मांग में तेजी और महंगाई की चिंता घटने के कारण वृद्धि को मजबूती मिली है। खाद्य सामग्री से इतर चीजों के लिए बैंक क्रेडिट में मजबूत वृद्धि भी मांग में सुधार का संकेत देती है। दूसरी तरफ सरकारी खर्च महज 1.3 फीसदी बढ़ा है। सरकार राजकोषीय घाटे को काबू करने पर ध्यान दे रही है।

बेहतरी की ओर

जीडीपी के ये आँकड़े अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर को पेश नहीं करते हैं, पर इनके सहारे काफी बातें स्पष्ट हो रही हैं। पहला निष्कर्ष है कि कोविड और उसके पहले से चली आ रही मंदी की प्रवृत्ति को हमारी अर्थव्यवस्था पीछे छोड़कर बेहतरी की ओर बढ़ रही है। पर उसकी गति उतनी तेज नहीं है, जितना रिजर्व बैंक जैसी संस्थाओं को उम्मीद थी। इसकी वजह वैश्विक-गतिविधियाँ भी हैं। घरेलू आर्थिक गतिविधियों में व्यापक सुधार अभी नहीं आया है। आने वाले समय में ऊँची महंगाई, कॉरपोरेट लाभ में कमी, मांग को घटाने वाली मौद्रिक नीतियों और वैश्विक वृद्धि की मंद पड़ती संभावनाओं के रूप में वैश्विक चुनौतियों का अंदेशा बना हुआ है। मुद्रास्फीति को काबू में करने के लिए ब्याज दरें बढ़ने से अर्थव्यवस्था में तरलता की कमी आई है, जिससे पूँजी निवेश कम हुआ है। नए उद्योगों और कारोबारों के शुरू नहीं होने से रोजगार-सृजन पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। इससे उपभोक्ता सामग्री की माँग कम होगी। सरकारी खर्च बढ़ने से इस कमी को कुछ देर के लिए ठीक किया जा सकता है, पर सरकार पर कर्ज बढ़ेगा, जिसका ब्याज चुकाने की वजह से भविष्य के सरकारी खर्चों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा और विकास-योजनाएं ठप पड़ेंगी। इस वात्याचक्र को समझने और उसे दुरुस्त करने की एक व्यवस्था है। भारत सही रास्ते पर है, पर वैश्विक-परिस्थितियाँ आड़े आ रही हैं। अच्छी खबर यह है कि पेट्रोलियम की कीमतें गिरने लगी हैं।

Saturday, September 3, 2022

कांग्रेस की ‘सफाई’ या ‘सफाए’ की घड़ी

गुलाम नबी आज़ाद ने इस्तीफा ऐसे मौके पर दिया है, जब कांग्रेस पार्टी बड़े जनांदोलन की तैयारी कर रही है। 4 सितंबर को दिल्ली में महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ रैली है। 7 सितंबर से राहुल गांधी भारत-जोड़ो यात्रा पर निकलने वाले हैं। यह यात्रा महात्मा गांधी की यात्राओं की याद दिला रही हैं। क्या गांधी की तरह राहुल भी इस देश का मन जीतने में समर्थ होंगे?  

इस दौरान पार्टी अध्यक्ष का चुनाव होगा, जिसका कार्यक्रम घोषित कर दिया गया है। यह तय है कि नया अध्यक्ष गैर-गांधी होगा, पर एकछत्र नेता राहुल गांधी ही होंगे। नया अध्यक्ष चरण-पादुका धरे भरत की भूमिका में होगा। लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी की परीक्षा गुजरात, हिमाचल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक जैसे राज्यों के विधानसभा चुनावों में होगी।

पार्टी के तीन मसले हैं। नेतृत्व, संगठन और विचारधारा या नैरेटिव। तीनों का अब एक स्रोत होगा, सर्वोच्च नेता। 1969 के बाद पार्टी का यह एक और रूपांतरण है। वह कैसा होगा, इसका अभी केवल अनुमान लगाया जा सकता है। मई 2014 में चुनाव हारने के बाद कार्यसमिति की बैठक में बाउंसबैक की उम्मीद जाहिर की गई थी। उस बात को आठ साल से ज्यादा समय हो चुका है और पार्टी लड़खड़ा रही है।

