Thursday, August 11, 2022

नीतीश को पीएम-प्रत्याशी बनाने और राष्ट्रीय गठबंधन के दावों के पीछे जल्दबाजी है

सतीश आचार्य का एक पुराना कार्टून

बिहार में सरकार बन जाने के बाद दो सवाल खड़े हुए हैं। स्वाभाविक रूप से पहला सवाल होना चाहिए था कि क्या नई सरकार, पिछली सरकार से बेहतर साबित होगी
? आश्चर्यजनक रूप से यह दूसरा सवाल बन गया है। उसकी जगह पहला सवाल है कि क्या नीतीश कुमार 2024 के चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए विरोधी दलों के सर्वमान्य प्रत्याशी होंगे? सर्वमान्य का एक मतलब यह भी है कि क्या बिहार का महागठबंधन विरोधी दलों का राष्ट्रीय महागठबंधन बनेगा? जैसा कि प्रशांत किशोर मानते हैं कि यह परिघटना राज्य-केंद्रित है, इससे 2024 के चुनाव को लेकर राष्ट्रीय-निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते हैं।

मनोबल बढ़ेगा

बेशक बिहार के परिदृश्य से विरोधी दलों का मनोबल ऊँचा होगा। इसे विरोधी महागठबंधन का प्रस्थान-बिंदु भी मान सकते हैं, पर उसके लिए थोड़ा इंतजार करना होगा। अभी हम उत्साह देख रहे हैं। नई सरकार से कुछ लोग निराश भी होंगे। उन अंतर्विरोधों को सामने आने दीजिए। मीडिया में अभी से खबरें हैं कि तेजस्वी बेहतर मुख्यमंत्री साबित होते। बिहार की राजनीति जाति और संप्रदाय-केंद्रित है। राज्य में सौ से ज्यादा अति-पिछड़े वर्ग हैं, जिनका नेतृत्व विकसित हो रहा है। इन नए नेताओं की मनोकामना का अनुमान अभी नहीं लगाया जा सकता है।

बीजेपी अकेली

महागठबंधन के समर्थक इस बात से खुश हैं कि सात दलों के उनके गठबंधन के सामने बीजेपी अकेली है। कौन जाने कुछ महीनों बाद बीजेपी के साथ कुछ दल आ जाएं। बहुत ज्यादा दलों के गठजोड़ के जोखिम भी हैं। अभी यह भी देखना होगा कि जेडीयू और राजद के रिश्ते किस प्रकार के रहेंगे। जेडीयू के भीतर के हालचाल भी पता लगने चाहिए। गठबंधन जब बनता है, तब जो उत्साहवर्धक बातें की जाती हैं, उनके व्यावहारिक-प्रतिफलन का इंतजार भी करना चाहिए।

जल्दबाजी

पहली नज़र में लगता है कि नीतीश कुमार को पीएम प्रत्याशी बनाने और महागठबंधन को राष्ट्रीय मोर्चा की शक्ल देने की कोशिश जल्दबाजी में की जा रही है। इसकी घोषणा राष्ट्रीय जनता दल या जेडीयू कैसे कर सकते हैं? दोनों की राष्ट्रीय राजनीति में क्या भूमिका है? नीतीश कुमार ने खुलकर कभी नहीं कहा कि मैं प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनना चाहता हूँ, पर 10 अगस्त को उन्होंने शपथ लेने के बाद यह कहकर एक नई पहेली पेश कर दी कि मैं 2024 के बाद मुख्यमंत्री पद पर नहीं रहूँगा।

चौबीस या पच्चीस?

बिहार विधानसभा के चुनाव तो 2025 में होने हैं, 2024 में नहीं। लोकसभा चुनाव नहीं, तो 2024 से उनका आशय और क्या हो सकता है? नीतीश कुमार को पीएम मैटीरियल के तौर पर स्थापित करने की कोशिश बरसों पहले से की जा रही है। 2013 में जब नरेंद्र मोदी का नाम बीजेपी के नेता के रूप में लाने की कोशिश की जा रही थी, तब नीतीश कुमार ने उनका विरोध करते हुए कहा था कि देश का प्रधानमंत्री धर्म-निरपेक्ष और उदारवादी होना चाहिए। एक तरह से 2014 में उन्होंने खुद को मोदी के बराबर खड़ा करने की कोशिश की थी, पर वे सफल नहीं हुए। इसके लिए राष्ट्रीय-स्तर पर जो वजन चाहिए, वह उनके पास नहीं था।

कितनी मनोकामनाएं?

नीतीश की छवि अच्छे प्रशासक की भी है, पर अच्छा प्रशासक होना पीएम पद का प्रत्याशी नहीं बनाता। उसके लिए राजनीतिक-प्रभाव और विरोधी दलों के बीच सहमति की जरूरत होगी। नीतीश कुमार 2024 के चुनाव में कितने प्रत्याशियों को जिताकर लोकसभा में ला सकेंगे? पीएम-प्रत्याशी बनने की मनोकामना कुछ और नेताओं के मन में है। उन सबके बीच एक सर्वसम्मत प्रत्याशी का नाम तय करने की प्रक्रिया काफी जटिल होगी। उसमें सबसे बड़ी भूमिका कांग्रेस की होगी, क्योंकि बीजेपी के बाद वह अकेली पार्टी है, जिसकी उपस्थिति देशभर में है।

कांग्रेस का महत्व

हालांकि कांग्रेस के सांसदों की संख्या छोटी है, पर उसकी राष्ट्रीय उपस्थिति बीजेपी से भी बेहतर है। पीएम-प्रत्याशी तो बाद की बात है, पहले देखना होगा कि क्या विरोधी दलों का कोई ऐसा मोर्चा बनना संभव है, जिसमें कांग्रेस, एनसीपी, तृणमूल, सीपीएम, सीपीआई, सीपीएमएल, राजद, जेडीयू, सपा, बसपा, टीआरएस, तेदेपा वगैरह-वगैरह हों?

 

 

Wednesday, August 10, 2022

अब किस दिशा में जाएगी बिहार की राजनीति?

तेलंगाना टुडे में सुरेंद्र का कार्टून

काफी समय से चर्चा थी कि नीतीश कुमार एक बार फिर पाला बदलेंगे, पर शायद उन्हें सही मौके और ऐसे ट्रिगर की तलाश थी, जिसे लेकर वे अपना रास्ता बदलते। यों इसकी संभावना काफी पहले से व्यक्त की जा रही थी। जब जेडीयू के अंदर आरसीपी सिंह पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा, तब इसकी पुष्टि होने लगी। उसके पहले बिहार विधानसभा के शताब्दी समारोह के निमंत्रण पत्र में नीतीश कुमार का नाम नहीं डाला गया, तब भी इस बात का इशारा मिला था कि टूटने की घड़ी करीब है।

बहरहाल बदलाव हो चुका है, इसलिए ज्यादा बड़ा सवाल है कि राज्य की राजनीति अब किस दिशा में बढ़ेगी? क्या तेजस्वी यादव और उनकी पार्टी ज्यादा समझदार हुई है? कांग्रेस की भूमिका क्या होगी? शेष छोटे दलों का व्यवहार कैसा रहेगा वगैरह?

