Sunday, August 16, 2026

‘कॉक्रोच-विद्रोह’ क्या उलट सकता है भाजपा के सत्ता-समीकरण?


मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेरोजगार युवाओं/सक्रियतावादियों की तुलना ‘कॉक्रोच’ और ‘परजीवियों’ से करती अदालती टिप्पणी के जवाब में आम आदमी पार्टी के पूर्व कम्युनिकेशन स्ट्रैटजिस्ट और बोस्टन यूनिवर्सिटी के छात्र अभिजीत दीपके ने व्यंग्यात्मक ‘कॉक्रोच जनता पार्टी (सीजेपी)’ शुरू की। इसका नाम ही बीजेपी की पैरोडी है। यह जल्दी ही मीम से बड़े डिजिटल आंदोलन में बदल गया—इंस्टाग्राम पर करोड़ों फॉलोअर्स (बीजेपी/कांग्रेस हैंडल्स से ज्यादा), लाखों रजिस्ट्रेशन हो गए। यह बेरोजगारी, परीक्षा लीक (खासकर NEET), जवाबदेही और व्यवस्था से नाराजगी का प्रतीक बन गया।

इसके दवाब में जुलाई में 36-37 दिनों के जंतर-मंतर धरने, ‘संसद चलो’ मार्च और देशव्यापी प्रदर्शनों के बाद केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया। मोदी सरकार (2014 के बाद) पर सार्वजनिक दबाव से यह मंत्री का दुर्लभ इस्तीफा था। सरकार ने अन्य माँगों (मुआवजा, FIR वापसी, परीक्षा सुधारों पर बात) पर भी सहमति जताई, जिसके बाद CJP ने आंदोलन स्थगित कर दिया।

इसके बाद सीजेपी ने अपनी राष्ट्रीय टीम घोषित कर दी, जिसके दीपके राष्ट्रीय संयोजक हैं। इसने 15 अगस्त से स्कूल ठीक करो’ अभियान शुरू किया है, जिला-स्तरीय संगठन बनाने की योजना है, ‘क्या बोलती पब्लिक’ जैसा सुनने वाली यात्रा और ‘सीजन-2’ की घोषणा भी की गई है। इतना होने के बावज़ूद यह ग्रुप औपचारिक पार्टी नहीं, बल्कि युवा राजनीतिक आंदोलन/प्रेशर ग्रुप के रूप में आगे बढ़ रहा है।

पहली नज़र में साफ दिखाई पड़ता है कि बीजेपी ने इसे शुरू में गंभीरता से नहीं लिया, पर बाद में इसे लेकर अफरा-तफरी में फैसले करना शुरू कर दिया। सवाल है कि यह आंदोलन व्यवस्था-परिवर्तन के लिए है या बीजेपी को सत्ता से बाहर करने के लिए? व्यवस्था-परिवर्तन करना है, तो इस संगठन की व्यवस्था योजना क्या है? सत्ता-परिवर्तन कराना है, तो किस पार्टी के पक्ष में? क्या यह संगठन बीजेपी से टक्कर ले सकता है? पहले एक नज़र में दोनों की तुलनात्मक ताकतों पर नज़र डालें:

बीजेपी की मजबूती: चुनावी मशीनरी, संगठन (RSS), कल्याण योजनाएं, हिंदू राष्ट्रवाद और विपक्ष की कमजोरी या आपसी टकराव, अब भी प्रमुख हैं। 2024 में बीजेपी को 37% वोट मिले थे; हाल के राज्य चुनावों में भी उसका असर दिखाई पड़ा है। CJP अभी चुनावी ताकत नहीं है—वह न तो पंजीकृत पार्टी है, न उसके पास राष्ट्रीय प्रतीक हैं, न बड़े पैमाने पर संगठन या काडर। हाँ, यह विचार का विषय ज़रूर है कि उसके पास संसाधन कहाँ से आ रहे हैं? इस विषय में कोई जानकारी हासिल हो पाई, तो यह बीजेपी के पक्ष में होगा।