इस साल फरवरी में पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार ने पार्टी छोड़ते हुए कहा था कि जल्द ही दूसरे कई नेता कांग्रेस छोड़ेंगे और सोनिया गांधी जानती हैं कि क्यों छोड़ेंगे। पलायन का यह सिलसिला पिछले कई वर्षों से चल रहा है, पर किसी ने अपनी बात को ऐसी कड़वाहट के साथ नहीं कहा, जैसा गुलाम नबी आजाद ने कहा है। जयराम रमेश ने उन्हें मोदी-फाइड बताया है।

Friday, September 2, 2022

भारत से खास रिश्तों के लिए याद रहेंगे गोर्बाचेव

गोर्बाचेव जब भारत आए

भारत की जनता के मन में कुछ विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के प्रति विशेष सम्मान है। इनमें अमेरिकी जॉन एफ कैनेडी और रूसी मिखाइल गोर्बाचेव के नाम शामिल किए जा सकते हैं। पूर्व सोवियत संघ के अंतिम नेता मिखाइल गोर्बाचेव (गोर्बाचोव या गोर्बाचौफ) को हिंदी वर्तनी के अलग-अलग रूपों की तरह अलग-अलग कारणों से याद कर सकते हैं। शीतयुद्ध खत्म कराने या अनायास हो गए साम्यवादी व्यवस्था के विखंडन में उनके योगदान के लिहाज से या फिर भारत के साथ उनके विशेष रिश्तों के कारण। यह आलेख भारत के साथ रिश्तों को लेकर ही है। उन रिश्तों को समझने के लिए भी उस पृष्ठभूमि को समझना होगा, जिसकी वजह से वे महत्वपूर्ण हैं।

सन 1985 में जब वे सत्ता में आए, तब उनका इरादा सोवियत संघ को भंग करने का नहीं था, बल्कि वे अपनी व्यवस्था को लेनिन के दौर में वापस ले जाकर जीवंत बनाना चाहते थे। वे ऐसा नहीं कर पाए, क्योंकि अपने समाज के जिन अंतर्विरोधों को उन्होंने खोला, उन्हें पिटारे में बंद करने की कोई योजना उनके पास नहीं थी। उन्हें न केवल सोवियत संघ में, बल्कि रूस के इतिहास में सबसे साफ-सुथरे और निष्पक्ष चुनाव कराने का श्रेय जाता है। उन्होंने व्यवस्था को सुधारने की लाख कोशिश की, फिर भी सफल नहीं हुए। दूसरी तरफ कट्टरपंथियों ने उनके तख्ता पलट की कोशिशें भी कीं, वे भी सफल नहीं हुए। अंततः 1991 में सोवियत संघ 1991 बिखर गया।

ताजा हवा का झोंका

गोर्बाचेव सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के पहले ऐसे महासचिव थे, जिनका जन्म 1917 की क्रांति के बाद हुआ था और कई उम्रदराज नेताओं के बाद उन्हें राजनीति में ताज़ा हवा के झोंके जैसा माना जाता था। उनका खुला रवैया उन्हें अपने दूसरे नेताओं से अलग बनाता था। उनके सामने पहली चुनौती ध्वस्त हो रही सोवियत अर्थव्यवस्था में फिर से जान फूंकने की थी। वे कम्युनिस्ट पार्टी में सिर से लेकर पैर तक बदलाव करने की इच्छा लेकर आए थे, जो लगभग असंभव संकल्प था। उन्होंने दुनिया को दो नए रूसी शब्द दिए, ग्लासनोस्तयानी खुलापन और 'पेरेस्त्रोइका' यानी पुनर्गठन। उनके विचार से नए निर्माण के लिए खुलापन जरूरी है। पर यह खुलापन बाजार की अर्थव्यवस्था का खुलापन नहीं है।

एक बात उन्होंने पार्टी प्रतिनिधियों से 1985 में कही थी, हमें अपने जहाज को बचाना है, जो समाजवाद है। उनके नेतृत्व में पहली बार सोवियत संघ की सर्वोच्च संस्था 'कांग्रेस ऑफ़ पीपुल्स डेप्युटीज़' के चुनाव हुए थे। वैश्विक स्तर पर वे गोर्बाचेव शीत युद्ध को ख़त्म करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन के साथ निरस्त्रीकरण संधि भी की। उनके खुलेपन और लोकतांत्रिक भावना पर पहला उन गणराज्यों पर पड़ा, जो कालांतर में सोवियत संघ में शामिल हुए थे। उन इलाकों में आज़ादी की मांग उठने लगी।

