Tuesday, September 15, 2026

पश्चिम और भारतीय नज़रिए में ब्रिक्स


ब्रिक्स समूह का दिल्ली शिखर-सम्मेलन जिस मापदंड पर सफल रहा है, वह है ‘नई दिल्ली घोषणा, जो सर्वानुमति से जारी हो गई. इससे संकेत मिलता है कि ब्रिक्स का काफी समय भू-राजनीति की विसंगतियों को दूर करने में लगा है.  

सम्मेलन में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात की उपस्थिति के बावज़ूद पश्चिम एशिया की लड़ाई से संदर्भ में कोई अड़चन नहीं आई. यह डिप्लोमेटिक सफलता है, क्योंकि इसे लेकर कई तरह के अंदेशे थे.

अंतिम घोषणापत्र उस संतुलन को दर्शाता है, जिसमें पश्चिम एशिया में चल रहे युद्धों और तनावों को संबोधित किया गया है, लेकिन किसी एक देश को सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं माना गया है.

सम्मेलन के समांतर चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की भारत-यात्रा और नरेंद्र मोदी के साथ उनकी वार्ता को भी इन उपलब्धियों में शामिल किया जाएगा, पर वह अपने आप में अलग और विषद विषय है.

भारत ने लगातार अपनी गैर-पश्चिमी पहचान पर बल दिया है. इसकी जटिलता को समझना आसान नहीं है. पश्चिम के राजनीतिक और मानवीय-मूल्यों को भारत भी स्वीकार करता है, लेकिन वह अमेरिका और यूरोप की भू-राजनीति का अनिवार्य हिस्साा बनने से इनकार करता है.  

Wednesday, September 9, 2026

राजनीति का नया फॉर्मूला ‘टार्गेट एम!’


भारतीय राजनीति में महिला मतदाता (साइलेंट वोटर) सबसे निर्णायक वोट बैंक बनकर उभरी हैं, जिसके कारण राजनीतिक दल उन्हें आकर्षित करने के लिए पारंपरिक उपहारों से लेकर बड़े पैमाने पर नकदी हस्तांतरण योजनाओं की घोषणाएँ कर रहे हैं। अतीत में मंगलसूत्र, कन्यादान, टीवी और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी मुफ्त वस्तुएँ महिलाओं को लुभाने के चुनावी रणनीतियों का एक बड़ा हिस्सा रही हैं, जो समय के साथ आर्थिक और सामाजिक रूप से विकसित होती जा रही हैं। क्या यह प्रवृत्ति रेवड़ी संस्कृति को बढ़ा रही है, या यह सामाजिक-विकास में मददगार है? मोदी, मुसलमान, मंगलसूत्र (हिंदू वैवाहिक प्रतीक), और यहाँ तक ​​कि मटन और मछली भी चुनावी शब्दावली का हिस्सा बन चुके हैं। विरोधी दल अपनी दुर्दशा के लिए मीडिया, मार्केटिंग और मनी (तीन और 'एम') को कोस सकते हैं, वोटिंग मशीन को तो कोस ही रहे हं। सच्चाई यह है कि चुनावों में कम से कम एक 'एम' निर्णायक साबित हो रहा है। देश के चुनावी इतिहास में महिला वोट का महत्व बढ़ता जा रहा है।

हालाँकि कॉक्रोच आंदोलन के कारण देश का ध्यान जेन-ज़ी और युवा वर्ग की ओर गया है, पर चुनावी-राजनीति के विशेषज्ञ मानते हैं कि सभी दल महिला वोटरों को लुभाने से जुड़े कार्यक्रमों को वरीयता दे रहे हैं। उन्हें समझ में आ रहा है कि महिला वोटर एक ब्लॉक है, जेन-ज़ी के बारे में फिलहाल कहना मुश्किल है कि वह ब्लॉक के रूप में मतदान करेगा या नहीं। राजनीति-शास्त्रियों का कहना है कि जेन-ज़ी की भूमिका किसी के पक्ष में माहौल को बनाने या किसी के विरोध में माहौल बिगाड़ने में हो सकती है, पर जेन-ज़ी वोटर ब्लॉक नहीं है। इनमें से कुछ तो वोटर भी नहीं हैं।

Tuesday, September 8, 2026

वैश्विक आर्थिक-प्रशासन को ब्रिक्स की चुनौती

1925 का एक अमेरिकी कार्टून, जो
आज सच साबित हो रहा है
विश्व-व्यवस्था की बदलती तस्वीर धीरे-धीरे सामने आ रही है. दुनिया के देशों के तीन महत्त्वपूर्ण समूहों के इर्द-गिर्द चल रही गतिविधियों से इस बदलाव के संकेत मिल रहे हैं.  