पीएम मैटीरियल

क्या नीतीश कुमार 2024 में प्रधानमंत्री पद के लिए विरोधी दलों के प्रत्याशी बनकर उभरना चाहते हैं?  राहुल गांधी, ममता बनर्जी, केसीआर और अरविंद केजरीवाल की मनोकामना भी शायद यही है। बहरहाल आरसीपी सिंह ने दो ऐसी बातें कहीं जो नीतीश के कट्टर विरोधी भी नहीं करते। उन्होंने कहा, "नीतीश कुमार कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते, सात जनम तक नहीं।" यह भी कि, "जनता दल यूनाइटेड डूबता जहाज़ है। आप लोग तैयार रहिए।" इन बातों से भी नीतीश कुमार को निजी तौर चोट लगी।

मंगलवार की शाम एक पत्रकार ने प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी से जुड़ा सवाल किया, तो नीतीश ने कहा, नो कमेंट। 2014 से कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार में पीएम मैटीरियल है। जेडीयू संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने इस बार भी गठबंधन से अलग होने से पहले प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि नीतीश कुमार में प्रधानमंत्री बनने के तमाम गुण हैं।

नीतीश कुमार को नज़दीक से जानने वाले कई नेताओं ने तसदीक की है कि प्रधानमंत्री पद की चर्चा होने पर नीतीश खुश होते हैं। आरसीपी सिंह तो उनके बहुत क़रीब रहे हैं। वे उनके मनोभावों को समझते हैं। बीजेपी के राज्यसभा सांसद सुशील मोदी ने ट्वीट किया, यह सरासर सफ़ेद झूठ है कि भाजपा ने बिना नीतीश जी की सहमति के आरसीपी को मंत्री बनाया था। यह भी झूठ है कि जेडीयू को बीजेपी तोड़ना चाहती थी। बल्कि जेडीयू ही तोड़ने का बहाना खोज रही थी।

क्षेत्रीय दलों का भविष्य

उधर 31 जुलाई को बीजेपी के अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि आने वाले दिनों में सभी क्षेत्रीय दल ख़त्म हो जाएंगे। फिर जिस तरह से महाराष्ट्र में बीजेपी ने शिवसेना को तोड़ा, उसे लेकर भी नीतीश कुमार सशंकित थे। 2020 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू को प्राप्त सीटों में भारी गिरावट भी एक इशारा था। ऊपर कही गई ज्यादातर बातें निजी या पार्टी के हितों को लेकर हैं, जो वास्तविकता है। पर राजनीति पर विचारधारा का कवच चढ़ा हुआ है, जिसका जिक्र अब हो रहा है। यूनिफॉर्म सिविल कोड और तीन तलाक़ जैसे मुद्दों पर और हाल में अग्निवीर कार्यक्रम को लेकर भी उनका दृष्टिकोण बीजेपी के नजरिए से अलग था। जातीय जनगणना को लेकर भी नीतीश कुमार का रास्ता अलग था।

नई ऊर्जा

माना जा रहा है कि इस उलटफेर से विरोधी पार्टियों में नई ऊर्जा देखने को मिलेगी। करीब-करीब ऐसी ही बात 2015 में जब पहली बार महागठबंधन बना तब कही गई थी। हालांकि उस ऊर्जा की हवा नीतीश कुमार ने ही 2017 में निकाल दी। उसके बाद 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी और अखिलेश यादव की जोड़ी भी विफल रही। पर 2018 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद जेडीएस और कांग्रेस की सरकार बन गई, तब एकबार फिर ऊर्जा नजर आने लगी। पर वह ऊर्जा ज्यादा देर चली नहीं। सवाल है कि क्या अब लालू और नीतीश की जोड़ी सफल होगी? इसका जवाब नई सरकार के पहले छह महीनों में मिलेगा। महागठबंधन लंबे समय तक बना रहा और उसके भीतर टकराव नहीं हुआ, तो बिहार की राजनीति में बदलाव होगा। पर इसकी विपरीत प्रतिक्रिया भी होगी।

मित्र-विहीन भाजपा

तेजस्वी यादव ने कहा है कि हिंदी पट्टी वाले राज्यों में बीजेपी का अब कोई भी अलायंस पार्टनर नहीं बचा। उन्होंने कहा, बीजेपी किसी भी राज्य में अपने विस्तार के लिए क्षेत्रीय पार्टियों का इस्तेमाल करती है, फिर उन्हीं पार्टियों को ख़त्म करने के मिशन में जुट जाती है। बिहार में भी यही करने की कोशिश हो रही थी। राजनीति में ऐसा ही होता है। बीजेपी का विस्तार होगा तो किसकी कीमत पर? उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह ने सपा का विस्तार किया तो गायब कौन हुआ? कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी।

बिहार में भी दो दशक पहले बीजेपी की ताकत क्या थी और आज क्या है? पार्टनर एक-दूसरे के करीब आते हैं, तो अपने हित के लिए आते हैं। नीतीश कुमार और बीजेपी एक-दूसरे के करीब अपने हितों के लिए आए थे। और आज नीतीश कुमार राजद के पास गए हैं, तो इसलिए कि वे 2024 और उससे आगे की राजनीति में खड़े रह सकें।

ताकत बढ़ी

बीजेपी के समर्थक मानते हैं कि फौरी तौर पर राज्य में धक्का जरूर लगा है, पर दीर्घकालीन दृष्टि से बीजेपी के लिए यह फ़ायदे की बात है। बीजेपी खेमे में 2020 के चुनाव परिणाम को लेकर नाराज़गी थी कि जेडीयू को 122 सीटें नहीं दी गई होती, तो बीजेपी अकेले दम पर सरकार बना सकती थी। देखना यह है कि बिहार की जातीय संरचना में अब बीजेपी क्या करती है। नीतीश कुमार के कारण कुर्मी वोट का एक आधार उसके साथ था। इसके अलावा अति-पिछड़े वोटर भी एनडीए के साथ थे। क्या पार्टी बिहार के जातीय-समूहों के बीच से नए नेतृत्व को खोज पाएगी? इसका जवाब मिलने में भी कम से कम छह महीने लगेंगे।

 

 

चीनी जहाज के चक्कर में फँस गया श्रीलंका


श्रीलंका ने चीन के पोत युआन वांग-5 के हंबनटोटा को टाल दिया है, जिसकी वजह से श्रीलंका-चीन और भारत तीनों के रिश्तों में ख़लिश आई है। पर संकट से घिरे श्रीलंका के लिए यह मसला गले की हड्डी बनने जा रहा है। यह मामला अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। श्रीलंका सरकार ने फिलहाल पोत के आगमन को स्थगित किया है। उसे पक्की तौर पर रोका नहीं है। चीन सरकार इसे लेकर आग-बबूला है। कोलंबो स्थित चीनी दूतावास ने श्रीलंका सरकार से अपनी नाराज़गी व्यक्त की है। दूसरी तरफ यह भी साफ है कि भारत इस पोत को किसी कीमत पर हंबनटोटा तक आने नहीं देगा।

चीन इसे वैज्ञानिक सर्वेक्षण पोत बता रहा है, जबकि भारत मानता है कि यह जासूसी पोत है। इस पोत पर जिस तरह के रेडार और सेंसर लगे हैं, उनका इस्तेमाल उपग्रहों की ट्रैकिंग के लिए हो सकता है, तो अंतर महाद्वीपीय प्रक्षेपास्त्रों के लिए भी किया जा सकता है। बात सिर्फ इस्तेमाल की है। चीन इस पोत को असैनिक और वैज्ञानिक-शोध से जुड़ा बता रहा है, पर पेंटागन की सालाना रिपोर्ट के अनुसार इस पोत का संचालन चीनी सेना की स्ट्रैटेजिक सपोर्ट फोर्स करती है। यह चीनी नौसेना का पोत है।

