Wednesday, June 9, 2010

कैसा विश्व कप?

बेशक दक्षिण अफ्रीका में हो रहे विश्व कप फुटबॉल के फाइनल राउंड में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीमें उतर रहीं हैं, पर इसे विश्व कप कहने के पहले सोचें। इसमे न चीन की टीम है न भारत की। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, मलेशिया और रूस भी नहीं। सबसे ज्यादा टीमें युरोप की हैं, क्योंकि सबसे बड़ा कोटा युरोप का है। दुनिया की काफी बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व इसमें नहीं है। और न यह खेल के स्तर का परिचायक है।

युरोप में फुटबॉल बहुत खेला जाता है। सारी दुनिया के अच्छे खिलाड़ियों को वे खरीद लाते हैं। पर युरोप का क्षय हो रहा है। उसे खेल की जो अर्थ व्यवस्था चला रही है, वह इंसानियत के लिए बहुत उपयोगी नहीं है।
खेल का कृत्रिम बिजनेस सोसायटी को कुछ देता नहीं। विश्व कप के सहारे दक्षिण अफ्रीका में कुछ आर्थिक गतिविधियाँ होंगी। परिवहन और यातायात सुविधाएं बढ़ेंगी, पर्यटन स्थल विकसित होंगे।  पर अफ्रीका के रूपांतरण के लिए बड़े स्तर पर आर्थिक बदलाव की ज़रूरत होगी।

हमारे लिए इसमें एक संदेश है कि हम खेल को व्यवस्थित करें। जनता का ध्यान खींचने के लिए खेल से बेहतर कुछ नहीं, पर खेल माने आईपीएल नहीं। और खेल माने ऐयाशी भी नहीं।
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Tuesday, June 8, 2010

लोकल खबरों का रोचक संसार

काफी पहले की बात है। अस्सी का दशक था। तब मैं लखनऊ में रहता था। मेरे पड़ोस में एक सज्जन रहते थे, जो बिजली के दफ्तर में क्लर्क थे। उनकी जीवन शैली बताती थी कि क्लर्क के वेतन के अलावा भी उनकी आय का कोई ज़रिया है। उनके घर को देखते ही उनकी हैसियत का पता लग जाता था। उनसे मेरा खास परिचय नहीं था। दूर की दुआ-सलाम थी। एक रोज सबेरे वे मेरे घर चले आए। इधर-उधर की बातें करने के बाद बोले, जोशी जी क्या आप मेरी पत्नी को अपने अखबार का संवाददाता बना सकते हैं? मुझे उनकी बात समझ में नहीं आई। मैने पूछा, क्या भाभी जी को लिखने-पढ़ने का शौक है? बोले ना जी। बात जे है कि मैं घर में टेलीफून लगाना चात्ता था। पता लगा कि पत्रकार कोट्टे से लग सकता है।

उस ज़माने में फोन आसानी से नहीं मिलता था। मेरे घर में भी फोन नहीं था। वह सज्जन बोले,आप रिपोर्टर बनवा दो बाक्की काम मैं कर लूँगा। मेरे पास जवाब नहीं था। उन दिनों मैं नवभारत टाइम्स में काम करता था। लखनऊ में स्ट्रिंगर होते नहीं थे। मेरे हाथ में स्ट्रिंगर बनाने की सामर्थ्य भी नहीं थी। बहरहाल उन्हें किसी तरह समझा कर विदा किया। तब तक टीवी चैनल शुरू नहीं हुए थे। पत्रकार को लोग इज़्ज़त की निगाह से देखते थे। जिलों और तहसीलों में स्ट्रिंगरों को काफी सम्मान मिलता था। इसलिए पत्रकार का कार्ड हासिल करने की होड़ रहती थी। हमारे पड़ोसी को फोन के अलावा घर के दरवाज़े पर पत्रकार का बोर्ड लगाने की इच्छा भी थी। उनकी वह इच्छा बाद में पूरी भी हुई। झाँसी के किसी साप्ताहिक अखबार ने उनकी पत्नी को संवाददाता बना लिया।