हमारी दृष्टि में इन गतिविधियों में भारत की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण है. खासतौर से ऐसे समय में जब भारत-अमेरिका और भारत-चीन संबंध नए सिरे से परिभाषित हो रहे हैं.

संबंधों के अलावा अपनी अर्थव्यवस्था और टेक्नोलॉजी को अपग्रेड करने के विचार से भी यह समय महत्त्वपूर्ण है. भारत को तीन महत्त्वपूर्ण समूहों के साथ अपने रिश्तों को संयोजित करना है.

ये तीन समूह हैं, जी7, जी20 और ब्रिक्स. इनके मार्फत बड़े देशों के बीच ऊर्जा संसाधनों, टेक्नोलॉजी और वित्तीय प्रभाव के मद्देनज़र बढ़ती प्रतिस्पर्धा की झलक नज़र आ रही है. देखना होगा कि भारत को यह स्पर्धा कितना प्रभावित करेगी. 

इनमें जी7 और ब्रिक्स दो ध्रुवों पर हैं और जी20 बीच में है, जिसमें अमेरिका और चीन-रूस दोनों हैं. 12-13 सितंबर को ब्रिक्स के नई दिल्ली शिखर सम्मेलन और इस साल जी20 की अमेरिकी अध्यक्षता के साथ इन गतिविधियों की आहट सुनाई पड़ने लगी है.   

ब्रिक्स की सफलता

हालाँकि पश्चिमी देशों के वर्चस्व वाले जी7 का वित्त और उन्नत प्रौद्योगिकी में अभी तक दबदबा है, पर जनसंख्या, पीपीपी-आधारित आर्थिक शक्ति, विनिर्माण और बहुध्रुवीय विश्व का झंडा ब्रिक्स बुलंद कर रहा है.

ताज़ा खबर है कि विस्तारित ब्रिक्स ब्लॉक ने पर्चेज़िंग पावर पैरिटी के आधार पर जी7 को आधिकारिक तौर पर पीछे छोड़ दिया है. जहाँ पश्चिमी अर्थव्यवस्थाएँ मात्र 1% की धीमी वार्षिक दर से आगे बढ़ रही हैं, वहीं ब्रिक्स ब्लॉक 4% से अधिक की दर से तेजी से आगे बढ़ रहा है, जो वैश्विक जीडीपी के लगभग 40% और विश्व की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है.

एक समय तक ब्रिक्स को उभरते बाजारों के लिए अनौपचारिक चर्चा मंच के रूप में देखा गया था, पर अब वह पश्चिमी आर्थिक वर्चस्व के खिलाफ एक दुर्जेय, बहु-महाद्वीपीय प्रति-संतुलनकारी ताकत के रूप में खड़ा हो रहा है.

Tuesday, September 1, 2026

बदलते वैश्विक-हालात में चीन से सुधरते रिश्ते


पिछले दो साल से भारत और चीन के रिश्तों की बर्फ पिघलाने के प्रयास चल रहे हैं. अब लगता है कि प्रयास रंग लाएँगे. शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन के हाशिए पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात को लेकर राजनयिक-सरगर्मियाँ अचानक बढ़ गई हैं. 

यह शिखर सम्मेलन एससीओ के 25 साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित किया गया था, जिसमें पीएम मोदी 31 अगस्त और 1 सितंबर तक किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में थे.

शिखर सम्मेलन से पहले, प्रधानमंत्री मोदी ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बातचीत की और अन्य एससीओ नेताओं के साथ एक समूह तस्वीर खिंचवाई. बाद में उन्होंने शिखर सम्मेलन की चर्चाओं में भाग लिया और अन्य सदस्य देशों के नेताओं के साथ एससीओ घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए.