11 को आने वाला था

भारत के पास शको-शुब्हे के पक्की वजहें हैं, इसीलिए जैसे ही इस पोत के आगमन की सूचना मिली तब से भारत लगातार विरोध कर रहा था। श्रीलंका इस मामले पर फैसला करने में देरी लगाता रहा। यह जहाज 11 से 17 अगस्त के बीच हंबनटोटा बंदरगाह पर रुकने वाला था। श्रीलंका की मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, जहाज के आगमन को स्थगित करने के पहले राष्ट्रपति रानिल विक्रमासिंघे ने चीन के राजदूत छी ज़ेनहोंग के साथ बंद कमरे में बैठक की थी। हालांकि, श्रीलंका सरकार ने ऐसी बैठक से इनकार किया है।

Tuesday, August 9, 2022

बिहार में एक अध्याय खत्म, दूसरा शुरू


बिहार में भाजपा और जेडीयू का गठबंधन अंततः टूट गया है। नीतीश कुमार ने राज्यपाल फागू चौहान को  मुलाकात करके अपना इस्तीफा सौंप दिया और अब कल वे नई सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगे। गवर्नर हाउस से निकल कर वे तेजस्वी यादव के घर पहुँचे। फिर तेजस्वी के साथ दुबारा राज्यपाल से मुलाकात करने गए और 164 विधायकों का समर्थन-पत्र सौंपा। इस प्रकार राज्य में एक राज्नीतिक अध्याय खत्म हुआ और दूसरा शुरू हो गया है। कांग्रेस विधायक शकील अहमद खान ने कहा है कि नीतीश कुमार महागठबंधन के मुख्यमंत्री होंगे। सब कुछ तय हो गया है। इसका मतलब है कि इसकी बातचीत कुछ दिन पहले से चल रही थी। 

राजभवन से वापसी के बाद नीतीश और तेजस्वी यादव ने पत्रकारों के साथ बातचीत में विश्वास जताया कि उनका गठबंधन बेहतर काम करेगा। अब कल से नई सरकार बनने की प्रक्रिया शुरू होगी। उसके बाद पता लगेगा कि राज्य की राजनीति किस दिशा में जा रही है। बीजेपी को ओर से कोई बड़ी प्रतिक्रिया नहीं आई है। केवल इतना कहा गया है कि हमने गठबंधन धर्म का निर्वाह किया, फिर भी नीतीश कुमार ने गठबंधन को तोड़ा है। 

किसे क्या मिलेगा?

हालांकि कहा जा रहा है कि महागठबंधन वैचारिक लड़ाई का हिस्सा है। इसका सरकार बनाने या गिराने से वास्ता नहीं है, पर नई सरकार का गठन होने के पहले ही मीडिया में खबरें चल रही हैं कि किसे कौन सा मंत्रालय मिलेगा। मसलन खबर है कि तेजस्वी यादव ने गृह मंत्रालय की मांग की है। गृह मंत्रालय अभी तक नीतीश के पास है।

अभी तक खामोशी से इंतजार कर रहे बीजेपी के खेमे की खबर है कि पार्टी के कोर ग्रुप की बैठक आज शाम तारकिशोर प्रसाद के आवास पर हुई। अब कुछ समय तक राज्य की राजनीति में नए गठबंधन और नई सरकार से जुड़े मसले हावी रहेंगे। फिलहाल दिलचस्पी का विषय यह है कि नीतीश कुमार ने बीजेपी का साथ क्यों छोड़ा और क्या राजद और कांग्रेस के साथ उनकी ठीक से निभ पाएगी या नहीं।

बिहार का धुँधला परिदृश्य


बिहार का राजनीतिक-परिदृश्य अभी तक अस्पष्ट है। राज्य के ज्यादातर दलों के पास गठबंधनों के इतने अच्छे-बुरे अनुभव हैं कि वे सावधानी से कदम बढ़ा रहे हैं। सत्ता-समीकरण इसबार बदले तो वे काफी दूर तक जाएंगे। नहीं बदले, तो उनमें कुछ बुनियादी बदलाव होंगे। पर सबसे महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि नीतीश कुमार ने परिस्थितियों का आकलन किस प्रकार किया है और बीजेपी की योजना क्या है। राज्य में जो हो रहा है, उसका स्रोत कहाँ है वगैरह

हालांकि भारतीय जनता पार्टी ने कहा है कि हमारा गठबंधन दुरुस्त है, पर नीतीश कुमार को समझाने उसका कोई वरिष्ठ नेता इसबार पटना नहीं गया है। जो भी बातें हैं, वह या तो फोन पर हो रही हैं या दिल्ली और पटना में बैठे नेताओं के मार्फत। इस प्रसंग से जुड़े ज्यादातर दलों की बैठकें चल रही हैं। सब इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि नीतीश कुमार की अगली घोषणा क्या होगी।

जेडीयू ने बीजेपी से अलग होने का साफ संकेत दे दिया है। इस संकेत का मतलब क्या है? क्या यह फौरी तौर पर धमकी है या दृढ़-निश्चय? क्या उन्हें राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर जाने में अपना बेहतर भविष्य दिखाई पड़ रहा है या वे केंद्रीय-मंत्रिमंडल में बेहतर भागीदारी चाहते हैं? क्या बीजेपी के रणनीतिकार नीतीश कुमार की भंगिमाओं को सही पढ़ पा रहे हैं या वे ये वे अंधेरे में हैं? 

Monday, August 8, 2022

बिहार की नई राजनीतिक पहेली


बिहार में जेडीयू और बीजेपी गठबंधन की दरार अब साफ दिखाई पड़ रही है। रविवार 7 अगस्त को नीतीश कुमार के नीति आयोग की बैठक में नहीं गए और सोमवार को जेडीयू ने आरोप लगाया है कि नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ साज़िश रची जा रही है। इस विवाद के शुरू होने के साथ ही दोनों पार्टियों के लोकसभा चुनाव साथ में लड़ने को लेकर भी सवाल खड़े हो गए थे।
बिहार में विधानसभा चुनाव 2025 में होंगे, पर तबतक गठबंधन चलेगा या नहीं, यह सवाल खड़ा हो रहा है। इस समय राज्य के राजनीतिक-गठबंधन के टूटने को लेकर कयास जरूर है, पर यह टूट आसान नहीं लग रही है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि टूट चाहता कौन है। 

भाजपा और जदयू के बीच दूरी बढ़ने की शुरुआत कुछ महीने पहले हुई थी। जाति आधारित जनगणना के मुद्दे पर नीतीश कुमार भाजपा से अलग-थलग नजर आए और उन्होंने विपक्षी दलों के साथ जाति आधारित जनगणना की मांग की। कुछ महीने पूर्व नीतीश पीएम की कोरोना पर बुलाई गई बैठक से दूर रहे। हाल में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के सम्मान में दिए गए भोज, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के शपथ ग्रहण समारोह से भी दूरी बनाई। इससे पहले गृह मंत्री अमित शाह की ओर से बुलाई गई मुख्यमंत्रियों की बैठक से दूरी बनाने के बाद अब नीति आयोग की बैठक से भी दूर रहे।

सोनिया गांधी से बात

ताजा विवाद जेडीयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह पर बेहिसाब संपत्ति और अनियमितताओं के आरोपों से शुरू हुआ है और आज खबरें हैं कि नीतीश कुमार ने सोनिया गांधी से फोन पर बात की है। मीडिया में खबरें हैं कि पिछले 15 दिनों में उनकी एकबार नहीं तीन बार सोनिया गांधी बात हुई है। मंगलवार को राजद और जदयू ने विधानमंडल दल की बैठक बुलाई है। पहले राजद और फिर जदयू की बैठक होगी।

