Wednesday, December 31, 2025

धर्मवीर भारती की पत्रकारिता

टिल्लन रिछारिया ने काफी पहले मुझसे भारती जी पर लेख लिखने को कहा था। मैंने भी लिखने में देरी की। टिल्लन जी के निधन से अवरोध पैदा हुए होंगे। इस वजह से किताब के प्रकाशन में भी देरी हुई होगी। बहरहाल 2025 के जनवरी में यह प्रकाशित हुई, जिसमें मेरा यह लेख भी शामिल है।

 रचनात्मक प्रतिभाएं बहुमुखी होती हैं। इसलिए रचनात्मकता के दायरे खींचना मुश्किल काम है। कविता शुरू होकर उपन्यास बन सकती है और कोई कहानी कविता में तब्दील हो सकती है। यह रचनाकार पर निर्भर करता है कि वह गीली मिट्टी को क्या आकार देता है। धर्मवीर भारती की पहली पहचान साहित्यकार के रूप में है। पर वे पत्रकार भी थे, बावजूद इसके कि जिस धर्मयुग के नाम से वे पहचाने गए, उसमें उन्होंने बहुत कम लिखा। फिर भी वे अपने किसी कृतित्व के कारण ही संपादक रूप में पहचाने गए। रिपोर्टर, लेखक और संपादक अलग-अलग पहचान हैं।

साहित्यकार के मुकाबले पत्रकार का मूल्यांकन केवल उसकी निजी-रचनाओं के मार्फत नहीं किया जा सकता। वह लेखक भी होता है और आयोजक भी। वह अपने विचार लिखता है और दूसरों के विचारों का वाहक भी होता है। उसका मूल्यांकन किसी एक या अनेक रिपोर्टों या टिप्पणियों के आधार पर किया जाना चाहिए। यह एक कसौटी है। दूसरी कसौटी है वह समग्र-आयोजन जिसमें वह अनेक रचनाधर्मियों को जोड़ता है। इस कसौटी पर खरा उतरना बेहद मुश्किल काम है, क्योंकि इसमें तमाम लोग जुड़े होते हैं, जो कंकड़-पत्थर नहीं इंसान हैं।

धर्मयुग: एक दीर्घ रचना-प्रक्रिया

इस लिहाज से धर्मयुग अपने आप में एक रचना-प्रक्रिया थी। उसकी साप्ताहिक, मासिक या वार्षिक-योजना, सहयोगियों की कार्य-क्षमता का मूल्यांकन, कार्य-वितरण और देश-काल के साथ चलने की सामर्थ्य का विवेचन लोगों ने किया है और होता रहेगा। उसमें एक दौर भारती जी का था और वह 27 वर्ष का था, यानी काफी लंबा। उसे भारती जी की पत्रकारिता का दौर कह सकते हैं।

काफी लंबा होने का मतलब यह भी है कि उन्हें अपनी दृष्टि, विवेक और क्षमताभर काम करने का मौका मिला, जिसका श्रेय बेनेट कोलमन कंपनी और उसके प्रबंधकों को भी जाता है। या उस विशेष मुद्रण प्रक्रिया को, जिसके कारण धर्मयुग, इलस्ट्रेटेड वीकली, फिल्मफेयर और फेमिना जैसी पत्रिकाओं की अलग पहचान थी। उस दौर को भी जिसमें इन पत्रों का मुकाबला करने वाले नहीं थे।

भारती जी का उपन्यास गुनाहों का देवता मैंने 1962-63 में कभी पढ़ा होगा। तब मैं किसी भी कहानी या उपन्यास को पढ़ लिया करता था। 12-13 की उम्र के लिहाज से उस उपन्यास को ठीक से समझ पाना भी मेरे लिए आसान नहीं रहा होगा, पर उन दिनों मैं चंदामामा से लेकर मामा बरेरकर के उपन्यासों तक कुछ भी पढ़ लेता था।

दूसरों से अलग

मथुरा के चौबियापाड़े की एक गली में छोटा सा समाज कल्याण पुस्तकालय और वाचनालय था, जो आसपास के लोगों की मदद से चलता था। शाम को दो बेंचें लगा दी जाती थीं, जिनमें बैठकर लोग अखबार और पत्रिकाएं पढ़ते थे। चंदामामा, मनमोहन, पराग और बालक से लेकर धर्मयुग तक। नंदन का प्रकाशन तब शुरू हुआ नहीं था। बहरहाल धर्मयुग और भारती जी के रिश्ते या उसके महत्व को मैं तब समझता नहीं था। वह पत्रिका दूसरी पत्रिकाओं से अलग लगती थी, अपने आकार, बनावट, छपाई और सजावट की वजह से। इसी पुस्तकालय से एक किताब घर ले जाने की व्यवस्था भी थी। इसी निशुल्क-व्यवस्था के तहत मैंने इब्ने सफी बीए से लेकर गुरुदत्त और रवींद्रनाथ ठाकुर तक के उपन्यास पढ़ डाले।

पाकिस्तान का ‘हाइब्रिड सिस्टम’ और सेना की ताकत


इस्लामी जम्हूरिया-ए-पाकिस्तान नाम से लगता है कि पाकिस्तानी राजव्यवस्था लोकतांत्रिक है. वहाँ चुनाव भी होने लगे हैं, संसद, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उच्चतम न्यायालय भी है. इसलिए मान लिया जाता है कि वहाँ असैनिक-शासन है.

बावज़ूद इन बातों के देश में पिछले 78 साल से सेना की घोषित-अघोषित भूमिका चली आ रही है, जिसे पनपाने, बढ़ावा देने और मजबूत करने में असैनिक-राजनीति की भी भूमिका है.

पाकिस्तान के नेता गर्व से इसे हाइब्रिड सिस्टम कहते हैं. इस साल वहाँ की संसद ने इस सिस्टम को सांविधानिक-दर्जा भी प्रदान कर दिया गया है.

पाकिस्तानी सेना और अमेरिका की लोकतांत्रिक सरकार के बीच अनोखा रिश्ता है, जो इस साल राष्ट्रपति ट्रंप और आसिम मुनीर के लंच से स्पष्ट हो गया था. कहा जाता है कि दूसरे देशों के पास अपनी सेना होती है, पाकिस्तान की सेना के पास एक देश है.   

सेना की भूमिका

देश में 1973 में बनाए गए संविधान के अनुच्छेद 243 के अनुसार संघीय सरकार का सशस्त्र बलों पर नियंत्रण और कमान होती है. देश के राष्ट्रपति सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर होते हैं. प्रधानमंत्री की सलाह पर सशस्त्र बलों के प्रमुखों (चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ, आदि) की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं.

2025 के 27वें संशोधन से इसमें महत्वपूर्ण बदलाव आया है. सेना प्रमुख (आर्मी चीफ) को चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस (सीडीएफ) का पद दिया गया है, जिससे वह तीनों सेनाओं (आर्मी, नेवी और एयर फोर्स) पर पूर्ण कमान रखता है.

यह पद थलसेना प्रमुख के साथ जुड़ा हुआ है, और फाइव-स्टार रैंक (जैसे फील्ड मार्शल) वाले अधिकारी को आजीवन विशेषाधिकार और मुकदमे से छूट मिलेगी.

 राष्ट्रपति अब भी सिद्धांततः तीनों सेनाओं के कमांडर हैं, पर जब वे सेवा निवृत्त होंगे, तब उन्हें कानूनी-संरक्षण मिलना बंद हो जाएगा, जबकि वहाँ के फील्ड मार्शल को आजीवन संरक्षण मिलेगा, जो अब तीनों सेनाओं के वास्तविक कमांडर भी हैं.

समझा जा सकता है कि शासन किसका है और किसका नहीं है. हालाँकि अदालतों ने देश में तीन बार हुए फौजी तख्ता पलट के विरुद्ध कोई टिप्पणी नहीं की और सेना के अधिकार बढ़ाने के हर कदम को स्वीकार कर लिया, फिर भी 27वें संशोधन ने वहाँ सुप्रीम कोर्ट के ऊपर एक और अदालत बना दी है. वहाँ नागरिकों पर मुकदमे सैनिक अदालतों में चलते हैं, जिनकी कार्यवाही सार्वजनिक नहीं होती.

Wednesday, December 24, 2025

उस्मान हादी की हत्या को ‘भारत-विरोधी’ मोड़


बांग्लादेश में उस्मान हादी और एक हिंदू युवक की हत्या के बाद भारत और बांग्लादेश के बीच तनाव फिर बढ़ गया है. ढाका में भारतीय उच्चायोग और देश के दूसरे हिस्सों में भारत से जुड़ी संस्थाओं और व्यक्तियों को धमकियों का सामना करना पड़ रहा है.

गुरुवार को मैमनसिंह ज़िले के भालुका में धर्म का 'अपमान' करने के आरोप में भीड़ ने एक हिंदू युवक दीपू चंद्र दास को पीट-पीटकर मार डाला था. भालुका पुलिस स्टेशन के ड्यूटी ऑफिसर ने बीबीसी बांग्ला को बताया था कि युवक को  मार डालने के बाद उसके शव को एक पेड़ से बाँधकर आग लगा दी गई थी.