Wednesday, August 31, 2022

कर्नाटक में गणेशोत्सव से जुड़े दो विवादों की खबरों के कारण गलतफहमी


कर्नाटक के दो ईदगाह मैदानों में गणेश पूजा की खबरों को कुछ लोग शायद ठीक से पढ़ नहीं पाए हैं। कुछ लोगों को लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी रात में कर्नाटक हाईकोर्ट ने आदेश क्यों दे दिया। एक मैदान बेंगलुरु में और दूसरा हुब्बली में है। मंगलवार (30 अगस्त) को सुप्रीम कोर्ट के तीन सदस्यों के पीठ ने बेंगलुरु के मैदान में यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया। यानी कि वहाँ गणेश चतुर्थी से जुड़े समारोह नहीं हो सकेंगे।

राज्य सरकार ने इस मैदान पर 31 अगस्त और 1 सितंबर को गणेश चतुर्थी से जुड़े समारोह की अस्थायी अनुमति दी थी। यह संपत्ति वक्फ बोर्ड की है या सरकार की, इसे लेकर विवाद है। अदालत ने इस मामले से जुड़े पक्षों से कहा कि वे इस मसले पर कर्नाटक हाईकोर्ट के सामने अपना पक्ष रखें। हाईकोर्ट में इस मामले पर 23 सितंबर को सुनवाई होगी।  

हुब्बली

दूसरी तरफ मंगलवार की रात कर्नाटक हाईकोर्ट ने हुब्बली के मेयर द्वारा शहर के ईदगाह में गणेश चतुर्थी के समारोह की अनुमति देने से जुड़े आदेश को रोकने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि हुब्बली के ईदगाह मैदान के स्वामित्व को लेकर कोई विवाद नहीं है। दोनों मामलों के तथ्य अलग-अलग हैं। अंजुमन-ए-इस्लाम को बेंगलुरु के मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का लाभ नहीं दिया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर अंजुमन ने हाईकोर्ट में अर्जी दी थी।

रात 10 बजे, न्यायमूर्ति अशोक एस किनागी ने चैंबर में मामले की सुनवाई की और कहा कि विचाराधीन भूमि हुबली धारवाड़ नगर निगम के स्वामित्व में है। यह ज़मीन 999 साल के पट्टे पर अंजुमन को दी गई है। फिर भी म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के पास ज़मीन के इस्तेमाल का अधिकार है। अदालत ने रात 1 बजकर 45 मिनट पर याचिका खारिज करने का आदेश जारी किया।

Monday, August 29, 2022

ट्विन-टावर प्रकरण: भ्रष्टाचार की बहती धारा में स्नान करने वालों को सजा कौन और कब देगा?

नोएडा की ट्विन-टावर गिरा दी गईं, पर अपने पीछे कुछ सवाल छोड़ गई हैं। इनका निर्माण अवैध था, तो उन्हें बनने क्यों दिया गया? जब ये अधूरी थीं, तभी रोकते।  अब इन्हें गिराकर एक गलत काम की सजा तो दे दी गई, पर इनके निर्माण की अनुमति देने वालों का क्या हुआ? देश में भ्रष्टाचार की गंगा बहती है। वह दो टावरों तक सीमित नहीं है। चंद अफसर ही इसमें शामिल नहीं हैं। अलबत्ता यह प्रकरण जनता की लड़ाई का प्रस्थान-बिंदु बन सकता है।

करोड़ों रुपये खर्च करके जब ये इमारतें बन ही गई थीं, तो बनाने वालों को सजा देने के बाद इमारतों का कोई इस्तेमाल कर लेते। इन्हें गिराने से क्या मिला? तमाम इमारतें गलत बनी हुई हैं। उनसे जुर्माना वगैरह लेकर आप चलने देते हैं। बहरहाल इन्हें अदालत के फैसले से गिराया गया है, इसलिए उसे स्वीकार कर लेते हैं।