जेडीयू ने शनिवार को आरसीपी सिंह को कारण बताओ नोटिस भेजा था, जिसके बाद आरसीपी सिंह ने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया। आरसीपी सिंह ने कहा कि जेडीयू डूबता हुआ जहाज़ है, हमारे जितने साथी हैं वे जल्द ही कूद जाएँगे और जहाज़ जल्दी डूब जाएगा। आरसीपी सिंह जेडीयू से एकमात्र नेता थे, जो पार्टी की ओर से केंद्र में मंत्री बने थे, जिसके लिए नीतीश कुमार की सहमति नहीं थी।

इस बार जेडीयू ने उन्हें राज्यसभा का टिकट नहीं दिया और वे मंत्री भी नहीं रहे। आरसीपी सिंह के बयान पर जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ़ ललन सिंह ने रविवार को कहा, ''जदयू डूबता हुआ जहाज़ नहीं, बल्कि दौड़ता हुआ जहाज़ है और आने वाले समय में पता लग जाएगा। कुछ लोग उस जहाज़ में छेद करना चाहते थे। नीतीश कुमार ने ऐसे षड्यंत्रकारियों को पहचान लिया।

Sunday, August 7, 2022

ताइवान-प्रसंग और भारत


अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की स्पीकर नैंसी पेलोसी का ताइवान दौरा सकुशल संपन्न हो गया है, पर उससे कुछ सवाल पैदा हुए हैं। ये सवाल अमेरिका और चीन के बिगड़ते रिश्तों से जुड़े हैं। वहीं भारतीय विदेश-नीति से जुड़े कुछ सवालों ने भी इस दौरान जन्म लिया है। भारत की ओर से इस विषय पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। विदेशमंत्री एस जयशंकर की इस दौरान अमेरिकी विदेशमंत्री एंटनी ब्लिंकेन से भी मुलाक़ात हुई है, पर चीन को लेकर कोई बयान नहीं आया है। बहरहाल ज्यादा बड़ा सवाल है कि अब क्या होगा? यूक्रेन पर रूसी हमले के कारण वैश्विक-संकट पैदा हो गया है, अब ताइवान में भी तो कहीं वैसा ही संकट पैदा नहीं होगा? हालांकि चीन काफी आग-बबूला है, पर वह सैनिक-कार्रवाई करने की स्थिति में नहीं है। ऐसी किसी भी कार्रवाई का मतलब है अमेरिका को सीधे ललकारना। दूसरे ताइवान पर चीन इतना ज्यादा आश्रित है कि लड़ाई से उसकी अर्थव्यवस्था भी संकट में आ जाएगी।

चीनी धमकी

नैंसी पेलोसी के ताइपेह पहुंचने के कुछ ही देर बाद चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा, ‘जो लोग आग से खेल रहे हैं, वे भस्म हो जाएंगे। इसे हम अपनी 'संप्रभुता का गंभीर उल्लंघन' और 'वन चायना पॉलिसी' को चुनौती के रूप में देखते हैं। चीन की यह बयानबाज़ी पेलोसी के आगमन के पहले ही शुरू हो गई थी।  हालांकि नैंसी पेलोसी 24 घंटे से भी कम समय तक वहाँ रहीं, पर इस छोटी सी प्रतीक-यात्रा ने माहौल बिगाड़ दिया है। जनवरी 2019 में चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने कहा था कि ताइवान शांतिपूर्ण तरीके से चीन में वापस आने को तैयार नहीं हुआ, तो हम सैनिक-कार्रवाई भी कर सकते हैं। सवाल है कि चीन ने हमला किया, तो क्या होगा? मई में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा था कि ताइवान की रक्षा के लिए हम 'प्रतिबद्ध' हैं। पर इसे स्पष्ट कभी नहीं किया। प्रतिबद्धता का मतलब क्या है? क्या वैसा ही जैसा अफगानिस्तान में हुआ और अब यूक्रेन में हो रहा है?

यात्रा क्यों?

अमेरिका में पूछा जा रहा है कि ऐसे मौके पर जब रूस के यूक्रेन अभियान के कारण दुनिया में परेशानी की लहर है, चीन को छेड़ने की जरूरत क्या थी? यह भी कहा जा रहा है कि चीन की मुश्कें कसना जरूरी है। नैंसी पेलोसी के पहले 1997 में एक और स्पीकर न्यूट जिंजरिच ने भी ताइवान की यात्रा की थी। इसमें नई बात क्या है? चीन में भी बहस चल रही है। शी चिनफिंग पार्टी को फिर से वापस कट्टर कम्युनिज्म की ओर ले जाना चाहते हैं, वहीं खुलेपन की प्रवृत्तियाँ भी अंगड़ाई ले रही हैं। इस साल शी चिनफिंग के कार्यकाल को तीसरी बार बढ़ाया जा रहा है, जिसके राजनीतिक निहितार्थ हैं। ऐसे में चोट करना सही है। बहरहाल अमेरिका ने जोखिम मोल ले ही लिया है, तो देखें कि अब होता क्या है।

Tuesday, August 2, 2022

कौन था अल-ज़वाहिरी, क्या चाहता था?

ओसामा बिन लादेन के साथ अल-ज़वाहिरी की पुरानी तस्वीर

अमेरिका ने अल-क़ायदा के नेता अयमान अल-ज़वाहिरी को अफ़ग़ानिस्तान में एक ड्रोन हमले में मार दिया है। ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद से अल-ज़वाहिरी ही इस संगठन को चला रहा था और उसकी मौत के बाद यह भी स्पष्ट है कि उसे अफगानिस्तान में शरण मिली हुई थी। ज़ाहिर है कि अल-क़ायदा का अस्तित्व बना हुआ है, और वह अपनी गतिविधियों को चला भी रहा है। भारत की दृष्टि से अल-ज़वाहिरी की मौत महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसके दो वीडियो ऐसे हैं, जिनसे इस बात की पुष्टि होती है कि उसके संगठन की भारत में भले ही बड़ी उपस्थिति नहीं हो, पर उसकी दिलचस्पी भारत में थी।  

भारत पर निगाहें

एक वीडियो में उसने भारत में अल-कायदा की शाखा स्थापित करने की घोषणा की थी और दूसरे में कर्नाटक के हिजाब विवाद पर अपनी टिप्पणी की थी। यों 2001 के बाद भारत को लेकर उनकी टिप्पणियों की चर्चा कई बार हुई। उसने अफगानिस्तान, कश्मीर, बोस्निया-हर्जगोविना और चेचन्या में इस्लामिक-युद्ध का कई बार उल्लेख किया। यों बिन लादेन ने भी 1996 में ताजिकिस्तान, बर्मा, कश्मीर, असम, फिलीपाइंस, ओगाडेन, सोमालिया, इरीट्रिया और बोस्निया-हर्जगोविना में मुसलमानों की कथित हत्याओं को लेकर अपना गुस्सा व्यक्त किया था।  

इस बात को लेकर कयास हैं कि तालिबान को क्या पता था कि अल-ज़वाहिरी उनके देश में है? अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि काबुल के जिस घर में अल-ज़वाहिरी को ड्रोन स्ट्राइक में मारा गया, उसमें बाद में तालिबान के अधिकारी गए और यह छिपाने की कोशिश की कि यहाँ कोई मौजूद नहीं था।