युवक की हत्या और उसे जलाने की घटना के विरोध में दिल्ली में बांग्लादेश उच्चायोग के सामने हुए प्रदर्शन पर बांग्लादेश ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई है, जबकि भारत के विदेश विभाग का कहना है कि 20-25 लोगों के उस प्रदर्शन में ऐसा कुछ नहीं था, जिसे तूल दिया जाए. इन घटनाओं के वीडियो और तस्वीरें सार्वजनिक रूप से मौजूद हैं और इन्हें कोई भी देख सकता है.

भारत की चिंता इस आशंका से और भी ज्यादा है कि हिंसा के बहाने फरवरी में होने वाले चुनावों को टाल न दिया जाए. अगले साल अप्रैल-मई में पश्चिम बंगाल में भी चुनाव होने वाले हैं. इस हिंसा का असर हमारी घरेलू राजनीति पर भी पड़ सकता है.

हादी की हत्या

नवीनतम हिंसा की वजह है इंकलाब मंच के नेता 32 वर्षीय शरीफ उस्मान हादी की 12 दिसंबर को गोली मारकर हुई हत्या. उनकी प्रसिद्धि आक्रामक भारत-विरोधी छात्र नेता के रूप में थी.

बांग्लादेश सरकार ने भावनात्मक आवेग का लाभ उठाते हुए न केवल उनका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया, देश में राष्ट्रीय शोक भी घोषित किया.

Tuesday, December 23, 2025

बढ़ते जाएँगे रोबोट अपराध

 


युद्ध के मैदान में स्वायत्त ड्रोन के उपयोग ने पहले से ही कई संदिग्ध नैतिक प्रश्न खड़े कर दिए हैं। कई विशेषज्ञों और मानवाधिकार समूहों ने किया है हत्यारे रोबोटों के उपयोग की निंदा की , विशेष रूप से जब आप तकनीकी खामियों की संभावनाओं पर विचार करते हैं जिसके परिणामस्वरूप निर्दोष लोगों की मृत्यु होती है - बिना किसी प्रत्यक्ष मानवीय भागीदारी के अत्याचार करने के लिए तकनीक का उपयोग करने का तो जिक्र ही नहीं।

लेकिन क्या होगा अगर ऐसी तकनीक आतंकवादियों और अपराधियों के हाथों में चली जाए, जो नैतिक मानदंडों  को मानते ही नहीं ? एक नई रिपोर्ट  में पैन-यूरोपीय पुलिस एजेंसी यूरोपोल की इनोवेशन लैब ने एक ऐसे भविष्य की कल्पना की है, जिसमें अपराधी अराजकता फैलाने के लिए स्वायत्त वाहनों, ड्रोन और ह्यूमनॉइड रोबोटों का इस्तेमाल  कर सकते हैं और इसके परिणामस्वरूप कानून लागू करने वाली एजेसियों को कैसे कदम उठाने होंगे।

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि कानून प्रवर्तन विभागों को वर्ष 2035 तक, "रोबोटों द्वारा किए जाने वाले अपराध, जैसे कि ड्रोन"से निपटने की आवश्यकता होगी, जिनका उपयोग "चोरी में उपकरण के रूप में किया जाता है", "पैदल यात्रियों को चोट पहुँचाने वाले स्वचालित वाहनों"का उल्लेख नहीं किया जाना चाहिए - एक ऐसी स्थिति जो हम बहुत मामलों  में पहले ही देख चुके हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि ह्यूमनॉइड रोबोट भी मामलों को जटिल बना सकते हैं "क्योंकि उन्हें मनुष्यों के साथ अधिक परिष्कृत तरीके से बातचीत करने के लिए डिज़ाइन किया जा सकता है, जिससे संभावित रूप से जानबूझकर और आकस्मिक व्यवहार के बीच अंतर करना अधिक कठिन हो जाता है।"

इससे भी बदतर, स्वास्थ्य देखभाल सेटिंग्स में सहायता के लिए डिज़ाइन किए गए रोबोटों को हैक किया जा सकता है, जिससे मरीज़ हमलावरों के प्रति असुरक्षित हो जाते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, साइबरपंक डायस्टोपिया वाइब्स को पूरा करने के लिए, स्वचालन के परिणामस्वरूप नौकरी से निकाले गए सभी लोगों को जीवित रहने के लिए "साइबर अपराध, बर्बरता और संगठित चोरी, अक्सर रोबोटिक बुनियादी ढांचे को लक्षित"करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

फ्यूचरिज़्म में पढ़ें पूरा आलेख

भारत की राष्ट्रीय-शक्ति में निरंतर निखार


लोवी इंस्टीट्यूट का एशिया पावर इंडेक्स

ऑस्ट्रेलियाई थिंक टैंक लोवी इंस्टीट्यूट द्वारा जारी एशिया पावर इंडेक्स के 2025 संस्करण के अनुसार, अमेरिका और चीन के बाद, भारत एशिया की तीसरी प्रमुख शक्ति है। 40 अंक से अधिक के समग्र शक्ति स्कोर के साथ, जो ‘प्रमुख शक्ति (मेजर पावर)’ का दर्जा पाने की प्रारंभिक सीमा है, भारत ने अमेरिका और चीन के बाद तीसरे स्थान पर अपनी जगह बना ली है। हालाँकि भारत को तीसरा स्थान पिछले साल ही मिल गया था, पर 'प्रमुख शक्ति' के रूप में पहली बार मान्यता मिली है।

एशिया का देश अमेरिका नहीं है, पर उसकी एशिया में उपस्थिति है, इस वजह से उसे रैंकिंग में रखा गया। ऐसा ही रूस के साथ है। इस वर्ष डॉनल्ड ट्रंप की नीतियों के कारण अमेरिकी शक्ति में गिरावट आ रही है। रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप प्रशासन की नीतियां एशिया में अमेरिकी शक्ति के लिए कुल मिलाकर नकारात्मक रही हैं, लेकिन उनका वास्तविक प्रभाव आने वाले वर्षों में ही महसूस किया जाएगा।’ एक वर्ष में अमेरिका के समग्र शक्ति स्कोर में 1.2 अंक की गिरावट आई, जबकि चीन के स्कोर में 1 अंक की वृद्धि हुई है।

चीन का उभार

सैन्य क्षमता के मामले में भी अमेरिका की बढ़त को चीन लगातार कम करता जा रहा है। इस बीच, एशिया में रूस की ताकत भी बढ़ रही है। वह ऑस्ट्रेलिया को पीछे छोड़कर एशिया का पाँचवाँ सबसे शक्तिशाली देश बन गया है। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘एशिया में रूस की ताकत बढ़ रही है, जिसे उत्तर कोरिया और चीन से समर्थन मिल रहा है।’

पिछले वर्ष, भारत का व्यापक शक्ति स्कोर 39.1 था, जो उसे केवल 'मध्यम शक्ति' का दर्जा देता था। पाकिस्तान, जिसने इस वर्ष मई में भारत के साथ चार दिन का संक्षिप्त युद्ध लड़ा था और वर्तमान में अफगानिस्तान से लड़ रहा है, ताइवान, फिलीपींस, न्यूजीलैंड, वियतनाम और थाईलैंड जैसे देशों से पीछे 16वें स्थान पर है।

Sunday, December 21, 2025

2025: महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरता भारत


2025 में भारत की विदेश नीति महाशक्तियों अमेरिका, चीन और रूस के साथ संतुलन बैठाने, दक्षिण एशिया में अपनी उपस्थिति को मज़बूत करने और ग्लोबल साउथ के साथ रिश्तों को बेहतर बनाने पर केंद्रित रही.

पुतिन की यात्रा के साथ, जहाँ रूस के साथ खड़े होकर भारत ने अपनी स्वतंत्र-नीति का परिचय दिया, वहीं धैर्य का परिचय देते हुए अंततः अमेरिका के साथ व्यापार-समझौते का आधार तैयार करके व्यावहारिक राजनीति का परिचय भी दिया.

यूक्रेन के युद्ध में हालाँकि भारत ने रूस की प्रकट आलोचना नहीं की, पर प्रकारांतर से यह संदेश देने में देरी भी नहीं की कि यह वक्त लड़ाइयों का नहीं है. पुतिन की यात्रा के बाद यूक्रेन के राष्ट्रपति की भारत-यात्रा इस संतुलन को प्रकट करती है. इस साल चीन के साथ भारत के रिश्तों में भी बर्फ पिघली है.

वैश्विक-राजनीति में संतुलन बैठाते हुए भारत ने हार्ड-डिप्लोमेसी, आर्थिक लचीलेपन और सामरिक-शक्ति को बढ़ाने पर जोर दिया. इस साल वह विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है.

भारत सक्रिय रूप से ग्लोबल साउथके एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसे अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों में सुधारों की वकालत कर रहा है. अपनी वैश्विक स्थिति को बढ़ाने के लिए जी20, ब्रिक्स और एससीओ जैसे मंचों का उपयोग कर रहा है.