सन 1973 में जब मैं लखनऊ के स्वतंत्र भारत में काम करने आया तब रायबरेली, हरदोई, सीतापुर, बाराबंकी, लखीमपुर खीरी वगैरह में जो अंशकालिक संवाददाता काम कर रहे थे, वे बुज़ुर्ग और अपने इलाके में बेहद सम्मानित लोग थे। ज़्यादातर इलाके के प्रसिद्ध वकील थे या अध्यापक। उन्हें किसी कार्ड की ज़रूरत नहीं थी। हिन्दी का हमारा अखबार आठ पेज का था। न्यूज़ प्रिंट का संकट हो गया, तो छह पेज का भी करना पड़ा। आठ पेज के अखबार के डाक संस्करण में एक पेज जिलों की खबरों का होता था। हर रोज़ डाक से खबरें आती थीं। दिन में दो-ढाई बजे फोरमैन शेषनारायण शर्मा जी खबरें भेजने को मना कर देते थे। जो बचीं होल्डओवर में गईं। अगले दिन सुबह होल्डओवर देखकर आगे का काम होता था। अखबार में जगह नहीं होती थी। अलग-अलग जिलों की खबर लग जाएं इसके लिए हफ्ते में एकबार जिले की चिट्ठी छापकर खबरें निपटा देते थे। ज़रूरी खबरें होने पर संवाददाता तार कर देते थे। तार करने का मौका भी हफ्ते-दो हफ्ते में एकबार मिलता था।

26 जून 1975 के बाद हमें पहली बार लगा कि जिलों में कुछ हो रहा है। पहले नसबंदी की खबरें आईं, फिर उसके विरोध की खबरें। शुरू में संवाददाता लिख कर भेज देते थे। वे छपतीं नहीं थीं। फिर वे समझदार हो गए। व्यक्तिगत रूप से लखनऊ आकर बताने लगे कि किस तरह की प्रशासनिक सख्ती हो रही है। अब खबरों के साथ अफबाहें भी आने लगीं। कुछ सच, कुछ कल्पना। छपता कुछ नहीं था। जिला सूचना विभाग की विज्ञप्तियों ने खबरों की जगह ले ली। इस दौरान हमारे अनेक संवाददाताओं ने काम छोड़ दिया। स्वतंत्र भारत देश का अकेला अखबार है, जो ठीक 15 अगस्त 1947 को निकला। उसमें तमाम संवाददाता उसी दौर के थे। इमर्जेंसी के पहले और इमर्जेंसी के बाद के माहौल में ज़मीन-आसमान का फर्क आ गया। खबरों के गठ्ठर के गट्ठर आने लगे। हर जिले में आपत्काल की कथाएं थीं। हिन्दी ब्लिट्ज़ का सर्कुलेशन अंग्रेज़ी ब्लिट्ज का कई गुना ज़्यादा हो गया। हिन्दी के अखबार बढ़ने लगे। जिलों में संवाददाताओं की संख्या दुगुनी-तिगुनी-चौगुनी हो गई। कवरेज बढ़ गई। ग्रामीण क्षेत्र से दलितों पर अत्याचार, सरकारी विभागों के घोटालों और कई तरह की सामंती क्रूरताओं के समाचार आने लगे। इमर्जेंसी खत्म होने के बाद आनन्द बाज़ार पत्रिका ग्रुप ने पहले संडे निकाला, फिर रविवार। रविवार में ज़्यादातर कथाएं हिन्दी क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों से थीं।

हिन्दी अखबारों की सफलता स्थानीय खबरों से जुड़ी है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा के बड़े शहरों ही नहीं दूर-दराज़ इलाकों में आज संस्करण हैं। अभी विस्तार की खासी सम्भावना है। इन जगहों से संवाद संकलन व्यवस्था के बारे में सोचने का मौका नहीं मिल पाया। जैसा था, वह चलता रहा। अखबार आठ से बारह पेज के हुए। नब्बे का दशक खत्म होते-होते 16 पेज के हो गए। अब 20 के हो गए हैं। ज्यादातर हिन्दी अखबारों ने लोकल पेज बढ़े। चार पेज, फिर छह पेज, फिर आठ पेज की लोकल कवरेज हो रही है। जितनी खबरें नहीं हैं, उससे ज्यादा बनाई जा रहीं हैं। तारीफ में या टाँग खिचाई में खबरें लिखीं जा रहीं हैं। निरर्थक सनसनी के लिए भी। मनरेगा, आरटीआई, खेती-बाड़ी, शिक्षा, कमज़ोर वर्गों का उत्थान, नए रोज़गार ऐसे तमाम मसले हैं, जिनपर काफी काम किया जा सकता है। यह वह स्तर है, जहाँ गवर्नेंस का परीक्षण होना है। पर जिलों में पत्रकारों की ट्रेनिंग का इंतज़ाम नहीं है। सिर्फ पत्रकारिता का कार्ड चाहिए।