सीआईए का ऑपरेशन

बीबीसी के अनुसार रविवार को अमेरिका की सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी यानी सीआईए ने अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में ऑपरेशन चलाया, जिसमें अल-ज़वाहिरी मारा गया। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा है,"ज़वाहिरी के हाथ अमेरिकी नागरिकों के ख़िलाफ़ हत्या और हिंसा के ख़ून से रंगे थे। अब लोगों को इंसाफ़ मिल गया है और यह आतंकवादी नेता अब जीवित नहीं है।"

राष्ट्रपति बाइडेन ने ज़वाहिरी को साल 2000 में अदन में अमेरिकी जंगी पोत यूएसस कोल पर आत्मघाती हमले के लिए भी ज़िम्मेदार बताया। इसमें 17 नौसैनिकों की मौत हुई थी। उन्होंने कहा, ''यह मायने नहीं रखता कि उसके सफाए में इतना लंबा समय लगा। यह भी मायने नहीं रखता कि कोई कहाँ छिपा है। अगर आप हमारे नागरिकों के लिए ख़तरा हैं तो अमेरिका छोड़ेगा नहीं। हम अपने राष्ट्र और नागरिकों की सुरक्षा में कभी कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।''

Sunday, July 31, 2022

‘रेवड़ीवाद’ और ‘कल्याणवाद’ का फर्क


देश की राजनीति में अचानक 'रेवड़ी-संस्कृति' के स्वर सुनाई पड़ रहे हैं। इस विषय को लेकर राजनीतिक बहस के समांतर देश के उच्चतम न्यायालय में भी सुनवाई चल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे गंभीर मुद्दा बताया है और सरकार तथा चुनाव आयोग से कहा है कि वे इसे रोकने के लिए जरूरी समाधान खोजें। इस मामले की अगली सुनवाई अब 3 अगस्त को होगी। यह मामला केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि इससे राजनीति में 'मुफ्त की रेवड़ियाँ' बाँटने की संस्कृति जन्म ले रही है। बल्कि इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे राज-व्यवस्था के चरमराने का खतरा पैदा हो गया है।

रिजर्व बैंक की रिपोर्ट

सुप्रीम कोर्ट की हिदायतों से इतर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट में इस खतरे के प्रति आगाह किया गया है। आरबीआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि राज्य सरकारें मुफ्त की योजनाओं पर जमकर खर्च कर रहीं हैं, जिससे वे कर्ज के जाल में फँसती जा रही हैं। 'स्टेट फाइनेंसेस: अ रिस्क एनालिसिसशीर्षक रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब, राजस्थान, बिहार, केरल और पश्चिम बंगाल कर्ज के दलदल में धँसते जा रहे हैं। पर मीडिया मे चर्चा सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई या रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के आधार पर नहीं हुई है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक टिप्पणी के बाद शुरू हुई है। उन्होंने गत 16 जुलाई को बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे  का उद्घाटन करते हुए 'रेवड़ी कल्चर' का जिक्र किया और जनता को सलाह दी कि इस मुफ्तखोरी का राजनीति से बचें। हालांकि प्रधानमंत्री ने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस टिप्पणी को अपने ऊपर ले लिया और उसी शाम जवाब दिया कि उनका ‘दिल्ली-मॉडल’ वोट जुटाने के लिए मुफ्त पेशकश करने से दूर कमजोर आय वाले लोगों को निशुल्क शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और पानी सुनिश्चित करके ‘देश की अर्थव्यवस्था की बुनियाद’ को मजबूत बनाने की कोशिश कर रहा है।

कौन सा मॉडल?

प्रधानमंत्री की टिप्पणी और दिल्ली के मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया ने देश का ध्यान लोकलुभावनवाद और सामाजिक-कल्याणवाद की ओर खींचा है। इसमें दो राय नहीं कि सामाजिक-कल्याणवाद के मॉडल ने बीजेपी को भी चुनावी सफलताएं दिलाने में मदद की है। अलबत्ता इसमें एक बुनियादी फर्क है। बीजेपी ने मुफ्त बिजली-पानी, साइकिल, लैपटॉप, मिक्सर ग्राइंडर, मंगलसूत्र, टीवी, गाय, बकरी की पेशकश करके मध्यवर्ग को आकर्षित करने का कार्यक्रम नहीं चलाया है। बल्कि अपेक्षाकृत गरीब तबकों पर ध्यान केंद्रित किया है। उसका लक्ष्य सार्वजनिक सफाई, शौचालय, ग्रामीण सड़कें, पक्के मकान, नल से जल, घरेलू गैस, घरेलू बिजली, बैंकिंग, आवास, स्वास्थ्य बीमा और मातृत्व सुरक्षा रहा है। दूसरे इनमें से कोई भी चीज पूरी तरह मुफ्त नहीं है, जैसे कि घरेलू-गैस। यूपीए का मनरेगा, खाद्य-सुरक्षा कार्यक्रम और भूमि-सुधार कानून भी कल्याणकारी था। मोदी और केजरीवाल के बयानों के पीछे की राजनीति को भी देखना चाहिए। प्रधानमंत्री ने अपनी बात गुजरात के चुनाव के संदर्भ में भी कही होगी, जहाँ आम आदमी पार्टी भी प्रवेश पाने की कोशिश कर रही है।

मुफ्त अनाज

आप पूछ सकते हैं कि पिछले दो वर्षों में देश के करीब 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज का जो कार्यक्रम चलाया गया है, क्या वह मुफ्त की रेवड़ी नहीं है? बेशक वह मुफ्त है, पर उसे भी ‘मुफ्त की रेवड़ी’ कहना उचित नहीं होगा, बल्कि मुसीबत में फँसे लोगों के लिए यह योजना सबसे बड़ी मददगार साबित हुई है। यह राज्य की जिम्मेदारी है। बेशक इसकी भारी कीमत देश ने दी है। यों भी सरकारी कार्यक्रमों पर भारी सब्सिडी दी जाती है। मुफ्त अनाज के अलावा खाद्य-सुरक्षा कार्यक्रम के तहत गरीबों को सस्ता अनाज भी दिया जाता है। देश में इस बात पर आम सहमति भी है। बल्कि माँग यह की जा रही है कि शहरी गरीबों के लिए भी कल्याणकारी कार्यक्रम चलाए जाएं। ऐसे कार्यक्रम संयुक्त राष्ट्र के सन 2030 तक संधारणीय लक्ष्यों की प्राप्ति के अनुरूप भी हैं। दुनिया से गरीबी मिटाने के जो सुझाव अर्थशास्त्रियों ने दिए हैं, उनसे ये योजनाएं मेल खाती हैं। इसे सार्वजनिक-संसाधनों का पुनर्वितरण माना जाता है। यह भी सच है कि सब्सिडी बेशक रेवड़ी नहीं हैं लेकिन चुनाव नतीजों पर उनका असर तो होता ही है। इससे सरकार की प्रशासनिक सूझ-बूझ का पता भी लगता है।