Friday, December 19, 2025

नाभिकीय-ऊर्जा में निजी-क्षेत्र का रास्ता खुला


संसद ने स्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया विधेयक, 2025’ को पारित कर दिया। इसअंग्रेजी नामाक्षरों के आधार पर शांति-विधेयक कहा गया है। हालाँकि कई विपक्षी सांसदों ने विधेयक को संसदीय समिति के पास भेजने की माँग की थी, पर सरकार ने इसे राज्यसभा में चर्चा के लिए भेजकर जल्दी पास कराना उचित समझा। अब यह कानून बन जाएगा। दोनों सदनों की राजनीतिक-बहसों पर ध्यान नहीं दें, तो यह स्पष्ट है कि यह कानून यूपीए सरकार में अमेरिका के साथ हुए न्यूक्लियर-डील का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो अब अमेरिका के साथ संभावित व्यापार-समझौते के साथ भी जुड़ा है।

यह कानून अनायास ही नहीं बनाया गया है। कई कारणों से न्यूक्लियर-डील अपने अभीप्सित उद्देश्यों में पूरी तरह सफल नहीं हो सका। एक बड़ा अड़ंगा, संभावित-दुर्घटना की क्षतिपूर्ति को लेकर था, जिसके लिए 2010 में पास हुए नागरिक दायित्व अधिनियम से विदेशी-आपूर्तिकर्त्ता सहमत नहीं थे। 2008 में, भाजपा ने मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था, जिसका एक कारण यह भी था कि न्यूक्लियर-डील में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था, जिससे क्षतिपूर्ति हो सके।

Tuesday, December 16, 2025

ट्रंप की ‘अमेरिका-फर्स्ट’ विदेश-नीति और भारत


अमेरिका के ट्रंप-प्रशासन ने वस्तुतः इस बात की खुली घोषणा कर दी है कि अमेरिकी-प्रभाव के विस्तार के बजाय उसकी आंतरिक-महानता को फिर से स्थापित करना होगा. यानी कि अमेरिका की विदेश-नीति भी मेक अमेरिका ग्रेट अगेन सिद्धांत पर केंद्रित होगी.

अमेरिका की नई राष्ट्रीय सुरक्षा-नीति (एनएसएस) से ऐसा ही आभास मिलता है. हालाँकि यह दस्तावेज़ 25 नवंबर को जारी हुआ था, पर हाल में ही सामने आया है. इस छोटे से दस्तावेज़ में अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय हितों, उन हितों के क्रम और समग्र रूप से बदलती विश्व व्यवस्था पर, अब तक का सबसे स्पष्ट वर्णन किया गया है.

आम बोलचाल की भाषा में लिखे गए, इस दस्तावेज़ में ट्रंप और उनकी टीम की खास शैली झलकती है. शुरुआत से ही, यह दस्तावेज़ रणनीति के वास्तविक अर्थ को परिभाषित करता है.

2021 में अपना पद संभालने के बाद जो बाइडेन ने कहा था, ‘अमेरिका इज़ बैक, हमारी विदेश-नीति के केंद्र में डिप्लोमेसी की वापसी हो रही है।’ वह मानवीय और उदार-अमेरिका था. ट्रंप उस उदार-अमेरिका को तमाम समस्याओं की जड़ मानते हैं.

Wednesday, December 10, 2025

पुतिन की यात्रा और तलवार की धार पर भारत


पुतिन के भारत दौरे से भारत ने अपनी विदेश-नीति की स्वतंत्रता का परिचय दिया वहीं, रूस को अलग-थलग करने की कोशिशों को विफल करने में मदद भी की है. भारत को यह संदेश भी देना है कि हम किसी की दादागीरी के दबाव में नहीं आएँगे और अपनी स्वतंत्र सत्ता को बनाकर रखेंगे.

रूस को अलग-थलग करना इसलिए भी आसान नहीं है, क्योंकि विकासशील देशों के साथ उसके रिश्ते सोवियत-युग से बने हुए हैं. रूस ने बहुत लंबे समय तक इन देशों का साथ दिया है और अब ये देश उसका साथ दे रहे हैं.

इसका अर्थ यह भी नहीं है कि भारत ने अमेरिका से दूरी बनाई है या वह वैश्विक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया में किसी एक पाले में जाकर बैठेगा. अलबत्ता यह संकेत ज़रूर दिया कि भारत और रूस की दोस्ती ख़ास है, जो समय की कसौटी पर परखी गई है.

भारत को अमेरिका से रिश्तों में बदलाव आने पर धक्का जरूर लगा है. पिछले दो दशक से भारत यह कोशिश कर रहा था कि अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी विकसित हो. डॉनल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत का दर्जा रणनीतिक रूप से घटाया गया है.

ट्रंप प्रशासन ने इस हफ़्ते अपनी बहुप्रतीक्षित राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति जारी की है, जिसे देखते हुए लगता है कि अमेरिका ने एशिया में चीन से शत्रुता को कम करने और यूरोप में अपने प्रभाव को बढ़ाने का फैसला किया है.

संचार साथी: पहले साख बनाएँ, फिर इस्तेमाल करें


दूरसंचार विभाग ने स्मार्टफोन कंपनियों को संचार साथी एप्लीकेशन को अनिवार्य रूप से प्री-लोड करने के अपना आदेश वापस लेकर अच्छा काम किया है। इसे लागू करने का बेहतर तरीका यही था कि लोगों पर छोड़ दिया जाता कि वे चाहें, तो इसे डाउनलोड कर लें और न चाहें, तो न करें। इसके फायदों को देखते हुए वह खुद ही लोकप्रिय हो जाएगा। हाँ, फायदों की जानकारी लोगों को जरूर दी जानी चाहिए थी। इसे लेकर गोपनीयता और संभावित निगरानी को लेकर चिंताएं पैदा हुई, जिनके पीछे भले ही कोई आधार नहीं रहा होगा, पर वे वाजिब थीं। संचार मंत्रालय ने अब बुधवार को एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा, ‘सरकार ने मोबाइल निर्माताओं के लिए प्री-इंस्टॉलेशन को अनिवार्य नहीं बनाने का निर्णय लिया है।’

मतलब यह भी नहीं है कि सरकार साइबर अपराधों को रोकने की अपनी जिम्मेदारी से हाथ धो ले। वस्तुतः यह साख का सवाल है। पिछले सोमवार को ही सुप्रीम कोर्ट ने देशभर से सामने आए डिजिटल अरेस्ट के मामलों की देशभर में जाँच की जिम्मेदारी सीबीआई को सौंपी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा, डिजिटल अरेस्ट तेजी से बढ़ता साइबर क्राइम है। इसमें ठग खुद को पुलिस, कोर्ट या सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर वीडियो/ऑडियो कॉल के जरिए पीड़ितों, खासकर सीनियर सिटिजन को धमकाते हैं और उनसे पैसे वसूलते हैं।

शुरू होगा भारत-रूस सहयोग का एक नया दौर


 ऐसे मौके पर जब लग रहा है कि रूस ने यूक्रेन में लड़ाई को डिप्लोमैटिक-मोर्चे पर जीत लिया है, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत आ रहे हैं. दूसरी तरफ इसी परिघटना के आगे-पीछे भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते की भी संभावना है.

इन दोनों खबरों को मिलाकर पढ़ें, तो भारत की दृष्टि से साल का समापन अच्छे माहौल में होने जा रहा है. यूक्रेन में लडाई खत्म हुई, तो एक और बड़ा काम होगा. वह है रूस पर आर्थिक-पाबंदियों में कमी. इनसे भी भारत का रिश्ता है.

दूसरी तरफ अमेरिका-रूस, अमेरिका-चीन और भारत-चीन रिश्ते भी नई शक्ल ले रहे हैं. अक्सर सवाल किया जाता है कि चीन से घनिष्ठता को देखते हुए क्या  रूस भारत के साथ न्याय कर पाएगा. क्यों नहीं? बल्कि रूस संतुलनकारी भूमिका निभा सकता है.

Wednesday, November 26, 2025

वैश्विक-राजनीति क्या जी-20 को विफल कर देगी?


हाल में जोहानेसबर्ग में हुए जी-20 शिखर सम्मेलन से वैश्विक व्यवस्था के लिए कुछ महत्वपूर्ण संदेश निकले हैं. भारत की दृष्टि से इस सम्मेलन का दो कारणों से महत्व है.

एक, भारत ग्लोबल साउथ के नेता के रूप में उभर रहा है, जिसमें अफ्रीका की बड़ी भूमिका है. 2023 में भारत की जी-20 की अध्यक्षता के दौरान, अफ्रीकी संघ जी-20 का सदस्य बनाने की घोषणा की गई थी. ग्लोबल साउथ में अफ्रीकी देशों की महत्वपूर्ण भूमिका है.

दूसरी तरफ अमेरिकी बहिष्कार के कारण यह सम्मेलन वैश्विक राजनीति का शिकार भी हो गया. कहना मुश्किल है कि आगे की राह कैसी होगी, क्योंकि जी-20 का अगला मेजबान अमेरिका ही है, जिसका कोई प्रतिनिधि अध्यक्षता स्वीकार करने के लिए सम्मेलन में उपस्थित नहीं था.

खाली कुर्सी की अध्यक्षता

अजीब बात है कि वह देश, जिसे अध्यक्षता संभालनी है, सम्मेलन में आया ही नहीं. ऐसे  दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने कहा कि हमें यह अध्यक्षता किसी ‘खाली कुर्सी’ को सौंपनी होगी.

दक्षिण अफ्रीका ने ट्रंप के स्थान पर कार्यभार सौंपने के लिए दूतावास के किसी अधिकारी को भेजने के अमेरिकी प्रस्ताव को प्रोटोकॉल का उल्लंघन बताते हुए अस्वीकार कर दिया. अब शायद किसी और तरीके से इस अध्यक्षता का हस्तांतरण होगा.