इमारतें गिर जाने के बाद एमराल्ड कोर्ट के निवासियों को क्या उनका गार्डन वापस मिलेगा? उन अफसरों का क्या होगा, जिन्होंने यह सब होने दिया? इस सोसायटी रहने वालों में सरकारी अफसर, वकील और रिटायर्ड जज भी हैं। उनके प्रयासों से यह कानूनी-उपचार संभव हो पाया। क्या वे अफसरों पर कार्रवाई के लिए भी कोई मुहिम चलाएंगे? क्या ऐसी मुहिम मामूली लोग भी चला सकेंगे, जो बिल्डरों की गलत-सलत हरकतों के शिकार हैं।  

इस प्रकरण का एक असर यह है कि एनसीआर क्षेत्र में तमाम सोसाइटियों के निवासी अब अपने मसलों को उठाने पर विचार कर रहे हैं। शिकायतें कई तरह की हैं, पर न्याय के दरवाजे दूर हैं। बिल्डरों ने अफसरों की मदद से तमाम नियम-विरुद्ध काम किए हैं। ट्विन-टावरों ने चेतना जगाने का काम किया है। अब जरूरत इस बात की है कि लोग मिलकर कानूनी उपाय खोजें।

Sunday, August 28, 2022

ट्विन-टावरों को गिराकर क्या मिला?


नोएडा की ट्विन-टावर गिरा दी गईं, पर अपने पीछे कुछ सवाल छोड़ गई हैं। पहला सवाल है कि इनका निर्माण अवैध था, तो उन्हें बनने क्यों दिया गया? इन्हें गिराकर एक गलत काम की सजा तो मिल गई, पर इनके निर्माण की अनुमति देने वालों का क्या हुआ? एक बात यह भी कही जा रही है कि करोड़ों रुपये खर्च करके जब ये इमारतें बन ही गई थीं, तो इन्हें बनाने वालों को सजा देने के बाद इन इमारतों का कोई इस्तेमाल कर लेते। इन्हें गिराने से क्या मिला?

इमारतें गिर जाने के बाद एमराल्ड कोर्ट को विशाल गार्डन मिलेगा। पर ज्यादा महत्वपूर्ण विषय यह है कि इससे जुड़े अफसरों पर हुई क्या कार्रवाई हुई। एमराल्ड कोर्ट में रहने वालों में सरकारी अफसर, वकील और रिटायर्ड जज भी हैं। उनके प्रयासों से यह कानूनी-उपचार संभव हो पाया। देखना होगा कि संबद्ध अफसरों पर कार्रवाई के लिए भी क्या कोई मुहिम चलेगी?

पूरे एनसीआर क्षेत्र में तमाम सोसाइटियों के निवासी अब इस बात पर विचार कर रहे हैं कि वे किस प्रकार अपने मसलों को उठाएं। इस पूरे क्षेत्र में बिल्डरों ने जबर्दस्त निर्माण-कार्य किया है, जिसमें कई तरह के नियम-विरुद्ध काम हुए हैं। इन कार्यों में अफसरों की मिली-भगत रही है। ट्विन-टावरों ने चेतना जगाने का काम किया है। अब जरूरत इस बात की है कि इनमें रहने वाले मिलकर कानूनी उपाय खोजें।