सेवंती नायनन ने अपनी पुस्तक हैडलाइंस फ्रॉम द हार्टलैंड में ग्रामीण क्षेत्रों के संवाद संकलन का रोचक वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है कि ग्रामीण क्षेत्र में अखबार से जुड़े कई काम एक जगह पर जुड़ गए। सेल्स, विज्ञापन, समाचार संकलन और रिसर्च सब कोई एक व्यक्ति या परिवार कर रहा है। खबर लिखी नहीं एकत्र की जा रही है। उन्होंने छत्तीसगढ़ के कांकेर-जगदलपुर हाइवे पर पड़ने वाले गाँव बानपुरी की दुकान में लगे साइनबोर्ड का ज़िक्र किया है, जिसमें लिखा है-आइए अपनी खबरें यहां जमा कराइए। खबरों के कारोबार से लोग अलग-अलग वजह से जुड़े हैं। इनमें ऐसे लोग हैं, जो तपस्या की तरह कष्ट सहते हुए खबरों को एकत्र करके भेजते हैं। नक्सली खौफ, सामंतों की नाराज़गी, और पुलिस की हिकारत जैसी विपरीत परिस्थितियों का सामना करके खबरें भेजने वाले पत्रकार हैं। ऐसे भी हैं, जो टैक्सी चलाते हैं, रास्ते में कोई सरकारी मुलाजिम परेशान न करे इसलिए प्रेस का कार्ड जेब में रखते हैं।

हिन्दी अखबारों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष लोकल कवरेज है। अखबारों में ऐसी खबरें छप रहीं हैं, जो हैं ही नहीं। जो हुआ ही नहीं। और जो हुआ, वह नहीं छपा। पत्रकारीय निष्ठा और मूल्यबद्ध कर्म की गौरव गाथाएं हैं, तो निहायत गैर-जिम्मेदारी के प्रसंग भी। इनके कार्टल बन गए हैं, जो अपने ढंग से खबरों को संचालित करते हैं। पत्रकारों की यह टीम राष्ट्रीय, प्रादेशिक और स्थानीय अखबारों और चैनलों को सामग्री मुहैया कराती है। इस लेवल के पत्रकारों पर अपने मैनेजमेंट की ओर से विज्ञापन लाने का दबाव भी है। कह नहीं सकते कि यह दबाव रहेगा या खत्म होगा, पर सूचना की ताकत और सूचना संकलन की पद्धति को ऑब्जेक्टिव और फेयर रखना है तो उसके कारोबारी रिश्तों को अच्छी तरह परिभाषित करना होगा। उसके पहले यह तय होना है कि इसका असर किसपर होता है। इसके बाद तय होगा कि इसे कौन परिभाषित करेगा और क्यों करेगा। आज टेलीफोन कनेक्शन पाने के लिए पत्रकार बनने की ज़रूरत नहीं है। पर सम्भव है मेरे पड़ोसी ने पत्रकारिता के कुछ नए संदर्भ खोजे हों। 


समाचार फॉर मीडिया डॉट कॉम में प्रकाशित

Sunday, June 6, 2010

बदलता वक्त, बदलता मैं


कल मैं कोई पोस्ट नहीं लिख पाया। मैं ब्लॉग लेखन को अपनी आदत में शामिल नहीं कर पाया हूँ। मेरी आदत दैनिक अखबार के काम के हिसाब से ढली है। उसे बदलने में वक्त लगेगा, फिर मैं पूरी तरह से कार्य मुक्त नहीं हुआ हूँ। शायद फिर कहीं काम करूँ।

