प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले शनिवार को ऑकलैंड से रवाना होते हुए इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के अपने तीन देशों के दौरे का समापन किया. यह एक ऐतिहासिक दौरा था जिसने इस इलाके के देशों के साथ भारत के संबंधों को दीर्घकालिक-साझेदारी के स्तर तक पहुँचाया.
इस यात्रा के महत्व और प्रभाव को समझने के लिए
हमें इन तीन देशों के अलावा दक्षिण, दक्षिण पूर्व और सुदूर एशिया के बारे में भी
विचार करना होगा. यह दौरा हिंद-प्रशांत
क्षेत्र के भू-राजनीतिक और आर्थिक भविष्य में भारत की उभरती आकांक्षाओं को उजागर
करता है. इसलिए भी कि यह क्षेत्र वैश्विक-स्पर्धा का केंद्र बनता जा रहा है.
प्रधानमंत्री की यह यात्रा कोरिया और जापान के
नेताओं के साथ उनकी हालिया मुलाकातों के बाद हुई हैं. ये सभी मुलाकातें भारत की
एक्ट ईस्ट पॉलिसी में नई ऊर्जा का संचार करती हैं और इस बात की मान्यता को दर्शाती
हैं कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र की मध्यम शक्तियों के बीच गहरा सहयोग पारस्परिक
आर्थिक और रणनीतिक लाभ संभव है.
तीन देशों की इस यात्रा ने व्यापार, प्रौद्योगिकी, सुरक्षा, शिक्षा, नवाचार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिणाम दिए, जिससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र और उससे परे एक प्रमुख भागीदार के रूप में भारत की भूमिका मजबूत हुई.