आज़ाद ने खोले कांग्रेसी अंतर्विरोध


गुलाम नबी आजाद के इस्तीफे की चिट्ठी हाल के वर्षों में कांग्रेस के अंतर्विरोधों का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसलिए महत्वपूर्ण यह देखना है कि इस पत्र पर कांग्रेस पार्टी की प्रतिक्रिया क्या है। उस प्रतिक्रिया से ही पता लगेगा कि पत्र में जो लिखा गया है, वह किस हद तक सही है और किस हद तक एक दिलजले की भड़ास। यह पत्र सोनिया गांधी को लिखा गया है और इसमें राहुल गांधी को निशाना बनाया गया है। उन्होंने लिखा है, ‘पार्टी के सभी वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं को किनारे कर दिया गया है, अब अनुभवहीन चाटुकारों की मंडली पार्टी चला रही है।’ दूसरी तरफ कहा जा रहा है कि गुलाम नबी को कांग्रेस ने हीरो बनाया। संगठन-सरकार में कई पदों से नवाजा। दो बार लोकसभा सांसद बनाया, जम्मू-कश्मीर का सीएम बनाया। चुनाव की हार से बचाकर पाँच बार राज्यसभा सांसद बनाया। उन्होंने मलाई काटी, आज दगाबाजी कर रहे हैं। पार्टी नेतृत्व को इस बात पर विचार करना चाहिए कि इतना सीनियर नेता पार्टी क्यों छोड़ रहा है। क्या इसलिए कि उसे राज्यसभा की सीट नहीं मिली और दिल्ली में रहने के लिए उसे बंगला चाहिए? राज्यसभा की सीट तो अब की बात है, गुलाम नबी कम से कम तीन साल से तो अपनी बात कह ही रहे हैं। यह बात उन्होंने पार्टी के फोरम पर ही की है। वे अपने विचार पार्टी अध्यक्ष को लिखे पत्रों में व्यक्त करते रहे हैं। उनकी बात सुनने के बजाय उनपर आरोपों की बौछार क्यों लगी?

परिवार खामोश

सोनिया, राहुल और प्रियंका की कोई प्रतिक्रिया इन पंक्तियों के लिखे जाने तक नहीं आई है। बाकी सीनियर नेताओं के स्वर वैसे ही हैं, जैसे 1969 में इंदिरा कांग्रेस बनने के बाद से रहे हैं। शुक्रवार को दिन में पार्टी ने अजय माकन की एक प्रेस कांफ्रेंस रखी थी, पर उसका एजेंडा दिल्ली की आम आदमी पार्टी को निशाना बनाने का था। गुलाब नबी के इस्तीफे की खबर आने के बाद वह प्रेस कांफ्रेंस रद्द कर दी गई, क्योंकि स्वाभाविक रूप से सवाल इस इस्तीफे को लेकर ही होते। आज 28 अगस्त को कार्यसमिति की बैठक बुलाई गई है। इस बैठक का विषय पार्टी अध्यक्ष के चुनाव के कार्यक्रम को तय करना है। क्या उसमें कांग्रेस के आंतरिक प्रश्नों पर खुलकर विचार-विमर्श होगा? इस बैठक के विमर्श से भी आपको पार्टी की सोच-समझ का अंदाज लगेगा।

संकट या नया दौर?

कांग्रेस के लिए यह संकट की घड़ी है या नहीं है, यह अलग-अलग दृष्टिकोणों पर निर्भर करता है। पिछले नौ वर्षों में, यानी मोदी के आने के बाद, काफी लोग पार्टी छोड़कर गए हैं। हरबार कहा जाता है कि अच्छा हुआ, गंध गई। यानी कि अब ताजगी का नया दौर शुरू होगा। इस नजरिए से कहा जा सकता है कि गुलाम नबी का जाना, अच्छा ही हुआ। अब पार्टी का नया दौर शुरू होगा। पार्टी को अगले तीन हफ्तों में अपने अध्यक्ष का चुनाव करना है। साल के अंत में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होने वले हैं। 

अगले साल कर्नाटक, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव हैं। दूसरे कई राज्यों में भी चुनाव हैं, पर पाँच में पहले चार राज्यों में कांग्रेस के महत्वपूर्ण हित जुड़े हुए हैं। राजनीति की निगाहें इससे आगे हैं, वह 2024 और 2029 के चुनावों तक देख रही है। गुलाम नबी के रहने या जाने से कांग्रेस की सेहत पर भले ही बड़ा फर्क पड़ने वाला नहीं हो, फिर भी उनके इस्तीफे से धक्का जरूर लगेगा। ऐसी परिघटनाओं से कार्यकर्ता का मनोबल गिरता है। उनके इस्तीफे के पहले पार्टी-प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने इस्तीफा दिया है। दोनों ने बदहाली के लिए राहुल गांधी को जिम्मेदार माना है। इसके पहले भी जो लोग पार्टी छोड़कर गए हैं, सबका निशाने पर राहुल गांधी रहे हैं।