अखबार में हमारे काम का तरीका अगली सुबह के पाठक को ध्यान में रख कर बनता है। नेट पर या टीवी पर उसी वक्त का पाठक होता है। हर क्षण पर नज़र रखने की एक मशीनरी होती है। मुझे एक साल टीवी में काम करने का मौका भी मिला। वहाँ के काम में अजब सी मस्ती और रचनात्मकता होती है, पर कोई नहीं जानता कि उसने क्या किया। मसलन किसी की स्क्रिप्ट, किस पैकेज के साथ गई, उसकी एंकर रीड कहीं बनी, वीओ किसी ने किया, ग्रैफिक्स का रिसर्च कहीं हुआ। उसके कैप्शन कहीं बने। इसके बाद इसपर डिस्को और फोनो कोई कर रहा है। किसी एक व्यक्ति को अपने पूरे काम का सतोष नहीं होता। शायद टीम का संतोष होता है, पर इस मीडिया में सामने दिखाई पड़ने वाले यानी एंकर का इतना महत्व है कि बाकी लोगों के मन में एक प्रकार का क्लेश रहता है।

टीवी मे टीज़र होते हैं, बम्पर होते हैं। मुझे अब भी लगता है कि टीवी फिल्म मेकिंग का शानदार माध्यम है, उसे न्यूज़ का माध्यम बनाते वक्त उसकी नाटकीयता को बहुत कम करना होगा। यह बात मैं किसी टीवी न्यूज़ वाले से कहूँगा, तो मुझे पागल समझेगा। टीवी में नाटकीयता बढ़ाने वाले तत्वों का हमेशा स्वागत होता है। मुझपर प्रिंट की तटस्थता का प्रभाव है। इसमें खबर लिखने वाले को अपनी मनोभावना या विचार को व्यक्त नहीं करना होता है।

टीवी में मनोभावना दिखाई नहीं जा सकती। प्रिंट में कम से लिखी जा सकती है। यह लिखा जा सकता है कि मैं शर्म से ज़मीन में समा गया या शर्म से लाल हो गया। टीवी में या तो ज़मीन में सीधे समाते हुए दिखाना होगा या लाल होते हुए। दरअसल उसका मुहावरा अलग है। मैने अपनी बात कहीं से शुरू की थी, कहीं और जा रही है। मैं केवल इतना कहना चाहता था कि वर्षों से हम जिस मुहावरे में जीते हैं, उसे ही अंतिम मान लेते हैं। ज़रूरत बदलने की होती है। मैं समय के हिसाब से खुद को बदलना चाहता हूँ।

यह ब्लॉग मैने करीब साढ़े पाँच साल पहले बनाया। पहले सोचा था, अपने नाम से नहीं लिखूँगा। हिन्दी में लिखना चाहता था, पर यूनीकोड फॉण्ट पर हिन्दी में लिखना नहीं आता था। अखबार का फॉण्ट यहाँ काम नहीं करता था। फिर वक्त भी कम मिलता था। पहले सोचा था अंग्रेज़ी में लिखूँ, पर मैं सोचता तो हिन्दी में हूँ। आखिरकार एक जगह हिन्दी में यूनीकोड को इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड पर लिखने का लिंक मिल गया। ब्लॉग का टेम्प्लेट दो-तीन बार बदला। टाइटिल लोगो बनाने के लिए ड्रॉइंग का कोई सॉफ्टवेयर नहीं था। इसे पेंट-ब्रश पर बनाया। विजेट्स क्या होते हैं नहीं जानता था। अब समझ में आने लगे हैं। किसी एग्रीगेटर से कैसे जोड़ते हैं, मालूम नहीं था। आखिरकार ब्लॉगवाणी से कनेक्शन जुड़ गया। चिट्ठाजगत से आजतक नहीं जोड़ पाया। लॉगिन करता हूँ, पर कुछ होता नहीं। बहरहाल अब हर रोज दस-बीस नए पाठक आने लगे हैं। पचास से सवा सौ तक पेज व्यूज़ हो जाते हैं। यह सख्या कम है, पर बढ़ेगी।

मैं मीडिया और करेंट अफेयर्स पर लिखना चाहता हूँ। कल मैं सोमालिया के समुद्री डाकुओं पर लिखने जा रहा था। उसपर पढ़ना शुरू किया तो लगा कि यह केवल सोमालिया की समस्या नहीं है। फिर इसमें कहीं न कहीं राज्य की भूमिका है। इसपर अंतरराष्ट्रीय संधियां हैं, पर वे राजनैतिक कारणों से लागू नहीं हो पातीं हैं। अनेक मामले इंश्योरेंस का पैसा वसूलने के कारण भी हैं, फिर इश्योरेंस कम्पनियो के खेल भी हैं। अब वह पोस्ट मैं दो-एक दिन बाद लिखूँगा।