दो हफ्ते बाद 12-13 सितंबर को दिल्ली में ब्रिक्स का शिखर सम्मेलन भी है, जिसमें दोनों नेताओं की फिर से मुलाकात होने की संभावनाएँ हैं. दोनों सम्मेलनों में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की उपस्थिति भी महत्त्वपूर्ण है.

चीनी राष्ट्रपति की दिल्ली-यात्रा के बड़े निहितार्थ हैं. इस यात्रा की सीधी जानकारी रखने वाले एक भारतीय सूत्र ने रॉयटर्स को बताया, ‘चीनी अधिकारी होटल और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े प्रोटोकॉल को अंतिम रूप देने में जुटे हैं. उनके साथ क़रीब 400 अधिकारियों का प्रतिनिधिमंडल आने की संभावना है.

Monday, August 31, 2026

अच्छी तरह पिटने तक लड़ाई जारी क्यों रखता है अमेरिका?


न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टर ग्रेग जैफ ने अपने एक लेख में लिखा है कि अमेरिका  का सबसे लंबा युद्ध ठीक पाँच साल पहले अफगानिस्तान में समाप्त हुआ था। आज यह ईरान में अंतहीन युद्ध से बचने की कोशिश कर रहे नीति निर्माताओं के लिए सबक पेश करता है। ग्रेग जैफ ने 15 साल तक अफगानिस्तान की रिपोर्टिंग की थी। उन्होंने इस लेख में अमेरिका की नीतियों की बखिया उधेड़ी है। इस लेख का हिंदी में अनुवाद नीचे पेश कर रहा हूँ। आप चाहें तो न्यूयॉर्क टाइम्स की वैबसाइट पर जाकर भी इसे अंग्रेजी मूल रूप में पढ़ सकते हैं। उसका लिंक नीचे दिया है। 

अफगानिस्तान युद्ध के दौरान अधिकांश समय, अमेरिका के लिए जीत से भी ज्यादा मुश्किल काम युद्ध खत्म करना था।

देश का सबसे लंबा युद्ध पाँच साल पहले अराजकता और हार के साथ समाप्त हुआ। तालिबान विद्रोहियों से बचने के लिए बेताब लाखों अफगान नागरिक काबुल हवाई अड्डे पर उमड़ पड़े। वहाँ एक आत्मघाती बम के हमले में तेरह अमेरिकी सैनिक मारे गए।

तब से, तीन राष्ट्रपतियों के वे भय निराधार साबित हुए हैं, जिन्हें लेकर उन्हें लगता था कि लड़ाई खत्म करना खतरे से खाली नहीं है। अफगानिस्तान न तो आतंकवाद का अड्डा बना, और न अमेरिका पर हमले हुए।

आज अमेरिकी सेना ईरान में एक नए युद्ध में उलझी हुई है। एक बार फिर, फौजी जीत की संभावनाएं धूमिल हैं। यहाँ तक ​​कि राष्ट्रपति ट्रंप ने भी युद्ध खत्म करने की इच्छा जताई थी, लेकिन बाद में अपना रुख बदलते हुए युद्ध में बने रहने की वकालत की।

उन्होंने ओवल ऑफिस में अपने भाषण में कहा, ‘हमें वहां रहने की जरूरत नहीं है। हमें उनके तेल की जरूरत नहीं है। हमें उनकी किसी भी चीज की जरूरत नहीं है। लेकिन हम अपने सहयोगियों की मदद के लिए वहां मौजूद हैं।’

अफगानिस्तान में लंबे समय से चल रहे युद्ध ने ईरान के भविष्य पर विचार कर रहे जनरलों और नीति निर्माताओं के सामने कई कठिन प्रश्न खड़े कर दिए हैं: अफगानिस्तान से पीछे हटना इतना कठिन क्यों था? वहां हार स्वीकार करने के लिए किया गया लंबा संघर्ष ईरान में ट्रंप प्रशासन की दुविधा के बारे में क्या बताता है?