Thursday, August 21, 2025

भारत को लंबा खेल ही खेलना होगा

इकोनॉमिस्ट में कैल का कार्टून

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर बातचीत फिलहाल रोक दी गई है. वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच पिछले शुक्रवार को हुई बातचीत से ऐसा कोई समाधान नहीं निकला है, जिससे भारत की उम्मीदें बढ़ें.

व्यापार वार्ता के विफल होने से भारत की चिंताएँ इसलिए बढ़ी हैं, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की है, जो दुनिया में किसी भी देश पर लगा सबसे ज़्यादा टैरिफ है.

25 प्रतिशत टैरिफ पहले ही लागू है, रूस के तेल व्यापार पर 25 प्रतिशत का अतिरिक्त टैरिफ भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर निर्भर करेगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस भाषण में कहा कि हम अपने किसानों, मछुआरों और पशुपालकों की भलाई के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे.  

रोचक बात यह है कि ट्रंप का झुकाव रूस की तरफ है, और अलास्का वार्ता कमोबेश रूस के पक्ष में ही रही है. ट्रंप की कोशिश अब यूक्रेन पर दबाव डालने की होगी. दूसरी तरफ वे भारत को धमका रहे हैं.

Wednesday, August 13, 2025

‘टैरिफ टेरर’ और भारत के सामने विकल्प


भारत और अमेरिका के बीच व्यापार-वार्ता में गतिरोध आने के बाद भारत में मोटे तौर पर दो तरह की प्रतिक्रियाएँ हैं. सोशल मीडिया पर कहा जा रहा है कि भारत को अमेरिका का साथ छोड़कर रूस और चीन के गुट में शामिल हो जाना चाहिए.

वहीं गंभीर पर्यवेक्षकों का कहना है कि इतनी जल्दी निष्कर्ष नहीं निकाल लेने चाहिए. भारत की नीति किसी गुट में शामिल होने की नहीं है. व्यापार-वार्ता में तनातनी का समाधान दोनों देश आपस की बातचीत से ही निकाल सकते हैं.

पर बात यहीं खत्म नहीं होती. वैश्विक-व्यवस्था भी तेज बदलाव की दिशा में बढ़ रही है. ब्रिक्स जैसे समूह का उदय उसी प्रक्रिया की शुरुआत है. ऐसा लगता है कि वैश्विक-मुद्रा के रूप में अमेरिकी डॉलर की हैसियत देर-सबेर खत्म होगी.

Friday, August 8, 2025

ट्रंप की सनक या बदलती दुनिया की प्राथमिकताएँ?


ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय विदेश-नीति के सामने अमेरिका के साथ रिश्तों को लेकर जो पेचीदगियाँ पैदा हुई हैं, उन्हें समझने के लिए हमें कई तरफ देखना होगा.

उनके पीछे अमेरिका की अपनी आंतरिक राजनीति, उनकी विदेश-नीति की नई प्राथमिकताएँ, ट्रंप के निजी तौर-तरीकों, खासतौर से पाकिस्तान के बरक्स, भारत की आंतरिक, आर्थिक और विदेश-नीति तथा पाकिस्तान के साथ रिश्तों की भूमिका भी है.

डॉनल्ड ट्रंप ने इस साल जनवरी में जबसे अपना नया कार्यकाल शुरू किया है, वे निरंतर विवाद के घेरे में हैं. इसमें सबसे बड़ी भूमिका उनकी आर्थिक-नीतियों की है. उन्होंने अप्रेल के महीने से जिस नई पारस्परिक टैरिफ नीति को लागू करने की घोषणा की, उसकी पेचीदगियों से वे खुद भी घिरे हैं.

इसके के तहत दुनिया के तमाम देशों से होने वाले आयात पर भारी टैक्स लगाने का दावा किया गया. ट्रंप ने उसे ‘मुक्ति दिवस’ बताया, पर उनका वह कार्यक्रम उस वक्त लागू नहीं हो पाया. इसके बाद उन्होंने इसके लिए 8 जुलाई की तारीख तय की, फिर उसे 1 अगस्त किया और अब 7 अगस्त से कुछ देशों पर नई दरें लागू करने का दावा किया है.

भारत की चिंता

यह योजना कितनी सफल या विफल होगी, यह वक्त बताएगा. हमारी निगाहों में भारत के साथ अमेरिका के रिश्ते ज्यादा महत्वपूर्ण हैं. इसके दो अलग-अलग आयाम हैं. एक है, भारत-अमेरिका व्यापार संबंध और दूसरा है दक्षिण एशिया को लेकर अमेरिका की नीति. इस समय दोनों गड्ड-मड्ड होती नज़र आ रही हैं. पर उससे ज्यादा डॉनल्ड ट्रंप के बयान ध्यान खींच रहे हैं.

ट्रंप बार-बार कह रहे हैं कि मैंने भारत-पाकिस्तान के बीच युद्धविराम कराया. यह बात समझ में नहीं आ रही है कि अमेरिका जैसे देश का राष्ट्रपति बार-बार इस बात को क्यों कह रहा है.

Wednesday, July 30, 2025

द्विपक्षीय व्यापार-समझौतों का मायाजाल

 


भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता हो गया, पर भारत-अमेरिका समझौता नहीं हो पाया है, जिसकी उम्मीदें लगाई जा रही थीं. हालाँकि कहा जा रहा है कि जल्द ही वह भी होगा.