CJP की सीमाएं: व्यंग्य और मुद्दा-आधारित (शिक्षा, युवा बेरोजगारी) होने से व्यापक वैचारिक आधार या ग्रामीण/जातिगत गठबंधन बनाना मुश्किल काम है। कई विश्लेषक कहते हैं कि गुस्सा अस्थायी हो सकता है; बीजेपी मांगों को को-ऑप्ट कर सकती है या दमन/अवहेलना कर सकती है। विपक्ष इसे अपना मंच बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन CJP खुद स्वतंत्र रहने पर जोर दे रहा है।

संभावनाएं: युवा (भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा) असंतोष अगर स्थायी संगठन और स्थानीय मुद्दों में बदल जाए, तो शहरी/युवा वोट प्रभावित हो सकते हैं, खासकर अगर परीक्षा लीक, नौकरियां या संस्थागत विश्वसनीयता जैसे मुद्दे दोहराए जाएं। दक्षिण एशिया में Gen-Z आंदोलनों (बांग्लादेश, नेपाल आदि) ने सरकारें गिराईं—भारत में संस्थाएं मजबूत हैं, लेकिन सड़क दबाव ने पहली बार मंत्री गिराया। यह ‘बीजेपी के अजेय’ होने की छवि को चुनौती ज़रूर देता है। पर इसके आगे क्या?

Wednesday, August 12, 2026

पश्चिम एशिया में ‘सेंटो’ जैसा नया गठबंधन


अरसे से अनुमान था कि पश्चिम एशिया में पाकिस्तान की पहल पर पचास के दशक में हुए बग़दाद पैक्ट या ‘सेंटो’ को फिर से जगाया जा सकता है, जिसे इस्लामिक ‘नेटो’ भी कहा गया था. कमोबेश उसी तर्ज पर एक नई संधि की शुरुआत पिछले हफ्ते हो गई है.   

सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में गत 7 अगस्त को क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मक्का समझौते पर दस्तखत कर दिए हैं.

हालांकि मिस्र और क़तर ने शुरुआती चर्चाओं में भाग लिया था, लेकिन शुक्रवार को हुई चर्चा में उनका उल्लेख प्रतिभागी के रूप में नहीं किया गया. फिर भी, कुछ नए देशों के इसमें शामिल होने की संभावनाएँ खुली हुई हैं.

समझौते को दुनियाभर के विशेषज्ञों ने अलग-अलग नज़रों से देखा है. मसलन क्षेत्रीय और वैश्विक भू-राजनीति, सऊदी-ईरान और इसराइल रिश्ते, अमेरिका और दूसरी ताकतों की भूमिका और भारत का नज़रिया. मुस्लिम देशों के संगठन ओआईसी की सार्थकता को लेकर भी सवाल हैं.

समझौते पर हस्ताक्षर होने के 48 घंटे बाद ही उसे पहली गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ा है. ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने जाज़ान में अरामको रिफाइनरी पर ड्रोन से हमला किया, जिससे आग लग गई. 

Tuesday, August 4, 2026

बांग्लादेश पर चीनी प्रभाव और भारत से रिश्ते


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन देशों की यात्रा के दौरान कुछ पर्यवेक्षकों ने टिप्पणी की कि, अपनी 'एक्ट-ईस्ट पॉलिसी' के तहत भारत सुदूर-पूर्व के देशों के साथ रिश्ते बनाने के पहले अपने निकटतम पड़ोसी बांग्लादेश के साथ संबंध सुधारने का काम क्यों नहीं करता? अब समय आ रहा है, जब इस सवाल का जवाब मिल सकता है.

भारत ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के आउटरीच सत्र में विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है. हालांकि, बांग्लादेश सरकार ने इस निमंत्रण पर अभी कोई निर्णय नहीं किया है, पर इससे कुछ संकेत मिलेंगे.

नया फौजी-गठबंधन

इस विषय पर आगे बात करने के पहले एक नई खबर पर भी ग़ौर करना चाहिए. सऊदी अरब ने एक समुद्री-सुरक्षा गठबंधन की घोषणा की है, जिसमें पाकिस्तान, तुर्की और बांग्लादेश समेत 13 देश शामिल हैं.