वरिष्ठों की उपेक्षा

पाँच पेज के पत्र में गुलाम नबी आजाद ने सोनिया गांधी की तारीफ़ की है और कहा है कि उन्होंने यूपीए-1 और यूपीए-2 को शानदार तरीके से चलाया जिसकी वजह थी कि तब वरिष्ठ और अनुभवी लोगों की सलाह मानी जाती थी। उनके अनुसार पार्टी के शीर्ष पर एक ऐसा आदमी थोपा गया जो गंभीर नहीं है। राहुल गांधी का रवैया 2014 में कांग्रेस पार्टी की पराजय का कारण बना। अब पार्टी के अहम फ़ैसले राहुल गांधी की चाटुकार मंडली कर रही है और अनुभवी नेताओं को दरकिनार कर दिया गया है। फ़ैसले राहुल गांधी के सिक्योरिटी गार्ड और पीए कर रहे हैं। इसी चाटुकार मंडली के इशारे पर जम्मू में मेरा जनाज़ा निकाला गया। जिन्होंने यह हरकत की उनकी तारीफ़ पार्टी के महासचिवों और राहुल गांधी ने की। इसी मंडली ने कपिल सिब्बल पर भी हमला किया, जबकि आपको और आपके परिवार को बचाने के लिए वे क़ानूनी लड़ाई लड़ रहे थे। उन्होंने राहुल गांधी के अध्यादेश फाड़ने के कृत्य को बचकाना बताया। पार्टी अब इस हाल में पहुँच गई है कि वहाँ से वापस नहीं लौट सकती।

Friday, August 26, 2022

गुलाम नबी का इस्तीफा और नाज़ुक घड़ी में कांग्रेस


इसे कांग्रेस के लिए संकट का समय न भी कहें, तो बहुत नाजुक समय जरूर कहेंगे। पार्टी को अगले तीन हफ्तों में अपने अध्यक्ष का चुनाव करना है। साल के अंत में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होने वले हैं। अगले साल कर्नाटक
, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव हैं।

दूसरे कई राज्यों में भी चुनाव हैं, पर पाँच में पहले चार राज्यों में कांग्रेस के महत्वपूर्ण हित जुड़े हुए हैं। तेलंगाना में उसकी स्थिति फिलहाल अच्छी नहीं है, पर कांग्रेस की राष्ट्रीय स्थिति को बनाए रखने में तेलंगाना की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। पर राजनीति की निगाहें इससे आगे हैं, वह 2024 और 2029 के चुनावों तक देख रही है।

गुलाम नबी के रहने या जाने से कांग्रेस की सेहत पर भले ही बड़ा फर्क पड़ने वाला नहीं हो, फिर भी उनके इस्तीफे से धक्का जरूर लगेगा। ऐसी परिघटनाओं से कार्यकर्ता का मनोबल गिरता है। उनके इस्तीफे के पहले पार्टी-प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने इस्तीफा दिया है। दोनों ने बदहाली के लिए राहुल गांधी को जिम्मेदार माना है। इसके पहले भी जो लोग पार्टी छोड़कर गए हैं, सबका निशाना राहुल गांधी रहे हैं।

चुनाव-कार्यक्रम

घोषित कार्यक्रम के अनुसार कांग्रेस के अध्यक्ष पद की चुनाव प्रक्रिया 21 अगस्त से 20 सितंबर के बीच पूरी की जानी है। चुनाव की तारीख कार्यसमिति तय करेगी, जिसकी बैठक 28 को होने जा रही है। इस चुनाव में सभी राज्यों के 9,000 से अधिक प्रतिनिधि मतदाता होंगे। मधुसूदन मिस्त्री की अध्यक्षता में पार्टी की चुनाव-समिति ने कहा है कि हम समय पर चुनाव के लिए तैयार हैं।

वर्तमान स्थितियों में लगता है कि इस प्रक्रिया को पूरा करने में 20 सितंबर की समय सीमा का उल्लंघन हो सकता है। पार्टी के संगठन महामंत्री केसी वेणुगोपाल ने स्पष्ट किया है कि चुनाव टाले नहीं जा रहे हैं। अलबत्ता कुछ तकनीकी कारणों से उनमें देरी हो रही है। कहा यह भी जा रहा है कि बीच में पितृ-पक्ष पड़ने के कारण पार्टी देरी कर रही है। राज्यों के अध्यक्षों का चुनाव भी 20 अगस्त तक होना था, लेकिन यह प्रक्रिया किसी भी राज्य में पूरी नहीं हुई है।