मैं रोज का ग्लोबल अपडेट भी देना चाहता हूँ। अखबारों और मीडिया के युवा संचालक बुरा न मानें तो मैं इतना कहना चाहता हूँ कि आप ग्लोबल थिंकिंग तो चाहते हैं, पर ग्लोबल इनफॉर्मेशन नहीं देते। ज्यादातर अखबारों में विदेशी खबरों का मतलब होता है बिकनी बालाओं के चार-पाँच फोटो। इसमें रैम्प पर चलती बालाएं भी हो सकतीं हैं। साइंस और मेडिकल साइंस पर खासतौर से खबरें होतीं है, पर उनमें सनसनी का पुट देने की कोशिश होती है। स्पेस रिसर्च की खबरें भी डेकोरेटिव ज्यादा हैं, सूचनाप्रद कम। मुझे लगता है मुझे खुद को बदलने की ज़रूरत है और अगर मैं समझता हूँ कि मीडिया को भी बदलना चाहिए तो उसे आगाह करने की ज़रूरत भी है। सजावट की सूचना का ट्रेंड ग्लोबल नहीं है। हमारे देश में कुछ साल पहले तक दो-एक साइंस की पत्रिकाएं निकलतीं थीं, वे अब नहीं निकलतीं। पर अमेरिकन साइंटिस्ट, न्यू साइंटिस्ट, नेचर या पॉपुलर साइंस तो बंद नहीं हुईं। हम न जाने क्यों सिर्फ सजावटी चीजें पसंद करते हैं। उनकी गहराई में नहीं जाना चाहते।

एक पोस्ट मैंने जातीय जनगणना पर लिखी थी अब एक और लिखूँगा। इस सिलसिले में मैं अभी तक जो देख रहा हूँ, उसमें लिखने वाले के विचार से ज्यादा लिखने वाले की पहचान महत्वपूर्ण होती है। चारों ओर बहुत ज्यादा भावावेश हैं। कोई व्यक्ति अपने नाम के आगे जातीय नाम नहीं लगाता, तब भी उसकी जाति का अनुमान लगाने की कोशिश की जाती है। मैं कोशिश करूँगा कि मेरी पोस्ट ऑब्जेक्टिव हो। मेरा मंतव्य अपने विचार से ज्यादा उपलब्ध जानकारियाँ उपलब्ध कराना है। पत्रकार का एक काम यह भी है।

यह पोस्ट सिर्फ एक प्रकार का अंतर्मंथन हैं। मैं कोशिश करूँगा कि अपनी जानकारी को बढ़ाऊँ और आपसे शेयर करूँ।

Friday, June 4, 2010

विश्व कप अपडेट-3

विश्व कप की सभी टीमों के खिलाड़ियों के नाम जारी हो गए हैं। केवल उत्तर कोरिया के टीम मैनेजमेंट की गलती के कारण एक खिलाड़ी को खेलने का मौका नहीं मिल पाएगा। उन्होने अपने स्ट्राइकर किम म्योंग वोन का नाम गोलकीपर के रूप में लिखवा दिया। पता नहीं ऐसा क्यों किया। शायद उन्हें लगता हो कि दो गोलकीपरों से काम चला लेंगे। तीसरे को स्ट्राइकर के रूप में खिला लेंगे, पर नियमानुसार गोलकीपर फील्ड पोजीशन पर नहीं खेल सकते। हर टीम में तीन गोलकीपर होना भी ज़रूरी है। यहाँ पर उत्तर कोरिया की टीम गच्चा खा गई है। 


उत्तर कोरिया की टीम इससे पहले 1966 में खेलने आई थी और क्वार्टर फाइनल तक पहुँची थी। इन दिनों एक जहाज को डुबो देने के कारण उसकी दक्षिण कोरिया से तनातनी चल रही है। यों भी उत्तर कोरिया के नेतृत्व का विश्वास विवाद खड़े करने में रहता है। एशिया से इस बार दोनों कोरिया, जापान और ऑस्ट्रेलिया की टीमें हैं। ऑस्ट्रेलिया को इस ग्रुप में डालकर यों भी ऑस्ट्रेलिया के क्वालिफाई होने का रास्ता आसान कर दिया है। उधर न्यूजीलैंड ओसनिया ग्रुप से आसानी से क्वालिफाई करता है। 


