Saturday, January 29, 2011

अरब देशों में लोकतांत्रिक क्रांति की बयार

ट्यूनीशिया ने दी प्रेरणा

हाल में अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने क़तर में कहा कि जनता भ्रष्ट संस्थाओं और जड़ राजनैतिक व्यवस्था से आज़िज़ आ चुकी है। उन्होंने इशारा किया कि इस इलाके की ज़मीन हिल रही है। हिलेरी क्लिंटन ट्यूनीशिया के संदर्भ में बोल रहीं थीं. उनकी बात पूरी होने के कुछ दिन के भीतर ही मिस्र से बगावत की खबरें आने लगीं हैं। मिस्र में लोकतांत्रिक आंदोलन भड़क उठा है। राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक ने अपनी सरकार को बर्खास्त करके जिम्मेदारी अपने हाथ में ले ली है। पिछले दो-तीन हफ्तों से काहिरा और स्वेज में प्रदर्शन हो रहे थे. प्रधानमंत्री अहमद नज़ीफ ने हर तरह के प्रदर्शनों पर पाबंदी लगा दी थी, पर प्रदर्शन रुक नहीं रहे थे।

Thursday, January 27, 2011

वीर सांघवी और बरखा दत्त


लाइफ स्टाइल पत्रिका सोसायटी के जनवरी अंक में वीर सांघवी और बरखा दत्त के इंटरव्यू छपे हैं। इनमें दोनों पत्रकारों ने अपन पक्ष को रखा है। दोनों अपने पक्ष को अपने कॉलमों, वैबसाइट और चैनल पर पहले भी रख चुके हैं। यह पहला मौका है जब दोनों ने एक साथ एक जगह अपनी बात रखी। इसमें ज़ोर इस बात पर है कि राडिया टेप का विवरण छापने के लिए जिन लोगों ने दिया उन्होंने हम दोनों से जुड़े विवरण को साफ-साफ अलग से अंकित किया था। यह लीक हम दोनों को टार्गेट करने के वास्ते थी।

Wednesday, January 26, 2011

पद्म पुरस्कार और पत्रकार

टीजेएस जॉर्ज
इस साल के पद्म पुरस्कारों की सूची में सिर्फ दो पत्रकारों के नाम हैं। कॉलम्निस्ट टीजेएस जॉर्ज और देश की पहली महिला न्यूज़ फोटोग्राफर होमाई वयारवाला(Homai Vyarawala)। पुरस्कारों की सूची में राजनेता भी एक ही हैं। सूची में कलाकार, संगीतकार, अभिनेता वगैरह हैं, पर स्टार पत्रकार नहीं हैं। शायद इसकी एक वजह यह है कि राडिया टेप सूची में करीब आधा दर्जन पूर्व पद्म-अलंकृतों के नाम हैं। राष्ट्रीय पुरस्कारों के लिए यह गौरव की बात नहीं। 25 जनवरी को इन पुरस्कारों की घोषणा होने के पहले हवा में अनेक नाम तैर रहे थे। वह सब हवा में ही रह गया। 

भारतीय गणतंत्र का मीडिया



हमारा मीडिया क्या पूरी तरह स्वतंत्र है? 
सन 1757 में जब प्लासी के युद्ध में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की सेना को ईस्ट इंडिया कम्पनी की मामूली सी फौज ने हराया था, तब इस देश में अखबार या खबरों को जनता तक पहुँचाने वाला मीडिया नहीं था। आधुनिक भारत के लिए वह खबर युगांतरकारी थी। सम्पूर्ण इतिहास में ऐसी ब्रेकिंग न्यूज़ उंगलियों पर गिनाई जा सकतीं हैं। पर उन खबरों पर सम्पादकीय नहीं लिखे गए। किसी टीवी शो में बातचीत नहीं हुई। पर 1857 की क्रांति होते-होते अखबार छपने लगे थे। ईस्ट इंडिया कम्पनी का मुख्यालय कोलकाता में था और वहीं से शुरूआती अखबार निकले। विलियम डैलरिम्पल ने अपनी पुस्तक द लास्ट मुगल में लिखा है कि पूरी बगावत के दौरान दिल्ली उर्दू अखबार और सिराज-उल-अखबार का प्रकाशन एक दिन के लिए भी नहीं रुका। आज इन अखबारों की कतरनें हमें इतिहास लिखने की सामग्री देतीं हैं। 

Tuesday, January 25, 2011

गलती जो हो गई


ग्राहम स्टेंस की हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर कुछ लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए एक प्रेस नोट ज़ारी किया। इसपर आधारित खबर हिन्दू में भी छपी। इसका रोचक पक्ष यह था कि खबर में कहा गया कि देश के प्रमुख सम्पादकों ने यह बयान जारी किया है। हैरत की बात थी कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का विरोध करने वाले सम्पादकों में एन राम और चन्दन मित्रा के नाम एक साथ थे।