Sunday, November 23, 2025

तमिल राजनीति और केंद्र-राज्य टकराव


सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार 20 नवंबर को राष्ट्रपति और राज्यपालों द्वारा विधेयकों पर स्वीकृति देने के लिए पहले इसी अदालत द्वारा निर्धारित अपनी ही समय-सीमा वापस ज़रूर ले ली, पर असाधारण स्थितियों में राज्यों के लिए अदालत का दरवाज़ा भी खुला रहने दिया है। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाले पीठ ने इस बात पर ज़ोर दिया कि न्यायालय कार्यपालिका की शक्तियों का अतिक्रमण नहीं कर सकता।

न्यायालय ने यह भी कहा है जब कोई राज्यपाल कानून बनाने की प्रक्रिया में ‘लंबी, अस्पष्ट और अनिश्चित’ देरी का कारण बने, तब राज्य सरकार अदालत की शरण ले सकती है। इस तरह से अदालत ने केंद्र और राज्यों के बीच एक जटिल राजनीतिक मुद्दे में नाज़ुक संतुलन बनाने की कोशिश की है। अदालत ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि 8 अप्रैल के फैसले के कारण तमिलनाडु के जिन 10 कानूनों पर राज्यपाल की स्वीकृति मान ली गई थी, उनकी स्थिति क्या होगी। कुछ संविधान विशेषज्ञ मानते हैं कि वे कानून बन चुके हैं और उनकी अधिसूचना गजट में भी हो चुकी है, इसलिए उन्हें स्वीकृत मान लेना चाहिए।

Wednesday, November 19, 2025

सेना की जागीर बनता पाकिस्तान


पाकिस्तान की संसद ने अपने थलसेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को असाधारण शक्तियां देने तथा देश के सुप्रीम कोर्ट को दूसरे दर्जे पर रखने के इरादे से तुर्त-फुर्त एक संविधान संशोधन किया है, जो फौरन लागू भी हो गया.

संविधान में 27वाँ संशोधन गुरुवार 13 नवंबर को राष्ट्रपति के दस्तखत होने के बाद कानून बन गया, जिससे देश की व्यवस्था बुनियादी तौर पर बदल गई है. पहले कहा जाता था कि दुनिया में पाकिस्तान की सेना ऐसी है, जो एक देश की मालिक है. अब कहा जा सकता है कि आसिम मुनीर ऐसे सेनाध्यक्ष हैं, जो पाकिस्तान के मालिक हैं.

पाकिस्तानी सेना ने लंबे समय से देश की वास्तविक सत्ता भोगी, कभी तख्तापलट के माध्यम से सत्ता पर कब्जा किया है तो कभी पर्दे के पीछे से प्रभाव डाला है. पर अब जो हुआ है, वह हैरतंगेज़ है.

सेना का नया पद

नेशनल असेंबली ने बुधवार 12 नवंबर को हंगामे से भरे सत्र के दौरान दो-तिहाई बहुमत से विवादास्पद 27वें संविधान संशोधन विधेयक को पास कर दिया. इस संशोधन का उद्देश्य रक्षा बलों के प्रमुख का एक नया पद सृजित करना और एक संवैधानिक न्यायालय की स्थापना करना है.

अब वहाँ के सेनाध्यक्ष देश के सबसे ताकतवर व्यक्ति बन गए हैं. एक और संशोधन के कारण सुप्रीम कोर्ट अब संविधान से जुड़े मुकदमों की सुनवाई नहीं कर सकेगा. उसकी जगह एक नए संघीय संवैधानिक न्यायालय का गठन शुरू हो गया है.  

Wednesday, November 12, 2025

बांग्लादेश के चुनाव से जुड़े हैं भारत से रिश्ते


बांग्लादेश में फरवरी में चुनाव कराए जाने की घोषणा के बाद से घटनाक्रम तेजी से बदल रहा है. वहाँ के राजनीतिक अंतर्विरोध तेजी से खुल रहे हैं. यह स्पष्ट हो रहा है कि वहाँ के समाज और राजनीति में कई धाराएँ एक साथ बहती हैं.

बुनियादी सवाल अब भी अपनी जगह है. चुनाव होंगे या नहीं और हुए तो परिणाम क्या होगा, कैसी सरकार बनेगी? अंतरिम सरकार को जो आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयाँ विरासत में मिली हैं, वे अब और बढ़ गई हैं, जो आने वाली सरकार के मत्थे मढ़ी जाएँगी. भारत के साथ रिश्ते भी इन चुनाव-परिणामों पर निर्भर करेंगे.

नई सरकार को राजनीतिक असंतोष, ऊँची मुद्रास्फीति और राजनीतिक-समूहों के तूफान का सामना करना होगा. देश की अर्थव्यवस्था भारत के साथ संबंधों पर भी निर्भर करती है. ये संबंध बिगड़े हुए हैं और कहना मुश्किल है कि नई सरकार का इस मामले में नज़रिया क्या होगा.

बढ़ती अराजकता

डॉ यूनुस की अंतरिम सरकार ने चुनाव की तारीख की घोषणा पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा ज़िया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और इस्लामी जमात-ए-इस्लामी के साथ विचार-विमर्श के बाद की है. फिर भी अधूरे सुधारों और बिगड़ती सुरक्षा व्यवस्था के कारण चुनाव की समय-सीमा खिसक जाए, तो हैरत नहीं होगी.

भीड़ की हिंसा बेरोकटोक जारी है, दिन-दहाड़े गोलीबारी और लिंचिंग की खबरें आ रही हैं. अवामी लीग को निशाना बनाकर राजनीतिक स्वतंत्रता पर भी अंकुश लगाए जा रहे हैं. ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी मई 2025 की रिपोर्ट में, इसे लेकर चिंता व्यक्त की है.

Saturday, November 8, 2025

‘वोट चोरी’ की साज़िश या कुछ और…


नवोदय टाइम्स में 8 नवंबर 2025 को प्रकाशित लेख का संवर्धित संस्करण

वोट चोरी के आरोपों पर ध्यान नहीं दें, तब भी मतदाता सूचियों में गड़बड़ियाँ हैं। ये गड़बड़ियाँ क्या सरकार और चुनाव आयोग की मिलीभगत की वजह से हैं? ऐसा है, तो फिर यह लोकतंत्र को कलंकित करने वाली घटना है, पर साज़िश का आरोप मामूली बात नहीं है। इसकी पड़ताल होनी ही चाहिए। साज़िश साबित नहीं हुई और प्रशासनिक-अव्यवस्था, अकुशलता या ज्यादा से ज्यादा विघ्नसंतोषियों की साज़िश साबित हुई, तब क्या होगा?

सवाल यह भी है कि कौन करेगा, इसकी जाँच? वस्तुतः यह मसला चुनाव-सुधारों और खासतौर से चुनाव-आयोग को स्वतंत्र संस्था बनाने से जुड़ा है। क्या देश के राजनीतिक दल इन दोनों बातों से सहमत हैं? इसे भी याद रखना चाहिए कि ज्यादातर चुनाव-सुधार से जुड़े काम, राजनीतिक दलों के अड़ंगों के बावज़ूद हुए हैं।

राहुल गांधी दो बार पीपीटी प्रेजेंटेशन कर चुके हैं। बुधवार को प्रेस कांफ्रेंस में उनसे पूछा गया कि आप इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में क्यों नहीं ले जाते, इसपर उन्होंने कहा, सुप्रीम कोर्ट सहित सब देख रहे हैं। हम यह सब बंद कमरे में नहीं कर रहे हैं। मीडिया के सामने कर रहे हैं। यह चुनाव आयोग का डेटा है, हमारा नहीं। अगस्त में राहुल गांधी ने कर्नाटक के महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची को लेकर कहा था कि आयोग और बीजेपी की मिलीभगत से ‘वोट चोरी’ हुई है। अब हरियाणा का मामला उन्होंने उठाया है।

Thursday, November 6, 2025

हैवी लिफ्ट अंतरिक्ष प्रक्षेपण के दरवाज़े खुले


भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 2 नवंबर को, भारतीय नौसेना के लिए जीसैट-7आर का प्रक्षेपण करके अपनी दक्षता को एक बार फिर से साबित किया है। दक्षता इसलिए क्योंकि देश के सबसे शक्तिशाली रॉकेट लॉन्च वेहिकल मार्क-3 (एलवीएम-3) का इसमें इस्तेमाल हुआ था, जिसकी भार वहन क्षमता मोटे तौर पर 4000 किलोग्राम की थी, पर उसने जिस उपग्रह का प्रक्षेपण किया, उसका भार 4,410 किलोग्राम था। भारतीय धरती से प्रक्षेपित यह अब तक का सबसे भारी संचार उपग्रह है।

सीएमएस-03 (जीसैट-7आर) सैन्य संचार उपग्रह है, जिसका वित्तपोषण पूरी तरह से रक्षा मंत्रालय ने किया है। इसे हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षित, मल्टी-बैंड संचार लिंक प्रदान करने के लिए भारतीय नौसेना के उपयोग के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किया गया है। यह उपग्रह पोतों, पनडुब्बियों और विमानों के बीच आवाज, डेटा और वीडियो लिंक के लिए संचार नेटवर्क का काम करेगा। मुख्य मिशन के रूप में इसका काम समुद्री सुरक्षा और निगरानी है। यह पुराने जीसैट-7 (रुक्मिणी) की जगह लेगा, जो 2013 से सेवा में है। जीसैट-7 और जीसैट-7ए देश के समर्पित सैन्य संचार उपग्रह हैं। दिसंबर 2018 में प्रक्षेपित जीसैट-7, मुख्यतः वायुसेना के लिए डिज़ाइन किया गया है। थलसेना आंशिक रूप से इसकी लगभग 30 प्रतिशत क्षमता का उपयोग करती है।