सभी टीमों के खिलाड़ियों के नाम, उनकी उम्र और उनके क्लबों के नाम दिए हैं। गौर करें किस देश का खिलाड़ी खेलता कहाँ है और किस देश का प्रतिनिधित्व करता है। तमाम खिलाड़ी ऐसे हैं जो एक ही क्लब से खेलते रहे हैं और विश्व कप में एक-दूसरे के खिलाफ खेलेंगे। 
फीफा विश्व कप 2010

Thursday, June 3, 2010

बंगाल में ममता की जीत

बंगाल में ममता बनर्जी ने निरंतर अपने प्रयास से वाम मोर्चे के दुर्ग में दरार पैदा कर दी है। हलांकि ये नगरपालिकाओं के चुनाव थे। इनसे गाँवों की कहानी पता नहीं लगती, पर 2009 के लोक सभा चुनाव में स्पष्ट हो गया था कि तृणमूल पार्टी ने ग्रामीण क्षेत्र में भी अच्छी घुसपैठ कर ली है। इन परिणामों का संदेश यह है कि वाममोर्चा नैतिक रूप से बंगाल पर राज करने का अधिकार खो चुका है। बेशक वह चाहे तो एक साल तक उसकी सरकार और चल सकती है, पर यह सिर्फ वक्त बिताना होगा। अब जैसे-जैसे दिन बीतेंगे ममता बनर्जी का दबाव बढ़ता जाएगा।

बंगाल पर वाम मोर्चे के शासन के अच्छे और बुरे पहलू दोनों हैं। वाम मोर्चे ने यहाँ तीन दशक से ज्यादा समय तक शासन किया। यह दुनिया के किसी भी इलाके मे लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सबसे पुरानी कम्युनिस्ट सरकार  है। इतने अर्से से शासन में रहने के कारण पूरी व्यवस्था मे एक संगति है। वाम मोर्चे के कार्यकर्ताओं ने प्रदेश में सिर्फ राजनीति ही नहीं की, सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों को चलाया। सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार पर अंकुश रखने का एक बेहतर तरीका पार्टी के पास था। पर इस परिस्थिति ने पार्टी कार्यकर्ताओं की एक समांतर शक्ति भी तैयार कर दी। पार्टी कार्यकर्ता अगर समझदार और अनुशासित होते तो वाममोर्चे को हरा पाना आसान न होता। अब वाममोर्चा हार चुका है। वाम मोर्चे के कार्यकर्ता इतने ताकतवर थे कि कोई दूसरा गाँवो के भीतर घुस नहीं सकता था। वे बुनियाद तक प्रवेश कर चुके थे। इनके बीच तृणमूल कार्यकर्ता अगर पहुँचे हैं तो इसका मतलब है वे कम ताकतवर नहीं हैं। साथ ही उन्हें वाममोर्चे के कुंठित कार्यकर्ताओं का समर्थन भी हासिल है। इनमें नक्सली भी शामिल हैं।

बंगाल में चुनाव कब होंगे, यह परिस्थितियाँ बताएंगी, पर इतना लगता है कि कांग्रेस और तृणमूल को साथ आना होगा, क्योंकि नगरपालिका चुनाव में कोलकाता में तो ममता बनर्जी ने जबर्दस्त विजय हासिल कर ली, पर शेष प्रदेश में उसे 80 में 27 और कांग्रेस को 7 नगरपालिकाओं में ही जीत हासिल हुई। वाममोर्चा को 2005 में जहां 60 पालिकाओं पर जीत मिली थी, इसबार सिर्फ 17 पर जीत मिली। 29 पालिकाओं में त्रिशंकु सदन हैं। इसका मतलब है वाममोर्चा हार गया है, पर तृणमूल पूरी तरह जीती नहीं है। आज कोलकाता के अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ का शीर्षक ध्यान देने लायक है, 'क्वीन ऑफ कैलकटा, नॉट ऑफ बंगाल यट'

बंगाल एक जबर्दस्त अंतर्मंथन से गुजर रहा है। पिछले 33 साल में वहां राजनैतिक कार्यकर्ताओं की कम से कम दो पीढ़ियाँ तैयार हो चुकीं हैं। अचानक उनके सिर से साया हटने का मतलब है बेचैनी। यह बेचैनी अगले चुनाव तक मुखर होकर दिखाई पड़ेगी। बंगाल की राजनीति में लहू भी बहुत बहता है। और यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अच्छी बात नहीं।