Sunday, August 2, 2026

कॉक्रोच-विद्रोह के तीन चेहरे

 


वायरल युवा-आक्रोश से प्रेरित, कॉक्रोच जनता पार्टी का तेजी से उदय तीन बेहद अलग-अलग व्यक्तियों के कारण हुआ, जिनके कौशल, महत्त्वाकांक्षाओं और राजनीतिक इतिहास ने एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन अभियान को एक राष्ट्रीय विरोध में बदल दिया, जिसके परिणामस्वरूप केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पद छोड़ना पड़ा। आज यानी 2 अगस्त 2026 के द हिंदू में तीन व्यक्तियों के जीवन-वृत्त पर रोशनी डाली गई हैं। मैंने इसे हिंदी में अपने पाठकों के लिए तैयार किया है। इसमें कुछ जगहों पर ज़रूरत के हिसाब से अपनी टिप्पणी भी की है, जो इटैलिक्स में है। इसे लिखा है शोभना के. नायर और निखिल एम बाबू ने।

व्यंग्य से लेकर धरने तक, यह छात्रों के उस विरोध आंदोलन की सबसे लोकप्रिय और शायद सबसे आसान व्याख्या है, जिसके परिणामस्वरूप केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। यह व्याख्या अपनी सरलता में सशक्त प्रतीत होती है। लेकिन यह अपूर्ण है।

अब तक तो सभी को पता ही है कि कहानी क्या है। 15 मई, 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सक्रियता और सोशल मीडिया का सहारा लेने वाले बेरोजगार युवाओं की तुलना ‘कॉक्रोचों’ से की, जिससे व्यापक विरोध हुआ। इस टिप्पणी को भुनाते हुए, बोस्टन में पढ़ रहे एक भारतीय छात्र अभिजीत दीपके ने अपने जैसे ‘कॉक्रोचों’ के लिए एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन मंच शुरू किया और इस अपमान को असंतुष्ट युवाओं के लिए एक एकजुटता के आह्वान में बदल दिया। पहले 24 घंटों के भीतर ही 50,000 लोगों ने इसमें पंजीकरण कराया। पाँच दिनों के भीतर यह संख्या बढ़कर दस लाख से अधिक हो गई, जबकि इस आंदोलन के इंस्टाग्राम अकाउंट पर 2.2 करोड़ से अधिक फॉलोवर हो गए।

वायरल पोस्ट, फॉलोवरों की बढ़ती संख्या और रंगीन प्रतीकों के पीछे तीन शख्सियतें थीं: अभिजीत दीपके (30), आशुतोष रांका (30) और सौरभ दास (27), जिनकी प्रतिभाएँ एक-दूसरे की पूरक हैं। वे देश के अलग-अलग हिस्सों, अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमियों से आते हैं और उनके स्वभाव भी काफी भिन्न हैं।

Wednesday, July 29, 2026

सऊदी एटमी-डील से पश्चिम एशिया में होड़ बढ़ेगी


पश्चिम एशिया का अनिश्चय खत्म होकर नहीं दे रहा है. अमेरिका और ईरान के बीच समझौता-ज्ञापन पर दस्तखत होने के बावज़ूद लड़ाई खत्म नहीं हुई है. दूसरी तरफ राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अपने पिटारे से नई-नई चीजें निकाल रहे हैं.

पिछले बुधवार को उन्होंने सऊदी अरब के साथ नाभिकीय-सहयोग के समझौते की घोषणा करके खलबली पैदा कर दी है. इस समझौते के तहत अमेरिकी सहयोग से सऊदी अरब अपने असैनिक परमाणु-कार्यक्रम का संचालन कर सकेगा.

यह 30 वर्षीय समझौता नाभिकीय-सहयोग पर तो रोशनी डालता है, लेकिन साथ ही कई महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलावों की ओर इशारा भी कर रहा है.

वेस्टिंगहाउस जैसी कंपनियों का उपयोग करते हुए रियाद को एक दीर्घकालिक अमेरिकी तकनीकी और सुरक्षा ढाँचे में बाँधकर, वाशिंगटन का लक्ष्य खाड़ी में चीन और रूस के बढ़ते राजनयिक और आर्थिक प्रभाव को कम करना है.