हमारे संचार उपग्रह अपेक्षाकृत भारी होते हैं। इसरो की कोशिश होती है कि एक ही अंतरिक्ष यान में व्यापक कवरेज, उच्च शक्ति और लंबी सेवा अवधि का मेल हो। पूरे देश और आस-पास के समुद्रों की कवरेज के लिए, संचार पेलोड को कई आवृत्ति बैंडों में कई चैनलों की आवश्यकता होती है। इसके लिए कई बड़े एंटेना, उच्च-शक्ति एम्पलीफायर, वेवगाइड, फ़िल्टर, स्विच कई एनालॉग ट्रांसपोंडरों या लचीले डिजिटल प्रोसेसर की आवश्यकता होती है। 12 से 15 साल तक कई किलोवाट बिजली की आपूर्ति के लिए, उपग्रहों में बड़े सौर पैनल, पर्याप्त बड़ी बैटरियाँ और पावर कंडीशनिंग इकाइयाँ होती हैं। इस वजह से वजन बढ़ता है।

चार हजार किलोग्राम से अधिक वज़न वाला जीसैट-7आर इसरो का यह पहला उपग्रह है, जिसे देश की धरती से दूरस्थ भू-समकालिक स्थानांतरण कक्षा में स्थापित किया गया है। इस प्रक्षेपण ने उस बाधा को तोड़ा, जो अपने प्रक्षेपकों की मदद से भारी उपग्रहों के प्रक्षेपण से हमें रोकती थी।

Wednesday, November 5, 2025

बदलती भू-राजनीति और भारत-अमेरिका-चीन त्रिकोण


अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के बयानों और टैरिफ को लेकर भारत और अमेरिका के बीच चलती तनातनी के दौरान दो-तीन घटनाएँ ऐसी हुई हैं, जो इस चलन के विपरीत हैं.

एक है, दोनों देशों के बीच दस साल के रक्षा-समझौते का नवीकरण और दूसरी चाबहार पर अमेरिकी पाबंदियों में छह महीने की छूट. इसके अलावा दोनों देश एक व्यापार-समझौते पर बात कर रहे हैं, जो इसी महीने होना है.

इन बातों को देखते हुए पहेली जैसा सवाल जन्म लेता है कि एक तरफ दोनों देशों के बीच आर्थिक-प्रश्नों को लेकर तीखे मतभेद हैं, तो सामरिक और भू-राजनीतिक रिश्ते मजबूत क्यों हो रहे हैं? उधर अमेरिका और चीन का एक-दूसरे के करीब आना भी पहेली की तरह है.

डॉनल्ड ट्रंप और शी चिनफिंग के बीच मुलाकात के बाद कुछ दिनों के भीतर  अमेरिकी युद्धमंत्री (या रक्षामंत्री) पीट हैगसैथ ने रविवार को बताया कि उन्होंने चीन के रक्षामंत्री एडमिरल दोंग जून से मुलाकात की और दोनों ने आपसी संपर्क को मजबूत करने और सैनिक-चैनल स्थापित करने पर सहमति व्यक्त की है.

Thursday, October 30, 2025

आगे जाता आसियान और पिछड़ता सार्क


हाल में दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया को लेकर दो तरह की खबरें मिली थीं, जिनसे दो तरह की प्रवृत्तियों के संकेत मिलते हैं। आसियान-भारत शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वर्चुअल तरीके से और विदेशमंत्री एस जयशंकर स्वयं उपस्थित हुए थे। इस मौके पर प्रधानमंत्री ने कम्युनिटी विज़न 2045 को अपनाने के लिए आसियान की सराहना की। कम्युनिटी विज़न 2045 अगले बीस वर्षों में इस क्षेत्र को एक समेकित समन्वित विकास-क्षेत्र में तब्दील करने की योजना है।

अपने आसपास के राजनीतिक माहौल को देखते हुए यह ज़ाहिर होता जा रहा है कि भारत को पूर्व की दिशा में अपनी कनेक्टिविटी का तेजी से विस्तार करना होगा। यह विस्तार हो भी रहा है, पर म्यांमार की अस्थिरता और बांग्लादेश की अनिश्चित राजनीति के कारण कुछ सवाल खड़े हो रहे हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया के पाँच देशों (कंबोडिया, लाओस, म्यांमार, थाईलैंड और वियतनाम) के साथ सांस्कृतिक और वाणिज्यिक संबंधों को बढ़ावा देने वाले गंगा-मीकांग सहयोग कार्यक्रम में हमें तेजी लानी चाहिए।

अब उस दूसरी खबर की ओर आएँ, जो इस सिलसिले में महत्वपूर्ण है। भारत के सरकारी स्वामित्व वाले भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) ने गत 22 अक्तूबर से अपने पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए बांग्लादेश से इंटरनेट बैंडविड्थ का आयात बंद कर दिया। इस कदम का सीधा असर पूर्वोत्तर की इंटरनेट कनेक्टिविटी पर पड़ेगा, जो अभी तक बांग्लादेश अखौरा बंदरगाह के माध्यम से आयातित बैंडविड्थ पर निर्भर थी।

यह फैसला अचानक नहीं हुआ है। पिछले साल दिसंबर में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने हसीना सरकार के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें भारत के पूर्वोत्तर को बैंडविड्थ की आपूर्ति के लिए बांग्लादेश को ट्रांज़िट पॉइंट के रूप में उपयोग करने की अनुमति दी गई थी। बांग्लादेश टेलीकम्युनिकेशंस रेग्युलेटरी कमीशन (बीटीआरसी) का कहना था कि भारत को ट्रांज़िट पॉइंट देने से क्षेत्रीय इंटरनेट हब बनने की हमारी क्षमता कमज़ोर हो जाएगी।

भारत का पूर्वोत्तर पहले घरेलू फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क का उपयोग करके चेन्नई में समुद्री केबलों के माध्यम से सिंगापुर से जुड़ा हुआ था। चूंकि चेन्नई में लैंडिंग स्टेशन पूर्वोत्तर से लगभग 5,500 किमी दूर है, इसलिए इंटरनेट की गति पर असर पड़ता था।

Wednesday, October 29, 2025

रूसी तेल पर पाबंदियाँ और भारत-अमेरिका रिश्ते


रूस पर दबाव बढ़ाने के लिए उसकी दो सबसे बड़ी तेल कंपनियों और 34 सहायक कंपनियों पर अमेरिका ने जो प्रतिबंध लगाए हैं, उनका असर भारत पर भी पड़ेगा. कोई भी बैंक, जो इन कंपनियों के तेल की खरीद में मदद करेगा, उसे अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से अलग किया जा सकता है.

रोज़नेफ्ट और लुकॉइल नामक इन कंपनियों से भारत की दो कंपनियाँ (रिलायंस और नायरा) तेल खरीदती रही हैं. रिलायंस का रोज़नेफ़्ट से क़रार था और नायरा में भी रोज़नेफ़्ट की हिस्सेदारी है. रिलायंस ने प्रतिबंधों को स्वीकार करने के साथ भारत सरकार के साथ खड़े होने की प्रतिबद्धता भी व्यक्त की है.

उधर भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता निर्णायक मोड़ पर है. लगता है कि दोनों देशों ने कुछ पत्ते दबाकर रखे हैं, जिनके सहारे मोल-तोल चल रहा है. इस दौरान अमेरिका यह संकेत भी दे रहा है कि दोनों के रिश्तों में बिगाड़ नहीं है.

ट्रंप इस हफ्ते दक्षिण पूर्व और पूर्व एशिया की यात्रा पर आए हैं. मलेशिया, जापान और दक्षिण कोरिया में वे रुकेंगे. उनकी चीन के शी जिनपिंग के साथ बैठक होगी. बुधवार को बुसान में इस बैठक के बाद अमेरिका और तीन के बीच की रस्साकशी के परिणाम सामने आएँगे, साथ ही अमेरिका के एशिया पर प्रभाव की असलियत का पता भी लगेगा. 

ट्रंप साबित करना चाहेंगे कि अमेरिका का अब भी दक्षिण पूर्व एशिया में बोलबाला है, जहाँ बीजिंग का दबदबा बढ़ रहा है. उम्मीद थी कि उनकी और पीएम मोदी की मुलाकात कुआलालंपुर में आसियान शिखर सम्मेलन में होगी, पर मोदी वहाँ नहीं गए. ज़ाहिर है कि भारत सरकार, अमेरिका के साथ निकटता दिखाने से बच रही है.

अन्य प्रतिबंध

रूस की सैन्य क्षमताओं को कम करने के उद्देश्य से विमान उपकरण और सेमीकंडक्टर जैसे उच्च तकनीक वाले उत्पादों के रूस को निर्यात पर रोक भी लगाई गई है.  