Saturday, July 30, 2022

हमें क्या चाहिए, मुफ्त की रेवड़ियाँ या सामाजिक-कल्याण?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में एक सभा में कहा कि देश में लोक-लुभावन राजनीति के नाम पर मुफ्त की रेवड़ियाँ बाँटने की संस्कृति पर रोक लगनी चाहिए। वे यह बात गुजरात के चुनाव के संदर्भ में कह रहे थे, जहाँ आम आदमी पार्टी भी प्रवेश पाने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री के इशारे को आम आदमी पार्टी ने अपने ऊपर हमला माना और उसके सुप्रीमो और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि मुफ्त बिजली, पानी, स्वास्थ्य-सेवाएं, विश्वस्तरीय-शिक्षा और महिलाओं का मुफ्त परिवहन राज्य की जिम्मेदारी है। उनके कार्यकर्ताओं ने गुजरात में जगह-जगह मोदी के ‘रेवड़ी संस्कृति’ बयान के विरोध में प्रदर्शन भी किया। इसके जवाब बीजेपी के गुजरात-प्रमुख सीआर पाटिल ने कहा कि ‘रेवड़ी संस्कृति’ से राज्य और भारत के सामने वैसी ही परिस्थिति पैदा हो सकती है जैसी श्रीलंका में बन गई है।

इस रेवड़ी-चर्चा ने कुछ समय के लिए जोर भी पकड़ा, पर इस विषय पर गंभीरता से विमर्श कभी नहीं हुआ। चुनाव-चर्चा से आगे यह बात कभी नहीं गई। मोदी और केजरीवाल में से कौन सही है? श्रीलंका में हालात क्या ‘रेवड़ी संस्कृति’ के कारण बिगड़े? आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में मुफ्त पानी-बिजली के सहारे बड़ी सफलता प्राप्त की। इसे उन्होंने पंजाब में भी दोहराया। और अब हिमाचल और गुजरात भी दोहराना चाहते हैं।

इस विषय को लेकर राजनीतिक बहस के समांतर देश के उच्चतम न्यायालय में भी सुनवाई चल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे गंभीर मुद्दा बताया है और सरकार तथा चुनाव आयोग से कहा है कि वे इसे रोकने के लिए जरूरी समाधान खोजें। इस मामले की अगली सुनवाई अब 3 अगस्त को होगी।

Sunday, July 24, 2022

इतिहास का सुनहरा अध्याय द्रौपदी मुर्मू


देश के 15वें राष्ट्रपति के रूप में श्रीमती द्रौपदी मुर्मू का चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक है। जनजातीय समाज से वे देश की पहली राष्ट्रपति बनने जा रही हैं। इसके अलावा वे देश की दूसरी महिला राष्ट्रपति होंगी। उनकी विजय भारतीय राजनीति और समाज की भावी दिशा की ओर इशारा कर रही है। हमारा लोकतंत्र वंचित और हाशिए के समाज को बढ़ावा दे रहा है। और यह भी कि सामाजिक रूप से पिछड़े और गरीब तबकों के बीच प्रतिभाशाली राजनेता, विचारक, अर्थशास्त्री, वैज्ञानिक, लेखक, कलाकार और खिलाड़ी मौजूद हैं, जो देश का नाम ऊँचा करेंगे। उन्हें बढ़ने का मौका दीजिए।

जबर्दस्त समर्थन

यह चुनाव राजनीतिक-स्पर्धा भी थी। जिस तरह से उन्हें विरोधी सांसदों और विधायकों के वोट मिले हैं, उससे भी देश की भावना स्पष्ट होती है। उनकी उम्मीदवारी का 44 छोटी-बड़ी पार्टियों ने समर्थन किया था, पर ज्यादा महत्वपूर्ण है, विरोधी दलों की कतार तोड़कर अनेक सांसदों और विधायकों का उनके पक्ष में मतदान करना। भारतीय राज-व्यवस्था में यह अलग किस्म की बयार है। तमाम मुश्किलों और मुसीबतों का सामना करते हुए देश के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचने वाली इस महिला को देश ने जो सम्मान दिया है, वह अतुलनीय है।

मास्टर-स्ट्रोक

राजनीतिक दृष्टि से यह चुनाव बीजेपी का मास्टर-स्ट्रोक साबित हुआ है। जैसे ही द्रौपदी मुर्मू का नाम सामने आया, पूरे देश ने उनके नाम का स्वागत किया। इसका प्रमाण और इस चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है क्रॉस वोटिंग। सबसे अधिक क्रॉस वोटिंग असम में हुई। असम में 22 और मध्य प्रदेश में 19 क्रॉस वोट पड़े। 126 सदस्यीय असम विधानसभा से उन्हें 104 वोट मिले। असम विधानसभा में एनडीए के 79 सदस्य हैं। मतदान के दौरान विधानसभा के दो सदस्य अनुपस्थित भी थे। राजनीतिक दृष्टि से यह भारतीय जनता पार्टी को मिली भारी सफलता और विरोधी दलों की रणनीति की भारी पराजय है। बावजूद इस सफलता के, उन्हें मिले एकतरफा समर्थन की यह राजनीतिक-तस्वीर पूरे देश की नहीं है। चार राज्यों में उन्हें कुल वोटों की तुलना में 12.5 फीसदी या उससे भी कम वोट मिले। सबसे कम केरल में उन्हें 0.7 फीसदी मत मिले, जहां एकमात्र विधायक ने उनके पक्ष में वोट डाला। तेलंगाना में उन्हें केवल 2.6 फीसदी वोट मिले। पंजाब में 7.3 फीसदी और दिल्ली में 12.5 फीसदी। अलबत्ता तमिलनाडु में 31 फीसदी वोट मिले, जिसकी वजह अद्रमुक का समर्थन है।

विरोधी बिखराव

यह परिणाम देश की पहली महिला आदिवासी के राष्ट्रपति बनने की कहानी तो है ही, साथ ही विरोधी दलों के आपसी मतभेद और अलगाव को भी दिखाता है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के ओम प्रकाश राजभर ने श्रीमती मुर्मू का समर्थन करके उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के गठबंधन की एकजुटता के लिए चुनौती पेश कर दी है। उधर तृणमूल कांग्रेस द्वारा उप राष्ट्रपति पद के चुनाव में मार्गरेट अल्वा का समर्थन न करने की घोषणा के बाद विरोधी दलों का यह बिखराव और ज्यादा खुलकर सामने आ गया है। प्रकारांतर से ममता बनर्जी श्रीमती मुर्मू का विरोध नहीं कर पाईं। उन्होंने कहा था,  हमें बीजेपी की उम्मीदवार के बारे में पहले सुझाव मिला होता, तो इस पर सर्वदलीय बैठक में चर्चा कर सकते थे। द्रौपदी मुर्मू संथाल-समुदाय से आती हैं। पश्चिम बंगाल के 70 फ़ीसदी आदिवासी संथाल हैं। उन्हें पश्चिम बंगाल के अपने आदिवासी मतदाता को यह समझाना होगा कि उन्होंने मुर्मू का समर्थन क्यों नहीं किया।

Wednesday, July 20, 2022

रानिल विक्रमासिंघे श्रीलंका के राष्ट्रपति चुने गए

श्रीलंका की संसद में हुए राष्ट्रपति पद के चुनाव में भी कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में अभी तक काम कर रहे रानिल विक्रमासिंघे को जीत मिली है। इसके पहले देश के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे देश छोड़कर सिंगापुर चले गए थे। उनके भाई महिंदा राजपक्षे ने प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़ दी थी। वे तब से कहाँ हैं, इसकी कोई सूचना नहीं है।

यह पहला मौका है जब राष्ट्रपति पद के लिए मुकाबला तीन उम्मीदवारों के बीच हुआ। मुकाबला रानिल विक्रमासिंघे, डलास अल्हाप्पेरुमा और वामपंथी जनता विमुक्ति पेरामुना (जेवीपी) के नेता अनुरा कुमारा दिसानायके के बीच था। विक्रमासिंघे को 134 वोट मिले हैं। 223 सदस्यों वाली संसद में दो सांसद नदारद रहे और कुल 219 वोट्स वैध और 4 वोट अवैध घोषित हुए। श्रीलंका के संविधान के मुताबिक नया राष्‍ट्रपति अब नवंबर 2024 तक पूर्व राष्‍ट्रपति के कार्यकाल को पूरा करेगा।