अमेरिका की एक टीम अगस्त में भारत आने वाली है. इसके बाद भारत और यूरोपियन यूनियन के समझौते की भी आशा है, जिसके लिए बातचीत चल रही है.

इन समझौतों में इतनी बारीकियाँ होती हैं कि उन्हें पूरी तरह समझे बिना कोई भी देश कदम आगे नहीं बढ़ाता है. कुछ बातें तब समझ में आती हैं, जब वे लागू हो जाती हैं.

रिश्तों के पेच

इधर भारत और चीन के बीच संबंधों में सुधार की प्रक्रिया भी चल रही है, जिसमें आर्थिक-रिश्तों की केंद्रीय भूमिका होगी. दूसरी तरफ अमेरिका के चीन, ईयू और ब्रिटेन के साथ आर्थिक-संबंध भी हमारी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेंगे.

रूस, चीन और खासतौर से ब्रिक्स के साथ भारत के रिश्ते, अमेरिका के साथ होने वाले समझौते का हमारे लिए भी महत्व है, क्योंकि घूम-फिरकर ये हमें भी प्रभावित करते हैं.

व्यापार के समांतर जियो-पॉलिटिक्स भी चल रही है. अमेरिका सरकार चीन के व्यापार-विस्तार को काबू करने की कोशिशें भी साथ-साथ कर रही है. इसलिए इन देशों के आपसी समझौतों और उनसे पड़ने वाले क्रॉस-प्रभावों को समझना जटिल काम है.

Sunday, July 27, 2025

क्या आप दुनिया की सबसे कठिन परीक्षा पास कर पाएँगे?

 

खान सर की क्लास

ब्रिटिश पत्रिका द इकोनॉमिस्ट की सहयोगी पत्रिका 1843 अपने लॉन्ग रीड्स (लंबे आलेख) के लिए प्रसिद्ध है। इसका नाम 1843 द इकोनॉमिस्ट की स्थापना के वर्ष के नाम पर रखा गया है। 1843 पत्रिका में, दुनिया भर की असाधारण कहानियाँ, लंबी-चौड़ी, कथात्मक पत्रकारिता पेश की जाती है। इसबार इसमें एक लंबी कथा भारत पर है। ऐसी कथा भारतीय मीडिया में होनी चाहिए,  पर शायद उनके पास फुर्सत नहीं है। जिस तरह से खान सर के यहाँ रेलवे की नौकरी पाने के इच्छुक लोगों की भीड़ है, वैसे ही भीड़ पत्रकार बनने के इच्छुक लोगों की भी है। बहरहाल यह लेख अंग्रेजी में है, पर हिंदी पाठकों की सुविधा के लिए इसके हिंदी मशीन अनुवाद के साथ इसके कुछ अंशों को अपने ब्लॉग पर लगा रहा हूँ। मेरा सुझाव है कि आप इसका अंग्रेजी मूल इसकी वैबसाइट पर पढ़ें, जिसके लिए आपको इसे सब्स्क्राइबर करना होगा। मैं यह भी बता दूँ कि इकोनॉमिस्ट के रेट ऊँचे होते हैं। बहरहाल..

 तीन करोड़ भारतीय रेलवे में नौकरी चाहते हैं, लेकिन एक भयावह सामान्य ज्ञान परीक्षा उनके रास्ते में रोड़ा बनी हुई है

2019 की गर्मियों में, नीरज कुमार नाम का एक 23 वर्षीय छात्र दिल्ली से पूर्वी भारत के पटना शहर जाने वाली स्लीपर ट्रेन में सवार हुआ । बर्थ उसकी पहुँच से बाहर थी, इसलिए उसने 16 घंटे की यात्रा के दौरान ज़मीन पर सोने की योजना बनाई। उसे असुविधा की कोई परवाह नहीं थी-वह मध्यम वर्ग की श्रेणी में जा रहा था ।

कुमार पटना से कुछ सौ किलोमीटर पूर्व में एक गाँव में पले-बढ़े थे। उनका परिवार गरीब, निचली जाति का किसान था। गाँव का स्कूल इतना साधारण था कि बच्चे कुर्सियों की बजाय खाद की बोरियों पर बैठते थे। कुमार एक होशियार लड़का था, और अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए तत्पर था। पहले तो उसका सपना एक फुटबॉलर बनने का था , लेकिन फिर उसने तय किया कि वह अपने बड़े चचेरे भाई की तरह इंजीनियर बनेगा।

2015 में उसे राजस्थान के एक सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला मिल गया। अचानक उसकी ज़िंदगी बदल गई। गाँव के लड़कों के साथ मिट्टी में खेलने के बजाय, वह क्लास के बाद बैडमिंटन खेलता था और शाम के समय अपने साथी छात्रों के साथ पार्क में टहलता था और नई फिल्मों पर चर्चा करता था। उसे राजनीतिक फिल्में पसंद थीं, ऐसी कहानियाँ जो एक निचली जाति के बच्चे के रूप में उसके साथ हुए अन्याय को नाटकीय रूप से दर्शाती थीं। इन फिल्मों के नायक हमेशा मुश्किलों का सामना करते नज़र आते थे।