ये निर्यात प्रतिबंध उन वस्तुओं पर भी लागू होंगे, जिनका उत्पादन अन्य देश अमेरिकी तकनीक का उपयोग करके करते हैं. अमेरिकी वित्तमंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि ‘युद्ध को ख़त्म करने से इनकार’ की वजह से प्रतिबंध जरूरी हैं.

अमेरिका ने यह कार्रवाई अकेले नहीं की है, बल्कि उसके सहयोगियों ने भी की है. पिछले हफ्ते ब्रिटेन ने भी इन्हीं दोनों कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए थे. यूरोपियन यूनियन ने भी प्रतिबंध लगाए हैं.

Saturday, October 25, 2025

पीयूष पांडे और हिन्दुस्तान अखबार

महिला प्रेस क्लब के लॉन की इस तस्वीर में बाएँ से अनिता सिंह, संजय अभिज्ञान, प्रमोद जोशी, मृणाल जी, गैबी श्मिट और जसनीत बिंद्रा। 
विज्ञापन गुरु पीयूष पांडे के निधन की खबर आने के बाद मेरे मन में उनसे एक या दो मुलाकातों की याद ताज़ा हो गई, जब 2008 में हिन्दुस्तान अखबार के दूसरे रिलॉन्च के सिलसिले में हमारी कंपनी ने उनकी सहायता ली थी। उसके तहत उन्होंने एक टीवी विज्ञापन तैयार किया था, जिसके साथ एक गीत बजता था, अब हिन्दुस्तान की बारी है, क्या पूरी तैयारी है?’ उन दिनों हमारे यहाँ इस गीत की कॉलर ट्यून भी बनाई गई थी।

हालाँकि उस समय तक सोशल मीडिया का भारत में उदय हो चुका था, पर कम से कम मैं उसमें बहुत सक्रिय नहीं था और अफसोस इस बात का है कि मैंने उस विज्ञापन को रिकॉर्ड करके नहीं रखा। बहरहाल आज मैंने यूट्यूब पर उसे सर्च किया, पर मिला नहीं। इसके बाद मैंने गूगल के सर्च इंजन पर सवाल डाला कि क्या आपको हिन्दुस्तान अखबार का विज्ञापन गीत की जानकारी है?

इसपर जवाब मिला, विज्ञापन गीत के लिए यह जानना ज़रूरी है कि आप किस विशेष विज्ञापन के बारे में पूछ रहे हैं, क्योंकि हिन्दुस्तान अखबार के कई विज्ञापन अभियान चले हैं और उनके विज्ञापन गीत भी अलग-अलग हैं। हालांकि, उनका एक लोकप्रिय और यादगार अभियान था, जिसका गीत इस प्रकार था: "तरक्की का नया हिन्दुस्तान, नए विचारों का हिन्दुस्तान।"

Wednesday, October 22, 2025

फ्रांचेस्का ऑर्सीनी के प्रवेश पर रोक


हिंदी की अग्रणी विद्वान और लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज (एसओएएस) की प्रोफेसर एमेरिटा फ्रांचेस्का ऑर्सीनी के देश में प्रवेश करने से रोक लगाने की कार्रवाई चिंता पैदा कर रही है। एक अखबार की रिपोर्ट के अनुसार गृह मंत्रालय के एक अधिकारी का दावा है कि उनकी पिछली यात्राओं के दौरान ‘वीज़ा शर्तों का उल्लंघन’ ही उन्हें देश में प्रवेश देने से इनकार करने का आधार है। इस विषय में सरकार को जल्द से जल्द पूरी जानकारी सामने रखनी चाहिए।

यह बात समझ में नहीं आती। वे साधारण महिला नहीं हैं। यदि वीज़ा को लेकर कोई तकनीकी दिक्कत थी, तो उसका पता इस तरह से अचानक नहीं लगना चाहिए था। अभी तक ऑर्सीनी की ओर से कोई बात सामने नहीं आई है, पर जो भी हुआ है, वह दुखद और निंदनीय है। वापस जाने वाली फ्लाइट में सवार ऑर्सीनी से कोई टिप्पणी नहीं मिल पाई, लेकिन द वायर ने पहले उनके हवाले से कहा था कि उन्हें दिल्ली एयरपोर्ट पर रोके जाने का कोई कारण नहीं बताया गया। उन्होंने कहा, ‘मुझे निर्वासित किया जा रहा है। मुझे बस इतना ही पता है।’

ऑर्सीनी के पति पीटर कोर्निकी, जो कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में जापानी भाषा के एमेरिटस प्रोफेसर और ब्रिटिश अकादमी के फैलो हैं। उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस से पुष्टि की कि ऑर्सीनी हांगकांग से दिल्ली आई थीं और उन्हें हांगकांग वापस भेज दिया गया। उन्होंने कहा कि इसके पीछे कोई कारण नहीं बताया गया।

वीज़ा उल्लंघन के आरोपों के बारे में पूछे जाने पर, उन्होंने कहा कि उन्हें ‘इन मामलों की कोई जानकारी नहीं है।’ यह पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने हाल में भारत में किसी सम्मेलन में भाग लिया है, उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी किसी भी बात की जानकारी नहीं है। मूल रूप से इटली की रहने वाली ऑर्सीनी ने हिंदी में स्नातक की पढ़ाई पूरी की, बाद में उन्होंने दिल्ली में केंद्रीय हिंदी संस्थान और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अध्ययन किया।


ऑर्सीनी ने 'द हिंदी पब्लिक स्फीयर 1920-1940: लैंग्वेज एंड लिटरेचर इन द एज ऑफ नेशनलिज्म' नामक पुस्तक लिखी है, जो 2002 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित हुई थी और यह उनके पीएचडी के दौरान एसओएएस में किए गए शोध का हिस्सा थी। इस पुस्तक में उन्होंने पत्रिकाओं और साहित्य के माध्यम से उन दशकों के राष्ट्रवाद के संदर्भ में हिंदी भाषा का परीक्षण किया है। इसका हिंदी में अनुवाद नीलाभ ने किया है, जिसका वाणी ने 2011 में प्रकाशन किया। मुझे थोड़ी हैरत हुई कि इस दौरान हिंदी के लेखक भी अंगरेजी किताब का ज़िक्र कर रहे हैं, हिंदी पुस्तक का नहीं। मुझे नहीं लगता कि इसे अंगरेजी में भी हिंदी वालों ने ज्यादा पढ़ा है, बहरहाल।  

ऑर्सीनी 2013-14 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के रैडक्लिफ संस्थान में फैलो थीं। उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय और एसओएएस में अध्यापन किया, और संस्थान के साथ तीन दशकों से अधिक समय तक जुड़े रहने के बाद, 2021 में वहाँ से सेवानिवृत्त हुईं।

उनका भारत से चार दशक से भी ज़्यादा पुराना नाता रहा है, उन्होंने यहीं हिंदी का अध्ययन किया है। वे समकालीन और मध्यकालीन हिंदी साहित्य की विद्वान हैं। उनका ज़्यादातर साहित्य मौखिक है, इसलिए वे लोगों से बातचीत करती थीं, जानकारी इकट्ठा करती थीं और विद्वानों से मिलती थीं। उन्होंने कई विद्वानों का मार्गदर्शन भी किया है और ग्रंथों का अनुवाद भी किया है। यह उनकी सामान्य वार्षिक यात्राओं में से एक थी,’ दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर और ऑर्सीनी के एक मित्र ने नाम न बताने की शर्त पर बताया।

Tuesday, October 21, 2025

अपने कट्टरपंथी मकड़जाल में फँसा पाकिस्तान

 


पाकिस्तान के रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ ने रविवार को कहा कि पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान दोहा में उच्च स्तरीय वार्ता के बाद तत्काल संघर्ष विराम पर सहमत हो गए हैं. दोनों ने आगे चर्चा के लिए 25 अक्तूबर को इस्तानबूल में फिर से मिलने की उम्मीद भी ज़ाहिर की है.

क़तर के प्रयास के दोनों देशों के बीच हुई इस वार्ता से मसले सुलझेंगे या नहीं, कहना मुश्किल है, पर टकराव ने बड़ी शक्ल ले ली है. यह टकराव सीधी पारंपरिक लड़ाई नहीं होगा. तालिबान खुले मैदान में नहीं लड़ता.

चार साल पहले अगस्त 2021 में, जब तालिबान ने काबुल पर कब्जा किया था, तब बहुत कम लोग इस बात की कल्पना कर सकते थे कि दोनों दोस्त, आगे जाकर दुश्मन जैसा व्यवहार करने लगेंगे.  

पाकिस्तान अपनी ही बोई फसल काट रहा है. भारत से अज़ली दुश्मनी रखने के अंतर्विरोध उसके इस संकट के पीछे हैं. एक तरफ टीटीपी सीमा पार से हमलों और आत्मघाती विस्फोटों के साथ जवाबी कार्रवाई कर रहा है, वहीं पाकिस्तान आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता से घिरा है. उसके लिए यह अच्छा संकेत नहीं है.

पाकिस्तानी प्रशासन आग से खेलने का शौकीन है. हिंसा और आतंकवाद उसकी विचारधारा के अनिवार्य अंग बन चुके हैं. यह रणनीति केवल कश्मीरी मसले को सुलगाए रखने तक सीमित नहीं है. पिछले तीन-चार दशकों में दुनिया के किसी भी कोने में हुई आतंकी गतिविधि में कहीं न कहीं पाकिस्तानी हाथ होता है.