इस जीत से फौरी तौर पर राजनीतिक अस्थिरता का समाधान हो गया है, पर यह समझ में नहीं आ रहा है कि आर्थिक संकट का समाधान कैसे निकलेगा। इस चुनाव परिणाम में जनता की दिलचस्पी नजर नहीं आ रही है। चुनाव परिणाम आने के बाद भी राजधानी कोलंबो में प्रदर्शन हो रहे हैं। प्रदर्शनकारी रानिल विक्रमासिंघे का भी विरोध कर रहे हैं। रानिल विक्रमासिंघे भी देश में अलोकप्रिय हैं और उनके निजी आवास में भी आक्रोशित भीड़ ने आग लगा दी थी।

Tuesday, July 19, 2022

गर्मी से परेशान यूरोप

 

मंगलवार के वॉलस्ट्रीट जरनल के पहले पेज पर प्रकाशित तस्वीर। बकिंघम पैलेस पर तैनात संतरी को ठंडा पानी पिलाता उसका अफसर। 

पश्चिमी यूरोप इन दिनों झुलसाने वाली गर्मी का सामना कर रहा है। ज़बरदस्त गर्म हवाओं के उत्तर की ओर बढ़ने के साथ ही मंगलवार को पश्चिमी यूरोप में पारा चढ़ता जा रहा है। कई देशों ने इसे राष्ट्रीय संकट घोषित कर दिया है। फ्रांस और यूके में सोमवार 18 जुलाई को बेहद गर्मी की चेतावनी जारी की गई। वहीं स्पेन में सोमवार को 43 डिग्री तापमान रहा।

फ्रांस, पुर्तगाल, स्पेन और ग्रीस में जंगल की आग के कारण हज़ारों लोगों को अपना घर छोड़कर सुरक्षित जगहों की तरफ जाना पड़ा है। विशेषज्ञ कहते हैं कि ब्रिटेन जल्द ही अपने सबसे गर्म दिन का सामना करेगा और फ्रांस के कुछ हिस्सों में "कयामत की गर्मी बरस" रही है।

पूरा यूरोप गर्मी में उबल रहा है। जंगलों में लगी आग ने मुश्किलों का और बढ़ा दिया है। यूनाइटेड किंगडम (यूके) से लेकर हर हिस्से में तापमान नए रिकॉर्ड बना रहा है। स्पेन में लगी आग में दो लोगों की मौत ने इसे और गंभीर बना दिया है। स्पेन के प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज ने इसे ग्लोबल वॉर्मिंग से जोड़ा है और कहा है कि जलवायु परिवर्तन लोगों की जान ले रहा है।

दक्षिणी इंग्‍लैंड में सोमवार को तापमान 38 डिग्री था जो मंगलवार को 41 डिग्री के आसपास है। नेशनल रेल सर्विस ने यात्रियों को सलाह दी है कि जब तक जरूरी न हो सफर न करें। पूर्वोत्तर इंग्‍लैंड में कई जगह रेल सेवा बंद कर दी गई है।

Monday, July 18, 2022

अदालत में लड़ी जाएगी ट्विटर और मस्क की लड़ाई


सोशल मीडिया कंपनी ट्विटर और टेस्ला-प्रमुख एलन मस्क के बीच 44 अरब डॉलर का सौदा खटाई में पड़ गया है। अब यह मामला लम्बी कानूनी लड़ाई का रूप लेने जा रहा है। इसमें दोनों पक्षों के अरबों डॉलर स्वाहा होंगे। ट्विटर के चेयरमैन ब्रेट टेलर का कहना है कि ट्विटर बोर्ड निर्धारित शर्तों पर समझौते को लागू कराएगा। इसके लिए हम डेलावेयर कोर्ट ऑफ चांसरी जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे विवादों में आमतौर पर डेलावेयर कोर्ट का रुख रहता है कि दोनों पक्ष आपस में बैठकर नया समझौता कर लें।  

ऐसे मौके भी आए हैं, जब अदालतों ने किसी एक पक्ष को समझौता मानने को मजबूर किया हो, पर वे छोटे करार थे। यह करार बहुत बड़ा है। एलन मस्क जैसे जुनूनी पूँजीपति को अपनी इच्छा के विपरीत कम्पनी खरीदने के लिए तैयार करना भी मुश्किल है। ज्यादा से ज्यादा एक अरब डॉलर का खामियाजा भरने के लिए कहा जा सकता है। समझौते में ब्रेक-अप फ़ी एक अरब डॉलर है। दोनों कम्पनियों ने देश की नामी लॉ फर्म्स को इस काम के लिए जोड़ा है, पर दोनों के सामने अनिश्चित भविष्य है।

कमजोर कारोबार

कॉरपोरेट लॉ विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्विटर का केस अपेक्षाकृत मजबूत है। मस्क के लिए यह साबित करना मुश्किल होगा कि ट्विटर ने जो विवरण दिया है, वह अधूरा है या उससे कम्पनी के कारोबार में भारी फर्क पड़ने का खतरा है। पर ट्विटर का आर्थिक आधार बहुत मजबूत नहीं है। डिजिटल-विज्ञापन के बाजार में भारी उतार-चढ़ाव आ रहे हैं। मस्क की जेब भारी है, पर क्या उनके पास इतना पैसा है कि वे लम्बी लड़ाई लड़ सकें?

दोनों कम्पनियों के शेयरों के भाव गिरे हुए हैं। इन बातों से दोनों का आर्थिक-भविष्य भी जुड़ा है। अदालती फैसला मस्क के खिलाफ गया, तो उन्हें अब टेस्ला के कुछ और शेयर बेचने होंगे। अप्रेल में उन्होंने टेस्ला के 8.5 अरब के शेयर बेचे थे। दूसरी तरफ जनवरी से अप्रेल के बीच उन्होंने 2.6 अरब डॉलर की कीमत के ट्विटर के शेयर भी खरीदे थे।

पहले ना, फिर हाँ

इस साल 13 अप्रेल को जब एलन मस्क ने ट्विटर पर कब्जा करने के इरादे से 54.20 डॉलर की दर से शेयर खरीदने की पेशकश की, तो सोशल मीडिया में सनसनी फैल गई थी। दुनिया का सबसे अमीर आदमी सोशल मीडिया के एक प्लेटफॉर्म की इतनी बड़ी कीमत क्यों देना चाहता है? टेकओवर वह भी जबरन, जिसे रोकने के लिए ट्विटर प्रबंधन ने पहले तो ‘पॉइज़न पिल’ का इस्तेमाल किया और फिर तैयार हो गए। पर ढाई-तीन महीने के भीतर समझौता टूटना उतना ही नाटकीय है, जितना समझौता होना।

एलन मस्क ने यह कहकर हाथ खींचा है कि इस क़रार से जुड़ी शर्तों को कई बार तोड़ा गया, जिसकी वजह से वे पीछे हट रहे हैं। मस्क के अनुसार कम्पनी ने उनको ट्विटर के फ़र्ज़ी हैंडलों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं दी थी। इसके अलावा भी समझौते की कई शर्तों को तोड़ा गया है। समझौते के साथ मस्क और ट्विटर दोनों की साख जुड़ी हुई हैं। दोनों के कारोबार पर भी इसका असर होगा।