उन्मादी राजनीति

ग्यारह साल पहले 16 दिसम्बर 2014 को जब पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल पर आतंकवादी हमले में करीब डेढ़ सौ बच्चों की मौत हुई थी, तब शायद वहाँ के नागरिकों को पहला झटका लगा था. खूनी विचारधारा ने उनके बच्चों की जान लेनी शुरू कर दी थी. 

इस हत्याकांड के बाद पाकिस्तान के राजनेताओं की प्रतिक्रियाएं रोचक थीं. अवामी नेशनल पार्टी के रहनुमा ग़ुलाम अहमद बिलौर ने कहा, ये ना यहूदियों और ना ही हिंदुओं ने, बल्कि हमारे मुसलमान अफ़राद ने किया. 

पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सीनेटर फ़रहत उल्ला बाबर ने बीबीसी उर्दू से कहा, इस बात का हमें बरमला एतराफ़ करना पड़ेगा कि पाकिस्तान का सब से बड़ा दुश्मन सरहद के उस पार नहीं, सरहद के अंदर है. आप ही के मज़हब की पैरवी करता है, आप ही के ख़ुदा और रसूल का नाम लेता है, आप ही तरह है, हम सब की तरह है और वो हमारे अंदर है.  

उन्होंने कहा, शिद्दतपसंदों का नज़रिया और बयानिया बदकिस्मती से रियासत की सतह पर सही तरीक़े से चैलेंज नहीं हुआ. शिद्दतपसंदों ने पाकिस्तानी सियासत में दाख़िल होने के रास्ते बना लिए हैं. पाकिस्तान में समझदार और शांतिप्रिय लोग भी हैं, पर राजनीतिक कारणों से उन्मादी विचार हावी रहते  हैं. 

तीन मोर्चे

पाकिस्तान तीन देशों-भारत, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान-के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है. इसके अलावा, पीओके में चीन के साथ भी इसकी 438 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है.

पाकिस्तान की भारत के साथ 3,323 किलोमीटर लंबी सीमा है और अफगानिस्तान के साथ 2,430 किलोमीटर लंबी सीमा है. यदि भारत के साथ पाकिस्तान का पूर्वी मोर्चा और अफगानिस्तान के साथ पश्चिमी मोर्चा दोनों सक्रिय हैं, तो इसका मतलब होगा कि 5,753 किलोमीटर लंबी सक्रिय सीमा रेखा होगी.

इसके अतिरिक्त, बलोचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) से लगातार खतरों के कारण पाकिस्तान को ईरान के साथ अपनी 959 किलोमीटर लंबी सीमा की भी सुरक्षा करने की आवश्यकता है. इस प्रकार लगभग 8,000 किलोमीटर लंबी सीमा की रक्षा करना एक अत्यंत कठिन कार्य है.

पाकिस्तान ने अपनी अधिकांश सेना (लगभग 70-80%) को नियंत्रण रेखा (एलओसी) और भारत के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा पर तैनात किया है, जिससे पश्चिमी मोर्चे पर संसाधनों की कमी है.

इस उपेक्षा का मूल कारण रणनीतिक गहराई का सिद्धांत है, जिसे 1980 के दशक में जनरल जिया-उल-हक के शासनकाल में औपचारिक रूप दिया गया था, जिसके अनुसार अफगानिस्तान मजबूत मोर्चा नहीं, बल्कि भारत के खिलाफ एक बफर/बैकबैक है.

मई में भारत के साथ हुए संक्षिप्त युद्ध के बाद, पाकिस्तान ने वित्त वर्ष 2025-26 में अपने रक्षा बजट को बढ़ाकर 11.67 अरब अमेरिकी डॉलर कर दिया है.

पाकिस्तान का रक्षा पूंजीगत व्यय लड़ाकू विमानों और वायु रक्षा पर केंद्रित है, जो पूर्वी मोर्चे पर इस्लामाबाद के फोकस को रेखांकित करता है, क्योंकि तालिबान के पास कोई वायु सेना नहीं है. इसी प्रकार, परमाणु शस्त्रागार बनाए रखने पर पाकिस्तान का खर्च विशेष रूप से भारत पर केंद्रित है।

बगराम एयरबेस

इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने भी अफ़ग़ानिस्तान के मसलों में हस्तक्षेप करने का संकेत दिया है. उन्होंने बार-बार बगराम एयरबेस पर फिर से कब्जा करने की इच्छा जताई है. इसमें उन्हें पाकिस्तान की मदद मिलेगी.

पाकिस्तान अपनी वायुसेना का सहारा ले रहा है. इसी रणनीति का सहारा अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सेना ने लिया था. पर उसे सफलता नहीं मिली. बहरहाल दोनों देशों के बीच पिछले दस-बारह दिन में टकराव में तेजी आई है.

व्यावहारिक स्थिति यह है कि अफ़ग़ानिस्तान के ज्यादातर हिस्सों पर पाकिस्तान आसानी से हवाई हमले कर सकता है, जबकि तालिबान की ताकत तोपखाने तक सीमित है. पर वह पाकिस्तान के भीतर टीटीपी के लड़ाकों का इस्तेमाल करके छापामार शैली का इस्तेमाल कर सकता है.

पाकिस्तानी धमकियाँ

पाकिस्तानी वायुसेना ने 9 अक्तूबर को अफ़ग़ानिस्तान में दो-तीन जगहों पर हवाई हमले किए. उसी रोज़ तालिबान के विदेशमंत्री अमीर ख़ान मुत्तकी भारत आए थे. अनुमान लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान की ओर से वह तालिबान के नाम संदेश था.  

हालाँकि पाकिस्तान कह रहा है कि तालिबान की ताज़ा गतिविधियाँ भारत से प्रेरित हैं, पर घटनाक्रम बता रहा है कि पाकिस्तान ने मुत्तकी की भारत-यात्रा पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने के लिए 9 अक्तूबर का दिन ही चुना. यानी पहल पाकिस्तान की तरफ से हुई.

पाकिस्तान की ओर से रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ उग्र बयान जारी कर रहे हैं. हाल में उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि काबुल के साथ संबंध अब पहले जैसे नहीं रहेंगे. अब शांति के लिए कोई अपील नहीं होगी; कोई भी प्रतिनिधिमंडल काबुल नहीं जाएगा. आतंकवाद का स्रोत जहाँ भी है, उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी.

बहरहाल दोहा में बात करने भी वही गए. आसिफ ने अफ़ग़ानिस्तान पर भारत की गोद में बैठकर पाकिस्तान के खिलाफ साज़िश रचने का आरोप लगाते हुए कहा कि इस्लामाबाद अब पहले की तरह काबुल के साथ संबंध नहीं रख सकता. 'पाकिस्तानी ज़मीन पर मौजूद सभी अफगानों को अपने वतन वापस जाना होगा.

क्रिकेट-मैच रद्द

शुक्रवार 17 अक्तूबर की रात कंधार के स्पिन बोल्डक ज़िले में पाकिस्तान के हवाई हमलों में तीन अफ़ग़ानिस्तानी क्रिकेटरों सहित 40 लोग मारे गए. ये हवाई हमले रिहायशी इलाकों में हुए.

इन हमलों के बाद अफ़ग़ानिस्तान ने पाकिस्तान के साथ होने वाली आगामी त्रिकोणीय टी-20 सीरीज़ से हटने की घोषणा की है. नवंबर में होने वाली इस सीरीज़ में तीसरी टीम श्रीलंका है. अब अफ़ग़ानिस्तान की जगह ज़िम्बाब्वे की टीम आएगी.

इसके पहले अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान की सीमा पर रविवार 12 अक्तूबर को दोनों देशों की सेनाओं के बीच रात भर घातक झड़प हुई. दोनों पक्षों के बीच भारी गोलीबारी हुई, जो पिछले कई वर्षों में हिंसा में सबसे बड़ी घटना थी.

क़तर-सऊदी हस्तक्षेप

टकराव की शिद्दत को देखते हुए क़तर और सऊदी अरब ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की, जिसके कारण आधी रात को लड़ाई रुक गई. दोनों देशों की सेनाओं के बीच सीमा पर पहले भी टकराव होता रहा है, पर अब उसकी शिद्दत ज्यादा है.

पाकिस्तान ने बार-बार तालिबान सरकार पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, को पनाह देने का आरोप लगाया है. उसने भारत पर टीटीपी का समर्थन करने का आरोप लगाया है.

पाकिस्तानी सेना और स्वतंत्र तथा संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों के अनुसार, टीटीपी नेतृत्व को अफ़ग़ान सरकार से वित्तीय सहायता मिलती है. तालिबान इस बात से इनकार करता है.

सुधार के प्रयास

दोनों सरकारों ने हाल में अपने संबंधों को सुधारने की कोशिश भी की है. दोनों देशों के शीर्ष राजनयिकों ने अगस्त में अपने चीनी नेताओं से मुलाकात की थी, लेकिन पाकिस्तान ने तालिबान को अफ़ग़ानिस्तान के वैध शासक के रूप में मान्यता नहीं दी है.

पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान का सबसे बड़ा निर्यात साझेदार है, और यह उन लाखों अफ़ग़ानों की मेज़बानी करता है जो पिछले दशकों में असुरक्षा और बेरोज़गारी के कारण भागकर आए हैं. हाल के महीनों में, पाकिस्तान सरकार ने इन अफ़ग़ानों के निष्कासन के आदेश दिए हैं, जिसके कारण हज़ारों अफ़ग़ान वापस अफ़ग़ानिस्तान लौट आए हैं.

9 अक्तूबर की रात को, काबुल और पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान के अन्य हिस्सों पर हुए हवाई हमलों के तुरंत बाद, सोशल मीडिया पर अटकलें लगाई गईं कि टीटीपी के प्रमुख नूर वली महसूद को निशाना बनाया गया है.

बाद में जानकारी सामने आई कि महसूद बच गया है. तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद ने जोर देकर कहा कि टीटीपी अमीर न तो काबुल में थे और न ही अफ़ग़ानिस्तान में.

पाकिस्तान की रचना

तालिबान, पाकिस्तान की ही रचना हैं. नब्बे के दशक में अपने जन्म के बाद से वे पाकिस्तान के सहयोगी बने हुए हैं. पाकिस्तान ने 1996 में तालिबान शासन को तेजी से मान्यता दी थी. वही तालिबान अब डूरंड रेखा को मान्यता देने से इनकार करते हैं और टीटीपी को शरण देते हैं.

2021 में तालिबान के काबुल पर कब्जे के दो दिन बाद टीटीपी के अमीर मुफ्ती नूर वली महसूद ने इस्लामी अमीरात के प्रति निष्ठा की शपथ ली. पाकिस्तान में टीटीपी की गतिविधियाँ तब से बढ़ती जा रही है. जवाब में, पाकिस्तान ने व्यापार को प्रतिबंधित करके, और पिछले दो वर्षों में हजारों अफ़ग़ान शरणार्थियों को निष्कासित किया है.

तालिबान और टीटीपी

टीटीपी को समझने के पहले तालिबान को समझना होगा. तालिबान शब्द का अर्थ है छात्र. अफ़ग़ान और पाकिस्तानी मदरसों या धार्मिक स्कूलों में इस्लाम की शिक्षा लेने वालों से 1990 के दशक में यह बना था.

1994 तक, तालिबान दक्षिण अफ़ग़ानिस्तान में अपनी पैठ बना चुका था. उसका पहला कदम कुरान की शिक्षाओं और न्यायशास्त्र की सख्त व्याख्याओं को लागू करना था. इसका सबसे बड़ा असर स्त्रियों, राजनीतिक विरोधियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों पर पड़ा.

टीटीपी 2007 में विभिन्न गुटों के गठबंधन से बना था. इसका मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान में सख्त व्याख्या वाले इस्लामी शरिया कानून को लागू करना है. खासतौर से पश्तून कबायली इलाकों, जैसे पूर्व फेडरली एडमिनिस्ट्रेटेड ट्राइबल एरियाज (फाटा) और खैबर पख्तूनख्वा प्रांत, में पाकिस्तान सरकार के असर को खत्म करना.

इस्लामी अमीरात

यह समूह पाकिस्तान में इस्लामी अमीरात स्थापित करना और पाकिस्तानी सरकार को उखाड़ फेंकना ज़रूरी मानता है. उसके अनुसार पाकिस्तान की स्थापना के मूल उद्देश्य को पूरा करने के लिए वर्तमान गैर-इस्लामी संविधान को खत्म करना होगा.  

वह अफगान तालिबान को अपना रोल मॉडल मानता है और उनके नेता को अपना सर्वोच्च नेता स्वीकार करता है. वह खुद को पश्तून जनजातियों का रक्षक बताता है और पश्तून राष्ट्रवादी तत्वों को बढ़ावा देता है, हालांकि उसका मुख्य फोकस जिहादी है.

टीटीपी के पहले नेता बैतुल्लाह महसूद की मृत्यु 5 अगस्त 2009 को हुई और उनके उत्तराधिकारी हकीमुल्लाह महसूद की मृत्यु 1 नवंबर 2013 को हुई.  नवंबर 2013 में टीटीपी के केंद्रीय शूरा ने मुल्ला फजलुल्लाह को समूह का समग्र नेता नियुक्त किया.

फजलुल्लाह कट्टर पश्चिम-विरोधी और इस्लामाबाद-विरोधी था. वह कठोर रणनीति का समर्थन करता था, जिसका प्रमाण नवंबर 2012 में शिक्षा अधिकार कार्यकर्ता मलाला युसुफज़ई की हत्या के प्रयास से मिलता है.

महसूद-नेतृत्व

2018 में टीटीपी का तत्कालीन अमीर, मुल्ला फजलुल्लाह अमेरिकी ड्रोन हमले में मारा गया था. उसके बाद महसूद को उनका उत्तराधिकारी बनाया गया. फजलुल्लाह, एकमात्र गैर-महसूद टीटीपी प्रमुख था. 2014 के आर्मी पब्लिक स्कूल नरसंहार के बाद इस समूह को काफी आलोचना का सामना करना पड़ा था.

महसूद के अधीन टीटीपी ने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों को भारी नुकसान पहुँचाया है. पिछले चार वर्षों में, पाकिस्तान ने अफ़ग़ान तालिबान अधिकारियों से कई बार टीटीपी पर लगाम लगाने का आग्रह किया है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि टीटीपी ने सीमा पार अपनी हिंसा को बढ़ाना जारी रखा.

पाकिस्तानी कार्रवाई

पाकिस्तान ने पिछले दो वर्षों में पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान में टीटीपी के गढ़ों को निशाना बनाकर हमले किए हैं. व्यापार प्रतिबंध भी लगाए और देश में रहने वाले दस लाख से अधिक अफ़ग़ान शरणार्थियों को निर्वासित करना शुरू कर दिया, इस उम्मीद में कि तालिबान दबाव में आ जाएगा.

सितंबर 2023 से अब तक लगभग 8,15,000 अफ़ग़ानों को पाकिस्तान से निकाला जा चुका है. संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि 30 लाख लोग अब भी वहाँ हैं. दोनों देशों के बीच व्यापार में भारी गिरावट आई है. फिर भी, तालिबान टस से मस नहीं हुए हैं.

भारत-तालिबान संपर्क

इस साल तालिबान ने पहलगाम कांड की भर्त्सना करके भारत को एक संदेश दिया. ऑपरेशन सिंदूर के फौरन बाद 16 मई को विदेशमंत्री एस जयशंकर ने मुत्तकी से टेलीफोन पर बात की और पहलगाम हमले पर उनके समर्थन और संवेदना के लिए धन्यवाद दिया.

माना जा रहा है कि भारत ने दुश्मन के दुश्मन के करीब जाने की रणनीति अपनाई है, पर कारण केवल यही नहीं है. तेजी से अस्थिर होते पड़ोस में, भारत कम से कम तालिबान से किसी भी खतरे को बेअसर करना चाहता है.

दूसरा उद्देश्य मध्य एशिया से संपर्क और व्यापार का है. ज़मीनी रास्ता बंद हैं. पाकिस्तान पारगमन की अनुमति नहीं देता और अमेरिका ने ईरान के चाबहार बंदरगाह पर परियोजनाओं के लिए प्रतिबंध फिर से लगा दिए हैं, जिसे भारत वैकल्पिक मार्ग के रूप में विकसित कर रहा था.

2001 से 2021 के दौरान भारत ने अफ़ग़ानिस्तान के पिछले प्रशासन के साथ दोस्ती बनाई थी. द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने के लिए भारत ने हवाई गलियारा भी बनाया और वहाँ बुनियादी ढाँचे की कई परियोजनाओं पर काम किया.

यह भी ध्यान रखना होगा कि अतीत में तालिबान के पाकिस्तानी सेना के साथ घनिष्ठ संबंध रहे हैं. काबुल और कंधार में तालिबान नेतृत्व के बीच मतभेद भी हैं.

तालिबानी रणनीति

पिछले महीने तालिबान ने काबुल में ईरानी विदेशमंत्री की मेज़बानी की. ऐसा 2017 के बाद पहली बार हुआ. जनवरी में भारत के विदेश सचिव की दुबई में तालिबान विदेशमंत्री से मुलाकात से भी पाकिस्तान बेचैन हुआ.

अब मुत्तकी की भारत-यात्रा ने जले में नमक छिड़का है. पाकिस्तान को लगता है कि इस उभरती दोस्ती के पीछे उसकी पूर्वी और पश्चिमी दोनों सीमाओं पर शत्रुतापूर्ण एजेंडा है.

पाकिस्तान के पिछले सेनाध्यक्ष कमर जावेद बाजवा ने सुझाव दिया था कि पाकिस्तान को चाहिए कि कश्मीर समस्या को लंबे समय तक के लिए ठंडे बस्ते में डाले और भारत के साथ रिश्ते बनाए. पाकिस्तानी सुरक्षा के लिए यह बेहतर कदम होगा.

उस समय इमरान खान प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने इस दिशा में कदम बढ़ा भी दिए थे, पर उन्हें यू-टर्न लेना पड़ा. 2015 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने भारत से बातचीत की पहल की थी, पर वे न केवल बाद में चुनाव हारे, बल्कि उन्हें जेल में भी डाल दिया गया. इसके पीछे पाकिस्तानी डीप स्टेट का हाथ बताया गया.  

 

आवाज़ द वॉयस में प्रकाशित