Sunday, July 17, 2022

आई2यू2 यानी भारत की ‘लुक-वेस्ट’ नीति


भारत-इजराइल-अमेरिका और यूएई के बीच नवगठित समूह आई2यू2 की गुरुवार 14 जुलाई को हुई पहली शिखर बैठक में भारत के लिए नए अवसर खुले हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन, इजरायल के प्रधानमंत्री येर लेपिड और यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन ज़ायेद अल नाह्यान की इस वर्चुअल बैठक में दो अहम परियोजनाओं को हरी झंडी दिखाई गई, जो भारत में शुरू होंगी। भारत और यूएई के बीच फूड एक कॉरिडोर बनाया जाएगा। दूसरे भारत के द्वारका में अक्षय ऊर्जा हब बनाया जाएगा। यह आर्थिक कार्यक्रम है, पर इसके पीछे पश्चिम एशिया की भावी राजनीति और इसमें भारत की भूमिका को भी देखा जा सकता है। 

बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति और इजराइल के प्रधानमंत्री तेल अवीव से शामिल हुए थे। जो बाइडेन 13 से 16 जुलाई तक पश्चिम एशिया के दौरे पर थे। उनकी इस यात्रा के पीछे पश्चिम एशिया में अपने मित्र देशों के आधार को मजबूत करने के अलावा यूक्रेन युद्ध के कारण इस समय दुनिया में पेट्रोलियम की कीमतों में तेजी को रोकना भी है। इस तेजी का लाभ रूस को मिल रहा है। अमेरिका की कोशिश है कि सऊदी अरब के सहयोग से इस तेजी पर काबू पाया जाए।
फलस्तीन की समस्या

बाइडेन चाहते हैं कि इजरायल और फलस्तीनियों के बीच दीर्घकालीन समझौता हो जाए। पर यह समझौता फलस्तीनी अथॉरिटी के महमूद अब्बास के साथ होगा। जो बाइडेन टू स्टेट अवधारणा क समर्थन कर रहे हैं। उनकी महमूद अब्बास से मुलाकात भी हुई है। पर समझौता आसान नहीं है। खासतौर से हमस का रुख काफी कड़ा है और गज़ा पट्टी पर हमस का ही दबदबा है। महमूद अब्बास के संगठन और इजरायल दोनों के साथ भारत के रिश्ते अच्छे हैं, जिनका लाभ लिया जा सकता है।

हमस मूलतः उग्रवादी संगठन है, पर 2005 के बाद से उसने गज़ा पट्टी के इलाके में राजनीतिक प्रक्रिया में हिस्सा लेना भी शुरू कर दिया। वह फलस्तीनी अथॉरिटी के चुनावों में शामिल होने लगा। गज़ा में फतह को चुनाव में हराकर उसने प्रशासन अपने अधीन कर लिया है। अब फतह गुट का पश्चिमी तट पर नियंत्रण है और गज़ा पट्टी पर हमस का। अंतरराष्ट्रीय समुदाय पश्चिमी तट के इलाके की अल फतह नियंत्रित फलस्तीनी अथॉरिटी को ही मान्यता देता है। 

शिखर बैठक के बाद भारत के विदेश सचिव विनय क्वात्रा ने कहा कि शुरूआती दौर में फिलहाल गुजरात और मध्य प्रदेश में यह पार्क बनाने की कवायद आगे बढ़ी है। उन्होंने बताया कि भारत की केला, चावल, आलू, प्याज और मसालों की फसलों को आरंभिक दौर में चिह्नित भी किया गया है। इन परियोजनाओं के जरिए भारतीय किसानों के उत्पादों को बड़ा बाजार मिलेगा, वहीं रोजगार के नए अवसर भी बनेंगे।

दो अरब डॉलर का निवेश

इस शिखर बैठक के बाद संयुक्त अरब अमीरात ने घोषणा की कि वह एकीकृत फूड पार्कों की श्रृंखला का विकास करने के लिए भारत में दो अरब डॉलर का निवेश करेगा। इसका उद्देश्य दक्षिण और पश्चिम एशिया में खाद्य असुरक्षा की समस्या का सामना करना है। बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में कहा गया है कि इस कार्य के लिए भूमि और किसानों को जोड़ने का काम भारत करेगा। इस बैठक में इस इलाके की खाद्य-सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा, खाद्य उत्पादन तथा वितरण प्रणाली में बदलावों को सुनिश्चित करने पर विचार हुआ, ताकि वैश्विक खाद्य-सामग्री का भंडार बनाया जा सके।

इस कार्य में अमेरिका और इजराइल से निजी क्षेत्रों को आमंत्रित किया जाएगा और उनकी विशेषज्ञता का लाभ उठाया जाएगा। वे परियोजना की कुल वहनीयता में योगदान देते हुए नवोन्मेषी समाधानों की पेशकश भी करेंगे। पूँजी निवेश से उपज बेहतर होगी और इससे दक्षिण एशिया एवं पश्चिम एशिया में खाद्य असुरक्षा से निपटा जा सकेगा।

आई2यू2 ग्रुप

आई2यू2 यानी अंग्रेजी आई 2 (इंडिया और इजरायल) और यू 2 (यानी यूएसए और यूएई)। इसे पश्चिम एशिया का क्वॉड भी कहा जा रहा है। इस अनौपचारिक समूह की शुरुआत अक्तूबर 2021 में विदेशमंत्री एस जयशंकर की इजरायल यात्रा के दौरान उपरोक्त चारों देशों के विदेशमंत्रियों की एक पहल के रूप में हुई थी। उस समय इसे आर्थिक सहयोग का अंतरराष्ट्रीय फोरम भी कहा गया था।

आई2यू2 समूह को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि पश्चिम एशिया में भारत के साथ अमेरिकी साझेदारी गेम चेंजर हो सकती है। यह बात पूर्व इजरायल के पूर्व एनएसए मेजर जनरल याकोव अमिद्रोर ने गत 14 जुलाई को फोरम की पहली उच्च स्तरीय बैठक से पहले कही। भारत सरकार ने मंगलवार 12 जुलाई को आई2यू2 नेताओं के वर्चुअल शिखर सम्मेलन की घोषणा करते हुए कहा कि यह समूह पानी, ऊर्जा, परिवहन, अंतरिक्ष, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा जैसे छह पारस्परिक रूप से पहचाने गए क्षेत्रों में संयुक्त निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए काम करेगा।

इजरायल  के पूर्व एनएसए ने कहा,  आई2यू2 दुनिया के हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इसमें इजरायल  और यूएई में रणनीतिक साझेदारी की घोषणा की उम्मीद है। उन्होंने कहा, भारत की भूमिका यूरोप और इजरायल  के साथ एक सेतु की है और पूरे संदर्भ में भारत एक बड़ा व्यापारिक भागीदार है।

नया क्वॉड

इसमें दो राय नहीं कि हाल के वर्षों में भारत ने इस इलाके में सम्पर्क बढ़ाया है। हाल में जर्मनी में हुई जी-7 की शिखर-बैठक में शामिल होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी यूएई की संक्षिप्त-यात्रा पर भी गए थे। अमेरिका की दिलचस्पी इस बात में भी है कि इजरायल के रिश्ते इस क्षेत्र के देशों के साथ बेहतर हों। इसमें यूएई के अलावा सऊदी अरब की भूमिका भी है। इसमें यूएई, मोरक्को और बहरीन के साथ हुआ अब्राहमिक समझौता मददगार होगा। इस प्रक्रिया को आई2यू2 समूह बढ़ाएगा।